उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण
धरती पर जीवन का आधार सूर्य की ऊर्जा को पकड़ने की पौधों की अद्भुत क्षमता है। हरे पौधे प्रकाश-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलकर अपना भोजन स्वयं बनाते हैं — और इस प्रक्रिया में वायुमंडल को ऑक्सीजन भी देते हैं। इस अध्याय में हम इस जटिल प्रक्रिया के हर चरण को विस्तार से समझेंगे।
भूमिका प्रकाश-संश्लेषण क्यों आवश्यक है?
क्या आपने कभी सोचा है कि पेड़-पौधे बिना भोजन की तलाश किए कैसे जीवित रहते हैं? वे अपनी आवश्यकता का भोजन स्वयं निर्मित करते हैं — इसीलिए उन्हें स्वपोषी (autotrophs) कहा जाता है। मनुष्य, पशु और अधिकांश अन्य जीव विषमपोषी (heterotrophs) हैं, जो भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर रहते हैं।
प्रकाश-संश्लेषण एक भौतिक-रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें सौर ऊर्जा को अकार्बनिक पदार्थों (CO₂ और H₂O) से जटिल कार्बनिक यौगिकों (शर्करा) में रूपांतरित किया जाता है। इसके दो सबसे बड़े योगदान हैं — (1) यह पृथ्वी के अधिकांश खाद्य पदार्थों का प्राथमिक स्रोत है, और (2) इसके फलस्वरूप वायुमंडल में ऑक्सीजन मुक्त होती है, जो लगभग सभी जीवों की श्वसन के लिए अनिवार्य है।
11.1 हम पहले से क्या जानते हैं
पिछली कक्षाओं में किए गए प्रयोगों से हम जानते हैं कि प्रकाश-संश्लेषण के लिए पर्णहरित (क्लोरोफिल), प्रकाश और कार्बन डाइऑक्साइड — तीनों की अनिवार्यता होती है।
याद कीजिए — जब किसी शबलित (वैरिगेटेड) पत्ती या आंशिक रूप से काली पन्नी से ढकी पत्ती को धूप में रखकर स्टार्च परीक्षण किया जाता है, तो केवल वही भाग नीला-काला दिखता है जो हरा था और प्रकाश में था — बाकी भाग नकारात्मक परिणाम देते हैं।
चित्र 11.1 — प्रारंभिक प्रयोगों के सेटअप, जो स्टार्च निर्माण के लिए प्रकाश एवं CO₂ की अनिवार्यता दर्शाते हैं
एक अन्य प्रयोग में, पत्ती का एक भाग KOH-भीगी रूई युक्त परखनली के अंदर (CO₂-मुक्त वातावरण) रखा जाता है, जबकि शेष भाग खुला रहता है — बाद में केवल खुले भाग में ही स्टार्च पाया जाता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि CO₂ भी प्रकाश-संश्लेषण हेतु अत्यावश्यक है।
11.2 शुरुआती प्रयोग
प्रकाश-संश्लेषण की वर्तमान समझ अनेक वैज्ञानिकों के योगदान से बनी है। आइए कुछ प्रमुख खोजों पर नज़र डालें।
जोसेफ प्रीस्टले (1733–1804)
सन 1770 के आसपास प्रीस्टले ने दिखाया कि एक बंद बेलजार में रखी जलती मोमबत्ती जल्दी बुझ जाती है, और उसी बेलजार में रखा चूहा भी जीवित नहीं रह पाता — उन्होंने इसे “हवा का खराब होना” कहा। पर जब उसी बेलजार में पुदीने का पौधा रखा गया, तो चूहा जीवित रहा और मोमबत्ती भी जलती रही। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि पौधे “खराब हवा” को शुद्ध कर देते हैं।
जॉन इंजेनहाउज (1730–1799)
इंजेनहाउज ने प्रीस्टले के प्रयोगों को दोहराया, परंतु एक सेटअप को अंधेरे और दूसरे को सूर्यप्रकाश में रखा। उन्होंने पाया कि हवा की शुद्धि केवल प्रकाश में ही होती है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जलीय पौधे का उपयोग करके यह भी दिखाया कि धूप में उसके हरे भाग के आस-पास बुलबुले (जो बाद में ऑक्सीजन सिद्ध हुए) बनते हैं, जबकि अंधेरे में ऐसा नहीं होता — यानी केवल हरा भाग ही ऑक्सीजन मुक्त करने में समर्थ है।
जूलियस वॉन सैक्स (1832–1897)
सैक्स ने 1854 के आसपास यह सिद्ध किया कि पौधों में वृद्धि के दौरान ग्लूकोज (शर्करा) का निर्माण होता है, जो प्रायः स्टार्च के रूप में संचित होती है। उन्होंने यह भी पहचाना कि क्लोरोफिल क्लोरोप्लास्ट नामक कोशिकांग के भीतर स्थित होता है।
टी.डब्ल्यू. एंजिलमैन (1843–1909)
एंजिलमैन ने एक प्रिज्म का उपयोग कर प्रकाश को विभिन्न रंगों में बाँटा और उस पर हरे शैवाल (क्लैडोफोरा) तथा ऑक्सीजन-प्रेमी जीवाणुओं का एक साथ उपचार किया। जीवाणु मुख्यतः लाल और नीले प्रकाश वाले क्षेत्रों में एकत्रित हुए — यह दर्शाता है कि प्रकाश-संश्लेषण की दर इन्हीं रंगों में अधिकतम होती है। यह क्रियात्मक वर्णक्रम (action spectrum) क्लोरोफिल a के अवशोषण वर्णक्रम से मेल खाता है।
कॉर्नेलियस वैन नील (1897–1985)
वैन नील ने बैंगनी व हरे जीवाणुओं पर अध्ययन कर यह परिकल्पना प्रस्तावित की कि प्रकाश-संश्लेषण एक प्रकाश-चालित अपचयोपचय (रेडॉक्स) अभिक्रिया है, जिसमें कोई हाइड्रोजन-दाता (जैसे H₂S या H₂O) CO₂ को अपचयित कर कार्बोहाइड्रेट बनाता है।
हरे पौधों में H₂A = H₂O है, अतः O₂ मुक्त होती है; जबकि कुछ जीवाणु H₂S का उपयोग करते हैं, जिनसे सल्फर या सल्फेट निकलता है, ऑक्सीजन नहीं। इसी से सिद्ध हुआ कि मुक्त ऑक्सीजन का स्रोत जल है, CO₂ नहीं — बाद में O¹⁸ समस्थानिक प्रयोगों से इसकी पुष्टि हुई।
ध्यान दें कि यह एक बहु-चरणीय जैव रासायनिक प्रक्रिया है, न कि एक सरल एक-चरणीय अभिक्रिया।
11.3 प्रकाश-संश्लेषण कहाँ संपन्न होता है
यह प्रक्रिया मुख्यतः पत्तियों की मेसोफिल कोशिकाओं में स्थित क्लोरोप्लास्ट में होती है, परंतु पौधे के किसी भी हरे भाग (जैसे हरा तना, हरे फल) में भी हो सकती है।
क्लोरोप्लास्ट की आंतरिक संरचना में एक झिल्ली-तंत्र (ग्राना, स्ट्रोमा लैमिली) तथा स्ट्रोमा (तरल मैट्रिक्स) सम्मिलित होते हैं। झिल्ली-तंत्र प्रकाश-ऊर्जा ग्रहण कर ATP व NADPH बनाता है, जबकि स्ट्रोमा में एंजाइमेटिक क्रियाएँ होती हैं जो CO₂ को स्थिर कर शर्करा बनाती हैं।
चित्र 11.2 — क्लोरोप्लास्ट की संरचना: ग्राना, स्ट्रोमा लैमिली, स्टार्च कणिकाएँ
11.4 वर्णक और उनकी भूमिका
पत्तियों का हरापन एक नहीं, बल्कि कई वर्णकों के मिश्रण से बनता है। पेपर क्रोमेटोग्राफी द्वारा उन्हें अलग किया जा सकता है।
क्लोरोफिल a
नीला-हरा रंग; मुख्य प्रकाश-संश्लेषी वर्णक; अभिक्रिया-केंद्र में उपस्थित।
क्लोरोफिल b
पीला-हरा; सहायक वर्णक, ऊर्जा क्लोरोफिल a को स्थानांतरित करता है।
जैन्थोफिल
पीला; कैरोटीनॉएड समूह का सहायक वर्णक।
कैरोटीन
नारंगी-पीला; सहायक वर्णक, अतिरिक्त प्रकाश-ऊर्जा अवशोषित कर क्लोरोफिल a को हानि से बचाता है।
वर्णक प्रकाश की विशिष्ट तरंगदैर्घ्यों को अवशोषित करते हैं। क्लोरोफिल a का अवशोषण स्पेक्ट्रम नीले (लगभग 430 nm) और लाल (लगभग 662 nm) क्षेत्रों में चोटियाँ दिखाता है — यही क्षेत्र प्रकाश-संश्लेषण के क्रियात्मक स्पेक्ट्रम से सर्वाधिक मेल खाते हैं।
सहायक वर्णक (क्लोरोफिल b, कैरोटीन, जैन्थोफिल) उन तरंगदैर्घ्यों को भी अवशोषित कर लेते हैं जिन्हें क्लोरोफिल a नहीं पकड़ पाता, और फिर वह ऊर्जा अनुनाद स्थानांतरण द्वारा क्लोरोफिल a तक पहुँचाते हैं। ये वर्णक अत्यधिक प्रकाश-तीव्रता में क्लोरोफिल a को फोटोऑक्सीडेशन से भी सुरक्षा प्रदान करते हैं।
11.5 प्रकाश अभिक्रिया — परिचय
प्रकाश अभिक्रिया (प्रकाश-रसायन चरण) में चार प्रमुख क्रियाएँ होती हैं: प्रकाश का अवशोषण, जल का विघटन, ऑक्सीजन का मुक्त होना, तथा ATP व NADPH का निर्माण। इस पूरी प्रक्रिया में दो प्रकाश-तंत्र (फोटोसिस्टम) — PS I व PS II — क्रमबद्ध रूप से कार्य करते हैं।
चित्र 11.3 — प्रकाश-संग्राहक तंतुजाल (LHC): अनेक वर्णक-अणु ऊर्जा को अभिक्रिया-केंद्र (P680/P700) तक पहुँचाते हैं
प्रत्येक फोटोसिस्टम में एक अभिक्रिया-केंद्र होता है — PS I में P700 (अधिकतम अवशोषण 700 nm) तथा PS II में P680 (अधिकतम अवशोषण 680 nm)। शेष वर्णक प्रकाश-संग्राहक परिसर (ऐन्टेनी) का निर्माण करते हैं, जो ऊर्जा को अभिक्रिया-केंद्र की ओर फ़नल (केंद्रित) करता है।
11.6 इलेक्ट्रॉन परिवहन (Z-स्कीम)
PS II के P680 द्वारा 680 nm प्रकाश के अवशोषण पर एक इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर प्राथमिक ग्राही (क्विनोन) को सौंप दिया जाता है। यह इलेक्ट्रॉन तब प्लास्टोक्विनोन (PQ) और साइटोक्रोम b₆f कॉम्प्लेक्स से होकर PS I तक पहुँचता है। इस यात्रा के दौरान इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा में कमी आती है, जिसका उपयोग प्रोटॉन-पम्प करने में होता है।
PS I का P700 भी प्रकाश-ऊर्जा अवशोषित कर अपना इलेक्ट्रॉन खोता है, जो फेरेडॉक्सिन (Fd) और NADP रिडक्टेस के माध्यम से NADP⁺ + H⁺ को अपचयित कर NADPH बनाता है।
चित्र 11.4 — Z-स्कीम: PS II → ETS → PS I → NADPH तक इलेक्ट्रॉन प्रवाह
इस संपूर्ण इलेक्ट्रॉन प्रवाह का आकार अंग्रेज़ी अक्षर Z जैसा होता है, इसलिए इसे Z-स्कीम कहा जाता है।
11.6.1 जल का विघटन (फोटोलिसिस)
PS II को इलेक्ट्रॉनों की आपूर्ति जल (H₂O) के विघटन से होती है, जो PS II के निकट मैंगनीज-युक्त परिसर पर संपन्न होती है।
यह विघटन थाइलेकोइड की भीतरी सतह (ल्यूमेन की ओर) पर होता है, अतः मुक्त हुए प्रोटॉन और O₂ ल्यूमेन में ही जाते हैं।
11.6.2 चक्रीय एवं अचक्रीय फोटोफॉस्फोरीलेशन
अचक्रीय फोटोफॉस्फोरीलेशन — जब PS II और PS I दोनों क्रम से कार्य करते हैं, इलेक्ट्रॉन परिवहन अरैखिक (लीनियर) होता है, और ATP तथा NADPH दोनों बनते हैं।
चक्रीय फोटोफॉस्फोरीलेशन — केवल PS I सक्रिय होता है, इलेक्ट्रॉन PS I में ही लौट आता है, केवल ATP बनता है, NADPH नहीं। यह तब होता है जब प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 680 nm से अधिक होती है, और यह मुख्यतः स्ट्रोमा लैमिली में संपन्न होता है।
11.6.3 रसोपरासरणी परिकल्पना
ATP का संश्लेषण थाइलेकोइड झिल्ली के आर-पार प्रोटॉन-प्रवणता (gradient) द्वारा होता है। प्रोटॉन (H⁺) निम्नलिखित स्रोतों से ल्यूमेन में संचित होते हैं:
- जल-विघटन से सीधे ल्यूमेन में H⁺ मुक्त होना
- इलेक्ट्रॉन परिवहन के दौरान प्रोटॉन का स्ट्रोमा से ल्यूमेन में पम्प होना (PQ द्वारा)
- NADP⁺ के अपचयन के लिए स्ट्रोमा से H⁺ लिया जाता है, जिससे स्ट्रोमा का pH बढ़ जाता है और अंतर बढ़ता है
इस प्रवणता के कारण प्रोटॉन ATP सिन्थेज (CF₀-CF₁ कॉम्प्लेक्स) के माध्यम से स्ट्रोमा में वापस विसरित होते हैं, जिससे ATP का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया श्वसन के रसोपरासरण के समान है, परंतु यहाँ प्रोटॉन ल्यूमेन में जमा होते हैं (श्वसन में अंतरा-झिल्ली स्थान में)।
11.7 ATP व NADPH का उपयोग
प्रकाश अभिक्रिया के उत्पाद — ATP, NADPH और O₂ — में से O₂ बाहर निकल जाती है, जबकि ATP और NADPH स्ट्रोमा में होने वाली कार्बन-स्थिरीकरण अभिक्रियाओं में उपयोग होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से जैवसंश्लेषण चरण कहा जाता है।
यह चरण प्रकाश पर प्रत्यक्ष निर्भर नहीं होता, परंतु प्रकाश अभिक्रिया के उत्पादों पर निर्भर है — इसलिए "अंधकार अभिक्रिया" नाम भ्रामक हो सकता है, क्योंकि यह बिना ATP/NADPH के नहीं चल सकती।
11.7.1 CO₂ का प्राथमिक ग्राही
मेलविन कैलविन ने रेडियोऐक्टिव ¹⁴CO₂ का उपयोग कर शैवाल में पाया कि CO₂ स्थिरीकरण का पहला स्थायी उत्पाद 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (PGA) है — एक तीन-कार्बन यौगिक। इसी पथ को केल्विन चक्र कहा गया।
बाद में पता चला कि CO₂ का प्राथमिक ग्राही पाँच-कार्बन वाला रिब्यूलोज 1,5-बाइफॉस्फेट (RuBP) है, जो रुबिस्को एंजाइम की सहायता से CO₂ से जुड़कर PGA के दो अणु बनाता है।
11.7.2 केल्विन चक्र
केल्विन चक्र को तीन चरणों में बाँटा गया है:
चित्र 11.5 — केल्विन चक्र: कार्बोक्सिलेशन, अपचयन, पुनरुद्भवन
इस प्रकार केल्विन चक्र के एक चक्कर में (एक CO₂ के लिए) 3 ATP और 2 NADPH की खपत होती है। एक ग्लूकोज अणु के लिए 6 चक्कर लगते हैं, अतः 18 ATP तथा 12 NADPH की आवश्यकता होती है।
| अंदर जाने वाले पदार्थ | बाहर निकलने वाले पदार्थ |
|---|---|
| 6 CO₂ | 1 ग्लूकोज |
| 18 ATP | 18 ADP + Pi |
| 12 NADPH | 12 NADP⁺ |
11.8 C₄ पथ
C₄ पथ उष्णकटिबंधीय, शुष्क क्षेत्रों के पौधों (जैसे मक्का, गन्ना, ज्वार) में पाया जाता है। इसमें CO₂ स्थिरीकरण का पहला उत्पाद चार-कार्बन यौगिक (OAA) होता है, परंतु अंतिम शर्करा-निर्माण केल्विन चक्र द्वारा ही होता है — यह चक्र C₄ पौधों में पूलाच्छद (बंडल शीथ) कोशिकाओं में सीमित रहता है।
इन पौधों की पत्ती की शारीरिकी क्रांज़ शारीरिकी (Kranz anatomy) कहलाती है, जिसमें संवहन बंडल के चारों ओर बड़ी, मोटी भित्ति वाली, क्लोरोप्लास्ट-युक्त पूलाच्छद कोशिकाओं का छल्ला (माला) बना होता है।
चित्र 11.6 — C₄ पौधे की पत्ती में क्रांज़ शारीरिकी: पूलाच्छद कोशिकाएँ मालाकार घेरा बनाती हैं
हैच-स्लैक पथ (C₄ पथ) के चरण:
तालिका 11.1 — C₃ एवं C₄ पौधों की तुलना
| विशेषता | C₃ पौधे | C₄ पौधे |
|---|---|---|
| केल्विन चक्र का स्थान | मीजोफिल कोशिका | पूलाच्छद कोशिका |
| प्रारंभिक कार्बोक्सिलेशन | मीजोफिल में | मीजोफिल में |
| CO₂ ग्राही | RuBP (5C) | PEP (3C) |
| पहला उत्पाद | PGA (3C) | OAA (4C) |
| रुबिस्को उपस्थिति | हाँ (मीजोफिल में) | हाँ (केवल पूलाच्छद में) |
| PEPcase उपस्थिति | नहीं | हाँ (मीजोफिल में) |
| प्रकाश श्वसन | उच्च | नगण्य |
| इष्टतम तापमान | ~20–25°C | 30–40°C |
| उदाहरण | गेहूँ, चावल, सोयाबीन | मक्का, गन्ना, ज्वार |
11.9 प्रकाश श्वसन (Photorespiration)
रुबिस्को की विशेषता यह है कि इसका सक्रिय स्थल CO₂ के अतिरिक्त O₂ से भी जुड़ सकता है। जब O₂ जुड़ती है, तो RuBP ऑक्सीजनीकृत होकर एक अणु PGA (3C) और एक अणु फॉस्फोग्लाइकोलेट (2C) बनाता है। इस प्रक्रिया को प्रकाश श्वसन कहा जाता है।
प्रकाश श्वसन में:
- न तो ATP बनता है, बल्कि ATP की खपत होती है।
- CO₂ मुक्त होती है, परन्तु कोई शर्करा नहीं बनती।
- NADPH का कोई संश्लेषण नहीं होता।
- यह एक ऊर्जा-अपव्ययी (wasteful) प्रक्रिया है, जिसका कोई स्पष्ट जैविक कार्य अभी ज्ञात नहीं है।
C₄ पौधों में प्रकाश श्वसन नगण्य होता है, क्योंकि पूलाच्छद में CO₂ की उच्च सांद्रता रुबिस्को को ऑक्सीजिनेस की बजाय कार्बोक्सिलेस की तरह कार्य करने के लिए बाध्य कर देती है।
11.10 प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक
प्रकाश-संश्लेषण की दर कई बाह्य और आंतरिक कारकों पर निर्भर करती है। आंतरिक कारकों में पत्ती की आयु, क्लोरोफिल सामग्री, मेसोफिल कोशिकाओं का अभिविन्यास आदि शामिल हैं। बाह्य कारक हैं — प्रकाश, CO₂, तापमान, जल, एवं खनिज पोषण।
11.10.1 प्रकाश
कम प्रकाश तीव्रता पर दर रैखिक रूप से बढ़ती है; एक बिंदु (प्रकाश-संतृप्ति) के बाद यह स्थिर हो जाती है, क्योंकि अन्य कारक (जैसे CO₂) सीमाकारी बन जाते हैं। अत्यधिक प्रकाश क्लोरोफिल को क्षति पहुँचा सकता है (फोटोब्लीचिंग)।
11.10.2 कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता
वायुमंडलीय CO₂ (0.03–0.04%) आमतौर पर सीमाकारी होती है। 0.05% तक बढ़ाने से दर बढ़ती है, लेकिन अत्यधिक उच्च सांद्रता (लंबे समय तक) पौधे के लिए हानिकारक हो सकती है। C₃ पौधों की CO₂ संतृप्ति ~450 µL L⁻¹ पर जबकि C₄ की ~360 µL L⁻¹ पर होती है।
11.10.3 तापमान
अप्रकाशी अभिक्रिया एंजाइम-निर्भर है, अतः तापमान-संवेदी है। C₄ पौधे उच्च तापमान (30–40°C) पर अधिक दक्ष होते हैं, जबकि C₃ पौधों का इष्टतम तापमान 20–25°C के आसपास होता है।
11.10.4 जल
जल की कमी रंध्रों के बंद होने, CO₂ प्रवेश में कमी, पत्ती मुरझाने तथा उपापचयी गतिविधियों में मंदी लाती है — ये सभी अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश-संश्लेषण को घटाते हैं।
परिचय वैज्ञानिक — मेलविन कैलविन
मेलविन कैलविन (1911–1997)
मिनेसोटा, अमेरिका में जन्मे कैलविन ने रसायन विज्ञान में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की और बर्कले विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन्होंने रेडियोआइसोटोप (¹⁴C) का उपयोग कर प्रकाश-संश्लेषण में कार्बन पथ का पता लगाया।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि CO₂ स्थिरीकरण का पहला उत्पाद 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल है, और संपूर्ण चक्रीय पथ (केल्विन चक्र) की खोज की। इस अनुसंधान के लिए उन्हें 1961 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आज भी उनका कार्य सौर-ऊर्जा रूपांतरण और जैव-ईंधन अनुसंधान का आधार है।
सार संक्षेप में समझें
प्रकाश-संश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमें हरे पौधे सूर्य-प्रकाश की उपस्थिति में CO₂ और H₂O से कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) बनाते हैं तथा O₂ मुक्त करते हैं। यह मुख्यतः क्लोरोप्लास्ट में संपन्न होता है, जहाँ दो चरण होते हैं — प्रकाश अभिक्रिया (Z-स्कीम द्वारा ATP व NADPH उत्पादन) तथा कार्बन अभिक्रिया (केल्विन चक्र द्वारा शर्करा-निर्माण)।
C₃ पौधों में पहला उत्पाद PGA होता है और प्रकाश श्वसन होता है; C₄ पौधों में पहला उत्पाद OAA होता है, प्रकाश श्वसन नगण्य होता है, और इनमें क्रांज़ शारीरिकी पाई जाती है। प्रकाश-संश्लेषण की दर प्रकाश तीव्रता, CO₂ सांद्रता, तापमान तथा जल की उपलब्धता से प्रभावित होती है।
अभ्यास स्वयं जाँचें
नीचे दिए गए प्रश्नों को हल करें और अपनी समझ का मूल्यांकन करें।
प्रश्न 1 क्या बाहरी स्वरूप देखकर C₃ और C₄ पौधों में अंतर किया जा सकता है? क्यों?
सामान्यतः नहीं, क्योंकि बाहरी आकार-प्रकार में कोई निश्चित अंतर नहीं होता। फिर भी, C₄ पौधे प्रायः उष्ण, शुष्क क्षेत्रों में पाए जाते हैं तथा उनकी पत्तियाँ अपेक्षाकृत संकरी व मोटी हो सकती हैं, परन्तु यह कोई निश्चित लक्षण नहीं है। निश्चित पहचान के लिए पत्ती की अनुप्रस्थ काट (क्रांज़ शारीरिकी) या पहले उत्पाद (PGA या OAA) का विश्लेषण आवश्यक है।
प्रश्न 2 पत्ती की आंतरिक संरचना देखकर क्या C₃ या C₄ होने का पता लगाया जा सकता है?
हाँ, C₄ पौधों में क्रांज़ शारीरिकी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है — संवहनी पूलाच्छद कोशिकाएँ बड़ी, मोटी भित्ति वाली, क्लोरोप्लास्ट-युक्त तथा मीजोफिल कोशिकाओं के चारों ओर मालाकार घेरा बनाती हैं। C₃ पौधों में यह विशेष व्यवस्था नहीं होती, पूलाच्छद कोशिकाएँ छोटी और प्रायः क्लोरोप्लास्ट-रहित होती हैं।
प्रश्न 3 C₄ पौधों की उत्पादकता C₃ पौधों से अधिक क्यों होती है, जबकि केल्विन चक्र केवल पूलाच्छद कोशिकाओं तक सीमित है?
C₄ पौधों में PEPcase द्वारा CO₂ को कम सांद्रता पर भी कुशलतापूर्वक स्थिर कर एक चार-कार्बन अम्ल बनाया जाता है, जो पूलाच्छद में CO₂ सांद्रता को बहुत बढ़ा देता है। इस उच्च सांद्रता के कारण रुबिस्को की ऑक्सीजिनेस क्रिया नगण्य होती है, जिससे प्रकाश श्वसन नहीं होता। अतः C₄ पौधे अपनी शुद्ध प्रकाश-संश्लेषण दर बनाए रखते हैं, जबकि C₃ पौधों में प्रकाश श्वसन के कारण कार्बन व ऊर्जा की हानि होती है — यही C₄ की अधिक उत्पादकता का मुख्य कारण है।
प्रश्न 4 C₄ पौधों में रुबिस्को अधिकतर कार्बोक्सिलेस की तरह क्यों कार्य करता है, ऑक्सीजिनेस की तरह नहीं?
क्योंकि C₄ पौधों की पूलाच्छद कोशिकाओं में C₄ अम्लों के विघटन से CO₂ सांद्रता कृत्रिम रूप से बहुत अधिक बढ़ा दी जाती है। यह उच्च CO₂/O₂ अनुपात रुबिस्को के सक्रिय स्थल पर CO₂ के बंधन को बढ़ावा देता है तथा O₂ के बंधन को रोकता है, जिससे ऑक्सीजिनेस क्रिया दब जाती है और कार्बोक्सिलेस क्रिया प्रधान हो जाती है।
प्रश्न 5 यदि किसी पत्ती में क्लोरोफिल b अधिक मात्रा में हो, पर क्लोरोफिल a न हो, तो क्या प्रकाश-संश्लेषण हो पाएगा? सहायक वर्णकों का क्या महत्व है?
नहीं, क्योंकि प्रकाश-रासायनिक अभिक्रिया के लिए अभिक्रिया-केंद्र में क्लोरोफिल a (P680 या P700) का होना अनिवार्य है — यही एकमात्र वर्णक है जो उत्तेजित इलेक्ट्रॉन को सीधे ग्राही को सौंप सकता है। सहायक वर्णक (क्लोरोफिल b, कैरोटीन, जैन्थोफिल) उन तरंगदैर्घ्यों का प्रकाश अवशोषित कर ऊर्जा को क्लोरोफिल a तक पहुँचाते हैं (ऐन्टेनी कार्य) तथा अत्यधिक प्रकाश से क्लोरोफिल a की फोटोऑक्सीडेशन से रक्षा करते हैं।
प्रश्न 6 अंधेरे में रखी पत्ती का रंग पीला क्यों पड़ जाता है? कौन-से वर्णक अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं?
अंधेरे में क्लोरोफिल का संश्लेषण रुक जाता है, जबकि मौजूदा क्लोरोफिल का विघटन होता रहता है। कैरोटीनॉएड (कैरोटीन, जैन्थोफिल) क्लोरोफिल की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं, इसलिए वे बचे रहते हैं और पीले रंग के रूप में दिखाई देते हैं। यही कारण है कि पतझड़ में पत्तियाँ पीली या नारंगी हो जाती हैं।
प्रश्न 7 छाया में उगे पौधे की पत्तियाँ धूप में उगे पौधे की तुलना में गहरे हरे रंग की क्यों होती हैं?
छाया में कम प्रकाश मिलता है, इसलिए पौधा प्रति क्लोरोप्लास्ट अधिक क्लोरोफिल तथा बड़े प्रकाश-संग्राहक परिसर (LHC) का निर्माण करता है, ताकि सीमित प्रकाश को अधिकतम ग्रहण किया जा सके — इससे पत्ती गहरी हरी दिखती है। धूप में रहने वाले पौधे में क्लोरोफिल कम, परन्तु प्रकाश-सुरक्षा तंत्र अधिक होते हैं।
प्रश्न 8 प्रकाश-तीव्रता बनाम प्रकाश-संश्लेषण दर वक्र के आधार पर —
(i) किस भाग में प्रकाश सीमाकारी कारक है? (ii) प्रारंभ में अन्य सीमाकारी कारक क्या हो सकते हैं? (iii) वक्र का सपाट भाग क्या दर्शाता है?
(i) वक्र के रैखिक आरंभिक भाग में प्रकाश सीमाकारी कारक होता है।
(ii) प्रारंभ में भी CO₂ सांद्रता, तापमान या एंजाइम सक्रियता सीमित हो सकती है, परंतु मुख्यतः प्रकाश ही सीमाकारी होता है।
(iii) सपाट (पठारी) भाग प्रकाश-संतृप्ति दर्शाता है — अब प्रकाश बढ़ाने पर दर नहीं बढ़ती, क्योंकि कोई अन्य कारक (जैसे CO₂) सीमाकारी बन चुका होता है।
प्रश्न 9 निम्नलिखित की तुलना कीजिए —
(i) C₃ व C₄ पथ (ii) चक्रीय व अचक्रीय फोटोफॉस्फोरीलेशन (iii) C₃ व C₄ पत्ती की शारीरिकी
(i) C₃ में प्रथम उत्पाद PGA (3C), RuBP ग्राही, एक कोशिका प्रकार; प्रकाश श्वसन होता है। C₄ में प्रथम उत्पाद OAA (4C), PEP ग्राही, दो कोशिका प्रकार; प्रकाश श्वसन नगण्य।
(ii) चक्रीय — केवल PS I, केवल ATP, कोई NADPH नहीं, कोई O₂ नहीं। अचक्रीय — PS I+II, ATP+NADPH, O₂ मुक्त होती है।
(iii) C₃ — केवल मीजोफिल, पूलाच्छद क्लोरोप्लास्ट-रहित। C₄ — क्रांज़ शारीरिकी, बड़ी पूलाच्छद कोशिकाएँ क्लोरोप्लास्ट-युक्त तथा मालाकार घेरा बनाती हैं।
NEET पूर्व-वर्षीय प्रश्न
इस अध्याय से NEET/AIPMT में पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष सहित — यहाँ से प्रतिवर्ष 3–5 प्रश्न आते हैं।
NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा-उपयोगी बिंदु जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं।
Extra अतिरिक्त NEET तथ्य
गहन समझ के लिए कुछ विशेष बिंदु — इन्हें अक्सर assertion-reason या मिलान-आधारित प्रश्नों में पूछा जाता है।
- इमर्सन वर्धन प्रभाव — दूर-लाल (700 nm) व लाल (650 nm) प्रकाश एक साथ देने पर प्रकाश-संश्लेषण की दर अलग-अलग देने पर प्राप्त योग से अधिक होती है — इसी से दो फोटोसिस्टमों की खोज हुई।
- हिल अभिक्रिया — पृथक क्लोरोप्लास्ट CO₂-मुक्त परिस्थितियों में भी कृत्रिम इलेक्ट्रॉन-ग्राही (हिल ऑक्सीडेंट) की उपस्थिति में O₂ मुक्त कर सकते हैं — इसने सिद्ध किया कि O₂ का स्रोत जल है, न कि CO₂।
- थाइलेकोइड झिल्ली में PS-II मुख्यतः ग्राना (संकुचित) क्षेत्रों में, जबकि PS-I स्ट्रोमा लैमिली (असंकुचित) क्षेत्रों में स्थित होता है।
- हैच-स्लैक पथ C₄ पथ का दूसरा नाम है; क्रांज़ शारीरिकी में "क्रांज़" का अर्थ जर्मन भाषा में "माला" होता है, जो पूलाच्छद कोशिकाओं की मालाकार व्यवस्था को दर्शाता है।
- PEPcase की CO₂ के प्रति बंधुता रुबिस्को से अधिक होती है, तथा PEPcase ऑक्सीजन को सब्सट्रेट नहीं मानता — इसी कारण C₄ पौधों में प्रकाश श्वसन नहीं होती।
- केल्विन चक्र में प्रति CO₂ — 3 ATP, 2 NADPH; प्रति ग्लूकोज — 18 ATP, 12 NADPH। दोनों आँकड़े याद रखें।
- प्रकाश श्वसन ATP-उत्पादक नहीं, बल्कि ATP-उपभोक्ता है — यह भूलकर "प्रकाश श्वसन भी श्वसन की भाँति ATP बनाता है" कहना पूर्णतः गलत है।
- RuBisCO का पूरा नाम — राइबुलोज-1,5-बाइफॉस्फेट कार्बोक्सिलेस-ऑक्सीजिनेस; यह द्वि-कार्यात्मक (कार्बोक्सिलेस व ऑक्सीजिनेस) है।
- क्लोरोफिल के पोर्फिरिन वलय के केंद्र में Mg²⁺ होता है, जबकि हीमोग्लोबिन के हीम में Fe²⁺ — यह तुलना अक्सर प्रश्नों में आती है।
- एंजेलमैन के प्रयोग ने क्लोरोफिल a को मुख्य वर्णक सिद्ध किया तथा क्रियात्मक वर्णक्रम की खोज की।
- अनॉक्सीजेनिक प्रकाश-संश्लेषण (बैंगनी व हरे गंधक जीवाणु) में H₂S इलेक्ट्रॉन-दाता होता है, O₂ मुक्त नहीं होती — यह उच्च पादपों के ऑक्सीजेनिक प्रकाश-संश्लेषण से भिन्न है।
- CAM पौधों के रंध्र रात में खुलते हैं, दिन में बंद — यह C₃/C₄ के सामान्य व्यवहार से उलट है, जिसे याद रखना आवश्यक है।
- कई C₄ पौधों में मीजोफिल क्लोरोप्लास्ट ग्रेना-युक्त, पूलाच्छद क्लोरोप्लास्ट अग्रेनल (ग्रेना-रहित) होते हैं — यह द्विरूपता (dimorphism) C₄ पहचान में सहायक है।
- प्रकाश-संश्लेषी इकाई (Photosynthetic unit) — कई सौ वर्णक अणुओं का समूह, जो ऊर्जा को अभिक्रिया-केंद्र (P680/P700) तक फ़नल करता है।
- अंतिम रिवीजन में तीन विषयों को प्राथमिकता दें — (1) Z-स्कीम व इलेक्ट्रॉन वाहकों का क्रम, (2) केल्विन चक्र के ATP/NADPH आँकड़े (प्रति CO₂ व प्रति ग्लूकोज), (3) C₃ बनाम C₄ के सभी भेद (शारीरिकी, एंजाइम, उत्पाद, प्रकाश श्वसन)।