पादप में श्वसन — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • पादप कार्यिकी

पादप में श्वसन

हम सब जीवित रहने के लिए साँस लेते हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि साँस लेना जीवन के लिए इतना जरूरी क्यों है? क्या पौधे भी हमारी तरह साँस लेते हैं, और अगर लेते हैं तो कैसे — जबकि उनके पास फेफड़े जैसा कोई अंग ही नहीं होता? इस अध्याय में हम कोशिकीय स्तर पर होने वाली उस जटिल प्रक्रिया को समझेंगे, जिसके जरिए भोजन में बंद ऊर्जा को जीवन के काम आने लायक ऊर्जा-मुद्रा ATP में बदला जाता है।

भूमिका श्वसन और भोजन की ऊर्जा

हर जीवधारी को अपने रोज़मर्रा के कामकाज के लिए — चाहे वह पदार्थों का अवशोषण हो, परिवहन, गति, प्रजनन, या फिर साँस लेने की क्रिया ही क्यों न हो — निरंतर ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा आती कहाँ से है? हम जानते हैं कि भोजन ही ऊर्जा का स्रोत है, पर सवाल यह उठता है कि भोजन से यह ऊर्जा निकलती कैसे है, और यह कैसे उपयोग में आती है?

दिलचस्प बात यह है कि साँस लेने की प्रक्रिया और भोजन से ऊर्जा मुक्त होने की प्रक्रिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। जीवन के लिए आवश्यक समूची ऊर्जा कुछ बड़े अणुओं — जिन्हें खाद्य पदार्थ कहा जाता है — के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। केवल हरे पौधे और नील-हरित जीवाणु ही अपना भोजन स्वयं तैयार कर सकते हैं। ये प्रकाश-संश्लेषण के जरिए प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलकर उसे ग्लूकोज, सुक्रोज और स्टार्च के रूप में संचित करते हैं।

स्वपोषी बनाम विषमपोषी ध्यान रहे कि हरे पौधों में भी हर कोशिका, ऊतक या अंग प्रकाश-संश्लेषण नहीं करता — केवल वे कोशिकाएँ जिनमें क्लोरोप्लास्ट मौजूद होता है, ही यह काम कर पाती हैं। चूँकि पौधे के सभी अंग, ऊतक और कोशिकाएँ हरी नहीं होतीं, इसलिए वहाँ ऑक्सीकरण के लिए भोजन बाहर से पहुँचाना पड़ता है — यानी अहरित भागों तक खाद्य पदार्थ का परिवहन होता है।

प्राणी चूँकि परपोषी होते हैं, इसलिए वे अपना भोजन पौधों से परोक्ष (शाकाहारी के रूप में) या अपरोक्ष (माँसाहारी के रूप में) पाते हैं। कवक जैसे मृतजीवी, मृत या सड़े-गले पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। यह समझना बेहद जरूरी है कि जीवन में साँस के लिए आवश्यक सारा भोजन, अंततः प्रकाश-संश्लेषण से ही आता है।

निःसंदेह प्रकाश-संश्लेषण क्लोरोप्लास्ट में (और केवल यूकैरियोट में) संपन्न होता है, जबकि ऊर्जा पाने के लिए जटिल अणुओं का विघटन कोशिकाद्रव्य तथा माइटोकॉन्ड्रिया में होता है (यह भी केवल यूकैरियोट में)। जब कोशिकाओं में मौजूद जटिल अणुओं के कार्बन-कार्बन (C-C) आबंधों का ऑक्सीकरण होकर पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है, तो इसी प्रक्रिया को साँस या श्वसन कहते हैं। जिस यौगिक का ऑक्सीकरण होता है, उसे श्वसनी क्रियाधार कहा जाता है — आमतौर पर यह कार्बोहाइड्रेट होता है, हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रोटीन, वसा या कार्बनिक अम्ल भी इस भूमिका में आ सकते हैं।

कोशिका के भीतर ऑक्सीकरण के दौरान श्वसनी क्रियाधार में बंद संपूर्ण ऊर्जा एक साथ मुक्त नहीं होती — यह एंजाइम द्वारा नियंत्रित, चरणबद्ध और धीमी अभिक्रियाओं की एक शृंखला के रूप में मुक्त होती है, जिसे रासायनिक ऊर्जा ATP के रूप में संचित कर लिया जाता है। यही ATP कोशिका की "ऊर्जा मुद्रा" कहलाती है, क्योंकि जब भी और जहाँ भी ऊर्जा की जरूरत हो, यह टूटकर उसे उपलब्ध करा देती है।

12.1 क्या पादप साँस लेते हैं?

इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर है — हाँ। पौधों को साँस लेने के लिए ऑक्सीजन (O₂) चाहिए ही होती है, और वे कार्बनडाइऑक्साइड (CO₂) मुक्त करते हैं। इसीलिए पौधों में ऐसी व्यवस्था होती है, जिससे ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। लेकिन प्राणियों की तरह पौधों में गैसीय आदान-प्रदान के लिए कोई विशिष्ट अंग नहीं होते — इसकी बजाय उनमें रंध्र और वातरंध्र इस काम को संभालते हैं।

आखिर बिना किसी श्वसन-अंग के पौधे साँस कैसे ले पाते हैं? इसके पीछे कई कारण हैं:

  • पौधे का हर भाग अपनी गैसीय आदान-प्रदान की जरूरत का खुद ध्यान रखता है — पौधे के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में गैसों का परिवहन बहुत कम होता है, इसलिए हर भाग को गैसों के लिए दूसरे भाग पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
  • पौधों में गैसों के आदान-प्रदान की माँग वैसे भी अपेक्षाकृत कम होती है। जड़, तना और पत्ती में श्वसन जंतुओं की तुलना में बहुत धीमी दर से होता है। केवल प्रकाश-संश्लेषण के दौरान ही गैसों का अत्यधिक आदान-प्रदान होता है, और हर पत्ती इस तरह अनुकूलित होती है कि वह उस समय की अपनी जरूरत पूरी कर सके। जब कोशिका श्वसन करती है, तब ऑक्सीजन की कमी की समस्या नहीं होती, क्योंकि कोशिका में उसी दौरान प्रकाश-संश्लेषण से ऑक्सीजन निकल भी रही होती है।
  • बड़े, स्थूल पौधों में गैसें ज्यादा दूरी तक विसरित नहीं हो पातीं — इसलिए पौधों की हर सजीव कोशिका, पौधे की सतह के काफी नजदीक ही स्थित होती है। यह बात पत्तियों के लिए तो पूरी तरह सच है ही, पर मोटे काष्ठीय तनों और जड़ों में सजीव कोशिकाएँ छाल के नीचे एक पतली परत के रूप में व्यवस्थित रहती हैं, जिसमें वातरंध्र नामक छिद्र मौजूद होते हैं। भीतर की कोशिकाएँ मृत होती हैं और केवल यांत्रिक सहायता देती हैं। इस तरह पौधों की अधिकांश कोशिकाओं की सतह हवा के संपर्क में ही रहती है, जो पैरेंकाइमा कोशिकाओं के आपस में जुड़े हुए जालरूपी वायु-रिक्तिकाओं (एयर स्पेस) के जरिए संभव हो पाता है।
  • ग्लूकोज के नियंत्रित संपूर्ण ऑक्सीकरण से अंतिम उत्पाद के रूप में कार्बनडाइऑक्साइड (CO₂) तथा जल (H₂O) के साथ ऊर्जा निकलती है, जिसका अधिकांश भाग ऊष्मा के रूप में बाहर निकल जाता है। यदि यह ऊर्जा कोशिका के लिए उपयोगी होनी है, तो इसका उपयोग कोशिका में अन्य अणुओं के संश्लेषण में होना चाहिए।

    C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा

    पौधों की कोशिकाएँ इस तरह भोजन का विघटन करती हैं कि ग्लूकोज अणु के अपचय से निकलने वाली पूरी ऊर्जा मुक्त ऊष्मा के रूप में एक साथ बाहर न निकल जाए। असल बात यह है कि ग्लूकोज का ऑक्सीकरण एक ही चरण में न होकर छोटे-छोटे अनेक चरणों में होता है, जिनमें से कुछ चरण इतने बड़े होते हैं कि उनसे निकलने वाली पर्याप्त ऊर्जा ATP के संश्लेषण में उपयोग हो पाती है। यही श्वसन की असली कहानी है — इस प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन का उपयोग होता है और CO₂, जल तथा ऊर्जा उत्पाद के रूप में निकलते हैं।

    दहन अभिक्रिया के लिए ऑक्सीजन जरूरी होती है, परंतु कुछ कोशिकाएँ ऑक्सीजन की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों ही परिस्थितियों में जीवित रह सकती हैं। जरा सोचिए — ऐसे कौन-से जीव और परिस्थितियाँ हो सकती हैं जहाँ ऑक्सीजन उपलब्ध ही न हो? माना जाता है कि इस ग्रह पर पहली कोशिका ऐसे ही वातावरण में उपजी थी, जहाँ ऑक्सीजन नहीं थी। आज भी कुछ जीव अनाक्सी (ऑक्सीजन-रहित) परिस्थितियों के लिए खुद को अनुकूलित कर चुके हैं — इनमें से कुछ के लिए यह वैकल्पिक है, तो कुछ के लिए बिल्कुल अनिवार्य।

    हर स्थिति में सभी जीवों में एक ऐसा एंजाइम-तंत्र होता है जो बिना ऑक्सीजन की सहायता के ग्लूकोज को आंशिक रूप से ऑक्सीकृत कर सके। इस तरह ग्लूकोज का पायरुविक अम्ल में विघटन ग्लाइकोलिसिस कहलाता है।

    12.2 ग्लाइकोलिसिस

    ग्लाइकोलिसिस शब्द ग्रीक शब्दों ग्लाइकोस (शर्करा) और लाइसिस (टूटना) से मिलकर बना है। इस प्रक्रिया का वर्णन सबसे पहले गुस्ताव एंबेडेन, ओटो मेयरहॉफ तथा जे. पारानास ने किया था, इसीलिए इसे सामान्यतः EMP पथ भी कहा जाता है। अनाक्सी जीवों में साँस लेने की यही एकमात्र प्रक्रिया होती है।

    ग्लाइकोलिसिस कोशिकाद्रव्य में संपन्न होता है और यह लगभग सभी सजीवों में पाया जाता है। इस प्रक्रिया में ग्लूकोज के आंशिक ऑक्सीकरण से पायरुविक अम्ल के दो अणु बनते हैं। पौधों में यह ग्लूकोज सुक्रोज से मिलता है, जो प्रकाश-संश्लेषी कार्बन-अभिक्रियाओं का अंतिम उत्पाद होता है, या फिर संचित कार्बोहाइड्रेट से प्राप्त होता है। सुक्रोज इन्वर्टेस नामक एंजाइम की मदद से ग्लूकोज तथा फ्रुक्टोज में बदल जाता है, और ये दोनों मोनोसैकेराइड्स आसानी से ग्लाइकोलाइटिक चक्र में प्रवेश कर जाते हैं।

    ग्लूकोज (6C) ग्लूकोज-6-फॉस्फेट फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट 2 × ट्रायोज फॉस्फेट 2 × 1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल 2 × 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल 2 × फॉस्फोइनोल पायरुवेट 2 × पायरुविक अम्ल ATP उपयोग ATP उपयोग NADH बनता है ATP बनता है ATP बनता है

    चित्र 12.1 — ग्लाइकोलिसिस के चरण: ग्लूकोज से पायरुविक अम्ल तक की दस शृंखलाबद्ध अभिक्रियाएँ

    ग्लूकोज एवं फ्रुक्टोज, हेक्सोकाइनेज एंजाइम द्वारा फॉस्फोरिकृत होकर ग्लूकोज-6-फॉस्फेट बनाते हैं। ग्लूकोज का यह फॉस्फोरिकृत रूप समायवीकरण से फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट में बदल जाता है — इसके बाद दोनों के उपापचय का क्रम एक जैसा हो जाता है। इस दस-चरणीय शृंखला में विभिन्न एंजाइम द्वारा ग्लूकोज से पायरुवेट का निर्माण होता है।

    इनमें से दो चरणों में ATP का उपयोग होता है — पहला, जब ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में परिवर्तन होता है, और दूसरा, जब फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट का फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट में परिवर्तन होता है। इसके बाद फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट टूटकर डाइहाइड्रॉक्सी एसीटोन फॉस्फेट तथा 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड (PGAL) बनाता है।

    जब PGAL का 1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरेट (BPGA) में परिवर्तन होता है, तो NAD⁺ से NADH+H⁺ बनता है। इसके बाद BPGA का 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल में परिवर्तन ऊर्जा-उत्पादक प्रक्रिया है, जिसकी ऊर्जा का उपयोग ATP निर्माण में होता है। इसी तरह PEP (फॉस्फोइनोल पायरुवेट) का पायरुविक अम्ल में बदलते समय भी ATP बनता है।

    क्या आप गणना कर सकते हैं कि ग्लूकोज के एक अणु से सीधे कितने ATP अणुओं का संश्लेषण होता है?

    पायरुविक अम्ल ग्लाइकोलिसिस का मुख्य उत्पाद है। अब पायरुवेट का उपापचयी भविष्य क्या होगा, यह कोशिकीय आवश्यकता पर निर्भर करता है। यहाँ तीन प्रमुख रास्ते हैं जिनसे कोशिकाएँ ग्लाइकोलिसिस से बने पायरुविक अम्ल का उपयोग करती हैं — लैक्टिक अम्ल किण्वन, एल्कोहलिक किण्वन, और ऑक्सी साँस।

    अधिकांश प्रोकैरियोट तथा एककोशिक यूकैरियोट में किण्वन अनाक्सी परिस्थितियों में होता है। ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीकरण से CO₂ तथा जल बनने के लिए जीवधारियों में क्रेब्स चक्र द्वारा जो प्रक्रिया होती है, उसे ही ऑक्सी श्वसन या साँस कहते हैं, जिसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

    12.3 किण्वन

    किण्वन में यीस्ट द्वारा ग्लूकोज का अनाक्सी परिस्थितियों में अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिसमें अभिक्रियाओं के विभिन्न चरणों से पायरुविक अम्ल, कार्बनडाइऑक्साइड तथा इथेनॉल में परिवर्तित हो जाता है। इस अभिक्रिया को पायरुविक अम्ल डिकार्बोक्सिलेज एवं एल्कोहल डिहाइड्रोजिनेज एंजाइम उत्प्रेरित करते हैं।

    कुछ अन्य जीव, जैसे कुछ जीवाणु, पायरुविक अम्ल से लैक्टिक अम्ल का निर्माण करते हैं। प्राणी की मांसपेशियों की कोशिकाओं में जब शारीरिक अभ्यास के दौरान कोशिकीय साँस के लिए अपर्याप्त ऑक्सीजन होती है, तब पायरुविक अम्ल लैक्टिक डिहाइड्रोजिनेज द्वारा लैक्टिक अम्ल में अपचयित हो जाता है। अपचयीकारक NADH+H⁺ होता है, जो पुनः दोनों प्रक्रियाओं में NAD⁺ में ऑक्सीकृत हो जाता है।

    ग्लूकोज ग्लिसरैल्डिहाइड 3-फॉस्फेट NAD⁺→NADH+H⁺ पायरुविक अम्ल लैक्टिक अम्ल फॉस्फोइनोल इथेनॉल + CO₂

    चित्र 12.2 — अनॉक्सी श्वसन के प्रमुख पथ: लैक्टिक अम्ल किण्वन और एल्कोहलिक किण्वन

    न तो लैक्टिक अम्ल किण्वन में, न ही एल्कोहल किण्वन में पर्याप्त ऊर्जा मुक्त होती है। ग्लूकोज से 7 प्रतिशत से भी कम ऊर्जा मुक्त होती है, और इसकी संपूर्ण ऊर्जा का उपयोग उच्च ऊर्जा-बंध वाले ATP के निर्माण में नहीं होता। अम्ल व एल्कोहल बनने की यह प्रक्रिया एक तरह से हानिकारक भी साबित हो सकती है।

    ग्लूकोज के एक अणु से किण्वन के बाद एल्कोहल या लैक्टिक अम्ल बनने के दौरान कुल कितने शुद्ध ATP का संश्लेषण होता है? (ग्लाइकोलिसिस के दौरान उपयोग में आने वाले ATP की संख्या घटाकर गणना करें)। जब एल्कोहल की मात्रा 13 प्रतिशत या उससे अधिक हो जाती है, तो यह यीस्ट के लिए विषाक्तता और मृत्यु का कारण बन जाती है — इसीलिए प्राकृतिक किण्वित पेय में एल्कोहल की सांद्रता एक सीमा से ऊपर नहीं जा पाती।

    वह प्रक्रिया जिसके द्वारा जीव में ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, और इस दौरान मुक्त ऊर्जा कोशिकीय उपापचय की आवश्यकता के अनुसार बहुत से ATP अणुओं का संश्लेषण करती है, उसे ऑक्सी श्वसन कहा जाता है। यूकैरियोट में इसके सभी चरण माइटोकॉन्ड्रिया में संपन्न होते हैं, जिसके लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

    ऑक्सी साँस वह प्रक्रिया जिसके द्वारा रासायनिक पदार्थों का ऑक्सीजन की उपस्थिति में पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिसके पश्चात् कार्बनडाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा निकलती है। इस प्रकार की साँस सामान्यतः उच्च जीवों में मिलती है।

    12.4 ऑक्सी श्वसन (साँस)

    माइटोकॉन्ड्रिया में होने वाले ऑक्सी श्वसन के दौरान ग्लाइकोलिसिस का अंतिम उत्पाद पायरुवेट, कोशिकाद्रव्य से माइटोकॉन्ड्रिया में पहुँचाया जाता है। इस प्रक्रिया की मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं:

  • पायरुवेट का चरणबद्ध क्रम में पूर्ण ऑक्सीकरण होने के बाद सभी हाइड्रोजन परमाणु पृथक हो जाते हैं, जिससे 3 कार्बनडाइऑक्साइड के अणु भी मुक्त होते हैं।
  • हाइड्रोजन परमाणुओं से पृथक हुए इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन अणु की ओर बढ़ते हैं, जिसके फलस्वरूप ATP का संश्लेषण होता है।
  • सबसे रोचक बात यह है कि इसकी पहली प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया की आधात्री (मैट्रिक्स) में संपन्न होती है, जबकि दूसरी प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली पर होती है। कोशिकाद्रव्य में मौजूद कार्बोहाइड्रेट के ग्लाइकोलिटिक अपचय से बनने वाला पायरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया की आधात्री में प्रवेश करता है, जहाँ पायरुवेट डिहाइड्रोजिनेज एंजाइम की जटिल सामूहिक क्रिया द्वारा ऑक्सीकृत कार्बोक्सिलिकरण होता है। इस अभिक्रिया में NAD⁺ तथा CoA जैसे कई सह-एंजाइम भाग लेते हैं।

    पायरुविक अम्ल + CoA + NAD⁺ → एसीटाइल CoA + CO₂ + NADH + H⁺   (Mg²⁺ / पायरुवेट डिहाइड्रोजिनेज)

    इस प्रक्रिया के दौरान पायरुविक अम्ल के दो अणुओं के उपापचय से NADH के दो अणुओं का निर्माण होता है (ग्लाइकोलिसिस के दौरान ग्लूकोज के एक अणु से जो पहले ही बन चुके होते हैं)।

    एसीटाइल CoA चक्रीय पथ, ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र में प्रवेश करता है, जिसे साधारणतया वैज्ञानिक हैंस क्रेब की खोज के कारण क्रेब्स चक्र कहा जाता है।

    12.4.1 ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (TCA)

    TCA चक्र की शुरुआत एसीटाइल समूह के ऑक्सेलो एसिटिक अम्ल (OAA) तथा जल के साथ संघनन से होती है, जिससे सिट्रिक अम्ल बनता है। यह अभिक्रिया सिट्रेट सिंथेटेज एंजाइम द्वारा होती है, और इस दौरान CoA का एक अणु मुक्त होता है। इसके बाद सिट्रेट, आइसोसिट्रेट में समायवित हो जाता है — यह डिकार्बोक्सिलिकरण के दो लगातार चरणों के रूप में घटित होता है।

    सिट्रिक अम्ल (6C) ऑक्सेलोऐसिटिक अम्ल (4C) α-कीटोग्लूटेरिक अम्ल (5C) सक्सीनिक अम्ल (4C) आइसोसिट्रिक अम्ल मैलिक अम्ल (4C)

    चित्र 12.3 — सिट्रिक अम्ल चक्र (क्रेब्स चक्र): एसीटाइल CoA से शुरू होकर OAA के पुनर्निर्माण तक की यात्रा

    इसके उपरांत अल्फा-कीटोग्लूटेरिक अम्ल, तत्पश्चात् सक्सीनाइल CoA का निर्माण होता है। सिट्रिक अम्ल के बचे हुए चरणों में सक्सीनाइल CoA, OAA (ऑक्सेलोऐसिटिक अम्ल) में ऑक्सीकृत होकर चक्र को आगे बढ़ाने में सहायक होता है। सक्सीनाइल (CoA) से सक्सीनिक अम्ल के रूपांतरण के दौरान GTP के एक अणु का निर्माण होता है — इसे क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण कहते हैं। इन युग्मित अभिक्रियाओं में GTP, GDP में रूपांतरित हो जाता है तथा ADP से ATP का निर्माण होता है।

    TCA चक्र में रेडॉक्स चक्र में तीन ऐसे स्थान होते हैं जहाँ NAD⁺ का NADH+H⁺ में अपचयन होता है, और एक स्थान पर FAD⁺ का FADH₂ में अपचयन होता है। TCA चक्र द्वारा एसीटाइल CoA को निरंतर ऑक्सीकृत करने के लिए OAA अम्ल के पुनर्निर्माण की आवश्यकता होती है, जो कि चक्र का पहला सदस्य है। इसी के साथ NAD⁺ तथा FAD⁺ का NADH व FADH₂ से क्रमशः पुनरुत्पादन होता रहता है।
    पायरुविक अम्ल + 4NAD⁺ + FAD⁺ + 2H₂O + ADP + Pi → 3CO₂ + 4NADH + 4H⁺ + FADH₂ + ATP

    अब तक हम देख चुके हैं कि TCA चक्र में ग्लूकोज के विखंडन से CO₂ निकलती है, NADH+H⁺ के आठ अणु, FADH₂ के दो अणु तथा दो ATP अणुओं का निर्माण होता है। आपको शायद आश्चर्य हो रहा होगा कि अभी तक साँस की चर्चा के दौरान न तो कहीं ऑक्सीजन की, न ही कहीं ATP के बहुत सारे अणुओं के निर्माण की चर्चा हुई है। अब यह समझना होगा कि संश्लेषित NADH+H⁺ तथा FADH₂ की क्या भूमिका होगी — यानी साँस में ऑक्सीजन की भूमिका तथा ATP का निर्माण आखिर कैसे होता है।

    12.4.2 इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र अथवा ऑक्सीकरणी फॉस्फोरिलीकरण

    साँस प्रक्रिया के अगले चरण में NADH+H⁺ तथा FADH₂ में संचित ऊर्जा को मुक्त कर उपयोग में लाना है। यह तब संपादित होता है जब इनका ऑक्सीकरण इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र द्वारा होता है और इलेक्ट्रॉन अंततः ऑक्सीजन पर पहुँचकर पानी का निर्माण करता है। जिस उपापचयी पथ द्वारा इलेक्ट्रॉन एक वाहक से दूसरे वाहक की ओर गुजरता है, उसे इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) कहते हैं, जो माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली पर संपन्न होता है।

    आंतरिक माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली कॉम्प्लेक्स I कॉम्प्लेक्स II कॉम्प्लेक्स III कॉम्प्लेक्स IV ATP सिंथेज NADH → कॉम्प्लेक्स I → UQ → कॉम्प्लेक्स III → साइटोक्रोम C → कॉम्प्लेक्स IV → O₂ → H₂O FADH₂ → कॉम्प्लेक्स II ( ऊपर की शृंखला में जुड़ता है )

    चित्र 12.4 — इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र: NADH व FADH₂ से इलेक्ट्रॉन कॉम्प्लेक्स I–IV से गुजरते हुए अंततः ऑक्सीजन तक पहुँचते हैं

    माइटोकॉन्ड्रिया की आधात्री में TCA चक्र के दौरान NADH से बनने वाले इलेक्ट्रॉन, एंजाइम NADH डिहाइड्रोजिनेज द्वारा ऑक्सीकृत होते हैं (कॉम्प्लेक्स-I), और फिर भीतरी झिल्ली में मौजूद यूबीक्विनोन की ओर स्थानांतरित होते हैं। यूबीक्विनोन, अपचयी समतुल्य FADH₂ से भी प्राप्त करता है (कॉम्प्लेक्स-II), जो सिट्रिक अम्ल चक्र में सक्सीन के ऑक्सीकरण के दौरान बनते हैं। अपचयित यूबिक्विनोन (यूबिक्विनोल) इलेक्ट्रॉन को साइटोक्रोम bc₁ के जरिए साइटोक्रोम C की ओर स्थानांतरित कर ऑक्सीकृत हो जाता है (कॉम्प्लेक्स-III)।

    साइटोक्रोम C एक छोटा प्रोटीन है जो झिल्ली की बाह्य सतह पर चिपका रहता है और कॉम्प्लेक्स-III से कॉम्प्लेक्स-IV के बीच गतिशील इलेक्ट्रॉन-वाहक की भूमिका निभाता है। कॉम्प्लेक्स-IV साइटोक्रोम C ऑक्सीडेज कॉम्प्लेक्स है, जिसमें साइटोक्रोम a, a₃ तथा दो तांबा केंद्र मिलते हैं।

    जब इलेक्ट्रॉन इस शृंखला में कॉम्प्लेक्स-I से कॉम्प्लेक्स-IV द्वारा गुजरते हैं, तब वे ATP सिंथेज (कॉम्प्लेक्स-V) से युग्मित होकर ADP व अकार्बनिक फॉस्फेट से ATP का निर्माण करते हैं। इस दौरान संश्लेषित होने वाली ATP अणुओं की संख्या इलेक्ट्रॉन-दाता पर निर्भर करती है — NADH के एक अणु के ऑक्सीकरण से ATP के तीन अणुओं का निर्माण होता है, जबकि FADH₂ के एक अणु से ATP के दो अणु बनते हैं।

    ऑक्सीजन की भूमिका ऑक्सीजन प्रक्रिया के अंतिम चरण में अंतिम इलेक्ट्रॉन-ग्राही के रूप में कार्य करता है, जो H₂ से मिलकर पानी बनाता है। प्रकाश फॉस्फोरिलीकरण के विपरीत, जहाँ प्रोटॉन प्रवणता के निर्माण में प्रकाश-ऊर्जा का उपयोग होता है, साँस में यही ऊर्जा ऑक्सीकरण-अपचयन अभिक्रियाओं से मिलती है। इसीलिए इस पूरी क्रियाविधि को ऑक्सीकारी-फॉस्फोरिलीकरण कहते हैं।

    झिल्ली से जुड़े ATP संश्लेषण की इस क्रियाविधि को रसोपरासरण परिकल्पना (केमियोऑस्मोटिक हाइपोथिसिस) के आधार पर समझाया जाता है। इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र के दौरान मुक्त ऊर्जा का उपयोग ATP सिंथेज (कॉम्प्लेक्स-V) की सहायता से ATP के संश्लेषण में होता है। यह कॉम्प्लेक्स मुख्यतः दो घटकों — F₀ और F₁ — से बना होता है। F₁ शीर्ष परिधीय झिल्ली प्रोटीन कॉम्प्लेक्स है, जहाँ अकार्बनिक फॉस्फेट तथा ADP से ATP का संश्लेषण होता है। वैद्युत-रासायनिक प्रोटॉन प्रवणता के फलस्वरूप 4H⁺ आयन अंतर-झिल्ली अवकाश से F₀ में होकर आधात्री की ओर गति करता है, जिससे एक ATP का संश्लेषण होता है।

    12.5 श्वसनीय संतुलन चार्ट

    प्रत्येक ऑक्सीकृत ग्लूकोज अणु से बनने वाले शुद्ध ATP की गणना करना अब संभव है, लेकिन वास्तविकता में यह एक सैद्धांतिक अभ्यास ही रह जाता है। यह गणना कुछ निश्चित मान्यताओं के आधार पर ही की जा सकती है:

  • यह एक क्रमिक, सुव्यवस्थित, क्रियात्मक पथ है जिसमें एक क्रियाधार से दूसरे क्रियाधार का निर्माण होता है — ग्लाइकोलिसिस से शुरू होकर TCA चक्र तथा ETS पथ एक के बाद एक आते हैं।
  • ग्लाइकोलिसिस में संश्लेषित NADH माइटोकॉन्ड्रिया में आता है, जहाँ उसका फॉस्फोरिलीकरण होता है।
  • पथ का कोई भी मध्यवर्ती दूसरे यौगिक के निर्माण में उपयोग नहीं होता।
  • श्वसन में केवल ग्लूकोज का ही उपयोग होता है — कोई दूसरा वैकल्पिक क्रियाधार पथ के किसी भी मध्यवर्ती चरण में प्रवेश नहीं करता।
  • हालाँकि इस प्रकार की कल्पना सजीव तंत्र में वास्तव में तर्कसंगत नहीं होती — सभी पथ एक के बाद एक नहीं, बल्कि एक साथ कार्य करते हैं। पथ में क्रियाधार आवश्यकतानुसार बाहर तथा अंदर आ-जा सकते हैं, आवश्यकतानुसार ATP का उपयोग हो सकता है, और एंजाइम की क्रिया की दर को कई तरीकों से नियंत्रित किया जाता है। फिर भी यह गणना करना उपयोगी है, क्योंकि सजीव तंत्र में ऊर्जा के निष्कर्षण एवं संग्रहण की दक्षता सराहनीय है।

    कुल ऊर्जा उपज
    ऑक्सी श्वसन के दौरान ग्लूकोज के एक अणु से ATP के 38 अणुओं की शुद्ध प्राप्ति होती है।

    अब हम किण्वन तथा ऑक्सी श्वसन की तुलना करते हैं:

  • किण्वन में ग्लूकोज का आंशिक विघटन होता है, जबकि ऑक्सी श्वसन में पूर्ण विघटन होता है तथा कार्बनडाइऑक्साइड एवं जल बनते हैं।
  • किण्वन में ग्लूकोज के एक अणु से पायरुविक अम्ल बनने के दौरान ATP के शुद्ध 2 अणुओं की प्राप्ति होती है, जबकि ऑक्सी श्वसन में बहुत अधिक ATP के अणु बनते हैं।
  • किण्वन में NADH का NAD⁺ में ऑक्सीकरण धीमी गति से होता है, जबकि ऑक्सी श्वसन में यह अभिक्रिया तीव्र गति से होती है।
  • 12.6 ऐंफीबोलिक पथ

    साँस के लिए ग्लूकोज सबसे अनुकूल क्रियाधार है — श्वसन में सभी कार्बोहाइड्रेट को उपयोग में लाने से पहले ग्लूकोज में ही परिवर्तित होना पड़ता है। जैसा पहले बताया जा चुका है, अन्य क्रियाधार भी साँस में इस्तेमाल किए जा सकते हैं, लेकिन वे साँस के पहले चरण में सीधे उपयोग में नहीं आते।

    वसा कार्बोहाइड्रेट्स प्रोटीन वसा अम्ल व ग्लिसरॉल सरल शर्करा (ग्लूकोज) अमीनो अम्ल ग्लूकोज 6-फॉस्फेट फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट डाइहाइड्रॉक्सी एसीटोन फॉस्फेट ग्लिसरैल्डिहाइड 3-फॉस्फेट पायरुविक अम्ल एसीटाइल कोएंजाइम A ↓ क्रेब्स चक्र → CO₂ व जल

    चित्र 12.5 — विभिन्न कार्बनिक अणुओं (वसा, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन) के श्वसन पथ में प्रवेश बिंदुओं का प्रदर्शन

    वसा सबसे पहले ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल में विघटित होती है। यदि वसीय अम्ल साँस के उपयोग में आता है, तो वह पहले एसीटाइल सह-एंजाइम बनकर पथ में प्रवेश करता है। ग्लिसरॉल पहले PGAL में परिवर्तित होकर श्वसन पथ में प्रवेश करता है। प्रोटीन, प्रोटिएज एंजाइम द्वारा विघटित होकर अमीनो अम्ल बनाता है। प्रत्येक अमीनो अम्ल (विएमीनीकरण के बाद) अपनी संरचना के आधार पर क्रेब्स चक्र के अंदर विभिन्न चरणों में प्रवेश करता है।

    चूँकि साँस के दौरान क्रियाधार टूटते हैं, इसलिए साँस प्रक्रिया परंपरागत रूप से अपचयी प्रक्रिया मानी जाती रही है, और श्वसन पथ को श्वसनीय अपचयी पथ कहा जाता है। पर क्या यह पूरी तरह सही है? ध्यान दें — जब जीवधारी को वसा अम्ल का संश्लेषण करना होता है, तो श्वसनी पथ से एसीटाइल CoA अलग हो जाता है। इसलिए वसा अम्ल के संश्लेषण तथा विखंडन, दोनों के दौरान श्वसनी पथ का उपयोग होता है। इसी तरह प्रोटीन के संश्लेषण व विखंडन के दौरान भी होता है।

    सजीवों में विघटन की प्रक्रिया अपचय कहलाती है तथा संश्लेषण उपचय कहलाता है। चूँकि श्वसनी पथ में अपचय तथा उपचय दोनों ही होते हैं, इसलिए श्वसनी पथ को ऐंफीबोलिक पथ कहना ज्यादा उचित होगा, न कि केवल उपचय पथ — क्योंकि यह अपचयी और उपचयी, दोनों प्रकार की गतिविधियों में भाग लेता है।

    12.7 साँस गुणांक (R.Q.)

    अब साँस के एक और पहलू को देखते हैं। जैसा आप जानते हैं कि ऑक्सी श्वसन के दौरान ऑक्सीजन का उपयोग होता है और कार्बनडाइऑक्साइड निकलती है। साँस के दौरान मुक्त हुई कार्बनडाइऑक्साइड तथा उपयोग में लाई गई ऑक्सीजन के अनुपात को साँस गुणांक (R.Q.) या श्वसनीय अनुपात कहते हैं।

    साँस गुणांक = मुक्त हुई CO₂ का आयतन ÷ उपयोग में लाई गई O₂ का आयतन

    साँस गुणांक, साँस के दौरान उपयोग में आने वाले श्वसनी क्रियाधार पर निर्भर करता है। जब कार्बोहाइड्रेट क्रियाधार के रूप में आकर पूर्ण ऑक्सीकृत हो जाते हैं, तो साँस गुणांक 1 होगा, क्योंकि समान मात्रा में CO₂ व O₂ क्रमशः मुक्त होती हैं एवं उपयोग में लाई जाती हैं:

    C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा
    साँस गुणांक (R.Q.) = 6CO₂ ÷ 6O₂ = 1.0

    जब वसा साँस में प्रयुक्त होती है तो साँस गुणांक 1.00 से कम होता है। वसा अम्ल ट्राइपामिटिन के रूप में उपयोग में आता है तब इसकी गणना निम्नवत होगी:

    2(C₅₁H₉₈O₆) + 145 O₂ → 102 CO₂ + 98 H₂O + ऊर्जा   (ट्राइपामिटिन)
    साँस गुणांक (R.Q.) = 102 CO₂ ÷ 145 O₂ = 0.7

    जब प्रोटीन श्वसनी क्रियाधार के रूप में प्रयुक्त होता है, तब यह अनुपात लगभग 0.9 के आसपास होता है।

    याद रखें यहाँ यह जानना अतिमहत्वपूर्ण है कि सजीवों में श्वसनीय क्रियाधार अक्सर एक से अधिक होते हैं — किंतु शुद्ध प्रोटीन व वसा शायद ही कभी अकेले श्वसनी क्रियाधार के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

    📝 NEET/AIIMS में पूछे जा चुके प्रश्न

    इस अध्याय से NEET में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न (2016 से 2026 तक), वर्ष के संदर्भ सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

    1AIIMS 2002 ग्लाइकोलिसिस लगभग सभी वायवीय/अवायवीय कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में पाई जाती है। इस प्रक्रिया में ग्लूकोज किसमें परिवर्तित होता है?

    उत्तर: पायरुविक अम्ल (Pyruvic acid)।

    ग्लाइकोलिसिस के अंत में एक ग्लूकोज अणु (6-कार्बन) टूटकर पायरुविक अम्ल के दो अणुओं (3-कार्बन प्रत्येक) में बदल जाता है — यह प्रक्रिया कोशिकाद्रव्य में होती है और वायवीय व अवायवीय, दोनों प्रकार की कोशिकाओं में एक समान रहती है, चाहे आगे का पथ अलग-अलग हो।

    2NEET 2016 वसा, कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन — तीनों के श्वसनीय अपघटन में कौन-सा जैव-अणु उभयनिष्ठ (common) है?

    उत्तर: एसीटाइल सह-एंजाइम A (Acetyl CoA)।

    वसा (वसीय अम्ल के रूप में), कार्बोहाइड्रेट (पायरुविक अम्ल के रूप में) व प्रोटीन (अमीनो अम्ल के रूप में) — तीनों ही अपने-अपने मार्ग से टूटकर अंततः एसीटाइल CoA बनाते हैं, जो फिर क्रेब्स चक्र में प्रवेश करता है। यही ऐंफीबोलिक पथ का केंद्रीय जंक्शन-बिंदु है।

    3NEET 2016 ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण (Oxidative phosphorylation) क्या है?

    उत्तर: क्रियाधार के ऑक्सीकरण के दौरान निकाले गए इलेक्ट्रॉनों से मुक्त ऊर्जा द्वारा ATP का निर्माण (Formation of ATP by energy released from electrons removed during substrate oxidation)।

    यह क्रिया सब्सट्रेट-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण से भिन्न है — सब्सट्रेट-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण में फॉस्फेट सीधे किसी क्रियाधार अणु से ADP में स्थानांतरित होता है, जबकि ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण में इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला से मुक्त ऊर्जा का उपयोग होता है, जो अंततः प्रोटॉन प्रवणता के ज़रिए ATP-सिंथेटेज़ को सक्रिय करती है।

    4NEET 2017 निम्नलिखित में से कौन-सा कोशिकांग कार्बोहाइड्रेट से ऊर्जा निकालकर ATP बनाने के लिए उत्तरदायी है?

    उत्तर: सूत्रकणिका (Mitochondrion)।

    ग्लाइकोलिसिस तो कोशिकाद्रव्य में होती है, किंतु ऑक्सी श्वसन के मुख्य चरण — क्रेब्स चक्र व इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र — माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर ही संपन्न होते हैं, जहाँ अधिकांश ATP का निर्माण होता है, इसीलिए इसे कोशिका का शक्ति गृह कहा जाता है।

    5NEET 2017 क्रेब्स चक्र के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

    उत्तर: "चक्र की शुरुआत एसीटाइल समूह (एसीटाइल CoA) के पायरुविक अम्ल से संघनन द्वारा साइट्रिक अम्ल बनने से होती है" — यह कथन गलत है।

    वास्तव में क्रेब्स चक्र की शुरुआत एसीटाइल CoA के ऑक्सैलोएसिटिक अम्ल (OAA) से संघनन द्वारा होती है, पायरुविक अम्ल से नहीं — पायरुविक अम्ल तो पहले ही ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण द्वारा एसीटाइल CoA में बदल चुका होता है। शेष कथन सही हैं — चक्र में तीन बिंदुओं पर NAD⁺, NADH+H⁺ में अपचयित होता है, एक बिंदु पर FAD, FADH₂ में, तथा सक्सिनिल-CoA से सक्सिनिक अम्ल बनने के दौरान एक GTP अणु भी बनता है।

    6NEET 2018 निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

    उत्तर: "ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण बाह्य माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली में होता है" — यह कथन गलत है।

    ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण वास्तव में भीतरी माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली में होता है, बाहरी में नहीं। शेष कथन सही हैं — ग्लाइकोलिसिस तब तक चलती रहती है जब तक उसे हाइड्रोजन ग्रहण करने वाला NAD⁺ मिलता रहे, यह कोशिकाद्रव्य में होती है, तथा TCA चक्र के एंजाइम माइटोकॉन्ड्रीय आधात्री में मौजूद रहते हैं।

    7NEET 2018 कोशिकीय श्वसन में NAD⁺ की क्या भूमिका है?

    उत्तर: यह इलेक्ट्रॉन वाहक के रूप में कार्य करता है (functions as an electron carrier)।

    NAD⁺, क्रियाधार-ऑक्सीकरण के दौरान मुक्त हुए हाइड्रोजन/इलेक्ट्रॉन को ग्रहण कर NADH+H⁺ में अपचयित हो जाता है, और फिर इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र तक इन्हें पहुँचाता है — यही इसकी वाहक (कैरियर) भूमिका है, यह स्वयं कोई एंजाइम नहीं है।

    8NEET 2019 ग्लूकोज का ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में रूपांतरण — जो ग्लाइकोलिसिस की पहली अनुत्क्रमणीय (irreversible) अभिक्रिया है — किस एंजाइम द्वारा उत्प्रेरित होता है?

    उत्तर: हेक्सोकाइनेज़ (Hexokinase)।

    हेक्सोकाइनेज़ ग्लूकोज को फॉस्फोरिलेट करके ग्लूकोज-6-फॉस्फेट बनाता है — यह पहला ATP-उपयोग वाला चरण है। ग्लाइकोलिसिस का दूसरा ATP-उपयोग वाला चरण फॉस्फोफ्रक्टोकाइनेज़ द्वारा उत्प्रेरित होता है, जो फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट को फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट में बदलता है।

    9NEET 2019 पौधों में श्वसनीय इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) कहाँ स्थित होता है?

    उत्तर: भीतरी माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली (Inner mitochondrial membrane)।

    इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र के सभी परिसर (कॉम्प्लेक्स I से IV) भीतरी झिल्ली में अंतर्स्थापित (एम्बेडेड) होते हैं — यह वही झिल्ली है जो क्रिस्टी बनाने के लिए अंतर्वलित होती है, जिससे इसका सतह क्षेत्रफल बढ़ जाता है और अधिक ETS परिसर समा पाते हैं।

    10NEET 2019 ट्राइपामिटिन का साँस गुणांक (R.Q.) मान क्या है?

    उत्तर: 0.7

    ट्राइपामिटिन (एक वसा) के पूर्ण ऑक्सीकरण में 2(C₅₁H₉₈O₆) + 145 O₂ → 102 CO₂ + 98 H₂O + ऊर्जा — इस समीकरण के अनुसार R.Q. = 102 CO₂ ÷ 145 O₂ = 0.7 आता है। वसा का R.Q. सदैव 1 से कम होता है, क्योंकि इसके ऑक्सीकरण में कार्बोहाइड्रेट की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक ऑक्सीजन की खपत होती है।

    11NEET 2019/2021/2026 निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

    उत्तर: "इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला में एक NADH+H⁺ से 2 ATP तथा एक FADH₂ से 3 ATP बनते हैं" — यह कथन गलत है (यह उलटा है)।

    वास्तविक स्थिति इसके ठीक विपरीत है — एक NADH+H⁺ से लगभग 3 ATP तथा एक FADH₂ से लगभग 2 ATP बनते हैं, क्योंकि FADH₂ इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला में NADH की तुलना में बाद के (नीचे के) बिंदु पर प्रवेश करता है, जिससे कम प्रोटॉन-पंपिंग होती है। यह प्रश्न लगभग हर 2-3 वर्ष में दोहराया जाता है, इसलिए NADH=3 व FADH₂=2 का यह क्रम कंठस्थ रखें।

    12NEET 2020 साइट्रिक अम्ल चक्र के एक चक्कर में सब्सट्रेट-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण कितनी बार होता है?

    उत्तर: एक बार (One)।

    क्रेब्स चक्र के एक चक्कर में सब्सट्रेट-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण केवल एक बार होता है — सक्सिनिल-CoA से सक्सिनिक अम्ल बनने के दौरान, जिसमें एक GTP (जो ATP के समतुल्य है) बनता है। शेष ऊर्जा (NADH व FADH₂ के रूप में) बाद में इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र द्वारा ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण से ATP में परिवर्तित होती है।

    13NEET 2022 लैक्टिक अम्ल किण्वन के दौरान ग्लूकोज से कितनी ऊर्जा मुक्त होती है?

    उत्तर: 7% से भी कम (Less than 7%)।

    किण्वन (लैक्टिक अम्ल हो या एल्कोहल) में ग्लूकोज का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है, इसलिए इसमें संचित ऊर्जा का बहुत छोटा हिस्सा ही मुक्त होता है — 7% से भी कम — जबकि शेष अधिकांश ऊर्जा अंतिम उत्पाद (लैक्टिक अम्ल/एल्कोहल) में ही बंधी रह जाती है। यही कारण है कि किण्वन ऑक्सी श्वसन की तुलना में अत्यंत अकुशल प्रक्रिया है।

    14NEET 2022 जब ग्लूकोज का एक अणु टूटकर पायरुविक अम्ल के दो अणु बनाता है, तो ATP की शुद्ध प्राप्ति कितनी होती है?

    उत्तर: दो (Two)।

    ग्लाइकोलिसिस में कुल 4 ATP बनते हैं, किंतु आरंभिक चरणों में 2 ATP खर्च भी होते हैं (हेक्सोकाइनेज़ व फॉस्फोफ्रक्टोकाइनेज़ की अभिक्रियाओं में) — इसलिए शुद्ध (नेट) प्राप्ति केवल 2 ATP की होती है, साथ ही 2 NADH भी बनते हैं।

    15NEET 2023 वसीय अम्ल (fatty acids) श्वसनी पथ से किसके माध्यम से जुड़ते हैं?

    उत्तर: एसीटाइल CoA (Acetyl CoA) के माध्यम से।

    वसीय अम्ल पहले β-ऑक्सीकरण द्वारा टूटकर एसीटाइल CoA बनाते हैं, जो सीधे क्रेब्स चक्र में प्रवेश कर जाता है — यह ग्लिसरॉल के मार्ग (जो पहले PGAL बनाकर ग्लाइकोलिसिस पथ में प्रवेश करता है) से अलग है।

    16NEET 2023 कथन A: ग्लाइकोलिसिस में दो चरणों पर ATP का उपयोग होता है। कारण R: पहला ATP ग्लूकोज को ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में बदलने में, तथा दूसरा ATP फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट को फ्रुक्टोज 1,6-डाइफॉस्फेट में बदलने में उपयोग होता है। इनमें से सही उत्तर चुनें।

    उत्तर: कथन A व कारण R दोनों सही हैं, तथा R वास्तव में A की सही व्याख्या करता है।

    ग्लाइकोलिसिस के "ऊर्जा-निवेश चरण" (energy investment phase) में ठीक इन्हीं दो बिंदुओं पर ATP खर्च होता है — यह जोड़ी NEET में लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में दोहराई जाती है।

    17NEET 2023 प्रत्येक TCA चक्र में विकार्बोक्सिलीकरण (decarboxylation) कितनी बार होता है?

    उत्तर: दो बार (Twice)।

    क्रेब्स चक्र के एक चक्कर में दो बार CO₂ मुक्त होती है — पहली बार आइसोसाइट्रिक अम्ल से α-कीटोग्लूटेरिक अम्ल बनने के दौरान, तथा दूसरी बार α-कीटोग्लूटेरिक अम्ल से सक्सिनिल-CoA बनने के दौरान। (इससे पहले पायरुविक अम्ल के एसीटाइल CoA में बदलने के दौरान भी एक बार CO₂ निकलती है, किंतु वह चरण TCA चक्र के बाहर, "लिंक अभिक्रिया" में गिना जाता है।)

    18NEET 2023 निम्नलिखित में से कौन-सा संयोजन रसाकर्षण (chemiosmosis) के लिए आवश्यक है?

    उत्तर: झिल्ली, प्रोटॉन पंप, प्रोटॉन प्रवणता, तथा ATP-सिंथेटेज़ (membrane, proton pump, proton gradient, ATP synthase)।

    रसाकर्षण परिकल्पना के अनुसार, इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र द्वारा प्रोटॉन को झिल्ली के आर-पार पंप किया जाता है, जिससे एक प्रोटॉन-प्रवणता (इलेक्ट्रोकेमिकल ग्रेडिएंट) बनती है। यही प्रवणता, जब प्रोटॉन ATP-सिंथेटेज़ (F₀-F₁ कॉम्प्लेक्स) से होकर वापस बहते हैं, तब ATP-निर्माण को ऊर्जा देती है।

    19NEET 2024 निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए — (A) साइट्रिक अम्ल चक्र (B) ग्लाइकोलिसिस (C) इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (D) प्रोटॉन प्रवणता — इनके स्थान से।

    उत्तर: साइट्रिक अम्ल चक्र — माइटोकॉन्ड्रीय आधात्री; ग्लाइकोलिसिस — कोशिकाद्रव्य; इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र — भीतरी माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली; प्रोटॉन प्रवणता — माइटोकॉन्ड्रिया का अंतराझिल्ली स्थान।

    यह चारों प्रक्रियाओं का स्थान-निर्धारण (localization) NEET में बार-बार पूछा जाने वाला बिंदु है — ग्लाइकोलिसिस को छोड़कर बाकी सभी माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर ही अलग-अलग जगहों पर होते हैं।

    20NEET 2025 माइटोकॉन्ड्रीय इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र का परिसर-II (Complex II) किस नाम से भी जाना जाता है?

    उत्तर: सक्सिनेट डिहाइड्रोजिनेज़ (Succinate dehydrogenase)।

    परिसर-II ही एकमात्र ऐसा ETS परिसर है, जो क्रेब्स चक्र का भी हिस्सा है — यह सक्सिनिक अम्ल को फ्यूमेरिक अम्ल में ऑक्सीकृत करते हुए FADH₂ से इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर सीधे यूबिक्विनोन (कोएंजाइम Q) तक पहुँचाता है, NADH-डिहाइड्रोजिनेज़ (परिसर-I) से अलग मार्ग द्वारा।

    21ReNEET 2026 ग्लूकोज के 206 अणुओं से ग्लाइकोलिसिस के अंत में पायरुविक अम्ल के कितने अणु बनेंगे?

    उत्तर: 412

    प्रत्येक 1 ग्लूकोज अणु से ग्लाइकोलिसिस द्वारा पायरुविक अम्ल के 2 अणु बनते हैं — इसलिए 206 ग्लूकोज अणुओं से 206 × 2 = 412 पायरुविक अम्ल अणु बनेंगे। यह सरल गणनात्मक प्रश्न ग्लाइकोलिसिस की मूल स्टॉइकियोमेट्री (1 ग्लूकोज → 2 पायरुवेट) की समझ जाँचता है।

    22NEET 2026 2(C₅₁H₉₈O₆) + 145 O₂ → 102 CO₂ + 98 H₂O + ऊर्जा — इस समीकरण के अनुसार श्वसन में प्रयुक्त जैव-अणु का साँस गुणांक (R.Q.) क्या होगा?

    उत्तर: 0.5 से 0.95 के बीच (Between 0.5 and 0.95)।

    गणना करने पर R.Q. = 102 ÷ 145 = 0.7 आता है, जो 0.5 व 0.95 के बीच स्थित है — यह वसा (ट्राइपामिटिन) का विशिष्ट R.Q. मान है, जो सदैव कार्बोहाइड्रेट के R.Q. (=1.0) से कम रहता है।

    23NEET 2026 निम्नलिखित प्रक्रम (सूची-I) को उसके स्थान (सूची-II) से सुमेलित करें — (A) ग्लाइकोलिसिस (B) ETS (C) प्रोटॉन का संचय (D) क्रेब्स चक्र।

    उत्तर: ग्लाइकोलिसिस — कोशिकाद्रव्य; ETS — भीतरी माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली; प्रोटॉन का संचय — अंतराझिल्ली स्थान; क्रेब्स चक्र — माइटोकॉन्ड्रीय आधात्री।

    यह वही स्थान-आधारित सुमेलन प्रश्न है जो NEET 2024 में भी पूछा जा चुका है (देखें प्रश्न 19) — स्थान (लोकेशन) से जुड़े ऐसे मिलान प्रश्न इस अध्याय में बहुत बार दोहराए जाते हैं, इसलिए चारों प्रक्रियाओं के स्थान याद रखना अनिवार्य है।

    अन्य NEET संबंधित तथ्य

    परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

    महत्वपूर्ण
    • चारों प्रक्रियाओं का स्थान कभी न भूलें — ग्लाइकोलिसिस: कोशिकाद्रव्य; क्रेब्स चक्र (TCA): माइटोकॉन्ड्रीय आधात्री; इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS): भीतरी माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली; प्रोटॉन प्रवणता/संचय: माइटोकॉन्ड्रिया का अंतराझिल्ली स्थान। यह चारों स्थान NEET में लगभग हर वर्ष किसी न किसी सुमेलन (मैच द फॉलोइंग) प्रश्न में दोहराए जाते हैं।
    तथ्य
    • NADH व FADH₂ से बनने वाले ATP की संख्या कभी न उलटें — एक NADH+H⁺ से लगभग 3 ATP, तथा एक FADH₂ से लगभग 2 ATP बनते हैं। FADH₂ चूँकि ETS में NADH की तुलना में बाद के (नीचे के) बिंदु पर प्रवेश करता है, इसलिए इससे कम प्रोटॉन-पंपिंग होती है — यही कम ATP-प्राप्ति का कारण है।
    तुलनात्मक
    • साँस गुणांक (R.Q.) के तीन मानक मान — कार्बोहाइड्रेट के लिए R.Q. = 1.0 (पूर्ण ऑक्सीकरण में समान CO₂ व O₂), वसा के लिए R.Q. ≈ 0.7 (1 से कम, क्योंकि अधिक O₂ चाहिए), तथा प्रोटीन के लिए R.Q. ≈ 0.9। शुद्ध रूप में केवल एक ही क्रियाधार का उपयोग होना दुर्लभ है — वास्तविक जीवों में सामान्यतः मिश्रित क्रियाधार प्रयुक्त होते हैं।
    तथ्य
    • ग्लाइकोलिसिस की ऊर्जा-गणना — कुल 4 ATP बनते हैं, किंतु 2 ATP आरंभिक "ऊर्जा-निवेश चरण" में खर्च हो जाते हैं (हेक्सोकाइनेज़ व फॉस्फोफ्रक्टोकाइनेज़ की अभिक्रियाओं में) — इसलिए शुद्ध लाभ केवल 2 ATP (+ 2 NADH) का होता है। यह "सकल बनाम शुद्ध" ATP का अंतर NEET में अक्सर भ्रामक विकल्प बनाता है।
    तथ्य
    • क्रेब्स चक्र में विकार्बोक्सिलीकरण दो बार होता है (आइसोसाइट्रिक अम्ल → α-कीटोग्लूटेरिक अम्ल, तथा α-कीटोग्लूटेरिक अम्ल → सक्सिनिल-CoA), जबकि पायरुविक अम्ल का एसीटाइल CoA में बदलना ("लिंक अभिक्रिया") चक्र से पहले, चक्र के बाहर गिना जाता है — इसे तीसरी बार गिनने की भूल न करें।
    रणनीति
    • NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 1–4 प्रश्न आते हैं (2019 व 2023 जैसे कुछ वर्षों में 4–5 तक भी रहे हैं), जिनमें ग्लाइकोलिसिस के चरण/एंजाइम, क्रेब्स चक्र के तथ्य, तथा ETS/चेमियोस्मोसिस से जुड़े स्थान-आधारित सुमेलन प्रश्न सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले उप-विषय रहे हैं।

    सार संक्षेप में समझें

    प्राणियों की तरह पौधों में श्वसन या गैसीय आदान-प्रदान के लिए कोई विशिष्ट तंत्र नहीं होता — रंध्र व वातरंध्र द्वारा विसरण से ही गैसों का आदान-प्रदान होता है, और पौधों में लगभग सभी सजीव कोशिकाएँ वायु के संपर्क में रहती हैं।

    जटिल कार्बनिक अणुओं के ऑक्सीकरण द्वारा C-C आबंधों के टूटने के बाद जब कोशिका से भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है, तो इसे कोशिकीय साँस कहते हैं। साँस के लिए ग्लूकोज सबसे उपयोगी क्रियाधार है; वसा एवं प्रोटीन के टूटने से भी ऊर्जा निकलती है। कोशिकीय साँस की प्रारंभिक प्रक्रिया, कोशिकाद्रव्य में संपन्न होती है — प्रत्येक ग्लूकोज अणु एंजाइम-उत्प्रेरित शृंखलाओं की अभिक्रियाओं द्वारा पायरुविक अम्ल के 2 अणुओं में टूट जाता है, जिसे ग्लाइकोलिसिस कहते हैं।

    पायरुवेट का भविष्य ऑक्सीजन की उपलब्धता तथा जीव पर निर्भर करता है। अनाक्सी परिस्थितियों में किण्वन द्वारा लैक्टिक अम्ल या एल्कोहल बनते हैं। यूकैरियोट जीवों में ऑक्सीजन की उपस्थिति में ऑक्सी साँस होता है — पायरुविक अम्ल का माइटोकॉन्ड्रिया में परिवहन के बाद एसीटाइल CoA में रूपांतरण होता है, साथ ही CO₂ निकलती है। एसीटाइल CoA फिर TCA पथ अथवा क्रेब्स चक्र में प्रवेश करता है, जो माइटोकॉन्ड्रिया की आधात्री में होता है।

    क्रेब्स चक्र में बनने वाले NADH+H⁺ तथा FADH₂ की ऊर्जा का उपयोग इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र द्वारा ATP के संश्लेषण में होता है, जिसे ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण कहते हैं — इस प्रक्रिया में अंततः अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही O₂ होता है, जो पानी में अपचयित हो जाता है।

    श्वसनी पथ में उपचयी अथवा अपचयी दोनों भाग लेते हैं, इसलिए इसे ऐंफीबोलिक पथ कहते हैं। साँस गुणांक, साँस के दौरान उपयोग में आने वाले श्वसनी क्रियाधार पर निर्भर करता है।

    अभ्यास स्वयं जाँचें

    नीचे दिए गए प्रश्नों को हल करके देखें कि आपने अध्याय के मुख्य बिंदु कितनी अच्छी तरह समझे हैं।

    प्रश्न 1 इनमें अंतर बताइए —
    (i) साँस (श्वसन) और दहन (ii) ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र (iii) ऑक्सी श्वसन तथा किण्वन
    उत्तर

    (i) साँस एंजाइम-नियंत्रित, चरणबद्ध, कोशिकीय प्रक्रिया है जो ATP बनाती है; दहन एक अकेली, अनियंत्रित अभिक्रिया है जो ऊष्मा मुक्त करती है।
    (ii) ग्लाइकोलिसिस कोशिकाद्रव्य में होता है, ग्लूकोज को पायरुवेट में बदलता है, ATP व NADH बनाता है; क्रेब्स चक्र माइटोकॉन्ड्रिया की आधात्री में होता है, एसीटाइल CoA को पूर्ण ऑक्सीकृत कर CO₂, NADH, FADH₂ व GTP बनाता है।
    (iii) ऑक्सी श्वसन में O₂ अंतिम इलेक्ट्रॉन-ग्राही होती है, पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, बहुत अधिक ATP बनता है; किण्वन अनाक्सी होता है, आंशिक ऑक्सीकरण होता है, केवल 2 ATP बनते हैं, तथा अंतिम उत्पाद लैक्टिक अम्ल या एल्कोहल होते हैं।

    प्रश्न 2 श्वसनीय क्रियाधार किसे कहते हैं? इनमें सबसे सामान्य क्रियाधार का नाम बताइए।
    उत्तर

    श्वसनीय क्रियाधार वह कार्बनिक यौगिक है जिसका ऑक्सीकरण श्वसन के दौरान होता है — सबसे सामान्य क्रियाधार ग्लूकोज (कार्बोहाइड्रेट) है, हालाँकि वसा, प्रोटीन व कार्बनिक अम्ल भी उपयोग हो सकते हैं।

    प्रश्न 3 ग्लाइकोलिसिस को रेखाचित्र के जरिए समझाइए।
    उत्तर

    ग्लाइकोलिसिस में ग्लूकोज (6C) के दस चरणों में टूटकर पायरुविक अम्ल (3C) के दो अणु बनते हैं। इसमें दो ATP खर्च होते हैं और कुल चार ATP तथा दो NADH+H⁺ बनते हैं — शुद्ध लाभ 2 ATP व 2 NADH+H⁺ है। चरणों का क्रम: ग्लूकोज → ग्लूकोज-6-फॉस्फेट → फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट → फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट → 2 ट्रायोज फॉस्फेट → 2 1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरेट → 2 3-फॉस्फोग्लिसरेट → 2 फॉस्फोइनोल पायरुवेट → 2 पायरुवेट। (चित्र 12.1 देखें।)

    प्रश्न 4 ऑक्सी श्वसन के मुख्य चरण कौन-कौन से हैं? यह कहाँ संपन्न होता है?
    उत्तर

    ऑक्सी श्वसन के मुख्य चरण हैं: (1) पायरुवेट का ऑक्सीकारी डिकार्बोक्सिलीकरण — माइटोकॉन्ड्रीय आधात्री में; (2) क्रेब्स चक्र (TCA) — आधात्री में; (3) इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) — भीतरी माइटोकॉन्ड्रीय झिल्ली पर; तथा (4) ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण — ATP सिंथेज द्वारा, भीतरी झिल्ली पर।

    प्रश्न 5 क्रेब्स चक्र की समग्र रूपरेखा एक रेखाचित्र द्वारा दर्शाइए।
    उत्तर

    क्रेब्स चक्र की शुरुआत एसीटाइल CoA (2C) के ऑक्सैलोएसिटिक अम्ल (4C) से संघनन से होती है, जिससे सिट्रिक अम्ल (6C) बनता है। फिर आइसोसिट्रेट, α-कीटोग्लूटेरेट (5C), सक्सिनिल-CoA, सक्सिनेट, फ्यूमरेट, मैलेट, और अंततः OAA पुनः बनता है। चक्र में 2 बार CO₂ निकलती है, 3 NADH, 1 FADH₂, और 1 GTP (ATP) बनता है। (चित्र 12.3 देखें।)

    प्रश्न 6 इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र का वर्णन कीजिए।
    उत्तर

    ETS माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली पर स्थित चार कॉम्प्लेक्स (I–IV) तथा ATP सिंथेज (कॉम्प्लेक्स V) से बना होता है। NADH+H⁺ कॉम्प्लेक्स I को, FADH₂ कॉम्प्लेक्स II को इलेक्ट्रॉन देता है। ये इलेक्ट्रॉन यूबिक्विनोन (UQ), कॉम्प्लेक्स III, साइटोक्रोम C, कॉम्प्लेक्स IV से होते हुए O₂ तक पहुँचकर जल बनाते हैं। इस दौरान प्रोटॉन बाहर पंप होते हैं, प्रोटॉन-प्रवणता बनती है, और ATP सिंथेज द्वारा ATP का निर्माण होता है।

    प्रश्न 7 निम्न के मध्य अंतर कीजिए —
    (i) ऑक्सी श्वसन तथा अनॉक्सी श्वसन (ii) ग्लाइकोलिसिस तथा किण्वन (iii) ग्लाइकोलिसिस तथा सिट्रिक अम्ल चक्र
    उत्तर

    (i) ऑक्सी श्वसन में O₂ अंतिम ग्राही है, पूर्ण ऑक्सीकरण, अधिक ATP; अनॉक्सी में O₂ नहीं, अपूर्ण ऑक्सीकरण, कम ATP (किण्वन) या O₂-मुक्त इलेक्ट्रॉन ग्राही।
    (ii) ग्लाइकोलिसिस ग्लूकोज को पायरुवेट में बदलता है (2 ATP, 2 NADH); किण्वन पायरुवेट को लैक्टिक अम्ल या एल्कोहल में बदलता है, NAD⁺ पुनर्जनन करता है, कोई अतिरिक्त ATP नहीं।
    (iii) ग्लाइकोलिसिस कोशिकाद्रव्य में, कार्बोहाइड्रेट का विघटन, ATP व NADH; सिट्रिक अम्ल चक्र आधात्री में, एसीटाइल CoA का ऑक्सीकरण, CO₂, NADH, FADH₂, GTP।

    प्रश्न 8 शुद्ध ATP के अणुओं की प्राप्ति की गणना के दौरान आमतौर पर कौन-सी मान्यताएँ मानी जाती हैं?
    उत्तर
    • पथ क्रमिक व सुव्यवस्थित है — ग्लाइकोलिसिस → TCA → ETS क्रम से चलते हैं।
    • ग्लाइकोलिसिस के NADH माइटोकॉन्ड्रिया में जाते हैं और उनका फॉस्फोरिलीकरण होता है।
    • पथ का कोई मध्यवर्ती दूसरे पथ में नहीं जाता (उपचयी नहीं)।
    • केवल ग्लूकोज ही क्रियाधार है, कोई वैकल्पिक क्रियाधार पथ में प्रवेश नहीं करता।

    इन मान्यताओं के तहत ऑक्सी श्वसन से कुल 38 ATP (सैद्धान्तिक) प्राप्त होते हैं।

    प्रश्न 9 "श्वसनीय पथ एक ऐंफीबोलिक पथ होता है" — इस कथन पर चर्चा कीजिए।
    उत्तर

    श्वसनी पथ का उपयोग केवल अपचय (विघटन) के लिए ही नहीं, बल्कि उपचय (संश्लेषण) के लिए भी होता है। उदाहरण — वसा अम्ल संश्लेषण के लिए एसीटाइल CoA पथ से निकाला जाता है; अमीनो अम्ल संश्लेषण में α-कीटोग्लूटरेट व OAA जैसे मध्यवर्ती उपयोग होते हैं। अतः पथ अपचयी और उपचयी दोनों भूमिकाएँ निभाता है, इसीलिए इसे ऐंफीबोलिक (दोहरी भूमिका वाला) कहा जाता है — न कि केवल अपचयी।

    प्रश्न 10 साँस गुणांक को परिभाषित कीजिए। वसा के लिए इसका मान क्या होता है?
    उत्तर

    साँस गुणांक (R.Q.) = मुक्त CO₂ का आयतन / उपयोग O₂ का आयतन। यह क्रियाधार पर निर्भर करता है। वसा (जैसे ट्राइपामिटिन) के लिए R.Q. ≈ 0.7 होता है, क्योंकि वसा के ऑक्सीकरण में ऑक्सीजन की खपत CO₂ मुक्ति से अधिक होती है।

    प्रश्न 11 ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण क्या है?
    उत्तर

    ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र द्वारा क्रियाधारों के ऑक्सीकरण से मुक्त ऊर्जा का उपयोग ADP व अकार्बनिक फॉस्फेट से ATP बनाने में होता है। यह माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली पर, रसोपरासरण (केमियोस्मोसिस) के जरिए संपन्न होता है।

    प्रश्न 12 साँस के प्रत्येक चरण में मुक्त होने वाली ऊर्जा का क्या महत्व है?
    उत्तर

    साँस में ऊर्जा चरणबद्ध रूप में मुक्त होती है ताकि कोशिका इसे कुशलता से ATP के रूप में संग्रहीत कर सके। यदि सारी ऊर्जा एक साथ मुक्त होती, तो वह ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती और कोशिका उसका उपयोग नहीं कर पाती। चरणबद्ध विमोचन से ऊर्जा का अधिकतम उपयोग ATP-संश्लेषण में होता है, जो कोशिकीय कार्यों के लिए आवश्यक है।

    पादप में श्वसन — जीव विज्ञान अध्याय 12 • सामग्री मौलिक रूप से लिखी गई है, अध्ययन व संदर्भ हेतु उपयोग करें।

    ऊर्जा का यह चक्र — भोजन से ATP तक, जीवन की हर गतिविधि का आधार है।

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