कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन
धरती पर जितने भी सजीव मौजूद हैं — चाहे वे सूक्ष्मदर्शी से दिखने वाले जीवाणु हों या विशालकाय हाथी — सबका आरंभ एक ही कोशिका से होता है। उस एक कोशिका से पूरा शरीर बनाने की कुंजी है बार-बार दोहराया जाने वाला एक व्यवस्थित घटनाक्रम, जिसे हम कोशिका चक्र कहते हैं। इस अध्याय में हम समझेंगे कि एक कोशिका किस तरह अपनी आनुवंशिक सामग्री को दोगुना करके, सही ढंग से बाँटकर, दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है — और यौन जनन में यही प्रक्रिया किस तरह बदलकर गुणसूत्रों की संख्या आधी करने वाली एक विशेष विधि, अर्धसूत्री विभाजन, में परिवर्तित हो जाती है।
भूमिका कोशिका विभाजन क्यों आवश्यक है?
हर बहुकोशिक जीव अपनी यात्रा एक अकेली कोशिका से शुरू करता है। यह कोशिका बार-बार विभाजित होकर दो, चार, आठ... इस तरह लाखों-करोड़ों कोशिकाओं का समूह बना देती है, जो अंततः पूरे शरीर का रूप ले लेता है। रोचक बात यह है कि यह प्रक्रिया जीव के वयस्क होने पर भी नहीं थमती — घाव भरना हो, त्वचा की मृत परतों को बदलना हो या रक्त कोशिकाओं की पूर्ति करनी हो, हर जगह कोशिका विभाजन की आवश्यकता बनी रहती है।
प्रत्येक कोशिका विभाजन में एक पैतृक कोशिका अपने पूरे आनुवंशिक भंडार (डीएनए) की एक हूबहू प्रतिलिपि तैयार करती है और फिर दो बराबर हिस्सों में बँट जाती है, ताकि दोनों नई कोशिकाओं को पैतृक कोशिका जितना ही पूर्ण जीनोम मिल सके। यह इतना सटीक और अनुशासित घटनाक्रम है कि इसे नियंत्रित करने के लिए कोशिका के भीतर आनुवंशिक स्तर पर कई नियंत्रण-बिंदु काम करते हैं, जिससे त्रुटियों की संभावना बहुत कम रहती है।
10.1 कोशिका चक्र क्या है
कोशिका चक्र को दो बड़े भागों में बाँटकर समझना आसान होता है — पहला वह लंबा चरण जिसमें कोशिका विभाजन की तैयारी करती है, और दूसरा वह अपेक्षाकृत छोटा चरण जिसमें वास्तविक विभाजन घटित होता है।
- अंतरावस्था (Interphase): तैयारी का चरण, जिसमें कोशिका बढ़ती है और अपने डीएनए की प्रतिकृति बनाती है।
- M प्रावस्था (Mitosis Phase): वह चरण जिसमें केंद्रक और कोशिकाद्रव्य दोनों वास्तव में दो भागों में बँटते हैं।
मानव कोशिकाओं के संवर्धन (कल्चर) में देखा गया है कि एक पूरा चक्र औसतन चौबीस घंटे में पूर्ण होता है, जबकि यीस्ट जैसे सूक्ष्म जीव में यही चक्र मुश्किल से डेढ़ घंटे (लगभग नब्बे मिनट) में पूरा हो जाता है। यानी चक्र की अवधि हर जीव और हर प्रकार की कोशिका के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है — यह कोई तयशुदा एक जैसा समय नहीं है।
चित्र 10.1 — कोशिका चक्र का चित्रात्मक निरूपण: एक कोशिका दो कोशिकाओं में बदलने से पहले जिन चरणों से गुजरती है
10.1.1 चक्र की प्रावस्थाएँ (G1, S, G2, M)
अंतरावस्था को आगे तीन उप-चरणों में बाँटा जाता है, और मनुष्य जैसी कोशिका में इसी अंतरावस्था में चक्र की कुल अवधि का लगभग पंचानबे प्रतिशत हिस्सा बीत जाता है — यानी असली "विभाजन" तो कुल समय के मुश्किल से एक घंटे भर में सिमट जाता है।
G1 प्रावस्था (वृद्धि चरण-एक)
कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय रहती है और आकार में लगातार बढ़ती है। इस दौरान अधिकांश कोशिकांगों की संख्या दोगुनी हो जाती है, लेकिन डीएनए की प्रतिकृति अभी शुरू नहीं होती।
S प्रावस्था (संश्लेषण चरण)
इसी चरण में डीएनए की प्रतिकृति बनती है। शुरुआत में डीएनए की मात्रा को यदि 2C मान लिया जाए तो इस चरण के अंत तक वह बढ़कर 4C हो जाती है — जबकि गुणसूत्रों की संख्या (जैसे द्विगुणित कोशिका में 2n) उतनी ही बनी रहती है।
G2 प्रावस्था (वृद्धि चरण-दो)
कोशिकाद्रव्य में और वृद्धि होती है तथा सूत्री विभाजन के लिए आवश्यक प्रोटीन का निर्माण इसी दौरान होता है।
M प्रावस्था (सूत्री विभाजन)
चक्र का सबसे नाटकीय हिस्सा, जिसमें कोशिका के भीतरी घटकों का बड़े पैमाने पर पुनर्गठन होता है और अंततः दो संतति कोशिकाएँ बन जाती हैं।
प्राणी कोशिका में जैसे ही S प्रावस्था के दौरान केंद्रक के भीतर डीएनए की प्रतिकृति शुरू होती है, ठीक उसी समय तारककेंद्र (सेंट्रोसोम) की प्रतिकृति भी कोशिकाद्रव्य में बनना आरंभ हो जाती है — दोनों प्रक्रियाएँ लगभग साथ-साथ चलती हैं।
10.1.2 शांत अवस्था — G0
वयस्क शरीर में हर कोशिका हमेशा विभाजित होती नहीं रहती। हृदय की मांसपेशी कोशिकाओं जैसी कुछ कोशिकाएँ तो पूरी तरह विभाजन बंद कर देती हैं, जबकि कई अन्य कोशिकाएँ केवल तभी विभाजित होती हैं जब क्षतिग्रस्त या मृत ऊतक की भरपाई करनी हो। ऐसी कोशिकाएँ G1 प्रावस्था से बाहर निकलकर एक निष्क्रिय-सी अवस्था में चली जाती हैं, जिसे G0 (शांत/प्रशांत अवस्था) कहा जाता है।
10.1.3 अगुणित कोशिकाओं में विभाजन
सामान्यतः प्राणियों में सूत्री विभाजन केवल द्विगुणित (diploid) कायिक कोशिकाओं में ही देखा जाता है। लेकिन प्रकृति में कुछ रोचक अपवाद भी हैं — जैसे नर मधुमक्खी, जो अगुणित (haploid) होती है, फिर भी उसकी कोशिकाएँ सामान्य सूत्री विभाजन से ही बँटती हैं। पादपों में तो यह और भी सामान्य दृश्य है — पादप जीवन-चक्र में पीढ़ी एकांतरण के कारण अगुणित और द्विगुणित, दोनों ही तरह की अवस्थाओं में सूत्री विभाजन होते हुए देखा जा सकता है।
10.2 M प्रावस्था (सूत्री विभाजन)
इस चरण में जनक कोशिका और संतति कोशिका के गुणसूत्रों की संख्या बराबर रहती है, इसलिए इसे सम-विभाजन भी कहा जाता है। सुविधा के लिए इसे चार अवस्थाओं में बाँटा गया है, हालाँकि वास्तव में यह एक निरंतर बहती हुई प्रक्रिया है जिसमें एक अवस्था दूसरे में धीरे-धीरे घुलती चली जाती है।
| क्रम | अवस्था | मुख्य घटना |
|---|---|---|
| 1 | पूर्वावस्था (Prophase) | गुणसूत्र संघनन, केंद्रक-आवरण विघटन |
| 2 | मध्यावस्था (Metaphase) | गुणसूत्र मध्य-रेखा पर पंक्तिबद्ध |
| 3 | पश्चावस्था (Anaphase) | बहनी क्रोमैटिडों का पृथक्करण |
| 4 | अंत्यावस्था (Telophase) | नया केंद्रक-आवरण बनना |
10.2.1 पूर्वावस्था
S और G2 प्रावस्थाओं में जो नए डीएनए सूत्र बन चुके होते हैं, वे आपस में इतने गुँथे रहते हैं कि सूक्ष्मदर्शी से भी अलग-अलग पहचानना असंभव होता है। पूर्वावस्था की शुरुआत इसी गुँथे हुए पदार्थ के धीरे-धीरे सिकुड़कर घना होने से होती है, जिससे गुणसूत्रीय द्रव्य साफ दिखाई देने लगता है।
10.2.2 मध्यावस्था
केंद्रक-आवरण के पूरी तरह टूट जाने के साथ ही अगला चरण शुरू होता है और गुणसूत्र कोशिकाद्रव्य में फैल जाते हैं। अब तक गुणसूत्रों का संघनन इतना पूर्ण हो चुका होता है कि उनकी बनावट का अध्ययन सबसे आसानी से इसी अवस्था में किया जा सकता है।
हर गुणसूत्र दो संतति अर्ध-गुणसूत्रों का बना होता है, जो गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर) पर जुड़े रहते हैं। इसी बिंदु की सतह पर एक छोटी बिंब-जैसी संरचना होती है, जिसे कायनेटोकोर कहा जाता है — यही वह स्थान है जहाँ सूक्ष्मनलिकाओं से बना तर्कु-तंतु (स्पिंडल फाइबर) आकर जुड़ता है। हर अर्ध-गुणसूत्र अपने कायनेटोकोर के माध्यम से एक ध्रुव से, और उसका जोड़ीदार संतति अर्ध-गुणसूत्र विपरीत ध्रुव से तर्कु-तंतु द्वारा जुड़ जाता है।
10.2.3 पश्चावस्था
इस चरण की शुरुआत में मध्यावस्था पट्टिका पर टिका हर गुणसूत्र अचानक दो हिस्सों में अलग होने लगता है — इन अलग हुए भागों को अब संतति अर्ध-गुणसूत्र कहा जाता है, और आगे चलकर यही नई संतति कोशिकाओं के गुणसूत्र बनेंगे। जैसे-जैसे ये अर्ध-गुणसूत्र मध्य-रेखा से दूर हटते जाते हैं, इनका गुणसूत्रबिंदु आगे-आगे और भुजाएँ पीछे की ओर मुड़ी हुई नजर आती हैं।
10.2.4 अंत्यावस्था
जब गुणसूत्र अपने-अपने ध्रुव तक क्रमिक रूप से पहुँच जाते हैं, तो वे धीरे-धीरे असंघनित होकर अपनी अलग-अलग स्पष्ट पहचान खो देते हैं और दोनों ध्रुवों पर एक-एक समूह के रूप में इकट्ठे दिखाई पड़ने लगते हैं।
10.2.5 कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis)
सूत्री विभाजन के दौरान द्विगुणित हो चुके गुणसूत्रों को दो अलग-अलग संतति केंद्रकों में बाँटने की प्रक्रिया को केंद्रक विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। इसके पूरा होते ही कोशिका एक स्वतंत्र प्रक्रिया द्वारा स्वयं भी दो हिस्सों में बँट जाती है, जिसे कोशिकाद्रव्य विभाजन कहा जाता है।
प्राणी कोशिका में यह विभाजन जीवद्रव्यकला पर एक हल्की खाँच बनने से शुरू होता है; यह खाँच धीरे-धीरे गहरी होती जाती है और अंत में केंद्र में मिलकर कोशिकाद्रव्य को पूरी तरह दो भागों में बाँट देती है। इसके विपरीत पादप कोशिका एक कठोर, कम-लचीली कोशिका भित्ति से घिरी होती है, इसलिए वहाँ यह प्रक्रिया अलग ढंग से होती है — कोशिका के बीचोंबीच से एक नई कोशिका भित्ति का निर्माण शुरू होकर बाहर की ओर पहले से मौजूद पार्श्व भित्ति तक फैलता है। इस निर्माण की शुरुआत एक सरल पूर्वगामी संरचना से होती है, जिसे कोशिका पट्टिका कहा जाता है।
10.3 सूत्री विभाजन का महत्व
सूत्री (मध्यवर्तीय) विभाजन आमतौर पर केवल द्विगुणित कोशिकाओं तक सीमित होता है, हालाँकि कुछ निम्न श्रेणी के पादपों और सामाजिक कीटों में अगुणित कोशिकाएँ भी इसी विधि से विभाजित होती देखी गई हैं। किसी भी प्राणी के जीवन में इस विभाजन के योगदान को समझना बेहद जरूरी है।
इस विभाजन से बनने वाली संतति कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से लगभग एक जैसी होती हैं। बहुकोशिक जीवों की समूची वृद्धि इसी सूत्री विभाजन पर टिकी होती है। जैसे-जैसे कोशिका बढ़ती है, केंद्रक और कोशिकाद्रव्य के बीच का अनुपात असंतुलित होने लगता है — इसलिए कोशिका का विभाजित होना जरूरी हो जाता है, ताकि यह अनुपात संतुलित बना रहे।
10.4 अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
यौन जनन में संतति के निर्माण के लिए दो युग्मकों का मिलन होता है, और हर युग्मक में गुणसूत्रों का केवल एक अगुणित समूह होता है। ये युग्मक विशिष्ट द्विगुणित कोशिकाओं से बनते हैं, जिनके लिए एक खास प्रकार का विभाजन जरूरी होता है — इसी में बनने वाली संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है। इसे ही अर्धसूत्री विभाजन कहा जाता है।
यौन जनन करने वाले जीवों के जीवन-चक्र में यही विभाजन अगुणित अवस्था को जन्म देता है, और आगे चलकर निषेचन के जरिए फिर से द्विगुणित अवस्था लौट आती है। पादपों और प्राणियों दोनों में युग्मक बनने के समय यही अर्धसूत्री विभाजन घटित होता है।
10.4.1 अर्धसूत्री विभाजन I
अर्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था-I सामान्य सूत्री विभाजन की पूर्वावस्था की तुलना में कहीं अधिक लंबी और जटिल होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच उप-चरणों में बाँटा गया है — तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकीटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) और पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)।
1 तनुपट्ट (लेप्टोटीन)
सामान्य सूक्ष्मदर्शी से देखने पर इस चरण में गुणसूत्र धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगते हैं। पूरे तनुपट्ट चरण के दौरान गुणसूत्र का संघनन (कॉम्पैक्शन) लगातार जारी रहता है।
2 युग्मपट्ट (जाइगोटीन)
इस अवस्था में समजात गुणसूत्र एक-दूसरे के साथ जुड़ना (युग्मन) शुरू कर देते हैं — इस तरह के जुड़ाव को सूत्रयुग्मन कहते हैं। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मलेखी से पता चलता है कि इस युग्मन के साथ एक जटिल संरचना बनती है, जिसे सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र कहा जाता है। एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों से बनी इस संरचना को युगली (bivalent) या चतुष्क (tetrad) कहा जाता है।
3 स्थूलपट्ट (पैकीटीन)
यह चरण पिछले दोनों चरणों की तुलना में अपेक्षाकृत छोटा होता है। इसी दौरान हर युगली गुणसूत्र के चार अर्ध-गुणसूत्र चतुष्क के रूप में साफ दिखाई देने लगते हैं। इसी अवस्था में पुनर्योजन ग्रंथिकाएँ दिखनी शुरू होती हैं, जहाँ समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्ध-गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान (क्रॉसिंग ओवर) होता है। यह विनिमय एक विशेष एंजाइम — रिकॉम्बिनेज — द्वारा नियंत्रित होता है, और इसी के जरिए जीन-विनिमय संपन्न होता है। स्थूलपट्ट के अंत तक यह पुनर्योजन पूरा हो जाता है, जिससे विनिमय-स्थल पर गुणसूत्र आपस में जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं।
4 द्विपट्ट (डिप्लोटीन)
इस चरण की शुरुआत में सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र टूटने लगता है और युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय-बिंदु को छोड़कर बाकी जगहों से एक-दूसरे से अलग होने लगते हैं। जिस X-आकार की संरचना पर यह विनिमय-बिंदु दिखता है, उसे काएज्मेटा कहते हैं। कुछ कशेरुकी प्राणियों के अंडकों में द्विपट्ट अवस्था महीनों या यहाँ तक कि वर्षों बाद जाकर पूरी होती है।
5 पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)
यह पूर्वावस्था-I का अंतिम चरण है। इसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन (टर्मिनलाइजेशन) होता है, यानी काएज्मेटा धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्र पूरी तरह संघनित हो चुके होते हैं और तर्कु-तंतु एकत्र होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में मदद करने लगते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक केंद्रिका लुप्त हो जाती है और केंद्रक-आवरण भी टूट जाता है — इस तरह यह चरण मध्यावस्था की ओर संक्रमण का संकेत देता है।
चित्र 10.2 — अर्धसूत्री विभाजन-I की मुख्य अवस्थाओं का सरलीकृत निरूपण
मध्यावस्था-I
युगली गुणसूत्र अब मध्य-रेखा पट्टिका पर व्यवस्थित हो जाते हैं। विपरीत ध्रुवों से आने वाले तर्कु-तंतुओं की सूक्ष्मनलिकाएँ समजात गुणसूत्रों के जोड़ों के कायनेटोकोर से जुड़ जाती हैं।
पश्चावस्था-I
समजात गुणसूत्र अब एक-दूसरे से अलग होकर विपरीत ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, जबकि हर संतति अर्ध-गुणसूत्र अब भी अपने गुणसूत्रबिंदु से जुड़ा रहता है — यानी सूत्री विभाजन की तरह यहाँ अर्ध-गुणसूत्र अलग नहीं होते, बल्कि पूरे समजात गुणसूत्र-जोड़े अलग होते हैं।
अंत्यावस्था-I
केंद्रक-आवरण और केंद्रिका फिर से स्पष्ट होने लगते हैं, कोशिकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है, और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका-द्विक कहा जाता है। हालाँकि इस चरण में गुणसूत्र कुछ हद तक बिखरे हुए दिखते हैं, फिर भी वे अंतरावस्था वाले केंद्रक की तरह पूरी तरह फैली हुई अवस्था में नहीं दिखते।
10.4.2 अर्धसूत्री विभाजन II
अर्धसूत्री विभाजन-II, विभाजन-I से काफी सरल होता है और सामान्य सूत्री विभाजन जैसा ही दिखता है। यह गुणसूत्रों के पूरी तरह फैलने से पहले और कोशिकाद्रव्य विभाजन के तुरंत बाद शुरू होता है।
संक्षेप में कहें तो अर्धसूत्री विभाजन एक ऐसी विरोधाभासी-सी दिखने वाली, लेकिन बेहद जरूरी प्रक्रिया है, जिसके जरिए यौन जनन करने वाले हर जीव में गुणसूत्रों की निश्चित संख्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित रहती है — भले ही इस विभाजन के दौरान संख्या अस्थायी रूप से आधी हो जाए। साथ ही, इसी प्रक्रिया के जरिए क्रॉसिंग ओवर के कारण हर पीढ़ी में नई आनुवंशिक विविधता जुड़ती जाती है, जो विकास की प्रक्रिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
तालिका — अर्धसूत्री-I और अर्धसूत्री-II के चरणों की तुलना
| अर्धसूत्री I | अर्धसूत्री II |
|---|---|
| पूर्वावस्था I (5 उप-चरण) | पूर्वावस्था II |
| मध्यावस्था I | मध्यावस्था II |
| पश्चावस्था I | पश्चावस्था II |
| अंत्यावस्था I | अंत्यावस्था II |
📝 NEET/AIIMS में पूछे जा चुके प्रश्न
इस अध्याय से 2013 के बाद NEET (व समान स्तर की AIIMS जैसी परीक्षाओं) में पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष के संदर्भ सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें
1NEET 2013 अर्धसूत्री विभाजन-I के दौरान गुणसूत्र आपस में युग्मित (pair) होना किस अवस्था से शुरू करते हैं?
उत्तर: सूत्रयुग्मन (Zygotene)।
पूर्वावस्था-I की पाँच उप-अवस्थाओं में से सूत्रयुग्मन (जाइगोटीन) वह अवस्था है, जिसमें समजात गुणसूत्र आपस में जुड़ना (सूत्रयुग्मन/synapsis) शुरू करते हैं। इससे पहले वाली अवस्था तनुतंतु (लेप्टोटीन) में गुणसूत्र केवल दिखने लगते हैं, युग्मन नहीं होता — यह क्रम NEET में सबसे अधिक बार पूछा जाने वाला बिंदु है।
2पूर्व वर्ष 2014 यदि किसी कोशिका में प्रारंभिक DNA मात्रा 2C मानी जाए, तो कोशिका चक्र की किन अवस्थाओं में यह मात्रा 4C स्तर पर बनी रहती है?
उत्तर: G2 व M अवस्था में (G2 and M)।
S प्रावस्था में DNA द्विगुणित होकर 2C से 4C हो जाता है, और यह 4C स्तर G2 अवस्था के दौरान तथा M प्रावस्था (सूत्री विभाजन) के मध्यावस्था तक बना रहता है — पश्चावस्था में गुणसूत्रबिंदु टूटने के बाद ही यह वापस 2C प्रति कोशिका हो पाता है।
3पूर्व वर्ष 2014 अर्धसूत्री विभाजन की किस अवस्था में रिकॉम्बिनेस एंजाइम की आवश्यकता होती है?
उत्तर: स्थूलपट्ट/पैकीटीन (Pachytene) अवस्था में।
पैकीटीन अवस्था में ही समजात गुणसूत्रों के अजात बहनी क्रोमैटिडों के बीच क्रॉसिंग ओवर (आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान) होता है, जिसके लिए रिकॉम्बिनेस एंजाइम ज़िम्मेदार होता है। इसी क्रिया के कारण अगली अवस्था (डिप्लोटीन) में काएज़्मेटा दिखाई देने लगते हैं।
4AIIMS 2014 कोशिका चक्र की सबसे लंबी अवस्था (longest phase) कौन-सी है?
उत्तर: अंतरावस्था (Interphase)।
संपूर्ण कोशिका चक्र में अंतरावस्था (G1 + S + G2) ही सबसे लंबी अवधि तक चलती है — सामान्यतः कुल चक्र-समय का लगभग 95% भाग अंतरावस्था में ही व्यतीत होता है, जबकि वास्तविक विभाजन (M प्रावस्था) अपेक्षाकृत बहुत छोटी अवधि में पूरा हो जाता है।
5पूर्व वर्ष 2015 अर्धसूत्री विभाजन की निम्नलिखित घटनाओं को सही क्रम में व्यवस्थित करें — (i) क्रॉसिंग ओवर (ii) सूत्रयुग्मन (iii) काएज़्मेटा का अंतस्थीकरण (iv) केंद्रिका का लुप्त होना।
उत्तर: सूत्रयुग्मन → क्रॉसिंग ओवर → काएज़्मेटा का अंतस्थीकरण → केंद्रिका का लुप्त होना (ii, i, iii, iv)।
सबसे पहले जाइगोटीन में समजात गुणसूत्रों का युग्मन (सूत्रयुग्मन) होता है, फिर पैकीटीन में क्रॉसिंग ओवर होता है, इसके बाद डिप्लोटीन/डायकाइनेसिस में काएज़्मेटा का अंतस्थीकरण (टर्मिनलाइज़ेशन) होता है, और अंत में डायकाइनेसिस के अंतिम चरण में केंद्रिका पूरी तरह लुप्त हो जाती है — यह क्रम पूर्वावस्था-I के पाँचों उप-चरणों की समझ की परीक्षा लेता है।
6NEET-I 2016 तर्कु-तंतु (spindle fibers) गुणसूत्र के किस भाग से जुड़ते हैं?
उत्तर: गुणसूत्र के कायनेटोकोर (kinetochore) से।
कायनेटोकोर, गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर) पर स्थित एक विशेष प्रोटीन-संरचना है, जिससे विपरीत ध्रुवों से आने वाले तर्कु-तंतुओं की सूक्ष्मनलिकाएँ जुड़ती हैं — गुणसूत्रबिंदु स्वयं जुड़ाव-स्थल नहीं है, बल्कि कायनेटोकोर उसी पर बना संरचनात्मक भाग है।
7NEET-I 2016 कायिक (सोमैटिक) कोशिकाओं में सूत्री विभाजन के दौरान निम्नलिखित में से कौन-सा लक्षण नहीं पाया जाता?
उत्तर: सूत्रयुग्मन/सिनैप्सिस (Synapsis)।
सिनैप्सिस (समजात गुणसूत्रों का युग्मन) केवल अर्धसूत्री विभाजन की विशेषता है, सूत्री विभाजन की नहीं — क्योंकि सूत्री विभाजन में समजात गुणसूत्र आपस में जुड़ते ही नहीं। केंद्रिका का लुप्त होना, तर्कु-तंतु का बनना व गुणसूत्रों की गति — ये तीनों सामान्य सूत्री विभाजन के लक्षण हैं।
8NEET 2017 सूत्री विभाजन की घटनाओं का सही क्रम क्या है?
उत्तर: संघनन → केंद्रक-आवरण का विघटन → मध्य-रेखा पर व्यवस्थापन → गुणसूत्रबिंदु का विभाजन → पृथक्करण → अंत्यावस्था।
यह क्रम पूर्वावस्था (संघनन व केंद्रक-आवरण विघटन), मध्यावस्था (मध्य-रेखा पर व्यवस्थापन), पश्चावस्था (गुणसूत्रबिंदु विभाजन व पृथक्करण) तथा अंत्यावस्था — चारों अवस्थाओं के तार्किक क्रम को दर्शाता है।
9NEET 2020 कुछ विभाजित होने वाली कोशिकाएँ कोशिका चक्र से बाहर निकलकर एक प्रशांत (quiescent) अवस्था — G0 — में प्रवेश कर जाती हैं। यह प्रक्रिया किस अवस्था के अंत में होती है?
उत्तर: G1 अवस्था के अंत में।
यदि G1 अवस्था की कोशिका को विभाजन की आवश्यकता न हो, तो वह S प्रावस्था में प्रवेश करने के बजाय G1 के तुरंत बाद एक निष्क्रिय प्रशांत अवस्था — G0 — में चली जाती है।
10NEET 2021 फल-मक्खी (Drosophila) की प्रत्येक कोशिका में 8 गुणसूत्र (2n) होते हैं। यदि G1 प्रावस्था में गुणसूत्रों की संख्या 8 है, तो S प्रावस्था के बाद यह संख्या क्या होगी?
उत्तर: 8 ही रहेगी (संख्या नहीं बदलती, केवल DNA मात्रा दोगुनी होती है)।
S प्रावस्था में प्रत्येक गुणसूत्र की प्रतिकृति बनकर दो बहनी क्रोमैटिड बन जाते हैं, किंतु दोनों क्रोमैटिड एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े रहने के कारण एक ही गुणसूत्र माने जाते हैं — इसलिए गुणसूत्रों की संख्या (N) 8 ही बनी रहती है, जबकि DNA की मात्रा (C) दोगुनी हो जाती है।
11NEET 2021 अर्धसूत्री पूर्वावस्था की किस उप-अवस्था में काएज़्मेटा का अंतस्थीकरण (टर्मिनलाइज़ेशन) प्रमुख विशेषता के रूप में दिखाई देता है?
उत्तर: डायकाइनेसिस (Diakinesis)।
डिप्लोटीन में काएज़्मेटा पहली बार दिखाई देते हैं, किंतु उनका छोर की ओर खिसकना (टर्मिनलाइज़ेशन) पूर्वावस्था-I की अंतिम उप-अवस्था, डायकाइनेसिस, में सबसे प्रमुखता से देखा जाता है — इसी अवस्था के अंत तक केंद्रिका व केंद्रक-आवरण भी पूर्णतः लुप्त हो जाते हैं।
12NEET 2022 Phase 1 सूत्री विभाजन के दौरान निम्नलिखित में से कौन-सी घटना कभी नहीं होती?
उत्तर: समजात गुणसूत्रों का युग्मन (Pairing of homologous chromosomes)।
समजात गुणसूत्रों का युग्मन (सिनैप्सिस) केवल अर्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था-I में होता है — सूत्री विभाजन में यह कभी नहीं होता।
13NEET 2022 समजात गुणसूत्रों पर पुनर्योजन गुच्छिकाओं (recombination nodules) का प्रकट होना किस अवस्था की विशेषता है?
उत्तर: पैकीटीन (Pachytene)।
पैकीटीन अवस्था में ही समजात गुणसूत्रों के बीच पुनर्योजन गुच्छिकाएँ बनती हैं, जो वास्तव में वे स्थल हैं जहाँ क्रॉसिंग ओवर (आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान) घटित होता है।
14NEET 2023 कोशिका चक्र की प्रशांत (quiescent) अवस्था कौन-सी है?
उत्तर: G0 अवस्था।
G0 वह अवस्था है जिसमें कोशिका सक्रिय कोशिका चक्र से बाहर निकल जाती है — यह न तो विभाजित होती है, न ही विभाजन की तैयारी करती है, फिर भी चयापचयी रूप से सक्रिय बनी रहती है।
15NEET 2023 अर्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था-I की उप-अवस्थाओं का सही क्रम बताइए — (A) जाइगोटीन (B) पैकीटीन (C) डायकाइनेसिस (D) लेप्टोटीन (E) डिप्लोटीन।
उत्तर: लेप्टोटीन → जाइगोटीन → पैकीटीन → डिप्लोटीन → डायकाइनेसिस (D, A, B, E, C)।
यह पूर्वावस्था-I के पाँचों उप-चरणों का मानक व अपरिवर्तनीय क्रम है, जो लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में NEET में दोहराया जाता है — इसे कंठस्थ याद रखना अनिवार्य है।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं
- पूर्वावस्था-I के पाँचों उप-चरणों की विशेषताओं को कभी न उलझाएँ — लेप्टोटीन (गुणसूत्र दिखने लगते हैं), जाइगोटीन (सूत्रयुग्मन/सिनैप्सिस, युगली/बाइवैलेंट व सिनैप्टोनीमल कॉम्प्लेक्स का बनना), पैकीटीन (क्रॉसिंग ओवर व पुनर्योजन गुच्छिकाएँ), डिप्लोटीन (सिनैप्टोनीमल कॉम्प्लेक्स का घुलना व काएज़्मेटा का दिखना), डायकाइनेसिस (काएज़्मेटा का अंतस्थीकरण, केंद्रिका व केंद्रक-आवरण का लुप्त होना)।
- गुणसूत्र संख्या (N) बनाम DNA मात्रा (C) — S प्रावस्था में DNA मात्रा 2C से 4C हो जाती है, किंतु गुणसूत्र संख्या नहीं बदलती (क्योंकि बहनी क्रोमैटिड एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े रहते हैं)। गुणसूत्र संख्या केवल पश्चावस्था (सूत्री) या पश्चावस्था-II (अर्धसूत्री) में गुणसूत्रबिंदु टूटने के बाद ही दोगुनी होती दिखती है — यह N व C का भेद NEET का सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला संख्यात्मक कॉन्सेप्ट है।
- कोशिका चक्र की सबसे लंबी अवस्था अंतरावस्था है (कुल चक्र का लगभग 95%), और अंतरावस्था के भीतर भी सामान्यतः G1 अवस्था सबसे परिवर्तनशील अवधि वाली होती है — यह भ्रम न करें कि M प्रावस्था सबसे लंबी होती है।
- सूत्री बनाम अर्धसूत्री विभाजन के तीन बड़े अंतर — सूत्री विभाजन में समजात गुणसूत्रों का युग्मन (सिनैप्सिस) व क्रॉसिंग ओवर कभी नहीं होता; अर्धसूत्री-I की पश्चावस्था में समजात गुणसूत्र अलग होते हैं (बहनी क्रोमैटिड नहीं), जबकि सूत्री पश्चावस्था व अर्धसूत्री-II की पश्चावस्था में बहनी क्रोमैटिड अलग होते हैं — यह अंतर बार-बार "पश्चावस्था की तुलना करें" प्रकार के प्रश्नों में पूछा जाता है।
- G0 (प्रशांत) अवस्था G1 के तुरंत बाद आती है, S प्रावस्था के बाद नहीं — जो कोशिकाएँ विभाजन के लिए निर्धारित नहीं होतीं (जैसे परिपक्व तंत्रिका कोशिकाएँ, हृद पेशी कोशिकाएँ), वे G1 से सीधे G0 में चली जाती हैं।
- NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 3–5 प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनमें सबसे अधिक भार पूर्वावस्था-I के उप-चरणों (लेप्टोटीन से डायकाइनेसिस), मध्यावस्था/पश्चावस्था की पहचान, तथा S प्रावस्था की घटनाओं पर रहता है — पिछले 10 वर्षों के 60% से अधिक प्रश्न इन्हीं तीन उप-विषयों से आए हैं।
✓ संक्षिप्त सार
कोशिका सिद्धांत के अनुसार हर नई कोशिका किसी पहले से मौजूद कोशिका से ही बनती है — इसी प्रक्रिया को कोशिका विभाजन कहा जाता है। यौन जनन करने वाले किसी भी जीव का जीवन एक ही युग्मनज (जाइगोट) से शुरू होता है, और यह विभाजन जीव के वयस्क बनने के बाद भी जीवनभर जारी रहता है।
कोशिका चक्र मूलतः दो बड़े चरणों में बँटा है — अंतरावस्था, जो विभाजन की तैयारी का समय है, और M प्रावस्था, जो वास्तविक विभाजन का समय है। अंतरावस्था को आगे G1, S और G2 में बाँटा गया है, जिसमें S प्रावस्था में डीएनए की प्रतिकृति व गुणसूत्रों का द्विगुणन होता है। सूत्री विभाजन को पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था और अंत्यावस्था — इन चार चरणों में समझा जाता है, जिसके अंत में केंद्रक-विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य-विभाजन होकर दो बराबर संतति कोशिकाएँ बनती हैं। यही कारण है कि सूत्री विभाजन को सम-विभाजन भी कहा जाता है।
इसके विपरीत, अर्धसूत्री विभाजन केवल उन्हीं द्विगुणित कोशिकाओं में होता है जो युग्मक बनाने के लिए निर्धारित हैं। इसमें केंद्रक व कोशिका विभाजन के दो क्रमिक दौर (अर्धसूत्री-I व अर्धसूत्री-II) होते हैं, जबकि डीएनए की प्रतिकृति केवल एक बार बनती है। परिणामस्वरूप बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ अगुणित होती हैं, यानी उनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका की आधी रह जाती है। यौन जनन में जब दो युग्मक मिलते हैं, तभी गुणसूत्रों की मूल संख्या फिर से स्थापित होती है।
? अध्याय अभ्यास
नीचे दिए गए प्रश्नों को हल करके देखें कि आपने अध्याय के मुख्य बिंदु कितनी अच्छी तरह समझे हैं।
प्रश्न 1 स्तनधारी की एक सामान्य कोशिका के पूरे कोशिका चक्र को पूरा होने में औसतन कितना समय लगता है?
स्तनधारी कोशिका में कोशिका चक्र पूरा होने में औसतन 24 घंटे का समय लगता है। हालाँकि यह अवधि जीव के प्रकार व कोशिका के प्रकार के अनुसार भिन्न हो सकती है — उदाहरण के लिए, यीस्ट में यह चक्र लगभग 90 मिनट में पूरा हो जाता है।
प्रश्न 2 कोशिकाद्रव्य विभाजन (साइटोकाइनेसिस) और केंद्रक विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) में मूल अंतर क्या है, स्पष्ट कीजिए।
केंद्रक विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) — वह प्रक्रिया जिसमें केंद्रक के भीतर गुणसूत्रों का विभाजन होता है, जिससे दो संतति केंद्रक बनते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन (साइटोकाइनेसिस) — वह प्रक्रिया जिसमें कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँटता है, जिससे दो पृथक संतति कोशिकाएँ बनती हैं।
प्रश्न 3 अंतरावस्था के दौरान कोशिका के भीतर घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अंतरावस्था तीन उप-चरणों में विभाजित है — G1 (कोशिका वृद्धि, कोशिकांगों का दोहराव), S (DNA प्रतिकृति, 2C से 4C होना) तथा G2 (प्रोटीन संश्लेषण, विभाजन की अंतिम तैयारी)। कुल मिलाकर अंतरावस्था चक्र के समय का लगभग 95% भाग घेरती है।
प्रश्न 4 कोशिका चक्र की G0 (प्रशांत) अवस्था किसे कहते हैं और यह किन कोशिकाओं में देखी जाती है?
G0 कोशिका चक्र की वह अवस्था है जिसमें कोशिका विभाजन चक्र से बाहर निकल जाती है — वह चयापचयी रूप से सक्रिय रहती है, लेकिन विभाजित नहीं होती। यह अवस्था तंत्रिका कोशिकाओं, हृद पेशी कोशिकाओं तथा कुछ स्थायी ऊतकों की कोशिकाओं में देखी जाती है।
प्रश्न 5 सूत्री विभाजन को सम-विभाजन (equational division) क्यों कहा जाता है, कारण सहित बताइए।
सूत्री विभाजन को सम-विभाजन कहा जाता है क्योंकि इसमें जनक कोशिका व संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या समान रहती है। दूसरे शब्दों में, यदि जनक कोशिका द्विगुणित (2n) है, तो संतति कोशिकाएँ भी द्विगुणित (2n) ही होती हैं — संख्या में कोई कमी या वृद्धि नहीं होती।
प्रश्न 6 कोशिका चक्र की उस अवस्था का नाम बताइए, जिसमें नीचे लिखी घटनाएँ घटित होती हैं —
(i) गुणसूत्र तर्कु की मध्य-रेखा की ओर गति करते हैं।
(ii) गुणसूत्रबिंदु टूटता है और अर्ध-गुणसूत्र अलग होते हैं।
(iii) समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होता है।
(iv) समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का विनिमय होता है।
(ii) गुणसूत्रबिंदु टूटता है और अर्ध-गुणसूत्र अलग होते हैं।
(iii) समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होता है।
(iv) समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का विनिमय होता है।
(i) मध्यावस्था — गुणसूत्र मध्य-रेखा पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होते हैं।
(ii) पश्चावस्था — गुणसूत्रबिंदु विभाजित होते हैं व बहनी क्रोमैटिड अलग होकर ध्रुवों की ओर जाते हैं।
(iii) जाइगोटीन (युग्मपट्ट) — अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था की उप-अवस्था जिसमें समजात गुणसूत्र युग्मित होते हैं।
(iv) पैकीटीन (स्थूलपट्ट) — अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था की उप-अवस्था जिसमें क्रॉसिंग ओवर होता है।
प्रश्न 7 नीचे दिए गए पदों की संक्षिप्त परिभाषा दीजिए —
(i) सूत्रयुग्मन (ii) युगली (bivalent) (iii) काएज्मेटा
(i) सूत्रयुग्मन (Synapsis) — अर्धसूत्री विभाजन-I की पूर्वावस्था के जाइगोटीन चरण में समजात गुणसूत्रों के आपस में जुड़ने की प्रक्रिया।
(ii) युगली (Bivalent) — जोड़ी बने दो समजात गुणसूत्रों से बनी संरचना, जिसमें चार अर्ध-गुणसूत्र (चतुष्क) होते हैं।
(iii) काएज्मेटा (Chiasmata) — डिप्लोटीन अवस्था में दिखने वाले X-आकार के बिंदु, जहाँ समजात गुणसूत्रों के बीच क्रॉसिंग ओवर हुआ होता है।
प्रश्न 8 पादप कोशिका और प्राणी कोशिका के कोशिकाद्रव्य विभाजन की प्रक्रिया में क्या भिन्नता पाई जाती है?
प्राणी कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन कोशिका झिल्ली पर एक खाँच (cleavage) बनने से शुरू होता है, जो धीरे-धीरे गहरी होकर कोशिका को दो भागों में बाँट देता है। पादप कोशिका में कठोर कोशिका भित्ति के कारण यह प्रक्रिया कोशिका पट्टिका के निर्माण से होती है, जो कोशिका के मध्य से बाहर की ओर बढ़कर नई कोशिका भित्ति बनाती है।
प्रश्न 9 अर्धसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ किन परिस्थितियों में आकार में समान होती हैं और किन में भिन्न-भिन्न आकार की?
नर में — अर्धसूत्री विभाजन से चारों शुक्राणु कोशिकाएँ आकार में समान होती हैं।
मादा में — अर्धसूत्री विभाजन से एक बड़ी अंडाणु कोशिका तथा तीन छोटी ध्रुवीय पिंडिकाएँ बनती हैं — ये आकार में भिन्न होती हैं।
प्रश्न 10 सूत्री विभाजन की पश्चावस्था और अर्धसूत्री विभाजन-I की पश्चावस्था के बीच मुख्य अंतर क्या है?
सूत्री पश्चावस्था में बहनी क्रोमैटिड अलग होकर ध्रुवों की ओर जाते हैं (गुणसूत्रबिंदु विभाजित होता है)। अर्धसूत्री-I की पश्चावस्था में समजात गुणसूत्र अलग होकर ध्रुवों की ओर जाते हैं, जबकि बहनी क्रोमैटिड अपने गुणसूत्रबिंदु से जुड़े रहते हैं — अर्थात पूरे गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं।
प्रश्न 11 सूत्री और अर्धसूत्री विभाजन के बीच के प्रमुख अंतरों को सूचीबद्ध कीजिए।
- सूत्री विभाजन कायिक (दैहिक) कोशिकाओं में होता है; अर्धसूत्री विभाजन युग्मक-जनक कोशिकाओं में होता है।
- सूत्री विभाजन में एक विभाजन होता है; अर्धसूत्री में दो क्रमिक विभाजन (Meiosis I व II) होते हैं।
- सूत्री विभाजन से दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं; अर्धसूत्री से चार संतति कोशिकाएँ बनती हैं।
- सूत्री विभाजन में गुणसूत्र संख्या समान (2n → 2n) रहती है; अर्धसूत्री में संख्या आधी (2n → n) हो जाती है।
- सूत्री विभाजन में समजात गुणसूत्रों का युग्मन नहीं होता; अर्धसूत्री-I में सिनैप्सिस व क्रॉसिंग ओवर होता है।
प्रश्न 12 अर्धसूत्री विभाजन का जीव-जगत के लिए क्या महत्व है, विस्तार से समझाइए।
- गुणसूत्र संख्या का स्थिरीकरण — यौन जनन में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की निश्चित संख्या बनी रहती है।
- आनुवंशिक विविधता — क्रॉसिंग ओवर के कारण पुनर्योजन होता है, जिससे नई जीन संयोजन बनते हैं।
- विकास का आधार — विविधता ही प्राकृतिक चयन व विकास का आधार है।
- युग्मक निर्माण — अर्धसूत्री विभाजन ही युग्मकों (शुक्राणु व अंडाणु) के निर्माण का माध्यम है।
प्रश्न 13 क्या S प्रावस्था में डीएनए की प्रतिकृति बने बिना सूत्री विभाजन संभव है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
नहीं, S प्रावस्था में DNA प्रतिकृति के बिना सूत्री विभाजन संभव नहीं है। क्योंकि विभाजन के बाद दोनों संतति कोशिकाओं को पूर्ण जीनोम (DNA) मिलना चाहिए, जो केवल प्रतिकृति द्वारा ही संभव है। बिना DNA प्रतिकृति के, संतति कोशिकाओं को अपूर्ण आनुवंशिक सामग्री मिलेगी, जो कोशिका की कार्यिकी के लिए घातक होगी।
प्रश्न 14 कोशिका विभाजन की हर अवस्था के दौरान गुणसूत्रों की संख्या (N) व DNA मात्रा (C) में होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए।
- G1 — N = 2n (द्विगुणित), C = 2C
- S — N = 2n (बहनी क्रोमैटिड बने, पर संख्या नहीं बदली), C = 4C (प्रतिकृति के कारण DNA दोगुना)
- G2 — N = 2n, C = 4C
- M-मध्यावस्था — N = 2n, C = 4C
- M-पश्चावस्था — N = 4n (गुणसूत्रबिंदु विभाजन से अस्थायी रूप से), C = 4C (विभाजन से पहले)
- M-अंत्यावस्था — प्रत्येक संतति में N = 2n, C = 2C