पारितंत्र — सम्पूर्ण अध्ययन
कक्षा-12 • अध्याय 12

पारितंत्र

पारितंत्र की संरचना, उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह, खाद्य शृंखला-जाल, पोषण स्तर, तथा संख्या-जैवमात्रा-ऊर्जा के पारिस्थितिक पिरैमिड — परीक्षा‑केंद्रित विस्तृत विवेचन।

★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 पारितंत्र — संरचना एवं क्रियाशीलता

प्रकृति की क्रियाशील इकाई — जैविक एवं अजैविक घटकों का सम्मिश्रण

पारितंत्र प्रकृति की वह क्रियाशील इकाई है, जहाँ जीवधारी आपस में तथा अपने भौतिक पर्यावरण के साथ परस्पर क्रिया करते हैं। यह एक छोटे तालाब से लेकर विशाल जंगल या महासागर तक हो सकता है। "इकोसिस्टम" शब्द ए. जी. टैंस्ली द्वारा 1935 में प्रस्तुत किया गया था।

पारितंत्र को मुख्यतः दो श्रेणियों में बाँटा गया है — स्थलीय (जंगल, घास के मैदान, मरुस्थल) एवं जलीय (झील, तालाब, नदी, ज्वारनदमुख)। मानव-निर्मित पारितंत्र के उदाहरण — शस्यभूमि एवं जलजीवशाला (एक्वेरियम)।

पारितंत्र के घटक
  • अजैविक (अजीवीय): हवा, पानी, मिट्टी, सौर विकिरण, ताप, आर्द्रता, कार्बनिक व अकार्बनिक पोषक तत्त्व।
  • जैविक (सजीव): उत्पादक (स्वपोषी), उपभोक्ता (परपोषी), अपघटक (मृतपोषी)।
पारितंत्र की संरचना अजैविक (अजीवीय) घटक हवा, पानी, मिट्टी कार्बनिक व अकार्बनिक तत्त्व सौर निवेश, ताप, आर्द्रता जलवायुवीय परिस्थितियाँ (क्रियाशीलता की दर को नियमित करते हैं) जैविक (सजीव) घटक उत्पादक (स्वपोषी — पादप) उपभोक्ता (शाकाहारी, मांसाहारी) अपघटक (कवक, जीवाणु) (जाति संघटन व स्तरविन्यास)
चित्र 12.1 — पारितंत्र के अजैविक एवं जैविक घटक (स्वनिर्मित)
स्तरविन्यास (Stratification): विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्रजातियों का ऊर्ध्वाधर वितरण — जैसे वन में वृक्ष (ऊपरी), झाड़ियाँ (मध्य), जड़ी-बूटियाँ (निचला स्तर)।
पारितंत्र की क्रियाएँसंक्षिप्त विवरण
उत्पादकतापादपों द्वारा सौर ऊर्जा से कार्बनिक जैवमात्रा का निर्माण
अपघटनअपरद के जटिल कार्बनिक पदार्थों का अकार्बनिक तत्त्वों में विघटन
ऊर्जा प्रवाहसूर्य से उत्पादकों, फिर उपभोक्ताओं तक एकदिशीय ऊर्जा स्थानांतरण
पोषण चक्रपारितंत्र के विभिन्न घटकों के माध्यम से पोषकों की गतिशीलता
NEET फोकस
  • "पारितंत्र" शब्द — ए. जी. टैंस्ली (1935)
  • भारत में "पारिस्थितिकी के जनक" — रामदेव मिश्रा
  • पारितंत्र की 4 क्रियाएँ — उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह, पोषण चक्र
  • ऊर्जा प्रवाह एकदिशीय — ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का पालन

2 उत्पादकता

जैवमात्रा उत्पादन की दर — GPP, NPP, द्वितीयक उत्पादकता

प्राथमिक उत्पादन — प्रकाश संश्लेषण के दौरान पादपों द्वारा प्रति इकाई क्षेत्र-समय में उत्पन्न की गई कार्बनिक सामग्री या जैवमात्रा। उत्पादकता इस जैवमात्रा के उत्पादन की दर है, जिसे g/m²/yr या kcal/m²/yr में व्यक्त किया जाता है।

सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP)

प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बनिक तत्त्व की कुल उत्पादन दर। इसमें से कुछ मात्रा पादपों के श्वसन में व्यय होती है।

नेट प्राथमिक उत्पादकता (NPP)

GPP में से श्वसन हानि (R) घटाने पर प्राप्त मान — यही उपभोक्ताओं एवं अपघटकों हेतु उपलब्ध जैवमात्रा है।

GPP − R = NPP
जहाँ R = श्वसन क्षति (Respiratory Losses)

द्वितीयक उत्पादकता — उपभोक्ताओं (शाकाहारी, मांसाहारी) द्वारा नए कार्बनिक तत्त्वों के निर्माण की दर।

जीवमंडल की प्राथमिक उत्पादकता
  • वार्षिक कुल — ~170 बिलियन टन (शुष्क भार)
  • भूमि — ~115 बिलियन टन
  • महासागर — ~55 बिलियन टन (70% क्षेत्र के बावजूद)
  • पादप PAR का केवल 2–10% ही ग्रहण करते हैं
  • सर्वाधिक NPP — उष्णकटिबंधीय वर्षावन
जीवमंडल की वार्षिक प्राथमिक उत्पादकता 115 बिलियन टन भूमि (शेष उत्पादकता) 55 बिलियन टन महासागर (70% क्षेत्र)
चित्र 12.2 — भूमि व महासागर की उत्पादकता (स्वनिर्मित)
प्राथमिक उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारक: पादप प्रजातियाँ, पर्यावरणीय कारक (ताप, वर्षा, प्रकाश), पोषकों की उपलब्धता, तथा पादपों की प्रकाश-संश्लेषण क्षमता।
NEET फोकस
  • GPP − R = NPP — यह समीकरण बार-बार पूछा जाता है
  • द्वितीयक उत्पादकता — उपभोक्ताओं द्वारा नए कार्बनिक तत्त्व निर्माण
  • उत्पादकता की इकाई — g/m²/yr या kcal/m²/yr
  • वैश्विक कार्बन का ~70% महासागरों में घुलित
  • उष्णकटिबंधीय वर्षावन — सर्वाधिक NPP

3 अपघटन

जटिल कार्बनिक पदार्थों का सरल अकार्बनिक तत्त्वों में विघटन

अपघटन — वह प्रक्रिया जिसमें अपघटक (कवक व जीवाणु) मृत कार्बनिक पदार्थ (अपरद) को सरल अकार्बनिक तत्त्वों — कार्बन डाईऑक्साइड, जल एवं पोषकों — में परिवर्तित करते हैं।

अपरद (डेट्राइटस): पादपों के मृत अवशेष (पत्तियाँ, छाल, फूल) तथा जंतुओं के मृत अवशेष, मल आदि।

अपघटन चक्र वृक्ष पत्ती गिरना कीट भक्षण अपघटक केंचुआ (खंडन) कार्बनिक मृदा
चित्र 12.3 — अपघटन चक्र: पत्ती → खंडन → अपघटन → मृदा (स्वनिर्मित)

अपघटन की चार अवस्थाएँ

अवस्थाप्रक्रियाविवरण
1. खंडनभौतिक विघटनअपरदाहारी (केंचुआ) अपरद को छोटे कणों में तोड़ते हैं
2. निक्षालनजल-विलयनजल-विलेय अकार्बनिक पोषक मृदासंस्तर में प्रविष्ट होते हैं
3. अपचयनजैव-रासायनिककवक/जीवाणु एंजाइम अपरद को सरल तत्त्वों में तोड़ते हैं
4. ह्यूमीफिकेशन & खनिजीकरणसंचयन एवं मुक्तिह्यूमस (कोलाइडल पोषक भंडार) बनता है; खनिजीकरण से अकार्बनिक पोषक मुक्त
ह्यूमस: गहरे रंग का, क्रिस्टल-रहित, कोलाइडल पदार्थ — पोषक भंडार के रूप में कार्य करता है; सूक्ष्मजैविक क्रिया के प्रति अत्यंत प्रतिरोधी, अतः धीमी गति से अपघटित होता है।
अपघटन को प्रभावित करने वाले कारक
  • रासायनिक संघटन: लिग्निन/काइटिन युक्त अपरद → धीमा अपघटन; नाइट्रोजन/शर्करा युक्त → तीव्र
  • जलवायु: गरम-आर्द्र → तीव्र; ठंडा/अवायुजीवी → धीमा
  • अपघटन एरोबिक (ऑक्सीजन-आवश्यक) प्रक्रिया है
NEET फोकस
  • अपघटन के 4 चरण — खंडन → निक्षालन → अपचयन → ह्यूमीफिकेशन-खनिजीकरण
  • लिग्निन/काइटिन युक्त अपरद → धीमा अपघटन
  • केंचुआ — खंडन (कैटाबॉलिज़्म नहीं)
  • अपघटन — एरोबिक प्रक्रिया

4 ऊर्जा प्रवाह

सूर्य से उत्पादकों, फिर उपभोक्ताओं तक एकदिशीय यात्रा

गहरे समुद्र के जलतापीय पारितंत्र को छोड़कर, सभी पारितंत्रों का एकमात्र ऊर्जा स्रोत सूर्य है। आपतित सौर विकिरण का 50% से कम भाग PAR (प्रकाश संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण) में प्रयुक्त होता है; पादप इसका केवल 2–10% ही ग्रहण करते हैं।

ऊर्जा प्रवाह — एकदिशीय: सूर्य → उत्पादक → प्राथमिक उपभोक्ता → द्वितीयक उपभोक्ता → तृतीयक उपभोक्ता। यह ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का पालन करता है — प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा का एक भाग ऊष्मा के रूप में क्षय होता है।
ऊर्जा प्रवाह — विभिन्न पोषण स्तरों में सूर्य उत्पादक (हरे पादप) ऊष्मा प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी) ऊष्मा द्वितीयक उपभोक्ता (मांसाहारी) ऊष्मा अपघटक
चित्र 12.4 — सूर्य से उपभोक्ताओं तक ऊर्जा का एकदिशीय प्रवाह (स्वनिर्मित)

खाद्य शृंखला एवं खाद्य जाल

चारण खाद्य शृंखला (GFC)

जीवित पादपों (उत्पादक) से शाकाहारियों तथा मांसाहारियों तक — जलीय पारितंत्रों में प्रमुख।

घास → बकरी → मनुष्य

अपरद खाद्य शृंखला (DFC)

मृत कार्बनिक पदार्थ (अपरद) से आरंभ — मुख्यतः कवक व बैक्टीरिया (अपघटक)। स्थलीय पारितंत्रों में प्रमुख।

अपरद → केंचुआ → पक्षी

दस प्रतिशत का नियम (लिंडमन का नियम)

प्रत्येक पोषण स्तर से अगले उच्च पोषण स्तर पर केवल ~10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है; शेष ~90% श्वसन, गति एवं ऊष्मा के रूप में क्षय हो जाती है।

20 J (पादप) → 2 J (चूहा) → 0.2 J (सर्प) → 0.02 J (मोर)

पोषण स्तर (Trophic Level): एक क्रियात्मक स्तर है — एक ही प्रजाति (जैसे गौरैया) बीज खाकर प्राथमिक तथा कीट खाकर द्वितीयक उपभोक्ता दोनों हो सकती है। खाद्य शृंखला सामान्यतः 3–4 पोषण स्तरों तक सीमित होती है।
NEET फोकस
  • एकमात्र ऊर्जा स्रोत — सूर्य (हाइड्रोथर्मल वेंट को छोड़कर)
  • ऊर्जा प्रवाह एकदिशीय — पारितंत्र ऊष्मागतिकी से मुक्त नहीं
  • GFC (जलीय प्रमुख) बनाम DFC (स्थलीय प्रमुख)
  • 10% नियम — लिंडमन का नियम
  • खाद्य शृंखला की लंबाई — सामान्यतः 3–4 स्तर

5 पारिस्थितिक पिरैमिड

संख्या, जैवमात्रा, ऊर्जा — तीन प्रकार

पिरैमिड का आधार चौड़ा (उत्पादक) तथा शिखर संकरा (उच्चतम उपभोक्ता) होता है। तीन प्रकार — संख्या, जैवमात्रा, ऊर्जा

संख्या का पिरैमिड

संख्या पिरैमिड — घास का मैदान (सीधा) TC — 3 SC — 35,400 PC — 7,08,000 PP — 58,42,000
चित्र 12.5 — घास के मैदान का संख्या पिरैमिड (स्वनिर्मित)

जैवमात्रा का पिरैमिड

दलदली — सीधा TC — 1.5 kg/m² SC — 11 kg/m² PC — 37 kg/m² P — 809 kg/m²
समुद्री — उल्टा PC (मछलियाँ) — 21 PP (पादपप्लवक) — 4
चित्र 12.6 — जैवमात्रा पिरैमिड: सीधा (बायाँ) व उल्टा (दायाँ, समुद्री) (स्वनिर्मित)
समुद्री पारितंत्र में जैवमात्रा पिरैमिड उल्टा क्यों? पादपप्लवकों का जनन-चक्र अत्यंत तीव्र होता है — किसी एक क्षण की "खड़ी फसल" (स्टैंडिंग क्रॉप) कम होने पर भी वे तेजी से पुनःउत्पादित होकर उच्च पोषण स्तर को पर्याप्त ऊर्जा आपूर्ति करते रहते हैं।

ऊर्जा का पिरैमिड — सदैव सीधा

ऊर्जा पिरैमिड — सदैव सीधा TC — 10 J SC — 100 J PC — 1,000 J P — 10,000 J (निवेश: 10,00,000 J सौर ऊर्जा)
चित्र 12.7 — ऊर्जा पिरैमिड — कभी उल्टा नहीं हो सकता (स्वनिर्मित)
ऊर्जा पिरैमिड कभी उल्टा नहीं हो सकता — क्योंकि प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊष्मा के रूप में ऊर्जा का ह्रास होता है, जो ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का पालन है।
पारिस्थितिक पिरैमिड की सीमाएँ
  • यह आहार जाल (फूड वेब) को नहीं दर्शाता — केवल सरल शृंखला
  • अपघटकों को पिरैमिड में कोई स्थान नहीं
  • यह मानकर चलता है कि एक जाति केवल एक ही पोषण स्तर पर है (वास्तव में गौरैया जैसी प्रजातियाँ एक से अधिक स्तरों पर हो सकती हैं)
NEET फोकस
  • तीन पिरैमिड — संख्या, जैवमात्रा, ऊर्जा
  • ऊर्जा पिरैमिड — सदैव सीधा (कभी उल्टा नहीं)
  • समुद्री जैवमात्रा पिरैमिड — उल्टा (मछली > पादपप्लवक)
  • वृक्ष-आधारित खाद्य शृंखला में संख्या पिरैमिड — उल्टा
  • पिरैमिड की सीमाएँ — आहार जाल, अपघटक, बहु-स्तरीय प्रजातियाँ

NEET फैक्ट‑शीट

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

अवधारणाप्रमुख तथ्य
"पारितंत्र" शब्दए. जी. टैंस्ली (1935)
भारत के पारिस्थितिकी जनकरामदेव मिश्रा
पारितंत्र की 4 क्रियाएँउत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह, पोषण चक्र
GPP − R= NPP (श्वसन क्षति सहित)
जीवमंडल वार्षिक उत्पादकता~170 बिलियन टन
सर्वाधिक NPPउष्णकटिबंधीय वर्षावन
अपघटन के 4 चरणखंडन → निक्षालन → अपचयन → ह्यूमीफिकेशन-खनिजीकरण
लिग्निन युक्त अपरदधीमा अपघटन
ऊर्जा प्रवाहएकदिशीय — ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम
10% नियमलिंडमन का नियम
ऊर्जा पिरैमिडसदैव सीधा
समुद्री जैवमात्रा पिरैमिडउल्टा
GFC (जलीय) vs DFC (स्थलीय)स्थलीय में DFC प्रमुख
खाद्य शृंखला लंबाईसामान्यतः 3–4 पोषण स्तर
वैश्विक कार्बन भंडारमहासागर (~70% घुलित)

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 "पारितंत्र (इकोसिस्टम)" शब्द किसके द्वारा प्रस्तुत किया गया?

उत्तर: ए. जी. टैंस्ली (1935)

इस शब्द को ए. जी. टैंस्ली ने 1935 में प्रस्तुत किया था। भारत में पारिस्थितिकी के जनक रामदेव मिश्रा हैं।

2 समीकरण GPP − R = NPP में R क्या दर्शाता है?

उत्तर: श्वसन हानि (Respiratory Losses)

GPP (सकल प्राथमिक उत्पादकता) में से पादपों द्वारा श्वसन में व्यय ऊर्जा (R) घटाने पर NPP (नेट प्राथमिक उत्पादकता) प्राप्त होती है।

3 यदि उत्पादक स्तर पर 20 J ऊर्जा हो, तो पादप → चूहा → सर्प → मोर शृंखला में मोर तक कितनी ऊर्जा पहुँचेगी?

उत्तर: 0.02 J

दस प्रतिशत नियम अनुसार: 20 J → 2 J → 0.2 J → 0.02 J। प्रत्येक स्तर पर केवल ~10% ऊर्जा स्थानांतरित होती है।

4 निम्न में से कौन-सा पारिस्थितिक पिरैमिड सामान्यतः उल्टा (इनवर्टेड) होता है?

उत्तर: समुद्री पारितंत्र में जैवमात्रा का पिरैमिड

समुद्री पारितंत्र में पादपप्लवकों (उत्पादक) की जैवमात्रा, मछलियों (उपभोक्ता) से कम होती है — इसलिए जैवमात्रा पिरैमिड उल्टा होता है। ऊर्जा पिरैमिड कभी उल्टा नहीं होता।

5 निम्न में से कौन-सा पारिस्थितिक पिरैमिड की सीमा नहीं है?

उत्तर: यह पोषण स्तरों के बीच ऊर्जा-हानि को दर्शाता है

यह पिरैमिड की सीमा नहीं, बल्कि इसकी मूल उपयोगिता है। सीमाएँ हैं — आहार जाल को न दिखाना, अपघटकों को शामिल न करना, तथा एक जाति को एक ही स्तर पर मान लेना।

6 कथन I: अपघटन वह प्रक्रिया है जिसमें सूक्ष्मजीवों द्वारा अपरद को सरल पदार्थों में विघटित किया जाता है। कथन II: यदि अपरद लिग्निन व काइटिन से भरपूर हो, तो अपघटन तीव्र होता है।

उत्तर: कथन I सही, कथन II गलत

लिग्निन व काइटिन से भरपूर अपरद का अपघटन धीमी गति से होता है, तीव्र नहीं — यही कारण है कि गिरे हुए वृक्ष-लट्ठे दीर्घकाल तक अपघटित नहीं होते।

7 पादप अपघटक (प्लांट डीकंपोज़र) मुख्यतः कौन हैं?

उत्तर: कवक व जीवाणु

ये दोनों मृतपोषी (सैप्रोट्रॉफिक) जीव मृत कार्बनिक पदार्थ का अपघटन करने वाले प्रमुख जीव हैं।

8 द्वितीयक उत्पादकता किसके द्वारा नए कार्बनिक तत्त्वों के निर्माण की दर है?

उत्तर: उपभोक्ता

द्वितीयक उत्पादकता — उपभोक्ताओं (शाकाहारी, मांसाहारी) द्वारा नए कार्बनिक तत्त्वों के निर्माण की दर।

9 केंचुए द्वारा अपरद को छोटे कणों में तोड़ने की प्रक्रिया को क्या कहा जाता है?

उत्तर: खंडन (Fragmentation)

केंचुए अपरद को भौतिक रूप से छोटे कणों में तोड़ते हैं — इसे खंडन कहते हैं (कैटाबॉलिज़्म नहीं, क्योंकि यह जैव-रासायनिक अपचयन नहीं है)।

10 पृथ्वी पर आपतित कुल सौर विकिरण में PAR का अनुपात लगभग कितना होता है?

उत्तर: लगभग 50%

आपतित सौर विकिरण का 50% से कम भाग PAR (प्रकाश संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण) में प्रयुक्त होता है; पादप इसका भी केवल 2–10% ही ग्रहण करते हैं।

अतिरिक्त NEET तथ्य

सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं

महत्वपूर्ण
  • इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 2–3 प्रश्न (~8–12 अंक) पूछे जाते हैं — 87+ PYQs उपलब्ध हैं।
  • सबसे अधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — GPP/NPP समीकरण, 10% नियम गणना, पारिस्थितिक पिरैमिड की आकृतियाँ, अपघटन के चरण
तुलनात्मक
  • अपघटक vs अपरदाहारी: अपघटक (कवक/जीवाणु) → बाह्यकोशिकीय पाचन; अपरदाहारी (केंचुआ) → भौतिक खंडन।
  • गैसीय vs अवसादी चक्र: गैसीय — भंडार वायुमंडल/जलमंडल (N, C); अवसादी — भंडार भूपर्पटी (P, S)।
तथ्य
  • स्थायी अवस्था (Standing Crop): किसी समय पर उपस्थित जैवमात्रा की कुल मात्रा — यह उत्पादकता (दर) से भिन्न है।
  • पीट (Peat): जलाक्रांत/दलदली क्षेत्रों में अवायुजीवी परिस्थितियों के कारण अपरद वर्षों तक अनअपघटित पड़ा रहता है — पीट बनता है।
ट्रैप
  • ऊर्जा पिरैमिड — कभी उल्टा नहीं — यह एक सार्वभौमिक सत्य है; "ऊर्जा पिरैमिड उल्टा हो सकता है" कथन हमेशा गलत है।
  • NPP केवल शाकाहारियों के लिए उपलब्ध — वास्तव में NPP शाकाहारियों व अपघटकों दोनों के लिए उपलब्ध होती है।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — GPP/NPP समीकरण, 10% नियम गणना, पिरैमिड आकृतियाँ (कौन-सा सीधा/उल्टा), अपघटन के 4 चरण — इन चारों पर विशेष ध्यान दें, इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।

संक्षिप्त सार

पारितंत्र संरचना

जैविक (उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक) + अजैविक (जल, वायु, मृदा, पोषक, सौर ऊर्जा) घटक।

उत्पादकता

GPP − R = NPP; द्वितीयक उत्पादकता = उपभोक्ताओं द्वारा नए कार्बनिक तत्त्व निर्माण।

अपघटन

खंडन → निक्षालन → अपचयन → ह्यूमीफिकेशन-खनिजीकरण; ह्यूमस = पोषक भंडार।

ऊर्जा प्रवाह

एकदिशीय (सूर्य → उत्पादक → उपभोक्ता); 10% नियम (लिंडमन); GFC vs DFC।

पारिस्थितिक पिरैमिड

संख्या, जैवमात्रा, ऊर्जा; ऊर्जा सदैव सीधा; जैवमात्रा समुद्री में उल्टा।

NEET फोकस

GPP/NPP, 10% नियम गणना, पिरैमिड आकृतियाँ, अपघटन चरण — सर्वाधिक पूछे जाने वाले टॉपिक।

? अभ्यास प्रश्न-उत्तर

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें एवं उत्तर देखें

प्रश्न 1 रिक्त स्थान भरें — (क) पादपों को ______ कहते हैं; (ख) पादप द्वारा प्रमुख पारितंत्र का पिरैमिड ______ प्रकार का है; (ग) एक जलीय पारितंत्र में उत्पादकता का सीमा कारक ______ है; (घ) हमारे पारितंत्र में सामान्य अपरद ______ हैं; (च) पृथ्वी पर कार्बन का प्रमुख भंडार ______ है।
उत्तर
  • (क) उत्पादक — प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बनिक पदार्थ निर्माण
  • (ख) सीधा (upright) — उत्पादकों की संख्या सर्वाधिक
  • (ग) प्रकाश व पोषक तत्त्व — गहरे जल में प्रकाश सीमित
  • (घ) पत्तियाँ, छाल, फूल, जंतु-अवशेष, मल
  • (च) महासागर — घुलित बाइकार्बोनेट/कार्बोनेट रूप में
प्रश्न 2 एक खाद्य शृंखला में सर्वाधिक संख्या किसकी होती है?
उत्तर

उत्पादक — क्योंकि खाद्य शृंखला के आधार पर स्थित होने के कारण इनकी संख्या सर्वाधिक होती है, तथा उच्च पोषण स्तरों पर ऊर्जा-हानि के कारण संख्या क्रमशः घटती जाती है।

प्रश्न 3 एक झील में द्वितीय पोषण स्तर होता है?
उत्तर

प्राणिप्लवक (Zooplankton) — झील में पादपप्लवक (प्रथम पोषण स्तर/उत्पादक) के बाद प्राणिप्लवक (प्राथमिक उपभोक्ता) द्वितीय पोषण स्तर पर आते हैं।

प्रश्न 4 द्वितीयक उत्पादक हैं?
उत्तर

उपरोक्त कोई भी नहीं — "द्वितीयक उत्पादक" नाम की कोई पारिस्थितिक श्रेणी नहीं होती; शाकाहारी व मांसाहारी दोनों "उपभोक्ता" कहलाते हैं, "उत्पादक" नहीं।

प्रश्न 5 आपतित सौर विकिरण में PAR का क्या प्रतिशत होता है?
उत्तर

50% — आपतित सौर विकिरण का लगभग 50% (इससे कम) भाग PAR के रूप में उपलब्ध होता है। पादप इस PAR का भी केवल 2–10% ही वास्तव में ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 6 चारण व अपरद खाद्य शृंखला में अंतर बताइए।
उत्तर

चारण खाद्य शृंखला (GFC): जीवित पादपों (उत्पादक) से आरंभ होकर शाकाहारियों व मांसाहारियों तक — जलीय पारितंत्रों में प्रमुख।

अपरद खाद्य शृंखला (DFC): मृत कार्बनिक पदार्थ (अपरद) से आरंभ — मुख्यतः कवक व बैक्टीरिया (अपघटक) — स्थलीय पारितंत्रों में प्रमुख।

प्रश्न 7 प्राथमिक व द्वितीयक उत्पादकता में अंतर बताइए।
उत्तर

प्राथमिक उत्पादकता: पादपों (उत्पादकों) द्वारा प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से कार्बनिक पदार्थ बनाने की दर (GPP/NPP)।

द्वितीयक उत्पादकता: उपभोक्ताओं (शाकाहारी/मांसाहारी) द्वारा प्राथमिक उत्पादकता से प्राप्त कार्बनिक पदार्थ के सम्मिलन से नए कार्बनिक तत्त्वों के निर्माण की दर।

प्रश्न 8 पारिस्थितिक पिरैमिड को परिभाषित करें तथा जैवमात्रा व संख्या के पिरैमिडों की उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर

पारिस्थितिक पिरैमिड: विभिन्न पोषण स्तरों पर जीवों की संख्या, जैवमात्रा या ऊर्जा का ग्राफीय निरूपण।

संख्या का पिरैमिड: प्रत्येक स्तर पर जीवों की संख्या — उदा. घास के मैदान में ~58,42,000 PP → 7,08,000 PC → 35,400 SC → 3 TC (सीधा)।

जैवमात्रा का पिरैमिड: प्रत्येक स्तर पर कुल जैवमात्रा — दलदली पारितंत्र में 809 → 37 → 11 → 1.5 kg/m² (सीधा); समुद्री में उल्टा (मछली > पादपप्लवक)।

प्रश्न 9 प्राथमिक उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा करें।
उत्तर
  • पादप प्रजातियाँ: किसी क्षेत्र में उपस्थित पादप प्रकार व संख्या
  • पर्यावरणीय कारक: तापमान, वर्षा, प्रकाश की तीव्रता व अवधि
  • पोषकों की उपलब्धता: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि की मात्रा (जलीय पारितंत्रों में सीमाकारी)
  • प्रकाश संश्लेषण क्षमता: पादप PAR का कितना प्रभावी उपयोग करते हैं (2–10%)
प्रश्न 10 अपघटन की परिभाषा दें तथा इसकी प्रक्रिया एवं उत्पादों की व्याख्या करें।
उत्तर

अपघटन: अपघटकों (कवक/जीवाणु) द्वारा जटिल कार्बनिक अपरद को सरल अकार्बनिक तत्त्वों (CO₂, जल, पोषक) में विघटित करना।

चार अवस्थाएँ: खंडन → निक्षालन → अपचयन → ह्यूमीफिकेशन-खनिजीकरण।

उत्पाद: CO₂, जल, नाइट्रेट, फॉस्फेट आदि अकार्बनिक पोषक — जो पुनः उत्पादकों हेतु उपलब्ध होते हैं।

यह अध्ययन सामग्री पारितंत्र — संरचना, उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह, पारिस्थितिक पिरैमिड — को सरल, मौलिक एवं परीक्षा-अनुकूल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिसमें NEET-स्तरीय तथ्य, तुलनात्मक तालिकाएँ एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर सम्मिलित हैं।

प्रकृति का यह अद्भुत तंत्र — ऊर्जा का प्रवाह, पदार्थ का चक्रण, जीवन की सततता।

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