विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति — सम्पूर्ण अध्याय
कक्षा-12 • भौतिकी • अध्याय 11

विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति

कैथोड किरणों से लेकर आइंस्टाइन के प्रकाश-विद्युत समीकरण और दे ब्रॉग्ली की द्रव्य-तरंगों तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आरेख और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।

E = hν फ़ोटॉन ऊर्जा
λ = h/p दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य
h = 6.63 × 10⁻³⁴ J·s
★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 भूमिका

कैथोड किरणों की खोज एवं इलेक्ट्रॉन

सन् 1887 में हर्ट्ज़ के वैद्युतचुंबकीय तरंगों के प्रयोगों ने प्रकाश की तरंगीय प्रकृति को अभूतपूर्व रूप से स्थापित किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में विसर्जन-नलिका (discharge tube) में गैसों में कम दाब पर विद्युत-चालन (विद्युत-विसर्जन) पर हुए प्रायोगिक अन्वेषणों से कई ऐतिहासिक खोजें हुईं।

लगभग 0.001 mm पारे के स्तंभ जैसे अत्यंत कम दाब पर, विसर्जन-नलिका में जब दो इलेक्ट्रोडों के बीच विद्युत क्षेत्र स्थापित किया जाता है, तो विसर्जन होता है और कैथोड के सम्मुख काँच पर प्रतिदीप्ति (fluorescence) उत्पन्न होती है। इस प्रतिदीप्ति का कारण उस विकिरण को माना गया जो कैथोड से आ रहा था — इन्हें कैथोड किरणें कहा गया।

कैथोड (−) एनोड (+) कैथोड किरणें (ऋण-आवेशी कण) निर्वात नलिका (कम दाब गैस)
चित्र 11.1 — विसर्जन नलिका में कैथोड किरणों की दिशा (कैथोड से एनोड की ओर)।

1870 में विलियम क्रुक्स ने कैथोड किरणों की खोज की; 1879 में उन्होंने सुझाया कि ये किरणें तीव्रता से चलने वाले ऋण-आवेशी कणों की धारा से बनी हैं। ब्रिटिश भौतिकशास्त्री जे.जे. टॉमसन (1856–1940) ने 1897 में इस परिकल्पना की पुष्टि की। उन्होंने विसर्जन-नलिका के आर-पार परस्पर लंबवत विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र स्थापित कर कैथोड-किरण कणों का वेग तथा आपेक्षिक आवेश (e/m) ज्ञात किया।

यह पाया गया कि ये कण प्रकाश के वेग (3×10⁸ m/s) के लगभग 0.1 से 0.2 गुने वेग से चलते हैं। e/m का स्वीकृत मान 1.76 × 10¹¹ C/kg है, जो कैथोड के पदार्थ या नलिका में भरी गैस की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता — इससे कैथोड-किरण कणों की सार्विकता सुझाई गई।

लगभग उसी समय (1887) यह भी पाया गया कि जब कुछ धातुओं को पराबैंगनी प्रकाश से किरणित करते हैं तो कम वेग वाले ऋण-आवेशित कण उत्सर्जित होते हैं; तथा जब धातुओं को उच्च ताप तक गरम किया जाता है तो भी ये ही कण उत्सर्जित होते हैं। इन सभी कणों का e/m समान पाया गया — अतः यह स्थापित हो गया कि, भिन्न दशाओं में उत्पन्न होने पर भी, ये सभी कण प्रकृति में समान हैं। जे.जे. टॉमसन ने 1897 में इन्हें इलेक्ट्रॉन नाम दिया और सुझाया कि ये द्रव्य के मौलिक सार्वत्रिक अवयव हैं — इस खोज के लिए उन्हें 1906 में नोबेल पुरस्कार मिला।

1913 में अमेरिकी भौतिकविज्ञानी आर.ए. मिलिकन (1868–1953) ने तेल-बूँद प्रयोग से इलेक्ट्रॉन के आवेश का परिशुद्ध मापन किया। उन्होंने पाया कि तेल-बिंदुक पर आवेश सदैव एक मूल आवेश, 1.602 × 10⁻¹⁹ C का पूर्ण गुणांक होता है — इससे यह स्थापित हुआ कि वैद्युत आवेश क्वांटीकृत है। आवेश (e) व आपेक्षिक आवेश (e/m) के मान से इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (m) ज्ञात किया जा सका।

त्वरित तथ्य
  • 1895 में रूंटगन ने X-किरणों की खोज की; 1897 में जे.जे. टॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज की।
  • कैथोड किरणों की खोज विलियम क्रुक्स ने 1870 में की।
  • जे.जे. टॉमसन ने 1897 में e/m ज्ञात किया और इन कणों को "इलेक्ट्रॉन" नाम दिया।
  • e/m का स्वीकृत मान = 1.76 × 10¹¹ C/kg — यह कैथोड के पदार्थ या गैस की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता।
  • जे.जे. टॉमसन को 1906 में इलेक्ट्रॉन की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
  • मिलिकन ने 1913 में तेल-बूँद प्रयोग से इलेक्ट्रॉन आवेश e = 1.602 × 10⁻¹⁹ C मापा।
  • मिलिकन के प्रयोग ने सिद्ध किया कि वैद्युत आवेश क्वांटीकृत (quantized) है।
  • 1 इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) = 1.602 × 10⁻¹⁹ J।

2 इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन

कार्य-फलन एवं उत्सर्जन की तीन विधियाँ

धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन (ऋण आवेशी कण) होते हैं जो उनकी चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। तथापि, ये मुक्त इलेक्ट्रॉन सामान्यतः धातु-पृष्ठ से बाहर नहीं निकल सकते। यदि इलेक्ट्रॉन धातु से बाहर आते हैं तो उसका पृष्ठ धन आवेश प्राप्त कर लेता है और इलेक्ट्रॉनों को वापस धातु पर आकर्षित कर लेता है। अतः मुक्त इलेक्ट्रॉन धातु के भीतर आयनों के आकर्षण बलों द्वारा रोककर रखे गए होते हैं।

परिणामस्वरूप, सिर्फ़ वे इलेक्ट्रॉन जिनकी ऊर्जा इस आकर्षण को अभिभूत कर सके, धातु पृष्ठ से बाहर आ पाते हैं। इस न्यूनतम ऊर्जा को धातु का कार्य-फलन (work function) कहते हैं, जिसे φ₀ द्वारा व्यक्त करते हैं और इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) में मापते हैं।

कार्य-फलन (φ₀): धातु-पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा। यह धातु के गुणों और उसके पृष्ठ की प्रकृति पर निर्भर करता है।

इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन की तीन भौतिक विधियाँ

विधिविवरणउदाहरण
तापायनिक उत्सर्जनउपयुक्त तापन द्वारा मुक्त इलेक्ट्रॉनों को पर्याप्त तापीय ऊर्जा देकर धातु से बाहर निकालनानिर्वात नलिका का गरम फिलामेंट
क्षेत्र उत्सर्जनधातु पर प्रबल विद्युत क्षेत्र (~10⁸ V/m की कोटि) लगाकर इलेक्ट्रॉनों को बाहर लानास्पार्क प्लग
प्रकाश-विद्युत उत्सर्जनउपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश धातु-पृष्ठ पर डालने पर इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जनप्रकाशिक इलेक्ट्रॉन (photo-electron)
NEET फोकस
  • कार्य-फलन φ₀, इलेक्ट्रॉन को धातु-पृष्ठ से बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा है।
  • कार्य-फलन धातु के गुणों तथा पृष्ठ की प्रकृति पर निर्भर करता है।
  • इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन की 3 विधियाँ हैं: तापायनिक उत्सर्जन, क्षेत्र उत्सर्जन, प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन।
  • क्षेत्र उत्सर्जन में प्रबल विद्युत क्षेत्र (~10⁸ V/m) प्रयुक्त होता है।
  • प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन से उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन कहते हैं।

3 प्रकाश-विद्युत प्रभाव

हर्ट्ज़, हालवॉक्स तथा लीनार्ड के प्रेक्षण

हर्ट्ज़ के परीक्षण

प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन की परिघटना की खोज हेनरिच हर्ट्ज़ (1857–1894) ने 1887 में वैद्युतचुंबकीय तरंगों के प्रयोगों के समय की थी। स्फुलिंग-विसर्जन द्वारा वैद्युतचुंबकीय तरंगों की उत्पत्ति के अपने प्रायोगिक अन्वेषण में हर्ट्ज़ ने प्रेक्षित किया कि कैथोड को किसी आर्क लैंप से पराबैंगनी प्रकाश द्वारा प्रदीप्त करने पर धातु-इलेक्ट्रोडों के पार उच्च वोल्टता स्फुलिंग अधिक हो जाता है।

धातु-पृष्ठ पर चमकने वाला प्रकाश मुक्त आवेशित कणों (इलेक्ट्रॉनों) को स्वतंत्र करने में सहायता प्रदान करता है। जब धातु-पृष्ठ पर प्रकाश पड़ता है तो पृष्ठ के समीप इलेक्ट्रॉन आपतित विकिरण से पदार्थ के पृष्ठ में धनात्मक आयनों के आकर्षण को पार करने के लिए ऊर्जा अवशोषित कर लेते हैं और बाहर परिवेश में आ जाते हैं।

हालवॉक्स तथा लीनार्ड के प्रेक्षण

विलहेल्म हालवॉक्स तथा फिलिप लीनार्ड ने 1886–1902 के बीच प्रकाशविद्युत उत्सर्जन की परिघटना का अन्वेषण किया। लीनार्ड (1862–1947) ने पाया कि जब पराबैंगनी विकिरणों को उत्सर्जक पट्टिका पर आपतित करते हैं तो परिपथ में धारा प्रवाह होता है; जैसे ही पराबैंगनी विकिरण को रोका गया, धारा प्रवाह भी रुक गया।

1897 में इलेक्ट्रॉन की खोज के पश्चात यह निश्चित हो गया कि उत्सर्जक पट्टिका से इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन का कारक आपतित प्रकाश है। हालवॉक्स तथा लीनार्ड ने यह भी प्रेक्षित किया कि जब उत्सर्जक पट्टिका पर एक नियत न्यूनतम मान से कम आवृत्ति का पराबैंगनी प्रकाश पड़ता है तो कोई भी इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होता। इस नियत न्यूनतम आवृत्ति को देहली आवृत्ति (threshold frequency) कहते हैं तथा इसका मान उत्सर्जक पट्टिका के पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।

यह पाया गया कि ज़िंक, कैडमियम, मैग्नीशियम जैसी धातुओं में यह प्रभाव केवल कम तरंगदैर्घ्य की पराबैंगनी तरंगों के लिए होता है। तथापि लीथियम, सोडियम, पोटेशियम, सीज़ियम तथा रूबीडियम जैसी क्षार धातुएँ दृश्य प्रकाश द्वारा भी यह प्रभाव दर्शाती हैं। ऐसे प्रकाश-संवेदी पदार्थों को प्रकाश से प्रदीप्त करने पर ये इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करते हैं — इस परिघटना को प्रकाश-विद्युत प्रभाव (photoelectric effect) कहते हैं।

NEET फोकस
  • हेनरिच हर्ट्ज़ ने 1887 में प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन की परिघटना खोजी।
  • हालवॉक्स व लीनार्ड ने 1886–1902 के बीच प्रकाशविद्युत उत्सर्जन का विस्तृत अन्वेषण किया।
  • देहली आवृत्ति (ν₀) — वह न्यूनतम आवृत्ति जिससे कम आवृत्ति पर कोई प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन संभव नहीं।
  • देहली आवृत्ति का मान उत्सर्जक पट्टिका के पदार्थ पर निर्भर करता है।
  • ज़िंक, कैडमियम, मैग्नीशियम केवल पराबैंगनी प्रकाश से प्रभाव दिखाते हैं; क्षार धातुएँ (Li, Na, K, Cs, Rb) दृश्य प्रकाश से भी।

4 प्रकाश-विद्युत प्रभाव का प्रायोगिक अध्ययन

प्रायोगिक व्यवस्था एवं परिणाम

प्रायोगिक व्यवस्था में एक निर्वातित काँच/क्वार्ट्ज़ की नली होती है, जिसमें एक प्रकाश-संवेदी पट्टिका C (उत्सर्जक) और दूसरी धातु पट्टिका A (संग्राहक) होती है। स्रोत S से प्रकाश, गवाक्ष (window) W से पार होकर पतली प्रकाश-संवेदी पट्टिका C पर पड़ता है। पट्टिका C से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं जो पट्टिका A पर बैटरी द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र द्वारा एकत्र कर लिए जाते हैं।

C तथा A पट्टिकाओं के बीच विभवांतर को बैटरी द्वारा बनाए रखा जाता है तथा इसे ध्रुव दिशा दिक्परिवर्तक (Commutator) द्वारा बदला जा सकता है — अर्थात संग्राहक पट्टिका A को उत्सर्जक पट्टिका C की तुलना में इच्छानुसार धन अथवा ऋण विभव पर रखा जा सकता है।

C (उत्सर्जक) A (संग्राहक) स्रोत S इलेक्ट्रॉन µA प्रकाश-विद्युत प्रभाव: प्रायोगिक व्यवस्था
चित्र 11.2 — निर्वातित नली में उत्सर्जक C और संग्राहक A; परिपथ में सूक्ष्मधारामापी (µA) से प्रकाशिक धारा मापी जाती है।

इस व्यवस्था का उपयोग प्रकाशिक धारा के (a) विकिरण की तीव्रता, (b) आपतित विकिरण की आवृत्ति, (c) पट्टिकाओं A तथा C के बीच के विभवांतर, तथा (d) पट्टिका C के पदार्थ की प्रकृति के साथ परिवर्तन के अध्ययन के लिए किया जाता है।

4.1 प्रकाश-विद्युत धारा पर प्रकाश की तीव्रता का प्रभाव

संग्राहक A को उत्सर्जक C की तुलना में एक धन विभव पर रखा जाता है जिससे C से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन A की ओर आकर्षित होते हैं। आपतित विकिरण की आवृत्ति तथा विभव को स्थिर रखते हुए प्रकाश की तीव्रता को परिवर्तित किया जाता है — प्रकाशिक धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के साथ रैखिकत: बढ़ती है।

प्रकाश की तीव्रता → प्रकाश-विद्युत धारा →
चित्र 11.3 — प्रकाशिक धारा, आपतित तीव्रता के अनुक्रमानुपाती (रेखीय ग्राफ)।

4.2 प्रकाश-विद्युत धारा पर विभव का प्रभाव

पट्टिका A के धन विभव को बढ़ाने पर प्रकाश-विद्युत धारा बढ़ती है, जब तक सभी उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन A पर संग्रहीत नहीं हो जाते — इसे संतृप्त धारा (saturation current) कहते हैं। इसके पश्चात धारा नहीं बढ़ती, भले ही विभव और बढ़ाया जाए।

अब पट्टिका A पर एक ऋण (मंदक) विभव लगाकर उसे धीरे-धीरे अधिक ऋणात्मक करते हैं। धारा तेज़ी से घटती है और पट्टिका A पर ऋण विभव के किसी निश्चित तीक्ष्ण एवं स्पष्ट क्रांतिक मान पर शून्य हो जाती है। इसे निरोधी विभव या अंतक विभव (Stopping / Cut-off Potential) V₀ कहते हैं।

उच्चतम गतिज ऊर्जा तथा निरोधी विभवKउच्च = e V₀
व्याख्या: धातु से उत्सर्जित सभी प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन समान ऊर्जा वाले नहीं होते। प्रकाश-विद्युत धारा तब शून्य होती है जब निरोधी विभव अधिकतम ऊर्जा वाले प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों को भी प्रतिकर्षित करने की अवस्था में हो।

प्रमुख प्रेक्षण: एक निश्चित आवृत्ति के लिए भिन्न-भिन्न तीव्रताओं (I₃ > I₂ > I₁) पर संतृप्त धारा के मान बढ़ते हैं, परंतु निरोधी विभव V₀ उतना ही रहता है — अर्थात आपतित विकिरण की एक निश्चित आवृत्ति के लिए निरोधी विभव इसकी तीव्रता से स्वतंत्र होता है।

4.3 निरोधी विभव पर आपतित विकिरण की आवृत्ति का प्रभाव

विभिन्न आवृत्तियों (ν₃ > ν₂ > ν₁) पर एक ही तीव्रता के प्रकाश के लिए संग्राही पट्टिका विभव के साथ प्रकाश-विद्युत धारा का अध्ययन करने पर, निरोधी विभवों का क्रम V₀₃ > V₀₂ > V₀₁ प्राप्त होता है, जबकि संतृप्त धारा का मान एक ही रहता है।

यदि भिन्न धातुओं के लिए आपतित विकिरण की आवृत्ति और संबंधित निरोधी विभव के बीच ग्राफ़ खींचें, तो एक सीधी रेखा प्राप्त होती है।

ν₀ ν₀' आपतित विकिरण की आवृत्ति (ν) → निरोधी विभव (V₀) → धातु A धातु B
चित्र 11.4 — दो भिन्न धातुओं के लिए ν के साथ V₀ का रैखिक परिवर्तन; ढाल (h/e) दोनों के लिए समान, केवल ν₀ भिन्न।
ग्राफ़ यह दर्शाता है कि:
(i) निरोधी विभव V₀, आपतित विकिरण की आवृत्ति के साथ रैखिकत: परिवर्तित होता है।
(ii) एक निश्चित न्यूनतम अंतक (देहली) आवृत्ति ν₀ होती है, जिससे कम पर निरोधी विभव शून्य / कोई उत्सर्जन नहीं होता — चाहे तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो।
NEET फोकस — प्रायोगिक लक्षण
  • दी गई आवृत्ति (देहली से अधिक) के लिए, प्रकाश-विद्युत धारा तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।
  • संतृप्त धारा तीव्रता के अनुक्रमानुपाती है; निरोधी विभव तीव्रता पर निर्भर नहीं करता।
  • देहली आवृत्ति के नीचे कोई प्रकाशिक उत्सर्जन नहीं होता, चाहे प्रकाश कितना भी तीव्र हो।
  • निरोधी विभव आवृत्ति के साथ रैखिकत: बढ़ता है, परंतु तीव्रता से स्वतंत्र होता है।
  • प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन तात्क्षणिक (~10⁻⁹ s या कम) होता है।
  • क्षार धातुएँ (Li, Na, K, Cs) अधिक प्रकाश-संवेदी होती हैं।

5 प्रकाश-विद्युत प्रभाव तथा प्रकाश का तरंग सिद्धांत

क्लासिकी भौतिकी की सीमा

प्रकाश की तरंग प्रकृति उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक अच्छी तरह स्थापित हो गई थी — व्यतिकरण, विवर्तन तथा ध्रुवण की परिघटनाओं की स्वाभाविक व्याख्या इस चित्र से हो चुकी थी। इस चित्र के अनुसार, प्रकाश एक वैद्युतचुंबकीय तरंग है, जो विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र से मिलकर बनी होती है तथा जिस आकाशीय क्षेत्र में फैली होती है, वहाँ ऊर्जा का संतत वितरण होता है।

तरंग-चित्रण के अनुसार धातु के पृष्ठ पर स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन विकिरित ऊर्जा को संतत रूप से अवशोषित करते हैं। जितनी अधिक प्रकाश की तीव्रता होगी उतने ही अधिक वैद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों के आयाम होंगे — फलस्वरूप, तीव्रता जितनी अधिक होगी उतना ही अधिक प्रत्येक इलेक्ट्रॉन द्वारा ऊर्जा-अवशोषण होना चाहिए। इस चित्रण के अनुसार, प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन की उच्चतम गतिज ऊर्जा तीव्रता में वृद्धि के साथ बढ़नी चाहिए, तथा प्रकाश की आवृत्ति चाहे जो भी हो, पर्याप्त समय में इलेक्ट्रॉनों को धातु से बाहर निकलने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिल ही जानी चाहिए — इसलिए किसी देहली आवृत्ति का अस्तित्व नहीं होना चाहिए।

तरंग सिद्धांत की चार असफलताएँ: (i) Kउच्च की तीव्रता से स्वतंत्रता, (ii) देहली आवृत्ति ν₀ का अस्तित्व, (iii) उत्सर्जन की तात्क्षणिक प्रकृति, (iv) तरंग-चित्रण में संतत ऊर्जा-अवशोषण के कारण अपेक्षित काल-विलंब (जो प्रेक्षित नहीं होता)। इस प्रकार तरंग-चित्रण के द्वारा प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के अत्यंत मूल लक्षणों की व्याख्या नहीं हो सकी।
NEET फोकस
  • प्रकाश की तरंग प्रकृति व्यतिकरण, विवर्तन तथा ध्रुवण से सिद्ध होती है।
  • तरंग सिद्धांत Kउच्च की तीव्रता-स्वतंत्रता को समझा नहीं सका।
  • तरंग सिद्धांत देहली आवृत्ति (ν₀) के अस्तित्व की व्याख्या नहीं कर सका।
  • तरंग सिद्धांत के अनुसार उत्सर्जन में देरी होनी चाहिए (कई घंटे तक), परंतु प्रयोग में यह तात्क्षणिक है।

6 आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्युत समीकरण: विकिरण का ऊर्जा क्वांटम

क्वांटम चित्रण एवं समीकरण

सन् 1905 में अल्बर्ट आइंस्टाइन (1879–1955) ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या के लिए वैद्युतचुंबकीय विकिरण का एक मौलिक रूप से नया चित्रण प्रस्तावित किया। इस चित्रण में, प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन विकिरण से संतत ऊर्जा-अवशोषण द्वारा नहीं होता। विकिरण ऊर्जा विविक्त इकाइयों से बनी होती है — जो विकिरण ऊर्जा के क्वांटा कहलाते हैं।

विकिरण ऊर्जा के प्रत्येक क्वांटम की ऊर्जा hν होती है, जहाँ h प्लांक स्थिरांक है और ν प्रकाश की आवृत्ति। प्रकाश-विद्युत प्रभाव में, एक इलेक्ट्रॉन विकिरण के एक क्वांटम की ऊर्जा (hν) अवशोषित करता है। यदि यह अवशोषित ऊर्जा इलेक्ट्रॉन के लिए धातु की सतह से बाहर निकल आने के लिए न्यूनतम आवश्यक ऊर्जा (कार्य-फलन, φ₀) से अधिक होती है, तब उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा होगी:

आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्युत समीकरणKउच्च = hν − φ₀

अधिक दृढ़ता से आबद्ध इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जित होने पर उनकी गतिज ऊर्जा अपने अधिकतम मान से कम होती है। किसी आवृत्ति के प्रकाश की तीव्रता प्रति सेकंड आपतित फ़ोटॉनों की संख्या द्वारा निर्धारित होती है; तीव्रता बढ़ाने पर प्रति सेकंड उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती है, परंतु उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा प्रत्येक फ़ोटॉन की ऊर्जा द्वारा ही निर्धारित होती है — तीव्रता से नहीं।

आइंस्टाइन समीकरण से सभी प्रेक्षणों की व्याख्या

  • तीव्रता-स्वतंत्रता: Kउच्च = hν − φ₀ के अनुसार, यह आवृत्ति ν पर रैखिकत: निर्भर करता है और तीव्रता पर नहीं।
  • देहली आवृत्ति का अस्तित्व: चूँकि Kउच्च ऋण राशि नहीं हो सकती, उत्सर्जन तभी संभव है जब hν > φ₀, अर्थात ν > ν₀, जहाँ:
देहली आवृत्तिν₀ = φ₀ / h
  • धारा की तीव्रता-आनुपातिकता: तीव्रता जितनी अधिक होगी, उतने ही अधिक इलेक्ट्रॉन ऊर्जा क्वांटा अवशोषित करेंगे — इसलिए प्रकाश-विद्युत धारा तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।
  • तात्क्षणिक प्रक्रिया: एक इलेक्ट्रॉन द्वारा एक फ़ोटॉन का अवशोषण तात्क्षणिक है — अतः उत्सर्जन भी तात्क्षणिक होगा।

समीकरण eV₀ = Kउच्च का उपयोग कर, प्रकाश-विद्युत समीकरण को इस प्रकार लिखा जा सकता है:

निरोधी विभव समीकरणe V₀ = hν − φ₀ ⟹ V₀ = (h/e) ν − φ₀/e

यह एक महत्वपूर्ण परिणाम है — इससे यह प्राग्युक्ति होती है कि V₀ के विरुद्ध ν का वक्र एक सरल रेखा है, जिसका ढलान (h/e) है, जो पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता। 1906–1916 के मध्य, मिलिकन ने आइंस्टाइन के प्रकाश-विद्युत समीकरण को असत्यापित करने के लिए प्रयोगों की शृंखला की, परंतु उसने सोडियम के लिए प्राप्त सरल रेखा का ढलान मापकर, इसके विपरीत, आइंस्टाइन के समीकरण को स्थापित कर दिया। इस प्रकार 1916 में मिलिकन ने प्लांक स्थिरांक h का मान भी निर्धारित किया, जो अन्य संदर्भों में ज्ञात मान (6.626 × 10⁻³⁴ J s) के अत्यंत निकट था।

AE
अल्बर्ट आइंस्टाइन (1879–1955) जर्मन-स्विस-अमेरिकी सैद्धांतिक भौतिकविद्

सन् 1905 में प्रकाशित अपने तीन क्रांतिकारी शोधपत्रों से आरंभ हुए इस वैज्ञानिक जीवन में आइंस्टाइन ने प्रकाश क्वांटा (फ़ोटॉन) की धारणा प्रस्तुत की और प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या की। सैद्धांतिक भौतिकी में योगदान तथा प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए उन्हें 1921 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विद्युत के मूल आवेश तथा प्रकाश-विद्युत प्रभाव पर किए गए कार्य के लिए मिलिकन को 1923 में नोबेल पुरस्कार दिया गया।

NEET फोकस
  • आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्युत समीकरण: Kउच्च = hν − φ₀।
  • देहली आवृत्ति ν₀ = φ₀/h।
  • निरोधी विभव समीकरण: eV₀ = hν − φ₀, अर्थात V₀ = (h/e)ν − φ₀/e।
  • V₀ बनाम ν ग्राफ़ की ढाल = h/e, जो पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता।
  • आइंस्टाइन को 1921 में तथा मिलिकन को 1923 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।
  • प्लांक स्थिरांक h = 6.626 × 10⁻³⁴ J s।

7 प्रकाश की कणीय प्रकृति: फ़ोटॉन

फ़ोटॉन के गुण एवं कॉम्पटन प्रभाव

प्रकाश-विद्युत प्रभाव ने इस विलक्षण तथ्य को प्रमाणित किया कि प्रकाश किसी द्रव्य के साथ अन्योन्य क्रिया में इस प्रकार व्यवहार करता है जैसे यह क्वांटा अथवा ऊर्जा के पैकेट (जिनमें प्रत्येक की ऊर्जा hν है) का बना हो। आइंस्टाइन ने यह महत्वपूर्ण परिणाम प्रस्तुत किया कि प्रकाश क्वांटम को संवेग (hν/c) से संबद्ध किया जा सकता है — इस कण को बाद में फ़ोटॉन नाम दिया गया।

प्रकाश के कण जैसे व्यवहार को ए.एच. कॉम्पटन (1892–1962) के इलेक्ट्रॉनों द्वारा X-किरणों के प्रकीर्णन के प्रयोग से सन् 1924 में पुनः पुष्ट किया गया।

फ़ोटॉन के गुण E = hν = hc/λ   |   p = hν/c = h/λ   |   चाल = c

वैद्युतचुंबकीय विकिरण के फ़ोटॉन चित्रण का सारांश

#गुण
(i)विकिरण द्रव्य के साथ अन्योन्य क्रिया में ऐसे कणों से बना व्यवहार करता है जिन्हें फ़ोटॉन कहते हैं।
(ii)प्रत्येक फ़ोटॉन की ऊर्जा E (=hν) होती है और संवेग p (=hν/c) तथा चाल c होती है।
(iii)एक निश्चित आवृत्ति ν के सभी फ़ोटॉनों की ऊर्जा व संवेग एकसमान होते हैं — तीव्रता बढ़ाने पर केवल फ़ोटॉनों की संख्या बढ़ती है।
(iv)फ़ोटॉन विद्युत उदासीन होते हैं और विद्युत-चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा विक्षेपित नहीं होते।
(v)फ़ोटॉन-कण संघट्ट में कुल ऊर्जा तथा कुल संवेग संरक्षित रहते हैं, परंतु फ़ोटॉनों की संख्या संरक्षित नहीं रहती।
NEET फोकस
  • फ़ोटॉन की ऊर्जा E = hν = hc/λ।
  • फ़ोटॉन का संवेग p = hν/c = h/λ।
  • फ़ोटॉन प्रकाश की चाल c से गति करता है और विद्युत उदासीन होता है।
  • ए.एच. कॉम्पटन ने 1924 में X-किरण प्रकीर्णन प्रयोग से फ़ोटॉन की कणीय प्रकृति पुनः सिद्ध की।
  • फ़ोटॉन-संघट्ट में ऊर्जा व संवेग संरक्षित रहते हैं, परंतु फ़ोटॉनों की संख्या नहीं।

8 द्रव्य की तरंग प्रकृति

दे ब्रॉग्ली परिकल्पना एवं तरंगदैर्घ्य

प्रकाश (व्यापक तौर पर वैद्युतचुंबकीय विकिरण) की द्वैत प्रकृति (तरंग–कण) स्पष्ट रूप से प्रकट होती है — प्रकाश की तरंग प्रकृति व्यतिकरण, विवर्तन तथा ध्रुवण की परिघटनाओं में दृष्टिगोचर होती है। दूसरी ओर, प्रकाश-विद्युत प्रभाव तथा कॉम्पटन प्रभाव जिनमें ऊर्जा और संवेग का अंतरण होता है, विकिरण इस प्रकार व्यवहार करता है मानो यह फ़ोटॉनों के गुच्छ से बना हो। कण अथवा तरंग-चित्रण में से कौन किसी प्रयोग को समझने में सर्वाधिक उपयुक्त है, यह प्रयोग की प्रकृति पर निर्भर है।

एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि यदि विकिरण की द्वैत प्रकृति (तरंग तथा कण) है तो क्या प्रकृति के कण (इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि) भी तरंग-जैसा लक्षण प्रदर्शित करते हैं? सन् 1924 में एक फ्रांसीसी भौतिकवैज्ञानिक लुईस विक्टर दे ब्रॉग्ली (1892–1987) ने एक निर्भीक परिकल्पना प्रस्तुत की कि पदार्थ के गतिमान कण उपयुक्त परिस्थितियों में तरंग सदृश गुण प्रदर्शित कर सकते हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि प्रकृति सम्मित (symmetric) है, और दो मूल भौतिक सत्ताओं — द्रव्य एवं ऊर्जा — का भी सम्मित लक्षण होना चाहिए।

दे ब्रॉग्ली संबंधλ = h/p = h/(mv)

यहाँ m कण का द्रव्यमान तथा v इसकी चाल है। λ को दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य कहते हैं। समीकरण की बाईं ओर λ तरंग का लक्षण है जबकि दाईं ओर संवेग p कण का विशिष्ट लक्षण है — प्लांक स्थिरांक h दोनों लक्षणों को संयोजित करता है।

यह परिकल्पना एक फ़ोटॉन द्वारा भी संतुष्ट होती है: फ़ोटॉन के लिए p = hν/c, इसलिए h/p = c/ν = λ — अर्थात एक फ़ोटॉन का दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य उस वैद्युतचुंबकीय विकिरण के तरंगदैर्घ्य के समान होता है।

स्पष्टतः, λ एक ज़्यादा भारी कण (बड़ा m) अथवा अधिक ऊर्जस्वी कण (बड़े v) के लिए छोटा होगा। यही कारण है कि स्थूल वस्तुएँ हमारे दैनिक जीवन में तरंग-सदृश गुण नहीं दर्शातीं (λ मापन की सीमा से बहुत परे होती है), जबकि अव-परमाण्विक डोमेन (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन) में कणों का तरंग लक्षण महत्वपूर्ण तथा मापने योग्य होता है।

LB
लुईस विक्टर दे ब्रॉग्ली (1892–1987) फ्रांसीसी भौतिकविद्

जिन्होंने द्रव्य की तरंग प्रकृति का क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किया। यह विचार इर्विन श्रोडिंगर द्वारा क्वांटम-यांत्रिकी के एक संपूर्ण सिद्धांत के रूप में विकसित किया गया, जिसे सामान्यतः तरंग-यांत्रिकी कहते हैं। इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति की खोज के लिए इन्हें सन् 1929 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

NEET फोकस
  • दे ब्रॉग्ली संबंध: λ = h/p = h/(mv)।
  • दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य पदार्थ-कण के आवेश तथा प्रकृति से स्वतंत्र होती है।
  • बड़े द्रव्यमान m या अधिक चाल v वाले कण की दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य छोटी होती है (λ ∝ 1/mv)।
  • एक फ़ोटॉन के लिए भी दे ब्रॉग्ली संबंध संतुष्ट होता है: λ = h/p = c/ν।
  • लुई दे ब्रॉग्ली को 1929 में नोबेल पुरस्कार मिला; उनका सिद्धांत श्रोडिंगर द्वारा तरंग-यांत्रिकी के रूप में विकसित हुआ।
  • त्वरित इलेक्ट्रॉन (V वोल्ट से) के लिए: λ = 12.27/√V Å।

✓ सारांश व सूत्र-सूची

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

इलेक्ट्रॉन

टॉमसन (1897): e/m = 1.76×10¹¹ C/kg; मिलिकन (1913): e = 1.602×10⁻¹⁹ C

कार्य-फलन

φ₀ — धातु से इलेक्ट्रॉन निकालने की न्यूनतम ऊर्जा

देहली आवृत्ति

ν₀ = φ₀/h; इससे कम आवृत्ति पर उत्सर्जन नहीं

निरोधी विभव

Kउच्च = eV₀

आइंस्टाइन समीकरण

Kउच्च = hν − φ₀ = h(ν−ν₀)

V₀ vs ν ग्राफ

ढाल = h/e (पदार्थ-स्वतंत्र)

फ़ोटॉन

E = hν = hc/λ; p = h/λ = E/c

दे ब्रॉग्ली

λ = h/p = h/(mv); त्वरित इलेक्ट्रॉन: λ=12.27/√V Å

नियतांक

h=6.63×10⁻³⁴ J s; e=1.6×10⁻¹⁹ C; 1 eV=1.6×10⁻¹⁹ J

📊 भौतिक राशियाँ तालिका

प्रतीक, मात्रक एवं सूत्र

भौतिक राशिप्रतीकसूत्रमात्रक
प्लांक स्थिरांकhE = hνJ s (मान: 6.63×10⁻³⁴ J s)
कार्य-फलनφ₀Kउच्च = hν − φ₀J या eV
देहली आवृत्तिν₀ν₀ = φ₀/hHz
निरोधक विभवV₀eV₀ = Kउच्चV
आइंस्टाइन समीकरण—Kउच्च = hν − φ₀ = h(ν−ν₀)J
निरोधी विभव-आवृत्ति समीकरण—V₀ = (h/e)ν − φ₀/eV
फ़ोटॉन ऊर्जाEE = hν = hc/λJ
फ़ोटॉन संवेगpp = hν/c = h/λkg m/s
दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्यλλ = h/p = h/(mv)m
प्रति सेकंड फ़ोटॉन संख्याNN = P/Eफ़ोटॉन/s
नियतांक: h = 6.63 × 10⁻³⁴ J s; e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C; me = 9.11 × 10⁻³¹ kg; c = 3 × 10⁸ m/s; 1 eV = 1.6 × 10⁻¹⁹ J।

★ NEET फैक्ट-शीट

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

अवधारणाप्रमुख तथ्य
इलेक्ट्रॉन की खोजजे.जे. टॉमसन (1897)
e/m मान1.76 × 10¹¹ C/kg
इलेक्ट्रॉन आवेश (मिलिकन)1.602 × 10⁻¹⁹ C (तेल-बूँद प्रयोग, 1913)
कार्य-फलनधातु से इलेक्ट्रॉन निकालने की न्यूनतम ऊर्जा
देहली आवृत्तिν₀ = φ₀/h
निरोधी विभवKउच्च = eV₀
आइंस्टाइन समीकरणKउच्च = hν − φ₀
V₀ vs ν ग्राफ़ की ढालh/e (सभी धातुओं के लिए समान)
प्रकाश-विद्युत धारा-तीव्रता संबंधरैखिक (रेखीय) — I ∝ तीव्रता
निरोधी विभव-तीव्रता संबंधस्वतंत्र (कोई प्रभाव नहीं)
उत्सर्जन की तात्क्षणिकता~10⁻⁹ s या कम
फ़ोटॉन ऊर्जाE = hν = hc/λ
फ़ोटॉन संवेगp = h/λ = E/c
फ़ोटॉन आवेशशून्य (विद्युत उदासीन)
दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्यλ = h/p = h/(mv)
त्वरित इलेक्ट्रॉन (V वोल्ट)λ = 12.27/√V Å
दे ब्रॉग्ली नोबेल पुरस्कार1929
आइंस्टाइन नोबेल पुरस्कार1921 (प्रकाश-विद्युत प्रभाव)
मिलिकन नोबेल पुरस्कार1923
तरंग-कण द्वैतताप्रकाश तथा द्रव्य दोनों में

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 किसी धातु के प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन प्रक्रम में, जिसका कार्य फलन 1.8 eV है, सर्वाधिक ऊर्जावान इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा 0.5 eV है। संगत निरोधी विभव क्या है?

उत्तर: 0.5 V

V₀ = Kmax/e = 0.5 eV/e = 0.5 V

2 किसी इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉन 25 kV के विभव से त्वरित किए जाते हैं। यदि विभव को बढ़ाकर 100 kV कर दिया जाए, तो इलेक्ट्रॉनों से संबद्ध डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य में क्या परिवर्तन होगा?

उत्तर: 2 गुना घट जाएगी

λ ∝ 1/√V; λ₂/λ₁ = √(25/100) = 1/2

3 4.2 eV ऊर्जा के फोटॉन किसी धातु पृष्ठ (कार्य फलन 2.2 eV) पर आपतित हो रहे हैं। पृष्ठ का निरोधी विभव ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 2 V

eV₀ = hν − φ₀ = 4.2 − 2.2 = 2.0 eV ⟹ V₀ = 2.0 V

4 किसी विभवांतर V से त्वरित इलेक्ट्रॉनों द्वारा उत्पन्न X-किरणों की न्यूनतम तरंगदैर्ध्य किसके अनुक्रमानुपाती होती है?

उत्तर: 1/V

λmin = hc/(eV) ⟹ λmin ∝ 1/V

5 किसी इलेक्ट्रॉन तथा किसी α-कण को समान विभवांतर से त्वरित किया जाता है। इनके डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्यों λe व λα के मध्य संबंध क्या होगा?

उत्तर: λe > λα

λ = h/√(2mqV); समान V के लिए λ ∝ 1/√(mq) — हल्के इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्घ्य अधिक

6 यदि Φ किसी प्रकाश-संवेदी पदार्थ का कार्य फलन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट में है, तथा तरंगदैर्ध्य λ=hc/e मीटर (संख्यात्मक मान) का प्रकाश उस पर देहली मान से अधिक ऊर्जा के साथ आपतित हो, तो उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा क्या होगी?

उत्तर: e−Φ

फोटॉन ऊर्जा = hc/λ = e; Kmax = e − Φ

7 धातु A, B व C के कार्य फलन क्रमशः 1.92 eV, 2.0 eV तथा 5 eV हैं। 4100Å तरंगदैर्ध्य के विकिरण के लिए कौन-सी धातुएँ फोटो-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करेंगी?

उत्तर: A व B दोनों

फोटॉन ऊर्जा ≈ 3.0 eV; A(1.92eV) व B(2.0eV) < 3.0 eV, C(5eV) > 3.0 eV

8 किसी प्रकाश-संवेदी धातु पृष्ठ का कार्य फलन hν₀ है। यदि इस पृष्ठ पर 2hν₀ ऊर्जा के फोटॉन आपतित हों, तो इलेक्ट्रॉन 4×10⁶ m/s की अधिकतम चाल से बाहर आते हैं। जब फोटॉन ऊर्जा को 5hν₀ कर दिया जाए, तो फोटो-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम चाल क्या होगी?

उत्तर: 8×10⁶ m/s

hν₀ = ½m(4×10⁶)²; दूसरी दशा: 4hν₀ = ½mv₂² ⟹ v₂ = 2×4×10⁶ = 8×10⁶ m/s

9 जब ऊर्जा hν के फोटॉन किसी ऐलुमिनियम प्लेट (कार्य फलन E₀) पर आपतित होते हैं, तो अधिकतम गतिज ऊर्जा K के फोटो-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। यदि विकिरण की आवृत्ति दुगुनी कर दी जाए, तो उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा क्या होगी?

उत्तर: 2K+E₀

K = hν − E₀; K' = 2hν − E₀ = 2(K+E₀) − E₀ = 2K+E₀

10 1 MeV ऊर्जा के किसी फोटॉन का संवेग kg m/s में ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 5.33×10⁻²² kg m/s

p = E/c = (1×10⁶×1.6×10⁻¹⁹)/(3×10⁸) ≈ 5.33×10⁻²² kg m/s

11 किसी लेज़र द्वारा उत्पन्न 6.0×10¹⁴ Hz आवृत्ति के एकवर्णी प्रकाश की उत्सर्जित शक्ति 2×10⁻³ W है। स्रोत द्वारा प्रति सेकंड औसतन उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए।

उत्तर: ≈5×10¹⁵ फोटॉन/सेकंड

E = hν ≈ 3.98×10⁻¹⁹ J; n = P/E ≈ 5×10¹⁵

12 किसी प्रकाश-विद्युत सेल में, प्रकाश स्रोत को उससे मूल दूरी (0.5m) से बढ़ाकर 1.0m कर दिया जाता है। मुक्त होने वाले फोटो-इलेक्ट्रॉनों की संख्या किस गुणक से घटेगी?

उत्तर: 4 गुना

I ∝ 1/d²; I₁/I₂ = 4

13 किसी प्रकाश-संवेदी पदार्थ पृष्ठ का कार्य फलन 6.2 eV है। जिस आपतित विकिरण के लिए निरोधी विभव 5V हो, उसकी तरंगदैर्ध्य किस क्षेत्र (स्पेक्ट्रम) में स्थित होगी?

उत्तर: पराबैंगनी (UV) क्षेत्र

hν = 6.2+5 = 11.2 eV; λ = 1240/11.2 ≈ 110.7 nm — यह UV क्षेत्र में है

14 किसी हीलियम-नियॉन लेज़र द्वारा 667nm तरंगदैर्ध्य का एकवर्णी प्रकाश उत्पन्न किया जाता है। उत्सर्जित शक्ति 9mW है। इस किरण-पुंज से किसी लक्ष्य पर औसतन प्रति सेकंड कितने फोटॉन आपतित होंगे?

उत्तर: ≈3×10¹⁶ फोटॉन/सेकंड

E = hc/λ ≈ 2.98×10⁻¹⁹ J; n = 9×10⁻³/2.98×10⁻¹⁹ ≈ 3×10¹⁶

15 किसी प्रकाश-संवेदी पदार्थ का कार्य फलन 4.0 eV है। इस पदार्थ से फोटो-विद्युत उत्सर्जन कराने वाले प्रकाश की अधिकतम (देहली) तरंगदैर्ध्य लगभग क्या होगी?

उत्तर: ≈310 nm

λ₀ = hc/φ₀ = 1240 eV·nm/4.0 eV = 310 nm

16 किसी α-कण की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए जो 0.25 Wb/m² के चुंबकीय क्षेत्र में 0.83 cm त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर गति करता है।

उत्तर: 0.01 Å

R=mv/(qB) ⟹ λ = h/(qBR) ≈ 10⁻¹² m = 0.01 Å

17 किसी प्रकाश-संवेदी धातु की देहली आवृत्ति 3.3×10¹⁴ Hz है। यदि इस धातु पर 8.2×10¹⁴ Hz आवृत्ति का प्रकाश आपतित किया जाए, तो फोटो-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन हेतु कट-ऑफ (निरोधी) वोल्टता लगभग कितनी होगी?

उत्तर: लगभग 2 V

eV₀ = h(ν−ν₀) = 6.63×10⁻³⁴×4.9×10¹⁴ ≈ 3.25×10⁻¹⁹ J; V₀ ≈ 2.03 V

➕ अतिरिक्त NEET तथ्य

सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय NEET में प्रतिवर्ष 2–3 प्रश्न (8–12 अंक) रखता है; सर्वाधिक बार पूछे गए उप-विषय — आइंस्टाइन के प्रकाश-विद्युत समीकरण पर आधारित गणना, निरोधी विभव व देहली आवृत्ति, तथा डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य से संबंधित संख्यात्मक प्रश्न हैं।
तथ्य
  • हाइज़ेनबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत — Δx·Δp ≥ h/4π; स्थिति व संवेग दोनों को एक साथ पूर्ण यथार्थता से मापना असंभव — यह द्रव्य की तरंग प्रकृति का प्रत्यक्ष परिणाम है।
तथ्य
  • X-किरण उत्पादन (प्रतिलोम प्रकाश-विद्युत प्रभाव) — उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों को धातु लक्ष्य पर आपतित कराकर X-किरण फोटॉन उत्पन्न होते हैं; न्यूनतम तरंगदैर्ध्य λmin=hc/eV।
तथ्य
  • कॉम्पटन प्रभाव — Δλ = (h/m₀c)(1−cosθ); X-किरणों के इलेक्ट्रॉनों से प्रकीर्णन में तरंगदैर्घ्य वृद्धि — फोटॉन के कणीय स्वभाव की पुष्टि।
तथ्य
  • डेविसन-जर्मर प्रयोग — निकैल क्रिस्टल से इलेक्ट्रॉनों का विवर्तन; डी-ब्रॉग्ली संबंध की प्रत्यक्ष प्रायोगिक पुष्टि।
तुलनात्मक
  • कार्य फलन के अनुमानित मान (eV में) — Cs: 2.14, K: 2.30, Na: 2.75, Al: 4.28, Pt: 5.65; क्षार धातुओं का कार्य फलन सबसे कम — फोटो-सेल में Cs, K, Na उपयोग।
तुलनात्मक
  • तीव्रता-निर्भरता — संतृप्त धारा ∝ तीव्रता (रैखिक); निरोधी विभव व Kmax तीव्रता से स्वतंत्र (केवल आवृत्ति पर निर्भर)।
तथ्य
  • निरोधी विभव बनाम आवृत्ति ग्राफ़ — सरल रेखा; ढाल = h/e; ν-अक्ष अंतःखंड = देहली आवृत्ति ν₀ — मिलिकन के प्रयोग से h का मान निर्धारण।
तथ्य
  • प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन की तात्क्षणिकता — ~10⁻⁹ s से भी कम विलंब में उत्सर्जन; तरंग सिद्धांत के अनुसार अपेक्षित काल-विलंब (कई घंटे) प्रेक्षित नहीं होता।
तथ्य
  • देहली आवृत्ति व देहली तरंगदैर्घ्य — ν₀=φ₀/h; λ₀=hc/φ₀; देहली तरंगदैर्घ्य से अधिक तरंगदैर्घ्य (देहली आवृत्ति से कम आवृत्ति) पर कोई उत्सर्जन नहीं।
रणनीति
  • त्वरित आवेशित कण की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य — आवेश q, द्रव्यमान m का कण विभव V से त्वरित: λ = h/√(2mqV); इलेक्ट्रॉन के लिए λ(Å)=12.27/√V।
तथ्य
  • फोटॉन के संवेग व ऊर्जा के मध्य संबंध — फोटॉन विराम-द्रव्यमान रहित पर संवेगयुक्त: p=E/c=h/λ; सापेक्षिकीय संबंध E²=(pc)²+(m₀c²)² में m₀=0 रखने पर E=pc।
तुलनात्मक
  • तरंग-कण द्वैतता व पूरकता सिद्धांत — कोई भी एक प्रयोग तरंग व कण दोनों स्वभाव एक साथ नहीं दर्शा सकता; दोनों स्वभाव पूरक हैं।
तुलनात्मक
  • कार्य फलन बनाम आयनन ऊर्जा — कार्य फलन: ठोस धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन मुक्त करने की ऊर्जा (~कुछ eV); आयनन ऊर्जा: पृथक परमाणु से इलेक्ट्रॉन हटाने की ऊर्जा (H के लिए 13.6 eV)।
तथ्य
  • ऊष्मीय न्यूट्रॉनों की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य — ताप T पर औसत गतिज ऊर्जा (3/2)kBT; λ = h/√(3mkBT); ताप बढ़ने पर λ घटती है — न्यूट्रॉन विवर्तन में उपयोग।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — आइंस्टाइन समीकरण, देहली आवृत्ति, निरोधी विभव, फ़ोटॉन के संवेग व ऊर्जा, तथा डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य — इन पाँचों पर विशेष ध्यान दें, इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।

? अभ्यास प्रश्न-उत्तर

NCERT अध्याय 11 के सभी 11 प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें

प्रश्न 11.1 30 kV इलेक्ट्रॉनों के द्वारा उत्पन्न X-किरणों की (a) उच्चतम आवृत्ति तथा (b) निम्नतम तरंगदैर्घ्य प्राप्त कीजिए।
उत्तर

इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा: eV = 30×10³×1.6×10⁻¹⁹ = 4.8×10⁻¹⁵ J

(a) hνmax=eV ⟹ νmax = (4.8×10⁻¹⁵)/(6.63×10⁻³⁴) ≈ 7.24×10¹⁸ Hz

(b) λmin = hc/eV = c/νmax ≈ 4.14×10⁻¹¹ m (0.0414 nm)

प्रश्न 11.2 सीज़ियम धातु का कार्य-फलन 2.14 eV है। जब 6×10¹⁴ Hz आवृत्ति का प्रकाश धातु-पृष्ठ पर आपतित होता है, इलेक्ट्रॉनों का प्रकाशिक उत्सर्जन होता है। (a) उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा, (b) निरोधी विभव, (c) उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम चाल ज्ञात कीजिए।
उत्तर

hν = 6.63×10⁻³⁴×6×10¹⁴ ≈ 3.98×10⁻¹⁹ J ≈ 2.49 eV

(a) Kmax = 2.49−2.14 ≈ 0.35 eV (5.5×10⁻²⁰ J)

(b) V₀ = Kmax/e ≈ 0.35 V

(c) v = √(2Kmax/m) ≈ 3.49×10⁵ m/s

प्रश्न 11.3 एक विशिष्ट प्रयोग में प्रकाश-विद्युत प्रभाव की अंतक वोल्टता 1.5 V है। उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा कितनी है?
उत्तर

Kmax = eV₀ = 1.5 eV = 1.5×1.6×10⁻¹⁹

Kmax = 1.5 eV = 2.4×10⁻¹⁹ J

प्रश्न 11.4 632.8 nm तरंगदैर्घ्य का एकवर्णी प्रकाश हीलियम-नियॉन लेसर द्वारा उत्पन्न किया जाता है। उत्सर्जित शक्ति 9.42 mW है। (a) प्रत्येक फ़ोटॉन की ऊर्जा तथा संवेग, (b) प्रति सेकंड फ़ोटॉनों की संख्या, (c) हाइड्रोजन परमाणु की चाल ज्ञात कीजिए।
उत्तर

(a) E = hc/λ ≈ 3.14×10⁻¹⁹ J; p = h/λ ≈ 1.05×10⁻²⁷ kg m/s

(b) N = P/E ≈ 3.0×10¹⁶ फ़ोटॉन/सेकंड

(c) v = p/mH ≈ 0.63 m/s

प्रश्न 11.5 प्रकाश-विद्युत प्रभाव के एक प्रयोग में, प्रकाश आवृत्ति के विरुद्ध अंतक वोल्टता की ढलान 4.12×10⁻¹⁵ V s प्राप्त होती है। प्लांक स्थिरांक का मान परिकलित कीजिए।
उत्तर

V₀ = (h/e)ν − φ₀/e ⟹ ढलान = h/e

h = ढलान × e = 4.12×10⁻¹⁵ × 1.6×10⁻¹⁹

h ≈ 6.59×10⁻³⁴ J s (स्वीकृत मान 6.63×10⁻³⁴ J s के निकट)

प्रश्न 11.6 किसी धातु की देहली आवृत्ति 3.3×10¹⁴ Hz है। यदि 8.2×10¹⁴ Hz आवृत्ति का प्रकाश धातु पर आपतित हो, तो प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के लिए अंतक वोल्टता ज्ञात कीजिए।
उत्तर

φ₀ = hν₀ = 2.188×10⁻¹⁹ J; hν = 5.437×10⁻¹⁹ J

Kmax = hν−φ₀ = 3.249×10⁻¹⁹ J

V₀ = Kmax/e = (3.249×10⁻¹⁹)/(1.6×10⁻¹⁹)

V₀ ≈ 2.03 V

प्रश्न 11.7 किसी धातु के लिए कार्य-फलन 4.2 eV है। क्या यह धातु 330 nm तरंगदैर्घ्य के आपतित विकिरण के लिए प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन देगा?
उत्तर

E = hc/λ = (6.63×10⁻³⁴×3×10⁸)/(330×10⁻⁹) ≈ 6.03×10⁻¹⁹ J ≈ 3.77 eV

चूँकि 3.77 eV < 4.2 eV (कार्य फलन से कम), उत्सर्जन नहीं होगा

नहीं, यह धातु प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नहीं देगी।

प्रश्न 11.8 7.21×10¹⁴ Hz आवृत्ति का प्रकाश एक धातु-पृष्ठ पर आपतित है। इस पृष्ठ से 6.0×10⁵ m/s की उच्चतम गति से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो रहे हैं। इलेक्ट्रॉनों के प्रकाश उत्सर्जन के लिए देहली आवृत्ति क्या है?
उत्तर

Kmax = ½mv² = ½×9.11×10⁻³¹×(6×10⁵)² ≈ 1.64×10⁻¹⁹ J

hν = 4.781×10⁻¹⁹ J; φ₀ = hν−Kmax = 3.141×10⁻¹⁹ J

ν₀ = φ₀/h ≈ 4.74×10¹⁴ Hz

प्रश्न 11.9 488 nm तरंगदैर्घ्य का प्रकाश एक आर्गन लेसर से उत्पन्न किया जाता है। जब इस स्पेक्ट्रमी-रेखा के प्रकाश को उत्सर्जक पर आपतित किया जाता है तब प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों का निरोधी विभव 0.38 V है। उत्सर्जक के पदार्थ का कार्य-फलन ज्ञात करें।
उत्तर

E = hc/λ ≈ 4.076×10⁻¹⁹ J ≈ 2.548 eV

Kmax = eV₀ = 0.38 eV

φ₀ = E−Kmax = 2.548−0.38

φ₀ ≈ 2.17 eV

प्रश्न 11.10 (a) एक 0.040 kg द्रव्यमान का बुलेट जो 1.0 km/s की चाल से चल रहा है, (b) एक 0.060 kg द्रव्यमान की गेंद जो 1.0 km/s की चाल से चल रही है, और (c) एक धूल-कण जिसका द्रव्यमान 1.0×10⁻⁹ kg और जो 2.2 m/s की चाल से अनुगमित हो रहा है, का दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए।
उत्तर

λ = h/p = h/(mv)

(a) λ = 6.63×10⁻³⁴/40 ≈ 1.66×10⁻³⁵ m

(b) λ = 6.63×10⁻³⁴/60 ≈ 1.10×10⁻³⁵ m

(c) λ = 6.63×10⁻³⁴/(2.2×10⁻⁹) ≈ 3.01×10⁻²⁵ m

इन सभी स्थूल वस्तुओं की तरंगदैर्घ्य मापन-सीमा से बहुत बाहर है।

प्रश्न 11.11 यह दर्शाइए कि वैद्युतचुंबकीय विकिरण का तरंगदैर्घ्य इसके क्वांटम (फ़ोटॉन) के तरंगदैर्घ्य के बराबर है।
उत्तर

फ़ोटॉन संवेग p = hν/c; दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य λdeB = h/p = h/(hν/c) = c/ν

EM तरंग संबंध: c = νλEM ⟹ λEM = c/ν

दोनों की तुलना करने पर: λdeB = λEM

सिद्ध हुआ कि EM विकिरण का तरंगदैर्घ्य, उसके क्वांटम (फ़ोटॉन) के दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य के बराबर है।

यह अध्ययन सामग्री विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति — इलेक्ट्रॉन की खोज, प्रकाश-विद्युत प्रभाव, आइंस्टाइन का समीकरण, फ़ोटॉन एवं दे ब्रॉग्ली तरंगें — को सरल, मौलिक एवं परीक्षा-अनुकूल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिसमें NEET-स्तरीय तथ्य, तुलनात्मक तालिकाएँ एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर सम्मिलित हैं।

द्वैत प्रकृति — तरंग एवं कण, प्रकृति की एक ही सच्चाई के दो पहलू।

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