तरंग-प्रकाशिकी
हाइगेंस के सिद्धांत से लेकर व्यतिकरण, यंग का द्विझिरी प्रयोग, विवर्तन और ध्रुवण तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, आरेख, त्वरित तथ्य और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
1 भूमिका
प्रकाश की प्रकृति — कणिका मॉडल से तरंग मॉडल तक
सन् 1637 में दकार्ते ने प्रकाश के कणिका मॉडल को प्रस्तुत किया तथा स्नेल के नियम को व्युत्पन्न किया। कणिका मॉडल ने प्रागुक्त किया कि यदि प्रकाश की किरण अपवर्तन के समय अभिलंब की ओर मुड़ती है, तब दूसरे माध्यम में प्रकाश की चाल अधिक होगी। आइज़क न्यूटन ने इसे अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ऑप्टिक्स में और विकसित किया।
सन् 1678 में डच भौतिकविद क्रिस्टिआन हाइगेंस ने प्रकाश के तरंग सिद्धांत को प्रस्तुत किया — इस अध्याय में हम इसी सिद्धांत पर विचार करेंगे। तरंग मॉडल प्रागुक्त करता है कि अपवर्तन के समय यदि तरंग अभिलंब की ओर मुड़ती है तो दूसरे माध्यम में प्रकाश की चाल कम होगी — यह कणिका मॉडल की प्रागुक्ति के विपरीत है। सन् 1850 में फूको के प्रयोग ने दर्शाया कि जल में प्रकाश की चाल वायु में प्रकाश की चाल से कम है — इस प्रकार तरंग मॉडल की प्रागुक्ति की पुष्टि हुई।
सन् 1801 में टॉमस यंग द्वारा किए गए व्यतिकरण प्रयोग ने निश्चित रूप से प्रमाणित किया कि प्रकाश की प्रकृति तरंगवत् है। परंतु सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि तरंग संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता मानी जाती थी — तो प्रकाश तरंगें निर्वात में कैसे संचरित हो सकती हैं? इसकी व्याख्या मैक्सवेल द्वारा वैद्युतचुंबकीय सिद्धांत प्रस्तुत करने पर हो पाई — मैक्सवेल के अनुसार प्रकाश तरंगें परिवर्तनशील विद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों से संबद्ध हैं, जो निर्वात में भी संचरण कर सकते हैं।
- कणिका मॉडल (न्यूटन): अपवर्तन में अभिलंब की ओर मुड़ने पर दूसरे माध्यम में चाल अधिक होनी चाहिए — यह गलत सिद्ध हुआ।
- तरंग मॉडल (हाइगेंस, 1678): अभिलंब की ओर मुड़ने पर दूसरे माध्यम में चाल कम होनी चाहिए — फूको (1850) के प्रयोग से यह सही सिद्ध हुआ।
- टॉमस यंग (1801) के व्यतिकरण प्रयोग ने प्रकाश की तरंग प्रकृति को निश्चित रूप से प्रमाणित किया।
- मैक्सवेल ने दिखाया कि प्रकाश एक वैद्युतचुंबकीय तरंग है, जो निर्वात में भी बिना किसी भौतिक माध्यम के संचरित हो सकती है।
- ज्यामितीय प्रकाशिकी, तरंग-प्रकाशिकी की एक सीमा (λ→0) है।
2 हाइगेंस का सिद्धांत
तरंगाग्र संकल्पना एवं द्वितीयक तरंगिकाएँ
समान कला में दोलन करते सभी बिंदुओं का बिंदुपथ तरंगाग्र कहलाता है। जिस गति के साथ तरंगाग्र स्रोत से बाहर की ओर बढ़ता है, वह तरंग की चाल कहलाती है। तरंग की ऊर्जा तरंगाग्र के लंबवत् चलती है।
बिंदु-स्रोत से समान तरंगें उत्सर्जित होने पर तरंगाग्र गोलीय होता है; स्रोत से बहुत अधिक दूरी पर, गोले का एक छोटा भाग समतल तरंग माना जा सकता है।
प्रकाश के तरंग सिद्धांत के प्रणेता। उनकी पुस्तक ट्रीटीज़ ऑन लाइट आज भी पढ़ने में अच्छी लगती है। इस पुस्तक में परावर्तन और अपवर्तन के अतिरिक्त, खनिज कैल्साइट द्वारा प्रदर्शित दोहरे-अपवर्तन की प्रक्रिया को भी बहुत सुंदर ढंग से समझाया गया है। वही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वृत्तीय गति एवं सरल-आवर्त गति का विश्लेषण प्रस्तुत किया और सुधरी हुई घड़ियाँ एवं टेलिस्कोप बनाए। उन्होंने शनि-वलयों की सही ज्यामिति भी प्रस्तुत की।
- तरंगाग्र = समान कला में दोलन करते बिंदुओं का बिंदुपथ; तरंग की ऊर्जा तरंगाग्र के लंबवत् चलती है।
- बिंदु स्रोत से गोलीय तरंगाग्र; बहुत दूर पर समतल तरंगाग्र सन्निकटन मान्य।
- हाइगेंस सिद्धांत: तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु द्वितीयक तरंगिकाओं का स्रोत होता है; इनका उभयनिष्ठ आवरण नया तरंगाग्र देता है।
- हाइगेंस के मॉडल की कमी: पश्च तरंग की व्याख्या के लिए तदर्थ कल्पना आवश्यक।
3 हाइगेंस सिद्धांत का उपयोग करते हुए समतल तरंगों का अपवर्तन तथा परावर्तन
स्नेल के नियम एवं परावर्तन के नियम की व्युत्पत्ति
समतल तरंगों का अपवर्तन
माना PP′ माध्यम 1 तथा माध्यम 2 को पृथक करने वाला पृष्ठ है, तथा v₁, v₂ क्रमशः दोनों माध्यमों में प्रकाश की चाल हैं। त्रिभुजों ABC तथा AEC पर विचार करने से:
इस समीकरण में अंतर्निहित है कि जब तरंग सघन माध्यम में अपवर्तित होती है (v₁>v₂), तो तरंगदैर्घ्य तथा संचरण की चाल कम हो जाती है, लेकिन आवृत्ति ν (=v/λ) उतनी ही रहती है।
विरल माध्यम पर अपवर्तन
यदि v₂>v₁ (विरल माध्यम), तो अपवर्तन कोण आपतन कोण से बड़ा होगा। एक कोण ic को इस प्रकार परिभाषित करते हैं:
i>ic के लिए कोई अपवर्तित तरंग प्राप्त नहीं होगी — तरंग का पूर्ण आंतरिक परावर्तन हो जाएगा (चर्चा अनुच्छेद 9.4 में की गई थी)।
समतल पृष्ठ से एक समतल तरंग का परावर्तन
त्रिभुज EAC तथा BAC सर्वांगसम हैं, इसीलिए कोण i तथा r बराबर होंगे — यही परावर्तन का नियम है, हाइगेंस के सिद्धांत से व्युत्पन्न।
एक बार परावर्तन तथा अपवर्तन के नियमों को जान लेने के पश्चात प्रिज्मों, लेंसों तथा दर्पणों के व्यवहार को समझा जा सकता है (अध्याय 9 में विस्तृत चर्चा)। महत्वपूर्ण तथ्य: बिंब पर किसी बिंदु से प्रतिबिंब के संगत बिंदु तक लगा कुल समय एक ही होता है, चाहे जिस भी किरण के अनुदिश मापा जाए।
(a) जब एकवर्णीय प्रकाश दो माध्यमों को पृथक करने वाली सतह पर आपतित होता है, तब परावर्तित एवं अपवर्तित दोनों प्रकाश की आवृत्तियाँ समान होती हैं। स्पष्ट कीजिए क्यों? (b) जब प्रकाश विरल से सघन माध्यम में गति करता है तो उसकी चाल में कमी आती है। क्या चाल में आई कमी प्रकाश तरंगों द्वारा संचारित ऊर्जा की कमी को दर्शाती है? (c) फोटॉन अवधारणा में तीव्रता का निर्धारण किससे होता है?
(b) नहीं। तरंग द्वारा ले जाई जाने वाली ऊर्जा तरंग के आयाम पर निर्भर करती है, यह तरंग संचरण की चाल पर निर्भर नहीं करती।
(c) फोटॉन चित्रण में किसी दी हुई आवृत्ति के लिए प्रकाश की तीव्रता एकांक क्षेत्रफल से एकांक समय में गमन करने वाले फोटॉन की संख्या द्वारा निर्धारित होती है।
- तरंग सिद्धांत से स्नेल का नियम स्वाभाविक रूप से व्युत्पन्न होता है: n₁ sin i = n₂ sin r।
- अपवर्तन में माध्यम बदलने पर आवृत्ति सदैव अपरिवर्तित रहती है — केवल तरंगदैर्घ्य व चाल बदलते हैं।
- सघन माध्यम में प्रवेश पर चाल व तरंगदैर्घ्य घटते हैं (आवृत्ति स्थिर)।
- क्रांतिक कोण sin ic = n₂/n₁; i>ic पर पूर्ण आंतरिक परावर्तन।
- परावर्तन का नियम (∠i=∠r) भी हाइगेंस के सिद्धांत से व्युत्पन्न होता है।
4 तरंगों का कला-संबद्ध तथा कला-असंबद्ध योग
अध्यारोपण का सिद्धांत एवं व्यतिकरण की शर्तें
अध्यारोपण के सिद्धांत के अनुसार, किसी माध्यम में एक विशिष्ट बिंदु पर अनेक तरंगों द्वारा उत्पन्न परिणामी विस्थापन इनमें से प्रत्येक तरंग के विस्थापनों का सदिश योग होता है। दो कला-संबद्ध (coherent) स्रोतों S₁ व S₂ के लिए, यदि पथांतर S₁P~S₂P = nλ है, तो संपोषी व्यतिकरण होगा; यदि पथांतर (n+½)λ है, तो विनाशी व्यतिकरण होगा।
यहाँ I₀ प्रत्येक स्रोत की पृथक तीव्रता है (I₀ ∝ a²)। φ=0,±2π,±4π,... पर संपोषी व्यतिकरण (I अधिकतम); φ=±π,±3π,... पर विनाशी व्यतिकरण (I=0)।
जब दो स्रोत कला-असंबद्ध (incoherent) होते हैं (कलांतर φ समय के साथ तेज़ी से बदलता है), तो "काल-औसत" तीव्रता प्राप्त होती है:
कला-असंबद्ध स्रोतों के लिए तीव्रताएँ केवल जुड़ जाती हैं — जैसे दो अलग-अलग प्रकाश स्रोत किसी दीवार को प्रकाशित करते समय होता है।
- कला-संबद्ध स्रोत: उनके बीच कलांतर समय के साथ स्थिर रहता है।
- संपोषी व्यतिकरण: पथांतर = nλ; I=4I0 (अधिकतम)।
- विनाशी व्यतिकरण: पथांतर = (n+½)λ; I=0।
- सामान्य सूत्र: I=4I0cos²(φ/2), जहाँ φ=(2π/λ)×पथांतर।
- कला-असंबद्ध स्रोतों के लिए तीव्रताएँ सीधे जुड़ती हैं: I=2I0।
- व्यतिकरण में ऊर्जा का पुनर्वितरण होता है, कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है।
5 प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण तथा यंग का प्रयोग
द्विझिरी प्रयोग एवं फ्रिंज चौड़ाई
दो अलग-अलग सामान्य प्रकाश स्रोतों (जैसे दो सोडियम लैंप) से कोई स्थिर व्यतिकरण फ्रिंज नहीं दिखतीं, क्योंकि सामान्य स्रोत से उत्सर्जित प्रकाश में 10⁻¹⁰ s की कोटि के समय अंतरालों पर आकस्मिक कला-परिवर्तन होता है — अतः ऐसे स्रोत कला-असंबद्ध होते हैं।
टॉमस यंग ने एक उत्तम तकनीक का उपयोग किया: एक अपारदर्शी परदे पर दो सूचिछिद्र S₁ तथा S₂ (एक-दूसरे के बहुत निकट) बनाए, जिन्हें एक अन्य सूचिछिद्र S से (जो किसी दीप्त स्रोत से प्रकाशित था) प्रदीप्त किया गया। चूँकि S₁ व S₂ एक ही मूल स्रोत S से व्युत्पन्न होते हैं, वे कला-संबद्ध स्रोतों की भाँति कार्य करते हैं।
काले तथा दीप्त फ्रिंज समान दूरी (β = λD/d, फ्रिंज चौड़ाई) पर होते हैं।
यंग ने बहुत तरह की वैज्ञानिक समस्याओं पर कार्य किया, जिनमें एक ओर आँख की संरचना और दृष्टि प्रक्रिया तो दूसरी ओर रोसेटा मणि का रहस्य भेदन शामिल है। उन्होंने प्रकाश के तरंग सिद्धांत को पुनर्जीवित किया और समझाया कि व्यतिकरण, प्रकाश के तरंग गुण का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
- यंग का प्रयोग: कला-संबद्ध स्रोत S1, S2 एक ही मूल स्रोत S से व्युत्पन्न होते हैं।
- फ्रिंज चौड़ाई β = λD/d (सभी दीप्त तथा अदीप्त फ्रिंज समान दूरी पर)।
- n-वें दीप्त फ्रिंज की दूरी: xn=nλD/d।
- n-वें अदीप्त फ्रिंज की दूरी: xn=(n+½)λD/d।
- व्यतिकरण फ्रिंज देखने के लिए दोनों झिरियों से आने वाले प्रकाश की तीव्रता (आयाम) लगभग समान होनी चाहिए।
6 विवर्तन
तरंगों का अवरोधक के किनारों पर मुड़ना
किसी अपारदर्शी वस्तु द्वारा बनने वाली छाया के ज्यामितीय क्षेत्र के समीप व्यतिकरण के समान बारी-बारी उदीप्त तथा दीप्त क्षेत्र आते हैं — यह विवर्तन की परिघटना के कारण होता है। विवर्तन सभी प्रकार की तरंगों (ध्वनि, प्रकाश, जल, द्रव्य) द्वारा प्रदर्शित एक सामान्य अभिलक्षण है।
एकल झिरी विवर्तन
a चौड़ाई की एकल झिरी LN पर अभिलंबवत पड़ने वाले समांतर किरण पुंज पर विचार करें। झिरी को बहुत से छोटे भागों में विभाजित करके, बिंदु P पर उनके योगदानों को उचित कलांतर के साथ जोड़ने पर:
एकल झिरी विवर्तन पैटर्न का अवलोकन
दो रेज़र ब्लेडों को समांतर किनारों के साथ पकड़कर एक संकीर्ण झिरी बनाई जा सकती है (उँगलियों से भी संभव)। किसी दूरस्थ चमकीले तंतु (बल्ब) को इस झिरी से देखने पर, दीप्त व अदीप्त बैंडों का पैटर्न दिखाई देगा।
- विवर्तन सभी प्रकार की तरंगों का सामान्य गुण है।
- एकल झिरी विवर्तन: केंद्रीय उच्चिष्ठ (θ=0, सबसे चौड़ा व तीव्र), द्वितीयक उच्चिष्ठ θ≈(n+½)λ/a पर, निम्निष्ठ θ≈nλ/a पर।
- व्यतिकरण व विवर्तन में कोई मौलिक भौतिक अंतर नहीं।
- विवर्तन परिघटना ही किरण-प्रकाशिकी की सीमा तय करती है।
7 ध्रुवण
प्रकाश की अनुप्रस्थ प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रमाण
प्रकाश की तरंगों की प्रकृति अनुप्रस्थ होती है — संचरित हो रही प्रकाश तरंग से संबद्ध विद्युत क्षेत्र सदैव तरंग संचरण की दिशा के लंबवत् होता है। किसी डोरी में उत्पन्न तरंग y(x,t) = a sin(kx−ωt) का विस्थापन तरंग संचरण दिशा (x) के लंबवत् (y दिशा में) होने से यह रैखिकतः ध्रुवित अनुप्रस्थ तरंग है।
प्राकृतिक प्रकाश (जैसे सूर्य से) अध्रुवित होता है — विद्युत सदिश अनुप्रस्थ तल में द्रुतता व यादृच्छिकता से सभी संभव दिशाओं में दोलन करता है। पोलेरॉइड केवल एक विशिष्ट दिशा (पारित-अक्ष) के अनुदिश घटक को पारगमित करता है — इससे रैखिक ध्रुवित प्रकाश प्राप्त होता है।
यहाँ I₀ पहले पोलेरॉइड से गुज़रने के बाद ध्रुवित प्रकाश की तीव्रता है, तथा θ दोनों पोलेरॉइडों की पारित-अक्षों के बीच का कोण है। किसी एक साधारण पोलेरॉइड से गुज़रने पर अध्रुवित प्रकाश की तीव्रता आधी हो जाती है।
जब दो क्रॉस्ड पोलेरॉइडों के बीच में पोलेराइड की एक तीसरी शीट को घुमाया जाता है तो पारगमित प्रकाश की तीव्रता में होने वाले परिवर्तन की विवेचना कीजिए।
I = I₀cos²θ·cos²(π/2−θ) = I₀cos²θ·sin²θ = (I₀/4)sin²2θ
- प्रकाश तरंगें अनुप्रस्थ वैद्युतचुंबकीय तरंगें हैं।
- प्राकृतिक प्रकाश अध्रुवित होता है; पोलेरॉइड से गुज़रने पर रैखिक ध्रुवित प्रकाश प्राप्त होता है।
- अध्रुवित प्रकाश किसी एक पोलेरॉइड से गुज़रने पर तीव्रता आधी हो जाती है।
- मेलस का नियम: I=I0cos²θ।
- क्रॉस्ड पोलेरॉइड (θ=90°): I=0; समांतर (θ=0°): I=I0।
- ध्रुवण केवल अनुप्रस्थ तरंगों की विशिष्टता है — अनुदैर्घ्य तरंगों में ध्रुवण नहीं होता।
- धूप के चश्मे, 3D कैमरे, फोटोग्राफी में उपयोग।
✓ सारांश व सूत्र-सूची
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
तरंग सिद्धांत
हाइगेंस: तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु द्वितीयक तरंगिकाओं का स्रोत
स्नेल का नियम
n₁sin i = n₂sin r; v₁/λ₁ = v₂/λ₂
क्रांतिक कोण
sin ic = n₂/n₁; i>ic पर पूर्ण आंतरिक परावर्तन
व्यतिकरण
संपोषी: पथांतर=nλ; विनाशी: (n+½)λ; I=4I₀cos²(φ/2)
यंग का प्रयोग
β=λD/d; xn=nλD/d (दीप्त); xn=(n+½)λD/d (अदीप्त)
विवर्तन (एकल झिरी)
निम्निष्ठ: θ≈nλ/a; द्वितीयक उच्चिष्ठ: θ≈(n+½)λ/a
मेलस का नियम
I=I₀cos²θ; अध्रुवित प्रकाश पोलेरॉइड से गुज़रने पर आधा
ध्रुवण
प्रकाश की अनुप्रस्थ प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रमाण
व्यतिकरण व विवर्तन
कोई मौलिक भौतिक अंतर नहीं — स्रोतों की संख्या का अंतर
📊 भौतिक राशियाँ तालिका
प्रतीक, मात्रक एवं सूत्र
| राशि / प्रकरण | सूत्र |
|---|---|
| अपवर्तनांक | n = c/v |
| स्नेल का नियम | n₁ sin i = n₂ sin r |
| वेग-तरंगदैर्घ्य संबंध | v₁/λ₁ = v₂/λ₂ |
| क्रांतिक कोण | sin ic = n₂/n₁ |
| संपोषी व्यतिकरण शर्त | पथांतर = nλ; I = 4I₀ |
| विनाशी व्यतिकरण शर्त | पथांतर = (n+½)λ; I = 0 |
| सामान्य तीव्रता (कलांतर φ) | I = 4I₀cos²(φ/2), φ = (2π/λ)×पथांतर |
| कला-असंबद्ध स्रोतों की औसत तीव्रता | I = 2I₀ |
| यंग द्विझिरी — फ्रिंज चौड़ाई | β = λD/d |
| n-वें दीप्त फ्रिंज की स्थिति | xn = nλD/d |
| n-वें अदीप्त फ्रिंज की स्थिति | xn = (n+½)λD/d |
| एकल झिरी विवर्तन — निम्निष्ठ | θ ≈ nλ/a |
| एकल झिरी विवर्तन — द्वितीयक उच्चिष्ठ | θ ≈ (n+½)λ/a |
| मेलस का नियम | I = I₀cos²θ |
★ NEET फैक्ट-शीट
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| प्रकाश की प्रकृति | वैद्युतचुंबकीय अनुप्रस्थ तरंग |
| कणिका vs तरंग मॉडल | फूको (1850) ने तरंग मॉडल की पुष्टि की |
| हाइगेंस सिद्धांत | तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु द्वितीयक तरंगिकाओं का स्रोत |
| स्नेल का नियम | n₁sin i = n₂sin r |
| अपवर्तन में | आवृत्ति स्थिर; चाल व तरंगदैर्घ्य बदलते हैं |
| क्रांतिक कोण | sin ic = n₂/n₁ (सघन → विरल) |
| संपोषी व्यतिकरण | पथांतर=nλ; I=4I0 |
| विनाशी व्यतिकरण | पथांतर=(n+½)λ; I=0 |
| सामान्य तीव्रता | I=4I0cos²(φ/2) |
| कला-असंबद्ध स्रोत | I=2I0 (कोई स्थिर व्यतिकरण नहीं) |
| यंग फ्रिंज चौड़ाई | β=λD/d |
| दीप्त फ्रिंज | xn=nλD/d |
| अदीप्त फ्रिंज | xn=(n+½)λD/d |
| एकल झिरी निम्निष्ठ | θ≈nλ/a |
| एकल झिरी द्वितीयक उच्चिष्ठ | θ≈(n+½)λ/a |
| केंद्रीय उच्चिष्ठ चौड़ाई | 2λD/a (द्वितीयक की दोगुनी) |
| मेलस का नियम | I=I0cos²θ |
| अध्रुवित प्रकाश | पहले पोलेरॉइड से गुज़रने पर आधा |
| क्रॉस्ड पोलेरॉइड | I=0 (θ=90°) |
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 λ तरंगदैर्घ्य के एकवर्णी प्रकाश के समांतर किरण-पुंज से, जिसकी झिरी की चौड़ाई 'a' प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की कोटि की है, विवर्तन उत्पन्न होता है। यदि परदे की झिरी से दूरी D हो, तो केंद्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई होगी?
उत्तर: 2λD/a
प्रथम निम्निष्ठ की स्थिति y=λD/a; केंद्रीय उच्चिष्ठ की कुल चौड़ाई 2y=2λD/a
2 किसी द्वि-झिरी प्रयोग में, दोनों झिरियाँ 1mm अलग-अलग हैं तथा परदा 1m दूर रखा है। 500nm तरंगदैर्ध्य का एकवर्णी प्रकाश प्रयुक्त होता है। एकल-झिरी विवर्तन पैटर्न के केंद्रीय उच्चिष्ठ के अंदर द्वि-झिरी पैटर्न की 10 उच्चिष्ठ प्राप्त करने के लिए प्रत्येक झिरी की चौड़ाई क्या होनी चाहिए?
उत्तर: 0.2 mm
मानक हल में एकल-झिरी केंद्रीय अधिकतम की अर्ध-चौड़ाई द्वि-झिरी पैटर्न में पाँचवें उच्चिष्ठ तक की दूरी के बराबर रखने पर a=0.2mm प्राप्त होता है।
3 यंग के द्वि-झिरी प्रयोग में, एकवर्णी प्रकाश (तरंगदैर्ध्य λ) का उपयोग करते हुए, परदे पर उस बिंदु की तीव्रता जहाँ पथांतर λ है, K मात्रक है। उस बिंदु पर तीव्रता क्या होगी जहाँ पथांतर λ/4 है?
उत्तर: K/2
पथांतर=λ पर: δ=2π ⟹ I=4I0=K ⟹ I0=K/4; पथांतर=λ/4 पर: δ=π/2 ⟹ I=4I0cos²(π/4)=2I0=K/2
4 दूरस्थ स्रोत से λ=600nm तरंगदैर्ध्य के प्रकाश का किरण-पुंज 1mm चौड़ी एकल झिरी पर आपतित होता है और 2m दूर परदे पर विवर्तन पैटर्न बनाता है। केंद्रीय दीप्त फ्रिंज के दोनों ओर प्रथम निम्निष्ठों के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 2.4 mm
y=λD/a=1.2×10⁻³ m; दोनों ओर के निम्निष्ठों के बीच दूरी = 2y = 2.4 mm
5 यंग का द्वि-झिरी प्रयोग पहले वायु में तथा फिर वायु से भिन्न किसी माध्यम में किया जाता है। पाया जाता है कि उस माध्यम में 8वीं दीप्त फ्रिंज उसी स्थान पर बनती है जहाँ वायु में 5वीं अदीप्त फ्रिंज बनती थी। माध्यम का अपवर्तनांक लगभग कितना है?
उत्तर: 1.78
माध्यम में 8वीं दीप्त: y=8λD/(μd); वायु में 5वीं अदीप्त: y=9λD/(2d); बराबर रखने पर μ=16/9≈1.78
6 दो पोलेरॉइड P₁ व P₂ को इस प्रकार रखा गया है कि उनके अक्ष परस्पर लंबवत् हैं। अध्रुवित प्रकाश I₀, P₁ पर आपतित होता है। एक तीसरा पोलेरॉइड P₃, P₁ व P₂ के बीच इस प्रकार रखा जाता है कि इसका अक्ष P₁ के अक्ष से 45° का कोण बनाता है। P₂ से निर्गत प्रकाश की तीव्रता क्या होगी?
उत्तर: I₀/8
P₁ के बाद: I₀/2; P₃ (45°) के बाद: (I₀/2)×(1/2)=I₀/4; P₂ (P₃ से 45°) के बाद: (I₀/4)×(1/2)=I₀/8
7 10cm व्यास के दूरदर्शी की कोणीय विभेदन क्षमता 5000Å तरंगदैर्ध्य पर लगभग किस कोटि की होगी?
उत्तर: 10⁻⁶ rad की कोटि
Δθ=1.22λ/D = 1.22×5000×10⁻¹⁰/0.1 ≈ 6.1×10⁻⁶ rad
8 किसी माध्यम में प्रकाश तरंग की आवृत्ति 2×10¹⁴ Hz तथा तरंगदैर्ध्य 5000Å है। माध्यम का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर: μ = 3
v = νλ = 2×10¹⁴×5000×10⁻¹⁰ = 1×10⁸ m/s; μ = c/v = 3×10⁸/1×10⁸ = 3
9 0.02cm चौड़ाई की किसी रैखिक द्वारक को 60cm फोकस दूरी के लेंस के ठीक सामने रखा गया है। द्वारक पर 5×10⁻⁵cm तरंगदैर्ध्य का समांतर किरण-पुंज अभिलंबवत् आपतित होता है। विवर्तन पैटर्न के प्रथम अदीप्त बैंड की परदे के केंद्र से दूरी ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 0.15 cm
y = λD/a = (5×10⁻⁵×60)/0.02 = 0.15 cm
10 किसी एकल झिरी (चौड़ाई a) पर 5000Å तरंगदैर्ध्य का प्रकाश आपतित होने से बने विवर्तन पैटर्न में प्रथम निम्निष्ठ 30° के कोण पर प्रेक्षित होता है। प्रथम द्वितीयक उच्चिष्ठ किस कोण पर प्रेक्षित होगा?
उत्तर: sin⁻¹(3/4)
a sin30°=λ ⟹ a=2λ; प्रथम द्वितीयक उच्चिष्ठ: a sinθ=(3/2)λ ⟹ sinθ=(3λ)/(2a)=3/4
11 यंग के द्वि-झिरी प्रयोग में झिरियाँ 2mm अलग-अलग हैं तथा दो तरंगदैर्ध्यों λ₁=12000Å व λ₂=10000Å के प्रकाश से प्रदीप्त की जाती हैं। परदा (2m दूर) पर उभयनिष्ठ केंद्रीय दीप्त फ्रिंज से कितनी न्यूनतम दूरी पर एक व्यतिकरण पैटर्न की दीप्त फ्रिंज दूसरे पैटर्न की दीप्त फ्रिंज से संपाती होगी?
उत्तर: 6 mm
m/n = λ₂/λ₁ = 5/6 ⟹ m=5, n=6; y = mλ₁D/d = (5×12000×10⁻¹⁰×2)/(2×10⁻³) = 6 mm
➕ अतिरिक्त NEET तथ्य
सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं
- इस अध्याय से NEET में सामान्यतः 2–3 प्रश्न (8–12 अंक) पूछे जाते हैं; सर्वाधिक बार दोहराए गए विषय — यंग के द्वि-झिरी प्रयोग में फ्रिंज चौड़ाई/तीव्रता परिकलन, एकल-झिरी विवर्तन पैटर्न, मेलस के नियम से पोलेरॉइड तीव्रता, तथा दूरदर्शी की विभेदन क्षमता हैं।
- आकाश का नीला रंग — रेले प्रकीर्णन — वायुमंडलीय गैस अणुओं द्वारा सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन, तरंगदैर्घ्य की चतुर्थ घात के व्युत्क्रमानुपाती होता है (I∝1/λ⁴); नीला प्रकाश (कम तरंगदैर्घ्य) लाल से कहीं अधिक प्रबलता से प्रकीर्णित होकर आकाश को नीला रंग देता है।
- सूर्योदय/सूर्यास्त के समय सूर्य का लाल दिखना — इस समय प्रकाश वायुमंडल की अधिक मोटी परत से गुज़रता है, जिसमें अधिकांश नीला प्रकाश प्रकीर्णित होकर हट जाता है; लंबी तरंगदैर्घ्य वाला लाल प्रकाश ही सीधे आँख तक पहुँचता है।
- विवर्तन झंझरी (diffraction grating) — बहुत अधिक संख्या में समान दूरी पर बनी संकीर्ण झिरियों की व्यवस्था; झंझरी समीकरण: d sinθ = nλ; एकल-झिरी की तुलना में कहीं अधिक तीक्ष्ण विवर्तन उच्चिष्ठ देती है; वर्णक्रम-विश्लेषण में उपयोग।
- ब्रूस्टर का नियम — tan iB=μ; ब्रूस्टर कोण पर परावर्तित प्रकाश पूर्णतः रैखिक ध्रुवित होता है, तथा परावर्तित व अपवर्तित किरणें परस्पर ठीक 90° का कोण बनाती हैं।
- फ्रिंज-चौड़ाई को प्रभावित करने वाले कारक — β=λD/d; D के समानुपाती, d के व्युत्क्रमानुपाती; प्रकाश को जल (अपवर्तनांक μ) में डुबाने पर तरंगदैर्घ्य λ/μ हो जाने से फ्रिंज-चौड़ाई भी β/μ गुना घट जाती है।
- पथांतर व कलांतर के मध्य संबंध — Δφ=(2π/λ)Δx; Δx=nλ पर Δφ=2nπ (संपोषी); Δx=(n+½)λ पर Δφ=(2n+1)π (विनाशी) — यह रूपांतरण व्यतिकरण संबंधी सभी संख्यात्मक प्रश्नों की नींव है।
- यंग के प्रयोग में पतली पट्टिका डालने का प्रभाव — मोटाई t व अपवर्तनांक μ की पट्टिका किसी एक झिरी के मार्ग में रखने पर अतिरिक्त प्रकाशिक पथ (μ−1)t जुड़ जाता है; संपूर्ण फ्रिंज-पैटर्न (μ−1)tD/d दूरी से विस्थापित हो जाता है (जिस झिरी में पट्टिका रखी हो उसकी विपरीत दिशा में)।
- विवर्तन बनाम व्यतिकरण फ्रिंजों की तुलना — व्यतिकरण में सभी उच्चिष्ठों की तीव्रता व चौड़ाई लगभग समान; विवर्तन में केंद्रीय उच्चिष्ठ अन्य द्वितीयक उच्चिष्ठों से दोगुनी चौड़ाई का व अधिक तीव्र होता है।
- एकल-झिरी विवर्तन — केंद्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई — केंद्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई 2λ/a व रैखिक चौड़ाई 2λD/a होती है, जो द्वितीयक उच्चिष्ठों की चौड़ाई λD/a से ठीक दोगुनी है।
- दूरदर्शी बनाम सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता — दूरदर्शी: Δθ=1.22λ/D (D=अभिदृश्यक का द्वारक); सूक्ष्मदर्शी: संख्यात्मक द्वारक (NA) पर निर्भर; दोनों ही में लघु तरंगदैर्घ्य व बड़ा द्वारक विभेदन क्षमता बढ़ाते हैं।
- हाइगेंस के सिद्धांत में तरंगाग्र के प्रकार — बिंदु स्रोत: गोलीय; रेखा-स्रोत: बेलनाकार; अत्यंत दूर स्रोत (या लेंस के फोकस पर रखे स्रोत से निर्गत): समतल।
- प्रकीर्णन द्वारा ध्रुवण — छोटे कणों (आकार < तरंगदैर्घ्य) से प्रकीर्णित प्रकाश, संचरण दिशा के लंबवत् दिशा में देखे जाने पर आंशिक रूप से ध्रुवित होता है — सूर्य से 90° दिशा में आकाश से आने वाला प्रकाश आंशिक ध्रुवित होता है।
- कला-संबद्ध स्रोतों की अनिवार्य शर्त — दो पृथक स्वतंत्र प्रकाश स्रोत (चाहे बिल्कुल समरूप भी हों) कभी कला-संबद्ध नहीं हो सकते, क्योंकि परमाण्विक उत्सर्जन की यादृच्छिकता के कारण कलांतर तीव्रता से (~10⁻¹⁰ s कोटि में) बदलता रहता है।
- इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — यंग द्वि-झिरी के सभी सूत्र, एकल-झिरी विवर्तन पैटर्न, मेलस का नियम, क्रांतिक कोण एवं स्नेल का नियम, तथा कला-संबद्धता की अवधारणा — इन पाँचों पर विशेष ध्यान दें, इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।
? अभ्यास प्रश्न-उत्तर
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प्रश्न 10.1 589 nm तरंगदैर्घ्य का एकवर्णीय प्रकाश वायु से जल की सतह पर आपतित होता है। (a) परावर्तित तथा (b) अपवर्तित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति तथा चाल क्या होगी? जल का अपवर्तनांक 1.33 है।
λ(वायु)=589nm, n(जल)=1.33
(a) परावर्तित प्रकाश: माध्यम नहीं बदलता, अतः λ=589 nm; ν≈5.09×10¹⁴ Hz; चाल=3×10⁸ m/s (सभी अपरिवर्तित)
(b) अपवर्तित प्रकाश: ν≈5.09×10¹⁴ Hz (अपरिवर्तित); चाल v=c/n≈2.26×10⁸ m/s; λ_जल=589/1.33≈443 nm
प्रश्न 10.2 निम्नलिखित दशाओं में प्रत्येक तरंगाग्र की आकृति क्या है? (a) किसी बिंदु स्रोत से अपसरित प्रकाश। (b) उत्तल लेंस से निर्गमित प्रकाश, जिसके फोकस बिंदु पर कोई बिंदु स्रोत रखा है। (c) किसी दूरस्थ तारे से आने वाले प्रकाश तरंगाग्र का पृथ्वी द्वारा अवरोधित भाग।
(a) गोलीय (स्रोत को केंद्र मानकर)
(b) समतल (लेंस के फोकस से निकलने वाली किरणें समांतर हो जाती हैं)
(c) समतल (सन्निकटन के रूप में — तारा बहुत दूर होने से अवरोधित भाग व्यावहारिक रूप से समतल)
प्रश्न 10.3 (a) काँच का अपवर्तनांक 1.5 है। काँच में प्रकाश की चाल क्या होगी? (b) क्या काँच में प्रकाश की चाल, प्रकाश के रंग पर निर्भर करती है? यदि हाँ, तो लाल तथा बैंगनी में से कौन-सा रंग काँच के प्रिज़्म में धीमा चलता है?
(a) v=c/n=3.0×10⁸/1.5=2.0×10⁸ m/s
(b) हाँ, चाल रंग पर निर्भर करती है (विक्षेपण); बैंगनी प्रकाश का अपवर्तनांक अधिक होने से बैंगनी रंग काँच में सबसे धीमा चलता है (लाल सबसे तेज़)।
प्रश्न 10.4 यंग के द्विझिरी प्रयोग में झिरियों के बीच की दूरी 0.28 mm है तथा परदा 1.4 m की दूरी पर रखा गया है। केंद्रीय दीप्त फ्रिंज एवं चतुर्थ दीप्त फ्रिंज के बीच की दूरी 1.2 cm मापी गई है। प्रयोग में उपयोग किए गए प्रकाश की तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए।
d=0.28×10⁻³m, D=1.4m; 4β=1.2cm ⟹ β=0.3cm=3×10⁻³m
λ=βd/D=(3×10⁻³×0.28×10⁻³)/1.4=8.4×10⁻⁷/1.4
λ = 6×10⁻⁷ m = 600 nm
प्रश्न 10.5 यंग के द्विझिरी प्रयोग में, λ तरंगदैर्घ्य का एकवर्णीय प्रकाश उपयोग करने पर, परदे के एक बिंदु पर जहाँ पथांतर λ है, प्रकाश की तीव्रता K इकाई है। उस बिंदु पर प्रकाश की तीव्रता कितनी होगी जहाँ पथांतर λ/3 है?
I=4I₀cos²(φ/2); φ=(2π/λ)×पथांतर
पथांतर=λ: φ=2π ⟹ I=4I₀=K ⟹ I₀=K/4
पथांतर=λ/3: φ=2π/3 ⟹ I=4I₀cos²(π/3)=4I₀×0.25=I₀
तीव्रता = I₀ = K/4 इकाई
प्रश्न 10.6 यंग के द्विझिरी प्रयोग में व्यतिकरण फ्रिंजों को प्राप्त करने के लिए, 650 nm तथा 520 nm तरंगदैर्घ्यों के प्रकाश-पुंज का उपयोग किया गया। (a) 650 nm तरंगदैर्घ्य के लिए परदे पर तीसरे दीप्त फ्रिंज की केंद्रीय उच्चिष्ठ से दूरी ज्ञात कीजिए। (b) केंद्रीय उच्चिष्ठ से उस न्यूनतम दूरी को ज्ञात कीजिए जहाँ दोनों तरंगदैर्घ्यों के कारण दीप्त फ्रिंज संपाती होते हैं।
प्रश्न 10.4 की व्यवस्था के अनुसार d=0.28mm, D=1.4m।
(a) x₃=3λ₁D/d=(3×650×10⁻⁹×1.4)/(0.28×10⁻³)≈9.75 mm ≈ 0.975 cm
(b) n₁λ₁=n₂λ₂ ⟹ 650n₁=520n₂ ⟹ 5n₁=4n₂; न्यूनतम पूर्णांक n₁=4, n₂=5
x=n₁λ₁D/d=(4×650×10⁻⁹×1.4)/(0.28×10⁻³)≈13 mm = 1.3 cm