प्रत्यावर्ती धारा
R, L, C पर प्रयुक्त AC वोल्टता से लेकर श्रेणीबद्ध LCR परिपथ, अनुनाद, शक्ति गुणांक और ट्रांसफॉर्मर तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, फेजर आरेख, त्वरित तथ्य और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
1 भूमिका
प्रत्यावर्ती धारा — परिचय एवं उपयोगिता
अभी तक हमने दिष्टधारा (dc) स्रोतों तथा उनसे युक्त परिपथों का अध्ययन किया है। इन धाराओं की दिशा समय के साथ परिवर्तित नहीं होती। परंतु समय के साथ बदलने वाली धाराओं और वोल्टताओं का मिलना अत्यंत सामान्य बात है। हमारे घरों एवं कार्यालयों में उपलब्ध मुख्य विद्युत प्रदाय (electric mains supply) एक ऐसी ही वोल्टता का स्रोत है, जो समय के साथ ज्या फलन (sine function) की भाँति परिवर्तित होता रहता है।
ऐसी वोल्टता को प्रत्यावर्ती (ac) वोल्टता तथा किसी परिपथ में इसके द्वारा प्रवाहित धारा को प्रत्यावर्ती धारा (ac धारा) कहते हैं।
ac को क्यों वरीयता दी जाती है?
- अधिकांश विद्युत कंपनियों द्वारा बेची जाने वाली विद्युत ऊर्जा प्रत्यावर्ती धारा के रूप में ही संप्रेषित एवं वितरित की जाती है।
- ac वोल्टताओं को ट्रांसफॉर्मरों की सहायता से सरलता एवं दक्षता के साथ एक वोल्टता से दूसरी वोल्टता में बदला जा सकता है।
- ac के रूप में लंबी दूरियों तक विद्युत ऊर्जा का संप्रेषण अपेक्षाकृत कम खर्चीला पड़ता है।
- प्रत्यावर्ती धारा परिपथ कुछ ऐसे अभिलक्षण प्रदर्शित करता है (जैसे अनुनाद) जिनका उपयोग दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक युक्तियों (जैसे रेडियो समस्वरण) में किया जाता है।
- dc परिपथों में धारा की दिशा समय के साथ नहीं बदलती; ac परिपथों में धारा व वोल्टता समय के साथ ज्यावक्रीय रूप से परिवर्तित होती हैं।
- घरेलू मुख्य आपूर्ति (mains supply) एक ac वोल्टता स्रोत है जो ज्या फलन (sine function) की तरह बदलती है।
- dc की तुलना में ac को वरीयता देने का मुख्य कारण: ट्रांसफॉर्मर द्वारा सरल रूपांतरण तथा लंबी दूरी पर कम खर्चीला संप्रेषण।
- "वोल्टता" शब्द का अर्थ है — दो बिंदुओं के बीच विभवांतर।
2 प्रतिरोधक पर प्रयुक्त ac वोल्टता
शुद्ध प्रतिरोधक में धारा एवं वोल्टता का संबंध
मान लीजिए किसी ac स्रोत ε से एक शुद्ध प्रतिरोधक R जुड़ा है। स्रोत अपने सिरों के बीच ज्यावक्रीय रूप से परिवर्तनशील विभवांतर उत्पन्न करता है:
यहाँ vm दोलायमान विभवांतर का आयाम तथा ω इसकी कोणीय आवृत्ति है। किरखोफ के लूप नियम ∑ε(t) = 0 को लागू करने पर vm sin ωt = iR, अर्थात:
समीकरण (7.3) ओम का नियम है, जो प्रतिरोधकों के प्रकरण में ac एवं dc दोनों प्रकार की वोल्टताओं के लिए समान रूप से लागू होता है।
शक्ति क्षय व rms धारा
चूँकि जूल तापन i²R द्वारा व्यक्त होता है और i² (जो सदैव धनात्मक ही होता है, चाहे i धनात्मक हो या ऋणात्मक) पर निर्भर करता है, अतः जब किसी प्रतिरोधक से ac धारा प्रवाहित होती है तो जूल तापन एवं वैद्युत ऊर्जा का क्षय अवश्य होता है।
एक समय चक्र में इसका माध्य मान ज्ञात करने पर (क्योंकि <sin²ωt> = 1/2):
dc शक्ति (P = I²R) की भाँति ही व्यक्त करने के लिए धारा के एक विशिष्ट मान का उपयोग किया जाता है, जिसे वर्ग माध्य मूल (root mean square, rms) अथवा प्रभावी (effective) धारा कहते हैं और इसे Irms अथवा I से निर्दिष्ट करते हैं:
V = vm/√2 = 0.707 vm (7.8)
V = IR (7.9)
rms धारा उस dc धारा के समतुल्य है जो वही माध्य शक्ति ह्रास करेगी जो प्रत्यावर्ती धारा करती है। परंपरा यह है कि ac राशियों को सदैव उनके rms मानों के पदों में मापा और व्यक्त किया जाता है — उदाहरणार्थ, घरेलू आपूर्ति में "220 V" कहा जाने वाला मान वास्तव में rms मान है, जिसका शिखर मान vm = √2 × 220 V ≈ 311 V है।
एक विद्युत बल्ब 220 V आपूर्ति पर 100 W शक्ति देने के लिए बनाया गया है। (a) बल्ब का प्रतिरोध; (b) स्रोत की शिखर वोल्टता एवं (c) बल्ब में प्रवाहित होने वाली rms धारा ज्ञात कीजिए।
(b) vm = √2 V = √2 × 220 = 311 V
(c) चूँकि P = IV ⇒ I = P/V = 100/220 = 0.450 A
- शुद्ध प्रतिरोधक में धारा व वोल्टता समान कला में होती हैं (कलांतर = 0°)।
- im = vm/R — यह ac व dc दोनों के लिए ओम के नियम जैसा ही सूत्र है।
- एक पूरे चक्र में तात्क्षणिक धारा का माध्य शून्य होता है, पर माध्य शक्ति शून्य नहीं होती।
- rms (वर्ग माध्य मूल) धारा: I = im/√2 = 0.707 im; rms वोल्टता: V = vm/√2 = 0.707 vm।
- rms धारा उस dc धारा के तुल्य है जो समान माध्य शक्ति क्षय करेगी।
- माध्य शक्ति P = I²R = V²/R = IV।
- ac राशियों को परंपरा अनुसार सदैव उनके rms मान में व्यक्त किया जाता है (जैसे 220 V घरेलू आपूर्ति)।
- घरेलू आपूर्ति 220 V (rms) का शिखर मान ≈ 311 V होता है।
चुंबकीय क्षेत्र को घुमाने का उनका विचार ही व्यावहारिक रूप से समस्त प्रत्यावर्ती धारा मशीनों का आधार बना, जिससे विद्युत शक्ति के युग में प्रवेश संभव हुआ। प्रेरण मोटर, ac शक्ति की बहुफेज़ प्रणाली तथा उच्च आवृत्ति प्रेरण कुंडली (टेस्ला कुंडली) का आविष्कार भी उन्होंने किया। चुंबकीय क्षेत्र के SI मात्रक का नाम उनके सम्मान में रखा गया है।
3 ac धारा एवं वोल्टता का घूर्णी सदिश द्वारा निरूपण — कलासमंजक (फेजर्स)
फेजर की अवधारणा एवं उपयोगिता
प्रतिरोधक में धारा तथा वोल्टता समान कला में रहते हैं, परंतु प्रेरक, संधारित्र अथवा इनके संयोजन युक्त परिपथों में ऐसा नहीं होता। ac परिपथ में धारा एवं वोल्टता के बीच कला संबंध दर्शाने के लिए फेजर्स की धारणा का उपयोग करते हैं।
फेजर एक सदिश है जो मूल बिंदु के परितः कोणीय वेग ω से घूर्णन करता है। फेजर के ऊर्ध्वाधर घटक ज्यावक्रीय रूप से परिवर्तनशील राशियाँ v एवं i निरूपित करते हैं। फेजर्स V एवं I के परिमाण इन दोलायमान राशियों के आयाम अथवा शिखरमान vm एवं im निरूपित करते हैं।
किसी प्रतिरोधक के सिरों से जुड़ी ac वोल्टता की, किसी क्षण t₁ पर, वोल्टता एवं धारा के फेजर्स समान दिशा में होते हैं — यह हर समय होता है। इसका अर्थ है कि वोल्टता एवं धारा के बीच कला कोण शून्य होता है।
- फेजर एक ऐसा सदिश है जो मूल बिंदु के परितः कोणीय वेग ω से वामावर्त (counter-clockwise) घूर्णन करता है।
- फेजर का ऊर्ध्वाधर प्रक्षेप उस क्षण विशेष पर संबंधित राशि (v या i) का तात्क्षणिक मान देता है।
- फेजर का परिमाण संबंधित राशि का आयाम (शिखरमान) होता है।
- फेजर्स स्वयं सदिश नहीं, बल्कि आवर्ती रूप से परिवर्तित होने वाली अदिश राशियों का सुविधाजनक निरूपण मात्र हैं।
- प्रतिरोधक के लिए V एवं I फेजर्स सदैव एक ही दिशा में होते हैं (कलांतर = 0)।
4 प्रेरक पर प्रयुक्त ac वोल्टता
प्रेरक में धारा विलंब एवं प्रेरकीय प्रतिघात
मान लीजिए एक शुद्ध प्रेरक L (जिसका प्रतिरोध नगण्य है) के सिरों पर ac स्रोत v = vm sin ωt लगाया गया है। किरखोफ लूप नियम के अनुसार:
di/dt को समय के सापेक्ष समाकलित करने तथा समाकलन नियतांक को शून्य लेने पर (क्योंकि धारा भी सममितीय रूप से दोलन करती है):
स्रोत वोल्टता एवं प्रेरक में प्रवाहित धारा की तुलना से यह ज्ञात होता है कि धारा वोल्टता से π/2 (अथवा 1/4 चक्र) पीछे रहती है। जब उन्हें ω आवृत्ति से वामावर्त दिशा में घूर्णन कराते हैं तो फेजर आरेख में धारा फेजर I, वोल्टता फेजर V से π/2 पीछे दिखाई देता है।
प्रेरक में शक्ति क्षय
प्रेरक को आपूर्त तात्क्षणिक शक्ति pL = iv = −(imvm/2) sin(2ωt) होती है। चूँकि एक पूरे चक्र में sin(2ωt) का माध्य शून्य होता है, अतः:
25.0 mH का एक शुद्ध प्रेरक 220 V के एक स्रोत से जुड़ा है। यदि स्रोत की आवृत्ति 50 Hz हो तो परिपथ का प्रेरकीय प्रतिघात एवं rms धारा ज्ञात कीजिए।
I = V/XL = 220/7.85 = 28 A
एक प्रकाश बल्ब और एक सरल कुंडली प्रेरक, एक कुंजी सहित, ac स्रोत से जोड़े गए हैं। स्विच को बंद कर दिया गया है और कुछ समय पश्चात एक लोहे की छड़ प्रेरक कुंडली के अंदर प्रविष्ट कराई जाती है। छड़ को प्रविष्ट कराते समय प्रकाश बल्ब की चमक का क्या होगा?
- शुद्ध प्रेरक में धारा, वोल्टता से π/2 पीछे रहती है (धारा विलंबित/lag करती है)।
- प्रेरकीय प्रतिघात XL = ωL — यह प्रतिरोध जैसी भूमिका निभाता है, इसका SI मात्रक भी ओम (Ω) है।
- XL, आवृत्ति ω व प्रेरकत्व L के अनुक्रमानुपाती होता है — dc (ω=0) पर XL शून्य होता है, अर्थात प्रेरक dc के लिए शॉर्ट-सर्किट जैसा व्यवहार करता है।
- im = vm/XL।
- एक पूरे चक्र में प्रेरक को आपूर्त माध्य शक्ति शून्य होती है — इसमें प्रवाहित धारा को वाटहीन धारा कहते हैं।
- लोहे की छड़ कुंडली में डालने से प्रेरकत्व व प्रतिघात बढ़ता है, जिससे परिपथ में बल्ब की चमक घटती है।
5 संधारित्र पर प्रयुक्त ac वोल्टता
संधारित्र में धारा अग्रता एवं धारितीय प्रतिघात
माना किसी क्षण t पर संधारित्र पर आवेश q है। संधारित्र के सिरों के बीच तात्क्षणिक वोल्टता v = q/C है। किरखोफ लूप नियम से vm sin ωt = q/C। धारा i = dq/dt का उपयोग करने पर:
यहाँ धारा, वोल्टता से π/2 अग्रगामी है। फेजर आरेख में धारा फेजर I, वोल्टता फेजर V से π/2 कोण अग्रगामी होता है जब वे वामावर्त घूर्णन करते हैं।
प्रेरक के समान ही, संधारित्र को भी एक पूरे चक्र में आपूर्त माध्य शक्ति शून्य होती है — यहाँ भी धारा वाटहीन होती है।
एक लैंप किसी संधारित्र के साथ श्रेणीक्रम में जुड़ा है। dc एवं ac संयोजनों के लिए अपने प्रेक्षणों की प्रागुक्ति कीजिए। प्रत्येक प्रकरण में बताइए कि संधारित्र की धारिता कम करने का क्या प्रभाव होगा?
15.0 µF का एक संधारित्र, 220 V, 50 Hz स्रोत से जोड़ा गया है। परिपथ का संधारित्रीय प्रतिघात और इसमें प्रवाहित होने वाली (rms एवं शिखर) धारा का मान बताइए। यदि आवृत्ति को दोगुना कर दिया जाए तो प्रभाव?
I = V/XC = 220/212 = 1.04 A (rms); im = √2×I = 1.47 A (शिखर)
आवृत्ति दोगुनी होने पर XC आधा रह जाता है, अतः धारा दोगुनी हो जाती है।
- शुद्ध संधारित्र में धारा, वोल्टता से π/2 आगे रहती है (धारा अग्रगामी/lead करती है)।
- धारितीय प्रतिघात XC = 1/ωC — आवृत्ति व धारिता के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- dc (ω=0) पर XC अनंत होता है — इसीलिए dc में संधारित्र पूर्ण आवेशन के बाद धारा प्रवाह रोक देता है।
- आवृत्ति बढ़ने पर XC घटता है, धारा बढ़ती है; आवृत्ति घटने पर विपरीत होता है।
- एक पूरे चक्र में संधारित्र को आपूर्त माध्य शक्ति भी शून्य होती है (वाटहीन धारा)।
- याद रखने की तरकीब — "CIVIL": संधारित्र (C) में धारा (I) वोल्टता (V) से आगे है; प्रेरक (L) में धारा (I) वोल्टता (V) से पीछे है।
6 श्रेणीबद्ध LCR परिपथ पर प्रयुक्त ac वोल्टता
तीनों अवयवों का संयोजन एवं प्रतिबाधा
किसी ac स्रोत ε से जुड़े श्रेणीबद्ध LCR परिपथ के लिए, यदि संधारित्र पर आवेश q एवं परिपथ में प्रवाहित धारा i है, तो किरखोफ पाश नियम से:
फेजर आरेख द्वारा हल
चूँकि R, L, C श्रेणीक्रम में जुड़े हैं, किसी क्षण विशेष पर परिपथ के हर घटक में ac धारा, उसके आयाम एवं कला में समान है। माना i = im sin(ωt+φ)। प्रेरक, प्रतिरोधक, संधारित्र एवं स्रोत के सिरों के बीच वोल्टताओं को क्रमशः VL, VR, VC, एवं V से निरूपित करें। हम जानते हैं VR, I के समांतर है; VC धारा I से π/2 रेडियन पीछे है; तथा VL, I से π/2 रेडियन आगे है।
चूँकि VC एवं VL सदैव विपरीत दिशाओं में होते हैं, इन्हें एकल फेजर (VC+VL) के रूप में संयोजित किया जाता है जिसका परिमाण |vCm − vLm| है। V इस समकोण त्रिभुज के कर्ण से निरूपित होता है जिसकी भुजाएँ VR एवं (VC+VL) हैं। पाइथागोरस प्रमेय द्वारा:
महत्वपूर्ण नियम: यदि XC > XL, φ धनात्मक होता है तथा परिपथ का धारितात्मक व्यवहार प्रधान हो जाता है — परिणामतः परिपथ में धारा स्रोत वोल्टता से अग्र (लीड) हो जाती है। यदि XC < XL, φ ऋणात्मक होता है तथा परिपथ का प्रेरकीय व्यवहार प्रमुख हो जाता है — परिणामतः परिपथ में धारा स्रोत वोल्टता से पश्च (लैग) हो जाती है।
एक 200 Ω प्रतिरोधक एवं एक 15.0 µF संधारित्र, किसी 220 V, 50 Hz ac स्रोत से श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। (a) परिपथ में धारा की गणना कीजिए। (b) प्रतिरोधक एवं संधारित्र के सिरों के बीच (rms) वोल्टता की गणना कीजिए। क्या इन वोल्टताओं का बीजगणितीय योग स्रोत वोल्टता से अधिक है? यदि हाँ, तो इस विरोधाभास का निराकरण कीजिए।
I = V/Z = 220/291.5 = 0.755 A
VR = IR = 151 V; VC = IXC = 160.3 V — इनका बीजगणितीय योग 311.3 V, जो स्रोत वोल्टता 220 V से अधिक है!
निराकरण: VR व VC के बीच 90° का कलांतर है, अतः इन्हें साधारण संख्याओं की तरह नहीं जोड़ा जा सकता — इनके योग का परिमाण पाइथागोरस प्रमेय से: V = √(VR²+VC²) = 220 V, जो स्रोत वोल्टता के बराबर ही है।
- श्रेणी LCR परिपथ के सभी अवयवों में समान धारा प्रवाहित होती है।
- प्रतिबाधा Z = √[R² + (XC−XL)²] — यह ओम में मापी जाती है।
- tan φ = (XC−XL)/R — कला कोण का चिह्न बताता है कि परिपथ प्रेरकीय है या धारितात्मक।
- XC > XL ⇒ धारितात्मक परिपथ ⇒ धारा वोल्टता से आगे (लीड)।
- XC < XL ⇒ प्रेरकीय परिपथ ⇒ धारा वोल्टता से पीछे (लैग)।
- विभिन्न अवयवों के सिरों की वोल्टताओं को जोड़ते समय सदैव कलांतर का ध्यान रखें — साधारण बीजगणितीय योग नहीं, फेजर योग (पाइथागोरस विधि) प्रयोग करें।
अनुनाद (Resonance)
श्रेणीबद्ध RLC परिपथ का एक रोचक अभिलक्षण अनुनाद की परिघटना है। अनुनाद ऐसे सभी निकायों की एक सामान्य परिघटना है जिनमें एक विशिष्ट आवृत्ति से दोलन की प्रवृत्ति होती है — यह आवृत्ति निकाय की प्राकृतिक आवृत्ति कहलाती है। यदि इस प्रकार का कोई निकाय किसी ऐसे ऊर्जा स्रोत द्वारा संचालित हो जिसकी आवृत्ति निकाय की प्राकृतिक आवृत्ति के सन्निकट हो तो निकाय बहुत अधिक आयाम के साथ दोलन करता हुआ पाया जाता है। (जैसे झूले पर बैठा बच्चा — यदि खींचने की आवृत्ति झूले की प्राकृतिक आवृत्ति के बराबर हो तो झूलने का आयाम अधिक होगा।)
इस आवृत्ति पर प्रतिबाधा न्यूनतम (Z = R) हो जाती है और धारा का आयाम अधिकतम होता है: im = vm/R।
पूर्व उदाहरण (7.8) में वर्णित स्रोत की आवृत्ति परिवर्तनशील है। (a) किस आवृत्ति पर अनुनाद होगा? (b) अनुनाद की अवस्था में प्रतिबाधा, धारा एवं क्षयित शक्ति की गणना कीजिए। (R=3Ω, L=25.48mH, C=796µF)
अनुनाद पर Z = R = 3 Ω; rms धारा = V/R = (283/√2)/3 = 66.7 A
शक्ति क्षय P = I²R = (66.7)²×3 = 13.35 kW
किसी हवाई अड्डे पर सुरक्षा कारणों से, किसी व्यक्ति को धातु-संसूचक (metal detector) के द्वार पथ से गुजारा जाता है। यदि उसके पास कोई धातु से बनी वस्तु है, तो धातु संसूचक से एक ध्वनि निकलने लगती है। यह संसूचक किस सिद्धांत पर कार्य करता है?
- अनुनाद पर XL = XC ⇒ ω₀ = 1/√(LC) — इस आवृत्ति को अनुनादी आवृत्ति कहते हैं।
- अनुनाद पर प्रतिबाधा न्यूनतम व केवल R के बराबर होती है: Z = R।
- अनुनाद पर धारा का आयाम अधिकतम होता है: im = vm/R।
- अनुनाद के लिए परिपथ में L और C दोनों का होना आवश्यक है — RL या RC परिपथ में अनुनाद असंभव है।
- R का मान जितना कम होगा, अनुनाद वक्र उतना ही तीक्ष्ण (sharp) व ऊँचा होगा।
- अनुनाद का प्रमुख अनुप्रयोग: रेडियो/टीवी सेटों का समस्वरण (tuning)।
- धातु संसूचक (metal detector) भी अनुनाद के सिद्धांत पर कार्य करता है।
7 ac परिपथों में शक्ति: शक्ति गुणांक
माध्य शक्ति एवं शक्ति गुणांक की अवधारणा
श्रेणीबद्ध RLC परिपथ में प्रयुक्त कोई वोल्टता v = vm sin ωt इस परिपथ में धारा i = im sin(ωt+φ) प्रवाहित करती है। स्रोत द्वारा आपूर्त तात्क्षणिक शक्ति p = vi का एक पूरे चक्र में माध्य लेने पर:
क्षयित माध्य शक्ति न केवल वोल्टता एवं धारा पर निर्भर करती है, बल्कि उनके बीच के कला-कोण की कोज्या (cosine) पर भी निर्भर करती है। राशि cos φ को शक्ति गुणांक (Power Factor) कहा जाता है।
| प्रकरण | φ | cos φ | शक्ति क्षय |
|---|---|---|---|
| (i) प्रतिरोधकीय परिपथ (केवल शुद्ध R) | 0 | 1 | अधिकतम शक्ति क्षय |
| (ii) शुद्ध प्रेरकीय अथवा धारितीय परिपथ | π/2 | 0 | कोई शक्ति क्षय नहीं (वाटहीन धारा) |
| (iii) श्रेणीबद्ध LCR परिपथ (सामान्य) | tan⁻¹[(XC−XL)/R] | शून्येतर हो सकता है | केवल प्रतिरोधक में शक्ति क्षय |
| (iv) LCR परिपथ — अनुनाद अवस्था | 0 (चूँकि XC=XL) | 1 | अधिकतम शक्ति (P = I²R) क्षयित |
(a) विद्युत शक्ति के परिवहन के लिए प्रयुक्त होने वाले परिपथों में निम्न शक्ति गुणांक, संप्रेषण में अधिक ऊर्जा का क्षय होगा, निर्दिष्ट करता है। कारण समझाइए। (b) परिपथ का शक्ति गुणांक, प्रायः परिपथ में उपयुक्त मान के संधारित्र का उपयोग करके सुधारा जा सकता है — यह तथ्य समझाइए।
(b) यदि किसी परिपथ में धारा I, वोल्टता से φ कोण पीछे रहती है तो cos φ = R/Z होता है। धारा I को दो घटकों में विभाजित करने पर — Ip (वोल्टता की दिशा में, "शक्ति घटक") तथा Iq (वोल्टता की लंबवत दिशा में, "वाटहीन घटक")। शक्ति गुणांक को 1 की ओर सुधारने के लिए, पश्चगामी वाटहीन धारा Iq को उसी के बराबर अग्रगामी वाटहीन धारा I′q द्वारा उदासीन करना पड़ता है — इसके लिए उपयुक्त मान का संधारित्र समांतर क्रम में संयोजित करना होता है।
283 V शिखर वोल्टता एवं 50 Hz आवृत्ति की एक ज्यावक्रीय वोल्टता एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ से जुड़ी है जिसमें R = 3 Ω, L = 25.48 mH, एवं C = 796 µF है। ज्ञात कीजिए (a) परिपथ की प्रतिबाधा; (b) कला-अंतर; (c) परिपथ में होने वाला शक्ति-क्षय; एवं (d) शक्ति गुणांक।
(a) Z = √[3² + (8−4)²] = 5 Ω
(b) φ = tan⁻¹[(4−8)/3] = −53.1° (ऋणात्मक ⇒ धारा वोल्टता से पीछे)
(c) I = im/√2 = (283/5)/√2 = 40 A; P = I²R = (40)²×3 = 4800 W
(d) शक्ति गुणांक = cos(−53.1°) = 0.6
- माध्य शक्ति P = VI cos φ; इसे P = I²Z cos φ के रूप में भी लिखा जा सकता है।
- शक्ति गुणांक cos φ, 0 से 1 के बीच होता है।
- शुद्ध R परिपथ ⇒ cos φ = 1 (अधिकतम शक्ति क्षय); शुद्ध L या C परिपथ ⇒ cos φ = 0 (कोई शक्ति क्षय नहीं)।
- अनुनाद पर LCR परिपथ में cos φ = 1 तथा P = I²R (अधिकतम शक्ति क्षय)।
- निम्न शक्ति गुणांक होने पर, वांछित शक्ति देने हेतु अधिक धारा चाहिए, जिससे I²R हानि बढ़ती है।
- शक्ति गुणांक को उपयुक्त धारिता का संधारित्र समांतर क्रम में जोड़कर सुधारा जा सकता है।
- शुद्ध L व C में प्रवाहित धारा को "वाटहीन धारा" कहा जाता है।
8 ट्रांसफॉर्मर
अन्योन्य प्रेरण पर आधारित वोल्टता रूपांतरण युक्ति
अनेक उद्देश्यों के लिए ac वोल्टता को एक मान से दूसरे अधिक या कम मान में परिवर्तित करना (या रूपांतरित करना) आवश्यक हो जाता है। ऐसा अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर आधारित एक युक्ति के द्वारा किया जाता है जिसे ट्रांसफॉर्मर कहते हैं।
ट्रांसफॉर्मर में दो कुंडलियाँ होती हैं जो एक दूसरे से विद्युतरुद्ध होती हैं तथा एक कोमल-लौह-क्रोड पर लिपटी होती हैं। एक कुंडली को प्राथमिक कुंडली (primary coil) कहते हैं (Np लपेटे), दूसरी को द्वितीयक कुंडली (secondary coil) कहते हैं (Ns लपेटे)।
प्राथमिक कुंडली के सिरों के बीच प्रत्यावर्ती वोल्टता लगाने से परिणामी धारा एक प्रत्यावर्ती चुंबकीय फ्लक्स उत्पन्न करती है जो द्वितीयक कुंडली से संयोजित होकर उसके सिरों के बीच emf प्रेरित करता है। आदर्श ट्रांसफॉर्मर मानकर (जिसका प्राथमिक प्रतिरोध नगण्य है, पूरा फ्लक्स दोनों कुंडलियों से गुजरता है):
100% दक्षता मानने पर (कोई ऊर्जा क्षय नहीं), निवेशी शक्ति = निर्गत शक्ति ⇒ ipvp = isvs। इसे संयोजित करने पर:
| प्रकार | फेरों की स्थिति | वोल्टता | धारा |
|---|---|---|---|
| उच्चायी (Step-up) | Ns > Np | बढ़ जाती है (Vs > Vp) | घट जाती है (Is < Ip) |
| अपचायी (Step-down) | Ns < Np | घट जाती है (Vs < Vp) | बढ़ जाती है (Is > Ip) |
उदाहरण: यदि किसी ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुंडली में 100 एवं द्वितीयक कुंडली में 200 फेरे हों तो Ns/Np = 2। अतः 220 V, 10 A का निवेश, बढ़कर 440 V का निर्गम 5.0 A पर देगा।
वास्तविक ट्रांसफॉर्मरों में ऊर्जा क्षय के कारण
- फ्लक्स क्षरण: क्रोड के खराब अभिकल्पन या वायु रिक्ति के कारण प्राथमिक का समस्त फ्लक्स द्वितीयक से नहीं गुजरता। — निवारण: कुंडलियों को एक-दूसरे के ऊपर लपेटना।
- कुंडलनों का प्रतिरोध: तारों में उत्पन्न ऊष्मा (I²R) के कारण ऊर्जा क्षय। — निवारण: मोटे तार का उपयोग।
- भँवर धाराएँ (Eddy currents): प्रत्यावर्ती चुंबकीय फ्लक्स, लौह-क्रोड में भँवर धाराएँ प्रेरित करके इसे गर्म कर देता है। — निवारण: स्तरित (laminated) क्रोड का उपयोग।
- शैथिल्य (Hysteresis): क्रोड का चुंबकन बार-बार उत्क्रमित होने से ऊर्जा ऊष्मा के रूप में क्षय होती है। — निवारण: कम शैथिल्य वाला पदार्थ प्रयोग करना।
दिष्टधारा की तुलना में प्रत्यावर्ती धारा के प्रमुख पक्षधर। अतः दिष्टधारा के समर्थक थॉमस अल्वा एडिसन से उनका सीधा संघर्ष हुआ। वेस्टिंगहाउस का पूर्ण विश्वास था कि प्रत्यावर्ती धारा प्रौद्योगिकी के हाथ में ही वैद्युतीय भविष्य की कुंजी है। उन्होंने अपने नाम वाली प्रसिद्ध कंपनी की स्थापना की और निकोला टेस्ला एवं अन्य आविष्कारकों को प्रत्यावर्ती धारा मोटरों एवं उच्च वोल्टता पर विद्युत धारा के संप्रेषण संबंधी उपकरणों के विकास के लिए नियुक्त किया।
- ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है, और केवल ac के लिए काम करता है।
- Vs/Vp = Ns/Np (आदर्श ट्रांसफॉर्मर के लिए)।
- Is/Ip = Np/Ns — अर्थात धारा का अनुपात वोल्टता अनुपात का व्युत्क्रम होता है।
- Ns > Np ⇒ उच्चायी ट्रांसफॉर्मर; Ns < Np ⇒ अपचायी ट्रांसफॉर्मर।
- ट्रांसफॉर्मर ऊर्जा संरक्षण के नियम का उल्लंघन नहीं करता।
- अच्छी तरह अभिकल्पित ट्रांसफॉर्मर की दक्षता 95% से अधिक होती है।
- ऊर्जा क्षय के चार कारण: फ्लक्स क्षरण, कुंडलनों का प्रतिरोध, भँवर धाराएँ, शैथिल्य।
- दूरसंचरण के लिए वोल्टता उच्चायित की जाती है ताकि I²R हानि कम हो।
✓ सारांश व सूत्र-सूची
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
rms मान
I = im/√2 = 0.707 im; V = vm/√2 = 0.707 vm
शुद्ध प्रतिरोधक
v व i समान कला में; im = vm/R; P = I²R
शुद्ध प्रेरक
i, v से π/2 पीछे; XL = ωL; औसत शक्ति शून्य
शुद्ध संधारित्र
i, v से π/2 आगे; XC = 1/ωC; औसत शक्ति शून्य
श्रेणी LCR प्रतिबाधा
Z = √[R² + (XC−XL)²]; tan φ = (XC−XL)/R
अनुनाद
ω₀ = 1/√(LC); Z = R; im = vm/R
माध्य शक्ति
P = VI cos φ; cos φ = R/Z
ट्रांसफॉर्मर
Vs/Vp = Ns/Np; Is/Ip = Np/Ns
CIVIL नियम
C में I, V से आगे; L में I, V से पीछे
📊 भौतिक राशियाँ तालिका
प्रतीक, मात्रक एवं सूत्र
| भौतिक राशि | प्रतीक | मात्रक | सूत्र / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| rms वोल्टता | Vrms | V | Vrms = vm/√2 = 0.707 vm |
| rms धारा | Irms | A | Irms = im/√2 = 0.707 im |
| प्रेरकीय प्रतिघात | XL | Ω | XL = ωL |
| धारितीय प्रतिघात | XC | Ω | XC = 1/ωC |
| प्रतिबाधा | Z | Ω | Z = √[R² + (XC−XL)²] |
| अनुनादी आवृत्ति | ω₀ | rad/s | ω₀ = 1/√(LC) |
| कला कोण | φ | — | tan φ = (XC−XL)/R |
| माध्य शक्ति | P | W | P = VI cos φ = I²Z cos φ |
| शक्ति गुणांक | cos φ | विमाहीन | cos φ = R/Z |
| ट्रांसफॉर्मर वोल्टता अनुपात | Vs/Vp | — | Vs/Vp = Ns/Np |
| ट्रांसफॉर्मर धारा अनुपात | Is/Ip | — | Is/Ip = Np/Ns |
★ NEET फैक्ट-शीट
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| AC आपूर्ति (भारत) | 220 V, 50 Hz (rms मान); शिखर ≈ 311 V |
| rms और शिखर का संबंध | Vrms = vm/√2; Irms = im/√2 |
| शुद्ध R में कलांतर | 0° (समान कला) |
| शुद्ध L में कलांतर | धारा π/2 पीछे |
| शुद्ध C में कलांतर | धारा π/2 आगे |
| XL | ωL (आवृत्ति के अनुक्रमानुपाती) |
| XC | 1/ωC (आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती) |
| श्रेणी LCR प्रतिबाधा | Z = √[R² + (XC−XL)²] |
| अनुनाद आवृत्ति | ω₀ = 1/√(LC) |
| अनुनाद पर प्रतिबाधा | Z = R (न्यूनतम) |
| शुद्ध L व C में औसत शक्ति | शून्य (वाटहीन धारा) |
| माध्य शक्ति | P = VI cos φ |
| शक्ति गुणांक | cos φ = R/Z |
| ट्रांसफॉर्मर वोल्टता | Vs/Vp = Ns/Np |
| ट्रांसफॉर्मर धारा | Is/Ip = Np/Ns |
| ट्रांसफॉर्मर ऊर्जा क्षय | फ्लक्स क्षरण, प्रतिरोध, भँवर धाराएँ, शैथिल्य |
| CIVIL स्मरण नियम | C में I आगे; L में I पीछे |
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ को V = 220 sin(2×10³t) V के AC स्रोत से जोड़ा गया है, जहाँ L=10 mH, C=25 µF तथा R=100 Ω हैं। परिपथ में धारा का शिखर मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 2.2 A
ω=2×10³; XL=ωL=20Ω; XC=1/ωC=20Ω। XL=XC ⇒ परिपथ अनुनाद पर, Z=R=100Ω। I₀=220/100=2.2 A
2 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में R=1kΩ, C=0.1 µF तथा L=1 mH हैं। परिपथ की अनुनाद-आवृत्ति (Hz में) ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 15.9 kHz
LC=10⁻¹⁰; √(LC)=10⁻⁵; f₀=1/(2π×10⁻⁵)≈15.9 kHz (R का कोई प्रभाव नहीं)
3 किसी AC स्रोत की धारा का शिखर मान 5 A तथा आवृत्ति 60 Hz है। धारा को शून्य से अपने शिखर मान तक पहुँचने में लगने वाला समय ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 4.2 ms
T=1/60 s; t=T/4=1/240≈4.2 ms
4 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में R=20Ω, XC=25Ω, XL=45Ω हैं, तथा यह 220V, 50Hz की AC आपूर्ति से जुड़ा है। परिपथ में rms धारा तथा कलांतर ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 7.78 A, 45°
X=XL−XC=20Ω (प्रेरकीय); Z=√(400+400)=28.28Ω; I=220/28.28≈7.78 A; tanφ=1 ⇒ φ=45°
5 किसी श्रेणीबद्ध परिपथ में एक शुद्ध प्रेरक (L) से धारा i=I₀sinωt प्रवाहित हो रही है। प्रेरक के आर-पार तात्क्षणिक विभवांतर के लिए सही व्यंजक चुनिए।
उत्तर: V = I₀ωL cos(ωt)
V=L(di/dt)=I₀ωL cosωt — विभवांतर धारा से 90° आगे
6 एक आदर्श उन्नायी ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुंडली में 220V दी जाती है, द्वितीयक से 11000V, 88W प्राप्त होता है। द्वितीयक धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 8 mA
Is=P/Vs=88/11000=0.008 A=8 mA
7 एक LR परिपथ में संधारित्र पर आवेश Q=Q₀e^(−Rt/2L) के अनुसार क्षय होता है, जहाँ R=1.5Ω, L=12mH हैं। आवेश को प्रारंभिक मान के आधे तक पहुँचने में लगने वाला समय ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 11.1 ms
t=2L·ln2/R = (2×0.012×0.693)/1.5 ≈ 11.1 ms
8 एक आदर्श ट्रांसफार्मर के लिए प्राथमिक व द्वितीयक फेरों का अनुपात Np:Ns = 1:2 है। द्वितीयक व प्राथमिक वोल्टता का अनुपात (Vs:Vp) ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 2 : 1
Vs/Vp = Ns/Np = 2 (उन्नायी ट्रांसफार्मर)
9 एक 10 µF का संधारित्र, 210V, 50Hz की AC आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में शिखर धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 0.93 A
ω=314 rad/s; XC=1/(314×10⁻⁵)≈318.5Ω; V₀=210√2≈296.9V; I₀=296.9/318.5≈0.93 A
10 किसी AC परिपथ में अधिकतम शक्ति व्यय होती है, यदि परिपथ में हो:
उत्तर: केवल प्रतिरोधक (R)
शुद्ध R में φ=0, cosφ=1 — अधिकतम शक्ति व्यय; L या C में φ=90°, cosφ=0 — शून्य।
11 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में L=10 mH, C=1 µF तथा R=100 Ω हैं। परिपथ की अनुनाद-आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 1.59 kHz
f₀ = 1/(2π√(LC)) = 1/(2π×10⁻⁴) ≈ 1.59 kHz
12 एक 12V, 60W का लैंप, किसी उतारी ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली से जुड़ा है, जिसकी प्राथमिक कुंडली 220V AC मुख्य आपूर्ति से जुड़ी है। प्राथमिक कुंडली में प्रवाहित धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 0.27 A
Pp=Ps=60W; Ip=60/220≈0.27 A
13 एक शुद्ध संधारित्र वाले AC परिपथ में, यदि स्रोत की आवृत्ति घटा दी जाए, तो परिपथ में प्रवाहित धारा के परिमाण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: धारा घटेगी
XC=1/ωC — आवृत्ति घटने पर XC बढ़ता है, अतः धारा घटती है।
14 4 µH प्रेरकत्व वाले किसी प्रेरक में 2A धारा प्रवाहित हो रही है। इसमें संचित चुंबकीय ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 8 µJ
U=½LI²=½×4×10⁻⁶×4=8×10⁻⁶ J=8 µJ
15 अभिकथन (A): शुद्ध संधारित्र वाले AC परिपथ में, धारा विभवांतर से आगे रहती है। तर्क (R): शुद्ध संधारित्र में धारा व विभवांतर के बीच कलांतर π होता है। सही विकल्प चुनिए।
उत्तर: A सत्य है, परंतु R असत्य है
A सही है, पर सही कलांतर π/2 है, π नहीं।
16 2 mH प्रेरकत्व वाले एक प्रेरक को 220V, 50Hz की AC आपूर्ति से जोड़ा गया है। यदि इसके स्थान पर 220V की DC आपूर्ति जोड़ी जाए, तो प्रतिघात ज्ञात कीजिए।
उत्तर: X₁ ≈ 0.628 Ω (AC); X₂ = 0 (DC)
X₁=ωL=2π×50×2×10⁻³≈0.628Ω; DC के लिए ω=0, अतः X₂=0
17 एक फिलामेंट लैंप, 200V AC आपूर्ति पर 100W की शक्ति खींचता है। इसमें प्रवाहित शिखर धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 0.707 A
Irms=100/200=0.5 A; I₀=0.5×√2≈0.707 A
18 AC स्रोत का शिखर वोल्टता, फेजर आरेख में किस राशि के बराबर होता है?
उत्तर: घूर्णनशील सदिश (फेजर) की लंबाई
फेजर की लंबाई = शिखर मान; ऊर्ध्वाधर प्रक्षेप = तात्क्षणिक मान
19 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में L=10H, C=10µF, R=50Ω हैं, तथा यह V=200sin(100t) AC स्रोत से जुड़ा है। परिपथ की अनुनाद-आवृत्ति (ν₀) की स्रोत-आवृत्ति (ν) से तुलना कीजिए।
उत्तर: ν₀ = ν (परिपथ अनुनाद पर है)
ω₀=1/√(LC)=1/√(10⁻⁴)=100 rad/s; स्रोत ω=100 rad/s ⇒ अनुनाद पर
20 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में VL=40V, VC=10V, VR=40V (सभी शिखर) हैं। यदि धारा का शिखर मान 10√2 A हो, तो प्रतिबाधा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 5/√2 Ω
V₀=√(40²+(40−10)²)=50V; Z=50/(10√2)=5/√2 Ω
21 एक संधारित्र (धारिता C) को V=V₀sinωt AC स्रोत से जोड़ा गया है। संधारित्र में विस्थापन धारा के लिए सही व्यंजक चुनिए।
उत्तर: I_d = ωCV₀ cos(ωt)
I=d(CV)/dt=CV₀ωcosωt — धारा विभवांतर से 90° आगे
22 एक उतारी ट्रांसफार्मर, 220V मुख्य आपूर्ति से जुड़ा है, इसकी द्वितीयक कुंडली से 11V, 44W का लैंप जुड़ा है। प्राथमिक धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 0.2 A
Pp=Ps=44W; Ip=44/220=0.2 A
23 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में L=5H, C=80µF, R=40Ω हैं। परिपथ के अर्ध-शक्ति बिंदुओं के संगत कोणीय आवृत्तियाँ ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 46 rad/s व 54 rad/s
ω₀=50 rad/s; Δω=R/L=8 rad/s; ω₁=46, ω₂=54
24 40 µF धारिता वाले एक संधारित्र को 200V, 50Hz की AC आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में rms धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 2.5 A
XC=1/(2π×50×40×10⁻⁶)≈79.6Ω; I=200/79.6≈2.5 A
25 किसी LCR परिपथ में, जब L हटाया जाता है, धारा विभवांतर से π/3 आगे रहती है। जब C हटाकर परिपथ पूरा किया जाता है, धारा विभवांतर से π/3 पीछे रहती है। परिपथ का शक्ति गुणांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 1
XL=XC=√3R ⇒ मूल परिपथ अनुनाद पर ⇒ cosφ=1
26 किसी प्रेरक में 60 mA धारा प्रवाहित होने पर, इसमें 25 mJ चुंबकीय ऊर्जा संचित है। प्रेरकत्व ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 13.9 H
L=2U/I²=2×25×10⁻³/(60×10⁻³)²≈13.9 H
27 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में L=20 mH, C=100 µF, R=50 Ω हैं, यह V=10sin(314t) से जुड़ा है। औसत शक्ति-क्षय ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 0.79 W
XL=6.28Ω, XC=31.85Ω; Z≈56.2Ω; Irms≈0.126A; P=Irms²R≈0.79 W
28 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में VR=80V, VC=40V, VL=100V हैं। शक्ति गुणांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 0.8
V=√(80²+60²)=100V; cosφ=VR/V=80/100=0.8
29 एक श्रेणीबद्ध R-C परिपथ (R=100Ω, XC=100Ω) को 220V rms की AC आपूर्ति से जोड़ा गया है। संधारित्र में विस्थापन धारा का शिखर मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 2.2 A
Z=100√2 Ω; V₀=220√2 V; I₀=220√2/(100√2)=2.2 A
30 श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में बेहतर आवृत्ति-वरणशीलता (tuning) के लिए उपयुक्त संयोजन चुनिए।
उत्तर: निम्न R, उच्च L, निम्न C
Q=1/R×√(L/C) — उच्च Q हेतु R न्यूनतम, L अधिकतम, C न्यूनतम।
31 किसी शुद्ध संधारित्र वाले AC परिपथ में विभवांतर V=V₀sinωt है। धारा के लिए सही कथन चुनिए।
उत्तर: धारा विभवांतर से π/2 आगे, आयाम ωCV₀
I=C(dV/dt)=ωCV₀cosωt — cos, sin से π/2 आगे
32 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ में L=20 mH, C=50 µF, R=40 Ω हैं, तथा V=10sin(340t) से जुड़ा है। औसत शक्ति-क्षय ज्ञात कीजिए।
उत्तर: ≈ 0.46 W
XL=6.8Ω, XC=58.8Ω; Z≈65.6Ω; Irms≈0.108A; P≈0.46 W
33 एक श्रेणीबद्ध R-C परिपथ (AC स्रोत) में वायु-संधारित्र को अभ्रक से भर दिया जाता है। धारा I व संधारित्र विभवांतर V पर प्रभाव बताइए।
उत्तर: I बढ़ेगी, V घटेगा
C बढ़ने से XC घटता है ⇒ Z घटता है ⇒ I बढ़ती है; VC=IXC घटता है
34 किसी प्रतिरोधक R से श्रेणीक्रम में प्रेरक जोड़ने पर प्रतिबाधा Z हो जाती है। नई व्यय शक्ति P' ज्ञात कीजिए।
उत्तर: P' = P(R/Z)²
P=V²/R; P'=I'²R=V²R/Z²=P(R/Z)²
35 एक ट्रांसफार्मर, जिसकी दक्षता 90% है, 200V तथा 3kW की शक्ति पर संचालित है। यदि द्वितीयक धारा 6A हो, तो द्वितीयक वोल्टता तथा प्राथमिक धारा ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 450V, 15A
Ps=0.9×3000=2700W; Vs=2700/6=450V; Ip=3000/200=15A
➕ अतिरिक्त NEET तथ्य
सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं
- इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 2–3 प्रश्न (~8–12 अंक) पूछे जाते हैं; सर्वाधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — श्रेणी LCR परिपथ में प्रतिबाधा व शक्ति गुणांक की गणना, अनुनाद आवृत्ति, ट्रांसफॉर्मर आधारित संख्यात्मक प्रश्न, तथा rms/शिखर मान का रूपांतरण।
- रूप गुणक व शिखर गुणक — रूप गुणक = rms मान/औसत मान = π/(2√2) ≈ 1.11 (ज्यावक्रीय AC के लिए); शिखर गुणक = शिखर मान/rms मान = √2 ≈ 1.414 — ये तरंग के आकार को अभिलाक्षणिक करते हैं।
- rms मान की आवश्यकता — AC धारा का सामान्य समय-औसत मान एक पूर्ण चक्र में शून्य होता है, अतः शक्ति व ऊष्मा-उत्पादन दर्शाने हेतु rms मान प्रयुक्त होता है — Irms=I₀/√2 (ज्यावक्रीय तरंग के लिए)।
- घरेलू व औद्योगिक AC मीटर rms मान मापते हैं — वोल्टमीटर व अमीटर सदैव rms मान प्रदर्शित करते हैं; भारत में घरेलू आपूर्ति "220V" का अर्थ Vrms=220V है, जिससे शिखर वोल्टता V₀=220×√2≈311V प्राप्त होती है।
- अर्ध-चक्र में AC का औसत मान — पूर्ण चक्र में औसत मान शून्य होते हुए भी, केवल एक अर्ध-चक्र पर औसत मान अशून्य होता है: Iavg=2I₀/π≈0.637I₀ — यह मान अर्ध-तरंग दिष्टकारी परिपथों के विश्लेषण में प्रयुक्त होता है।
- R, L, C में कलांतर का सारांश — शुद्ध R में धारा व वोल्टता समान कला में; शुद्ध L में धारा π/2 पीछे; शुद्ध C में धारा π/2 आगे — स्मरण युक्ति "ELI the ICE man": L में E (वोल्टता), I (धारा) से आगे; C में I, E से आगे।
- शक्ति गुणांक के तीन विशेष प्रकरण — शुद्ध R में cosφ=1 (अधिकतम शक्ति); शुद्ध L/C में cosφ=0 (वाटहीन धारा); LCR परिपथ (सामान्य) में 0<cosφ<1 — अनुनाद पर cosφ=1 हो जाता है।
- चोक कुंडली का उपयोग — AC परिपथ में धारा सीमित करने हेतु प्रतिरोधक के स्थान पर उच्च प्रेरकत्व व नगण्य प्रतिरोध वाली चोक कुंडली का उपयोग होता है, जो वाटहीन धारा के सिद्धांत के कारण ऊर्जा बर्बाद नहीं करती — यही कारण प्रतिदीप्त नलिकाओं में चोक का प्रयोग है।
- ट्रांसफॉर्मर की दक्षता — आदर्श में 100% मानी जाती है; वास्तविक में ताम्र-क्षय, भँवर-धारा क्षय, शैथिल्य क्षय व फ्लक्स-रिसाव के कारण 95–99% तक होती है; दक्षता η=Pout/Pin×100%।
- XL व XC की आवृत्ति निर्भरता — XL=ωL आवृत्ति के अनुक्रमानुपाती (DC पर शॉर्ट-सर्किट जैसा); XC=1/ωC आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती (DC पर पूर्ण अवरोधक) — यह व्युत्क्रम प्रवृत्ति उच्च-पास/निम्न-पास फिल्टर परिपथों का आधार है।
- अनुनाद आवृत्ति केवल L व C पर निर्भर, R पर नहीं — श्रेणी LCR परिपथ में ω₀=1/√(LC); परन्तु R अनुनाद की तीक्ष्णता (गुणता कारक Q के माध्यम से) को अवश्य प्रभावित करता है — कम R (उच्च Q) पर अनुनाद तीक्ष्ण, अधिक R (निम्न Q) पर कुंद।
- LC दोलन व SHM की सादृश्यता — बिना प्रतिरोध वाले LC परिपथ में आवेश Q(t) व धारा I(t) SHM की भाँति दोलन करते हैं; L↔m, 1/C↔k, Q↔x, I↔v — संधारित्र में संचित ऊर्जा (½Q²/C, स्थितिज ऊर्जा) व प्रेरक में संचित ऊर्जा (½LI², गतिज ऊर्जा) के मध्य निरंतर आदान-प्रदान होता है।
- वाटमीटर बनाम वोल्टमीटर-अमीटर गुणनफल — वास्तविक शक्ति हेतु वाटमीटर (P=VrmsIrmscosφ) प्रयुक्त होता है; केवल वोल्टमीटर व अमीटर के पाठ्यांकों का गुणनफल आभासी शक्ति (apparent power, VA में) देता है, जो वास्तविक शक्ति से भिन्न हो सकती है — यह भेद औद्योगिक विद्युत बिलिंग में महत्वपूर्ण है।
- फेजर आरेख की उपयोगिता — फेजर एक घूर्णनशील सदिश है जो ज्यावक्रीय राशि के आयाम व कला दोनों को निरूपित करता है; LCR परिपथ में विभिन्न घटकों के फेजर्स को सदिश-योग द्वारा जोड़कर परिणामी वोल्टता व प्रतिबाधा ज्ञात की जाती है (Z=√(R²+(XL−XC)²)) — यह ग्राफीय विधि बीजगणितीय समीकरणों को हल करने से अधिक तीव्र होती है।
- घरेलू AC आपूर्ति की मानक विशेषताएँ — भारत में घरेलू आपूर्ति की आवृत्ति 50 Hz (अमेरिका में 60 Hz) तथा rms वोल्टता 220V (अमेरिका में 120V) होती है; यह मानकीकरण उपकरणों की अभिकल्पना से जुड़ा व्यावहारिक तथ्य है।
- अनुनाद पर वोल्टेज प्रवर्धन — अनुनाद अवस्था में कुल प्रतिबाधा न्यूनतम (Z=R) होती है, परन्तु VL व VC स्रोत वोल्टता से कई गुना अधिक हो सकती हैं (उच्च Q पर) — इस "वोल्टेज प्रवर्धन" का उपयोग रेडियो ट्यूनिंग परिपथों में होता है।
? अभ्यास प्रश्न-उत्तर
NCERT अध्याय 7 के सभी 8 प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें
प्रश्न 7.1 एक 100 Ω का प्रतिरोधक 200 V, 50 Hz आपूर्ति से संयोजित है। (a) परिपथ में धारा का rms मान कितना है? (b) एक पूरे चक्र में कितनी नेट शक्ति व्यय होती है?
R = 100 Ω, V(rms) = 200 V, ν = 50 Hz
(a) ओम के नियम (rms मानों में): I = V/R = 200/100 = 2 A
(b) माध्य शक्ति: P = I²R = (2)² × 100 = 400 W
(a) I = 2 A; (b) P = 400 W
प्रश्न 7.2 (a) ac आपूर्ति का शिखर मान 300 V है। rms वोल्टता कितनी है? (b) ac परिपथ में धारा का rms मान 10 A है। शिखर धारा कितनी है?
(a) vm = 300 V ⇒ Vrms = vm/√2 = 300/1.414 = 212.1 V
(b) Irms = 10 A ⇒ im = √2 × Irms = 1.414 × 10 = 14.14 A
प्रश्न 7.3 एक 44 mH का प्रेरक 220 V, 50 Hz आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में धारा के rms मान को ज्ञात कीजिए।
L = 44 mH, V = 220 V, ν = 50 Hz
XL = 2πνL = 2×3.14×50×44×10⁻³ = 13.83 Ω
I = V/XL = 220/13.83 = 15.92 A
प्रश्न 7.4 एक 60 µF का संधारित्र 110 V, 60 Hz ac आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में धारा के rms मान को ज्ञात कीजिए।
C = 60 µF, V = 110 V, ν = 60 Hz
XC = 1/(2πνC) = 1/(2×3.14×60×60×10⁻⁶) = 44.21 Ω
I = V/XC = 110/44.21 = 2.49 A
प्रश्न 7.5 अभ्यास 7.3 व 7.4 में एक पूरे चक्र की अवधि में प्रत्येक परिपथ में कितनी नेट शक्ति अवशोषित होती है? अपने उत्तर का विवरण दीजिए।
दोनों परिपथों (शुद्ध प्रेरक व शुद्ध संधारित्र) में एक पूरे चक्र में नेट अवशोषित शक्ति शून्य होती है।
कारण: शुद्ध प्रेरक में धारा, वोल्टता से π/2 (90°) पीछे रहती है, तथा शुद्ध संधारित्र में धारा, वोल्टता से π/2 आगे रहती है। दोनों में कला-कोण φ = π/2 होता है, अतः शक्ति गुणांक cos φ = 0।
माध्य शक्ति P = VrmsIrmscos φ = VrmsIrms × 0 = 0
भौतिक व्याख्या: प्रत्येक अर्ध-चक्र में स्रोत, प्रेरक/संधारित्र को जितनी ऊर्जा देता है, अगले अर्ध-चक्र में उतनी ही ऊर्जा वापस स्रोत को लौटा दी जाती है (ऊर्जा प्रेरक के चुंबकीय क्षेत्र या संधारित्र के वैद्युत क्षेत्र में संचित होकर वापस आती है) — इस कारण शुद्ध L या C परिपथ में कोई स्थायी (नेट) ऊर्जा क्षय नहीं होता।
दोनों परिपथों में नेट अवशोषित शक्ति = शून्य (0 W), क्योंकि φ = 90° और cos 90° = 0।
प्रश्न 7.6 30 µF का एक आवेशित संधारित्र 27 mH के प्रेरित्र से जोड़ा गया है। परिपथ के मुक्त दोलनों की कोणीय आवृत्ति कितनी है?
C = 30 µF, L = 27 mH
LC दोलन परिपथ की मुक्त दोलन कोणीय आवृत्ति: ω = 1/√(LC)
LC = 27×10⁻³ × 30×10⁻⁶ = 8.1×10⁻⁷; √(LC) ≈ 9.0×10⁻⁴
ω = 1/(9.0×10⁻⁴) = 1.11 × 10³ rad/s
ω ≈ 1111 rad/s
प्रश्न 7.7 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ को, जिसमें R = 20 Ω, L = 1.5 H तथा C = 35 µF, एक परिवर्ती आवृत्ति की 200 V ac आपूर्ति से जोड़ा गया है। जब आपूर्ति की आवृत्ति परिपथ की मूल (अनुनादी) आवृत्ति के बराबर होती है तो एक पूरे चक्र में परिपथ को स्थानांतरित की गई माध्य शक्ति कितनी होगी?
R = 20 Ω, L = 1.5 H, C = 35 µF, V = 200 V (rms)
जब आपूर्ति की आवृत्ति अनुनादी आवृत्ति के बराबर होती है, तब XL = XC, अतः Z = R
अनुनाद पर φ = 0, cos φ = 1
P = V²/R = (200)²/20 = 40000/20 = 2000 W
P = 2 kW
प्रश्न 7.8 एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ को परिवर्ती आवृत्ति के 230 V के स्रोत से जोड़ा गया है। L = 5.0 H, C = 80 µF, R = 40 Ω। (a) स्रोत की आवृत्ति निकालिए जो परिपथ में अनुनाद उत्पन्न करे। (b) परिपथ की प्रतिबाधा तथा अनुनादी आवृत्ति पर धारा का आयाम निकालिए। (c) परिपथ के तीनों अवयवों के सिरों पर विभवपात के rms मानों को निकालिए। दिखलाइए कि अनुनादी आवृत्ति पर LC संयोग के सिरों पर विभवपात शून्य है।
L = 5.0 H, C = 80 µF, R = 40 Ω, V(rms) = 230 V
(a) ω₀ = 1/√(LC); LC = 5×80×10⁻⁶ = 4×10⁻⁴; √(LC) = 0.02
ω₀ = 1/0.02 = 50 rad/s; ν₀ = 50/(2π) ≈ 7.96 Hz
(b) अनुनाद पर Z = R = 40 Ω; vm = √2×230 = 325.27 V; im = 325.27/40 = 8.13 A (शिखर); Irms = 230/40 = 5.75 A
(c) XL = ω₀L = 50×5 = 250 Ω; XC = 1/(ω₀C) = 1/(50×80×10⁻⁶) = 250 Ω (XL=XC यथार्थ)
VR = Irms·R = 5.75×40 = 230 V (स्रोत वोल्टता के बराबर — अनुनाद पर अपेक्षित)
VL = Irms·XL = 5.75×250 = 1437.5 V
VC = Irms·XC = 5.75×250 = 1437.5 V
LC संयोग पर विभवपात शून्य क्यों: VL तथा VC परिमाण में बराबर (1437.5 V) परंतु कला में ठीक 180° (परस्पर विपरीत) होते हैं — प्रेरक में वोल्टता धारा से π/2 आगे, संधारित्र में वोल्टता धारा से π/2 पीछे, अतः दोनों एक-दूसरे के ठीक विपरीत दिशा में फेजर बनाते हैं।
फेजर योग: VLC = VL − VC = 1437.5 − 1437.5 = 0 V
(a) ω₀ = 50 rad/s, ν₀ ≈ 7.96 Hz; (b) Z = 40 Ω, im ≈ 8.13 A (Irms = 5.75 A); (c) VR = 230 V, VL = VC = 1437.5 V, VLC = 0 V — अनुनाद पर संपूर्ण स्रोत वोल्टता केवल R के सिरों पर प्रभावी दिखती है।