वैद्युतचुंबकीय प्रेरण
फैराडे व हेनरी के ऐतिहासिक प्रयोगों से लेकर लेंज के नियम, गतिक emf, स्व/अन्योन्य प्रेरकत्व और प्रत्यावर्ती धारा जनित्र तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आवश्यक चित्र और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
1 भूमिका
विद्युत एवं चुंबकत्व — परस्पर संबंधित परिघटनाएँ
विद्युत तथा चुंबकत्व को बहुत समय तक दो अलग-अलग, परस्पर असंबद्ध परिघटनाएँ माना जाता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में ऑस्टेंड, ऐम्पियर तथा अन्य वैज्ञानिकों ने विद्युत धारा पर प्रयोग करके सिद्ध किया कि ये दोनों परिघटनाएँ परस्पर जुड़ी हुई हैं — गतिमान विद्युत आवेश अपने चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।
इससे एक सहज प्रश्न उठता है — क्या इसका उलटा भी संभव है? क्या गतिमान चुंबक किसी चालक में विद्युत धारा उत्पन्न कर सकता है? इसका उत्तर स्पष्ट 'हाँ' है। लगभग सन 1830 में इंग्लैंड में माइकल फैराडे तथा अमेरिका में जोसेफ हेनरी ने स्वतंत्र रूप से किए गए प्रयोगों से यह दिखाया कि परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र बंद कुंडलियों में विद्युत धारा प्रेरित करता है। चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा विद्युत धारा उत्पन्न होने की इस परिघटना को वैद्युतचुंबकीय प्रेरण कहते हैं।
वैद्युतचुंबकीय प्रेरण केवल सैद्धांतिक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है — यदि यह खोज न होती, तो न विद्युत प्रकाश होता, न रेलगाड़ियाँ, न टेलीफ़ोन और न ही कंप्यूटर। फैराडे एवं हेनरी के इन अग्रणी प्रयोगों ने ही आधुनिक जनित्रों तथा ट्रांसफार्मरों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। आज की सभ्यता के विकास में इस खोज की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है।
- ऑस्टेंड, ऐम्पियर आदि ने दिखाया कि गतिमान विद्युत आवेश (धारा) चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।
- माइकल फैराडे (इंग्लैंड) एवं जोसेफ हेनरी (अमेरिका) ने लगभग 1830 में स्वतंत्र रूप से परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र द्वारा बंद कुंडलियों में धारा उत्पन्न होने का प्रदर्शन किया।
- वैद्युतचुंबकीय प्रेरण: चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा विद्युत धारा (या emf) उत्पन्न होने की परिघटना।
- आधुनिक जनित्रों एवं ट्रांसफार्मरों का विकास इन्हीं प्रयोगों पर आधारित है।
- वैद्युतचुंबकीय प्रेरण की खोज — फैराडे (इंग्लैंड) व हेनरी (अमेरिका), लगभग 1830
- गतिमान आवेश → चुंबकीय क्षेत्र; परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र → विद्युत धारा
- जनित्र व ट्रांसफार्मर — इसी सिद्धांत पर आधारित
2 फैराडे एवं हेनरी के प्रयोग
प्रायोगिक प्रेक्षण जिन्होंने प्रेरण की खोज की
प्रयोग 6.1
धारामापी G से जुड़ी कुंडली C₁ के पास दंड चुंबक का उत्तरी ध्रुव धकेलने पर धारामापी का संकेतक विक्षेपित होता है — यह कुंडली में विद्युत धारा की उपस्थिति दर्शाता है। यह विक्षेप तभी तक बना रहता है जब तक चुंबक गति में रहता है; चुंबक के स्थिर होते ही धारामापी शून्य दर्शाता है।
चुंबक को कुंडली से दूर ले जाने पर धारामापी विपरीत दिशा में विक्षेप दर्शाता है — यह धारा की दिशा उलट जाने को दर्शाता है। इसी प्रकार, चुंबक के दक्षिणी ध्रुव को कुंडली की ओर या दूर ले जाने पर विक्षेप की दिशा उत्तरी ध्रुव की समान गति की तुलना में विपरीत होती है। चुंबक को तेज़ी से गतिमान करने पर विक्षेप (अर्थात धारा) अधिक प्राप्त होता है।
यह भी देखा गया कि यदि चुंबक को स्थिर रखकर कुंडली C₁ को चुंबक की ओर या दूर गतिमान किया जाए, तो भी समान प्रभाव उत्पन्न होता है। अतः कुंडली में धारा की उत्पत्ति (प्रेरण), चुंबक तथा कुंडली के बीच सापेक्ष गति का परिणाम है।
प्रयोग 6.2
इस प्रयोग में दंड चुंबक के स्थान पर बैटरी से जुड़ी दूसरी कुंडली C₂ का उपयोग किया जाता है। C₂ में अपरिवर्ती धारा अपरिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। जैसे ही C₂ को कुंडली C₁ की ओर लाया जाता है, धारामापी विक्षेप दर्शाता है — C₁ में प्रेरित धारा का संकेत। C₂ को दूर ले जाने पर विक्षेप पुनः प्राप्त होता है, परंतु इस बार विपरीत दिशा में। यह विक्षेप तभी तक रहता है जब तक C₂ गति में रहती है। यहाँ भी कुंडलियों के बीच सापेक्ष गति धारा प्रेरित करती है।
प्रयोग 6.3
उपरोक्त दोनों प्रयोगों में सापेक्ष गति सम्मिलित थी। फैराडे ने एक अन्य प्रयोग द्वारा दिखाया कि सापेक्ष गति अनिवार्य नहीं है। दो कुंडलियाँ C₁ तथा C₂ स्थिर रखी जाती हैं। C₁ को धारामापी G से तथा C₂ को दाब-कुंजी K के माध्यम से बैटरी से जोड़ा जाता है।
जब कुंजी K दबाई जाती है, धारामापी क्षणिक विक्षेप दर्शाता है और तुरंत शून्य पर लौट आता है। कुंजी को दबाकर रखने पर कोई विक्षेप नहीं होता। कुंजी छोड़ने पर पुनः क्षणिक विक्षेप मिलता है, परंतु विपरीत दिशा में। कुंडलियों के अक्ष के अनुदिश लोहे की छड़ रखने पर विक्षेप नाटकीय रूप से बढ़ जाता है।
- प्रयोग 6.1: चुंबक व कुंडली की सापेक्ष गति → कुंडली में धारा प्रेरित; गति रुकते ही विक्षेप शून्य।
- प्रयोग 6.2: धारावाही कुंडली की गति भी दूसरी कुंडली में उसी प्रकार धारा प्रेरित करती है।
- निष्कर्ष: कुंडली में प्रेरित धारा, चुंबक (या धारावाही कुंडली) तथा कुंडली की सापेक्ष गति का परिणाम है।
- प्रयोग 6.3: दो स्थिर कुंडलियों में भी, दूसरी की धारा परिवर्तित होने पर (कुंजी दबाने/छोड़ने) पहली में क्षणिक emf प्रेरित — सापेक्ष गति अनिवार्य नहीं।
- लोहे की छड़ रखने से विक्षेप नाटकीय रूप से बढ़ जाता है।
- सर्वनिष्ठ बात: किसी परिपथ से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर से प्रेरित emf उत्पन्न होता है।
3 चुंबकीय फ्लक्स
फैराडे के नियम की पूर्व-आवश्यकता
फैराडे की गहन अंतर्दृष्टि से इन प्रयोगों की व्याख्या करने वाला एक सरल गणितीय संबंध खोजना संभव हुआ। परंतु इससे पहले चुंबकीय फ्लक्स ΦB की अवधारणा से परिचित होना आवश्यक है। इसकी परिभाषा विद्युतीय फ्लक्स के समान ही होती है।
यदि क्षेत्रफल A वाला समतल एकसमान चुंबकीय क्षेत्र B में रखा जाए, तो चुंबकीय फ्लक्स:
जहाँ θ, B तथा क्षेत्रफल सदिश A के बीच का कोण है। यदि सतह के विभिन्न भागों पर क्षेत्र के परिमाण व दिशाएँ भिन्न हों, तो सतह से गुजरने वाला कुल फ्लक्स सूक्ष्म अवयवों के योग द्वारा प्राप्त होता है:
चुंबकीय फ्लक्स का SI मात्रक वेबर (Wb) है; इसे टेस्ला-वर्ग मीटर (T m²) से भी व्यक्त किया जाता है। चुंबकीय फ्लक्स एक अदिश राशि है।
- ΦB = B·A = BA cosθ
- असमान क्षेत्र/वक्र पृष्ठ: ΦB = ΣBi·ΔAi
- मात्रक — वेबर (Wb); 1 Wb = 1 T·m²
- चुंबकीय फ्लक्स — अदिश राशि
4 फैराडे का प्रेरण का नियम
प्रेरित emf एवं फ्लक्स-परिवर्तन की दर
प्रायोगिक प्रेक्षणों के आधार पर फैराडे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जब किसी कुंडली से जुड़ा चुंबकीय फ्लक्स समय के साथ परिवर्तित होता है, तब कुंडली में विद्युत वाहक बल प्रेरित होता है। अनुभाग 6.2 के सभी प्रायोगिक प्रेक्षणों की व्याख्या इसी अवधारणा से हो जाती है।
गणितीय रूप में एक फेरे वाली कुंडली के लिए:
ऋण चिह्न प्रेरित emf की दिशा (तथा बंद लूप में धारा की दिशा) को व्यक्त करता है — यह लेंज के नियम से संबंधित है (अगले अनुच्छेद में विस्तार से)।
यदि कुंडली में पास-पास N फेरे हों, तथा प्रत्येक फेरे से संबद्ध फ्लक्स में एकसमान परिवर्तन हो, तो कुल प्रेरित emf:
फेरों की संख्या N बढ़ाकर प्रेरित emf को बढ़ाया जा सकता है। फ्लक्स में परिवर्तन तीन प्रकार से किया जा सकता है — चुंबकीय क्षेत्र B को बदलकर, कुंडली के क्षेत्रफल A को बदलकर (सिकोड़ना/खींचना), अथवा कुंडली को घुमाकर B व A के बीच का कोण θ बदलकर।
- ε = −dΦB/dt (एक फेरा); ε = −N dΦB/dt (N फेरे)
- फ्लक्स-परिवर्तन के तीन कारण — B में परिवर्तन, A में परिवर्तन, θ में परिवर्तन
- N बढ़ाने से emf बढ़ता है
5 लेंज का नियम तथा ऊर्जा संरक्षण
प्रेरित emf की ध्रुवता एवं उसका मूल कारण
सन 1834 में जर्मन भौतिकविद हेनरिक फ्रेडरिक लेंज (1804–1865) ने एक नियम का प्रतिपादन किया, जो प्रेरित विद्युत वाहक बल की ध्रुवता (दिशा) को संक्षेप में व्यक्त करता है।
फैराडे के नियम ε = −dΦB/dt में ऋण चिह्न इसी प्रभाव को निरूपित करता है।
चित्र 6.1 के निरीक्षण से लेंज का नियम सरलता से समझा जा सकता है। जब दंड चुंबक का उत्तरी ध्रुव कुंडली की ओर बढ़ता है, तब कुंडली से जुड़ा चुंबकीय फ्लक्स बढ़ता है। प्रेरित धारा ऐसी दिशा में उत्पन्न होती है जिससे यह फ्लक्स-वृद्धि का विरोध कर सके। यह तभी संभव है जब चुंबक की ओर स्थित प्रेक्षक के सापेक्ष कुंडली में धारा वामावर्त दिशा में हो — इसका चुंबकीय आघूर्ण उत्तरी ध्रुव की ओर होगा, जो आते हुए उत्तरी ध्रुव को प्रतिकर्षित करेगा।
इसी प्रकार, यदि चुंबक कुंडली से दूर हटे और फ्लक्स घटे, तो घटते फ्लक्स का विरोध करने के लिए प्रेरित धारा दक्षिणावर्त दिशा में बहती है, जिससे कुंडली का दक्षिणी ध्रुव दूर जाते चुंबक के उत्तरी ध्रुव की ओर बन जाता है — जिससे आकर्षण बल उत्पन्न होकर चुंबक की गति तथा फ्लक्स-ह्रास का विरोध करता है।
ऊर्जा संरक्षण से संगति
यदि प्रेरित धारा की दिशा इसके विपरीत होती, तो प्रेरित धारा द्वारा उत्पन्न दक्षिणी ध्रुव पास आते उत्तरी ध्रुव को आकर्षित करता, जिससे चुंबक बिना किसी ऊर्जा-निवेश के त्वरित होता रहता और उसकी गतिज ऊर्जा अनंत रूप से बढ़ती जाती।
वास्तविक स्थिति में दंड चुंबक प्रेरित धारा के कारण प्रतिकर्षण बल अनुभव करता है। अतः चुंबक को गति देने के लिए हमें कार्य करना पड़ता है। हमारे द्वारा किया गया यह कार्य प्रेरित धारा द्वारा उत्पन्न जूल ऊष्मन के रूप में क्षय होता है।
- लेंज का नियम: प्रेरित emf/धारा की दिशा सदैव उस परिवर्तन का विरोध करती है जिसके कारण वह उत्पन्न हुई
- फैराडे के नियम में ऋण चिह्न = लेंज का नियम
- लेंज का नियम ऊर्जा संरक्षण का परिणाम है
- खुले परिपथ में भी सिरों पर प्रेरित emf उत्पन्न होता है
6 गतिक विद्युत वाहक बल
गतिमान चालक द्वारा फ्लक्स-परिवर्तन
किसी एकसमान, समय-निरपेक्ष चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान ऋजु चालक पर विचार कीजिए। एक आयताकार चालक PQRS में PQ स्वतंत्र रूप से गति कर सकता है। PQ को स्थिर वेग v से बाईं ओर चलाने पर बंद परिपथ PQRS से घिरा क्षेत्रफल परिवर्तित होता है।
इस लूप को क्षेत्र B में इस प्रकार रखा गया है कि इसका तल B के लंबवत हो। यदि RQ = x तथा RS = l हो, तो लूप से घिरा चुंबकीय फ्लक्स ΦB = Blx होता है। x समय के साथ बदलने से उत्पन्न प्रेरित emf:
यहाँ dx/dt = −v लिया गया है (v, चालक PQ की चाल है)। Blv को गतिक विद्युत वाहक बल कहते हैं। इस प्रकार चुंबकीय क्षेत्र बदलने के स्थान पर किसी चालक को गतिमान करके भी परिपथ से घिरे फ्लक्स में परिवर्तन करके emf उत्पन्न किया जा सकता है।
लोरेंज बल द्वारा वैकल्पिक व्याख्या
चालक PQ में किसी यादृच्छिक आवेश q पर विचार कीजिए। छड़ के v वेग से गति करने पर आवेश भी चुंबकीय क्षेत्र B में v वेग से गति करेगा। इस पर लगने वाले लोरेंज बल का परिमाण qvB होता है, तथा दिशा Q के अनुदिश होती है। आवेश को P से Q तक ले जाने में किया गया कार्य W = qvBl होता है। प्रति इकाई आवेश पर किया गया कार्य ही emf है, अतः:
यह प्रस्तुति पूर्णतः यथार्थ नहीं है, परंतु एकसमान एवं समय-निरपेक्ष चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान चालक के लिए फैराडे के नियम का आधार समझने में सहायक है।
- गतिक emf: ε = Blv
- लोरेंज बल से व्युत्पत्ति: ε = W/q = Blv
- परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र स्वयं विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है
- स्थिर चालक में भी परिवर्तनशील B से emf प्रेरित
7 प्रेरकत्व
फ्लक्स-बंधता एवं धारा का संबंध
किसी कुंडली के निकट रखी दूसरी कुंडली में फ्लक्स परिवर्तन से, अथवा उसी कुंडली में फ्लक्स परिवर्तन से, उस कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित हो सकती है। दोनों स्थितियों में कुंडली से जुड़ा फ्लक्स धारा के समानुपाती होता है, अर्थात ΦB ∝ I। यदि समय के साथ कुंडली की ज्यामिति न बदले, तो dΦB/dt ∝ dI/dt।
पास-पास लिपटे N फेरों वाली कुंडली के सभी फेरों से समान चुंबकीय फ्लक्स संबद्ध होता है। अतः फ्लक्स-बंधता (flux linkage) NΦB का उपयोग होता है, जो धारा के समानुपाती होता है। इस समानुपातिकता स्थिरांक को प्रेरकत्व कहते हैं। प्रेरकत्व का मान कुंडली की ज्यामिति तथा उसके पदार्थ के नैज गुणधर्मों पर निर्भर करता है — यह पक्ष धारिता की प्रकृति के समान है, जो समांतर प्लेट संधारित्र के लिए प्लेट-क्षेत्रफल, प्लेट-पृथक्करण तथा माध्यम के परावैद्युतांक पर निर्भर करती है।
प्रेरकत्व एक अदिश राशि है। इसकी विमाएँ [M L²T⁻²A⁻²] हैं। इसका SI मात्रक हेनरी (H) है — यह नाम जोसेफ हेनरी के सम्मान में रखा गया है।
7.1 अन्योन्य प्रेरकत्व
दो लंबी समाक्षी (co-axial) परिनालिकाओं पर विचार कीजिए, जिनकी प्रत्येक की लंबाई l है। अंदर वाली परिनालिका S₁ की त्रिज्या r₁ तथा प्रति एकांक लंबाई फेरे n₁ हैं; बाहरी परिनालिका S₂ के लिए r₂ तथा n₂ हैं। मान लीजिए कुल फेरे क्रमशः N₁ तथा N₂ हैं।
जब S₂ में धारा I₂ प्रवाहित होती है, तो यह S₁ में चुंबकीय फ्लक्स स्थापित करती है। S₁ में फ्लक्स-बंधता:
M₁₂ को S₁ का S₂ के सापेक्ष अन्योन्य प्रेरकत्व कहते हैं। इन समाक्षी परिनालिकाओं के लिए गणना संभव है। S₂ में धारा I₂ द्वारा उत्पन्न क्षेत्र μ₀n₂I₂ होता है। S₁ से जुड़ी फ्लक्स-बंधता N₁Φ₁ = (n₁l)(πr₁²)(μ₀n₂I₂) = μ₀n₁n₂πr₁²lI₂ होती है, अतः:
विपरीत स्थिति में समान गणना से M₂₁ = μ₀n₁n₂πr₁²l प्राप्त होता है, अर्थात:
यह समानता दीर्घ समाक्षी परिनालिकाओं के लिए दर्शायी गई है, परंतु व्यापक रूप से सत्य है। युग्म का अन्योन्य प्रेरकत्व उनके पृथक्करण तथा सापेक्ष दिक्विन्यास पर भी निर्भर करता है।
यदि माध्यम की सापेक्ष चुंबकशीलता μr हो, तो M = μrμ₀n₁n₂πr₁²l। किसी कुंडली में परिवर्ती धारा, समीपस्थ कुंडली में emf प्रेरित करती है:
7.2 स्व-प्रेरकत्व
किसी एकल वियुक्त कुंडली में भी उसी कुंडली में धारा परिवर्तित करने पर होने वाले फ्लक्स-परिवर्तन के कारण emf प्रेरित किया जा सकता है। इस परिघटना को स्व-प्रेरण कहते हैं। इस स्थिति में N फेरों वाली कुंडली में फ्लक्स-बंधता धारा के समानुपाती होती है:
यहाँ L कुंडली का स्व-प्रेरकत्व है। धारा परिवर्तित होने पर फ्लक्स भी परिवर्तित होता है, जिससे उत्पन्न emf:
स्व-प्रेरित emf सदैव धारा-परिवर्तन (वृद्धि या कमी) का विरोध करता है; इसे विरोधी विद्युत वाहक बल (back emf) भी कहते हैं। भौतिक दृष्टि से स्व-प्रेरकत्व जड़त्व का कार्य करता है — यह यांत्रिकी में द्रव्यमान का विद्युत-चुंबकीय अनुरूप है।
लंबी परिनालिका (अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल A, लंबाई l, प्रति एकांक लंबाई फेरे n) का स्व-प्रेरकत्व:
कुंडली का स्व-प्रेरकत्व उसकी ज्यामिति तथा माध्यम की चुंबकशीलता पर निर्भर करता है। धारा स्थापित करने के लिए विरोधी emf के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है, जो चुंबकीय स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है:
यह व्यंजक गतिज ऊर्जा (½mv²) की याद दिलाता है — यह दर्शाता है कि L, द्रव्यमान m के अनुरूप है। परिनालिका में संचित चुंबकीय ऊर्जा को B, A, l के पदों में व्यक्त करने पर प्रति एकांक आयतन चुंबकीय ऊर्जा:
यह स्थिरवैद्युत ऊर्जा घनत्व uE = ½ε₀E² के तुलनीय है — दोनों में ऊर्जा, क्षेत्र-तीव्रता के समानुपाती होती है।
- अन्योन्य प्रेरकत्व: N₁Φ₁ = M₁₂I₂; समाक्षी परिनालिकाओं के लिए M = μ₀n₁n₂πr₁²l; M₁₂ = M₂₁
- अन्योन्य प्रेरकत्व द्वारा emf: ε₁ = −M dI₂/dt
- स्व-प्रेरकत्व: NΦB = LI; ε = −L dI/dt (विरोधी emf)
- लंबी परिनालिका का L = μ₀n²Al
- संचित चुंबकीय ऊर्जा: W = ½LI²; ऊर्जा घनत्व uB = B²/2μ₀
- प्रेरकत्व का मात्रक — हेनरी (H)
8 प्रत्यावर्ती धारा जनित्र
प्रेरण का महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक अनुप्रयोग
विद्युतचुंबकीय प्रेरण का प्रौद्योगिक रूप से अनेक प्रकार से उपयोग किया गया है। एक असाधारण उपयोग प्रत्यावर्ती धारा (ac) का उत्पादन है। इस मशीन के विकास का श्रेय यूगोस्लाव वैज्ञानिक निकोला टेस्ला को जाता है। किसी लूप में emf या धारा प्रेरित करने की एक विधि यह है कि लूप के अभिविन्यास अथवा प्रभावी क्षेत्रफल में परिवर्तन किया जाए।
जब कुंडली क्षेत्र B में घूर्णन करती है, तो लूप का (क्षेत्र के अभिलंबवत) प्रभावी क्षेत्रफल A cosθ होता है, जहाँ θ, A तथा B के बीच का कोण है। फ्लक्स बदलने की यह विधि एक सरल प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का सिद्धांत है। जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।
जनित्र के मूल अवयव में एक कुंडली होती है, जो रोटर शैफ्ट पर आरोपित होती है। कुंडली का घूर्णन अक्ष चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लंबवत होता है। कुंडली (आर्मेचर) को बाह्य साधन द्वारा एकसमान क्षेत्र में घुमाया जाता है। घूर्णन के कारण फ्लक्स बदलता है, जिससे कुंडली में emf प्रेरित होता है। कुंडली के सिरे सर्पी वलयों व ब्रशों के माध्यम से बाह्य परिपथ से जुड़े होते हैं।
यदि कुंडली को एकसमान कोणीय वेग ω से घुमाया जाए, तो समय t पर θ = ωt होता है (t = 0 पर θ = 0° मानकर)। किसी समय t पर फ्लक्स ΦB = BA cosωt होता है। फैराडे के नियम से N फेरों वाली घूर्णी कुंडली के लिए:
यहाँ NBAω emf का अधिकतम मान है (जो sin ωt = ±1 पर प्राप्त होता है) और इसे ε₀ से दर्शाया जाता है। चूँकि sin ωt का मान +1 से −1 के बीच बदलता है, emf का चिह्न (ध्रुवता) समय के साथ परिवर्तित होता है। θ = 90° या 270° पर emf अपने चरम मान पर होता है, क्योंकि इन बिंदुओं पर फ्लक्स-परिवर्तन अधिकतम होता है। धारा की दिशा आवर्ती रूप से बदलने के कारण इसे प्रत्यावर्ती धारा (ac) कहते हैं। ω = 2πν के उपयोग से:
यहाँ ν, आर्मेचर की परिक्रमण आवृत्ति है। व्यावसायिक जनित्रों में आर्मेचर घुमाने हेतु आवश्यक यांत्रिक ऊर्जा ऊँचाई से गिरते जल से प्राप्त होती है (जल-विद्युत जनित्र)। विकल्पतः कोयला या अन्य स्रोतों से जल गर्म करके भाप बनाई जाती है, और उच्च दाब की भाप से आर्मेचर घुमाया जाता है (तापीय जनित्र)। कोयले के स्थान पर नाभिकीय ईंधन का उपयोग करने पर नाभिकीय शक्ति प्राप्त होती है।
भारत में जनित्रों की घूर्णन आवृत्ति 50 Hz है; अमेरिका (USA) में यह 60 Hz है।
- AC जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है
- तात्क्षणिक emf: ε = NBAω sinωt = ε₀ sinωt; ε₀ = NBAω
- θ = 90° या 270° पर emf चरम मान पर
- भारत में आवृत्ति 50 Hz; USA में 60 Hz
- जल-विद्युत, तापीय, नाभिकीय जनित्र — यांत्रिक ऊर्जा के स्रोत
✓ सारांश व सूत्र-सूची
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
चुंबकीय फ्लक्स
ΦB = B·A = BA cosθ; मात्रक वेबर (Wb) = T·m²; अदिश राशि
फैराडे का नियम
ε = −N dΦB/dt; बंद परिपथ में I = ε/R
लेंज का नियम
प्रेरित emf/धारा उस परिवर्तन का विरोध करती है जिसके कारण वह उत्पन्न हुई
गतिक emf
ε = Blv (चालक B के लंबवत v वेग से गति करे)
अन्योन्य प्रेरकत्व
ε₁ = −M dI₂/dt; समाक्षी परिनालिकाओं के लिए M = μ₀n₁n₂πr₁²l
स्व-प्रेरकत्व
ε = −L dI/dt; परिनालिका के लिए L = μ₀n²Al
संचित ऊर्जा
W = ½LI²; ऊर्जा घनत्व uB = B²/2μ₀
AC जनित्र
ε = NBAω sinωt = ε₀ sin(2πνt); ε₀ = NBAω
घूर्णी छड़
ε = ½ωBR² (केंद्र व परिधि के बीच)
विचारणीय विषय
- विद्युत तथा चुंबकत्व का घनिष्ठ संबंध है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में ऑस्टेंड, ऐम्पियर तथा अन्य द्वारा यह सिद्ध हुआ कि गतिमान आवेश (धारा) चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं। कुछ समय पश्चात, 1830 के आसपास फैराडे तथा हेनरी के प्रयोगों ने स्पष्ट रूप से दर्शाया कि गतिमान चुंबक विद्युत धारा प्रेरित करता है।
- किसी बंद परिपथ में विद्युत धारा इस प्रकार उत्पन्न होती है कि वह परिवर्ती चुंबकीय फ्लक्स का विरोध कर सके — यह ऊर्जा संरक्षण के अनुरूप है। परंतु खुले परिपथ में emf केवल सिरों पर उत्पन्न होता है।
- गतिक emf की अवधारणा लोरेंज बल (गतिमान आवेशों पर qv×B) के माध्यम से भी व्युत्पन्न की जा सकती है। परंतु यदि आवेश स्थिर हों (तथा लोरेंज बल का qv×B पद क्रियात्मक न हो), तब भी समय-परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण emf उत्पन्न होता है। अतः फैराडे का नियम सापेक्षता के सिद्धांत से गहराई से जुड़ा प्रतीत होता है।
📊 भौतिक राशियाँ तालिका
प्रतीक, मात्रक, विमाएँ एवं समीकरण
| राशि | प्रतीक | मात्रक | विमाएँ | समीकरण |
|---|---|---|---|---|
| चुंबकीय फ्लक्स | ΦB | Wb (वेबर) | [M L²T⁻²A⁻¹] | ΦB = B·A |
| विद्युत वाहक बल (emf) | ε | V (वोल्ट) | [M L²T⁻³A⁻¹] | ε = −d(NΦB)/dt |
| अन्योन्य प्रेरकत्व | M | H (हेनरी) | [M L²T⁻²A⁻²] | ε₁ = −M₁₂(dI₂/dt) |
| स्व-प्रेरकत्व | L | H (हेनरी) | [M L²T⁻²A⁻²] | ε = −L(dI/dt) |
★ NEET फैक्ट-शीट
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| वैद्युतचुंबकीय प्रेरण की खोज | फैराडे (इंग्लैंड) व हेनरी (अमेरिका), लगभग 1830 |
| चुंबकीय फ्लक्स | ΦB = BA cosθ; मात्रक वेबर |
| फैराडे का नियम | ε = −N dΦB/dt |
| लेंज का नियम | प्रेरित प्रभाव, कारण का विरोध करता है |
| लेंज नियम व ऊर्जा संरक्षण | लेंज नियम, ऊर्जा संरक्षण का परिणाम |
| गतिक emf | ε = Blv |
| घूर्णी छड़ का emf | ε = ½Bωl² |
| अन्योन्य प्रेरकत्व | ε₁ = −M dI₂/dt; M₁₂ = M₂₁ |
| स्व-प्रेरकत्व | NΦB = LI; ε = −L dI/dt |
| लंबी परिनालिका का L | L = μ₀n²Al |
| संचित चुंबकीय ऊर्जा | W = ½LI²; uB = B²/2μ₀ |
| AC जनित्र का emf | ε = NBAω sinωt = ε₀ sinωt |
| भारत में AC आवृत्ति | 50 Hz |
| USA में AC आवृत्ति | 60 Hz |
| प्रेरकत्व का मात्रक | हेनरी (H) |
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 लंबाई l तथा त्रिज्या r की एक लंबी परिनालिका में प्रति एकांक लंबाई n फेरे हैं। परिनालिका का स्व-प्रेरकत्व क्या होगा?
उत्तर: μ₀n²πr²l
परिनालिका में क्षेत्र B = μ₀nI; कुल फ्लक्स-बंधता NΦ = (nl)(μ₀nI)(πr²) ⇒ L = μ₀n²πr²l
2 8 cm व 3 cm भुजाओं वाला एक आयताकार लूप, जिसमें एक छोटा कट है, 0.3 T के (लूप के तल के लंबवत) क्षेत्र से बाहर निकल रहा है। वेग 2 cm/s हो और यह लूप की छोटी भुजा के लंबवत हो, तो कट के आर-पार उत्पन्न emf ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 1.8 × 10⁻⁵ V
वेग लूप की छोटी भुजा के लंबवत है, अतः प्रभावी भुजा = 0.03 m; e = Blv = 0.3×0.03×0.02 = 1.8×10⁻⁵ V
3 समान पदार्थ (μᵣ) व समान अनुप्रस्थ-काट क्षेत्रफल की दो परिनालिकाएँ A व B हैं। A की लंबाई, B की दोगुनी है; A में प्रति एकांक लंबाई फेरे, B की आधी हैं। L_A : L_B ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 1 : 2
L ∝ n²l; n_A = n_B/2, l_A = 2l_B ⇒ L_A/L_B = (1/4)(2) = 1/2
4 100 फेरों वाली, 1 m² क्षेत्रफल वाली कुंडली से युक्त AC जनरेटर, 0.05 T क्षेत्र में 1 चक्कर/सेकंड की चाल से घूर्णन करता है। उत्पन्न emf का अधिकतम मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 10π V
ω = 2π×1 = 2π rad/s; e₀ = NBAω = 100×0.05×1×2π = 10π V
5 किसी भी बंद पृष्ठ से गुजरने वाला कुल चुंबकीय फ्लक्स होता है:
उत्तर: सदैव शून्य
चुंबकत्व के लिए गाउस नियम: ∮B·dA = 0 (चुंबकीय एकल-ध्रुव का अस्तित्व नहीं)
6 किसी वृत्ताकार कुंडली से जुड़ा चुंबकीय फ्लक्स φ = 2t³+4t²+2t+5 Wb है। t = 5s पर प्रेरित emf का परिमाण ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 192 V
e = −dφ/dt = −(6t²+8t+2); t = 5 पर: 6(25)+40+2 = 192 V
7 1 m भुजा तथा 1 Ω प्रतिरोध का वर्गाकार लूप 0.5 T के क्षेत्र में इस प्रकार रखा है कि लूप का तल क्षेत्र के लंबवत है। लूप से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 0.5 Wb
Φ = BA = 0.5×(1×1) = 0.5 Wb
8 समान तल में, संकेंद्रित केंद्रों वाले दो चालक वृत्ताकार लूप, त्रिज्या R₁ तथा R₂ (R₁≫R₂) रखे हैं। दोनों के बीच अन्योन्य प्रेरकत्व M किसके अनुक्रमानुपाती होगा?
उत्तर: R₂²/R₁
M = μ₀πR₂²/2R₁ ⇒ M ∝ R₂²/R₁
9 निम्नलिखित में से किस युक्ति में भँवर धारा (eddy current) प्रभाव का उपयोग नहीं किया जाता?
उत्तर: विद्युत हीटर (electric heater)
विद्युत हीटर में साधारण I²R ऊष्मन होता है; भँवर धाराओं का उपयोग प्रेरण भट्टी, चुंबकीय अवमंदन, रेल ब्रेकिंग में होता है।
10 800 फेरों वाली, 0.05 m² क्षेत्रफल की एक कुंडली को 5×10⁻⁵ T के क्षेत्र के लंबवत रखा गया है। यदि कुंडली को उसके किसी समतलीय अक्ष के परितः 0.1 s में 90° घुमा दिया जाए, तो प्रेरित emf ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 0.02 V
प्रारंभिक NΦᵢ = 800×5×10⁻⁵×0.05 = 2×10⁻³ Wb; 90° घुमाने पर NΦ_f = 0; e = 2×10⁻³/0.1 = 0.02 V
11 0.1 m व्यास की एक लंबी परिनालिका में 2×10⁴ फेरे प्रति मीटर हैं। इसके केंद्र पर, समान अक्ष वाली 100 फेरों व 0.01 m त्रिज्या की छोटी कुंडली रखी है। परिनालिका की धारा 0.05 s में 4A से 0A तक घटाई जाती है। छोटी कुंडली का प्रतिरोध 10π² Ω हो, तो प्रवाहित कुल आवेश ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 3.2 × 10⁻⁵ C
M = 4π×10⁻⁷×2×10⁴×100×π×(0.01)² = 800π²×10⁻⁷ H; q = MΔI/R = (800π²×10⁻⁷×4)/(10π²) = 3.2×10⁻⁵ C
12 एक एकसमान चुंबकीय क्षेत्र त्रिज्या r के वृत्ताकार क्षेत्र तक सीमित है, जिसमें dB/dt की दर से परिवर्तन हो रहा है। लूप 1 (त्रिज्या R > r) क्षेत्र को पूर्णतः घेरता है, जबकि लूप 2 (त्रिज्या R, परंतु क्षेत्र-क्षेत्र से बाहर) चुंबकीय क्षेत्र से बाहर है। दोनों लूपों में उत्पन्न emf की तुलना कीजिए।
उत्तर: लूप 1 में शून्येतर emf, लूप 2 में शून्य
लूप 1 में e₁ = πr²(dB/dt) ≠ 0; लूप 2 से कोई परिवर्ती फ्लक्स जुड़ा नहीं, अतः e₂ = 0
13 1000 फेरों वाली एक लंबी परिनालिका में 4A धारा प्रवाहित होने पर प्रत्येक फेरे से जुड़ा चुंबकीय फ्लक्स 4×10⁻³ Wb है। परिनालिका का स्व-प्रेरकत्व ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 1 H
L = NΦ/I = (1000×4×10⁻³)/4 = 1 H
14 त्रिज्या r की एक पतली अर्धवृत्ताकार चालक वलय PQR, क्षैतिज चुंबकीय क्षेत्र B में गिर रही है। जब वलय का वेग v हो, तब इसके दो सिरों (P व R) के बीच उत्पन्न विभवांतर ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 2rBv
गतिक emf केवल सिरों के बीच की सीधी दूरी (जीवा = व्यास = 2r) पर निर्भर करता है: e = B(2r)v = 2rBv
➕ अतिरिक्त NEET तथ्य
सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं
- इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 2–3 प्रश्न (~8–12 अंक) पूछे जाते हैं। सर्वाधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — गतिक emf, लेंज नियम आधारित दिशा-निर्धारण, स्व/अन्योन्य प्रेरकत्व के सूत्र, तथा भँवर धाराओं के अनुप्रयोग।
- बीटाट्रॉन — विद्युतचुंबकीय प्रेरण पर आधारित एक कण त्वरक, जिसमें परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र द्वारा उत्पन्न प्रेरित विद्युत क्षेत्र इलेक्ट्रॉनों को एक वृत्तीय पथ में निरंतर त्वरित करता है।
- युग्मन गुणांक (k) — दो कुंडलियों के बीच चुंबकीय युग्मन की पूर्णता: k = M/√(L₁L₂); 0 (कोई युग्मन नहीं) से 1 (पूर्ण युग्मन) तक; आदर्श ट्रांसफार्मर में k = 1।
- गतिक emf — बल दृष्टिकोण — चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान चालक छड़ में मुक्त इलेक्ट्रॉनों पर चुंबकीय लोरेंज बल F = qv×B कार्य करता है, जो छड़ के एक सिरे पर आवेश एकत्र कर emf उत्पन्न करता है — यह फ्लक्स-नियम (dΦ/dt) के समतुल्य परिणाम देता है।
- फैराडे का व्यापक रूप — प्रेरित emf फ्लक्स-परिवर्तन के किसी भी कारण से उत्पन्न हो सकता है — क्षेत्र स्वयं बदल रहा हो (स्थिर परिपथ) या परिपथ स्वयं गतिमान/विकृत हो (स्थिर क्षेत्र); दोनों में ε = −dΦB/dt लागू होता है।
- लेंज का नियम — ऊर्जा संरक्षण का परिणाम — यदि प्रेरित धारा अपने कारण को बढ़ाने की दिशा में होती, तो बिना ऊर्जा-निवेश अनंत ऊर्जा उत्पन्न होती — ऊर्जा संरक्षण का उल्लंघन। अतः लेंज का नियम (ऋण चिह्न के रूप में) मूलतः ऊर्जा संरक्षण की ही अभिव्यक्ति है।
- AC जनित्र की emf — N फेरों वाली कुंडली (क्षेत्रफल A) को क्षेत्र B में नियत कोणीय वेग ω से घुमाने पर e(t) = NBAω sin(ωt); शिखर emf e₀ = NBAω।
- स्व-प्रेरकत्व — "विद्युत जड़त्व" — जैसे द्रव्यमान वेग-परिवर्तन का विरोध करता है, वैसे ही प्रेरकत्व धारा-परिवर्तन का विरोध करता है; इसी कारण प्रेरक-युक्त परिपथों में धारा तुरंत नहीं बदलती।
- LR परिपथ — धारा की वृद्धि व क्षय — वृद्धि: i(t) = (ε/R)(1 − e^(−t/τ)); क्षय: i(t) = i₀e^(−t/τ); दोनों में समय-स्थिरांक τ = L/R समान।
- प्रेरक में संचित ऊर्जा — U = ½LI²; यह संधारित्र की ऊर्जा U = ½CV² के समरूप है।
- अन्योन्य प्रेरकत्व कारक — यह दोनों कुंडलियों की ज्यामिति, सापेक्ष स्थिति/अभिविन्यास तथा माध्यम की चुंबकशीलता पर निर्भर करता है — धारा के मान पर नहीं।
- गतिमान छड़ पर बल व ऊर्जा संरक्षण — नियत वेग से गति करती छड़ द्वारा उत्पन्न धारा, छड़ पर प्रतिक्रियात्मक चुंबकीय बल (गति-विरोधी) लगाती है; बाह्य यांत्रिक कार्य = प्रतिरोध में क्षय ऊष्मा (I²R)।
- प्रेरित विद्युत क्षेत्र — असंरक्षी प्रकृति — स्थिरवैद्युतिकी में ∮E·dl = 0, परंतु परिवर्ती फ्लक्स द्वारा प्रेरित क्षेत्र में ∮E·dl = −dΦB/dt ≠ 0 — क्षेत्र-रेखाएँ बंद वृत्तों के रूप में।
- धातु संसूचक व प्रेरण कुकटॉप — धातु संसूचक में उच्च-आवृत्ति दोलायमान क्षेत्र से निकटवर्ती धातु में भँवर धाराएँ; प्रेरण कुकटॉप में बर्तन के तल में सीधे भँवर धाराएँ उत्पन्न कर ऊष्मा।
- इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — फैराडे का नियम, लेंज का नियम, गतिक emf, स्व/अन्योन्य प्रेरकत्व, AC जनित्र, भँवर धाराएँ — इन छह टॉपिक पर विशेष ध्यान दें; इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।
? अभ्यास प्रश्न-उत्तर
NCERT अध्याय 6 के सभी 8 प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें
प्रश्न 6.1 चित्र 6.15 (a) से (f) में वर्णित स्थितियों के लिए प्रेरित धारा की दिशा की प्रागुक्ति कीजिए।
सभी उप-भागों में लेंज के नियम का उपयोग करते हैं: प्रेरित धारा सदैव उस फ्लक्स-परिवर्तन का विरोध करती है जिसके कारण वह उत्पन्न हुई।
(a) S ध्रुव कुंडली की ओर बढ़ रहा है, फ्लक्स बढ़ता है; विरोध हेतु कुंडली का निकटतम फलक S-ध्रुव बनेगा। उत्तर: q → r → p → q
(b) एक कुंडली से S दूर, दूसरी से N दूर; दोनों में फ्लक्स-ह्रास का विरोध। उत्तर: पहली p → r → q; दूसरी y → z → x
(c) कुंजी बंद करने पर धारा बढ़ती है, विरोध होता है। उत्तर: y → z → x → y
(d) धारा बढ़ाई जा रही है, प्रेरित धारा वृद्धि का विरोध करेगी। उत्तर: z → y → x → z
(e) कुंजी खोलने पर धारा घटती है, फ्लक्स बनाए रखने का प्रयास। उत्तर: x → r → y → x
(f) क्षेत्र-रेखाएँ लूप के तल में हैं (तल के लंबवत नहीं), अतः कोई फ्लक्स नहीं, कोई प्रेरित धारा नहीं।
प्रश्न 6.2 चित्र 6.16 में वर्णित स्थितियों के लिए लेंज के नियम का उपयोग करते हुए प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात कीजिए। (a) अनियमित आकार का तार वृत्ताकार लूप में बदल रहा हो; (b) वृत्ताकार लूप सीधे बारीक तार में विरूपित हो रहा हो।
दिया गया: क्षेत्र कागज़ के तल में भीतर की ओर (⊗ चिह्न से)।
(a) वृत्ताकार बनने से क्षेत्रफल बढ़ता है (दी गई परिमिति पर वृत्त का क्षेत्रफल अधिकतम होता है), फ्लक्स बढ़ता है; विरोध हेतु धारा वामावर्त। उत्तर: adcba (वामावर्त)
(b) सीधे तार में बदलने से क्षेत्रफल घटकर शून्य के निकट, फ्लक्स घटता है; विरोध हेतु धारा दक्षिणावर्त। उत्तर: a'd'c'b' (दक्षिणावर्त, (a) के विपरीत)
प्रश्न 6.3 एक लंबी परिनालिका के प्रति सेंटीमीटर 15 फेरे हैं। इसके अंदर 2.0 cm² का छोटा लूप परिनालिका की अक्ष के लंबवत रखा गया है। यदि परिनालिका की धारा 2.0 A से 4.0 A में 0.1 s में बदले, तो प्रेरित emf ज्ञात कीजिए।
n = 1500 फेरे/m, A = 2.0×10⁻⁴ m², dI/dt = 20 A/s
ε = μ₀nA(dI/dt) = 4π×10⁻⁷×1500×2.0×10⁻⁴×20
ε ≈ 7.5 × 10⁻⁶ V (7.5 μV)
प्रश्न 6.4 8 cm × 2 cm भुजाओं वाला कटा हुआ आयताकार लूप, 0.3 T के (लूप के तल के लंबवत) क्षेत्र से 1 cm/s की चाल से बाहर निकल रहा है। कटे सिरों पर emf ज्ञात कीजिए जब गति (a) लंबी भुजा के लंबवत हो, (b) छोटी भुजा के लंबवत हो। प्रत्येक में प्रेरित वोल्टता कितने समय टिकेगी?
(a) गति लंबी भुजा के लंबवत: प्रभावी भुजा = 8 cm; e = 0.3×0.08×0.01 = 2.4×10⁻⁴ V; समय = 0.02/0.01 = 2 s
(b) गति छोटी भुजा के लंबवत: प्रभावी भुजा = 2 cm; e = 0.3×0.02×0.01 = 6.0×10⁻⁵ V; समय = 0.08/0.01 = 8 s
प्रश्न 6.5 1.0 m लंबी धातु की छड़ एक सिरे से जाने वाले लंबवत अक्ष के परितः 400 rad/s की कोणीय आवृत्ति से घूर्णन कर रही है। दूसरा सिरा धात्विक वलय से संपर्कित है। 0.5 T का एकसमान क्षेत्र अक्ष के अनुदिश है। वलय व अक्ष के बीच emf ज्ञात कीजिए।
R = 1.0 m, ω = 400 rad/s, B = 0.5 T
ε = ∫₀ᴿ Bωr dr = ½BωR² = ½×0.5×400×(1.0)²
ε = 100 V
प्रश्न 6.6 पूर्व-पश्चिम दिशा में 10 m लंबा क्षैतिज तार 0.30×10⁻⁴ Wb/m² तीव्रता वाले पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक से लंबवत 5.0 m/s की चाल से गिर रहा है। (a) emf का तात्क्षणिक मान, (b) emf की दिशा, (c) कौन-सा सिरा उच्च विभव पर?
(a) ε = Blv = 0.30×10⁻⁴×10×5.0 = 1.5×10⁻³ V
(b) दक्षिण हस्त नियम से — गति नीचे, क्षेत्र उत्तर की ओर, अतः प्रेरित धारा पश्चिम से पूर्व की ओर।
(c) चूँकि धारा (धनावेश) पूर्व की ओर, तार का पूर्वी सिरा उच्च विभव पर।
प्रश्न 6.7 किसी परिपथ में 0.1 s में धारा 5.0 A से 0.0 A तक गिरती है। यदि औसत प्रेरित emf 200 V है, तो परिपथ का स्वप्रेरकत्व ज्ञात कीजिए।
dI = 5.0 A, dt = 0.1 s, ε = 200 V
L = ε/(dI/dt) = 200/(5.0/0.1) = 200/50
L = 4 H
प्रश्न 6.8 पास-पास रखे कुंडलियों के युग्म का अन्योन्य प्रेरकत्व 1.5 H है। यदि एक कुंडली में 0.5 s में धारा 0 से 20 A परिवर्तित हो, तो दूसरी कुंडली की फ्लक्स-बंधता में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
M = 1.5 H, ΔI₁ = 20 A
Δ(N₂Φ₂) = M·ΔI₁ = 1.5×20
Δ(N₂Φ₂) = 30 Wb