d- एवं f-ब्लॉक तत्व — सम्पूर्ण अध्याय नोट्स (अध्याय 4)
रसायन विज्ञान • कक्षा-12 • अध्याय 4

d- एवं f-ब्लॉक तत्व

संक्रमण तत्वों से लेकर लैंथेनॉयड व ऐक्टिनॉयड तक — संपूर्ण अध्याय की अवधारणाएँ, तथ्य, तालिकाएँ, आरेख, पाठ्यनिहित प्रश्न (4.1–4.11) तथा अभ्यास प्रश्न (4.1–4.38) के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।

(n−1)d¹⁻¹⁰ns¹⁻² d-ब्लॉक विन्यास
μ = √n(n+2) BM चुंबकीय आघूर्ण
Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O
★ NEET फोकस तथ्य
अवधारणा

4.1 परिचय

आवर्त सारणी को चार बड़े ब्लॉक — s, p, d और f — में बाँटा गया है। जब किसी तत्व के परमाणु में सबसे बाद में जुड़ने वाला इलेक्ट्रॉन d-कक्षक में प्रवेश करता है तो उस तत्व को d-ब्लॉक तत्व कहा जाता है, और यदि यह इलेक्ट्रॉन f-कक्षक में जाता है तो तत्व f-ब्लॉक में आता है। d-ब्लॉक तत्वों को संक्रमण तत्व (Transition Elements) तथा f-ब्लॉक तत्वों को आंतरिक संक्रमण तत्व (Inner Transition Elements) कहते हैं।

IUPAC की परिभाषा के अनुसार, संक्रमण तत्व वे तत्व हैं जिनके परमाणु या आयन में d-कक्षक अपूर्ण (आंशिक रूप से भरा) होता है। इसी कारण Zn, Cd और Hg — जिनका d-कक्षक (d¹⁰) उनकी मूल एवं सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था दोनों में पूर्ण भरा रहता है — को सामान्यतः संक्रमण तत्व नहीं माना जाता, हालाँकि सुविधा के लिए इनका अध्ययन संक्रमण तत्वों के साथ ही किया जाता है।

याद रखने की तरकीब: "d-ब्लॉक = आवर्त सारणी का मध्य भाग (वर्ग 3–12)" और "f-ब्लॉक = आवर्त सारणी के नीचे अलग से रखे गए दो खंड (लैंथेनॉयड व ऐक्टिनॉयड)"।
त्वरित तथ्य — 4.1
  • d-ब्लॉक: वर्ग 3–12, चार आवर्त (3d, 4d, 5d, 6d)।
  • f-ब्लॉक: दो शृंखलाएँ — 4f (लैंथेनॉयड, Ce–Lu) व 5f (ऐक्टिनॉयड, Th–Lr)।
  • संक्रमण तत्व की IUPAC परिभाषा: परमाणु या किसी आयन में d-कक्षक अपूर्ण।
  • Zn, Cd, Hg को संक्रमण तत्व नहीं माना जाता (d¹⁰ पूर्ण भरा)।
आवर्त सारणी

4.2 आवर्त सारणी में स्थिति

d-ब्लॉक में वर्ग 3 से 12 तक के तत्व आते हैं और चार दीर्घ आवर्तों में d-कक्षक भरे जाते हैं — इन्हें 3d, 4d, 5d और 6d श्रेणी कहा जाता है। f-ब्लॉक के तत्व दो श्रेणियों में बँटे हैं — 4f श्रेणी (लैंथेनॉयड, Ce से Lu तक) और 5f श्रेणी (ऐक्टिनॉयड, Th से Lr तक)।

s-ब्लॉक d-ब्लॉक (वर्ग 3–12) 3d, 4d, 5d, 6d श्रेणियाँ p-ब्लॉक f-ब्लॉक (आवर्त सारणी के नीचे अलग खंड) लैंथेनॉयड (4f, Ce–Lu) तथा ऐक्टिनॉयड (5f, Th–Lr)
चित्र: आवर्त सारणी में d- व f-ब्लॉक की सापेक्ष स्थिति (योजनाबद्ध)
श्रेणीतत्वपरमाणु क्रमांक परास
3d श्रेणी (प्रथम)Sc से Zn21–30
4d श्रेणी (द्वितीय)Y से Cd39–48
5d श्रेणी (तृतीय)La, Hf से Hg57, 72–80
6d श्रेणी (चतुर्थ)Ac, Rf से Cn89, 104–112
4f श्रेणीलैंथेनॉयड (Ce–Lu)58–71
5f श्रेणीऐक्टिनॉयड (Th–Lr)90–103
त्वरित तथ्य — 4.2
  • d-ब्लॉक: वर्ग 3–12, चार श्रेणियाँ (3d, 4d, 5d, 6d)।
  • f-ब्लॉक: 4f (लैंथेनॉयड) और 5f (ऐक्टिनॉयड) — आवर्त सारणी के नीचे अलग खंड।
  • लैंथेनॉयड: Ce (Z=58) से Lu (Z=71) तक 14 तत्व।
  • ऐक्टिनॉयड: Th (Z=90) से Lr (Z=103) तक 14 तत्व।
विन्यास

4.3 संक्रमण तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

संक्रमण तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n−1)d¹⁻¹⁰ns¹⁻² होता है। यहाँ (n−1)d, भीतरी d-कक्षक को दर्शाता है जिसमें 1 से 10 तक इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, जबकि बाहरी ns कक्षक में 1 या 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। चूँकि (n−1)d और ns कक्षकों की ऊर्जाओं में बहुत कम अंतर होता है, इसलिए इस सामान्य नियम के कुछ अपवाद देखने को मिलते हैं — जैसे Cr का विन्यास 3d⁵4s¹ (न कि 3d⁴4s²) और Cu का विन्यास 3d¹⁰4s¹ (न कि 3d⁹4s²) होता है। इसका कारण यह है कि अर्ध-भरित (d⁵) और पूर्ण-भरित (d¹⁰) कक्षकों को अतिरिक्त स्थायित्व प्राप्त होता है।

तत्वScTiVCrMnFeCoNiCuZn
Z21222324252627282930
4s2221222212
3d123556781010
याद रखने योग्य बिंदु
  • Zn, Cd, Hg का सामान्य सूत्र (n−1)d¹⁰ns² है — पूर्ण भरे d-कक्षक के कारण इन्हें विशिष्ट रूप से संक्रमण तत्व नहीं माना जाता।
  • Cr व Mo और Cu, Ag, Au में अर्ध/पूर्ण भरित स्थायित्व के कारण अपवाद विन्यास मिलते हैं।
  • d-ब्लॉक तत्वों से आयन बनते समय पहले ns इलेक्ट्रॉन निकलते हैं, बाद में (n−1)d इलेक्ट्रॉन।
  • Sc (Z=21) संक्रमण तत्व है (3d¹ अपूर्ण); Zn (Z=30) नहीं (3d¹⁰ पूर्ण)।
गुणधर्म

4.4 संक्रमण तत्वों के सामान्य गुण — भौतिक गुण

लगभग सभी संक्रमण तत्व धात्विक गुण दर्शाते हैं — उच्च तनन सामर्थ्य, तन्यता, वर्धनीयता तथा उत्कृष्ट ऊष्मीय व विद्युत चालकता। Zn, Cd, Hg तथा Mn जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर, सामान्य ताप पर इनकी विशिष्ट धात्विक जालक संरचनाएँ (bcc, hcp, ccp) होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक बहुत ऊँचे होते हैं क्योंकि अंतरापरमाण्विक धात्विक बंधन में ns इलेक्ट्रॉनों के अतिरिक्त (n−1)d इलेक्ट्रॉन भी भाग लेते हैं, जिससे प्रबल अंतरापरमाण्विक आबंध बनता है।

प्रत्येक श्रेणी में गलनांक तथा कणन एन्थैल्पी (enthalpy of atomisation) का उच्चतम मान लगभग मध्य में (d⁵ विन्यास के आसपास) पाया जाता है, क्योंकि प्रति d-कक्षक एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन का होना प्रबल अंतरापरमाण्विक अन्योन्यक्रिया के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है। दूसरी व तीसरी श्रेणी की धातुओं की कणन एन्थैल्पी प्रथम श्रेणी की तुलना में अधिक होती है — यही कारण है कि भारी संक्रमण धातुओं के यौगिकों में धातु-धातु आबंध बहुधा बनते हैं।

त्वरित तथ्य — 4.4
  • संक्रमण धातुओं के गलनांक/क्वथनांक व कणन एन्थैल्पी उच्च होते हैं।
  • d⁵ विन्यास के पास कणन एन्थैल्पी का शिखर होता है।
  • Cr, Mo, W सबसे उच्च कणन एन्थैल्पी वाली धातुओं में हैं।
  • Zn की कणन एन्थैल्पी (126 kJ/mol) श्रेणी में सबसे कम — क्योंकि d-इलेक्ट्रॉन धात्विक बंधन में भाग नहीं लेते।
आकार

4.5 परमाण्विक एवं आयनिक आकार में परिवर्तन

किसी श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है परंतु अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन भी उसी (n−1)d उपकोश में प्रवेश करता है। चूँकि d-इलेक्ट्रॉनों का आवरण प्रभाव (screening effect) कमजोर होता है, इसलिए नाभिकीय आवेश व बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच नेट आकर्षण बढ़ता है, जिससे त्रिज्या में हल्की कमी आती है। हालाँकि यह कमी बहुत नियमित नहीं होती।

एक रोचक तथ्य यह है कि द्वितीय संक्रमण श्रेणी (4d) के तत्वों का आकार प्रथम श्रेणी (3d) से बड़ा होता है, परंतु तृतीय संक्रमण श्रेणी (5d) के तत्वों की त्रिज्याएँ लगभग द्वितीय श्रेणी के बराबर ही रह जाती हैं। इसका कारण है लैंथेनॉयड आकुंचन (Lanthanoid Contraction) — 5d कक्षक भरने से पहले 4f कक्षकों में 14 इलेक्ट्रॉन भरते हैं, और चूँकि एक 4f इलेक्ट्रॉन दूसरे 4f इलेक्ट्रॉन को बहुत कम परिरक्षित (shield) करता है, इसलिए बढ़ते नाभिकीय आवेश के साथ त्रिज्या में लगातार कमी होती जाती है। परिणामस्वरूप Zr (160 pm) और Hf (159 pm) जैसी जोड़ी की त्रिज्याएँ लगभग समान हो जाती हैं, और इसी कारण द्वितीय व तृतीय श्रेणी की संगत धातुओं (जैसे Zr-Hf, Nb-Ta) को रासायनिक रूप से अलग करना कठिन होता है।

त्वरित तथ्य — 4.5
  • श्रेणी में परमाणु त्रिज्या घटती है (नियमित रूप से नहीं) — d-इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण कमजोर है।
  • Zr व Hf की त्रिज्याएँ लगभग समान — लैंथेनॉयड आकुंचन का प्रभाव।
  • लैंथेनॉयड आकुंचन का कारण: 4f इलेक्ट्रॉनों का अपूर्ण परिरक्षण।
आयनन

4.6 आयनन एन्थैल्पी

किसी श्रेणी में बाएँ से दाएँ बढ़ने पर आयनन एन्थैल्पी में वृद्धि होती है, परंतु मुख्य वर्ग तत्वों की तुलना में यह वृद्धि उतनी तीव्र नहीं होती — क्योंकि (n−1)d कक्षक से इलेक्ट्रॉन निकलना ऊर्जा की दृष्टि से बहुत बाधक नहीं होता, इसलिए संक्रमण तत्व प्रायः अनेक परिवर्ती (variable) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखाते हैं।

प्रथम आयनन एन्थैल्पी की प्रवृत्ति में कुछ अनियमितता होती है, जिसका कारण 4s व 3d कक्षकों की आपेक्षिक ऊर्जाओं में परिवर्तन है। द्वितीय व तृतीय आयनन एन्थैल्पी की व्याख्या के लिए विनिमय ऊर्जा (Exchange Energy) तथा हुंड के नियम का उपयोग किया जाता है — अर्ध-भरित (d⁵) व पूर्ण-भरित (d¹⁰/d⁰) विन्यासों को अतिरिक्त स्थायित्व मिलता है, इसलिए इनसे इलेक्ट्रॉन निकालना कठिन होता है। उदाहरण के लिए Mn²⁺ (d⁵) व Zn²⁺ (d¹⁰) से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए (तृतीय आयनन एन्थैल्पी) अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा चाहिए।

त्वरित तथ्य — 4.6
  • श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है परंतु असंक्रमण तत्वों जितनी तेज़ी से नहीं।
  • d⁵ (Mn²⁺) व d¹⁰ (Zn²⁺) विन्यासों को अतिरिक्त स्थायित्व — विनिमय ऊर्जा अधिकतम।
  • Cr व Cu पर आयनन एन्थैल्पी में विसंगति — असामान्य विन्यास (d⁵s¹, d¹⁰s¹) के कारण।
ऑक्सीकरण

4.7 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ

संक्रमण तत्वों की एक विशिष्ट पहचान है — एक ही तत्व द्वारा कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाना। अधिकतम संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ श्रेणी के मध्य वाले तत्व दिखाते हैं — जैसे Mn, +2 से +7 तक सभी अवस्थाएँ दर्शाता है। श्रेणी के आरंभ (Sc, Ti) में त्याग के लिए कम इलेक्ट्रॉन उपलब्ध होते हैं, जबकि अंत (Cu, Zn) में d-कक्षकों की भागीदारी के लिए कम कक्षक उपलब्ध होते हैं — इसलिए दोनों सिरों पर ऑक्सीकरण अवस्थाओं की संख्या कम रहती है।

तत्वScTiVCrMnFeCoNiCuZn
अति सामान्य अवस्था+3+4+5+3+2+2,+3+2+2+2+2
अन्य अवस्थाएँ+2,+3+2,+3,+4+2,+4,+5,+6+3,+4,+5,+6,+7+4,+5,+6+3,+4+3,+4+1
ऑक्सीकरण अवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण नियम
  • Mn तक अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था = 4s + 3d इलेक्ट्रॉनों का योग (Mn में +7)।
  • असंक्रमण तत्वों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में 2 का अंतर, संक्रमण तत्वों में प्रायः 1 का अंतर।
  • निम्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (शून्य सहित) तब मिलती हैं जब लिगंड में π-ग्राही गुण हों — Ni(CO)₄, Fe(CO)₅।
  • d-ब्लॉक में भारी सदस्यों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी (Mo(VI), W(VI) > Cr(VI))।
  • Sc केवल +3 अवस्था दर्शाता है (कोई परिवर्तनशीलता नहीं)।
  • Zn की एकमात्र अवस्था +2 है (d-इलेक्ट्रॉन की भागीदारी नहीं)।
विभव

4.8 मानक इलेक्ट्रोड विभव में प्रवृत्तियाँ

M²⁺/M विभव: यह मान श्रेणी में द्विसंयोजी धनायन बनाने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। सामान्य प्रवृत्ति यह है कि प्रथम व द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के योग में वृद्धि के साथ E° के मान कम ऋणात्मक होते जाते हैं। परंतु Mn, Ni व Zn के E° मान इस सामान्य प्रवृत्ति से अपेक्षाकृत अधिक ऋणात्मक हैं — Mn²⁺(d⁵) व Zn²⁺(d¹⁰) के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण, जबकि Ni का असामान्य मान इसकी उच्चतम ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी से जुड़ा है। कॉपर का E° धनात्मक (+0.34V) होने के कारण यह तनु अम्लों से H₂ मुक्त नहीं कर पाता — इसे केवल ऑक्सीकारक अम्ल (सांद्र HNO₃, गर्म सांद्र H₂SO₄) ही घोल पाते हैं।

M³⁺/M²⁺ विभव: Mn³⁺ व Co³⁺ जलीय विलयन में प्रबल ऑक्सीकारक हैं (क्योंकि Mn²⁺ का d⁵ विन्यास विशेष स्थायी है), जबकि Ti²⁺, V²⁺ व Cr²⁺ प्रबल अपचायक हैं (क्योंकि इनकी तीन-संयोजी अवस्था अधिक स्थायी है)।

त्वरित तथ्य — 4.8
  • Cu का E°(M²⁺/M) धनात्मक (+0.34V) — इसीलिए Cu तनु अम्ल से H₂ मुक्त नहीं करता।
  • Mn³⁺ व Co³⁺ जलीय विलयन में प्रबल ऑक्सीकारक हैं।
  • Ti²⁺, V²⁺, Cr²⁺ प्रबल अपचायक हैं (तनु अम्ल से H₂ मुक्त करते हैं)।
  • E°(Mn³⁺/Mn²⁺) का असामान्य उच्च धनात्मक मान — Mn²⁺ (d⁵) के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण।
अभिक्रियाशीलता

4.9 रासायनिक अभिक्रियाशीलता

संक्रमण धातुओं की रासायनिक अभिक्रियाशीलता में व्यापक भिन्नता पाई जाती है। कॉपर को छोड़कर प्रथम श्रेणी के अधिकतर तत्व 1M H⁺ आयनों द्वारा ऑक्सीकृत हो जाते हैं, यद्यपि टाइटेनियम व वैनेडियम जैसे कुछ तत्व द्रुतिक (kinetically) रूप से कक्ष ताप पर तनु ऑक्सीकारक अम्लों के प्रति निष्क्रिय व्यवहार करते हैं। सिल्वर, गोल्ड, प्लैटिनम जैसी बहुमूल्य धातुएँ 'उत्कृष्ट' श्रेणी में आती हैं जो सामान्य अम्लों द्वारा प्रभावित नहीं होतीं।

त्वरित तथ्य — 4.9
  • संक्रमण धातुओं की अभिक्रियाशीलता में व्यापक भिन्नता — स्कैंडियम से प्लैटिनम तक।
  • प्रथम श्रेणी की अधिकांश धातुएँ तनु अम्लों में घुल जाती हैं (Cu को छोड़कर)।
  • उत्कृष्ट धातुएँ (Ag, Au, Pt) सामान्य अम्लों से अप्रभावित।
चुंबकत्व

4.10 चुंबकीय गुण

पदार्थों में मुख्यतः दो प्रकार का चुंबकीय व्यवहार देखा जाता है — प्रतिचुंबकत्व (diamagnetism), जिसमें पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षित होते हैं (सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित), और अनुचुंबकत्व (paramagnetism), जिसमें पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं (अयुगलित इलेक्ट्रॉन उपस्थित)। बहुत से संक्रमण धातु आयन अनुचुंबकीय होते हैं। प्रथम श्रेणी की धातुओं में कक्षीय कोणीय संवेग का योगदान प्रभावी रूप से शमित (quenched) हो जाता है, इसलिए चुंबकीय आघूर्ण की गणना "प्रचक्रण-मात्र" (spin-only) सूत्र से की जाती है:

प्रचक्रण-मात्र चुंबकीय आघूर्ण μ = √n(n+2) BM   (जहाँ n = अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या)

चुंबकीय आघूर्ण का मान जितना अधिक, अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या उतनी ही अधिक। d⁰ व d¹⁰ विन्यास वाले आयन प्रतिचुंबकीय होते हैं (कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं)।

त्वरित तथ्य — 4.10
  • अनुचुंबकत्व: अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति — चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षण।
  • प्रतिचुंबकत्व: सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित — चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षण।
  • प्रचक्रण-मात्र सूत्र: μ = √n(n+2) BM।
  • d⁰ (Sc³⁺, Ti⁴⁺) व d¹⁰ (Zn²⁺, Cu⁺) आयन प्रतिचुंबकीय व रंगहीन।
रंग

4.11 रंगीन आयनों का बनना

जब एक निम्न-ऊर्जा वाले d-कक्षक से इलेक्ट्रॉन का उत्तेजन (excitation) उच्च-ऊर्जा वाले d-कक्षक में होता है, तो उत्तेजन के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रायः दृश्य प्रकाश क्षेत्र (visible region) की आवृत्ति के बराबर होती है। जो प्रकाश अवशोषित होता है, उसका पूरक रंग हमें दिखाई देता है। यह घटना केवल तभी संभव है जब d-कक्षक आंशिक रूप से भरा हो (d¹ से d⁹) — इसीलिए d⁰ (जैसे Sc³⁺, Ti⁴⁺) व d¹⁰ (जैसे Zn²⁺, Cu⁺) विन्यास वाले आयन रंगहीन होते हैं।

V²⁺ (बैंगनी)
V³⁺ (हरा)
Mn²⁺ (गुलाबी)
Fe³⁺ (पीला)
Fe²⁺ (हरा)
Co²⁺ (नीला-गुलाबी)
Ni²⁺ (हरा)
Cu²⁺ (नीला)
Zn²⁺ (रंगहीन)
Sc³⁺ (रंगहीन)
कुछ जलयोजित प्रथम-श्रेणी संक्रमण धातु आयनों के प्रेक्षित रंग (संकेतात्मक)
त्वरित तथ्य — 4.11
  • रंग d-d संक्रमण (इलेक्ट्रॉनिक उत्तेजन) के कारण होता है।
  • d⁰ व d¹⁰ विन्यास वाले आयन रंगहीन व प्रतिचुंबकीय होते हैं।
  • d¹–d⁹ विन्यास वाले आयन रंगीन व अनुचुंबकीय होते हैं (f⁰/f¹⁴ को छोड़कर)।
संकुलन

4.12 संकुल यौगिकों का बनना तथा उत्प्रेरकीय गुण

संकुल यौगिक वे यौगिक हैं जिनमें धातु आयन एक निश्चित संख्या में ऋणायनों या उदासीन अणुओं (लिगंड) से बंधकर संकुलन स्पीशीज़ बनाते हैं — जैसे [Fe(CN)₆]³⁻, [Cu(NH₃)₄]²⁺। संक्रमण धातुएँ आसानी से संकुल बनाती हैं क्योंकि इनके धातु आयनों का आकार छोटा होता है, इन पर उच्च आयनिक आवेश होता है, और आबंध बनाने के लिए रिक्त d-कक्षक उपलब्ध होते हैं।

संक्रमण धातुएँ व इनके यौगिक उत्प्रेरकीय सक्रियता के लिए प्रसिद्ध हैं — जैसे संस्पर्श प्रक्रम में V₂O₅, हाबर प्रक्रम में सूक्ष्म विभाजित Fe, और उत्प्रेरकीय हाइड्रोजनीकरण में Ni। यह गुण इनकी परिवर्तनशील संयोजकता (variable oxidation states) व संकुल बनाने की क्षमता के कारण होता है।

त्वरित तथ्य — 4.12
  • संक्रमण धातुएँ संकुल यौगिक आसानी से बनाती हैं — छोटा आकार, उच्च आवेश, रिक्त d-कक्षक।
  • V₂O₅ (संस्पर्श प्रक्रम), Fe (हाबर प्रक्रम), Ni (हाइड्रोजनीकरण) — प्रमुख उत्प्रेरक।
  • PdCl₂ — वाकर प्रक्रम में उत्प्रेरक।
  • TiCl₄ + Al(CH₃)₃ — ज़ीगलर उत्प्रेरक (पॉलीएथिलीन उत्पादन)।
अंतराकाशी

4.13 अंतराकाशी यौगिक तथा मिश्रातु

जब संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक के भीतर H, N या C जैसे छोटे आकार के परमाणु समा जाते हैं, तो अंतराकाशी यौगिक (Interstitial Compounds) बनते हैं — जैसे TiC, Mn₄N, Fe₃H। ये असमीकरणमितीय (non-stoichiometric), न आयनिक और न सहसंयोजी होते हैं। इनके गलनांक शुद्ध धातुओं से भी अधिक ऊँचे, कठोरता अत्यधिक (कुछ बोराइड लगभग हीरे जितने कठोर), धात्विक चालकता सुरक्षित तथा रासायनिक रूप से निष्क्रिय होती हैं।

मिश्रातु (Alloys) विभिन्न धातुओं के सम्मिश्रण से प्राप्त समांगी ठोस विलयन होते हैं। चूँकि संक्रमण धातुओं की त्रिज्याओं में अधिक भिन्नता नहीं होती (15% से कम अंतर), इसलिए ये आसानी से मिश्रातु बनाती हैं — जैसे फेरस मिश्रातु (स्टेनलेस स्टील में Cr, Mn, Ni, W, Mo), पीतल (Cu-Zn), कांसा (Cu-Sn)।

त्वरित तथ्य — 4.13
  • अंतराकाशी यौगिक असमीकरणमितीय, अति कठोर, धात्विक चालक व रासायनिक रूप से निष्क्रिय होते हैं।
  • 15% से कम त्रिज्या-अंतर वाली धातुएँ आसानी से मिश्रातु बनाती हैं।
  • अंतराकाशी यौगिकों के गलनांक शुद्ध धातुओं से भी ऊँचे होते हैं।
महत्वपूर्ण यौगिक

4.14 संक्रमण तत्वों के कुछ महत्वपूर्ण यौगिक

(क) पोटैशियम डाइक्रोमेट, K₂Cr₂O₇

यह चर्म उद्योग व ऐज़ो-यौगिकों के संश्लेषण में एक महत्वपूर्ण ऑक्सीकारक रसायन है। इसे क्रोमाइट अयस्क (FeCr₂O₄) को वायु की उपस्थिति में सोडियम कार्बोनेट के साथ संगलित करके क्रोमेट बनाया जाता है, फिर इसे अम्लीकृत कर सोडियम डाइक्रोमेट में बदला जाता है, और अंत में पोटैशियम क्लोराइड मिलाकर कम विलेय पोटैशियम डाइक्रोमेट अवक्षेपित किया जाता है।

निर्माण अभिक्रियाएँ 4FeCr₂O₄ + 8Na₂CO₃ + 7O₂ → 8Na₂CrO₄ + 2Fe₂O₃ + 8CO₂
2Na₂CrO₄ + 2H⁺ → Na₂Cr₂O₇ + 2Na⁺ + H₂O
Na₂Cr₂O₇ + 2KCl → K₂Cr₂O₇ + 2NaCl

जलीय विलयन में क्रोमेट (CrO₄²⁻, चतुष्फलकीय, pH उच्च पर) व डाइक्रोमेट (Cr₂O₇²⁻, दो चतुष्फलकों का शीर्ष-साझा रूप, pH निम्न पर) आपस में अंतरारूपांतरित होते हैं (pH पर निर्भर): 2CrO₄²⁻ + 2H⁺ ⇌ Cr₂O₇²⁻ + H₂O

अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट प्रबल ऑक्सीकारक है: Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O (E° = 1.33V)। यह I⁻ को I₂ में, Fe²⁺ को Fe³⁺ में, तथा Sn²⁺ को Sn⁴⁺ में ऑक्सीकृत कर देता है।

(ख) पोटैशियम परमैंगनेट, KMnO₄

इसे बनाने के लिए MnO₂ (पाइरोलुसाइट अयस्क) को क्षारीय माध्यम में वायु या KNO₃ के साथ संगलित कर हरा K₂MnO₄ (मैंगनेट, Mn(VI)) प्राप्त किया जाता है, जो उदासीन या अम्लीय माध्यम में असमानुपातित होकर बैंगनी KMnO₄ (परमैंगनेट, Mn(VII)) देता है:

निर्माण अभिक्रियाएँ 2MnO₂ + 4KOH + O₂ → 2K₂MnO₄ + 2H₂O
3MnO₄²⁻ + 4H⁺ → 2MnO₄⁻ + MnO₂ + 2H₂O

औद्योगिक स्तर पर मैंगनेट का वैद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण किया जाता है। KMnO₄ गहरे बैंगनी (लगभग काले) क्रिस्टल बनाता है, 513K पर विघटित हो जाता है, तथा प्रतिचुंबकीय होता है (कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं, जबकि हरा मैंगनेट आयन एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन के कारण अनुचुंबकीय है)।

अम्लीय माध्यम में KMnO₄ प्रबल ऑक्सीकारक है: MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O (E° = +1.52V)। यह I⁻ को I₂ में, Fe²⁺ को Fe³⁺ में, ऑक्सैलेट को CO₂ में, तथा H₂S को S में ऑक्सीकृत करता है। HCl की उपस्थिति में परमैंगनेट का अनुमापन असंतोषजनक होता है क्योंकि HCl स्वयं Cl₂ में ऑक्सीकृत हो जाता है।

त्वरित तथ्य — 4.14
  • क्रोमाइट अयस्क = FeCr₂O₄; पाइरोलुसाइट अयस्क = MnO₂।
  • क्रोमेट (पीला, चतुष्फलकीय) ⇌ डाइक्रोमेट (नारंगी) — pH निर्भर संतुलन।
  • Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O, E° = 1.33V।
  • MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O, E° = 1.52V।
  • मैंगनेट (हरा) अनुचुंबकीय; परमैंगनेट (बैंगनी) प्रतिचुंबकीय।
  • KMnO₄ 513K पर विघटित होता है: 2KMnO₄ → K₂MnO₄ + MnO₂ + O₂।
f-ब्लॉक — 4f

4.15 लैंथेनॉयड (Lanthanoids)

लैंथेनम के बाद आने वाले चौदह तत्व (Ce से Lu, Z=58–71) लैंथेनॉयड कहलाते हैं, इन्हें सामान्य संकेत Ln से दर्शाया जाता है। इनका सामान्य विन्यास 4fⁿ 5d⁰⁻¹ 6s² है। इनकी सबसे स्थायी ऑक्सीकरण अवस्था +3 है, यद्यपि कुछ तत्व +2 (Eu²⁺, Yb²⁺) व +4 (Ce⁴⁺, Tb⁴⁺) भी दर्शाते हैं — यह अनियमितता खाली (f⁰), अर्ध-भरित (f⁷) व पूर्ण-भरित (f¹⁴) विन्यासों के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण है।

लैंथेनॉयड आकुंचन — श्रेणी में परमाणु व आयनिक त्रिज्याओं में क्रमिक व नियमित ह्रास — इस श्रेणी की सबसे विशिष्ट पहचान है, जिसका परिणाम आगे आने वाले 5d संक्रमण तत्वों के गुणों पर पड़ता है (जैसे Zr-Hf का लगभग समान आकार व रसायन)।

सामान्य गुण: सभी लैंथेनॉयड चाँदी जैसे श्वेत, मुलायम धातु हैं, जो वायु में शीघ्र बदरंग हो जाते हैं; गलनांक 1000–1200K के बीच (Sm को छोड़कर, जो 1623K पर पिघलता है); जल से क्रिया कर +3 आयन बनाते हैं; La³⁺ व Lu³⁺ रंगहीन हैं जबकि शेष सभी f-इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण रंगीन व (f⁰ तथा f¹⁴ को छोड़कर) अनुचुंबकीय हैं।

उपयोग: "मिश्र धातु" (Misch Metal — ~95% लैंथेनॉयड + ~5% Fe + लेशमात्र S, C, Ca, Al) का उपयोग लाइटर फ्लिंट, बंदूक की गोली व हल्के मिश्रातु में होता है; लैंथेनॉयड ऑक्साइड पेट्रोलियम भंजन में उत्प्रेरक तथा TV स्क्रीन में फॉस्फर के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

त्वरित तथ्य — 4.15
  • लैंथेनॉयड = La के बाद के 14 तत्व (Ce–Lu); सामान्य संकेत Ln।
  • सामान्य विन्यास: 4fⁿ 5d⁰⁻¹ 6s²; स्थायी अवस्था +3।
  • अपवाद अवस्थाएँ: Ce⁴⁺ (f⁰), Eu²⁺ (f⁷), Tb⁴⁺ (f⁷), Yb²⁺ (f¹⁴), Sm²⁺।
  • लैंथेनॉयड आकुंचन: 4f इलेक्ट्रॉनों का दुर्बल परिरक्षण → त्रिज्या में क्रमिक ह्रास।
  • मिश्र धातु (Misch Metal): ~95% लैंथेनॉयड + ~5% Fe + लेशमात्र S,C,Ca,Al।
f-ब्लॉक — 5f

4.16 ऐक्टिनॉयड (Actinoids)

ऐक्टिनियम के बाद आने वाले चौदह तत्व (Th से Lr, Z=90–103) ऐक्टिनॉयड कहलाते हैं। इनका सामान्य विन्यास 5fⁿ है। यह सभी तत्व रेडियोसक्रिय (radioactive) हैं — प्रारंभिक सदस्यों की अर्धायु अपेक्षाकृत लंबी, जबकि बाद वाले सदस्यों की अर्धायु कुछ मिनट तक ही सीमित है (Lr की अर्धायु मात्र 3 मिनट)।

ऐक्टिनॉयडों का रसायन लैंथेनॉयडों की तुलना में अधिक जटिल है क्योंकि इनकी ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परास बहुत विस्तृत है (+3 से +7 तक), जिसका कारण 5f, 6d व 7s कक्षकों की लगभग समान ऊर्जा है। फिर भी सामान्य स्थायी अवस्था +3 है। ऐक्टिनॉयड आकुंचन भी होता है, जो लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र (एक तत्व से अगले तक ज्यादा) होता है, क्योंकि 5f इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव 4f से भी कमजोर होता है।

त्वरित तथ्य — 4.16
  • ऐक्टिनॉयड = Ac के बाद के 14 तत्व (Th–Lr); सभी रेडियोसक्रिय।
  • सामान्य विन्यास: 5fⁿ 6d⁰⁻¹ 7s²; ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परास +3 से +7 तक।
  • ऐक्टिनॉयड आकुंचन, लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र (5f का और भी कमजोर परिरक्षण)।
  • ऐक्टिनॉयडों का रसायन लैंथेनॉयडों से अधिक जटिल व अनियमित।
  • Lr (Z=103) ऐक्टिनॉयड श्रेणी का अंतिम तत्व — [Rn]5f¹⁴6d¹7s²।
अनुप्रयोग

4.17 d- एवं f-ब्लॉक तत्वों के कुछ अनुप्रयोग

  • लोहा व इस्पात — निर्माण उद्योग की रीढ़, जिनमें Cr, Mn, Ni मिश्रातु तत्वों के रूप में उपयोग होते हैं।
  • V₂O₅ — संस्पर्श प्रक्रम (H₂SO₄ उत्पादन) में उत्प्रेरक।
  • TiCl₄ + Al(CH₃)₃ (ज़ीग्लर उत्प्रेरक) — पॉलीएथिलीन उत्पादन में।
  • Fe — हाबर प्रक्रम (अमोनिया संश्लेषण) में उत्प्रेरक।
  • Ni — तेल/वसा के हाइड्रोजनीकरण में उत्प्रेरक।
  • PdCl₂ — वाकर प्रक्रम (एथाइन से एथेनल बनाने) में उत्प्रेरक।
  • AgBr — फोटोग्राफी उद्योग में प्रकाश-संवेदनशीलता के लिए।
  • TiO — वर्णक उद्योग में सफेद रंगद्रव्य के रूप में।
  • MnO₂ — शुष्क बैटरी सेल में।
  • मिश्र धातु — लाइटर फ्लिंट, हल्के मिश्रातुओं में।
रिवीज़न पैक

4.18 महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य

🔑 जल्दी दोहराने के लिए (Quick Revision Facts)
  • d-ब्लॉक में वर्ग 3–12 आते हैं; f-ब्लॉक को आवर्त सारणी के नीचे अलग रखा जाता है।
  • संक्रमण तत्व की IUPAC परिभाषा: जिसके परमाणु/आयन में d-कक्षक अपूर्ण हो।
  • Zn, Cd, Hg संक्रमण तत्व नहीं माने जाते (मूल व सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था दोनों में d¹⁰)।
  • सामान्य विन्यास: (n−1)d¹⁻¹⁰ns¹⁻²।
  • Cr का विन्यास 3d⁵4s¹ तथा Cu का विन्यास 3d¹⁰4s¹ है (अपवाद)।
  • Sc (Z=21) संक्रमण तत्व है क्योंकि 3d¹ अपूर्ण है; Zn (Z=30) नहीं क्योंकि 3d¹⁰ पूर्ण है।
  • संक्रमण धातुओं के गलनांक/क्वथनांक व कणन एन्थैल्पी उच्च होते हैं; d⁵ विन्यास के पास शिखर।
  • Cr, Mo, W सबसे उच्च कणन एन्थैल्पी वाली धातुओं में हैं।
  • श्रेणी में परमाणु त्रिज्या घटती है (नियमित रूप से नहीं) क्योंकि d-इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण कमजोर है।
  • Zr व Hf की त्रिज्याएँ लगभग समान — लैंथेनॉयड आकुंचन का प्रभाव।
  • लैंथेनॉयड आकुंचन का कारण: 4f इलेक्ट्रॉनों का अपूर्ण परिरक्षण।
  • श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है परंतु असंक्रमण तत्वों जितनी तेज़ी से नहीं।
  • d⁵ (Mn²⁺) व d¹⁰ (Zn²⁺) विन्यासों को अतिरिक्त स्थायित्व — विनिमय ऊर्जा अधिकतम।
  • Mn सर्वाधिक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2 से +7) दिखाता है।
  • Sc केवल +3 अवस्था दर्शाता है (कोई परिवर्तनशील अवस्था नहीं)।
  • Zn की एकमात्र अवस्था +2 है (d-इलेक्ट्रॉन की भागीदारी नहीं)।
  • Cu की सामान्य अवस्थाएँ +1 व +2 हैं।
  • असंक्रमण तत्वों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में 2 का अंतर, संक्रमण तत्वों में प्रायः 1 का अंतर।
  • Ni(CO)₄ व Fe(CO)₅ में धातु की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है (π-ग्राही CO लिगंड के कारण)।
  • Cu का E°(M²⁺/M) धनात्मक (+0.34V) — इसीलिए Cu तनु अम्ल से H₂ मुक्त नहीं करता।
  • Mn³⁺ व Co³⁺ जलीय विलयन में प्रबल ऑक्सीकारक हैं।
  • Ti²⁺, V²⁺, Cr²⁺ प्रबल अपचायक हैं (तनु अम्ल से H₂ मुक्त करते हैं)।
  • चुंबकीय आघूर्ण सूत्र: μ = √n(n+2) BM, n = अयुगलित इलेक्ट्रॉन।
  • d⁰ व d¹⁰ विन्यास वाले आयन रंगहीन व प्रतिचुंबकीय होते हैं।
  • रंग d-d संक्रमण (इलेक्ट्रॉनिक उत्तेजन) के कारण होता है।
  • संक्रमण धातुएँ संकुल यौगिक आसानी से बनाती हैं — छोटा आकार, उच्च आवेश, रिक्त d-कक्षक।
  • V₂O₅ (संस्पर्श प्रक्रम), Fe (हाबर प्रक्रम), Ni (हाइड्रोजनीकरण) — प्रमुख उत्प्रेरक उदाहरण।
  • अंतराकाशी यौगिक असमीकरणमितीय, अति कठोर, धात्विक चालक व रासायनिक रूप से निष्क्रिय होते हैं।
  • 15% से कम त्रिज्या-अंतर वाली धातुएँ आसानी से मिश्रातु बनाती हैं।
  • क्रोमाइट अयस्क = FeCr₂O₄; पाइरोलुसाइट अयस्क = MnO₂।
  • क्रोमेट (पीला, चतुष्फलकीय) ⇌ डाइक्रोमेट (नारंगी, दो चतुष्फलकों का शीर्ष-साझा रूप) — pH निर्भर संतुलन।
  • Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O, E° = 1.33V।
  • MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O, E° = 1.52V।
  • मैंगनेट आयन (हरा) अनुचुंबकीय; परमैंगनेट आयन (बैंगनी) प्रतिचुंबकीय।
  • लैंथेनॉयड = La के बाद के 14 तत्व (Ce–Lu); सामान्य संकेत Ln।
  • ऐक्टिनॉयड = Ac के बाद के 14 तत्व (Th–Lr); सभी रेडियोसक्रिय।
  • लैंथेनॉयडों की स्थायी अवस्था +3; अपवाद: Ce⁴⁺, Eu²⁺, Tb⁴⁺, Yb²⁺, Sm²⁺।
  • ऐक्टिनॉयडों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परास लैंथेनॉयडों से कहीं अधिक विस्तृत है।
  • ऐक्टिनॉयड आकुंचन, लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र है।
  • मिश्र धातु (Misch Metal): ~95% लैंथेनॉयड + ~5% Fe + लेशमात्र S,C,Ca,Al।
  • Cu⁺ जलीय विलयन में असमानुपातित होकर Cu²⁺ व Cu देता है (2Cu⁺ → Cu²⁺ + Cu)।

4.19 पाठ्यनिहित प्रश्नों के हल (4.1–4.11)

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें।

4.1 सिल्वर परमाणु की मूल अवस्था में पूर्ण भरित d कक्षक (4d¹⁰) हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक संक्रमण तत्व है?
यद्यपि सिल्वर (Ag) की मूल अवस्था में d-कक्षक पूर्ण भरा (4d¹⁰) है, परंतु इसकी सामान्य व स्थिर ऑक्सीकरण अवस्था +2 (Ag²⁺) में d-कक्षक अपूर्ण (4d⁹) हो जाता है।
चूँकि IUPAC परिभाषा के अनुसार तत्व को संक्रमण तत्व मानने के लिए मूल अवस्था या ऑक्सीकृत अवस्था में से किसी एक में भी d-कक्षक का अपूर्ण होना पर्याप्त है, इसलिए सिल्वर को संक्रमण तत्व माना जाता है।
4.2 श्रेणी Sc(Z=21) से Zn(Z=30) में, जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम (126 kJ/mol) होता है; क्यों?
जिंक का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d¹⁰4s² है, जिसमें d-कक्षक पूर्णतः भरा हुआ है।
चूँकि Zn के 3d-कक्षक के इलेक्ट्रॉन धात्विक (अंतरापरमाण्विक) बंधन में भाग नहीं लेते (क्योंकि यह अत्यंत स्थायी पूर्ण-भरित विन्यास है), केवल दो 4s इलेक्ट्रॉन ही धात्विक बंधन में सम्मिलित होते हैं।
परिणामस्वरूप अंतरापरमाण्विक बंधन अपेक्षाकृत दुर्बल रहता है, जिस कारण Zn की कणन एन्थैल्पी श्रेणी में सबसे कम होती है।
4.3 संक्रमण तत्वों की 3d श्रेणी का कौन सा तत्व बड़ी संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है एवं क्यों?
मैंगनीज (Mn, Z=25) 3d श्रेणी में सबसे अधिक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2 से +7 तक) दर्शाता है।
इसका कारण यह है कि Mn श्रेणी के लगभग मध्य में स्थित है, जहाँ इसके 4s (2 इलेक्ट्रॉन) व 3d (5 इलेक्ट्रॉन) — कुल 7 — सभी संयोजकता इलेक्ट्रॉन विभिन्न संख्या में भाग ले सकते हैं।
4.4 ऐसे संक्रमण तत्व का नाम बताइए जिसमें परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्थाएँ नहीं पाई जातीं।
स्कैंडियम (Sc, Z=21) परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्थाएँ नहीं दर्शाता — यह केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था दिखाता है, जिसमें इसका विन्यास अक्रिय गैस [Ar] के समान (पूर्णतः स्थायी) हो जाता है।
4.5 कॉपर के लिए E°(M²⁺/M) का मान धनात्मक (+0.34V) है। इसके संभावित कारण क्या हैं?
Cu(s) को Cu²⁺(aq) में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक कुल ऊर्जा में कणन एन्थैल्पी (ΔₐH°) तथा प्रथम व द्वितीय आयनन एन्थैल्पी (ΔᵢH₁+ΔᵢH₂) शामिल हैं, जिनकी क्षतिपूर्ति जलयोजन एन्थैल्पी (ΔhydH°) द्वारा होनी चाहिए।
कॉपर की कणन एन्थैल्पी व आयनन एन्थैल्पी का योग अपेक्षाकृत अधिक होता है, जबकि इसकी जलयोजन एन्थैल्पी इस उच्च ऊर्जा-व्यय की पूरी तरह भरपाई करने के लिए पर्याप्त ऋणात्मक नहीं होती।
परिणामस्वरूप Cu(s) से Cu²⁺(aq) बनने की प्रक्रिया ऊर्जा की दृष्टि से अननुकूल हो जाती है, जिसके कारण E° का मान धनात्मक हो जाता है और कॉपर तनु अम्लों से H₂ मुक्त करने में असमर्थ रहता है।
4.6 संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी (प्रथम और द्वितीय) में अनियमित परिवर्तन को आप कैसे समझायेंगे?
यह अनियमितता विभिन्न 3d इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों की सापेक्ष स्थिरता (विशेषकर d⁰, d⁵ व d¹⁰ विन्यासों के असाधारण स्थायित्व) के कारण उत्पन्न होती है।
जब किसी परमाणु/आयन से इलेक्ट्रॉन निकलने पर d⁵ या d¹⁰ जैसा विशेष रूप से स्थायी विन्यास बनता है, तो उस इलेक्ट्रॉन को निकालना अपेक्षाकृत आसान (कम एन्थैल्पी) हो जाता है; इसके विपरीत, यदि किसी स्थायी विन्यास (जैसे d⁵) को तोड़कर इलेक्ट्रॉन निकालना पड़े, तो एन्थैल्पी असामान्य रूप से अधिक हो जाती है।
इसी कारण द्वितीय आयनन एन्थैल्पी में Cr व Cu के लिए असामान्य रूप से उच्च मान (M⁺ आयनों में क्रमशः d⁵ व d¹⁰ विन्यास) देखे जाते हैं।
4.7 कोई धातु अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था केवल ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में ही क्यों प्रदर्शित करती है?
ऑक्सीजन व फ्लुओरीन आवर्त सारणी में सबसे अधिक विद्युत-ऋणात्मक तत्वों में से हैं तथा इनका आकार भी छोटा होता है।
इसी उच्च विद्युत-ऋणात्मकता व छोटे आकार के कारण ये धातु के साथ प्रबल आबंध बना पाते हैं और धातु के अधिकतम इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित कर उसे उसकी उच्चतम संभव ऑक्सीकरण अवस्था तक ऑक्सीकृत कर सकते हैं।
4.8 Cr²⁺ और Fe²⁺ में से कौन प्रबल अपचायक है और क्यों?
Cr²⁺ अधिक प्रबल अपचायक है। जब Cr²⁺, Cr³⁺ में ऑक्सीकृत होता है तो विन्यास d⁴ से d³ में बदलता है, जिसमें अर्ध-भरित t₂g स्तर (स्थायी विन्यास) प्राप्त होता है — इसलिए यह परिवर्तन ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूल है और Cr²⁺ आसानी से इलेक्ट्रॉन त्यागकर ऑक्सीकृत हो जाता है।
इसके विपरीत, Fe²⁺(d⁶) से Fe³⁺(d⁵) में परिवर्तन में भी स्थायी अर्ध-भरित विन्यास बनता तो है, परंतु Fe²⁺ स्वयं d⁶ रूप में पहले से ही अपेक्षाकृत स्थायी है, इसलिए Fe²⁺ का ऑक्सीकरण होना Cr²⁺ जितना आसान नहीं। अतः Cr²⁺, Fe²⁺ से अधिक प्रबल अपचायक है।
4.9 M²⁺(aq) आयन (Z=27) के लिए 'प्रचक्रण-मात्र' चुंबकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
Z=27 अर्थात Co (कोबाल्ट)। Co²⁺ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar]3d⁷ है। d⁷ विन्यास में अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या n = 3 होती है।
सूत्र μ = √n(n+2) लगाने पर: μ = √(3×5) = √15 = 3.87 BM
अतः Co²⁺ का चुंबकीय आघूर्ण लगभग 3.87 बोर मैग्नेटॉन है।
4.10 स्पष्ट कीजिए कि Cu⁺ आयन जलीय विलयन में स्थायी नहीं है, क्यों? समझाइए।
जलीय विलयन में Cu⁺ आयन असमानुपातित (disproportionate) हो जाता है: 2Cu⁺(aq) → Cu²⁺(aq) + Cu(s)।
इसका मुख्य कारण यह है कि Cu²⁺(aq) की जलयोजन एन्थैल्पी (ΔhydH°) Cu⁺ की तुलना में कहीं अधिक ऋणात्मक होती है, और यह अतिरिक्त ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी, Cu की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी की क्षतिपूर्ति से भी अधिक होती है।
इस कारण Cu²⁺(aq) की तुलना में Cu⁺(aq) कम स्थायी सिद्ध होता है और यह अभिक्रिया के लिए ऊष्मागतिक रूप से अनुकूल E° मान (धनात्मक) रखती है, जिससे Cu⁺ स्वतः असमानुपातित हो जाता है।
4.11 लैंथेनॉयड आकुंचन की तुलना में एक तत्व से दूसरे तत्व के बीच ऐक्टिनॉयड आकुंचन अधिक होता है। क्यों?
ऐक्टिनॉयडों में 5f कक्षक भरते हैं, जो लैंथेनॉयडों के 4f कक्षकों की तुलना में नाभिक से अधिक दूर तथा अधिक विस्तारित होते हैं।
इसी कारण एक 5f इलेक्ट्रॉन द्वारा दूसरे 5f इलेक्ट्रॉन का परिरक्षण (shielding) प्रभाव, एक 4f इलेक्ट्रॉन द्वारा दूसरे 4f इलेक्ट्रॉन के परिरक्षण प्रभाव से भी कमजोर होता है। परिणामस्वरूप श्रेणी में नाभिकीय आवेश बढ़ने पर बाह्यतम इलेक्ट्रॉन पर प्रभावी नाभिकीय आकर्षण अधिक तेज़ी से बढ़ता है, जिससे एक तत्व से अगले तत्व की ओर जाने पर त्रिज्या में कमी (आकुंचन) लैंथेनॉयडों की तुलना में अधिक तीव्र होती है।

4.20 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल (4.1 – 4.38)

NCERT कक्षा 12 रसायन विज्ञान, एकक 4 (d- एवं f-ब्लॉक तत्व) के अभ्यास के सभी 38 प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल — प्रत्येक प्रश्न को विस्तार से समझाया गया है।

अभ्यास प्रश्न (Exercise 4.1–4.38)
4.1 निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए — (i) Cr³⁺ (ii) Pm³⁺ (iii) Cu⁺ (iv) Ce⁴⁺ (v) Co²⁺ (vi) Lu²⁺ (vii) Mn²⁺ (viii) Th⁴⁺
(i) Cr³⁺ (Z=24, 3 इलेक्ट्रॉन कम): [Ar]3d³
(ii) Pm³⁺ (Z=61, [Xe]4f⁵6s² से 3 इलेक्ट्रॉन निकालने पर): [Xe]4f⁴
(iii) Cu⁺ (Z=29, विन्यास 3d¹⁰4s¹ से 1 इलेक्ट्रॉन 4s से निकलता है): [Ar]3d¹⁰
(iv) Ce⁴⁺ (Z=58, [Xe]4f¹5d¹6s² से 4 इलेक्ट्रॉन निकलने पर): [Xe] (f⁰)
(v) Co²⁺ (Z=27, विन्यास 3d⁷4s² से 2 इलेक्ट्रॉन 4s से): [Ar]3d⁷
(vi) Lu²⁺ (Z=71, [Xe]4f¹⁴5d¹6s² से 2 इलेक्ट्रॉन निकलने पर): [Xe]4f¹⁴5d¹
(vii) Mn²⁺ (Z=25, विन्यास 3d⁵4s² से 2 इलेक्ट्रॉन 4s से): [Ar]3d⁵
(viii) Th⁴⁺ (Z=90, [Rn]6d²7s² से 4 इलेक्ट्रॉन निकलने पर): [Rn] (f⁰d⁰)
4.2 +3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के संदर्भ में Mn²⁺ के यौगिक Fe²⁺ के यौगिकों की तुलना में अधिक स्थायी क्यों हैं?
Mn²⁺ का विन्यास 3d⁵ है, जो अर्ध-भरित d-कक्षक होने के कारण अत्यंत स्थायी है। इसे +3 (Mn³⁺, d⁴) अवस्था में ऑक्सीकृत करने के लिए इस स्थायी अर्ध-भरित विन्यास को तोड़ना पड़ता है, जिसके लिए अतिरिक्त ऊर्जा (उच्च तृतीय आयनन एन्थैल्पी) चाहिए — इसलिए Mn²⁺ का ऑक्सीकरण कठिन है और Mn²⁺ के यौगिक अपनी +2 अवस्था में अधिक स्थायी रहते हैं।
इसके विपरीत, Fe²⁺(d⁶) को Fe³⁺(d⁵, अर्ध-भरित, स्थायी) में ऑक्सीकृत करना ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूल है, इसलिए Fe²⁺ आसानी से Fe³⁺ में ऑक्सीकृत हो जाता है।
4.8 संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं? d-ब्लॉक के तत्वों में कौन से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते?
अभिलक्षण: संक्रमण धातुएँ धात्विक गुण (उच्च गलनांक/क्वथनांक, तनन सामर्थ्य, तापीय व विद्युत चालकता), परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, रंगीन आयन, अनुचुंबकत्व, उत्प्रेरकीय गुण, संकुल निर्माण की प्रवृत्ति तथा अंतराकाशी यौगिक व मिश्रातु बनाने की क्षमता प्रदर्शित करती हैं।
नामकरण का कारण: इन्हें "संक्रमण" तत्व इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके रासायनिक गुण s-ब्लॉक (अत्यधिक क्रियाशील धातु) व p-ब्लॉक (कम क्रियाशील/अधात्विक) तत्वों के बीच एक "संक्रमणकारी" या मध्यवर्ती व्यवहार दर्शाते हैं।
अपवाद: Zn, Cd तथा Hg को संक्रमण तत्व नहीं माना जाता क्योंकि इनकी मूल अवस्था व सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था दोनों में d-कक्षक पूर्ण भरा (d¹⁰) रहता है।

🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न — d- एवं f-ब्लॉक तत्व (2014–2026)

2014 से 2026 (रीएग्ज़ाम सहित) तक इस अध्याय से NEET में पूछे गए प्रश्न, हल सहित। यह अध्याय 2026 में 6.67% भारांक (पिछले वर्ष से 50% अधिक) के साथ इनऑर्गेनिक रसायन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल रहा।

26R.1 निम्नलिखित लैंथेनाइड आयनों में से किसमें चार अयुगलित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं? (Ce=58, Nd=60, Tb=65, Ho=67)
Ce³⁺ = 4f¹ → 1 अयुगलित; Nd³⁺ = 4f³ → 3 अयुगलित
Tb³⁺ = 4f⁸ → 6 अयुगलित; Ho³⁺ = 4f¹⁰ → 4 अयुगलित
उत्तर: Ho³⁺ में 4 अयुगलित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं।
26R.2 KMnO₄ को 513K पर गरम करने से बनने वाली हरी अनुचुंबकीय स्पीशीज़ कौन-सी है?
2KMnO₄ →(513K)→ K₂MnO₄ + MnO₂ + O₂
उत्तर: K₂MnO₄ (पोटैशियम मैंगनेट) — Mn(+6) एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन, हरा रंग।
26.1 Ce (लैंथेनॉयड) में +3 सबसे सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था होते हुए भी यह +4 अवस्था क्यों दर्शाता है?
Ce³⁺ = [Xe]4f¹, Ce⁴⁺ = [Xe]4f⁰ (पूर्णतः रिक्त, अक्रिय गैस सदृश)
उत्तर: Ce⁴⁺ का [Xe]4f⁰ (रिक्त एवं अक्रिय गैस सदृश स्थायी) विन्यास Ce को +4 अवस्था दर्शाने हेतु प्रेरित करता है।
NEET 2025
25.1 निम्नलिखित औद्योगिक प्रक्रमों को उनमें प्रयुक्त उत्प्रेरकों से सुमेलित कीजिए — हैबर प्रक्रम, वाकर ऑक्सीकरण, विल्किंसन उत्प्रेरक, ज़ीगलर उत्प्रेरक
हैबर प्रक्रम: Fe; वाकर ऑक्सीकरण: PdCl₂
विल्किंसन उत्प्रेरक: RhCl(PPh₃)₃; ज़ीगलर उत्प्रेरक: TiCl₄ + Al(C₂H₅)₃
सही सुमेलन: हैबर→Fe, वाकर→PdCl₂, विल्किंसन→RhCl(PPh₃)₃, ज़ीगलर→TiCl₄+Al(C₂H₅)₃
25.2 कथन I: लौहचुंबकत्व, अनुचुंबकत्व का एक चरम रूप माना जाता है। कथन II: Mn²⁺ आयन में अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, Fe³⁺ आयन के समान है।
लौहचुंबकत्व में सभी चुंबकीय द्विध्रुव एक दिशा में संरेखित — अनुचुंबकत्व का चरम रूप — कथन I सत्य
Mn²⁺ (d⁵) व Fe³⁺ (d⁵) दोनों में 5 अयुगलित — कथन II सत्य
उत्तर: दोनों कथन सत्य हैं
NEET 2024
24.1 Mn³⁺/Mn²⁺ युग्म का E° मान, Cr³⁺/Cr²⁺ अथवा Fe³⁺/Fe²⁺ की तुलना में अधिक धनात्मक क्यों होता है?
Mn³⁺ (d⁴) का Mn²⁺ (d⁵) में अपचयन अत्यंत अनुकूल — Mn²⁺ का अर्ध-भरित d⁵ विन्यास असाधारण रूप से स्थायी
उत्तर: d⁵ (अर्ध-भरित) विन्यास की अतिरिक्त स्थिरता के कारण Mn³⁺ प्रबल ऑक्सीकारक (E° अधिक धनात्मक) होता है।
24.2 लैंथेनॉयड आयनों का कौन-सा युग्म प्रतिचुंबकीय है?
La³⁺ = [Xe]4f⁰ (रिक्त); Lu³⁺ = [Xe]4f¹⁴ (पूर्ण भरा) — दोनों में कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं
उत्तर: La³⁺ तथा Lu³⁺ — दोनों प्रतिचुंबकीय हैं।
NEET 2023
23.1 जलीय विलयन में Cu²⁺ लवण, Cu⁺ लवण से अधिक स्थायी क्यों होते हैं?
Cu²⁺ की जलयोजन एन्थैल्पी, Cu⁺ से कहीं अधिक ऋणात्मक होती है (छोटे आकार व अधिक आवेश घनत्व के कारण)
उत्तर: Cu²⁺ की अधिक ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी, द्वितीय आयनन एन्थैल्पी की कमी को पूरा कर देती है।
NEET 2022
22.1 Zr (Z=40) तथा Hf (Z=72) के परमाण्विक व आयनिक त्रिज्या लगभग समान क्यों होते हैं?
Hf से पहले संपूर्ण 4f लैंथेनॉयड शृंखला (14 तत्व) आती है, जिसमें लैंथेनॉयड आकुंचन होता है
उत्तर: लैंथेनॉयड आकुंचन के कारण Hf की त्रिज्या, Zr के लगभग बराबर ही रह जाती है।
NEET 2018
18.1 Co³⁺, Cr³⁺, Fe³⁺ तथा Ni²⁺ आयनों के चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
Co³⁺ (d⁶, 4 अयुगलित): μ = √(4×6) = 4.90 BM
Cr³⁺ (d³, 3 अयुगलित): μ = √(3×5) = 3.87 BM
Fe³⁺ (d⁵, 5 अयुगलित): μ = √(5×7) = 5.92 BM
Ni²⁺ (d⁸, 2 अयुगलित): μ = √(2×4) = 2.83 BM
NEET 2017
17.1 HgCl₂ तथा I₂ दोनों को I⁻ आयन युक्त जल में घोलने पर बनने वाली स्पीशीज़ों का युग्म बताइए।
HgCl₂ + अतिरिक्त I⁻ → [HgI₄]²⁻ (टेट्राआयोडोमरक्यूरेट)
I₂ + I⁻ → I₃⁻ (ट्राईआयोडाइड आयन) — उत्तर: [HgI₄]²⁻ तथा I₃⁻
17.2 ऐक्टिनॉयडों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की अधिक विस्तृत परास किस कारण से है?
उत्तर: 5f, 6d व 7s कक्षकों की ऊर्जाओं की निकटता के कारण ऐक्टिनॉयड व्यापक व अनियमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+3 से +7 तक) दर्शाते हैं।
NEET 2016
16.1 यूरोपियम (Z=63), गैडोलिनियम (Z=64) तथा टर्बियम (Z=65) के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
Eu (Z=63): [Xe]4f⁷6s²
Gd (Z=64): [Xe]4f⁷5d¹6s² (अर्ध-भरित f⁷ की स्थिरता बनाए रखने के लिए d-कक्षक में इलेक्ट्रॉन)
Tb (Z=65): [Xe]4f⁹6s²
AIPMT 2015
15C.1 2.84 BM चुंबकीय आघूर्ण किस आयन द्वारा प्रदर्शित होता है? (Ni=28, Ti=22, Cr=24, Co=27)
μ = 2.84 BM ⇒ n ≈ 2 अयुगलित इलेक्ट्रॉन (√(2×4) = 2.83)
उत्तर: Ni²⁺ (d⁸, t₂g⁶eg² में 2 अयुगलित)
AIPMT 2014
14.1 लैंथेनॉयड आकुंचन का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: 4f इलेक्ट्रॉनों द्वारा एक-दूसरे का अपूर्ण/दुर्बल परिरक्षण — जिससे त्रिज्या में क्रमिक संकुचन होता है।
14.2 अम्लीय परिस्थितियों में जलीय KMnO₄ की H₂O₂ के साथ अभिक्रिया से क्या प्राप्त होता है?
2KMnO₄ + 3H₂SO₄ + 5H₂O₂ → K₂SO₄ + 2MnSO₄ + 8H₂O + 5O₂
उत्तर: Mn²⁺ (रंगहीन) + O₂ गैस + H₂O (KMnO₄ का बैंगनी रंग समाप्त हो जाता है)

4.22 अन्य NEET संबंधित तथ्य Extra High-Yield

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, सूत्र व तुलनाएँ, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं।

तुलनात्मक
  • लैंथेनॉयड आकुंचन के कारण द्वितीय (4d) व तृतीय (5d) संक्रमण श्रेणी के संगत तत्वों (जैसे Zr-Hf, Nb-Ta, Mo-W) की त्रिज्याएँ लगभग बराबर हो जाती हैं — इन्हें एक-दूसरे से अलग करना कठिन होता है।
तथ्य
  • संक्रमण तत्वों का घनत्व श्रेणी में नीचे जाने पर बढ़ता है — तृतीय श्रेणी के तत्व (जैसे Os, Ir) का घनत्व सर्वाधिक (≈22.6 g/cm³) होता है।
ट्रैप
  • Mn तथा Tc का गलनांक अपने निकटवर्ती तत्वों की तुलना में कम होता है — d⁵ अर्ध-भरित विन्यास में सभी d-इलेक्ट्रॉन अयुगलित व स्थानीकृत रहते हैं, धात्विक आबंध में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम हो जाती है।
तथ्य
  • किसी संक्रमण धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रायः उसके ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में ही प्राप्त होती है — O व F उच्च वैद्युतऋणात्मकता व लघु आकार के कारण धातु को अपनी अधिकतम d-इलेक्ट्रॉन संख्या साझा करने हेतु प्रेरित करते हैं।
तुलनात्मक
  • E°(Mn³⁺/Mn²⁺) का मान (+1.57V) संक्रमण श्रेणी में असामान्य रूप से उच्च धनात्मक — Mn²⁺ (d⁵, अर्ध-भरित) के असाधारण स्थायित्व के कारण Mn³⁺ प्रबल ऑक्सीकारक है।
तथ्य
  • अंतराकाशी यौगिक (interstitial compounds) असमीकरणमितीय होते हैं — रासायनिक संघटन के स्थिर अनुपात के नियम का पालन नहीं करते (जैसे TiC में कार्बन का 1:1 अनुपात आवश्यक नहीं)।
तुलनात्मक
  • ऐक्टिनॉयड आकुंचन, लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र होता है — 5f कक्षकों का 4f से और भी कमजोर परिरक्षण प्रभाव।
  • लैंथेनॉयड हाइड्रॉक्साइडों [Ln(OH)₃] की क्षारकता श्रेणी में आगे बढ़ने पर घटती है — La(OH)₃ सर्वाधिक क्षारकीय, Lu(OH)₃ सबसे कम।
तथ्य
  • K₂Cr₂O₇ के निर्माण: क्रोमाइट (FeCr₂O₄) → Na₂CrO₄ → Na₂Cr₂O₇ → K₂Cr₂O₇।
  • KMnO₄ के निर्माण: पाइरोलुसाइट (MnO₂) → K₂MnO₄ → KMnO₄ (वैद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण)।
तथ्य
  • Cu²⁺ का जलीय विलयन में होना ऊष्मागतिकीय रूप से Cu⁺ से अधिक स्थायी — Cu²⁺ की असामान्य रूप से उच्च जलयोजन एन्थैल्पी।
रणनीति
  • अंतिम रिवीज़न में इन चार बिंदुओं को प्राथमिकता दें: (1) चुंबकीय आघूर्ण सूत्र व d-इलेक्ट्रॉन गणना, (2) K₂Cr₂O₇ व KMnO₄ के निर्माण व अभिक्रियाएँ (माध्यम सहित), (3) लैंथेनॉयड/ऐक्टिनॉयड आकुंचन के कारण व परिणाम, (4) असामान्य विन्यास (Cr, Cu) व d⁵/d¹⁰ स्थायित्व से जुड़े अपवाद।

यह लेख कक्षा 12 रसायन विज्ञान (NCERT पाठ्यक्रम आधारित) के अध्याय "d- एवं f-ब्लॉक के तत्व" पर मौलिक (original) व स्वतंत्र रूप से लिखे गए अध्ययन नोट्स हैं। इसे शैक्षणिक उपयोग हेतु स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।

सभी पाठ्यनिहित (4.1–4.11) तथा अभ्यास (4.1–4.38) प्रश्नों के साथ-स

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