d- एवं f-ब्लॉक तत्व
संक्रमण तत्वों से लेकर लैंथेनॉयड व ऐक्टिनॉयड तक — संपूर्ण अध्याय की अवधारणाएँ, तथ्य, तालिकाएँ, आरेख, पाठ्यनिहित प्रश्न (4.1–4.11) तथा अभ्यास प्रश्न (4.1–4.38) के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
4.1 परिचय
आवर्त सारणी को चार बड़े ब्लॉक — s, p, d और f — में बाँटा गया है। जब किसी तत्व के परमाणु में सबसे बाद में जुड़ने वाला इलेक्ट्रॉन d-कक्षक में प्रवेश करता है तो उस तत्व को d-ब्लॉक तत्व कहा जाता है, और यदि यह इलेक्ट्रॉन f-कक्षक में जाता है तो तत्व f-ब्लॉक में आता है। d-ब्लॉक तत्वों को संक्रमण तत्व (Transition Elements) तथा f-ब्लॉक तत्वों को आंतरिक संक्रमण तत्व (Inner Transition Elements) कहते हैं।
IUPAC की परिभाषा के अनुसार, संक्रमण तत्व वे तत्व हैं जिनके परमाणु या आयन में d-कक्षक अपूर्ण (आंशिक रूप से भरा) होता है। इसी कारण Zn, Cd और Hg — जिनका d-कक्षक (d¹⁰) उनकी मूल एवं सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था दोनों में पूर्ण भरा रहता है — को सामान्यतः संक्रमण तत्व नहीं माना जाता, हालाँकि सुविधा के लिए इनका अध्ययन संक्रमण तत्वों के साथ ही किया जाता है।
- d-ब्लॉक: वर्ग 3–12, चार आवर्त (3d, 4d, 5d, 6d)।
- f-ब्लॉक: दो शृंखलाएँ — 4f (लैंथेनॉयड, Ce–Lu) व 5f (ऐक्टिनॉयड, Th–Lr)।
- संक्रमण तत्व की IUPAC परिभाषा: परमाणु या किसी आयन में d-कक्षक अपूर्ण।
- Zn, Cd, Hg को संक्रमण तत्व नहीं माना जाता (d¹⁰ पूर्ण भरा)।
4.2 आवर्त सारणी में स्थिति
d-ब्लॉक में वर्ग 3 से 12 तक के तत्व आते हैं और चार दीर्घ आवर्तों में d-कक्षक भरे जाते हैं — इन्हें 3d, 4d, 5d और 6d श्रेणी कहा जाता है। f-ब्लॉक के तत्व दो श्रेणियों में बँटे हैं — 4f श्रेणी (लैंथेनॉयड, Ce से Lu तक) और 5f श्रेणी (ऐक्टिनॉयड, Th से Lr तक)।
| श्रेणी | तत्व | परमाणु क्रमांक परास |
|---|---|---|
| 3d श्रेणी (प्रथम) | Sc से Zn | 21–30 |
| 4d श्रेणी (द्वितीय) | Y से Cd | 39–48 |
| 5d श्रेणी (तृतीय) | La, Hf से Hg | 57, 72–80 |
| 6d श्रेणी (चतुर्थ) | Ac, Rf से Cn | 89, 104–112 |
| 4f श्रेणी | लैंथेनॉयड (Ce–Lu) | 58–71 |
| 5f श्रेणी | ऐक्टिनॉयड (Th–Lr) | 90–103 |
- d-ब्लॉक: वर्ग 3–12, चार श्रेणियाँ (3d, 4d, 5d, 6d)।
- f-ब्लॉक: 4f (लैंथेनॉयड) और 5f (ऐक्टिनॉयड) — आवर्त सारणी के नीचे अलग खंड।
- लैंथेनॉयड: Ce (Z=58) से Lu (Z=71) तक 14 तत्व।
- ऐक्टिनॉयड: Th (Z=90) से Lr (Z=103) तक 14 तत्व।
4.3 संक्रमण तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
संक्रमण तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n−1)d¹⁻¹⁰ns¹⁻² होता है। यहाँ (n−1)d, भीतरी d-कक्षक को दर्शाता है जिसमें 1 से 10 तक इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, जबकि बाहरी ns कक्षक में 1 या 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। चूँकि (n−1)d और ns कक्षकों की ऊर्जाओं में बहुत कम अंतर होता है, इसलिए इस सामान्य नियम के कुछ अपवाद देखने को मिलते हैं — जैसे Cr का विन्यास 3d⁵4s¹ (न कि 3d⁴4s²) और Cu का विन्यास 3d¹⁰4s¹ (न कि 3d⁹4s²) होता है। इसका कारण यह है कि अर्ध-भरित (d⁵) और पूर्ण-भरित (d¹⁰) कक्षकों को अतिरिक्त स्थायित्व प्राप्त होता है।
| तत्व | Sc | Ti | V | Cr | Mn | Fe | Co | Ni | Cu | Zn |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| Z | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 |
| 4s | 2 | 2 | 2 | 1 | 2 | 2 | 2 | 2 | 1 | 2 |
| 3d | 1 | 2 | 3 | 5 | 5 | 6 | 7 | 8 | 10 | 10 |
- Zn, Cd, Hg का सामान्य सूत्र (n−1)d¹⁰ns² है — पूर्ण भरे d-कक्षक के कारण इन्हें विशिष्ट रूप से संक्रमण तत्व नहीं माना जाता।
- Cr व Mo और Cu, Ag, Au में अर्ध/पूर्ण भरित स्थायित्व के कारण अपवाद विन्यास मिलते हैं।
- d-ब्लॉक तत्वों से आयन बनते समय पहले ns इलेक्ट्रॉन निकलते हैं, बाद में (n−1)d इलेक्ट्रॉन।
- Sc (Z=21) संक्रमण तत्व है (3d¹ अपूर्ण); Zn (Z=30) नहीं (3d¹⁰ पूर्ण)।
4.4 संक्रमण तत्वों के सामान्य गुण — भौतिक गुण
लगभग सभी संक्रमण तत्व धात्विक गुण दर्शाते हैं — उच्च तनन सामर्थ्य, तन्यता, वर्धनीयता तथा उत्कृष्ट ऊष्मीय व विद्युत चालकता। Zn, Cd, Hg तथा Mn जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर, सामान्य ताप पर इनकी विशिष्ट धात्विक जालक संरचनाएँ (bcc, hcp, ccp) होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक बहुत ऊँचे होते हैं क्योंकि अंतरापरमाण्विक धात्विक बंधन में ns इलेक्ट्रॉनों के अतिरिक्त (n−1)d इलेक्ट्रॉन भी भाग लेते हैं, जिससे प्रबल अंतरापरमाण्विक आबंध बनता है।
प्रत्येक श्रेणी में गलनांक तथा कणन एन्थैल्पी (enthalpy of atomisation) का उच्चतम मान लगभग मध्य में (d⁵ विन्यास के आसपास) पाया जाता है, क्योंकि प्रति d-कक्षक एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन का होना प्रबल अंतरापरमाण्विक अन्योन्यक्रिया के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है। दूसरी व तीसरी श्रेणी की धातुओं की कणन एन्थैल्पी प्रथम श्रेणी की तुलना में अधिक होती है — यही कारण है कि भारी संक्रमण धातुओं के यौगिकों में धातु-धातु आबंध बहुधा बनते हैं।
- संक्रमण धातुओं के गलनांक/क्वथनांक व कणन एन्थैल्पी उच्च होते हैं।
- d⁵ विन्यास के पास कणन एन्थैल्पी का शिखर होता है।
- Cr, Mo, W सबसे उच्च कणन एन्थैल्पी वाली धातुओं में हैं।
- Zn की कणन एन्थैल्पी (126 kJ/mol) श्रेणी में सबसे कम — क्योंकि d-इलेक्ट्रॉन धात्विक बंधन में भाग नहीं लेते।
4.5 परमाण्विक एवं आयनिक आकार में परिवर्तन
किसी श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है परंतु अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन भी उसी (n−1)d उपकोश में प्रवेश करता है। चूँकि d-इलेक्ट्रॉनों का आवरण प्रभाव (screening effect) कमजोर होता है, इसलिए नाभिकीय आवेश व बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच नेट आकर्षण बढ़ता है, जिससे त्रिज्या में हल्की कमी आती है। हालाँकि यह कमी बहुत नियमित नहीं होती।
एक रोचक तथ्य यह है कि द्वितीय संक्रमण श्रेणी (4d) के तत्वों का आकार प्रथम श्रेणी (3d) से बड़ा होता है, परंतु तृतीय संक्रमण श्रेणी (5d) के तत्वों की त्रिज्याएँ लगभग द्वितीय श्रेणी के बराबर ही रह जाती हैं। इसका कारण है लैंथेनॉयड आकुंचन (Lanthanoid Contraction) — 5d कक्षक भरने से पहले 4f कक्षकों में 14 इलेक्ट्रॉन भरते हैं, और चूँकि एक 4f इलेक्ट्रॉन दूसरे 4f इलेक्ट्रॉन को बहुत कम परिरक्षित (shield) करता है, इसलिए बढ़ते नाभिकीय आवेश के साथ त्रिज्या में लगातार कमी होती जाती है। परिणामस्वरूप Zr (160 pm) और Hf (159 pm) जैसी जोड़ी की त्रिज्याएँ लगभग समान हो जाती हैं, और इसी कारण द्वितीय व तृतीय श्रेणी की संगत धातुओं (जैसे Zr-Hf, Nb-Ta) को रासायनिक रूप से अलग करना कठिन होता है।
- श्रेणी में परमाणु त्रिज्या घटती है (नियमित रूप से नहीं) — d-इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण कमजोर है।
- Zr व Hf की त्रिज्याएँ लगभग समान — लैंथेनॉयड आकुंचन का प्रभाव।
- लैंथेनॉयड आकुंचन का कारण: 4f इलेक्ट्रॉनों का अपूर्ण परिरक्षण।
4.6 आयनन एन्थैल्पी
किसी श्रेणी में बाएँ से दाएँ बढ़ने पर आयनन एन्थैल्पी में वृद्धि होती है, परंतु मुख्य वर्ग तत्वों की तुलना में यह वृद्धि उतनी तीव्र नहीं होती — क्योंकि (n−1)d कक्षक से इलेक्ट्रॉन निकलना ऊर्जा की दृष्टि से बहुत बाधक नहीं होता, इसलिए संक्रमण तत्व प्रायः अनेक परिवर्ती (variable) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखाते हैं।
प्रथम आयनन एन्थैल्पी की प्रवृत्ति में कुछ अनियमितता होती है, जिसका कारण 4s व 3d कक्षकों की आपेक्षिक ऊर्जाओं में परिवर्तन है। द्वितीय व तृतीय आयनन एन्थैल्पी की व्याख्या के लिए विनिमय ऊर्जा (Exchange Energy) तथा हुंड के नियम का उपयोग किया जाता है — अर्ध-भरित (d⁵) व पूर्ण-भरित (d¹⁰/d⁰) विन्यासों को अतिरिक्त स्थायित्व मिलता है, इसलिए इनसे इलेक्ट्रॉन निकालना कठिन होता है। उदाहरण के लिए Mn²⁺ (d⁵) व Zn²⁺ (d¹⁰) से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए (तृतीय आयनन एन्थैल्पी) अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा चाहिए।
- श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है परंतु असंक्रमण तत्वों जितनी तेज़ी से नहीं।
- d⁵ (Mn²⁺) व d¹⁰ (Zn²⁺) विन्यासों को अतिरिक्त स्थायित्व — विनिमय ऊर्जा अधिकतम।
- Cr व Cu पर आयनन एन्थैल्पी में विसंगति — असामान्य विन्यास (d⁵s¹, d¹⁰s¹) के कारण।
4.7 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
संक्रमण तत्वों की एक विशिष्ट पहचान है — एक ही तत्व द्वारा कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाना। अधिकतम संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ श्रेणी के मध्य वाले तत्व दिखाते हैं — जैसे Mn, +2 से +7 तक सभी अवस्थाएँ दर्शाता है। श्रेणी के आरंभ (Sc, Ti) में त्याग के लिए कम इलेक्ट्रॉन उपलब्ध होते हैं, जबकि अंत (Cu, Zn) में d-कक्षकों की भागीदारी के लिए कम कक्षक उपलब्ध होते हैं — इसलिए दोनों सिरों पर ऑक्सीकरण अवस्थाओं की संख्या कम रहती है।
| तत्व | Sc | Ti | V | Cr | Mn | Fe | Co | Ni | Cu | Zn |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अति सामान्य अवस्था | +3 | +4 | +5 | +3 | +2 | +2,+3 | +2 | +2 | +2 | +2 |
| अन्य अवस्थाएँ | — | +2,+3 | +2,+3,+4 | +2,+4,+5,+6 | +3,+4,+5,+6,+7 | +4,+5,+6 | +3,+4 | +3,+4 | +1 | — |
- Mn तक अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था = 4s + 3d इलेक्ट्रॉनों का योग (Mn में +7)।
- असंक्रमण तत्वों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में 2 का अंतर, संक्रमण तत्वों में प्रायः 1 का अंतर।
- निम्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (शून्य सहित) तब मिलती हैं जब लिगंड में π-ग्राही गुण हों — Ni(CO)₄, Fe(CO)₅।
- d-ब्लॉक में भारी सदस्यों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी (Mo(VI), W(VI) > Cr(VI))।
- Sc केवल +3 अवस्था दर्शाता है (कोई परिवर्तनशीलता नहीं)।
- Zn की एकमात्र अवस्था +2 है (d-इलेक्ट्रॉन की भागीदारी नहीं)।
4.8 मानक इलेक्ट्रोड विभव में प्रवृत्तियाँ
M²⁺/M विभव: यह मान श्रेणी में द्विसंयोजी धनायन बनाने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। सामान्य प्रवृत्ति यह है कि प्रथम व द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के योग में वृद्धि के साथ E° के मान कम ऋणात्मक होते जाते हैं। परंतु Mn, Ni व Zn के E° मान इस सामान्य प्रवृत्ति से अपेक्षाकृत अधिक ऋणात्मक हैं — Mn²⁺(d⁵) व Zn²⁺(d¹⁰) के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण, जबकि Ni का असामान्य मान इसकी उच्चतम ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी से जुड़ा है। कॉपर का E° धनात्मक (+0.34V) होने के कारण यह तनु अम्लों से H₂ मुक्त नहीं कर पाता — इसे केवल ऑक्सीकारक अम्ल (सांद्र HNO₃, गर्म सांद्र H₂SO₄) ही घोल पाते हैं।
M³⁺/M²⁺ विभव: Mn³⁺ व Co³⁺ जलीय विलयन में प्रबल ऑक्सीकारक हैं (क्योंकि Mn²⁺ का d⁵ विन्यास विशेष स्थायी है), जबकि Ti²⁺, V²⁺ व Cr²⁺ प्रबल अपचायक हैं (क्योंकि इनकी तीन-संयोजी अवस्था अधिक स्थायी है)।
- Cu का E°(M²⁺/M) धनात्मक (+0.34V) — इसीलिए Cu तनु अम्ल से H₂ मुक्त नहीं करता।
- Mn³⁺ व Co³⁺ जलीय विलयन में प्रबल ऑक्सीकारक हैं।
- Ti²⁺, V²⁺, Cr²⁺ प्रबल अपचायक हैं (तनु अम्ल से H₂ मुक्त करते हैं)।
- E°(Mn³⁺/Mn²⁺) का असामान्य उच्च धनात्मक मान — Mn²⁺ (d⁵) के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण।
4.9 रासायनिक अभिक्रियाशीलता
संक्रमण धातुओं की रासायनिक अभिक्रियाशीलता में व्यापक भिन्नता पाई जाती है। कॉपर को छोड़कर प्रथम श्रेणी के अधिकतर तत्व 1M H⁺ आयनों द्वारा ऑक्सीकृत हो जाते हैं, यद्यपि टाइटेनियम व वैनेडियम जैसे कुछ तत्व द्रुतिक (kinetically) रूप से कक्ष ताप पर तनु ऑक्सीकारक अम्लों के प्रति निष्क्रिय व्यवहार करते हैं। सिल्वर, गोल्ड, प्लैटिनम जैसी बहुमूल्य धातुएँ 'उत्कृष्ट' श्रेणी में आती हैं जो सामान्य अम्लों द्वारा प्रभावित नहीं होतीं।
- संक्रमण धातुओं की अभिक्रियाशीलता में व्यापक भिन्नता — स्कैंडियम से प्लैटिनम तक।
- प्रथम श्रेणी की अधिकांश धातुएँ तनु अम्लों में घुल जाती हैं (Cu को छोड़कर)।
- उत्कृष्ट धातुएँ (Ag, Au, Pt) सामान्य अम्लों से अप्रभावित।
4.10 चुंबकीय गुण
पदार्थों में मुख्यतः दो प्रकार का चुंबकीय व्यवहार देखा जाता है — प्रतिचुंबकत्व (diamagnetism), जिसमें पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षित होते हैं (सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित), और अनुचुंबकत्व (paramagnetism), जिसमें पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं (अयुगलित इलेक्ट्रॉन उपस्थित)। बहुत से संक्रमण धातु आयन अनुचुंबकीय होते हैं। प्रथम श्रेणी की धातुओं में कक्षीय कोणीय संवेग का योगदान प्रभावी रूप से शमित (quenched) हो जाता है, इसलिए चुंबकीय आघूर्ण की गणना "प्रचक्रण-मात्र" (spin-only) सूत्र से की जाती है:
चुंबकीय आघूर्ण का मान जितना अधिक, अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या उतनी ही अधिक। d⁰ व d¹⁰ विन्यास वाले आयन प्रतिचुंबकीय होते हैं (कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं)।
- अनुचुंबकत्व: अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति — चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षण।
- प्रतिचुंबकत्व: सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित — चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षण।
- प्रचक्रण-मात्र सूत्र: μ = √n(n+2) BM।
- d⁰ (Sc³⁺, Ti⁴⁺) व d¹⁰ (Zn²⁺, Cu⁺) आयन प्रतिचुंबकीय व रंगहीन।
4.11 रंगीन आयनों का बनना
जब एक निम्न-ऊर्जा वाले d-कक्षक से इलेक्ट्रॉन का उत्तेजन (excitation) उच्च-ऊर्जा वाले d-कक्षक में होता है, तो उत्तेजन के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रायः दृश्य प्रकाश क्षेत्र (visible region) की आवृत्ति के बराबर होती है। जो प्रकाश अवशोषित होता है, उसका पूरक रंग हमें दिखाई देता है। यह घटना केवल तभी संभव है जब d-कक्षक आंशिक रूप से भरा हो (d¹ से d⁹) — इसीलिए d⁰ (जैसे Sc³⁺, Ti⁴⁺) व d¹⁰ (जैसे Zn²⁺, Cu⁺) विन्यास वाले आयन रंगहीन होते हैं।
- रंग d-d संक्रमण (इलेक्ट्रॉनिक उत्तेजन) के कारण होता है।
- d⁰ व d¹⁰ विन्यास वाले आयन रंगहीन व प्रतिचुंबकीय होते हैं।
- d¹–d⁹ विन्यास वाले आयन रंगीन व अनुचुंबकीय होते हैं (f⁰/f¹⁴ को छोड़कर)।
4.12 संकुल यौगिकों का बनना तथा उत्प्रेरकीय गुण
संकुल यौगिक वे यौगिक हैं जिनमें धातु आयन एक निश्चित संख्या में ऋणायनों या उदासीन अणुओं (लिगंड) से बंधकर संकुलन स्पीशीज़ बनाते हैं — जैसे [Fe(CN)₆]³⁻, [Cu(NH₃)₄]²⁺। संक्रमण धातुएँ आसानी से संकुल बनाती हैं क्योंकि इनके धातु आयनों का आकार छोटा होता है, इन पर उच्च आयनिक आवेश होता है, और आबंध बनाने के लिए रिक्त d-कक्षक उपलब्ध होते हैं।
संक्रमण धातुएँ व इनके यौगिक उत्प्रेरकीय सक्रियता के लिए प्रसिद्ध हैं — जैसे संस्पर्श प्रक्रम में V₂O₅, हाबर प्रक्रम में सूक्ष्म विभाजित Fe, और उत्प्रेरकीय हाइड्रोजनीकरण में Ni। यह गुण इनकी परिवर्तनशील संयोजकता (variable oxidation states) व संकुल बनाने की क्षमता के कारण होता है।
- संक्रमण धातुएँ संकुल यौगिक आसानी से बनाती हैं — छोटा आकार, उच्च आवेश, रिक्त d-कक्षक।
- V₂O₅ (संस्पर्श प्रक्रम), Fe (हाबर प्रक्रम), Ni (हाइड्रोजनीकरण) — प्रमुख उत्प्रेरक।
- PdCl₂ — वाकर प्रक्रम में उत्प्रेरक।
- TiCl₄ + Al(CH₃)₃ — ज़ीगलर उत्प्रेरक (पॉलीएथिलीन उत्पादन)।
4.13 अंतराकाशी यौगिक तथा मिश्रातु
जब संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक के भीतर H, N या C जैसे छोटे आकार के परमाणु समा जाते हैं, तो अंतराकाशी यौगिक (Interstitial Compounds) बनते हैं — जैसे TiC, Mn₄N, Fe₃H। ये असमीकरणमितीय (non-stoichiometric), न आयनिक और न सहसंयोजी होते हैं। इनके गलनांक शुद्ध धातुओं से भी अधिक ऊँचे, कठोरता अत्यधिक (कुछ बोराइड लगभग हीरे जितने कठोर), धात्विक चालकता सुरक्षित तथा रासायनिक रूप से निष्क्रिय होती हैं।
मिश्रातु (Alloys) विभिन्न धातुओं के सम्मिश्रण से प्राप्त समांगी ठोस विलयन होते हैं। चूँकि संक्रमण धातुओं की त्रिज्याओं में अधिक भिन्नता नहीं होती (15% से कम अंतर), इसलिए ये आसानी से मिश्रातु बनाती हैं — जैसे फेरस मिश्रातु (स्टेनलेस स्टील में Cr, Mn, Ni, W, Mo), पीतल (Cu-Zn), कांसा (Cu-Sn)।
- अंतराकाशी यौगिक असमीकरणमितीय, अति कठोर, धात्विक चालक व रासायनिक रूप से निष्क्रिय होते हैं।
- 15% से कम त्रिज्या-अंतर वाली धातुएँ आसानी से मिश्रातु बनाती हैं।
- अंतराकाशी यौगिकों के गलनांक शुद्ध धातुओं से भी ऊँचे होते हैं।
4.14 संक्रमण तत्वों के कुछ महत्वपूर्ण यौगिक
(क) पोटैशियम डाइक्रोमेट, K₂Cr₂O₇
यह चर्म उद्योग व ऐज़ो-यौगिकों के संश्लेषण में एक महत्वपूर्ण ऑक्सीकारक रसायन है। इसे क्रोमाइट अयस्क (FeCr₂O₄) को वायु की उपस्थिति में सोडियम कार्बोनेट के साथ संगलित करके क्रोमेट बनाया जाता है, फिर इसे अम्लीकृत कर सोडियम डाइक्रोमेट में बदला जाता है, और अंत में पोटैशियम क्लोराइड मिलाकर कम विलेय पोटैशियम डाइक्रोमेट अवक्षेपित किया जाता है।
2Na₂CrO₄ + 2H⁺ → Na₂Cr₂O₇ + 2Na⁺ + H₂O
Na₂Cr₂O₇ + 2KCl → K₂Cr₂O₇ + 2NaCl
जलीय विलयन में क्रोमेट (CrO₄²⁻, चतुष्फलकीय, pH उच्च पर) व डाइक्रोमेट (Cr₂O₇²⁻, दो चतुष्फलकों का शीर्ष-साझा रूप, pH निम्न पर) आपस में अंतरारूपांतरित होते हैं (pH पर निर्भर): 2CrO₄²⁻ + 2H⁺ ⇌ Cr₂O₇²⁻ + H₂O
अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट प्रबल ऑक्सीकारक है: Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O (E° = 1.33V)। यह I⁻ को I₂ में, Fe²⁺ को Fe³⁺ में, तथा Sn²⁺ को Sn⁴⁺ में ऑक्सीकृत कर देता है।
(ख) पोटैशियम परमैंगनेट, KMnO₄
इसे बनाने के लिए MnO₂ (पाइरोलुसाइट अयस्क) को क्षारीय माध्यम में वायु या KNO₃ के साथ संगलित कर हरा K₂MnO₄ (मैंगनेट, Mn(VI)) प्राप्त किया जाता है, जो उदासीन या अम्लीय माध्यम में असमानुपातित होकर बैंगनी KMnO₄ (परमैंगनेट, Mn(VII)) देता है:
3MnO₄²⁻ + 4H⁺ → 2MnO₄⁻ + MnO₂ + 2H₂O
औद्योगिक स्तर पर मैंगनेट का वैद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण किया जाता है। KMnO₄ गहरे बैंगनी (लगभग काले) क्रिस्टल बनाता है, 513K पर विघटित हो जाता है, तथा प्रतिचुंबकीय होता है (कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं, जबकि हरा मैंगनेट आयन एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन के कारण अनुचुंबकीय है)।
अम्लीय माध्यम में KMnO₄ प्रबल ऑक्सीकारक है: MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O (E° = +1.52V)। यह I⁻ को I₂ में, Fe²⁺ को Fe³⁺ में, ऑक्सैलेट को CO₂ में, तथा H₂S को S में ऑक्सीकृत करता है। HCl की उपस्थिति में परमैंगनेट का अनुमापन असंतोषजनक होता है क्योंकि HCl स्वयं Cl₂ में ऑक्सीकृत हो जाता है।
- क्रोमाइट अयस्क = FeCr₂O₄; पाइरोलुसाइट अयस्क = MnO₂।
- क्रोमेट (पीला, चतुष्फलकीय) ⇌ डाइक्रोमेट (नारंगी) — pH निर्भर संतुलन।
- Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O, E° = 1.33V।
- MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O, E° = 1.52V।
- मैंगनेट (हरा) अनुचुंबकीय; परमैंगनेट (बैंगनी) प्रतिचुंबकीय।
- KMnO₄ 513K पर विघटित होता है: 2KMnO₄ → K₂MnO₄ + MnO₂ + O₂।
4.15 लैंथेनॉयड (Lanthanoids)
लैंथेनम के बाद आने वाले चौदह तत्व (Ce से Lu, Z=58–71) लैंथेनॉयड कहलाते हैं, इन्हें सामान्य संकेत Ln से दर्शाया जाता है। इनका सामान्य विन्यास 4fⁿ 5d⁰⁻¹ 6s² है। इनकी सबसे स्थायी ऑक्सीकरण अवस्था +3 है, यद्यपि कुछ तत्व +2 (Eu²⁺, Yb²⁺) व +4 (Ce⁴⁺, Tb⁴⁺) भी दर्शाते हैं — यह अनियमितता खाली (f⁰), अर्ध-भरित (f⁷) व पूर्ण-भरित (f¹⁴) विन्यासों के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण है।
लैंथेनॉयड आकुंचन — श्रेणी में परमाणु व आयनिक त्रिज्याओं में क्रमिक व नियमित ह्रास — इस श्रेणी की सबसे विशिष्ट पहचान है, जिसका परिणाम आगे आने वाले 5d संक्रमण तत्वों के गुणों पर पड़ता है (जैसे Zr-Hf का लगभग समान आकार व रसायन)।
सामान्य गुण: सभी लैंथेनॉयड चाँदी जैसे श्वेत, मुलायम धातु हैं, जो वायु में शीघ्र बदरंग हो जाते हैं; गलनांक 1000–1200K के बीच (Sm को छोड़कर, जो 1623K पर पिघलता है); जल से क्रिया कर +3 आयन बनाते हैं; La³⁺ व Lu³⁺ रंगहीन हैं जबकि शेष सभी f-इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण रंगीन व (f⁰ तथा f¹⁴ को छोड़कर) अनुचुंबकीय हैं।
उपयोग: "मिश्र धातु" (Misch Metal — ~95% लैंथेनॉयड + ~5% Fe + लेशमात्र S, C, Ca, Al) का उपयोग लाइटर फ्लिंट, बंदूक की गोली व हल्के मिश्रातु में होता है; लैंथेनॉयड ऑक्साइड पेट्रोलियम भंजन में उत्प्रेरक तथा TV स्क्रीन में फॉस्फर के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
- लैंथेनॉयड = La के बाद के 14 तत्व (Ce–Lu); सामान्य संकेत Ln।
- सामान्य विन्यास: 4fⁿ 5d⁰⁻¹ 6s²; स्थायी अवस्था +3।
- अपवाद अवस्थाएँ: Ce⁴⁺ (f⁰), Eu²⁺ (f⁷), Tb⁴⁺ (f⁷), Yb²⁺ (f¹⁴), Sm²⁺।
- लैंथेनॉयड आकुंचन: 4f इलेक्ट्रॉनों का दुर्बल परिरक्षण → त्रिज्या में क्रमिक ह्रास।
- मिश्र धातु (Misch Metal): ~95% लैंथेनॉयड + ~5% Fe + लेशमात्र S,C,Ca,Al।
4.16 ऐक्टिनॉयड (Actinoids)
ऐक्टिनियम के बाद आने वाले चौदह तत्व (Th से Lr, Z=90–103) ऐक्टिनॉयड कहलाते हैं। इनका सामान्य विन्यास 5fⁿ है। यह सभी तत्व रेडियोसक्रिय (radioactive) हैं — प्रारंभिक सदस्यों की अर्धायु अपेक्षाकृत लंबी, जबकि बाद वाले सदस्यों की अर्धायु कुछ मिनट तक ही सीमित है (Lr की अर्धायु मात्र 3 मिनट)।
ऐक्टिनॉयडों का रसायन लैंथेनॉयडों की तुलना में अधिक जटिल है क्योंकि इनकी ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परास बहुत विस्तृत है (+3 से +7 तक), जिसका कारण 5f, 6d व 7s कक्षकों की लगभग समान ऊर्जा है। फिर भी सामान्य स्थायी अवस्था +3 है। ऐक्टिनॉयड आकुंचन भी होता है, जो लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र (एक तत्व से अगले तक ज्यादा) होता है, क्योंकि 5f इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव 4f से भी कमजोर होता है।
- ऐक्टिनॉयड = Ac के बाद के 14 तत्व (Th–Lr); सभी रेडियोसक्रिय।
- सामान्य विन्यास: 5fⁿ 6d⁰⁻¹ 7s²; ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परास +3 से +7 तक।
- ऐक्टिनॉयड आकुंचन, लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र (5f का और भी कमजोर परिरक्षण)।
- ऐक्टिनॉयडों का रसायन लैंथेनॉयडों से अधिक जटिल व अनियमित।
- Lr (Z=103) ऐक्टिनॉयड श्रेणी का अंतिम तत्व — [Rn]5f¹⁴6d¹7s²।
4.17 d- एवं f-ब्लॉक तत्वों के कुछ अनुप्रयोग
- लोहा व इस्पात — निर्माण उद्योग की रीढ़, जिनमें Cr, Mn, Ni मिश्रातु तत्वों के रूप में उपयोग होते हैं।
- V₂O₅ — संस्पर्श प्रक्रम (H₂SO₄ उत्पादन) में उत्प्रेरक।
- TiCl₄ + Al(CH₃)₃ (ज़ीग्लर उत्प्रेरक) — पॉलीएथिलीन उत्पादन में।
- Fe — हाबर प्रक्रम (अमोनिया संश्लेषण) में उत्प्रेरक।
- Ni — तेल/वसा के हाइड्रोजनीकरण में उत्प्रेरक।
- PdCl₂ — वाकर प्रक्रम (एथाइन से एथेनल बनाने) में उत्प्रेरक।
- AgBr — फोटोग्राफी उद्योग में प्रकाश-संवेदनशीलता के लिए।
- TiO — वर्णक उद्योग में सफेद रंगद्रव्य के रूप में।
- MnO₂ — शुष्क बैटरी सेल में।
- मिश्र धातु — लाइटर फ्लिंट, हल्के मिश्रातुओं में।
4.18 महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य
- d-ब्लॉक में वर्ग 3–12 आते हैं; f-ब्लॉक को आवर्त सारणी के नीचे अलग रखा जाता है।
- संक्रमण तत्व की IUPAC परिभाषा: जिसके परमाणु/आयन में d-कक्षक अपूर्ण हो।
- Zn, Cd, Hg संक्रमण तत्व नहीं माने जाते (मूल व सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था दोनों में d¹⁰)।
- सामान्य विन्यास: (n−1)d¹⁻¹⁰ns¹⁻²।
- Cr का विन्यास 3d⁵4s¹ तथा Cu का विन्यास 3d¹⁰4s¹ है (अपवाद)।
- Sc (Z=21) संक्रमण तत्व है क्योंकि 3d¹ अपूर्ण है; Zn (Z=30) नहीं क्योंकि 3d¹⁰ पूर्ण है।
- संक्रमण धातुओं के गलनांक/क्वथनांक व कणन एन्थैल्पी उच्च होते हैं; d⁵ विन्यास के पास शिखर।
- Cr, Mo, W सबसे उच्च कणन एन्थैल्पी वाली धातुओं में हैं।
- श्रेणी में परमाणु त्रिज्या घटती है (नियमित रूप से नहीं) क्योंकि d-इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण कमजोर है।
- Zr व Hf की त्रिज्याएँ लगभग समान — लैंथेनॉयड आकुंचन का प्रभाव।
- लैंथेनॉयड आकुंचन का कारण: 4f इलेक्ट्रॉनों का अपूर्ण परिरक्षण।
- श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है परंतु असंक्रमण तत्वों जितनी तेज़ी से नहीं।
- d⁵ (Mn²⁺) व d¹⁰ (Zn²⁺) विन्यासों को अतिरिक्त स्थायित्व — विनिमय ऊर्जा अधिकतम।
- Mn सर्वाधिक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2 से +7) दिखाता है।
- Sc केवल +3 अवस्था दर्शाता है (कोई परिवर्तनशील अवस्था नहीं)।
- Zn की एकमात्र अवस्था +2 है (d-इलेक्ट्रॉन की भागीदारी नहीं)।
- Cu की सामान्य अवस्थाएँ +1 व +2 हैं।
- असंक्रमण तत्वों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में 2 का अंतर, संक्रमण तत्वों में प्रायः 1 का अंतर।
- Ni(CO)₄ व Fe(CO)₅ में धातु की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है (π-ग्राही CO लिगंड के कारण)।
- Cu का E°(M²⁺/M) धनात्मक (+0.34V) — इसीलिए Cu तनु अम्ल से H₂ मुक्त नहीं करता।
- Mn³⁺ व Co³⁺ जलीय विलयन में प्रबल ऑक्सीकारक हैं।
- Ti²⁺, V²⁺, Cr²⁺ प्रबल अपचायक हैं (तनु अम्ल से H₂ मुक्त करते हैं)।
- चुंबकीय आघूर्ण सूत्र: μ = √n(n+2) BM, n = अयुगलित इलेक्ट्रॉन।
- d⁰ व d¹⁰ विन्यास वाले आयन रंगहीन व प्रतिचुंबकीय होते हैं।
- रंग d-d संक्रमण (इलेक्ट्रॉनिक उत्तेजन) के कारण होता है।
- संक्रमण धातुएँ संकुल यौगिक आसानी से बनाती हैं — छोटा आकार, उच्च आवेश, रिक्त d-कक्षक।
- V₂O₅ (संस्पर्श प्रक्रम), Fe (हाबर प्रक्रम), Ni (हाइड्रोजनीकरण) — प्रमुख उत्प्रेरक उदाहरण।
- अंतराकाशी यौगिक असमीकरणमितीय, अति कठोर, धात्विक चालक व रासायनिक रूप से निष्क्रिय होते हैं।
- 15% से कम त्रिज्या-अंतर वाली धातुएँ आसानी से मिश्रातु बनाती हैं।
- क्रोमाइट अयस्क = FeCr₂O₄; पाइरोलुसाइट अयस्क = MnO₂।
- क्रोमेट (पीला, चतुष्फलकीय) ⇌ डाइक्रोमेट (नारंगी, दो चतुष्फलकों का शीर्ष-साझा रूप) — pH निर्भर संतुलन।
- Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O, E° = 1.33V।
- MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O, E° = 1.52V।
- मैंगनेट आयन (हरा) अनुचुंबकीय; परमैंगनेट आयन (बैंगनी) प्रतिचुंबकीय।
- लैंथेनॉयड = La के बाद के 14 तत्व (Ce–Lu); सामान्य संकेत Ln।
- ऐक्टिनॉयड = Ac के बाद के 14 तत्व (Th–Lr); सभी रेडियोसक्रिय।
- लैंथेनॉयडों की स्थायी अवस्था +3; अपवाद: Ce⁴⁺, Eu²⁺, Tb⁴⁺, Yb²⁺, Sm²⁺।
- ऐक्टिनॉयडों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परास लैंथेनॉयडों से कहीं अधिक विस्तृत है।
- ऐक्टिनॉयड आकुंचन, लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र है।
- मिश्र धातु (Misch Metal): ~95% लैंथेनॉयड + ~5% Fe + लेशमात्र S,C,Ca,Al।
- Cu⁺ जलीय विलयन में असमानुपातित होकर Cu²⁺ व Cu देता है (2Cu⁺ → Cu²⁺ + Cu)।
4.19 पाठ्यनिहित प्रश्नों के हल (4.1–4.11)
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें।
4.1 सिल्वर परमाणु की मूल अवस्था में पूर्ण भरित d कक्षक (4d¹⁰) हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक संक्रमण तत्व है?
4.2 श्रेणी Sc(Z=21) से Zn(Z=30) में, जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम (126 kJ/mol) होता है; क्यों?
4.3 संक्रमण तत्वों की 3d श्रेणी का कौन सा तत्व बड़ी संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है एवं क्यों?
4.4 ऐसे संक्रमण तत्व का नाम बताइए जिसमें परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्थाएँ नहीं पाई जातीं।
4.5 कॉपर के लिए E°(M²⁺/M) का मान धनात्मक (+0.34V) है। इसके संभावित कारण क्या हैं?
4.6 संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी (प्रथम और द्वितीय) में अनियमित परिवर्तन को आप कैसे समझायेंगे?
4.7 कोई धातु अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था केवल ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में ही क्यों प्रदर्शित करती है?
4.8 Cr²⁺ और Fe²⁺ में से कौन प्रबल अपचायक है और क्यों?
4.9 M²⁺(aq) आयन (Z=27) के लिए 'प्रचक्रण-मात्र' चुंबकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
4.10 स्पष्ट कीजिए कि Cu⁺ आयन जलीय विलयन में स्थायी नहीं है, क्यों? समझाइए।
4.11 लैंथेनॉयड आकुंचन की तुलना में एक तत्व से दूसरे तत्व के बीच ऐक्टिनॉयड आकुंचन अधिक होता है। क्यों?
4.20 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल (4.1 – 4.38)
NCERT कक्षा 12 रसायन विज्ञान, एकक 4 (d- एवं f-ब्लॉक तत्व) के अभ्यास के सभी 38 प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल — प्रत्येक प्रश्न को विस्तार से समझाया गया है।
4.1 निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए — (i) Cr³⁺ (ii) Pm³⁺ (iii) Cu⁺ (iv) Ce⁴⁺ (v) Co²⁺ (vi) Lu²⁺ (vii) Mn²⁺ (viii) Th⁴⁺
4.2 +3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के संदर्भ में Mn²⁺ के यौगिक Fe²⁺ के यौगिकों की तुलना में अधिक स्थायी क्यों हैं?
4.8 संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं? d-ब्लॉक के तत्वों में कौन से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते?
🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न — d- एवं f-ब्लॉक तत्व (2014–2026)
2014 से 2026 (रीएग्ज़ाम सहित) तक इस अध्याय से NEET में पूछे गए प्रश्न, हल सहित। यह अध्याय 2026 में 6.67% भारांक (पिछले वर्ष से 50% अधिक) के साथ इनऑर्गेनिक रसायन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल रहा।
26R.1 निम्नलिखित लैंथेनाइड आयनों में से किसमें चार अयुगलित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं? (Ce=58, Nd=60, Tb=65, Ho=67)
26R.2 KMnO₄ को 513K पर गरम करने से बनने वाली हरी अनुचुंबकीय स्पीशीज़ कौन-सी है?
26.1 Ce (लैंथेनॉयड) में +3 सबसे सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था होते हुए भी यह +4 अवस्था क्यों दर्शाता है?
25.1 निम्नलिखित औद्योगिक प्रक्रमों को उनमें प्रयुक्त उत्प्रेरकों से सुमेलित कीजिए — हैबर प्रक्रम, वाकर ऑक्सीकरण, विल्किंसन उत्प्रेरक, ज़ीगलर उत्प्रेरक
25.2 कथन I: लौहचुंबकत्व, अनुचुंबकत्व का एक चरम रूप माना जाता है। कथन II: Mn²⁺ आयन में अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, Fe³⁺ आयन के समान है।
24.1 Mn³⁺/Mn²⁺ युग्म का E° मान, Cr³⁺/Cr²⁺ अथवा Fe³⁺/Fe²⁺ की तुलना में अधिक धनात्मक क्यों होता है?
24.2 लैंथेनॉयड आयनों का कौन-सा युग्म प्रतिचुंबकीय है?
23.1 जलीय विलयन में Cu²⁺ लवण, Cu⁺ लवण से अधिक स्थायी क्यों होते हैं?
22.1 Zr (Z=40) तथा Hf (Z=72) के परमाण्विक व आयनिक त्रिज्या लगभग समान क्यों होते हैं?
18.1 Co³⁺, Cr³⁺, Fe³⁺ तथा Ni²⁺ आयनों के चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
17.1 HgCl₂ तथा I₂ दोनों को I⁻ आयन युक्त जल में घोलने पर बनने वाली स्पीशीज़ों का युग्म बताइए।
17.2 ऐक्टिनॉयडों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की अधिक विस्तृत परास किस कारण से है?
16.1 यूरोपियम (Z=63), गैडोलिनियम (Z=64) तथा टर्बियम (Z=65) के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
15C.1 2.84 BM चुंबकीय आघूर्ण किस आयन द्वारा प्रदर्शित होता है? (Ni=28, Ti=22, Cr=24, Co=27)
14.1 लैंथेनॉयड आकुंचन का मुख्य कारण क्या है?
14.2 अम्लीय परिस्थितियों में जलीय KMnO₄ की H₂O₂ के साथ अभिक्रिया से क्या प्राप्त होता है?
4.22 अन्य NEET संबंधित तथ्य Extra High-Yield
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, सूत्र व तुलनाएँ, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं।
- लैंथेनॉयड आकुंचन के कारण द्वितीय (4d) व तृतीय (5d) संक्रमण श्रेणी के संगत तत्वों (जैसे Zr-Hf, Nb-Ta, Mo-W) की त्रिज्याएँ लगभग बराबर हो जाती हैं — इन्हें एक-दूसरे से अलग करना कठिन होता है।
- संक्रमण तत्वों का घनत्व श्रेणी में नीचे जाने पर बढ़ता है — तृतीय श्रेणी के तत्व (जैसे Os, Ir) का घनत्व सर्वाधिक (≈22.6 g/cm³) होता है।
- Mn तथा Tc का गलनांक अपने निकटवर्ती तत्वों की तुलना में कम होता है — d⁵ अर्ध-भरित विन्यास में सभी d-इलेक्ट्रॉन अयुगलित व स्थानीकृत रहते हैं, धात्विक आबंध में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम हो जाती है।
- किसी संक्रमण धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रायः उसके ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में ही प्राप्त होती है — O व F उच्च वैद्युतऋणात्मकता व लघु आकार के कारण धातु को अपनी अधिकतम d-इलेक्ट्रॉन संख्या साझा करने हेतु प्रेरित करते हैं।
- E°(Mn³⁺/Mn²⁺) का मान (+1.57V) संक्रमण श्रेणी में असामान्य रूप से उच्च धनात्मक — Mn²⁺ (d⁵, अर्ध-भरित) के असाधारण स्थायित्व के कारण Mn³⁺ प्रबल ऑक्सीकारक है।
- अंतराकाशी यौगिक (interstitial compounds) असमीकरणमितीय होते हैं — रासायनिक संघटन के स्थिर अनुपात के नियम का पालन नहीं करते (जैसे TiC में कार्बन का 1:1 अनुपात आवश्यक नहीं)।
- ऐक्टिनॉयड आकुंचन, लैंथेनॉयड आकुंचन से अधिक तीव्र होता है — 5f कक्षकों का 4f से और भी कमजोर परिरक्षण प्रभाव।
- लैंथेनॉयड हाइड्रॉक्साइडों [Ln(OH)₃] की क्षारकता श्रेणी में आगे बढ़ने पर घटती है — La(OH)₃ सर्वाधिक क्षारकीय, Lu(OH)₃ सबसे कम।
- K₂Cr₂O₇ के निर्माण: क्रोमाइट (FeCr₂O₄) → Na₂CrO₄ → Na₂Cr₂O₇ → K₂Cr₂O₇।
- KMnO₄ के निर्माण: पाइरोलुसाइट (MnO₂) → K₂MnO₄ → KMnO₄ (वैद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण)।
- Cu²⁺ का जलीय विलयन में होना ऊष्मागतिकीय रूप से Cu⁺ से अधिक स्थायी — Cu²⁺ की असामान्य रूप से उच्च जलयोजन एन्थैल्पी।
- अंतिम रिवीज़न में इन चार बिंदुओं को प्राथमिकता दें: (1) चुंबकीय आघूर्ण सूत्र व d-इलेक्ट्रॉन गणना, (2) K₂Cr₂O₇ व KMnO₄ के निर्माण व अभिक्रियाएँ (माध्यम सहित), (3) लैंथेनॉयड/ऐक्टिनॉयड आकुंचन के कारण व परिणाम, (4) असामान्य विन्यास (Cr, Cu) व d⁵/d¹⁰ स्थायित्व से जुड़े अपवाद।