उपसहसंयोजन यौगिक — सम्पूर्ण अध्याय नोट्स (अध्याय 5)
रसायन विज्ञान • कक्षा-12 • अध्याय 5

उपसहसंयोजन यौगिक

वर्नर के सिद्धांत, नामकरण, समावयवता से लेकर संयोजकता आबंध सिद्धांत, क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत, धातु कार्बोनिलों में आबंधन तथा जैविक व औद्योगिक महत्व तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आरेख और सभी पाठ्यनिहित व अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही जगह।

[M(L)ₙ] समन्वय सत्ता
Δₒ, Δₜ क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन
d²sp³ / sp³d² संकरण
★ NEET फोकस तथ्य
इतिहास व अभिधारणाएँ

5.1 उपसहसंयोजन यौगिकों का वर्नर का सिद्धांत

संक्रमण धातुएँ बड़ी संख्या में संकुल यौगिक बनाती हैं, जिनमें धातु परमाणु अनेक ऋणायनों अथवा उदासीन अणुओं से इलेक्ट्रॉनों का सहसंयोजन कर परिबद्ध रहते हैं — ऐसे यौगिक उपसहसंयोजन यौगिक कहलाते हैं। क्लोरोफिल (मैग्नीशियम), हीमोग्लोबिन (आयरन) तथा विटामिन B₁₂ (कोबाल्ट) इसके जैविक उदाहरण हैं।

सर्वप्रथम स्विस वैज्ञानिक अल्फ्रेड वर्नर (1866–1919) ने उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचनाओं के संबंध में अपने विचार प्रतिपादित किए। कोबाल्ट(III) क्लोराइड–अमोनिया संकुलों के प्रेक्षणों से उन्होंने प्राथमिक व द्वितीयक संयोजकता की धारणा प्रस्तुत की।

रंगसूत्रचालकता संबंधAgCl (मोल)
पीला[Co(NH₃)₆]³⁺3Cl⁻1:3 विद्युत अपघट्य3
नीललोहित[CoCl(NH₃)₅]²⁺2Cl⁻1:2 विद्युत अपघट्य2
हरा[CoCl₂(NH₃)₄]⁺Cl⁻1:1 विद्युत अपघट्य1
बैंगनी[CoCl₂(NH₃)₄]⁺Cl⁻1:1 विद्युत अपघट्य1
ध्यान दें: हरे व बैंगनी यौगिकों के मूलानुपाती सूत्र CoCl₃·4NH₃ समान हैं परंतु गुणधर्म भिन्न — ऐसे यौगिक समावयव (isomers) कहलाते हैं। वर्नर ने 1898 में उपसहसंयोजन यौगिकों का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
वर्नर सिद्धांत की मुख्य अभिधारणाएँ 1. धातुएँ दो प्रकार की संयोजकताएँ दर्शाती हैं — प्राथमिक तथा द्वितीयक।
2. प्राथमिक संयोजकताएँ आयननीय होती हैं तथा ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं।
3. द्वितीयक संयोजकताएँ अन-आयननीय होती हैं (उदासीन अणुओं/ऋणायनों द्वारा संतुष्ट); यह उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है, किसी धातु के लिए सामान्यतः निश्चित।
4. द्वितीयक संयोजकता से आबंधित समूह विशिष्ट रूप से दिक्स्थान में व्यवस्थित रहते हैं — समन्वय बहुफलक (Coordination polyhedra)।

वर्नर ने यह भी बताया कि संक्रमण तत्वों के समन्वय यौगिकों में सामान्यतः अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय व वर्ग समतली ज्यामितियाँ पाई जाती हैं। [Co(NH₃)₆]³⁺, [CoCl(NH₃)₅]²⁺ तथा [CoCl₂(NH₃)₄]⁺ अष्टफलकीय हैं; [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय; [PtCl₄]²⁻ वर्ग समतली है।

द्वि लवण तथा संकुल में अंतर

द्वि लवण जैसे कार्नैलाइट (KCl·MgCl₂·6H₂O), मोर लवण (FeSO₄·(NH₄)₂SO₄·6H₂O), फिटकरी (KAl(SO₄)₂·12H₂O) जल में पूर्णरूप से साधारण आयनों में वियोजित हो जाते हैं। परंतु K₄[Fe(CN)₆] में उपस्थित [Fe(CN)₆]⁴⁻ संकुल आयन, Fe²⁺ तथा CN⁻ आयनों में वियोजित नहीं होता — यही मूल अंतर है।

त्वरित तथ्य — 5.1
  • वर्नर ने 1898 में उपसहसंयोजन यौगिकों का सिद्धांत प्रस्तुत किया; 1913 में इस कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
  • प्राथमिक संयोजकता = आयननीय (ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट); द्वितीयक संयोजकता = अन-आयननीय (उपसहसंयोजन संख्या के बराबर)।
  • [Co(NH₃)₆]³⁺, [CoCl(NH₃)₅]²⁺, [CoCl₂(NH₃)₄]⁺ अष्टफलकीय; [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय; [PtCl₄]²⁻ वर्ग समतली।
  • द्वि लवण जल में पूर्णतः वियोजित होते हैं; संकुल यौगिकों के संकुल आयन वियोजित नहीं होते (जैसे K₄[Fe(CN)₆])।
शब्दावली

5.2 उपसहसंयोजन यौगिकों से संबंधित पारिभाषिक शब्द

शब्दपरिभाषाउदाहरण
उपसहसंयोजन सत्ताकेंद्रीय धातु से निश्चित संख्या में आबंधित आयन/अणु[CoCl₃(NH₃)₃]
केंद्रीय परमाणु/आयनवह परमाणु/आयन जो निश्चित ज्यामिति में परिबद्ध रहता है[NiCl₂(H₂O)₄] में Ni²⁺
लिगन्डकेंद्रीय परमाणु/आयन से परिबद्ध आयन/अणुCl⁻, H₂O, NH₃
उपसहसंयोजन संख्या (CN)धातु से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की संख्या[PtCl₆]²⁻ में Pt की CN=6
समन्वय मंडलकेंद्रीय परमाणु व उससे जुड़े लिगन्डK₄[Fe(CN)₆] में [Fe(CN)₆]⁴⁻
ऑक्सीकरण संख्यालिगन्डों को हटाने पर केंद्रीय परमाणु पर आवेश[Cu(CN)₄]³⁻ में Cu(I)
होमोलेप्टिक संकुलधातु केवल एक प्रकार के दाता समूह से जुड़ा[Co(NH₃)₆]³⁺
हेट्रोलेप्टिक संकुलधातु एक से अधिक प्रकार के दाता समूहों से जुड़ा[Co(NH₃)₄Cl₂]⁺

लिगन्ड के प्रकार (दंतुरता के आधार पर)

प्रकारपरिभाषाउदाहरण
एकदंतुर (unidentate)एक दाता परमाणु द्वारा परिबद्धCl⁻, H₂O, NH₃
द्विदंतुर (didentate)दो दाता परमाणुओं द्वारा परिबद्धen, C₂O₄²⁻
बहुदंतुर (polydentate)अनेक दाता परमाणुN(CH₂CH₂NH₂)₃
षट्दंतुर (hexadentate)छह दाता परमाणुEDTA⁴⁻ (2N + 4O)
उभयदंती (ambidentate)दो भिन्न दाता परमाणु, कोई एक भाग लेता है−NO₂/−ONO, SCN⁻/NCS⁻
कीलेट लिगन्ड: जब द्विदंतुर/बहुदंतुर लिगन्ड अपने दो या अधिक दाता परमाणुओं का प्रयोग एक ही धातु आयन से आबंधन हेतु करता है, तो वह कीलेट (chelate) लिगन्ड कहलाता है; परिणामी संकुल कीलेट संकुल — ये एकदंतुर लिगन्ड युक्त संकुलों से अधिक स्थायी होते हैं (कीलेट प्रभाव)।
M ← −NO₂(नाइट्रिटो-N) M ← −O−N=O(नाइट्रिटो-O) M ← −SCN(थायोसायनेटो) M ← −NCS(आइसोथायोसायनेटो) उभयदंती लिगन्डों के आबंधन के दो प्रकार NO₂⁻ नाइट्रोजन अथवा ऑक्सीजन द्वारा संयोजित हो सकता है SCN⁻ सल्फर अथवा नाइट्रोजन परमाणु द्वारा संयोजित हो सकता है
उभयदंती लिगन्ड आबंधन के दोनों प्रकार

समन्वय बहुफलक की आकृतियाँ

L L M चतुष्फलकीय L L L M वर्ग समतल M अष्टफलकीय
चित्र 5.1 — विभिन्न समन्वय बहुफलकों की आकृतियाँ (M केंद्रीय परमाणु/आयन, L एकदंतुर लिगन्ड)
त्वरित तथ्य — 5.2
  • उपसहसंयोजन संख्या केवल σ आबंधों की संख्या पर निर्धारित होती है; π आबंध नहीं गिने जाते।
  • एकदंतुर, द्विदंतुर, बहुदंतुर व षट्दंतुर — दाता परमाणुओं की संख्या पर वर्गीकरण।
  • EDTA⁴⁻ एक महत्वपूर्ण षट्दंतुर लिगन्ड है (2N+4O)।
  • कीलेट संकुल एकदंतुर लिगन्ड युक्त संकुलों से अधिक स्थायी होते हैं (कीलेट प्रभाव)।
  • उभयदंती लिगन्ड (जैसे −NO₂/−ONO, SCN⁻/NCS⁻) दो भिन्न परमाणुओं में से किसी एक द्वारा संयोजित हो सकते हैं।
सूत्र व नामकरण नियम

5.3 उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण

5.3.1 एककेंद्रकी उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र

सूत्र लिखने के नियम (i) सर्वप्रथम केंद्रीय परमाणु लिखा जाता है।
(ii) तत्पश्चात लिगन्डों को अंग्रेज़ी वर्णमाला के क्रम में लिखा जाता है (आवेश पर निर्भर नहीं)।
(iii) बहुदंतुर लिगन्ड भी वर्णमाला के क्रम में; संकेताक्षर के प्रथम अक्षर के आधार पर स्थिति।
(iv) संपूर्ण उपसहसंयोजन सत्ता को गुरुकोष्ठक [ ] में लिखते हैं।
(v) समन्वय मंडल में धातु व लिगन्डों के मध्य स्थान नहीं छोड़ा जाता।
(vi) उपसहसंयोजन सत्ता का आवेश गुरुकोष्ठक के बाहर दाईं ओर मूर्धांक में लिखा जाता है।
2004 में IUPAC ने अनुशंसा की है कि लिगन्डों को वर्णमाला के आधार पर चुनना चाहिए, आवेश के आधार पर नहीं।

5.3.2 एककेंद्रकी उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण

नामकरण के नियम (i) धनायन का नाम सर्वप्रथम लिखा जाता है (धनायन अथवा ऋणायन में से जो भी आवेशयुक्त हो)।
(ii) केंद्रीय परमाणु के नाम से पूर्व लिगन्डों के नाम वर्णमाला क्रम में (सूत्र के विपरीत)।
(iii) ऋणावेशित लिगन्डों के नाम के अंत में −o आता है (2004 से −ido, अतः क्लोरो→क्लोरिडो); उदासीन व धनावेशित लिगन्डों के नाम नहीं बदलते — अपवाद: H₂O=एक्वा, NH₃=ऐम्मीन, CO=कार्बोनिल, NO=नाइट्रोसिल।
(iv) एक से अधिक समान लिगन्ड होने पर डाइ, ट्राइ आदि (सरल लिगन्ड) या बिस, ट्रिस, टेट्राकिस (जटिल/संख्यात्मक-पूर्वलग्न वाले लिगन्ड) पूर्व-लगाते हैं।
(v) धातु की ऑक्सीकरण अवस्था रोमन अंकों में कोष्ठक में दर्शाई जाती है।
(vi) धनायनिक संकुल में धातु का सामान्य नाम; ऋणायनिक संकुल में धातु नाम के अंत में −ऐट (ate) अनुलग्न (कुछ धातुओं के लैटिन नाम, जैसे Fe के लिए फेरेट)।
यौगिकIUPAC नाम
[Cr(NH₃)₃(H₂O)₃]Cl₃ट्राइऐम्मीनट्राइएक्वाक्रोमियम(III) क्लोराइड
[Co(H₂NCH₂CH₂NH₂)₃]₂(SO₄)₃ट्रिस(एथेन-1,2-डाइऐमीन)कोबाल्ट(III) सल्फेट
[Ag(NH₃)₂][Ag(CN)₂]डाइऐम्मीनसिल्वर(I)डाइसायनिडोअर्जेन्टेट(I)
त्वरित तथ्य — 5.3
  • सूत्र में लिगन्ड वर्णमाला क्रम में; नाम में भी लिगन्ड वर्णमाला क्रम में।
  • 2004 IUPAC: ऋणावेशित लिगन्ड के नाम के अंत में −इडो (−ido); जैसे क्लोरो→क्लोरिडो।
  • उदासीन लिगन्डों के विशेष नाम: H₂O=एक्वा, NH₃=ऐम्मीन, CO=कार्बोनिल, NO=नाइट्रोसिल।
  • ऋणायनिक संकुल में धातु नाम के अंत में −ऐट; Fe=फेरेट, Cu=क्यूप्रेट।
  • बहुदंतुर लिगन्ड कोष्ठक में लिखे जाते हैं; बिस/ट्रिस/टेट्राकिस उपयोग होते हैं।
त्रिविम व संरचनात्मक

5.4 उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता

समावयवी ऐसे दो या इससे अधिक यौगिक होते हैं जिनके रासायनिक सूत्र समान होते हैं परंतु परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न होती है।

समावयवता के प्रकार 1. त्रिविम समावयवता: (क) ज्यामितीय समावयवता (ख) ध्रुवण समावयवता
2. संरचनात्मक समावयवता: (क) बंधनी (ख) उपसहसंयोजन (ग) आयनन (घ) विलायकयोजन

5.4.1 ज्यामितीय समावयवता

यह हेट्रोलेप्टिक संकुलों में पाई जाती है — मुख्यतः 4 व 6 CN वाले संकुलों में। [MX₂L₂] (वर्ग समतल) में दो X लिगन्ड समपक्ष (cis) पास-पास अथवा विपक्ष (trans) एक-दूसरे के विपरीत रहते हैं।

ClNH₃ Pt ClNH₃ समपक्ष (cis) ClNH₃ Pt NH₃Cl विपक्ष (trans)
चित्र 5.2 — [Pt(NH₃)₂Cl₂] के ज्यामितीय समावयव (समपक्ष एवं विपक्ष)

[MX₂L₄] अष्टफलकीय में भी cis/trans संभव है। [Ma₃b₃] (जैसे [Co(NH₃)₃(NO₂)₃]) में फलकीय (fac) तथा रेखांशिक (mer) समावयवी प्राप्त होते हैं।

महत्वपूर्ण: चतुष्फलकीय संकुल ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाते, क्योंकि सभी स्थितियाँ समतुल्य होती हैं।

5.4.2 ध्रुवण समावयवता

ध्रुवण समावयव एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं जिन्हें अध्यारोपित नहीं किया जा सकता — प्रतिबिंब रूप या एनैन्टिओमर। ऐसे अणु/आयन काइरल (chiral) कहलाते हैं।

Co दक्षिण घूर्णक (d) दर्पण Co वामावर्ती (l)
चित्र 5.6 — [Co(en)₃]³⁺ के ध्रुवण समावयव (d तथा l)

5.4.3 बंधनी समावयवता

उभयदंती लिगन्ड युक्त संकुलों में — थायोसायनेट NCS⁻, नाइट्रोजन (M−NCS) अथवा सल्फर (M−SCN) से बंध सकता है। [Co(NH₃)₅(NO₂)]Cl₂ — नाइट्राइट ऑक्सीजन द्वारा (M−ONO) लाल, नाइट्रोजन द्वारा (M−NO₂) पीला होता है।

5.4.4 उपसहसंयोजन समावयवता

धनायनिक व ऋणायनिक उपसहसंयोजन सत्ता के मध्य लिगन्डों के अंतरपरिवर्तन से — [Co(NH₃)₆][Cr(CN)₆] व [Cr(NH₃)₆][Co(CN)₆]।

5.4.5 आयनन समावयवता

प्रतिआयन स्वयं लिगन्ड बन सकता है — [Co(NH₃)₅(SO₄)]Br तथा [Co(NH₃)₅Br]SO₄।

5.4.6 विलायकयोजन समावयवता

जल विलायक में हाइड्रेट समावयवता — [Cr(H₂O)₆]Cl₃ (बैंगनी) तथा [Cr(H₂O)₅Cl]Cl₂·H₂O (भूरा-हरा)।

त्वरित तथ्य — 5.4
  • ज्यामितीय: cis/trans; [Ma₃b₃] में fac/mer।
  • चतुष्फलकीय संकुल ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाते।
  • ध्रुवण समावयव = अध्यारोपित न हो सकने वाले दर्पण प्रतिबिंब (एनैन्टिओमर)।
  • बंधनी समावयवता उभयदंती लिगन्ड (NO₂⁻, SCN⁻) युक्त संकुलों में।
  • उपसहसंयोजन: धनायन व ऋणायन के बीच लिगन्ड अंतरपरिवर्तन।
  • आयनन: प्रतिआयन स्वयं लिगन्ड बन सकता है।
  • विलायकयोजन (हाइड्रेट): विलायक अणु सीधे लिगन्ड या क्रिस्टल जालक में।
VBT व CFT

5.5 उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन

5.5.1 संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)

इस सिद्धांत के अनुसार, लिगन्डों के प्रभाव में धातु परमाणु/आयन अपने (n−1)d, ns, np अथवा ns, np, nd कक्षकों का उपयोग संकरण के लिए कर सकता है।

समन्वय संख्यासंकरणज्यामिति
4sp³चतुष्फलकीय
4dsp²वर्ग समतली
5sp³dत्रिकोणीय द्विपिरैमिडी
6sp³d²अष्टफलकीय (बाह्य/उच्च प्रचक्रण)
6d²sp³अष्टफलकीय (आंतरिक/निम्न प्रचक्रण)

प्रतिचुंबकीय [Co(NH₃)₆]³⁺ (d⁶) आंतरिक कक्षक (d²sp³); अनुचुंबकीय [CoF₆]³⁻ बाह्य कक्षक (sp³d²)

आंतरिक कक्षक संकुल में (n−1)d कक्षक प्रयुक्त होते हैं (युग्मन होता है); बाह्य कक्षक संकुल में nd कक्षक प्रयुक्त होते हैं (बिना युग्मन के)।

5.5.2 VBT की सीमाएँ

VBT की कमियाँ (i) रंगों की व्याख्या नहीं
(ii) चुंबकीय आँकड़ों की कोई मात्रात्मक व्याख्या नहीं
(iii) दुर्बल/प्रबल लिगन्ड में भेद नहीं
(iv) ऊष्मागतिकीय/गतिक स्थायित्व की व्याख्या नहीं

5.5.3 क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)

CFT एक स्थिर वैद्युत मॉडल है — धातु-लिगन्ड आबंध आयनिक माने जाते हैं। विलगित धातु आयन के पाँचों d-कक्षकों की ऊर्जा समान होती है (अपभ्रष्ट/degenerate), परंतु लिगन्ड क्षेत्र में विपाटन (splitting) होता है।

(क) अष्टफलकीय विपाटन

dx²−y² व d (अक्षों पर) → eg (उच्च ऊर्जा); dxy, dyz, dxz (अक्षों के मध्य) → t2g (निम्न ऊर्जा)। ऊर्जा अंतर = Δo

ऊर्जा → गोलीय क्षेत्र में औसत ऊर्जा eg (d_z², d_x²-y²) t2g (dxy, dyz, dxz) Δo
चित्र 5.8 — अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों का विपाटन
स्पेक्ट्रमी रासायनिक श्रेणी (बढ़ती क्षेत्र प्रबलता) I⁻ < Br⁻ < SCN⁻ < Cl⁻ < S²⁻ < F⁻ < OH⁻ < C₂O₄²⁻ < H₂O < NCS⁻ < edta⁴⁻ < NH₃ < en < CN⁻ < CO

d⁴ आयनों के लिए — यदि Δo < P (युग्मन ऊर्जा): उच्च प्रचक्रण (t2g³eg¹); यदि Δo > P: निम्न प्रचक्रण (t2g⁴eg⁰)।

(ख) चतुष्फलकीय विपाटन

विपाटन अष्टफलकीय से उलटा व छोटा होता है: Δt = 4/9 Δo — अतः निम्न प्रचक्रण विरले ही देखा जाता है।

t2 (dxy,dyz,dxz) e (dz²,dx²-y²) Δt
चित्र 5.9 — चतुष्फलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों का विपाटन

5.5.4 उपसहसंयोजन यौगिकों में रंग

रंग d-d संक्रमण के कारण होता है — संकुल का रंग अवशोषित रंग का पूरक रंग होता है। [Ti(H₂O)₆]³⁺ में t2g¹→eg¹ संक्रमण से बैंगनी रंग प्राप्त होता है।

[Ti(H₂O)₆]³⁺ में एक इलेक्ट्रॉन का संक्रमण t2geg मूल अवस्था t2geg उत्तेजित अवस्था
चित्र 5.10 — [Ti(H₂O)₆]³⁺ में t2g¹eg⁰→t2g⁰eg¹ संक्रमण

5.5.5 CFT की सीमाएँ

CFT लिगन्ड को बिंदु आवेश मानता है, जो स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी के तथ्यों से असंगत है; यह सहसंयोजक आबंध प्रकृति को नकारता है — इन कमियों को लिगन्ड क्षेत्र सिद्धांत (LFT)आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT) द्वारा सुधारा गया।

त्वरित तथ्य — 5.5
  • VBT: d²sp³/dsp²/sp³d²/sp³d/sp³ संकरण; आंतरिक/बाह्य कक्षक संकुल।
  • VBT रंग व मात्रात्मक चुंबकीय व्याख्या नहीं देता।
  • CFT: स्थिर वैद्युत मॉडल; लिगन्ड बिंदु आवेश।
  • अष्टफलकीय: eg(+3/5Δo), t2g(−2/5Δo); Δt=4/9Δo।
  • स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: I⁻<Br⁻<Cl⁻<F⁻<H₂O<NH₃<en<CN⁻<CO।
  • Δo<P ⟹ उच्च प्रचक्रण; Δo>P ⟹ निम्न प्रचक्रण।
  • रंग की उत्पत्ति d-d संक्रमण से।
सहक्रियाशीलता

5.6 धातु कार्बोनिलों में आबंधन

होमोलेप्टिक कार्बोनिल — [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय, [Fe(CO)₅] त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी, [Cr(CO)₆] अष्टफलकीय है।

धातु-कार्बन आबंध — सहक्रियाशीलता (Synergic Bonding) M−C σ आबंध: CO के कार्बन पर इलेक्ट्रॉन युगल धातु के रिक्त कक्षक में दान
M−C π आबंध: धातु के पूरित d कक्षकों से इलेक्ट्रॉन CO के रिक्त π* कक्षक में दान
सहक्रियाशीलता आबंधन M C≡O σ (C→M) π (M→CO)
चित्र 5.14 — कार्बोनिल संकुल में सहक्रियाशीलता आबंधन
त्वरित तथ्य — 5.6
  • [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय, [Fe(CO)₅] त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी, [Cr(CO)₆] अष्टफलकीय।
  • [Mn₂(CO)₁₀]: दो Mn(CO)₅ इकाइयाँ Mn−Mn आबंध से जुड़ी।
  • M−C में σ (C→M) व π (M→CO) दोनों — सहक्रियाशीलता।
  • सहक्रियाशीलता आबंधन M−CO आबंध को मज़बूत बनाता है।
जैविक व औद्योगिक अनुप्रयोग

5.7 उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व तथा अनुप्रयोग

प्रमुख अनुप्रयोग क्षेत्र
  • विश्लेषणात्मक रसायन: EDTA, DMG, α-नाइट्रोसो-β-नेफ्थॉल; जल की कठोरता का आकलन Na₂EDTA अनुमापन द्वारा।
  • धातुकर्म: सिल्वर/गोल्ड निष्कर्षण — [Au(CN)₂]⁻; मॉण्ड प्रक्रम — [Ni(CO)₄]।
  • जैव तंत्र: क्लोरोफिल (Mg), हीमोग्लोबिन (Fe), विटामिन B₁₂ (Co), कार्बोक्सीपेप्टिडेज-A (Zn)।
  • औद्योगिक उत्प्रेरक: विल्किन्सन उत्प्रेरक [(Ph₃P)₃RhCl] — एल्कीनों का हाइड्रोजनीकरण।
  • वैद्युतलेपन: [Ag(CN)₂]⁻ व [Au(CN)₂]⁻ से एकसार लेपन।
  • फ़ोटोग्राफी: [Ag(S₂O₃)₂]³⁻ — हाइपो विलयन द्वारा स्थायीकरण।
  • औषध रसायन: D-पेनिसिलऐमीन, डेसफेरीऑक्सिम B, EDTA (लेड विषाक्तता), cis-प्लेटिन (कैंसर-रोधी)।
रिवीज़न पैक

संपूर्ण अध्याय — एक-पंक्ति तथ्य सूची

वर्नर सिद्धांत, शब्दावली व नामकरण (5.1–5.3)
  • वर्नर सिद्धांत (1898): प्राथमिक (आयननीय) व द्वितीयक (अन-आयननीय, CN के बराबर) संयोजकता।
  • द्वि लवण जल में पूर्णतः वियोजित; संकुल आयन (जैसे [Fe(CN)₆]⁴⁻) वियोजित नहीं होता।
  • उपसहसंयोजन संख्या = केंद्रीय परमाणु से जुड़े σ-दाता परमाणुओं की संख्या।
  • एकदंतुर/द्विदंतुर/बहुदंतुर/षट्दंतुर — दाता परमाणुओं की संख्या पर आधारित।
  • उभयदंती लिगन्ड: दो भिन्न दाता परमाणु (NO₂⁻, SCN⁻)।
  • कीलेट संकुल एकदंतुर लिगन्ड संकुलों से अधिक स्थायी (कीलेट प्रभाव)।
  • सूत्र में लिगन्ड वर्णमाला क्रम; नाम में भी लिगन्ड नाम वर्णमाला क्रम।
  • ऋणावेशित लिगन्ड नाम अंत में −इडो (2004 IUPAC); एक्वा, ऐम्मीन, कार्बोनिल, नाइट्रोसिल।
  • ऋणायनिक संकुल में धातु नाम अंत में −ऐट (Fe=फेरेट, Cu=क्यूप्रेट)।
समावयवता (5.4)
  • त्रिविम: ज्यामितीय (cis/trans, fac/mer) व ध्रुवण (d/l, एनैन्टिओमर)।
  • संरचनात्मक: बंधनी, उपसहसंयोजन, आयनन, विलायकयोजन (हाइड्रेट)।
  • चतुष्फलकीय संकुल कभी ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाते।
  • [MX₂L₄] अष्टफलकीय व [MX₂L₂] वर्ग समतल में cis/trans संभव।
  • [Ma₃b₃] अष्टफलकीय में fac/mer।
  • बंधनी समावयवता उभयदंती लिगन्ड (NO₂⁻/ONO⁻, SCN⁻/NCS⁻) युक्त संकुलों में।
आबंधन, कार्बोनिल व अनुप्रयोग (5.5–5.7)
  • VBT: d²sp³/dsp²/sp³d²/sp³d/sp³ संकरण; d²sp³=आंतरिक (निम्न प्रचक्रण), sp³d²=बाह्य (उच्च प्रचक्रण)।
  • VBT रंग व मात्रात्मक व्याख्या नहीं देता।
  • CFT: अष्टफलकीय eg(+3/5Δo), t2g(−2/5Δo); Δt=4/9Δo।
  • स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: I⁻<Br⁻<Cl⁻<F⁻<H₂O<NH₃<en<CN⁻<CO।
  • रंग d-d संक्रमण से; लिगन्ड न हो तो रंगहीन।
  • धातु कार्बोनिल में M−C σ (C→M) व π (M→CO) — सहक्रियाशीलता।
  • क्लोरोफिल=Mg, हीमोग्लोबिन=Fe, विटामिन B₁₂=Co।
  • cis-प्लेटिन कैंसर-रोधी; EDTA लेड विषाक्तता उपचार में।
सूत्र संग्रह

महत्वपूर्ण राशियाँ, सूत्र व तुलना तालिका

संकरणज्यामितिउदाहरण
sp³चतुष्फलकीय[Ni(CO)₄], [NiCl₄]²⁻
dsp²वर्ग समतली[Ni(CN)₄]²⁻, [PtCl₄]²⁻
sp³dत्रिकोणीय द्विपिरैमिडी[Fe(CO)₅]
sp³d²अष्टफलकीय (बाह्य)[CoF₆]³⁻
d²sp³अष्टफलकीय (आंतरिक)[Co(NH₃)₆]³⁺
राशिसूत्र/मान
अष्टफलकीय eg ऊर्जा वृद्धि(3/5)Δo
अष्टफलकीय t2g ऊर्जा कमी(2/5)Δo
चतुष्फलकीय व अष्टफलकीय संबंधΔt = (4/9)Δo
चुंबकीय आघूर्णμ = √{n(n+2)} BM
प्रबल क्षेत्रΔo > P ⟹ निम्न प्रचक्रण
दुर्बल क्षेत्रΔo < P ⟹ उच्च प्रचक्रण

चुंबकीय आघूर्ण संदर्भ सारणी

अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (n)μ (BM) = √n(n+2)
00 (प्रतिचुंबकीय)
11.73
22.83
33.87
44.90
55.92
ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात करने की विधि संकुल का कुल आवेश = (धातु की ऑक्सीकरण संख्या) + (सभी लिगन्डों के आवेशों का योग)
उदासीन लिगन्ड = 0; एकल ऋणायनी (Cl⁻, CN⁻) = −1; द्विऋणायनी (C₂O₄²⁻) = −2

पाठ्यनिहित प्रश्न (5.1 – 5.10) — विस्तृत हल

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके हल देखें।

5.1 निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखिए — (i) टेट्राऐम्मीनडाइएक्वाकोबाल्ट(III)क्लोराइड (ii) पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकैलेट(II) (iii) ट्रिस(एथेन-1,2-डाइऐमीन)क्रोमियम(III)क्लोराइड (iv) ऐम्मीनब्रोमिडोक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-प्लैटिनेट(II) (v) डाइक्लोरोबिस(एथेन-1,2-डाइऐमीन)प्लैटिनम(IV)नाइट्रेट (vi) आयरन(III)हेक्सासायनिडोफेरेट(II)
(i) [Co(NH₃)₄(H₂O)₂]Cl₃
(ii) K₂[Ni(CN)₄]
(iii) [Cr(en)₃]Cl₃
(iv) [Pt(NH₃)BrCl(NO₂)]⁻
(v) [PtCl₂(en)₂](NO₃)₂
(vi) Fe₄[Fe(CN)₆]₃
5.2 निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए — (i)–(vi)
(i) [Co(NH₃)₆]Cl₃ → हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट(III)क्लोराइड
(ii) [Co(NH₃)₅Cl]Cl₂ → पेन्टाऐम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट(III)क्लोराइड
(iii) K₃[Fe(CN)₆] → पोटैशियम हेक्सासायनिडोफेरेट(III)
(iv) K₃[Fe(C₂O₄)₃] → पोटैशियम ट्राइऑक्सैलेटोफेरेट(III)
(v) K₂[PdCl₄] → पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट(II)
(vi) [Pt(NH₃)₂Cl(NH₂CH₃)]Cl → डाइऐम्मीनक्लोरिडो(मेथेनेमीन)प्लैटिनम(II)क्लोराइड
5.3 निम्नलिखित संकुलों द्वारा प्रदर्शित समावयवता का प्रकार बतलाइए — (i)–(iv)
(i) K[Cr(H₂O)₂(C₂O₄)₂]: [MX₂(AA)₂] प्रकार — cis/trans ज्यामितीय; cis के d/l ध्रुवण — कुल 3 समावयव।
(ii) [Co(en)₃]Cl₃: [M(AA)₃] — कोई ज्यामितीय नहीं, केवल d/l ध्रुवण (2 समावयव)।
(iii) [Co(NH₃)₅(NO₂)](NO₃)₂: NO₂⁻ उभयदंती — बंधनी समावयवता (M−NO₂ व M−ONO)।
(iv) [Pt(NH₃)(H₂O)Cl₂]: [MX₂YL] — कुल 10 संभावित समावयव (ज्यामितीय, आयनन, बंधनी)।
5.4 [Co(NH₃)₅Cl]SO₄ तथा [Co(NH₃)₅(SO₄)]Cl आयनन समावयव हैं — इसका प्रमाण दीजिए।
[Co(NH₃)₅Cl]SO₄ → Ba²⁺ के साथ BaSO₄ अवक्षेप (SO₄²⁻ मुक्त), Ag⁺ से कोई अवक्षेप नहीं (Cl⁻ बंधा)।
[Co(NH₃)₅(SO₄)]Cl → Ag⁺ के साथ AgCl अवक्षेप (Cl⁻ मुक्त), Ba²⁺ से कोई अवक्षेप नहीं (SO₄²⁻ बंधा)। विपरीत व्यवहार आयनन समावयवता सिद्ध करता है।
5.5 VBT के आधार पर [Ni(CN)₄]²⁻ प्रतिचुंबकीय व [NiCl₄]²⁻ अनुचुंबकीय क्यों है?
Ni²⁺: d⁸। CN⁻ प्रबल क्षेत्र → d-इलेक्ट्रॉन युगलित → dsp² (वर्ग समतल) → सभी युगलित → प्रतिचुंबकीय।
Cl⁻ दुर्बल क्षेत्र → युग्मन नहीं → sp³ (चतुष्फलकीय) → 2 अयुग्मित → अनुचुंबकीय
5.6 [NiCl₄]²⁻ अनुचुंबकीय जबकि [Ni(CO)₄] प्रतिचुंबकीय — दोनों चतुष्फलकीय क्यों?
[NiCl₄]²⁻: Ni²⁺(d⁸), Cl⁻ दुर्बल → 2 अयुग्मित → अनुचुंबकीय।
[Ni(CO)₄]: Ni(0)(d¹⁰) → सभी d कक्षक पूर्ण → कोई अयुग्मित नहीं → प्रतिचुंबकीय
5.7 [Fe(H₂O)₆]³⁺ प्रबल अनुचुंबकीय, [Fe(CN)₆]³⁻ दुर्बल अनुचुंबकीय — समझाइए।
Fe³⁺: d⁵। H₂O दुर्बल → कोई युग्मन नहीं → sp³d², 5 अयुग्मित → प्रबल अनुचुंबकीय (उच्च प्रचक्रण)।
CN⁻ प्रबल → युग्मन → d²sp³, 1 अयुग्मित → दुर्बल अनुचुंबकीय (निम्न प्रचक्रण)।
5.8 [Co(NH₃)₆]³⁺ आंतरिक कक्षक, [Ni(NH₃)₆]²⁺ बाह्य कक्षक — क्यों?
Co³⁺: d⁶। NH₃ प्रबल क्षेत्र → युग्मन → d²sp³ (आंतरिक, प्रतिचुंबकीय)।
Ni²⁺: d⁸। NH₃ अपेक्षाकृत दुर्बल → युग्मन नहीं → sp³d² (बाह्य, अनुचुंबकीय)
5.9 वर्ग समतली [Pt(CN)₄]²⁻ में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या?
Pt²⁺: d⁸। CN⁻ प्रबल → dsp² (वर्ग समतल) → पूर्ण युग्मन।
अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 0 (प्रतिचुंबकीय)।
5.10 [Mn(H₂O)₆]²⁺ में 5 अयुग्मित, [Mn(CN)₆]⁴⁻ में 1 अयुग्मित — CFT से समझाइए।
Mn²⁺: d⁵। H₂O दुर्बल → Δo<P → t2g³eg² → 5 अयुग्मित (उच्च प्रचक्रण)।
CN⁻ प्रबल → Δo>P → t2g⁵eg⁰ → 1 अयुग्मित (निम्न प्रचक्रण)।

अध्याय अभ्यास (5.1 – 5.32) — विस्तृत हल

NCERT पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल — प्रश्न पर क्लिक करके देखें।

अभ्यास प्रश्न (Exercise 5.1–5.32)
5.1 वर्नर की अभिधारणाओं के आधार पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन को समझाइए।
वर्नर के अनुसार धातु दो प्रकार की संयोजकताएँ दर्शाता है — प्राथमिक (आयननीय, ऑक्सीकरण अवस्था के संगत) तथा द्वितीयक (अन-आयननीय, उपसहसंयोजन संख्या के बराबर, निश्चित दिक्स्थान व्यवस्था — समन्वय बहुफलक)। आधुनिक भाषा में प्राथमिक = आयनिक, द्वितीयक = उपसहसंयोजक (सहसंयोजक) आबंध।
5.2 FeSO₄ तथा (NH₄)₂SO₄ का 1:1 मोलर मिश्रण Fe²⁺ परीक्षण देता है, परंतु CuSO₄ व अमोनिया का 1:4 मिश्रण Cu²⁺ परीक्षण नहीं देता — क्यों?
FeSO₄·(NH₄)₂SO₄·6H₂O एक द्वि लवण है — जल में पूर्णतः Fe²⁺, NH₄⁺, SO₄²⁻ में वियोजित, अतः Fe²⁺ परीक्षण देता है।
CuSO₄ + अधिक्य NH₃ → [Cu(NH₃)₄]²⁺ संकुल आयन बनाता है — मुक्त Cu²⁺ की सांद्रता नगण्य, अतः सामान्य परीक्षण नहीं देता।
5.28 संकुल [Co(NH₃)₆]Cl₂ से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे?
[Co(NH₃)₆]Cl₂ → [Co(NH₃)₆]²⁺ + 2Cl⁻
कुल आयन = 1 + 2 = 3 — सही विकल्प (iii)
5.30 K[Co(CO)₄] में कोबाल्ट की ऑक्सीकरण संख्या है — (i) +1 (ii) +3 (iii) –1 (iv) –3
K[Co(CO)₄] → K⁺ + [Co(CO)₄]⁻। CO आवेश 0। संकुल आयन आवेश −1।
x + 4(0) = −1 ⟹ x = −1
उत्तर: (iii) −1
5.31 निम्न में सर्वाधिक स्थायी संकुल है — (i) [Fe(H₂O)₆]³⁺ (ii) [Fe(NH₃)₆]³⁺ (iii) [Fe(C₂O₄)₃]³⁻ (iv) [FeCl₆]³⁻
कीलेट प्रभाव के अनुसार, बहुदंतुर लिगन्ड युक्त संकुल अधिक स्थायी होता है।
C₂O₄²⁻ द्विदंतुर (कीलेटी) है — (iii) [Fe(C₂O₄)₃]³⁻ सर्वाधिक स्थायी।
5.32 [Ni(NO₂)₆]⁴⁻, [Ni(NH₃)₆]²⁺, [Ni(H₂O)₆]²⁺ के लिए अवशोषण तरंगदैर्ध्य का सही क्रम बताइए।
स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: H₂O < NH₃ < NO₂⁻ (बढ़ती क्षेत्र प्रबलता)
क्षेत्र प्रबलता ↑ ⇒ Δo ↑ ⇒ अवशोषित ऊर्जा ↑ ⇒ तरंगदैर्ध्य ↓
सही क्रम: [Ni(NO₂)₆]⁴⁻ < [Ni(NH₃)₆]²⁺ < [Ni(H₂O)₆]²⁺

🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न (उपसहसंयोजन यौगिक)

NEET/AIPMT में इस अध्याय से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।

NEET 2026 (जारी प्रश्न-पत्र से)
2026 · Q1 सूची-I (संकुल) को सूची-II (आकृति) से सुमेलित कीजिए: [Pt(Cl₂)(NH₃)₂], [Co(NH₃)₆]Cl₃, [NiCl₄]²⁻, [Fe(CO)₅]
[Pt(Cl₂)(NH₃)₂] — वर्ग-समतलीय (dsp²); [Co(NH₃)₆]Cl₃ — अष्टफलकीय (d²sp³); [NiCl₄]²⁻ — चतुष्फलकीय (sp³); [Fe(CO)₅] — त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी (dsp³)
सही विकल्प: D — A-III, B-I, C-IV, D-II
2026 · Q2 कौन सा उभयदंतुर लिगन्ड है?
थायोसायनेट (SCN⁻) S अथवा N से बंध बना सकता है — उभयदंतुर। सही विकल्प: D — थायोसायनेट
NEET 2025
NEET 2025 · Q1 न्यूनतम चालकता वाला संकुल पहचानिए:
[Co(NH₃)₃Cl₃] उदासीन संकुल है — कोई आयन नहीं बनता।
सही उत्तर: (c) [Co(NH₃)₃Cl₃]
NEET 2024
NEET 2024 · Q1 कथन-I: [Co(NH₃)₆]³⁺ समलिगन्डी, [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺ विषमलिगन्डी। कथन-II: [Co(NH₃)₆]³⁺ में एक प्रकार का लिगन्ड, [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺ में एक से अधिक प्रकार।
दोनों कथन सत्य हैं — सही उत्तर: (a)
NEET 2024 · Q2 [CoF₆]³⁻ तथा [Co(C₂O₄)₃]³⁻ के 'केवल-चक्रण' चुंबकीय आघूर्ण क्रमशः हैं:
Co³⁺: d⁶। F⁻ दुर्बल → उच्च चक्रण, 4 अयुग्मित → μ=4.9 BM।
C₂O₄²⁻ प्रबल → पूर्ण युग्मन → 0 अयुग्मित → μ=0 BM।
सही उत्तर: (c) 4.9 BM व 0 BM
NEET 2024 · Q3 EDTA आयन है:
EDTA में 2N + 4O = 6 दाता स्थल — षट्दंतुर लिगन्ड। सही उत्तर: (a)
NEET 2023
NEET 2023 · Q1 समलिगन्डी संकुल पहचानिए:
K₃[Al(ox)₃] में केवल ऑक्सैलेट लिगन्ड — समलिगन्डी। सही उत्तर: (a)
NEET 2022
NEET 2022 (Phase 2) · Q1 अभिकथन-तर्क: धातु कार्बोनिलों में M−C बंध में σ व π दोनों लक्षण।
A सत्य (सहक्रियाशीलता); R असत्य (लिगन्ड→धातु σ, धातु→लिगन्ड π)।
सही उत्तर: (d) A सत्य किन्तु R असत्य
NEET 2018
NEET 2018 · Q1 [Ni(CO)₄] की आकृति व चुंबकीय व्यवहार:
Ni(0): d¹⁰; sp³ संकरण → चतुष्फलकीय, सभी युगलित → प्रतिचुंबकीय।
सही उत्तर: (b) चतुष्फलकीय व प्रतिचुंबकीय
NEET 2017
NEET 2017 · Q1 σ-बंधित ऑर्गेनोमेटैलिक यौगिक का उदाहरण:
ग्रीन्यार अभिकर्मक (R-Mg-X) में C−Mg σ-बंध — सही उत्तर: (a)
NEET 2016
NEET 2016 (Phase 2) · Q1 जॉन-टेलर प्रभाव किस d⁸ संकुल में प्रेक्षित नहीं होता?
d⁸ उच्च-चक्रण (t₂g⁶eg²) में eg कक्षक सममित (1-1), अतः J-T विरूपण नगण्य।
सही उत्तर: (b) d⁸

NEET सम्बंधित तथ्य Anya तथ्य

प्रश्न-पैटर्न, भार-विभाजन व बार-बार दोहराई जाने वाली अवधारणाएँ।

प्रश्न-पैटर्न व भार-विभाजन
  • 2014–2025 में इस अध्याय से 41 प्रश्न पूछे गए; NEET 2024 में 9 प्रश्न तक शामिल थे।
  • प्रश्न मुख्यतः IUPAC नामकरण, समावयवता, CFT (चुंबकीय आघूर्ण, CFSE, संकरण) पर केंद्रित।
बार-बार पूछी जाने वाली अवधारणाएँ
  • चुंबकीय आघूर्ण: μ=√n(n+2) BM — n=1⇒1.73, n=2⇒2.83, n=3⇒3.87, n=4⇒4.90, n=5⇒5.92।
  • स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: I⁻<Br⁻<Cl⁻<F⁻<H₂O<NH₃<en<CN⁻<CO।
  • प्रबल क्षेत्र → निम्न चक्रण (प्रायः प्रतिचुंबकीय); दुर्बल क्षेत्र → उच्च चक्रण (प्रायः अनुचुंबकीय)।
  • समलिगन्डी (एक प्रकार का लिगन्ड) बनाम विषमलिगन्डी (एक से अधिक प्रकार)।
  • कीलेट प्रभाव — बहुदंतुर लिगन्ड वाले संकुल अधिक स्थायी।
  • CFSE — d⁰, d⁵(उच्च-चक्रण), d¹⁰ के लिए शून्य।
तैयारी हेतु सुझाव: इन प्रश्नों को बिना उत्तर देखे हल करें, गलती होने पर संबंधित अनुभाग में वापस जाएँ।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

तथ्य
  • EAN नियम (सिजविक) — EAN = Z − ऑक्सीकरण अवस्था + 2×CN; Ni(CO)₄, Fe(CO)₅, Cr(CO)₆ के लिए EAN = अक्रिय गैस परमाणु क्रमांक।
  • प्राथमिक संयोजकता (ऑक्सीकरण अवस्था) आयनीकरणीय; द्वितीयक (CN) अन-आयनीकरणीय व दिशात्मक — ज्यामिति सदैव द्वितीयक से।
ट्रैप
  • ऑक्सीकरण अवस्था व उपसहसंयोजन संख्या भिन्न — [Co(NH₃)₆]³⁺ में Co की OS +3, CN=6।
  • VBT की सीमाएँ — रंग, मात्रात्मक चुंबकीय व्याख्या व दुर्बल/प्रबल लिगन्ड भेद नहीं करता।
तुलनात्मक
  • IUPAC नामकरण — लिगन्ड वर्णानुक्रम; ऋणायनी संकुल में −ऐट (Fe→फेरेट, Cu→क्यूप्रेट)।
  • सेतु-बंधी लिगन्ड के लिए μ (म्यू) उपसर्ग।
  • उभयदंती लिगन्ड — NO₂⁻ (N→नाइट्रो, O→नाइट्रिटो), SCN⁻ (S→थायोसायनेटो, N→आइसोथायोसायनेटो)।
तथ्य
  • चतुष्फलकीय Δt ≈ 4/9 Δo — अतः चतुष्फलकीय संकुल लगभग सदैव उच्च-चक्रण।
  • द्वि लवण (जैसे मोर लवण) जल में पूर्ण वियोजित; उपसहसंयोजन यौगिक (जैसे [Cu(NH₃)₄]SO₄) संकुल आयन बनाए रखते हैं।
  • ऑर्गेनोमेटैलिक — फेरोसीन [Fe(η⁵-C₅H₅)₂] सैंडविच यौगिक का उदाहरण।
रणनीति
  • अंतिम रिवीज़न में इन तीन क्षेत्रों को प्राथमिकता दें — (1) IUPAC नामकरण, (2) समावयवता के प्रकार, (3) CFT आधारित चुंबकीय आघूर्ण व CFSE।

उपसहसंयोजन यौगिक — NCERT कक्षा 12, अध्याय 5 · संपूर्ण अध्ययन नोट्स, सूत्र, आरेख, सभी पाठ्यनिहित तथा अभ्यास प्रश्नों के हल, तथा NEET में पूछे गए सभी प्रश्न सहित।

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