वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत
मेंडल के वंशागति नियम, एकसंकर एवं द्विसंकर क्रॉस, सहलग्नता, पुनर्योजन, लिंग निर्धारण, उत्परिवर्तन तथा आनुवंशिक विकार — परीक्षा‑केंद्रित विस्तृत विवेचन।
★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित1 आनुवंशिकी — वंशागति एवं विविधता का अध्ययन
जनक से संतति में लक्षणों का स्थानांतरण एवं उनमें भिन्नता
आनुवंशिकी जीव विज्ञान की वह शाखा है जो वंशागति (जनक से संतति में लक्षणों के स्थानांतरण की प्रक्रिया) तथा विविधता (जनक एवं संतति के बीच लक्षणों में असमानता) का अध्ययन करती है।
- मेंडल के प्रयोग — 1856–1863; प्रकाशन — 1865; पुनः खोज — 1900।
- पुनः खोज करने वाले तीन वैज्ञानिक — डीव्रीज़, कॉरेन्स, वॉन शेरमाक।
- मेंडल ने 7 जोड़े विपरीत लक्षणों का अध्ययन किया।
2 मेंडल के वंशागति के नियम
मटर के पौधे पर सात वर्षों के सूक्ष्म प्रयोग
मेंडल ने उद्यान मटर की 14 तद्रूप-प्रजननी (ट्रू-ब्रीडिंग) किस्मों का चयन किया — अर्थात् सात जोड़े विपरीत लक्षणों को लिया, जबकि अन्य सभी लक्षण समान थे।
| लक्षण | प्रभावी विशेषक | अप्रभावी विशेषक |
|---|---|---|
| तने की ऊँचाई | लंबा | बौना |
| फूल का रंग | बैंगनी | सफेद |
| फूल की स्थिति | अक्षीय | अंत्य |
| फली का आकार | फूली हुई | सिकुड़ी हुई |
| फली का रंग | हरा | पीला |
| बीज का आकार | गोल | झुर्रीदार |
| बीज का रंग | पीला | हरा |
- स्पष्ट विपरीत लक्षण: सातों लक्षण असंदिग्ध थे — कोई मध्यवर्ती रूप नहीं।
- स्वपरागण एवं कृत्रिम परागण: मटर स्व-परागित होता है, फिर भी कृत्रिम पर-परागण सुगम था।
- अल्प जीवनकाल व विशाल संतति: सांख्यिकीय विश्लेषण हेतु पर्याप्त नमूना संख्या।
प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
यह नियम कहता है कि लक्षणों का निर्धारण जीन (कारक) नामक विविक्त इकाइयों द्वारा होता है; ये जोड़ों में होते हैं; असमान कारक जोड़े में से एक प्रभावी (व्यक्त होने वाला) तथा दूसरा अप्रभावी (दबा रहने वाला) होता है।
विसंयोजन का नियम (Law of Segregation)
युग्मक निर्माण के समय किसी जीन जोड़े के दोनों अलील एक-दूसरे से अलग (पृथक्) हो जाते हैं, तथा केवल एक ही अलील किसी एक युग्मक में जाता है — यह विसंयोजन यादृच्छिक होता है (50% प्रायिकता)।
- प्रभाविता नियम एवं विसंयोजन नियम — मेंडल के दो मूलभूत नियम।
- F₂ में जीनोटाइप अनुपात: 1:2:1 (TT : Tt : tt)
- F₂ में फीनोटाइप अनुपात: 3:1 (लंबा : बौना)
3 एक जीन की वंशागति — एकसंकर क्रॉस
मेंडल का लंबा × बौना पौधा संकरण
मेंडल ने लंबे (TT) तथा बौने (tt) मटर पौधों का संकरण किया। F₁ पीढ़ी (प्रथम संतति) के सभी पौधे लंबे (Tt) थे — केवल लंबे लक्षण की अभिव्यक्ति हुई। जब F₁ (Tt) को स्व-परागित कराया गया, तो F₂ पीढ़ी में 3 लंबे : 1 बौना (75% : 25%) अनुपात प्राप्त हुआ।
परीक्षार्थ संकरण (Test Cross)
F₂ के लंबे पौधे का जीनोटाइप (TT या Tt) फीनोटाइप से ज्ञात नहीं होता। इसके निर्धारण हेतु प्रभावी फीनोटाइप वाले जीव का संकरण अप्रभावी समयुग्मजी (tt) से कराया जाता है — इसे परीक्षार्थ संकरण कहते हैं।
- यदि सभी संतति लंबी हों → परीक्षार्थ जीव समयुग्मजी (TT)
- यदि 1:1 (लंबा : बौना) अनुपात मिले → परीक्षार्थ जीव विषमयुग्मजी (Tt)
अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance)
अपूर्ण प्रभाविता में F₂ में फीनोटाइप अनुपात 1:2:1 (लाल : गुलाबी : श्वेत) — जो जीनोटाइप अनुपात के समान होता है।
सह-प्रभाविता (Co-dominance) — ABO रुधिर वर्ग
ABO रुधिर वर्ग जीन I के तीन अलील — I^A, I^B, i होते हैं। I^A व I^B, i पर पूर्णतः प्रभावी हैं, परंतु जब I^A व I^B दोनों उपस्थित हों, तो दोनों अभिव्यक्त होते हैं — यह सह-प्रभाविता है।
| जीनोटाइप | रुधिर वर्ग |
|---|---|
| I^AI^A, I^Ai | A |
| I^BI^B, I^Bi | B |
| I^AI^B | AB |
| ii | O |
- अपूर्ण प्रभाविता का उदाहरण — श्वान पुष्प (स्नैपड्रैगन)
- सह-प्रभाविता का उदाहरण — ABO रुधिर वर्ग (3 अलील, 6 जीनोटाइप, 4 फीनोटाइप)
- बहुअलीलता (Multiple alleles) — ABO रुधिर वर्ग
4 दो जीनों की वंशागति — द्विसंकर क्रॉस
स्वतंत्र अपव्यूहन नियम एवं क्रोमोसोम सिद्धांत
मेंडल ने पीले-गोल (RRYY) तथा हरे-झुर्रीदार (rryy) बीज वाले पौधों का संकरण किया। F₁ में सभी पौधे गोल-पीले (RrYy) थे। F₁ के स्व-परागण से F₂ में 9:3:3:1 का फीनोटाइप अनुपात प्राप्त हुआ — 9 गोल-पीला : 3 गोल-हरा : 3 झुर्रीदार-पीला : 1 झुर्रीदार-हरा।
स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
जब किसी संकर में लक्षणों के दो जोड़े लिए जाते हैं, तो किसी एक जोड़े का विसंयोजन दूसरे जोड़े से स्वतंत्र होता है। 9:3:3:1 अनुपात को (3 गोल : 1 झुर्रीदार) × (3 पीला : 1 हरा) = 9:3:3:1 के रूप में व्युत्पन्न किया जा सकता है।
वंशागति का क्रोमोसोम सिद्धांत
- सटन एवं बोवेरी (1902): क्रोमोसोम का व्यवहार जीन जैसा होता है — "वंशागति का क्रोमोसोम सिद्धांत" प्रस्तावित।
- थॉमस हंट मॉर्गन: ड्रोसोफिला पर प्रयोगों से क्रोमोसोम सिद्धांत का प्रयोगात्मक सत्यापन; सहलग्नता एवं पुनर्योजन की खोज।
- एल्फ्रेड स्टर्टीवेंट: सहलग्नता-मानचित्र (रीकॉम्बिनेशन मैप) तकनीक विकसित।
सहलग्नता (Linkage) एवं पुनर्योजन (Recombination)
मॉर्गन ने ड्रोसोफिला में द्विसंकर क्रॉस किए और पाया कि जब दो जीन एक ही क्रोमोसोम पर स्थित होते हैं, तो वे स्वतंत्र रूप से विसंयोजित नहीं होते — F₂ का अनुपात 9:3:3:1 से भिन्न होता है।
- सहलग्नता: एक ही क्रोमोसोम पर स्थित जीनों का एक साथ वंशागत होना।
- पुनर्योजन: क्रॉसिंग ओवर के कारण अजनकीय (नए) जीन संयोजनों का उत्पादन।
- द्विसंकर क्रॉस में F₂ फीनोटाइप अनुपात — 9:3:3:1
- वंशागति का क्रोमोसोम सिद्धांत — सटन एवं बोवेरी (1902)
- प्रयोगात्मक सत्यापन — थॉमस हंट मॉर्गन (ड्रोसोफिला)
- सहलग्नता शब्द — मॉर्गन द्वारा दिया गया
5 बहुजीनी वंशागति एवं बहुप्रभाविता
जटिल लक्षणों की वंशागति
बहुजीनी वंशागति (Polygenic Inheritance)
मानव कद, त्वचा रंग जैसे लक्षण तीन या अधिक जीनों द्वारा नियंत्रित होते हैं — इन्हें बहुजीनी लक्षण कहते हैं। इनमें पर्यावरण का भी प्रभाव होता है तथा फीनोटाइप एक सतत प्रवणता (ग्रेडिएंट) में दिखता है।
यदि तीन जीन A, B, C त्वचा रंग नियंत्रित करें — AABBCC (गहरा), aabbcc (हल्का), तथा मध्यवर्ती संयोजन बीच के रंग दर्शाते हैं। प्रत्येक प्रभावी अलील का योगात्मक प्रभाव होता है।
बहुप्रभाविता (Pleiotropy)
कभी-कभी एक एकल जीन एक से अधिक फीनोटाइप लक्षणों को प्रभावित करता है — ऐसे जीन को बहुप्रभावी जीन कहते हैं।
- बहुजीनी वंशागति का उदाहरण — मानव कद, त्वचा रंग
- बहुप्रभाविता का उदाहरण — फेनिलकीटोनूरिया (PKU)
- PKU एक अलिंग सूत्री अप्रभावी विकार है।
6 लिंग निर्धारण
विभिन्न जीवों में लिंग-निर्धारण के प्रकार
हेंकिंग (1891) ने कुछ कीटों में एक विशेष केंद्रकीय संरचना का पता लगाया, जिसे 'X काय' नाम दिया — बाद में यह X-क्रोमोसोम कहलाया। X-क्रोमोसोम की लिंग निर्धारण में भूमिका होने से इसे लिंग-क्रोमोसोम तथा शेष को अलिंग क्रोमोसोम (ऑटोसोम) कहा गया।
| लिंग-निर्धारण प्रकार | उदाहरण | विशेषता |
|---|---|---|
| XO प्रकार | टिड्डा (ग्रासहॉपर) | मादा XX, नर XO — नर में एक X क्रोमोसोम कम |
| XY प्रकार | मानव, ड्रोसोफिला, स्तनधारी | नर XY (विषमयुग्मकी), मादा XX (समयुग्मकी) — नर विषमयुग्मकता |
| ZW प्रकार | पक्षी (कुक्कुट) | नर ZZ (समयुग्मकी), मादा ZW (विषमयुग्मकी) — मादा विषमयुग्मकता |
| अगुणित-द्विगुणित | मधुमक्खी (मधुप) | मादा 2n (निषेचित अंडे से), नर n (अनिषेचित अंडे से — पार्थेनोजिनेसिस) |
मानव में लिंग-निर्धारण
मानव में XY प्रकार का लिंग-निर्धारण होता है। 23 जोड़े (46) क्रोमोसोम में से 22 जोड़े ऑटोसोम तथा 1 जोड़ा लिंग-क्रोमोसोम (XX/XY) होता है।
- स्त्री: XX — केवल X-युक्त अंडाणु
- पुरुष: XY — 50% X-युक्त, 50% Y-युक्त शुक्राणु
- X काय की खोज — हेंकिंग (1891)
- मानव लिंग निर्धारण — XY प्रकार (नर विषमयुग्मकता)
- मधुमक्खी में नर अगुणित (n=16), मादा द्विगुणित (2n=32)
- मधुमक्खी में नर समसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणु बनाते हैं (अर्धसूत्री नहीं)
7 उत्परिवर्तन (Mutation)
DNA अनुक्रम में परिवर्तन — विविधता का स्रोत
उत्परिवर्तन DNA अनुक्रम में परिवर्तन है, जिसके परिणामस्वरूप जीनोटाइप एवं फीनोटाइप में परिवर्तन आता है।
| उत्परिवर्तन का स्तर | विवरण |
|---|---|
| बिंदु उत्परिवर्तन | DNA के एकल क्षार युग्म में परिवर्तन — उदा. सिकल सेल एनीमिया |
| क्रोमोसोमीय उत्परिवर्तन | DNA खंड की कमी (हटना) या बढ़त (जुड़ना/द्विगुणन) |
| फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन | क्षार युग्मों के घटने-बढ़ने से वाचन-फ्रेम में बदलाव |
सिकल सेल एनीमिया — बिंदु उत्परिवर्तन का प्रमुख उदाहरण
- बिंदु उत्परिवर्तन का प्रसिद्ध उदाहरण — सिकल सेल एनीमिया
- पराबैंगनी विकिरण — एक प्रमुख उत्परिवर्तजन (म्यूटाजेन)
- उत्परिवर्तन — DNA अनुक्रम में परिवर्तन
8 आनुवंशिक विकार
मेंडलीय एवं क्रोमोसोमीय विकार
मानव में वंशागत विकारों के विश्लेषण हेतु वंशावली विश्लेषण (पेडीग्री एनालेसिस) का उपयोग किया जाता है — परिवार के वंश-वृक्ष में किसी विशेष लक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी अध्ययन।
मेंडलीय विकार
एकल जीन के उत्परिवर्तन से उत्पन्न विकार।
| विकार | प्रकार | कारण / लक्षण |
|---|---|---|
| हीमोफीलिया | X-सहलग्न अप्रभावी | रक्त-स्कंदन प्रोटीन की कमी; महारानी विक्टोरिया की वंशावली में प्रसिद्ध |
| वर्णांधता | X-सहलग्न अप्रभावी | लाल/हरे रंग की पहचान में दोष; ~8% पुरुष, ~0.4% स्त्रियाँ |
| सिकल सेल एनीमिया | अलिंग सूत्री अप्रभावी | β-ग्लोबिन जीन में बिंदु उत्परिवर्तन (Glu→Val) |
| फेनिलकीटोनूरिया (PKU) | अलिंग सूत्री अप्रभावी | फेनिल ऐलेनीन हाइड्रॉक्सीलेज एंजाइम की कमी; मानसिक दुर्बलता |
| थैलेसीमिया | अलिंग सूत्री अप्रभावी | ग्लोबिन शृंखला संश्लेषण दर में कमी — परिमाणात्मक समस्या |
क्रोमोसोमीय विकार
क्रोमोसोमों की संख्या या संरचना में असामान्यता के कारण उत्पन्न विकार।
| विकार | क्रोमोसोमीय कारण | प्रमुख लक्षण |
|---|---|---|
| डाउन सिंड्रोम | 21वें क्रोमोसोम की त्रिसूत्रता (47, +21) | छोटा कद, गोल सिर, खाँच वाली जीभ, मानसिक मंदता |
| क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम | 47, XXY | पुंप्रधान पर स्त्रैण लक्षण (गाइनीकोमैस्टिया), बंध्यता |
| टर्नर सिंड्रोम | 45, XO | बंध्यता, अल्पविकसित अंडाशय, द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का अभाव |
- हीमोफीलिया एवं वर्णांधता — X-सहलग्न अप्रभावी
- डाउन सिंड्रोम — 21 त्रिसूत्रता (47 क्रोमोसोम)
- क्लाइनफेल्टर — 47, XXY; टर्नर — 45, XO
- असुगुणिता — एक क्रोमोसोम की कमी/अधिकता
★ NEET फैक्ट‑शीट
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| मेंडल प्रयोग | 1856–1863, मटर, 7 जोड़े लक्षण |
| पुनः खोज | 1900 — डीव्रीज़, कॉरेन्स, वॉन शेरमाक |
| एकसंकर F₂ अनुपात | जीनोटाइप 1:2:1, फीनोटाइप 3:1 |
| द्विसंकर F₂ अनुपात | 9:3:3:1 (स्वतंत्र अपव्यूहन) |
| अपूर्ण प्रभाविता | श्वान पुष्प — F₂ फीनोटाइप 1:2:1 |
| सह-प्रभाविता | ABO रुधिर वर्ग — 3 अलील, 6 जीनोटाइप, 4 फीनोटाइप |
| क्रोमोसोम सिद्धांत | सटन एवं बोवेरी (1902) |
| सहलग्नता | मॉर्गन — एक ही क्रोमोसोम पर जीन |
| बहुजीनी लक्षण | मानव कद, त्वचा रंग |
| बहुप्रभाविता | फेनिलकीटोनूरिया (PKU) |
| मानव लिंग | XY प्रकार — नर विषमयुग्मकता |
| बिंदु उत्परिवर्तन | सिकल सेल एनीमिया (GAG→GUG) |
| डाउन सिंड्रोम | 21 त्रिसूत्रता (47, +21) |
| क्लाइनफेल्टर | 47, XXY |
| टर्नर सिंड्रोम | 45, XO |
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 मेंडल के संकरण प्रयोगों की कालावधि क्या थी?
उत्तर: 1856–1863
मेंडल ने उद्यान मटर पर सात वर्षों (1856–1863) तक संकरण प्रयोग किए। परिणाम 1865 में प्रकाशित हुए तथा 1900 में पुनः खोजे गए।
2 एकसंकर क्रॉस (Tt × Tt) में F₂ जीनोटाइप अनुपात क्या होता है?
उत्तर: 1:2:1 (TT:Tt:tt)
F₂ में जीनोटाइप अनुपात सदैव 1:2:1 होता है, जबकि फीनोटाइप अनुपात 3:1 (लंबा:बौना) होता है।
3 द्विसंकर क्रॉस (RrYy × RrYy) में F₂ फीनोटाइप अनुपात क्या होता है?
उत्तर: 9:3:3:1
9 गोल-पीला : 3 गोल-हरा : 3 झुर्रीदार-पीला : 1 झुर्रीदार-हरा — यह स्वतंत्र अपव्यूहन नियम का प्रमाण है।
4 वंशागति के क्रोमोसोम सिद्धांत के प्रवर्तक कौन हैं?
उत्तर: वाल्टर सटन एवं थियोडोर बोवेरी (1902)
इन्होंने देखा कि क्रोमोसोम का व्यवहार जीन (मेंडल के कारकों) जैसा ही है। मॉर्गन ने बाद में ड्रोसोफिला पर प्रयोगों से इसकी पुष्टि की।
5 सह-प्रभाविता (को-डोमिनेंस) का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है?
उत्तर: ABO रुधिर वर्ग
ABO रुधिर वर्ग में जीन I के तीन अलील (I^A, I^B, i) होते हैं। I^A व I^B दोनों साथ होने पर दोनों अभिव्यक्त होते हैं — यह सह-प्रभाविता है।
6 सहलग्नता (लिंकेज) शब्द किस वैज्ञानिक ने दिया?
उत्तर: थॉमस हंट मॉर्गन
मॉर्गन ने ड्रोसोफिला पर द्विसंकर क्रॉस में देखा कि एक ही क्रोमोसोम पर स्थित जीन स्वतंत्र रूप से विसंयोजित नहीं होते — इसी घटना को "सहलग्नता" नाम दिया।
7 डाउन सिंड्रोम किस क्रोमोसोमीय असामान्यता के कारण होता है?
उत्तर: 21वें क्रोमोसोम की त्रिसूत्रता (Trisomy-21)
डाउन सिंड्रोम में क्रोमोसोम 21 की तीन प्रतियाँ होती हैं — कुल 47 क्रोमोसोम।
8 क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम का कैरियोटाइप क्या है?
उत्तर: 47, XXY
इसमें एक अतिरिक्त X-क्रोमोसोम होता है। व्यक्ति पुंप्रधान होता है, परंतु स्त्रैण लक्षण (गाइनीकोमैस्टिया) व बंध्यता होती है।
9 सिकल सेल एनीमिया किस प्रकार का उत्परिवर्तन है?
उत्तर: बिंदु उत्परिवर्तन (Point Mutation)
β-ग्लोबिन जीन के छठे कोडोन में GAG→GUG परिवर्तन के कारण ग्लूटैमिक अम्ल (Glu) का वैलीन (Val) द्वारा प्रतिस्थापन होता है।
10 मानव में लिंग-निर्धारण किस प्रकार का होता है?
उत्तर: XY प्रकार (नर विषमयुग्मकता)
पुरुष XY (50% X, 50% Y शुक्राणु) तथा स्त्री XX (सभी X अंडाणु) — शिशु का लिंग पिता के शुक्राणु पर निर्भर करता है।
➕ अतिरिक्त NEET तथ्य
सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं
- इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 2–4 प्रश्न (~8–16 अंक) पूछे जाते हैं — सर्वाधिक प्रश्न-घनत्व वाला अध्याय।
- सबसे अधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — अनुपात (3:1, 9:3:3:1), ABO रुधिर वर्ग, सहलग्नता-पुनर्योजन, आनुवंशिक विकार।
- अपूर्ण प्रभाविता बनाम सह-प्रभाविता: अपूर्ण प्रभाविता में F₁ मध्यवर्ती फीनोटाइप (गुलाबी) — सह-प्रभाविता में F₁ दोनों जनकों के समान (AB रुधिर वर्ग)।
- थैलेसीमिया बनाम सिकल सेल: थैलेसीमिया परिमाणात्मक (ग्लोबिन कम), सिकल सेल गुणात्मक (विकृत ग्लोबिन)।
- बहुअलीलता (Multiple Alleles): ABO रुधिर वर्ग — 3 अलील (I^A, I^B, i); खरगोश फर-रंग — 4 अलील (C, c^ch, c^h, c)।
- Y-सहलग्न (Holandric) वंशागति: केवल पिता से पुत्र में — मानव कर्णपल्लव अतिरोमता (हाइपरट्रिकोसिस) उदाहरण।
- अपूर्ण प्रभाविता — विसंयोजन नियम का अपवाद नहीं: युग्मक-निर्माण में विसंयोजन पूर्णतः सामान्य होता है — केवल फीनोटाइपिक अभिव्यक्ति भिन्न होती है।
- सिकल सेल एनीमिया — X-सहलग्न नहीं: यह अलिंग सूत्री (ऑटोसोमल) अप्रभावी विकार है, X-सहलग्न नहीं।
- इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — पनेट वर्ग बनाने, अनुपात निकालने, तथा विकारों के कैरियोटाइप का अभ्यास करें — इससे 80% प्रश्नों का उत्तर सहज हो जाता है।
✓ संक्षिप्त सार
मेंडल के नियम
प्रभाविता नियम, विसंयोजन नियम, स्वतंत्र अपव्यूहन नियम — एकसंकर (3:1) एवं द्विसंकर (9:3:3:1) अनुपात।
अपूर्ण प्रभाविता & सह-प्रभाविता
श्वान पुष्प (1:2:1) — अपूर्ण; ABO रुधिर वर्ग — सह-प्रभाविता, बहुअलीलता।
सहलग्नता & पुनर्योजन
मॉर्गन — ड्रोसोफिला; एक ही क्रोमोसोम पर जीन सहलग्न; क्रॉसिंग ओवर से पुनर्योजन।
लिंग निर्धारण
XY (मानव), XO (टिड्डा), ZW (पक्षी), अगुणित-द्विगुणित (मधुमक्खी)।
उत्परिवर्तन & विकार
बिंदु उत्परिवर्तन (सिकल सेल), क्रोमोसोमीय विकार (डाउन, क्लाइनफेल्टर, टर्नर)।
NEET फोकस
अनुपात, ABO रुधिर वर्ग, सहलग्नता, आनुवंशिक विकार — सर्वाधिक पूछे जाने वाले टॉपिक।
? अभ्यास प्रश्न-उत्तर
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें एवं उत्तर देखें
प्रश्न 1 मेंडल के मटर चयन से क्या लाभ हुए?
- स्पष्ट विपरीत लक्षण: 7 जोड़े असंदिग्ध, मध्यवर्ती रहित लक्षण।
- स्वपरागण एवं कृत्रिम परागण: शुद्ध वंशक्रम प्राप्त करना आसान, नियंत्रित संकरण संभव।
- अल्प जीवनकाल, विशाल संतति: सांख्यिकीय विश्लेषण हेतु पर्याप्त नमूना संख्या।
प्रश्न 2 परीक्षार्थ संकरण (टेस्ट क्रॉस) क्या है? इसका उद्देश्य बताइए।
परीक्षार्थ संकरण: अज्ञात जीनोटाइप वाले प्रभावी फीनोटाइप जीव का अप्रभावी समयुग्मजी (जैसे tt) जीव से कराया गया संकरण।
उद्देश्य: परीक्षार्थ जीव के जीनोटाइप (TT या Tt) का निर्धारण करना।
- सभी संतति प्रभावी → परीक्षार्थ जीव समयुग्मजी (TT)
- 1:1 अनुपात → परीक्षार्थ जीव विषमयुग्मजी (Tt)
प्रश्न 3 अपूर्ण प्रभाविता एवं सह-प्रभाविता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
| बिंदु | अपूर्ण प्रभाविता | सह-प्रभाविता |
|---|---|---|
| F₁ फीनोटाइप | मध्यवर्ती (गुलाबी) | दोनों जनकों के समान (AB) |
| F₂ अनुपात | 1:2:1 (फीनोटाइप) | 1:2:1 (A:AB:B) |
| उदाहरण | श्वान पुष्प | ABO रुधिर वर्ग |
प्रश्न 4 वंशागति के क्रोमोसोम सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
सटन एवं बोवेरी (1902) ने देखा कि क्रोमोसोम का व्यवहार जीन (मेंडल के कारकों) जैसा ही है:
- दोनों जोड़ों में होते हैं।
- युग्मक जनन के दौरान दोनों विसंयोजित होते हैं — युग्मक को जोड़े में से केवल एक सदस्य मिलता है।
- अलग-अलग जोड़े स्वतंत्र रूप से विसंयोजित होते हैं।
प्रयोगात्मक सत्यापन: थॉमस हंट मॉर्गन ने ड्रोसोफिला पर प्रयोगों से इस सिद्धांत की पुष्टि की।
प्रश्न 5 सहलग्नता एवं पुनर्योजन क्या है? सहलग्नता-मानचित्र क्या होता है?
सहलग्नता (Linkage): एक ही क्रोमोसोम पर स्थित जीनों का एक साथ वंशागत होना — ये स्वतंत्र रूप से विसंयोजित नहीं होते।
पुनर्योजन (Recombination): क्रॉसिंग ओवर के कारण अजनकीय (नए) जीन संयोजनों का उत्पादन।
सहलग्नता-मानचित्र: जीनों के बीच की भौतिक दूरी को पुनर्योजन आवृत्ति (%) के आधार पर मापना — इकाई सेंटीमॉर्गन (cM)।
विकास: एल्फ्रेड स्टर्टीवेंट (मॉर्गन के शिष्य) ने यह तकनीक विकसित की।
प्रश्न 6 मानव में लिंग-निर्धारण कैसे होता है? स्पष्ट कीजिए।
मानव में XY प्रकार का लिंग-निर्धारण होता है:
- स्त्री (XX): सभी अंडाणु X-क्रोमोसोम युक्त।
- पुरुष (XY): 50% X-युक्त, 50% Y-युक्त शुक्राणु।
- X-शुक्राणु + अंडाणु → XX (मादा शिशु)
- Y-शुक्राणु + अंडाणु → XY (नर शिशु)
निष्कर्ष: शिशु का लिंग पिता के शुक्राणु पर निर्भर करता है — प्रत्येक गर्भावस्था में 50% प्रायिकता।
प्रश्न 7 सिकल सेल एनीमिया क्या है? इसका कारण बताइए।
सिकल सेल एनीमिया एक अलिंग सूत्री अप्रभावी आनुवंशिक विकार है।
कारण: β-ग्लोबिन जीन के छठे कोडोन में बिंदु उत्परिवर्तन (GAG→GUG) — ग्लूटैमिक अम्ल (Glu) का वैलीन (Val) द्वारा प्रतिस्थापन।
प्रभाव: उत्परिवर्तित हीमोग्लोबिन निम्न ऑक्सीजन तनाव में बहुलकीकृत हो जाता है, RBC दात्राकार (हँसिये के आकार) हो जाते हैं।