मानव जनन
पुरुष एवं स्त्री जनन तंत्र, युग्मक निर्माण, आर्तव चक्र, निषेचन, गर्भावस्था, प्रसव एवं दुग्धस्रवण — परीक्षा‑केंद्रित विस्तृत विवेचन।
★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित1 जनन की मूल अवधारणा
मानव एक लैंगिक, सजीवप्रजक (विविपेरस) प्राणी है
मानव में जनन की संपूर्ण प्रक्रिया कई चरणों में संपन्न होती है। सबसे पहले पुरुष व स्त्री के जननांगों में क्रमशः शुक्राणु एवं अंडाणु का निर्माण होता है — इसे युग्मकजनन कहते हैं। संभोग के दौरान शुक्राणुओं को स्त्री जनन पथ में स्थानांतरित किया जाता है (वीर्यसेचन), फिर शुक्राणु एवं अंडाणु का संलयन (निषेचन) होता है, जिससे युग्मनज बनता है। युग्मनज के विभाजन से कोरकपुटी बनती है, जो गर्भाशय की दीवार में स्थापित हो जाती है (अंतरोपण)। इसके बाद भ्रूणीय परिवर्धन होता है, और अंत में प्रसव के द्वारा शिशु का जन्म होता है। ये सभी घटनाएँ यौवनारंभ के बाद ही संभव होती हैं।
- मानव लैंगिक जनन करने वाला जरायुज (विविपेरस) प्राणी है।
- जनन क्रम: युग्मकजनन → वीर्यसेचन → निषेचन → अंतरोपण → भ्रूणीय परिवर्धन → प्रसव।
- यौवनारंभ के बाद ही सभी जनन क्रियाएँ सक्रिय होती हैं।
2 पुरुष जनन तंत्र
वृषण, नलिकाएँ, सहायक ग्रंथियाँ एवं शिश्न
पुरुष जनन तंत्र में निम्न प्रमुख अंग सम्मिलित हैं:
- वृषण (टेस्टिस): शुक्राणु उत्पादन का स्थान। ये वृषणकोष (स्क्रोटम) में स्थित होते हैं, जो शरीर के तापमान से 2–2.5°C कम तापमान बनाए रखता है — यह शुक्राणुजनन के लिए अनिवार्य है। प्रत्येक वृषण में लगभग 250 पालिकाएँ होती हैं, जिनमें शुक्रजनक नलिकाएँ पाई जाती हैं। नलिकाओं की भीतरी दीवार पर शुक्राणुजन (जर्म कोशिकाएँ) और सरटोली कोशिकाएँ (पोषण प्रदाता) होती हैं। नलिकाओं के बीच लीडिग (अंतराली) कोशिकाएँ होती हैं, जो एंड्रोजन (टेस्टोस्टेरोन) का स्राव करती हैं।
- सहायक नलिकाएँ: वृषण जालिका → शुक्रवाहिकाएँ → अधिवृषण → शुक्रवाहक → स्खलन वाहिनी → मूत्रमार्ग। ये नलिकाएँ शुक्राणुओं को संग्रहित, परिपक्व एवं परिवहित करती हैं।
- सहायक ग्रंथियाँ: शुक्राशय (फ्रुक्टोज़, कैल्शियम, एंजाइम), पुरस्थ (प्रोस्टेट) ग्रंथि (क्षारीय स्राव), तथा बल्बोयूरेथ्रल (काउपर) ग्रंथियाँ (स्नेहन)। इन ग्रंथियों का स्राव शुक्राणुओं के साथ मिलकर वीर्य बनाता है।
- शिश्न (पेनिस): मैथुन का अंग; इसमें स्तंभनशील ऊतक होते हैं, जो उद्घर्षण (इरेक्शन) में सहायक होते हैं। अग्र भाग शिश्न मुंड (ग्लांस) तथा उसे ढकने वाली त्वचा अग्रच्छद (फोरस्किन) कहलाती है।
- लीडिग कोशिकाएँ — एंड्रोजन (टेस्टोस्टेरोन) स्रावित करती हैं; सरटोली कोशिकाएँ — शुक्राणुओं को पोषण देती हैं।
- वृषणकोष द्वारा कम तापमान (2–2.5°C कम) बनाए रखना शुक्राणुजनन हेतु आवश्यक है।
- सहायक ग्रंथियों का स्राव + शुक्राणु = वीर्य।
3 स्त्री जनन तंत्र
अंडाशय, अंडवाहिनी, गर्भाशय, योनि एवं स्तन ग्रंथियाँ
स्त्री जनन तंत्र के मुख्य अंग हैं:
- अंडाशय (ओवरी): अंडाणु उत्पादन तथा स्टेरॉयड हार्मोन (एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टरॉन) स्राव। प्रत्येक अंडाशय लगभग 2–4 सेमी लंबा होता है, जिसमें असंख्य पुटक (फॉलिकल) होते हैं।
- अंडवाहिनी (फेलोपियन ट्यूब): ~10–12 सेमी लंबी; इसके कीपाकार सिरे पर झालर (फिम्ब्रिया) होती हैं जो अंडोत्सर्ग के समय अंडाणु को ग्रहण करती हैं। तुंबिका (एंपुला) क्षेत्र में निषेचन होता है।
- गर्भाशय (यूटरस): उल्टी नाशपाती के आकार का अंग; भित्ति तीन स्तरों — परिगर्भाशय (बाहरी), गर्भाशय पेशी स्तर (मध्य, मोटी पेशी) तथा गर्भाशय अंत:स्तर (आंतरिक, चक्रीय परिवर्तन) — से बनी होती है। यह भ्रूण के अंतरोपण एवं विकास का स्थान है।
- गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स): गर्भाशय का निचला सँकरा भाग; इसकी गुहा को ग्रीवा नाल कहते हैं, जो योनि से मिलकर जन्म नाल (बर्थ कैनाल) बनाती है।
- योनि (वेजाइना): मैथुन तथा प्रसव के लिए मार्ग। इसके मुख पर योनिच्छद (हाइमेन) पाया जाता है, पर इसकी उपस्थिति/अनुपस्थिति कौमार्य का विश्वसनीय संकेत नहीं है।
- बाह्य जननेंद्रिय: जघन शैल, वृहद् भगोष्ठ, लघु भगोष्ठ, भगशेफ आदि।
- स्तन ग्रंथियाँ: 15–20 पालियों में विभक्त; दुग्ध उत्पादन के लिए कूपिका कोशिकाएँ तथा नलिकाएँ होती हैं।
- निषेचन — अंडवाहिनी के तुंबिका (एंपुला) क्षेत्र में होता है।
- एंडोमेट्रियम (गर्भाशय अंत:स्तर) — आर्तव चक्र में चक्रीय परिवर्तन; अंतरोपण का आधार।
- योनिच्छद की स्थिति कौमार्य का सूचक नहीं है — यह खेल या अन्य क्रियाओं से भी फट सकता है।
4 युग्मकजनन (Gametogenesis)
शुक्राणुजनन (पुरुष) एवं अंडजनन (स्त्री)
शुक्राणुजनन (Spermatogenesis)
यह प्रक्रिया वृषण की शुक्रजनक नलिकाओं में यौवनारंभ से आरंभ होकर जीवनपर्यंत चलती है। चरण:
- शुक्राणुजन (2n) समसूत्री विभाजन द्वारा बहुगुणित होते हैं।
- कुछ शुक्राणुजन प्राथमिक शुक्राणु कोशिका (2n) में बदलते हैं, फिर अर्धसूत्री- I से द्वितीयक शुक्राणु कोशिकाएँ (n) बनती हैं।
- अर्धसूत्री- II से चार शुक्राणुप्रसू (स्पर्मेटिड, n) उत्पन्न होते हैं, जो रूपांतरित होकर परिपक्व शुक्राणु बन जाते हैं (स्पर्मियोजेनेसिस)।
- शुक्राणुओं का नलिका से मोचन वीर्यसेचन (स्पर्मिएशन) कहलाता है।
नियामक हार्मोन: GnRH (हाइपोथैलेमस) → LH (लीडिग कोशिकाओं पर → एंड्रोजन) तथा FSH (सरटोली कोशिकाओं पर → शुक्राणुजनन में सहायक कारक)।
अंडजनन (Oogenesis)
यह भ्रूणीय अवस्था में ही प्रारंभ हो जाती है:
- अंडजननी (ऊगोनिया, 2n) भ्रूणीय अंडाशय में बनती हैं; जन्म के बाद नई नहीं बनतीं।
- ये अर्धसूत्री की पूर्वावस्था-1 में रुककर प्राथमिक अंडक बन जाती हैं, जो कणिकामय कोशिकाओं से घिरकर प्राथमिक पुटक बनाती हैं।
- पुटक विकास: प्राथमिक → द्वितीयक → तृतीयक (गह्वर/एंट्रम सहित) → ग्राफी पुटक।
- ग्राफी पुटक में प्रथम अर्धसूत्री विभाजन पूर्ण होकर द्वितीयक अंडक (n) तथा प्रथम ध्रुवीय पिंड बनता है।
- अंडोत्सर्ग — ग्राफी पुटक फटकर द्वितीयक अंडक को मुक्त करता है (यह मियोसिस-II में मेटाफेज़ पर रुका होता है, निषेचन पर पूर्ण होता है)।
शुक्राणुजनन
- प्रारंभ: यौवनारंभ
- विभाजन: समान → 4 क्रियाशील शुक्राणु
- निरंतरता: जीवनपर्यंत
अंडजनन
- प्रारंभ: भ्रूणीय अवस्था
- विभाजन: असमान → 1 अंडाणु + 3 ध्रुवीय पिंड
- निरंतरता: ~50 वर्ष तक (रजोनिवृत्ति)
- शुक्राणु का अग्रपिंडक (एक्रोसोम) — निषेचन हेतु एंजाइम युक्त; मध्य खंड — माइटोकॉन्ड्रिया (ऊर्जा)।
- अंडजनन में प्रथम ध्रुवीय पिंड (n) तथा द्वितीयक अंडक (n) बनते हैं; द्वितीयक अंडक का विभाजन निषेचन पर ही पूर्ण होता है।
- FSH — पुरुष में सरटोली कोशिकाओं पर, स्त्री में पुटकों पर कार्य करता है। LH — पुरुष में लीडिग कोशिकाओं पर, स्त्री में अंडोत्सर्ग हेतु।
5 आर्तव चक्र (Menstrual Cycle)
प्राइमेटों का चक्रीय जनन-प्रक्रम
स्त्री प्राइमेटों (मानव सहित) में लगभग 28–29 दिन की अवधि में दोहराया जाने वाला चक्र। इसके चार चरण:
- आर्तव प्रावस्था (1–5 दिन): एंडोमेट्रियम का विघटन एवं रक्तस्राव (रजोधर्म)।
- पुटकीय प्रावस्था (5–13 दिन): FSH के प्रभाव से पुटक परिपक्व होते हैं; एस्ट्रोजन स्राव बढ़ता है, एंडोमेट्रियम पुनर्निर्मित होता है।
- अंडोत्सर्ग (~14वाँ दिन): LH का तीव्र स्राव (LH सर्ज) — ग्राफी पुटक फटता है, द्वितीयक अंडक मुक्त होता है।
- स्रावी (ल्यूटियल) प्रावस्था (15–28 दिन): पीत पिंड (कॉर्पस ल्यूटियम) प्रोजेस्टरॉन स्रावित करता है, एंडोमेट्रियम को बनाए रखता है। यदि निषेचन न हो — पीत पिंड ह्रास, प्रोजेस्टरॉन गिरता है, एंडोमेट्रियम टूटता है — चक्र पुनः आरंभ।
- रजोदर्शन (मेनार्के) = प्रथम रजोधर्म; रजोनिवृत्ति (मीनोपॉज) = ~50 वर्ष पर चक्र बंद।
- LH सर्ज — अंडोत्सर्ग का प्रमुख कारण।
- स्रावी प्रावस्था में प्रोजेस्टरॉन उच्च; यह FSH/LH को दबाता है, इसलिए नए पुटक नहीं बनते।
6 निषेचन, अंतरोपण एवं गर्भावस्था
युग्मनज से भ्रूण तक की यात्रा
निषेचन: अंडवाहिनी के तुंबिका क्षेत्र में शुक्राणु एवं अंडाणु का संलयन। शुक्राणु का अग्रपिंडक एंजाइमों द्वारा अंडावरण (जोना पेल्युसिडा) को भेदता है; एक बार प्रवेश करने पर अन्य शुक्राणुओं की प्रवेश-क्षमता समाप्त हो जाती है। इससे द्वितीयक अंडक का मियोसिस-II पूर्ण होकर अंडाणु केंद्रक (n) बनता है, जो शुक्राणु केंद्रक (n) से मिलकर युग्मनज (2n) बनाता है।
लिंग-निर्धारण: स्त्री के अंडाणु में सदैव X गुणसूत्र होता है, जबकि पुरुष के शुक्राणु में 50% X, 50% Y होते हैं। यदि X-युक्त शुक्राणु निषेचित करे → XX (मादा); Y-युक्त → XY (नर)। अतः शिशु का लिंग पिता द्वारा निर्धारित होता है, माता द्वारा नहीं।
अंतरोपण एवं भ्रूण विकास: युग्मनज विदलन (क्लीवेज) से 8–16 कोशिकीय तूतक (मोरूला) बनाता है, फिर कोरकपुटी (ब्लास्टोसिस्ट) — जिसमें बाहरी पोषकोरक (ट्रोफोब्लास्ट) तथा भीतरी अंतर कोशिका समूह होता है। पोषकोरक गर्भाशय अंत:स्तर में स्थापित हो जाता है — यह अंतरोपण है। इसके बाद पोषकोरक की कोशिकाएँ बढ़कर अपरा (प्लेसेंटा) बनाती हैं, जो भ्रूण को पोषण, श्वसन, उत्सर्जन तथा हार्मोन (hCG, hPL, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टरॉन) आपूर्ति करती है।
गर्भावधि (जेस्टेशन) लगभग 9 माह (38–40 सप्ताह) होती है। इस दौरान भ्रूण के तीन रोगाणु स्तर (एक्टोडर्म, मेसोडर्म, एंडोडर्म) सभी अंगों का निर्माण करते हैं।
- निषेचन स्थल — अंडवाहिनी की तुंबिका।
- तूतक (8–16 कोशिकाएँ), कोरकपुटी (बाहरी पोषकोरक + भीतरी कोशिका समूह)।
- अपरा द्वारा स्रावित हार्मोन — hCG (गर्भावस्था परीक्षण), hPL, रिलैक्सिन, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टरॉन।
- भ्रूणीय स्तर: एक्टोडर्म (त्वचा, तंत्रिका), मेसोडर्म (पेशी, कंकाल, रक्त), एंडोडर्म (पाचन, श्वसन अस्तर)।
7 प्रसव एवं दुग्धस्रवण
शिशुजन्म एवं स्तनपान
प्रसव (Parturition): गर्भावधि के अंत में गर्भाशय की पेशियों में तीव्र संकुचन शुरू होते हैं, जो शिशु को जन्म नाल के माध्यम से बाहर धकेलते हैं। यह एक धनात्मक-प्रतिपुष्टि क्रियाविधि है — पूर्ण विकसित भ्रूण एवं अपरा से संकेत (गर्भ उत्क्षेपण प्रतिवर्त) मातृ पीयूष से ऑक्सीटोसिन के स्राव को उत्तेजित करते हैं; ऑक्सीटोसिन गर्भाशय संकुचन बढ़ाता है, जो और अधिक ऑक्सीटोसिन स्राव प्रेरित करता है — जब तक शिशु का जन्म न हो जाए। प्रसव के पश्चात् अपरा भी निष्कासित हो जाती है।
दुग्धस्रवण (Lactation): सगर्भता के दौरान स्तन ग्रंथियाँ दूध उत्पादन के लिए तैयार हो जाती हैं। जन्म के बाद पहले कुछ दिनों में स्रावित दूध खीस (कोलोस्ट्रम) कहलाता है, जिसमें प्रचुर मात्रा में प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) होते हैं — यह नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।
- प्रसव का प्रमुख हार्मोन — ऑक्सीटोसिन।
- गर्भावधि — 9 माह (लगभग 40 सप्ताह)।
- कोलोस्ट्रम (खीस) — एंटीबॉडी युक्त, शिशु को प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।
★ NEET फैक्ट‑शीट
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| मानव जनन | लैंगिक, जरायुज (विविपेरस) |
| वृषण कोशिकाएँ | लीडिग → एंड्रोजन; सरटोली → पोषण |
| शुक्राणु संरचना | शीर्ष (एक्रोसोम), मध्यखंड (माइटोकॉन्ड्रिया), पूँछ |
| अंडजनन प्रारंभ | भ्रूणीय अवस्था |
| आर्तव चक्र | ~28 दिन; 4 प्रावस्थाएँ |
| अंडोत्सर्ग | LH सर्ज द्वारा (~14वाँ दिन) |
| निषेचन स्थल | अंडवाहिनी की तुंबिका |
| अंतरोपण | कोरकपुटी (ब्लास्टोसिस्ट) → एंडोमेट्रियम |
| अपरा हार्मोन | hCG, hPL, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टरॉन |
| प्रसव हार्मोन | ऑक्सीटोसिन |
| खीस (कोलोस्ट्रम) | एंटीबॉडी युक्त |
| लिंग-निर्धारण | पिता के शुक्राणु (X/Y) पर निर्भर |
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 अंडजनन की प्रक्रिया कब आरंभ होती है?
उत्तर: भ्रूणीय परिवर्धन अवस्था में।
स्त्री में अंडजनन भ्रूणीय अवस्था में ही आरंभ हो जाता है, जब अंडजननी (ऊगोनिया) बनती हैं। जन्म के बाद नई अंडजननी नहीं बनतीं — यह शुक्राणुजनन से भिन्न है, जो यौवनारंभ से शुरू होता है।
2 द्वितीयक शुक्राणु कोशिका में अलिंगसूत्रों (autosomes) की संख्या है — (a) 46 (b) 44 (c) 23 (d) 22
उत्तर: (d) 22
द्वितीयक शुक्राणु कोशिका अगुणित (n=23) होती है; इसमें 22 अलिंगसूत्र तथा 1 लिंग गुणसूत्र (X या Y) होता है।
3 द्वितीयक अंडक अपना शेष अर्धसूत्री विभाजन कब पूरा करता है?
उत्तर: जब इसे शुक्राणु भेदता (penetrate) है।
द्वितीयक अंडक मियोसिस-II में मेटाफेज़ पर रुका रहता है; निषेचन के समय शुक्राणु के प्रवेश से ही यह विभाजन पूर्ण होता है।
4 आर्तव चक्र का सही क्रम है — (a) आर्तव, पुटकीय, अंडोत्सर्ग, स्रावी (b) पुटकीय, आर्तव, अंडोत्सर्ग, स्रावी (c) अंडोत्सर्ग, आर्तव, पुटकीय, स्रावी (d) स्रावी, आर्तव, पुटकीय, अंडोत्सर्ग
उत्तर: (a) आर्तव, पुटकीय, अंडोत्सर्ग, स्रावी
चक्र आर्तव प्रावस्था से शुरू होता है, फिर पुटकीय, फिर अंडोत्सर्ग (लगभग 14वाँ दिन), और अंत में स्रावी (ल्यूटियल) प्रावस्था।
5 अभिकथन (A): कोरकपुटी के अंतरोपण के लिए एंडोमेट्रियम आवश्यक है। कारण (R): निषेचन न होने पर पीत पिंड का ह्रास एंडोमेट्रियम विघटन का कारण बनता है।
उत्तर: (a) A व R दोनों सत्य हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
दोनों कथन तथ्यात्मक रूप से सही हैं, किंतु R यह नहीं बताता कि अंतरोपण हेतु एंडोमेट्रियम क्यों आवश्यक है — वह केवल आर्तव चक्र के अंत का वर्णन है।
6 कथन-I: शुक्रवाहक शुक्राशय की वाहिनी से मिलकर स्खलन वाहिनी बनाता है। कथन-II: ग्रीवा नाल व योनि मिलकर जन्म नाल बनाते हैं।
उत्तर: दोनों कथन सही हैं।
ये संरचनात्मक तथ्य NCERT के अनुरूप हैं।
7 भ्रूण की पहली हलचल एवं सिर पर बाल किस माह में दिखते हैं?
उत्तर: पाँचवें माह में।
गर्भावस्था के पाँचवें महीने में माँ को भ्रूण की गतियाँ (क्विकनिंग) महसूस होती हैं तथा सिर पर बाल उग आते हैं।
➕ अतिरिक्त NEET तथ्य
सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं
- इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 3–4 प्रश्न (~12–16 अंक) पूछे जाते हैं।
- सबसे अधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — गेमीटोजेनेसिस, आर्तव चक्र, निषेचन एवं भ्रूण विकास।
- FSH — स्त्री में पुटकों पर; पुरुष में सरटोली कोशिकाओं पर (लीडिग पर LH कार्य करता है)।
- शुक्राणुजनन — यौवनारंभ से, समान विभाजन, 4 शुक्राणु। अंडजनन — भ्रूणीय से, असमान विभाजन, 1 अंडाणु + 3 ध्रुवीय पिंड।
- पुटक विकास क्रम: प्राथमिक → द्वितीयक (ग्रेन्युलोसा, थीका, एंट्रम) → तृतीयक → ग्राफी पुटक → अंडोत्सर्ग (द्वितीयक अंडक मुक्त)।
- स्रावी प्रावस्था में FSH/LH निम्न होते हैं — इसलिए नए पुटक नहीं बनते।
- गर्भावस्था-विशिष्ट हार्मोन — hCG, hPL, रिलैक्सिन (केवल सगर्भता में)।
- कोलोस्ट्रम — IgA सहित प्रतिरक्षी, नवजात की प्रतिरक्षा हेतु।
✓ संक्षिप्त सार
पुरुष तंत्र
वृषण (शुक्राणु, एंड्रोजन), नलिकाएँ, सहायक ग्रंथियाँ (वीर्य), शिश्न।
स्त्री तंत्र
अंडाशय (अंडाणु, एस्ट्रोजन/प्रोजेस्टरॉन), अंडवाहिनी, गर्भाशय, योनि, स्तन ग्रंथियाँ।
युग्मकजनन
शुक्राणुजनन (जीवनपर्यंत) एवं अंडजनन (भ्रूणीय प्रारंभ, रजोनिवृत्ति पर समाप्त)।
आर्तव चक्र
28‑दिनी चक्र; आर्तव, पुटकीय, अंडोत्सर्ग, स्रावी प्रावस्थाएँ; FSH, LH, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टरॉन नियमन।
निषेचन & भ्रूण
तुंबिका में निषेचन; युग्मनज → तूतक → कोरकपुटी → अंतरोपण; अपरा का निर्माण।
प्रसव & दुग्धस्रवण
ऑक्सीटोसिन प्रेरित प्रसव; कोलोस्ट्रम (एंटीबॉडी) शिशु की प्रतिरक्षा हेतु।
? अभ्यास प्रश्न-उत्तर
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें एवं उत्तर देखें
प्रश्न 1 मानव जनन की परिभाषा एवं उसके प्रमुख चरण लिखिए।
मानव जनन — वह जैविक प्रक्रिया जिसमें नर एवं मादा युग्मकों के निर्माण, संलयन तथा भ्रूण के विकास के फलस्वरूप नई संतान उत्पन्न होती है।
प्रमुख चरण: युग्मकजनन → वीर्यसेचन → निषेचन → अंतरोपण → भ्रूणीय परिवर्धन → प्रसव।
प्रश्न 2 पुरुष जनन तंत्र के प्रमुख अंगों के नाम एवं उनके कार्य लिखिए।
वृषण — शुक्राणु निर्माण एवं एंड्रोजन स्राव।
सहायक नलिकाएँ — शुक्राणुओं का भंडारण, परिपक्वन एवं परिवहन।
सहायक ग्रंथियाँ — शुक्रीय प्लाज्मा (फ्रुक्टोज़, क्षारीय स्राव, स्नेहन) प्रदान करती हैं।
शिश्न — मैथुन एवं वीर्यसेचन का अंग।
प्रश्न 3 स्त्री जनन तंत्र के मुख्य भागों का वर्णन कीजिए।
अंडाशय — अंडाणु एवं स्टेरॉयड हार्मोन (एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टरॉन) उत्पादन।
अंडवाहिनी — अंडाणु का संग्रहण एवं निषेचन स्थल (तुंबिका)।
गर्भाशय — भ्रूण का अंतरोपण एवं विकास; भित्ति में एंडोमेट्रियम, मायोमेट्रियम, पेरिमेट्रियम।
योनि — मैथुन एवं जन्म नाल।
स्तन ग्रंथियाँ — दुग्ध उत्पादन।
प्रश्न 4 शुक्राणुजनन एवं अंडजनन में तुलनात्मक अंतर स्पष्ट कीजिए।
| बिंदु | शुक्राणुजनन | अंडजनन |
|---|---|---|
| प्रारंभ | यौवनारंभ | भ्रूणीय अवस्था |
| विभाजन प्रकार | समान | असमान |
| उत्पाद | 4 क्रियाशील शुक्राणु | 1 अंडाणु + 3 ध्रुवीय पिंड |
| निरंतरता | जीवनपर्यंत | रजोनिवृत्ति तक |
प्रश्न 5 आर्तव चक्र की विभिन्न प्रावस्थाओं को नाम सहित समझाइए।
- आर्तव प्रावस्था (1–5 दिन) — एंडोमेट्रियम विघटन, रक्तस्राव।
- पुटकीय प्रावस्था (5–13 दिन) — पुटक परिपक्वन, एस्ट्रोजन स्राव, एंडोमेट्रियम पुनर्निर्माण।
- अंडोत्सर्ग (~14वाँ दिन) — LH सर्ज से ग्राफी पुटक फटना।
- स्रावी प्रावस्था (15–28 दिन) — पीत पिंड प्रोजेस्टरॉन स्राव, एंडोमेट्रियम रखरखाव; यदि निषेचन न हो — चक्र पुनः आरंभ।