पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • अध्याय 1

पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन

पुष्प की संरचना, परागण, निषेचन, बीजाण्ड से बीज तक की सम्पूर्ण यात्रा — परीक्षा-केंद्रित विवेचन।

★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 पुष्प — पादपों का जनन अंग

पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन का आधार

पुष्पी पादपों (एंजियोस्पर्म) में लैंगिक जनन का मुख्य अंग पुष्प होता है। पुष्प एक रूपांतरित प्ररोह है जो जनन कार्यों को संपादित करता है। पुष्प में नर जनन तंत्र (पुंकेसर) तथा मादा जनन तंत्र (स्त्रीकेसर) दोनों उपस्थित होते हैं। इन्हीं अंगों में परागकण (नर युग्मकोद्भिद्) तथा बीजाण्ड (मादा युग्मकोद्भिद्) का निर्माण होता है।

पुष्प की परिभाषा पुष्प एक रूपांतरित प्ररोह है जो लैंगिक जनन के लिए विशिष्ट होता है। इसके विभिन्न भाग — बाह्यदल, दलपुंज, पुंकेसर तथा स्त्रीकेसर — एक निश्चित क्रम में पुष्पासन पर व्यवस्थित होते हैं।
NEET फोकस
  • पुष्प एक रूपांतरित प्ररोह है, न कि रूपांतरित जड़ या पत्ती — यह basic fact बार-बार पूछा जाता है।
  • एंजियोस्पर्म में द्विनिषेचन की प्रक्रिया होती है, जो उन्हें अन्य पादप समूहों से अलग करती है।

2 पुष्प के भाग

चार प्रमुख चक्र — बाह्यदल, दलपुंज, पुंकेसर, स्त्रीकेसर

एक पूर्ण पुष्प में चार प्रमुख भाग होते हैं, जो बाहर से भीतर की ओर क्रमशः बाह्यदल, दलपुंज, पुंकेसर तथा स्त्रीकेसर हैं।

चक्रभागमुख्य कार्य
बाह्यदल चक्र (Calyx)बाह्यदल (Sepals)पुष्प कली की रक्षा
दलपुंज (Corolla)दल (Petals)परागणकों को आकर्षित करना
पुंकेसर (Androecium)परागकोष, सूत्रपरागकण (नर युग्मक) का निर्माण
स्त्रीकेसर (Gynoecium)अण्डाशय, वर्तिका, वर्तिकाग्रबीजाण्ड (मादा युग्मक) का निर्माण

पुंकेसर — नर जनन अंग

पुंकेसर दो भागों से बना होता है — सूत्र (फिलामेंट) तथा परागकोष (एंथर)। परागकोष में परागकोषीय ऊतक होता है जिसमें परागकण बनते हैं। प्रत्येक परागकोष में चार परागकोषीय कोष्ठ (माइक्रोस्पोरैंजियम) होते हैं, जिनमें परागाणु मातृ कोशिकाएँ विभाजित होकर परागकण (माइक्रोस्पोर) बनाती हैं।

परागाणु मातृ कोशिका (2n) → अर्धसूत्री विभाजन → 4 परागकण (n)

स्त्रीकेसर — मादा जनन अंग

स्त्रीकेसर में तीन भाग होते हैं — अण्डाशय (ओवरी), वर्तिका (स्टाइल) तथा वर्तिकाग्र (स्टिग्मा)। अण्डाशय के भीतर एक या अधिक बीजाण्ड (ओव्यूल) होते हैं। प्रत्येक बीजाण्ड में बीजाण्ड द्वार (माइक्रोपाइल), बीजाण्ड काय (न्यूसिलस) तथा बीजाण्डावरण (इंट्यूमेंट) होते हैं। बीजाण्ड के भीतर भ्रूणकोष (एम्ब्रियो सेक) का निर्माण होता है, जिसमें अंडाणु (इग्ग) तथा ध्रुवीय केंद्रक होते हैं।

बीजाण्डाणु मातृ कोशिका (2n) → अर्धसूत्री विभाजन → 4 बीजाण्डाणु (n) → 3 नष्ट, 1 → भ्रूणकोष (7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय)
NEET फोकस
  • परागकोष में चार परागकोषीय कोष्ठ (माइक्रोस्पोरैंजियम) होते हैं — यह संख्या सीधे पूछी जाती है।
  • भ्रूणकोष का विकास मोनोस्पोरिक (एक बीजाण्डाणु से) होता है तथा यह 7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय होता है — यह संरचना बहुत महत्वपूर्ण है।
  • बीजाण्ड का बाहरी आवरण बीजाण्डावरण (इंट्यूमेंट) तथा भीतरी भाग बीजाण्ड काय (न्यूसिलस) कहलाता है — इन दोनों को उलट कर पूछा जा सकता है।

3 परागण — प्रकार एवं महत्त्व

परागकणों का वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण

परागण वह क्रिया है जिसमें परागकण परागकोष से निकलकर वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। परागण दो प्रकार के होते हैं — स्वपरागण तथा परपरागण।

स्वपरागण (Autogamy)

परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं।

  • समयुग्मता (होमोगैमी) — पुंकेसर व स्त्रीकेसर एक साथ परिपक्व होते हैं।
  • परागकोष व वर्तिकाग्र का निकट संपर्क।
  • उदाहरण — मटर, अरंडी, गेहूँ।
परपरागण (Xenogamy)

परागकण एक पुष्प से दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं।

  • अनुवांशिक विविधता उत्पन्न होती है।
  • परागण कारकों (कीट, पवन, जल) की आवश्यकता होती है।
  • उदाहरण — सूरजमुखी, आम, पपीता।
परपरागण को बढ़ावा देने वाली युक्तियाँ पौधे परपरागण को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाते हैं — (अ) एकलिंगी पुष्प (अलग-अलग पुष्पों में नर व मादा भाग), (ब) उभयलिंगी पुष्पों में परागकोष व वर्तिकाग्र का अलग-अलग समय पर परिपक्व होना (प्रोटोएंड्री या प्रोटोजाइनी), (स) स्व-बाँझपन (स्व-परागण को रोकना)।
NEET फोकस
  • स्वपरागण के लाभ — परागणकों पर निर्भरता नहीं, सदैव फल-बीज बनते हैं।
  • परपरागण के लाभ — अनुवांशिक विविधता, अधिक अनुकूलन क्षमता, नई किस्मों का विकास।
  • स्व-बाँझपन (Self-incompatibility) परपरागण को बढ़ावा देता है — यह genetics से जुड़ा topic है।

4 परागण के कारक

पवन, कीट, जल — तीन प्रमुख माध्यम

परागण के लिए बाह्य कारकों की आवश्यकता होती है। मुख्य परागण कारक हैं — पवन (अजैविक), कीट (जैविक), जल (अजैविक) तथा कभी-कभी पक्षी या चमगादड़ भी परागण करते हैं।

परागण कारकपौधों के उदाहरणविशेष लक्षण
पवन परागण (Anemophily)घास, गेहूँ, चावल, मक्कापरागकण हल्के, शुष्क, बहुतायत में; पुष्प छोटे, दलहीन
कीट परागण (Entomophily)सूरजमुखी, गुड़हल, मटरपुष्प बड़े, रंगीन, सुगंधित, मधुरस होता है
जल परागण (Hydrophily)वैलिसनेरिया, जल-कुम्भीपरागकण जल में तैरते हैं; जल में ही निषेचन होता है
NEET फोकस
  • पवन परागण वाले पौधों में परागकण बहुत हल्के व शुष्क होते हैं — इनकी संख्या अत्यधिक होती है।
  • कीट परागण वाले पौधों का पुष्प आकर्षक होता है तथा मधुरस (नेक्टर) का स्राव होता है।
  • जल परागण जलीय पौधों में पाया जाता है, परंतु अधिकांश जलीय पौधे पवन या कीट परागण करते हैं — यह भेद महत्वपूर्ण है।

5 द्विनिषेचन — एंजियोस्पर्म की अनोखी प्रक्रिया

दो नर केंद्रकों का दो अलग-अलग स्थानों पर निषेचन

जब परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होता है, तो परागनली (पोलेन ट्यूब) बनती है जो वर्तिका से होती हुई अण्डाशय तक पहुँचती है। परागनली में दो नर युग्मक (केंद्रक) होते हैं।

जब परागनली बीजाण्ड के भीतर भ्रूणकोष में प्रवेश करती है, तो निम्न प्रक्रिया होती है:

  • एक नर युग्मक (n) + अंडाणु (n) → युग्मनज (2n) — यह भ्रूण में विकसित होता है।
  • दूसरा नर युग्मक (n) + दो ध्रुवीय केंद्रक (n+n) → त्रिगुणित केंद्रक (3n) — यह भ्रूणपोष (एंडोस्पर्म) में विकसित होता है।
द्विनिषेचन — एक नर केंद्रक + अंडाणु = युग्मनज (2n)
दूसरा नर केंद्रक + ध्रुवीय केंद्रक = भ्रूणपोष (3n)
द्विनिषेचन का महत्त्व द्विनिषेचन एंजियोस्पर्म (पुष्पी पादपों) की विशेषता है। इसमें भ्रूणपोष का निर्माण निषेचन के बाद ही होता है, जिससे पौधे की ऊर्जा की बचत होती है। यह प्रक्रिया एंजियोस्पर्म को अन्य पादप समूहों से अलग करती है।
NEET फोकस
  • द्विनिषेचन (Double Fertilization) — एंजियोस्पर्म की अनोखी विशेषता है, यह जिम्नोस्पर्म में नहीं पाया जाता।
  • त्रिगुणित भ्रूणपोष (3n) — यह पोषक ऊतक है जो भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
  • परागनली में दो नर केंद्रक होते हैं — एक अंडाणु के लिए, दूसरा ध्रुवीय केंद्रकों के लिए।

6 बीजाण्ड से बीज तक — विकासात्मक यात्रा

बीजाण्ड का बीज, तथा अण्डाशय का फल में रूपांतरण

निषेचन के बाद बीजाण्ड में परिवर्तन होते हैं —

  • युग्मनज (2n) → भ्रूण (Embryo) — यह बीज का मुख्य भाग है, जो नए पौधे में विकसित होता है।
  • त्रिगुणित केंद्रक (3n) → भ्रूणपोष (Endosperm) — यह पोषक ऊतक है, जो भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
  • बीजाण्डावरण → बीज आवरण (Seed coat) — यह बीज की बाहरी परत बनाता है, जो उसे सुरक्षा प्रदान करता है।
  • अण्डाशय की भित्ति → फल भित्ति (Pericarp) — यह फल में बदल जाती है, जो बीजों को फैलाने में सहायक होती है।
बीजाण्ड भागनिषेचन के बादअंतिम संरचना
युग्मनज→ भ्रूणबीज का मुख्य भाग
त्रिगुणित केंद्रक→ भ्रूणपोषपोषक ऊतक
बीजाण्डावरण→ बीज आवरणबीज का बाहरी आवरण
बीजाण्ड द्वार→ बीजांकुर द्वारअंकुरण के समय जल का प्रवेश
NEET फोकस
  • बीज आवरण बीजाण्डावरण (इंट्यूमेंट) से बनता है — यह 2n (द्विगुणित) होता है।
  • भ्रूणपोष 3n (त्रिगुणित) होता है, जबकि भ्रूण 2n (द्विगुणित) होता है — इनके प्लॉइडी स्तर अलग-अलग होते हैं।
  • फल अण्डाशय (2n) से बनता है, जबकि बीज बीजाण्ड (2n) से बनता है — यह सरल भेद बार-बार पूछा जाता है।

NEET फैक्ट-शीट — एक नज़र में

परीक्षा से ठीक पहले रिवीज़न के लिए संकलित प्रमुख तथ्य

अवधारणाप्रमुख तथ्य
पुष्परूपांतरित प्ररोह — जनन अंग
पुंकेसरपरागकोष (चार कोष्ठ) + सूत्र
स्त्रीकेसरअण्डाशय + वर्तिका + वर्तिकाग्र
भ्रूणकोष7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय (मोनोस्पोरिक)
परागणस्वपरागण (Autogamy) / परपरागण (Xenogamy)
परागण कारकपवन, कीट, जल (Anemophily, Entomophily, Hydrophily)
द्विनिषेचनएक नर युग्मक + अंडाणु = 2n; दूसरा + ध्रुवीय केंद्रक = 3n
भ्रूणपोषत्रिगुणित (3n) पोषक ऊतक
बीज आवरणबीजाण्डावरण (इंट्यूमेंट) से बनता है
फलअण्डाशय की भित्ति से बनता है

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय (पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन) से विगत वर्षों में आए प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 परागकोष में परागकोषीय कोष्ठों (माइक्रोस्पोरैंजिया) की संख्या कितनी होती है — (a) 2 (b) 3 (c) 4 (d) 5।

उत्तर: (c) 4

एक सामान्य परागकोष में चार परागकोषीय कोष्ठ (माइक्रोस्पोरैंजियम) होते हैं। प्रत्येक कोष्ठ में परागाणु मातृ कोशिकाएँ होती हैं, जो अर्धसूत्री विभाजन द्वारा परागकण बनाती हैं।

2 भ्रूणकोष की कोशिकीय संरचना क्या है?

उत्तर: 7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय

भ्रूणकोष में — 3 प्रतिविपरीत कोशिकाएँ (एंटीपोडल), 2 सहायक कोशिकाएँ (सिनरजिड), 1 अंडाणु (इग्ग) तथा 1 केंद्रीय कोशिका (जिसमें 2 ध्रुवीय केंद्रक होते हैं)। इस प्रकार कुल 7 कोशिकाएँ व 8 केंद्रक होते हैं।

3 स्वपरागण बनाम परपरागण — कौन सा कथन सही है?

उत्तर: परपरागण से अधिक अनुवांशिक विविधता उत्पन्न होती है।

स्वपरागण में एक ही पौधे के युग्मक मिलते हैं, जिससे संतानें एक जैसी (होमोज़ाइगस) होती हैं। परपरागण में विभिन्न पौधों के युग्मक मिलते हैं, जिससे विविधता (हेटेरोज़ाइगस) बढ़ती है।

4 द्विनिषेचन में दूसरा नर युग्मक किससे मिलकर क्या बनाता है?

उत्तर: दूसरा नर युग्मक (n) + 2 ध्रुवीय केंद्रक (n+n) → त्रिगुणित भ्रूणपोष (3n)

यह एंजियोस्पर्म की विशेष प्रक्रिया है, जिसमें भ्रूणपोष का निर्माण निषेचन के बाद ही होता है।

5 बीज आवरण किससे बनता है तथा इसका प्लॉइडी स्तर क्या है?

उत्तर: बीज आवरण — बीजाण्डावरण (इंट्यूमेंट) से, 2n (द्विगुणित)

बीजाण्डावरण मातृ पौधे का द्विगुणित ऊतक होता है, अतः बीज आवरण भी 2n होता है। भ्रूण 2n, भ्रूणपोष 3n, तथा बीज आवरण 2n — इन तीनों के प्लॉइडी स्तर अलग-अलग होते हैं, जो NEET में अक्सर पूछे जाते हैं।

6 पवन परागण व कीट परागण में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: पवन परागण — परागकण हल्के, शुष्क, बहुतायत में; पुष्प छोटे, दलहीन, रंगहीन। कीट परागण — पुष्प बड़े, रंगीन, सुगंधित, मधुरस युक्त।

पवन परागण वाले पौधों (जैसे घास, गेहूँ) में पुष्प आकर्षक नहीं होते, जबकि कीट परागण वाले पौधों (जैसे सूरजमुखी, गुड़हल) में पुष्प बहुत आकर्षक होते हैं।

अन्य NEET तथ्य

इस अध्याय से जुड़े कुछ अतिरिक्त सूक्ष्म तथ्य

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय (पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन) NEET में लगभग हर वर्ष 2-3 प्रश्न देता है — सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले प्रारूप भ्रूणकोष की संरचना तथा द्विनिषेचन पर आधारित होते हैं।
तथ्य
  • परागकण की संरचना — परागकण में दो आवरण होते हैं — बाह्य आवरण (एक्जाइन) तथा अंतः आवरण (इंटाइन)। एक्जाइन स्पोरोपोलेनिन से बना होता है, जो सबसे कठोर जैविक पदार्थों में से एक है।
  • परागकण का जीवनकाल — कुछ पौधों में परागकण घंटों में नष्ट हो जाते हैं, जबकि कुछ में (जैसे कुछ फलीदार पौधे) वे वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।
तुलनात्मक
  • मोनोस्पोरिक भ्रूणकोष बनाम टेट्रास्पोरिक — अधिकांश पुष्पी पादपों में भ्रूणकोष का विकास मोनोस्पोरिक (एक बीजाण्डाणु से) होता है, जिसमें 7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय संरचना बनती है।
तथ्य
  • बीजांकुर (Radicle) तथा बीजपत्र (Cotyledon) — भ्रूण में बीजांकुर (जड़ में विकसित होता है) तथा बीजपत्र (भ्रूण को पोषण प्रदान करते हैं) होते हैं। द्विबीजपत्री पौधों में दो बीजपत्र तथा एकबीजपत्री में एक बीजपत्र होता है।
तथ्य
  • अपोमिक्सिस (Apomixis) — कुछ पौधों में बिना निषेचन के बीज बनते हैं, इस प्रक्रिया को अपोमिक्सिस कहते हैं। यह एक प्रकार का अलैंगिक जनन है, जो कुछ घासों तथा खरपतवारों में पाया जाता है।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — पुष्प का चित्र, भ्रूणकोष की संरचना, द्विनिषेचन का चित्र — ये तीन चित्र बनाने का अभ्यास करें, इससे 80% प्रश्नों का उत्तर सहज हो जाता है।

संक्षिप्त सार

पुष्प की संरचना

पुष्प चार चक्रों — बाह्यदल, दलपुंज, पुंकेसर, स्त्रीकेसर — से मिलकर बना है। पुंकेसर नर जनन अंग तथा स्त्रीकेसर मादा जनन अंग है।

परागण

परागकणों का वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है। स्वपरागण व परपरागण दो मुख्य प्रकार हैं।

द्विनिषेचन

एंजियोस्पर्म की अनोखी प्रक्रिया — एक नर युग्मक अंडाणु से मिलता है, दूसरा ध्रुवीय केंद्रकों से।

बीज से पौधा

बीज में भ्रूण (2n), भ्रूणपोष (3n) तथा बीज आवरण (2n) होते हैं। अंकुरण पर भ्रूण नए पौधे में विकसित होता है।

परागण कारक

पवन, कीट, जल — तीन प्रमुख माध्यम। पवन परागण वाले पौधों के परागकण हल्के होते हैं, कीट परागण वाले के पुष्प आकर्षक होते हैं।

NEET फोकस

भ्रूणकोष (7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय), द्विनिषेचन, तथा बीज-फल का विकास — ये तीन topics सर्वाधिक पूछे जाते हैं।

? प्रश्न-उत्तर

हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

प्रश्न 1 पुष्प के चार मुख्य चक्रों के नाम लिखिए तथा उनके कार्य बताइए।
उत्तर

(अ) बाह्यदल चक्र (Calyx) — बाह्यदल (सेपल्स) पुष्प कली की रक्षा करते हैं।

(ब) दलपुंज (Corolla) — दल (पेटल्स) परागणकों (कीट, पक्षी) को आकर्षित करते हैं।

(स) पुंकेसर (Androecium) — परागकोष व सूत्र — परागकण (नर युग्मक) बनाता है।

(द) स्त्रीकेसर (Gynoecium) — अण्डाशय, वर्तिका, वर्तिकाग्र — बीजाण्ड (मादा युग्मक) बनाता है तथा निषेचन के बाद बीज व फल बनाता है।

प्रश्न 2 परागण किसे कहते हैं? स्वपरागण तथा परपरागण में अंतर लिखिए।
उत्तर

परागण — परागकणों का परागकोष से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।

स्वपरागण (Autogamy) — परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। एक ही पौधे के युग्मक मिलते हैं, इसलिए संतानें समरूप होती हैं।

परपरागण (Xenogamy) — परागकण एक पुष्प से दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। भिन्न-भिन्न पौधों के युग्मक मिलते हैं, इसलिए संतानों में विविधता उत्पन्न होती है।

प्रश्न 3 परागण के तीन मुख्य कारकों के नाम लिखिए तथा प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर

(अ) पवन परागण (Anemophily) — गेहूँ, चावल, घास — परागकण हल्के, शुष्क व बहुतायत में होते हैं।

(ब) कीट परागण (Entomophily) — सूरजमुखी, गुड़हल, मटर — पुष्प आकर्षक, रंगीन, सुगंधित व मधुरस युक्त होते हैं।

(स) जल परागण (Hydrophily) — वैलिसनेरिया, जल-कुम्भी — परागकण जल में तैरते हैं तथा जल में ही निषेचन होता है।

प्रश्न 4 द्विनिषेचन क्या है? इसकी प्रक्रिया संक्षेप में समझाइए।
उत्तर

द्विनिषेचन — यह एंजियोस्पर्म (पुष्पी पादपों) की अनोखी प्रक्रिया है जिसमें दो नर युग्मक दो अलग-अलग स्थानों पर निषेचन करते हैं —

  • पहला नर युग्मक (n) + अंडाणु (n) → युग्मनज (2n) — यह भ्रूण में विकसित होता है।
  • दूसरा नर युग्मक (n) + 2 ध्रुवीय केंद्रक (n+n) → त्रिगुणित केंद्रक (3n) — यह भ्रूणपोष में विकसित होता है।

इस प्रक्रिया के कारण ही एंजियोस्पर्म में भ्रूणपोष का निर्माण निषेचन के बाद ही होता है।

प्रश्न 5 बीजाण्ड के विभिन्न भागों के नाम लिखिए तथा निषेचन के बाद उनमें होने वाले परिवर्तन बताइए।
उत्तर
बीजाण्ड भागनिषेचन के बादअंतिम संरचना
युग्मनज→ भ्रूण (Embryo)बीज का मुख्य भाग
त्रिगुणित केंद्रक→ भ्रूणपोष (Endosperm)पोषक ऊतक (3n)
बीजाण्डावरण (इंट्यूमेंट)→ बीज आवरण (Seed coat)बीज का बाहरी आवरण (2n)
बीजाण्ड द्वार (माइक्रोपाइल)→ बीजांकुर द्वारअंकुरण के समय जल का प्रवेश

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन के सभी पहलुओं — पुष्प संरचना, परागण, द्विनिषेचन, बीज-फल विकास — को सरल व मौलिक भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी तथ्य-बॉक्स, तुलनात्मक तालिकाएँ व प्रश्नोत्तर भी शामिल किए गए हैं।

एक परागकण से शुरू होकर एक सम्पूर्ण पौधे तक — यही तो जीवन की अद्भुत यात्रा है।

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