शरीर द्रव तथा परिसंचरण — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • मानव शरीर विज्ञान

शरीर द्रव तथा परिसंचरण

शरीर की हर कोशिका तक ऑक्सीजन और पोषण पहुँचाना, और वहाँ से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर ले जाना — यह पूरा काम एक अनवरत बहते हुए तरल, रक्त, के जरिए होता है। इस अध्याय में हम रुधिर और लसीका की बनावट, उनके गुणों, हृदय की कार्यप्रणाली और पूरे परिसंचरण तंत्र को समझेंगे।

भूमिका परिवहन का माध्यम — रक्त

अब तक आप यह सीख चुके हैं कि जीवित कोशिकाओं को ऑक्सीजन, पोषण और अन्य आवश्यक पदार्थ उपलब्ध होने चाहिए। ऊतकों के सुचारु कार्य हेतु अपशिष्ट या हानिकारक पदार्थ जैसे कार्बनडाइऑक्साइड (CO₂) का लगातार निष्कासन आवश्यक है। अतः इन पदार्थों के कोशिकाओं तक से चलन हेतु एक प्रभावी क्रियाविधि का होना आवश्यक था।

विभिन्न प्राणियों में इस हेतु अभिगमन के विभिन्न तरीके विकसित हुए हैं। सरल प्राणी जैसे स्पंज व सिलेंटेरेटा बाहर से अपने शरीर में पानी का संचरण शारीरिक गुहाओं में करते हैं, जिससे कोशिकाओं के द्वारा इन पदार्थों का आदान-प्रदान सरलता से हो सके। जटिल प्राणी इन पदार्थों के परिवहन के लिए विशेष तरल का उपयोग करते हैं।

मनुष्य सहित उच्च प्राणियों में रक्त इस उद्देश्य में काम आने वाला सर्वाधिक सामान्य तरल है। एक अन्य शरीर द्रव लसीका भी कुछ विशिष्ट तत्वों के परिवहन में सहायता करता है। इस अध्याय में हम रुधिर एवं लसीका (ऊतक द्रव्य) के संघटन एवं गुणों के बारे में पढ़ेंगे, साथ ही रुधिर के परिसंचरण को भी समझेंगे।

15.1 रुधिर (Blood)

रक्त एक विशेष प्रकार का ऊतक है, जिसमें द्रव्य आधात्री (मैट्रिक्स) प्लाज्मा तथा अन्य संगठित संरचनाएँ पाई जाती हैं।

15.1.1 प्लाज्मा (Plasma)

प्रद्रव्य एक हल्के पीले रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है, जो रक्त के आयतन का लगभग 55% होता है। प्रद्रव्य में 90–92% जल तथा 6–8% प्रोटीन पदार्थ होते हैं। फाइब्रिनोजन, ग्लोबुलिन तथा एल्बूमिन प्लाज्मा में उपस्थित मुख्य प्रोटीन हैं।

फाइब्रिनोजन Fibrinogen

रक्त थक्का बनाने या स्कंदन में आवश्यक होता है।

ग्लोबुलिन Globulin

शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में उपयोग होता है।

एल्बूमिन Albumin

परासरणी संतुलन बनाए रखने के लिए उपयोग होता है।

प्लाज्मा में अनेक खनिज आयन जैसे Na⁺, Ca⁺⁺, Mg⁺⁺, HCO₃⁻, Cl⁻ इत्यादि भी पाए जाते हैं। शरीर में संक्रमण की अवस्था में होने के कारण ग्लूकोज, अमीनो अम्ल तथा लिपिड भी प्लाज्मा में पाए जाते हैं। रुधिर का थक्का बनाने अथवा स्कंदन के अनेक कारक प्रद्रव्य के साथ निष्क्रिय दशा में रहते हैं।

बिना थक्का/स्कंदन कारकों के प्लाज्मा को सीरम (Serum) कहते हैं।

15.1.2 संगठित पदार्थ (Formed Elements)

लाल रुधिर कणिका (इरिथ्रोसाइट), श्वेताणु (ल्यूकोसाइट) तथा पट्टिकाणु (प्लेटलेट्स) को संयुक्त रूप से संगठित पदार्थ कहते हैं और ये रक्त के लगभग 45% भाग बनाते हैं।

RBC प्लेटलेट्स इयोसिनोफिल बेसोफिल न्युट्रोफिल मोनोसाइट लिंफोसाइट

चित्र 15.1 — रक्त में संगठित पदार्थ: RBC, प्लेटलेट्स तथा विभिन्न प्रकार के श्वेत रुधिर कणिकाएँ

इरिथ्रोसाइट (लाल रुधिर कणिका) Erythrocyte / RBC

अन्य सभी कोशिकाओं से संख्या में अधिक होती हैं। एक स्वस्थ मनुष्य में ये कणिकाएँ लगभग 50 से 55 लाख प्रतिघन मिमी. रक्त (5 से 5.5 मिलियन प्रतिघन मिमी.) होती हैं। वयस्क अवस्था में लाल रुधिर कणिकाएँ लाल अस्थि मज्जा में बनती हैं। अधिकतर स्तनधारियों की लाल रुधिर कणिकाओं में केंद्रक नहीं मिलते हैं तथा इनकी आकृति उभयावतल (बाईकोनकेव) होती है। इनका लाल रंग एक लौहयुक्त जटिल प्रोटीन हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण है। एक स्वस्थ मनुष्य में प्रति 100 मिली. रक्त में लगभग 12 से 16 ग्राम हीमोग्लोबिन पाया जाता है। लाल रक्त कणिकाओं की औसत आयु 120 दिन होती है, तत्पश्चात इनका विनाश प्लीहा (लाल रक्त कणिकाओं की कब्रिस्तान) में होता है।

ल्युकोसाइट (श्वेत रुधिर कणिकाएँ) Leukocyte / WBC

ल्युकोसाइट को हीमोग्लोबिन के अभाव के कारण तथा रंगहीन होने से श्वेत रुधिर कणिकाएँ भी कहते हैं। इसमें केंद्रक पाए जाते हैं तथा इनकी संख्या लाल रक्त कणिकाओं की अपेक्षा कम, औसतन 6000–8000 प्रति घन मिमी. रक्त होती है। इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा गया है — कणिकाणु (ग्रेन्यूलोसाइट) तथा अकण कोशिका (एग्रेन्यूलोसाइट)।

कोशिका प्रकारश्रेणीअनुमानित प्रतिशतमुख्य कार्य
न्यूट्रोफिलकणिकाणु60–65%भक्षण (शरीर में प्रवेश करने वाले जीवों को समाप्त करना)
इओसिनोफिलकणिकाणु2–3%संक्रमण से बचाव, एलर्जी प्रतिक्रिया में भाग
बेसोफिलकणिकाणु0.5–1%हिस्टामिन, सिरोटोनिन, हिपैरिन का स्राव; शोथकारी क्रिया
लिंफोसाइट (B व T)अकण कोशिका20–25%शरीर की प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी
मोनोसाइटअकण कोशिका6–8%भक्षण कोशिका

पट्टिकाणु (प्लेटलेट्स) Platelets / Thrombocyte

पट्टिकाणु को थ्रोम्बोसाइट भी कहते हैं, ये मैगाकेरियोसाइट (अस्थि मज्जा की विशेष कोशिका) के टुकड़ों में विखंडन से बनती हैं। रक्त में इनकी संख्या 1.5 से 3.5 लाख प्रति घन मिमी. होती हैं। प्लेटलेट्स कई प्रकार के पदार्थ स्रवित करती हैं जिनमें अधिकांश रुधिर का थक्का जमाने (स्कंदन) में सहायक हैं। प्लेटलेट्स की संख्या में कमी के कारण स्कंदन (जमाव) में विकृति हो जाती है तथा शरीर से अधिक रक्त स्राव हो जाता है।

15.1.3 रक्त समूह (Blood Group)

15.1.3.1 ABO समूह

ABO समूह मुख्यतः लाल रुधिर कणिकाओं की सतह पर दो प्रतिजन/एंटीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर होता है। ये एंटीजन A और B हैं, जो प्रतिरक्षा अनुक्रिया को प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार विभिन्न व्यक्तियों में दो प्रकार के प्राकृतिक प्रतिरक्षी/एंटीबॉडी मिलते हैं।

रक्त समूहलाल रुधिर कणिकाओं पर प्रतिजनप्लाज्मा में प्रतिरक्षी (एंटीबॉडीज)रक्तदाता समूह
AAएंटी BA, O
BBएंटी AB, O
ABABअनुपस्थितAB, A, B, O
Oअनुपस्थितएंटी A, BO

तालिका 15.1 — रक्त समूह तथा रक्तदाता सुयोग्यता

इस तालिका से स्पष्ट है कि रक्त समूह O एक सर्वदाता है, जो सभी समूहों को रक्त प्रदान कर सकता है। रक्त समूह AB सर्व आदाता (ग्राही) है, जो सभी प्रकार के रक्त समूहों से रक्त ले सकता है।

15.1.3.2 Rh समूह

एक अन्य प्रतिजन/एंटीजन Rh है, जो लगभग 80% मनुष्यों में पाया जाता है तथा यह Rh एंटीजेन रीसेस बंदर में पाए जाने वाले एंटीजेन के समान है। ऐसे व्यक्ति को जिसमें Rh एंटीजेन होता है, को Rh सहित (Rh+ve) और जिसमें यह नहीं होता उसे Rh हीन (Rh-ve) कहते हैं।

यदि Rh रहित (Rh-ve) के व्यक्ति के रक्त को Rh सहित (Rh+ve) पॉजिटिव के साथ मिलाया जाता है, तो व्यक्ति में Rh प्रतिजन के विरुद्ध विशेष प्रतिरक्षी बन जाती हैं — इसलिए रक्त आदान-प्रदान के पहले Rh समूह का मिलना भी आवश्यक है।

एक विशेष प्रकार की Rh अयोग्यता एक गर्भवती (Rh-ve) माता एवं उसके गर्भ में पल रहे भ्रूण के Rh+ve के बीच पाई जाती है। पहले प्रसव के समय माता के Rh-ve रक्त से शिशु के Rh+ve रक्त के संपर्क में आने की संभावना रहती है, जिससे माता के रक्त में Rh प्रतिरक्षी (एंटीबॉडीज) बनना शुरू हो जाता है। यदि परवर्ती गर्भावस्था होती है, तो माता के रक्त से भ्रूण के रक्त में Rh प्रतिरक्षी का रिसाव हो सकता है, जिससे भ्रूण की लाल रुधिर कणिकाएँ नष्ट हो सकती हैं। इस स्थिति को इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटैलिस (गर्भ रक्ताणु कोरकता) कहते हैं। इससे बचने के लिए माता को प्रसव के तुरंत बाद Rh प्रतिरक्षी का उपयोग करना चाहिए।

15.1.4 रक्त-स्कंदन (Blood Clotting)

किसी चोट या घात की प्रतिक्रिया स्वरूप रक्त स्कंदन होता है। यह क्रिया शरीर से बाहर अत्यधिक रक्त को बहने से रोकती है। यह जो गहरे लाल व भूरे रंग का झाग-सा दिखता है, वह रक्त का स्कंदन या थक्का है, जो मुख्यतः फाइब्रिन धागे के जाल से बनता है। इस जाल में मरे तथा क्षतिग्रस्त संगठित पदार्थ भी उलझे हुए होते हैं।

फाइब्रिन रक्त प्लैज्मा में उपस्थित एंजाइम थ्रोम्बिन की सहायता से फाइब्रिनोजन से बनती है। थ्रोम्बिन की रचना प्लाज्मा में उपस्थित निष्क्रिय प्रोथोंबिन से होती है। इसके लिए थ्रोंबोकाइनेज एंजाइम समूह की आवश्यकता होती है, जो रक्त प्लैज्मा में उपस्थित अनेक निष्क्रिय कारकों की सहायता से एक के बाद एक अनेक एंजाइमी प्रतिक्रिया की शृंखला (सोपानी प्रक्रम) से बनता है।

एक चोट या घात रक्त में उपस्थित प्लेटलेट्स को विशेष कारकों को मुक्त करने के लिए प्रेरित करती है, जिनसे स्कंदन की प्रक्रिया शुरू होती है। क्षतिग्रस्त ऊतकों द्वारा भी चोट की जगह पर कुछ कारक मुक्त होते हैं, जो स्कंदन को प्रारंभ कर सकते हैं। इस प्रतिक्रिया में कैल्सियम आयन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।

15.2 लसीका (ऊतक द्रव्य) (Lymph)

रक्त जब ऊतक की कोशिकाओं से होकर गुजरता है, तब बड़े प्रोटीन अणु एवं संगठित पदार्थों को छोड़कर रक्त से जल एवं जल में घुलनशील पदार्थ कोशिकाओं से बाहर निकल जाते हैं। इस तरल को अंतराली द्रव या ऊतक द्रव कहते हैं। इसमें प्लैज्मा के समान ही खनिज लवण पाए जाते हैं। रक्त तथा कोशिकाओं के बीच पोषक पदार्थ एवं गैसों का आदान-प्रदान इसी द्रव से होता है।

वाहिकाओं का विस्तृत जाल जो लसीका तंत्र (लिंफैटिक सिस्टम) कहलाता है, इस द्रव को एकत्र कर बड़ी शिराओं में वापस छोड़ता है। लसीका तंत्र में उपस्थित यह द्रव/तरल को लसीका कहते हैं।

लसीका एक रंगहीन द्रव है जिसमें विशिष्ट लिंफोसाइट मिलते हैं। लिंफोसाइट शरीर की प्रतिरक्षा अनुक्रिया के लिए उत्तरदायी है। लसीका पोषक पदार्थ, हार्मोन आदि के संवहन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। आंत्र अंकुर में उपस्थित लैक्टियल वसा को लसीका द्वारा अवशोषित करते हैं।

15.3 परिसंचरण पथ (Circulatory Pathways)

परिसंचरण दो तरह का होता है, जो खुला एवं बंद होता है।

खुला परिसंचरण तंत्र Open Circulation

आर्थोपोडा (संधिपाद) तथा मोलस्का में पाया जाता है। हृदय द्वारा रक्त को रक्त वाहिकाओं में पंप किया जाता है, जो रक्त स्थान (कोटरों) में खुलता है। एक कोटर वस्तुतः देहगुहा होती है।

बंद परिसंचरण तंत्र Closed Circulation

एनेलिडा तथा कशेरुकी में पाया जाता है, जिसमें हृदय से रक्त का प्रवाह एक दूसरे से जुड़ी रक्त वाहिनियों के जाल में होता है — इस तरह रक्त प्रवाह आसानी से नियमित किया जा सकता है, इसलिए यह अधिक लाभदायक होता है।

सभी कशेरुकी में कक्षों से बना हुआ पेशी हृदय होता है। मछलियों में दो कक्षीय हृदय होता है, जिसमें एक अलिंद तथा एक निलय होता है। उभयचरों तथा सरीसृपों (रेप्टाइल का, मगरमच्छ को छोड़कर) हृदय तीन कक्षों से बना होता है, जिसमें दो अलिंद तथा एक निलय होता है। जबकि मगरमच्छ, पक्षियों तथा स्तनधारियों में हृदय चार कक्षों का बना होता है जिसमें दो अलिंद तथा दो निलय होते हैं।

प्राणी वर्गहृदय की संरचनापरिसंचरण का प्रकार
मछलियाँ2 कक्षीय (1 अलिंद + 1 निलय)एकल परिसंचरण
उभयचर व सरीसृप (मगरमच्छ छोड़कर)3 कक्षीय (2 अलिंद + 1 निलय)अपूर्ण दोहरा परिसंचरण
मगरमच्छ, पक्षी, स्तनधारी4 कक्षीय (2 अलिंद + 2 निलय)पूर्ण दोहरा परिसंचरण

मछलियों में हृदय विऑक्सीजनित रुधिर बाहर को पंप करता है, जो क्लोम द्वारा ऑक्सीजनित होकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाया जाता है तथा वहाँ से विऑक्सीजनित रक्त हृदय में वापस आता है — इस क्रिया को एकल परिसंचरण कहते हैं।

उभयचरों व सरीसृपों में बांया अलिंद क्लोम/फेफड़ों/त्वचा से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है तथा दाहिना आलिंद शरीर के दूसरे भागों से विऑक्सीजनित रुधिर प्राप्त करता है, लेकिन वे रक्त को निलय में मिश्रित कर बाहर की ओर पंप करते हैं — इस क्रिया को अपूर्ण दोहरा परिसंचरण कहते हैं।

पक्षियों एवं स्तनधारियों में ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त क्रमशः बाएँ व दाएँ आलिंदों में आता है, जहाँ से वह उसी क्रम से बाएँ, दाएँ एवं बाएँ निलयों में जाता है। निलय बिना रक्त को मिलाए इन्हें पंप करते हैं — यानी दो तरह के परिसंचरण पथ इन प्राणियों में मिलते हैं। अतः इन प्राणियों में दोहरा परिसंचरण पाया जाता है।

15.3.1 मानव परिसंचरण तंत्र (Human Circulatory System)

मानव परिसंचरण तंत्र जिसे रक्तवाहिनी तंत्र भी कहते हैं, जिसमें कक्षों से बना पेशी हृदय, शाखित बंद रक्त वाहिनियों का एक जाल, रक्त एवं तरल समाहित होता है।

दायाँ बायाँ महाधमनी

चित्र 15.2 — मानव हृदय का सरलीकृत काट: चार कक्ष — दो अलिंद (ऊपर) व दो निलय (नीचे)

हृदय की उत्पत्ति मध्यजन स्तर (मीसोडर्म) से होती है तथा यह दोनों फेफड़ों के मध्य, वक्ष गुहा में स्थित रहता है — यह थोड़ा सा बाईं तरफ झुका रहता है। यह बंद मुट्ठी के आकार का होता है। यह एक दोहरी भित्ति के झिल्लीमय थैली, हृदयावरणी (pericardium) द्वारा सुरक्षित होता है, जिसमें हृदयावरणी द्रव पाया जाता है।

हमारे हृदय में चार कक्ष होते हैं — दो कक्ष अपेक्षाकृत छोटे तथा ऊपर पाए जाते हैं, जिन्हें अलिंद (आर्ट्रिया) कहते हैं, तथा दो कक्ष अपेक्षाकृत बड़े होते हैं, जिन्हें निलय (वेंट्रिकल) कहते हैं। एक पतली पेशीय भित्ति जिसे अंतर-अलिंदी पट कहते हैं, दाएँ एवं बाएँ आलिंद को अलग करती है, जबकि एक मोटी भित्ति, जिसे अंतर-निलयी पट कहते हैं, बाएँ एवं दाएँ निलय को अलग करती है।

दाहिने आलिंद और दाहिने निलय के छिद्र पर तीन पेशी पल्लों (फ्लैप्स) से युक्त एक वाल्व पाया जाता है — इसे त्रिवलनी (ट्राइकसपिड) कपाट कहते हैं। बाएँ अलिंद तथा बाएँ निलय के छिद्र पर एक द्विवलनी कपाट/मिट्रल कपाट पाया जाता है। दाएँ तथा बाएँ निलयों से निकलने वाली क्रमशः फुफ्फुसीय धमनी तथा महाधमनी का निकास द्वार अर्धचंद्र कपाटिकर (सेमील्यूनर वाल्व) से युक्त रहता है। हृदय के कपाट रुधिर को एक दिशा में ही जाने देते हैं तथा उल्टे प्रवाह को रोकते हैं।

एक विशेष प्रकार की हृद पेशीय्न्यास, जिसे नोडल ऊतक कहते हैं, भी हृदय में पाया जाता है। इसका एक धब्बा दाहिने अलिंद के दाहिने ऊपरी कोने पर स्थित रहता है, जिसे शिराअलिंदपर्व (SAN — सायनो-आट्रियल नॉड) कहते हैं। दूसरा पिंड दाहिने अलिंद में नीचे के कोने पर अलिंद निलय पट के पास स्थित होता है, जिसे अलिंद निलय पर्व (AVN — आट्रियो-वेंटीकुलर नॉड) कहते हैं। SAN सबसे अधिक क्रियाविभव (70–75 प्रति मिनट) पैदा करती है और हृदय के लयात्मक संकुचन को प्रारंभ करती व बनाए रखती है — इसीलिए इसे गतिप्रेरक (पेस मेकर) कहते हैं।

15.3.2 हृद चक्र (Cardiac Cycle)

हृदय काम कैसे करता है? प्रारंभ में मानिए कि हृदय के चारों कक्ष शिथिल अवस्था में हैं, यानी हृदय अनुशिथिलन अवस्था में है। इस समय त्रिवलन या द्विवलन कपाट खुले रहते हैं, जिससे रक्त फुफ्फुस शिरा तथा महाशिरा से क्रमशः बाएँ तथा दाएँ अलिंद से होता हुआ बाएँ तथा दाएँ निलय में पहुँचता है। अर्ध चंद्रकपाटिका इस अवस्था में बंद रहती है।

  • शिराअलिंदपर्व (SAN) क्रियाविभव पैदा करता है, जो दोनों अलिंदों को प्रेरित कर अलिंद प्रकुंचन (Atrial Systole) पैदा करता है — इससे रक्त का प्रवाह निलय में लगभग 30% बढ़ जाता है।
  • निलय में क्रियाविभव का संचालन अलिंद निलय (पर्व) तथा अलिंद निलय बंडल द्वारा होता है, जहाँ से हिज के बंडल इसे निलयी पेशीन्यास तक पहुँचाता है — इससे निलयी पेशियों में संकुचन होता है, यानी निलय प्रकुंचन होता है, इस समय अलिंद विश्राम अवस्था (अनुशिथिलन) में जाते हैं।
  • निलयी प्रकुंचन से निलयी दाब बढ़ जाता है, जिससे त्रिवलनी व द्विवलनी कपाट बंद हो जाते हैं। जैसे ही निलयी दबाव बढ़ता है, अर्ध चंद्रकपाटिकाएँ (फुफ्फुसीय धमनी व महाधमनी पर स्थित) खुलने के लिए मजबूर हो जाती हैं, जिससे रक्त इन धमनियों से होकर परिसंचरण मार्ग में चला जाता है।
  • निलय अब शिथिल हो जाते हैं (निलयी अनुशिथिलन) — इससे निलयी दाब कम हो जाता है, जिससे अर्धचंद्रकपाटिका बंद हो जाती है। निलयी दाब और कम होता है, जिससे त्रिवलनी व द्विवलनी कपाट खुल जाते हैं और शिराओं से आए रक्त का प्रवाह अलिंद से पुनः निलय में शुरू हो जाता है — चक्र फिर दोहराता है।
  • एक हृदय स्पंदन के आरंभ से दूसरे स्पंदन के आरंभ (एक संपूर्ण हृदय स्पंदन होने) के बीच के घटनाक्रम को हृद चक्र (Cardiac Cycle) कहते हैं। हृदय स्पंदन एक मिनट में लगभग 72 बार होता है — यानी एक चक्र का समय लगभग 0.8 सेकेंड होता है। प्रत्येक हृद चक्र में निलय लगभग 70 मिली रक्त पंप करता है, जिसे प्रवाह आयतन (स्ट्रोक आयतन) कहते हैं। प्रवाह आयतन को हृदय दर से गुणा करने पर हृद निकास मिलता है, जो औसतन लगभग 5 लीटर प्रति मिनट होता है।

    हृद चक्र के दौरान दो महत्वपूर्ण ध्वनियाँ स्टेथेस्कोप द्वारा सुनी जा सकती हैं। प्रथम ध्वनि (लब) त्रिवलनी तथा द्विवलनी कपाट के बंद होने से संबंधित है, जबकि दूसरी ध्वनि (डब) अर्ध चंद्रकपाट के बंद होने से संबंधित है — इन दोनों ध्वनियों का चिकित्सीय निदान में बहुत महत्व है।

    15.3.3 विद्युत हृद लेख (Electrocardiogram — ECG)

    P R Q S T

    चित्र 15.3 — मानव ECG का रेखांकित चित्रण: P तरंग, QRS सम्मिश्र तथा T तरंग

    इस तरह की मशीन (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ) का उपयोग विद्युत हृद लेख (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम/ECG) प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ECG हृदय के हृदयी चक्र की विद्युत क्रियाकलापों का आरेखीय प्रस्तुतीकरण है।

  • P तरंग — आलिंद के उद्दीपन/विध्रुवण को दर्शाती है, जिससे दोनों अलिंदों का संकुचन होता है।
  • QRS सम्मिश्र — निलय के अधुव्रण को प्रस्तुत करता है, जो निलय के संकुचन (प्रकुंचन/सिस्टोल) को शुरू करता है।
  • T तरंग — निलय का उत्तेजना से सामान्य अवस्था में वापस आने की स्थिति को दर्शाती है; इसका अंत प्रकुंचन अवस्था की समाप्ति का द्योतक है।
  • एक निश्चित समय में QRS सम्मिश्र की संख्या गिनने पर एक मनुष्य के हृदय स्पंदन दर भी निकाली जा सकती है। इस आकृति में कोई परिवर्तन किसी संभावित असामान्यता अथवा बीमारी को इंगित करता है — अतः इसकी चिकित्सीय महत्ता बहुत ज्यादा है।

    15.4 द्विसंचरण (डबल सरकुलेशन) (Double Circulation)

    रक्त अनिवार्य रूप से एक निर्धारित मार्ग से रक्तवाहिनियों — धमनी एवं शिराओं में बहता है। मूल रूप से प्रत्येक धमनी और शिरा में तीन परतें होती हैं — अंदर की परत शल्की अंतराच्छादित ऊतक (अंतःस्तर कंचुक), चिकनी पेशियों एवं लचीले रेशों से युक्त मध्य कंचुक, एवं कोलेजन रेशे से युक्त रेशेदार संयोजी ऊतक (बाह्य कंचुक)। शिराओं में मध्य कंचुक अपेक्षाकृत पतला होता है।

    फेफड़ा हृदय शरीर अंग

    चित्र 15.4 — मानव रक्त परिसंचरण का आरेखीय चित्र: फुफ्फुसीय व दैहिक दोनों पथ

    जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि दाहिने निलय द्वारा पंप किया गया रक्त फुफ्फुसीय धमनियों में जाता है जबकि बाएँ निलय से रक्त महाधमनी में जाता है।

    फुफ्फुसीय परिसंचरण Pulmonary Circulation

    ऑक्सीजन रहित रक्त दाहिने निलय से फेफड़ों में पहुँचाया जाता है, जहाँ यह ऑक्सीजनित होता है, तथा फुफ्फुसीय शिरा द्वारा बाएँ अलिंद में पहुँचता है।

    दैहिक परिसंचरण Systemic Circulation

    बाएँ निलय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को महाधमनी द्वारा शरीर के ऊतकों तक पहुँचाया जाता है तथा वहाँ से ऑक्सीजन रहित रक्त को ऊतकों से शिराओं के द्वारा दाहिने अलिंद में वापस पहुँचाया जाता है।

    एक अनूठी संवहनी संबद्धता आहार नाल तथा यकृत के बीच उपस्थित होती है, जिसे यकृत निवाहिका परिसंचरण तंत्र (हिपेटिकपोर्टल सिस्टम) कहते हैं। यकृत निवाहिका शिरा रक्त को इसके पहले कि वह क्रमबद्ध परिसंचरण में आंत्र से यकृत तक पहुँचाती है। हमारे शरीर में एक विशेष हृद परिसंचरण तंत्र (कोरोनरी सिस्टम) पाया जाता है, जो रक्त सिर्फ को हृद पेशी न्यास तक ले जाता है तथा वापस लाता है।

    15.5 हृद क्रिया का नियंत्रण (Regulation of Cardiac Activity)

    हृदय की सामान्य क्रियाओं का नियमन अंतरिम होता है, यानी विशेष पेशी ऊतक (नोडल ऊतक) द्वारा स्वनियमित होते हैं, इसलिए हृदय को पेशीजनक (मायोजनिक) कहते हैं। मेड्यूला ओबलांगाटा के विशेष तंत्रिका केंद्र स्वायत्त तंत्रिका के द्वारा हृदय की क्रियाओं को संयमित कर सकता है।

  • अनुकंपी तंत्रिकाओं से प्राप्त तंत्रीय संकेत हृदय स्पंदन को बढ़ा देते हैं व निलयी संकुचन को सुदृढ़ बनाते हैं — अतः हृद निकास बढ़ जाता है।
  • परानुकंपी तंत्रिकीय संकेत (जो स्वचालित तंत्रिका केंद्र का हिस्सा है) हृदय स्पंदन एवं क्रियाविभव की संवहन गति कम करते हैं — अतः यह हृद निकास को कम करते हैं।
  • अधिवृक्क अंतस्था (एडीनल मेड्यूला) का हार्मोन भी हृद निकास को बढ़ा सकता है।
  • 15.6 परिसंचरण की विकृतियाँ (Circulatory Disorders)

    उच्च रक्त दाब (अति तनाव) Hypertension

    रक्त चाप सामान्य (120/80) से अधिक होने की अवस्था। यदि किसी का रक्त दाब बार-बार मापने पर भी 140/90 या इससे अधिक होता है, तो वह अति तनाव प्रदर्शित करता है। यह हृदय की बीमारियों को जन्म देता है तथा मस्तिष्क व वृक्क जैसे अंगों को प्रभावित करता है।

    हृद धमनी रोग (CAD) Coronary Artery Disease

    प्रायः एथिरोकाठिंय (एथिरोस सक्लेरोसिस) कहलाता है — धमनियों के अंदर कैल्सियम, वसा तथा अन्य रेशीय ऊतकों के जमा होने से धमनी की अवकाशिका संकरी हो जाती है।

    हृदशूल (एंजाइना) Angina Pectoris

    हृद पेशी में जब पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुँचती है तब सीने में दर्द (वक्ष पीड़ा) होता है। मध्यावस्था तथा वृद्धावस्था में यह सामान्यतः होता है। यह अवस्था रक्त बहाव के प्रभावित होने से होती है।

    हृदपात (हार्ट फेल्योर) Heart Failure

    वह अवस्था जिसमें हृदय शरीर के विभिन्न भागों को आवश्यकतानुसार पर्याप्त आपूर्ति नहीं कर पाता। हृदघात (जहाँ हृदय की धड़कन बंद हो जाती है) से भिन्न — यहाँ हृदयपेशी को रक्त आपूर्ति अचानक अपर्याप्त हो जाने से यकायक क्षति पहुँचती है।

    सार संक्षेप में समझें

    कशेरुकी रक्त (द्रव संयोजी ऊतक) को पूरे शरीर में संचारित करते हैं, जिसके द्वारा आवश्यक पदार्थ कोशिकाओं तक पहुँचाते हैं तथा वहाँ से अवशिष्टों को शरीर से बाहर निकालते हैं। रक्त, द्रव आधात्री (प्लाज्मा) तथा संगठित पदार्थों से बना होता है — लाल रुधिर कणिकाएँ, श्वेत रुधिर कणिकाएँ और प्लेटलेट्स संगठित पदार्थों का हिस्सा हैं। मानव का रक्त चार समूहों A, B, AB, O में वर्गीकृत किया गया है, जो लाल रुधिर कणिकाओं की सतह पर एंटीजन A या B की उपस्थिति/अनुपस्थिति पर आधारित है; दूसरा वर्गीकरण Rh घटक की उपस्थिति/अनुपस्थिति पर।

    सभी कशेरुकियों तथा कुछ अकशेरुकियों में बंद परिसंचरण तंत्र होता है। हृदय में दो अलिंद तथा दो निलय होते हैं। हृद पेशीन्यास स्वउत्तेजनीय होता है — शिराअलिंद पर्व (SAN) अधिकतम क्रियाविभव उत्पन्न करती है, इसीलिए इसे पेश मेकर (गति प्रेरक) कहते हैं। एक हृद चक्र में दोनों अलिंदों तथा दोनों निलयों का प्रकुंचन एवं अनुशिथिलन सम्मिलित होता है — एक स्वस्थ व्यक्ति प्रति मिनट लगभग 72 चक्र दर्शाता है।

    हम पूर्ण दोहरा संचरण रखते हैं — फुफ्फुसीय तथा दैहिक। फुफ्फुसीय परिसंचरण में ऑक्सीजनरहित रक्त फेफड़ों में ऑक्सीजनित होकर बाएँ अलिंद में पहुँचता है; दैहिक परिसंचरण में ऑक्सीजन युक्त रक्त महाधमनी द्वारा शरीर के ऊतकों तक पहुँचकर, ऑक्सीजनरहित होकर दाहिने अलिंद में वापस आता है। हृदय स्व उत्तेज्य होते हुए भी इसकी क्रियाशीलता को तंत्रिकीय तथा हार्मोन की क्रियाओं से नियमित किया जा सकता है।

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    प्रश्न 1 रक्त के संगठित पदार्थों के अवयवों का वर्णन करें तथा प्रत्येक अवयव के एक प्रमुख कार्य के बारे में लिखें।
    उत्तर
    • लाल रुधिर कणिका (RBC/इरिथ्रोसाइट): हीमोग्लोबिन के जरिए ऑक्सीजन व कुछ कार्बनडाइऑक्साइड का परिवहन करती है।
    • श्वेत रुधिर कणिका (WBC/ल्यूकोसाइट): शरीर की प्रतिरक्षा में भाग लेती है — कुछ प्रकार बाह्य जीवों का भक्षण करते हैं, कुछ एंटीबॉडी बनाते हैं।
    • पट्टिकाणु (प्लेटलेट्स): चोट लगने पर रक्त-स्कंदन (थक्का जमाने) की प्रक्रिया शुरू करने में सहायक हैं, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव रुकता है।
    प्रश्न 2 प्लाज्मा (प्लैज्मा) प्रोटीन का क्या महत्व है?
    उत्तर

    प्लाज्मा में तीन मुख्य प्रोटीन पाए जाते हैं, जिनके अलग-अलग महत्वपूर्ण कार्य हैं — फाइब्रिनोजन रक्त का थक्का बनाने (स्कंदन) में आवश्यक है, जो चोट लगने पर अत्यधिक रक्तस्राव रोकता है। ग्लोबुलिन शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में भूमिका निभाता है, यानी संक्रमण से लड़ने में मदद करता है। एल्बूमिन रक्त और ऊतकों के बीच परासरणी संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है, जिससे शरीर के तरल पदार्थों का संतुलन बना रहता है।

    प्रश्न 3 स्तंभ I का स्तंभ II से मिलान करें
    (i) इयोसिनोफिल्स — (क) रक्त जमाव (स्कंदन)
    (ii) लाल रुधिर कणिकाएँ — (ख) सर्व आदाता
    (iii) AB रक्त समूह — (ग) संक्रमण प्रतिरोधन
    (iv) पट्टिकाणु प्लेटलेट्स — (घ) हृदय संकुचन
    (v) प्रकुंचन (सिस्टोल) — (च) गैस परिवहन (अभिगमन)
    उत्तर
    • (i) इयोसिनोफिल्स → (ग) संक्रमण प्रतिरोधन
    • (ii) लाल रुधिर कणिकाएँ → (च) गैस परिवहन (अभिगमन)
    • (iii) AB रक्त समूह → (ख) सर्व आदाता
    • (iv) पट्टिकाणु प्लेटलेट्स → (क) रक्त जमाव (स्कंदन)
    • (v) प्रकुंचन (सिस्टोल) → (घ) हृदय संकुचन
    प्रश्न 4 रक्त को एक संयोजी ऊतक क्यों मानते हैं?
    उत्तर

    रक्त को एक विशेष प्रकार का संयोजी ऊतक (connective tissue) माना जाता है, क्योंकि यह अन्य संयोजी ऊतकों की तरह एक द्रव आधात्री (matrix) — यानी प्लाज्मा — में कोशिकाओं (RBC, WBC, प्लेटलेट्स) के तैरते हुए मिलने से बना होता है। इसका मुख्य कार्य भी संयोजी ऊतकों जैसा ही है — यह शरीर के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ता है और उनके बीच पदार्थों (पोषक तत्व, गैसें, हार्मोन, अपशिष्ट) का परिवहन कर उन्हें कार्यात्मक रूप से एकीकृत करता है।

    प्रश्न 5 लसीका एवं रुधिर में अंतर बताएं।
    उत्तर
    रुधिर (Blood)लसीका (Lymph)
    लाल रंग का (हीमोग्लोबिन के कारण)रंगहीन
    RBC, WBC व प्लेटलेट्स तीनों मौजूदमुख्यतः लिंफोसाइट (WBC का एक प्रकार) मौजूद
    प्रोटीन की मात्रा अधिकप्रोटीन की मात्रा कम
    बंद रक्त वाहिनियों में बहता हैलसीका वाहिनियों में बहता है
    ऑक्सीजन व CO₂ का मुख्य परिवहन करता हैवसा, पोषक पदार्थ व हार्मोन का संवहन करता है
    प्रश्न 6 दोहरे परिसंचरण से क्या तात्पर्य है? इसकी क्या महत्ता है?
    उत्तर

    दोहरा परिसंचरण उस व्यवस्था को कहते हैं, जिसमें रक्त हृदय से होकर दो अलग-अलग, स्वतंत्र पथों से गुजरता है — फुफ्फुसीय परिसंचरण (हृदय से फेफड़ों तक और वापस) तथा दैहिक परिसंचरण (हृदय से शरीर के बाकी ऊतकों तक और वापस) — और इस दौरान ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त कभी आपस में मिश्रित नहीं होता (जैसा कि पक्षियों, स्तनधारियों तथा मगरमच्छ में होता है)।

    इसकी महत्ता यह है कि इससे ऊतकों को पूरी तरह ऑक्सीजनयुक्त रक्त मिलता है (मिश्रण न होने के कारण), जिससे शरीर की कोशिकाओं को अधिक कुशलता से ऑक्सीजन उपलब्ध हो पाती है — यही कारण है कि उच्च चयापचय दर वाले प्राणी (पक्षी, स्तनधारी) दोहरे परिसंचरण के जरिए अपनी ऊर्जा-मांग पूरी कर पाते हैं।

    प्रश्न 7 भेद स्पष्ट करें —
    (क) रक्त एवं लसीका (ख) खुला व बंद परिसंचरण तंत्र (ग) प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन (घ) P तरंग तथा T तरंग
    उत्तर

    (क) रक्त एवं लसीका: रक्त लाल रंग का, प्रोटीन-समृद्ध तथा RBC/WBC/प्लेटलेट्स युक्त होता है, जबकि लसीका रंगहीन, कम प्रोटीन वाला तथा मुख्यतः लिंफोसाइट युक्त होता है।

    (ख) खुला व बंद परिसंचरण तंत्र: खुले तंत्र (आर्थोपोडा, मोलस्का) में रक्त सीधे शरीर के खुले स्थानों (कोटरों/देहगुहा) में बहता है, जबकि बंद तंत्र (एनेलिडा, कशेरुकी) में रक्त हमेशा बंद वाहिनियों के जाल में ही बहता है, जिससे प्रवाह अधिक नियंत्रित व कुशल होता है।

    (ग) प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन: प्रकुंचन (सिस्टोल) हृदय की पेशियों का संकुचन है, जिससे रक्त बाहर धकेला जाता है; अनुशिथिलन (डायस्टोल) पेशियों का शिथिलन है, जिस दौरान कक्ष रक्त से भरते हैं।

    (घ) P तरंग तथा T तरंग: P तरंग अलिंद के विध्रुवण (उद्दीपन) को दर्शाती है, जिससे अलिंद संकुचन होता है; T तरंग निलय के उत्तेजना से सामान्य अवस्था में वापस लौटने (पुनर्ध्रुवण) को दर्शाती है।

    प्रश्न 8 कशेरुकी के हृदयों में विकासीय परिवर्तनों का वर्णन करें।
    उत्तर

    कशेरुकियों में हृदय की संरचना विकास (evolution) के क्रम में सरल से जटिल होती गई है। मछलियों में सबसे सरल दो-कक्षीय हृदय (एक अलिंद, एक निलय) होता है, जिससे केवल एकल परिसंचरण संभव है। उभयचरों तथा अधिकांश सरीसृपों में तीन-कक्षीय हृदय (दो अलिंद, एक निलय) विकसित हुआ, जिससे अपूर्ण दोहरा परिसंचरण होता है — यहाँ ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त निलय में कुछ हद तक मिश्रित हो जाता है। मगरमच्छ, पक्षियों तथा स्तनधारियों में सबसे विकसित चार-कक्षीय हृदय (दो अलिंद, दो निलय) पाया जाता है, जिसमें पूर्ण विभाजन के कारण ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त पूरी तरह अलग रहता है, जिससे कुशल पूर्ण दोहरा परिसंचरण संभव होता है।

    प्रश्न 9 हम अपने हृदय को पेशीजनक (मायोजेनिक) क्यों कहते हैं?
    उत्तर

    हृदय को पेशीजनक (मायोजेनिक) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी धड़कन की शुरुआत बाहरी तंत्रिकीय उत्तेजना से नहीं होती — बल्कि हृदय की अपनी विशेष पेशी ऊतक (नोडल ऊतक, विशेषकर SAN) स्वयं ही, बिना किसी बाहरी संकेत के, लयबद्ध क्रियाविभव पैदा करने में सक्षम होती है (इसे स्वउत्तेजनशील या ऑटोएक्साइटेबल कहा जाता है)। यानी हृदय की धड़कन का स्रोत स्वयं हृदय की पेशी ही है, इसीलिए इसे "पेशी से उत्पन्न होने वाला" या पेशीजनक कहते हैं — तंत्रिका तंत्र केवल इसकी गति को घटा-बढ़ा सकता है, पर धड़कन शुरू करने के लिए तंत्रिका संकेत की जरूरत नहीं पड़ती।

    प्रश्न 10 शिरा अलिंद पर्व (कोटरालिंद गाँठ SAN) को हृदय का गति प्रेरक (पेशमेकर) क्यों कहा जाता है?
    उत्तर

    शिराअलिंद पर्व (SAN) को हृदय का गति प्रेरक (पेसमेकर) इसलिए कहा जाता है, क्योंकि नोडल ऊतक के सभी भागों में से यही सबसे अधिक संख्या में क्रियाविभव पैदा करता है — प्रति मिनट लगभग 70–75 बार। चूँकि यह हृदय के सभी नोडल भागों में सबसे तेज गति से क्रियाविभव पैदा करता है, इसलिए यही हृदय की पूरी लयबद्ध धड़कन (स्पंदन) की गति और लय को निर्धारित करता है — बाकी पूरा नोडल ऊतक (AVN, AV बंडल, पुरकिंजे तंतु) इसी के संकेत के पीछे-पीछे चलता है। इसीलिए इसे हृदय की गति निर्धारित करने वाला "गति प्रेरक" कहा जाता है।

    प्रश्न 11 अलिंद निलय गाँठ (AVN) तथा आलिंद निलय बंडल (AVB) का हृदय के कार्य में क्या महत्व है।
    उत्तर

    अलिंद निलय गाँठ (AVN) SAN से उत्पन्न क्रियाविभव को प्राप्त करती है और उसे आगे निलयों तक पहुँचाने का काम करती है — यह एक तरह से "रिले स्टेशन" की भूमिका निभाती है, जिससे अलिंद के संकुचन के तुरंत बाद (एक छोटे विलंब के साथ) निलय का संकुचन शुरू होता है, ताकि अलिंद पहले पूरी तरह रक्त निलय में भेज सके।

    अलिंद निलय बंडल (AVB / हिज का बंडल) AVN से क्रियाविभव को आगे अंतर-निलयी पट से होते हुए दोनों निलयों की पेशियों तक तेजी से पहुँचाता है, जहाँ से यह पुरकिंजे तंतुओं द्वारा फैलकर पूरे निलयी पेशीविन्यास में एक साथ, समन्वित संकुचन सुनिश्चित करता है। इस तरह AVN व AVB दोनों मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि अलिंद व निलय का संकुचन ठीक क्रम और समय पर, समन्वित ढंग से हो — जो हृदय के प्रभावी पंपिंग कार्य के लिए बेहद जरूरी है।

    प्रश्न 12 हृद चक्र तथा हृदनिकास को परिभाषित करें?
    उत्तर

    हृद चक्र (Cardiac Cycle): एक हृदय स्पंदन के आरंभ से दूसरे स्पंदन के आरंभ (एक संपूर्ण हृदय स्पंदन) के बीच के घटनाक्रम को हृद चक्र कहते हैं, जिसमें दोनों अलिंदों तथा दोनों निलयों का प्रकुंचन एवं अनुशिथिलन सम्मिलित होता है — यह लगभग 0.8 सेकंड में पूरा होता है।

    हृद निकास (Cardiac Output): हृदय के निलय द्वारा प्रति मिनट पंप किए गए रक्त की कुल मात्रा को हृद निकास कहते हैं। यह प्रवाह/स्ट्रोक आयतन (प्रति धड़कन पंप हुआ रक्त, लगभग 70 मिली) और हृदय दर (प्रति मिनट धड़कनों की संख्या) के गुणनफल के बराबर होता है — औसतन यह लगभग 5 लीटर प्रति मिनट होता है।

    प्रश्न 13 हृदय ध्वनियों की व्याख्या करें।
    उत्तर

    हृद चक्र के दौरान दो प्रमुख ध्वनियाँ स्टेथेस्कोप से सुनी जा सकती हैं। पहली ध्वनि ("लब") निलयी प्रकुंचन की शुरुआत में त्रिवलनी (ट्राइकसपिड) व द्विवलनी (मिट्रल) कपाटों के अचानक बंद होने से उत्पन्न होती है। दूसरी ध्वनि ("डब") निलयी अनुशिथिलन की शुरुआत में अर्ध चंद्रकपाटों (सेमील्यूनर वाल्व — जो फुफ्फुसीय धमनी व महाधमनी पर स्थित हैं) के बंद होने से उत्पन्न होती है। इन दोनों ध्वनियों का चिकित्सीय महत्व यह है कि इनमें किसी असामान्यता (जैसे बड़बड़ाहट या मर्मर) से हृदय के कपाटों में खराबी या अन्य हृदय संबंधी समस्याओं का संकेत मिल सकता है।

    प्रश्न 14 एक मानक ECG को दर्शाएं तथा उसके विभिन्न खंडों का वर्णन करें।
    उत्तर

    एक मानक ECG में तीन मुख्य तरंगें/खंड होते हैं (चित्र 15.3 देखें):

    • P तरंग: आलिंद के उद्दीपन/विध्रुवण को दर्शाती है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों अलिंदों का संकुचन (अलिंद प्रकुंचन) होता है।
    • QRS सम्मिश्र: निलय के विध्रुवण को दर्शाता है, जो निलय के संकुचन (निलयी प्रकुंचन) को आरंभ करता है — यह संकुचन Q तरंग के तुरंत बाद शुरू होता है।
    • T तरंग: निलय के उत्तेजित अवस्था से पुनः सामान्य (विश्राम) अवस्था में लौटने यानी पुनर्ध्रुवण को दर्शाती है। T तरंग का अंत निलयी प्रकुंचन अवस्था की समाप्ति का संकेत है।

    किसी निश्चित समय में QRS सम्मिश्र की संख्या गिनकर हृदय स्पंदन दर निकाली जा सकती है, और इस आकृति में कोई भी असामान्य बदलाव हृदय संबंधी किसी संभावित समस्या का संकेत देता है — इसीलिए ECG का चिकित्सीय महत्व बहुत अधिक है।

    NEET फोकस इस अध्याय के वे तथ्य जो NEET में पूछे जा सकते हैं

    यह अध्याय NEET का सर्वाधिक स्कोरिंग व बार-बार पूछा जाने वाला भाग है — हर वर्ष 2-3 प्रश्न सीधे इसी अध्याय से आते हैं। नीचे दिए गए बिंदुओं को ठीक से समझें व रटें।

    प्लाज्मा व इसके प्रोटीन

    • प्लाज्मा रक्त आयतन का लगभग 55% तथा संगठित पदार्थ लगभग 45% होते हैं।NEET
    • तीन मुख्य प्लाज्मा प्रोटीन — फाइब्रिनोजन (स्कंदन), ग्लोबुलिन (प्रतिरक्षा/रक्षा तंत्र), एल्बूमिन (परासरणी संतुलन) — इनका मिलान बार-बार पूछा जाता है।NEET
    • स्कंदन कारकों (क्लॉटिंग फैक्टर्स) रहित प्लाज्मा को सीरम कहते हैं — "सीरम बनाम रक्त" अंतर एक क्लासिक प्रश्न है।NEET

    RBC, WBC व प्लेटलेट्स के आँकड़े (संख्याएँ याद रखें)

    • RBC संख्या: 5–5.5 मिलियन/घन मिमी; ये उभयावतल, बिना केंद्रक (एन्यूक्लिएट) होती हैं — इसका कारण है कि पूरा आंतरिक स्थान ऑक्सीजन परिवहन हेतु उपलब्ध रहे।NEET
    • हीमोग्लोबिन: 12–16 ग्राम प्रति 100 मिली रक्त; RBC का औसत जीवनकाल 120 दिन; इनका विनाश प्लीहा (स्प्लीन) में होता है — इसीलिए प्लीहा को "RBC का कब्रिस्तान (ग्रेवयार्ड)" कहा जाता है।NEET
    • WBC संख्या: 6000–8000/घन मिमी। कणिकाणु — न्यूट्रोफिल (60–65%, सर्वाधिक, भक्षक), इओसिनोफिल (2–3%, एलर्जी/संक्रमण प्रतिरोधन), बेसोफिल (0.5–1%, हिस्टामिन-सिरोटोनिन-हिपैरिन स्रावी, शोथकारी)। अकणिकाणु — लिंफोसाइट (20–25%, प्रतिरक्षा), मोनोसाइट (6–8%, भक्षक)।NEET
    • बेसोफिल सबसे कम संख्या में पाई जाने वाली WBC है (सर्वाधिक नहीं); ये कणिकाणु (ग्रेन्यूलोसाइट) हैं, अकणिकाणु नहीं।NEET
    • प्लेटलेट्स (थ्रोम्बोसाइट): 1.5–3.5 लाख/घन मिमी; ये मेगाकेरियोसाइट के विखंडन से बनती हैं; इनकी कमी से स्कंदन विकृति व अत्यधिक रक्तस्राव होता है।NEET

    रक्त समूह (ABO व Rh) — बहुत उच्च-आवृत्ति टॉपिक

    • रक्त समूह O सर्वदाता है (RBC पर कोई प्रतिजन नहीं, इसलिए किसी को भी दिया जा सकता है, पर प्लाज्मा में एंटी-A व एंटी-B दोनों प्रतिरक्षी उपस्थित होते हैं)।NEET
    • रक्त समूह AB सर्व आदाता (ग्राही) है — RBC पर A व B दोनों प्रतिजन, पर प्लाज्मा में कोई प्रतिरक्षी नहीं (इसीलिए किसी से भी रक्त ले सकता है)।NEET
    • Rh प्रतिजन लगभग 80% मनुष्यों में पाया जाता है; रक्त-आदान-प्रदान से पहले ABO के साथ-साथ Rh का मिलान भी अनिवार्य है।NEET
    • इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटैलिस तब होता है जब माता Rh-ve तथा भ्रूण Rh+ve हो (इसका उल्टा नहीं) — यह पहले प्रसव में सामान्यतः सुरक्षित रहता है, पर परवर्ती गर्भधारण में जोखिम पैदा करता है। बचाव हेतु प्रथम प्रसव के तुरंत बाद माता को Rh प्रतिरक्षी दी जाती है।NEET

    रक्त-स्कंदन (क्लॉटिंग)

    • क्रम याद रखें: निष्क्रिय प्रोथ्रोम्बिन → (थ्रोंबोकाइनेज द्वारा) सक्रिय थ्रोम्बिन → थ्रोम्बिन की सहायता से फाइब्रिनोजन से फाइब्रिन (थक्का) का निर्माण।NEET
    • स्कंदन प्रक्रिया में कैल्सियम आयन (Ca²⁺) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है — यह लगभग हर वर्ष पूछा जाता है।NEET

    लसीका (लिंफ)

    • लसीका रंगहीन द्रव है, जिसमें मुख्यतः लिंफोसाइट होते हैं; यह पोषक पदार्थ, हार्मोन के संवहन व आंत्र अंकुर से वसा (लैक्टियल के जरिए) के अवशोषण में सहायक है।NEET
    • रक्त की तुलना में लसीका में प्रोटीन की मात्रा कम होती है — "सीरम बनाम लसीका बनाम रक्त" जैसे भ्रमित करने वाले प्रश्न आते हैं।NEET

    परिसंचरण के प्रकार व कशेरुकी हृदय का विकास

    • खुला परिसंचरण — आर्थ्रोपोडा व मोलस्का; बंद परिसंचरण — ऐनेलिडा व सभी कशेरुकी।NEET
    • मछली: 2-कक्षीय हृदय (1 अलिंद+1 निलय) → एकल परिसंचरण। उभयचर व सरीसृप (मगरमच्छ छोड़कर): 3-कक्षीय (2 अलिंद+1 निलय) → अपूर्ण दोहरा परिसंचरण (निलय में रक्त मिश्रण)। मगरमच्छ, पक्षी, स्तनधारी: 4-कक्षीय (2+2) → पूर्ण दोहरा परिसंचरण (कोई मिश्रण नहीं)।NEET

    मानव हृदय — कपाट, नोडल ऊतक व चालन तंत्र (हर वर्ष पूछा जाता है)

    • दाहिना अलिंद-निलय द्वार — त्रिवलनी (ट्राइकसपिड) कपाट; बायाँ अलिंद-निलय द्वार — द्विवलनी (मिट्रल/बाइकसपिड) कपाट; फुफ्फुसीय धमनी व महाधमनी के निकास पर — अर्धचंद्र (सेमील्यूनर) कपाटNEET
    • चालन क्रम याद रखें: SAN → AVN → अलिंद-निलय बंडल (हिज का बंडल) → बंडल शाखाएँ → पुरकिंजे तंतुNEET
    • SAN सबसे अधिक क्रियाविभव उत्पन्न करता है — 70–75 प्रति मिनट — इसीलिए इसे "गति प्रेरक (पेसमेकर)" कहा जाता है; हृदय पेशीजनक (मायोजेनिक) है क्योंकि इसकी धड़कन स्वयं हृदय-पेशी (नोडल ऊतक) से उत्पन्न होती है, बाहरी तंत्रिका संकेत से नहीं।NEET

    हृद चक्र, हृद ध्वनियाँ व ECG — संख्यात्मक प्रश्नों के लिए सूत्र

    • एक हृद चक्र ≈ 0.8 सेकंड; हृदय दर ≈ 72/मिनट; प्रवाह/स्ट्रोक आयतन ≈ 70 मिली; हृद निकास (Cardiac Output) = स्ट्रोक आयतन × हृदय दर ≈ 5 लीटर/मिनट — यह सूत्र संख्यात्मक प्रश्नों में सीधे उपयोग होता है।NEET
    • प्रथम ध्वनि "लब" — त्रिवलनी व द्विवलनी कपाट बंद होने से (निलयी प्रकुंचन के आरंभ में); द्वितीय ध्वनि "डब" — अर्धचंद्र कपाट बंद होने से (निलयी अनुशिथिलन के आरंभ में)।NEET
    • ECG की तीन तरंगें — P तरंग (अलिंद विध्रुवण/संकुचन), QRS सम्मिश्र (निलय विध्रुवण/संकुचन का आरंभ), T तरंग (निलय पुनर्ध्रुवण/विश्राम)। T-P अंतराल में हृद-पेशियाँ विद्युतीय रूप से शांत (silent) रहती हैं।NEET

    दोहरा परिसंचरण, यकृत निवाहिका तंत्र व हृद-नियमन

    • फुफ्फुसीय परिसंचरण — दायाँ निलय → फेफड़े → बायाँ अलिंद (यहाँ रक्त ऑक्सीजनित होता है)। दैहिक परिसंचरण — बायाँ निलय → शरीर के ऊतक → दायाँ अलिंद।NEET
    • यकृत निवाहिका तंत्र (हिपेटिक पोर्टल सिस्टम) — आहार नाल (आंत्र) व यकृत के बीच का अनूठा संवहनी संबंध, जिसमें रक्त सामान्य परिसंचरण में जाने से पहले यकृत से होकर गुजरता है।NEET
    • अनुकंपी तंत्रिका संकेत — हृद निकास बढ़ाते हैं; परानुकंपी तंत्रिका संकेत — हृद निकास घटाते हैं; अधिवृक्क मध्यांश (एड्रीनल मेड्यूला) का हार्मोन भी हृद निकास बढ़ा सकता है।NEET

    परिसंचरण संबंधी विकृतियाँ

    • सामान्य रक्तचाप 120/80; बार-बार 140/90 या अधिक पर उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) माना जाता है।NEET
    • हृद-धमनी रोग (CAD/एथिरोस्क्लेरोसिस) — धमनियों में कैल्सियम, वसा व रेशीय ऊतक जमने से अवकाशिका संकरी होना; हृदशूल (एंजाइना) — हृद-पेशी को अपर्याप्त ऑक्सीजन आपूर्ति से सीने में दर्द; हृदपात — हृदय द्वारा शरीर की माँग अनुसार रक्त आपूर्ति न कर पाना (हृदघात से भिन्न)।NEET

    NEET PYQs NEET परीक्षा में अब तक पूछे गए प्रश्न (Previous Year Questions)

    इस अध्याय (शरीर द्रव तथा परिसंचरण) से NEET/AIPMT परीक्षा में अब तक पूछे गए प्रश्न — यह चैप्टर NEET जीव विज्ञान के सर्वाधिक प्रश्न-घनत्व वाले अध्यायों में से एक है। हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।

    AIPMT 2001 रक्त समूह O के लिए क्या सही है?
    (अ) कोई प्रतिजन नहीं, पर a व b दोनों प्रतिरक्षी उपस्थित   (ब) A प्रतिजन व b प्रतिरक्षी उपस्थित   (स) प्रतिजन व प्रतिरक्षी दोनों अनुपस्थित   (द) A व B दोनों प्रतिजन तथा a, b दोनों प्रतिरक्षी उपस्थित

    उत्तर: (अ) कोई प्रतिजन नहीं, पर दोनों प्रतिरक्षी (एंटी-A व एंटी-B) उपस्थित होते हैं। यही कारण है कि रक्त समूह O की RBC पर कोई प्रतिजन न होने से इसे किसी को भी दिया जा सकता है (सर्वदाता), परंतु इसके प्लाज्मा में दोनों प्रतिरक्षी होने के कारण यह केवल O समूह से ही रक्त ले सकता है।

    AIPMT 2000 WBC के लिए कौन-सा कथन सत्य है?
    (अ) अकेंद्रकी होती हैं   (ब) कमी होने पर कैंसर होता है   (स) थाइमस में निर्मित होती हैं   (द) रुधिर कोशिकाओं (कोशिकाओं) से होकर निचुड़ सकती हैं

    उत्तर: (द) ये रक्त कोशिकाओं (कोशिकाओं) से होकर निचुड़ सकती हैं (डायपेडेसिस)। WBC में केंद्रक उपस्थित होता है (अ गलत); ये मुख्यतः अस्थि मज्जा में बनती हैं, केवल लिंफोसाइट का एक भाग थाइमस में परिपक्व होता है (स भ्रामक); WBC की विशेष क्षमता है कि वे केशिकाओं की दीवार से होकर ऊतकों में जा सकती हैं, जिसे डायपेडेसिस कहते हैं।

    AIPMT 2012 Mains मानव के किस अंग को RBC का "कब्रिस्तान (ग्रेवयार्ड)" कहा जाता है?
    (अ) यकृत   (ब) प्लीहा   (स) अस्थि मज्जा   (द) वृक्क

    उत्तर: (ब) प्लीहा (स्प्लीन)। RBC का औसत जीवनकाल लगभग 120 दिन होता है, जिसके बाद इनका विनाश मुख्यतः प्लीहा में होता है — इसीलिए प्लीहा को RBC का कब्रिस्तान कहा जाता है।

    AIPMT 2003 ABO रक्त समूह तंत्र में, यदि दोनों प्रतिजन उपस्थित हों पर कोई प्रतिरक्षी न हो, तो व्यक्ति का रक्त समूह क्या होगा?
    (अ) A   (ब) B   (स) AB   (द) O

    उत्तर: (स) AB। AB रक्त समूह में RBC की सतह पर A व B दोनों प्रतिजन उपस्थित होते हैं, परंतु प्लाज्मा में इनके विरुद्ध कोई प्रतिरक्षी नहीं होती — यही कारण है कि AB समूह वाला व्यक्ति किसी भी समूह से रक्त ग्रहण कर सकता है (सर्व आदाता)।

    NEET 2017 वयस्क मानव RBC अकेंद्रकी (enucleate) होती हैं। निम्न में से इसका सर्वाधिक उपयुक्त स्पष्टीकरण कौन-सा है?
    (1) इन्हें प्रजनन की आवश्यकता नहीं होती   (2) ये कायिक (सोमैटिक) कोशिकाएँ हैं   (3) ये उपापचय (मेटाबोलाइज़) नहीं करतीं   (4) इनका पूरा आंतरिक स्थान ऑक्सीजन परिवहन हेतु उपलब्ध रहता है

    उत्तर: (4) इनका पूरा आंतरिक स्थान ऑक्सीजन परिवहन हेतु उपलब्ध रहता है। केंद्रक की अनुपस्थिति से कोशिका के भीतर अधिक स्थान हीमोग्लोबिन व ऑक्सीजन-वहन हेतु उपलब्ध हो जाता है, जिससे RBC ऑक्सीजन परिवहन के अपने कार्य में अधिक कुशल बन जाती है — यही इस विशेषता का सबसे सटीक जैविक कारण है।

    NEET 2017 यकृत निवाहिका शिरा (हिपेटिक पोर्टल वेन) रक्त को यकृत तक कहाँ से लाती है?
    (अ) वृक्क से   (ब) आमाशय व आंत्र से   (स) फेफड़ों से   (द) हृदय से

    उत्तर: (ब) आमाशय व आंत्र (आहार नाल) से। यकृत निवाहिका तंत्र एक अनूठी संवहनी व्यवस्था है, जिसमें आंत्र से अवशोषित पोषक पदार्थों से युक्त रक्त सामान्य परिसंचरण में मिलने से पहले यकृत में होकर गुजरता है, जहाँ इसका संसाधन (प्रोसेसिंग) होता है।

    NEET 2018 स्तंभ I का स्तंभ II से मिलान करें — प्लाज्मा प्रोटीन
    A. फाइब्रिनोजन   B. ग्लोबुलिन   C. एल्बूमिन  |  (i) परासरणी संतुलन   (ii) रक्त-स्कंदन   (iii) रक्षा तंत्र (डिफेंस)

    उत्तर: A–(ii) रक्त-स्कंदन, B–(iii) रक्षा तंत्र, C–(i) परासरणी संतुलन। यह ठीक वही तथ्य है जो अध्याय के प्लाज्मा-प्रोटीन खंड में बताया गया है — फाइब्रिनोजन स्कंदन में, ग्लोबुलिन प्रतिरक्षा में, तथा एल्बूमिन परासरणी संतुलन बनाए रखने में सहायक है।

    NEET 2018 स्तंभ I का स्तंभ II से मिलान करें — हृदय कपाट
    A. त्रिवलनी कपाट   B. द्विवलनी कपाट   C. अर्धचंद्र कपाट  |  (i) बाएँ अलिंद व बाएँ निलय के बीच   (ii) दाएँ निलय व फुफ्फुसीय धमनी के बीच   (iii) दाएँ अलिंद व दाएँ निलय के बीच

    उत्तर: A–(iii) दाएँ अलिंद-निलय के बीच, B–(i) बाएँ अलिंद-निलय के बीच, C–(ii) दाएँ निलय-फुफ्फुसीय धमनी के बीच। कपाटों के स्थान को उनके नाम के साथ ठीक से जोड़ना इस अध्याय का एक बार-बार दोहराया जाने वाला प्रश्न-प्रकार है।

    NEET 2019 यदि हृद निकास 5 लीटर है, निलय में अनुशिथिलन (डायस्टोल) के अंत में रक्त आयतन 100 मिली तथा निलयी प्रकुंचन (सिस्टोल) के अंत में 50 मिली है, तो हृदय दर क्या होगी?

    उत्तर: 100 धड़कन प्रति मिनट। स्ट्रोक आयतन = डायस्टोल अंत आयतन − सिस्टोल अंत आयतन = 100 − 50 = 50 मिली। चूँकि हृद निकास = स्ट्रोक आयतन × हृदय दर, इसलिए हृदय दर = हृद निकास ÷ स्ट्रोक आयतन = 5000 मिली ÷ 50 मिली = 100 प्रति मिनट

    NEET 2021 AB रक्त समूह वाले व्यक्तियों को "सर्व आदाता (यूनिवर्सल रेसिपिएंट)" क्यों कहा जाता है?

    उत्तर: क्योंकि उनके प्लाज्मा में A व B, किसी भी प्रतिजन के विरुद्ध कोई प्राकृतिक प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) उपस्थित नहीं होती। चूँकि कोई प्रतिरक्षी न होने से किसी भी रक्त समूह (A, B, AB या O) से प्राप्त प्रतिजन के विरुद्ध प्रतिरक्षा-अभिक्रिया नहीं होती, इसलिए AB समूह वाला व्यक्ति किसी से भी रक्त ग्रहण कर सकता है।

    NEET 2021 निष्क्रिय फाइब्रिनोजन को फाइब्रिन में बदलने के लिए कौन-सा एंजाइम उत्तरदायी है?
    (अ) थ्रोंबोकाइनेज   (ब) प्रोथ्रोम्बिन   (स) थ्रोम्बिन   (द) हिपैरिन

    उत्तर: (स) थ्रोम्बिन। स्कंदन-श्रृंखला का क्रम है — निष्क्रिय प्रोथ्रोम्बिन को थ्रोंबोकाइनेज सक्रिय थ्रोम्बिन में बदलता है, तथा यही सक्रिय थ्रोम्बिन एंजाइम फाइब्रिनोजन को फाइब्रिन (थक्के के धागे) में परिवर्तित करता है।

    NEET 2022 (II) आहार नाल तथा यकृत के बीच का अनूठा संवहनी संबंध क्या कहलाता है?

    उत्तर: यकृत निवाहिका तंत्र (हिपेटिक पोर्टल सिस्टम)। इस विशेष व्यवस्था में यकृत निवाहिका शिरा आंत्र से अवशोषित पदार्थों से युक्त रक्त को सामान्य परिसंचरण में प्रवेश करने से पहले यकृत तक पहुँचाती है, जहाँ इसका प्रसंस्करण होता है।

    NEET 2023 बेसोफिल के संदर्भ में निम्न कथनों में से कौन-से सही हैं? A. बेसोफिल कुल WBC में सर्वाधिक प्रचुर कोशिकाएँ हैं B. बेसोफिल हिस्टामिन, सिरोटोनिन व हिपैरिन स्रावित करते हैं C. बेसोफिल शोथकारी (इंफ्लेमेटरी) अनुक्रिया में भाग लेते हैं D. बेसोफिल का केंद्रक वृक्काकार (किडनी के आकार का) होता है E. बेसोफिल अकणिकाणु (एग्रेन्यूलोसाइट) होते हैं

    उत्तर: केवल B व C सही हैं। बेसोफिल वास्तव में WBC में सबसे कम मात्रा (0.5–1%) में पाए जाते हैं, सर्वाधिक नहीं (न्यूट्रोफिल सर्वाधिक हैं) — इसलिए A गलत है। बेसोफिल कणिकाणु (ग्रेन्यूलोसाइट) होते हैं, अकणिकाणु नहीं — इसलिए E भी गलत है, तथा इनका केंद्रक वृक्काकार नहीं होता (यह मोनोसाइट की विशेषता है) — इसलिए D भी गलत है। हिस्टामिन-सिरोटोनिन-हिपैरिन स्राव व शोथकारी क्रिया में भागीदारी (B, C) ही बेसोफिल के सही लक्षण हैं।

    NEET 2024 हृदय में क्रियाविभव के चालन-पथ के चरणों को सही क्रम में व्यवस्थित करें: A. अलिंद-निलय बंडल B. पुरकिंजे तंतु C. अलिंद-निलय गाँठ D. बंडल शाखाएँ E. शिरा-अलिंद गाँठ

    उत्तर: E → C → A → D → B अर्थात् शिरा-अलिंद गाँठ (SAN) → अलिंद-निलय गाँठ (AVN) → अलिंद-निलय बंडल (हिज का बंडल) → बंडल शाखाएँ → पुरकिंजे तंतु। यही हृदय में विद्युतीय संकेत के संचालन का सही मार्ग है, जिससे अलिंद व निलय का संकुचन ठीक क्रम व समय पर होता है।

    RE-NEET 2026 एक स्वस्थ मनुष्य में शिरा-अलिंद गाँठ (SAN) द्वारा प्रति मिनट कितने क्रियाविभव उत्पन्न किए जाते हैं?
    (अ) 120–140   (ब) 28–30   (स) 70–75   (द) 100–110

    उत्तर: (स) 70–75 प्रति मिनट। नोडल ऊतक के सभी भागों में SAN सर्वाधिक संख्या में क्रियाविभव उत्पन्न करता है, इसीलिए यह हृदय की संपूर्ण लय व गति को निर्धारित करता है तथा इसे "गति प्रेरक (पेसमेकर)" कहा जाता है।

    RE-NEET 2026 दाएँ अलिंद व दाएँ निलय के बीच के द्वार की रखवाली किसके द्वारा की जाती है?
    (अ) शिरा-अलिंद गाँठ   (ब) द्विवलनी कपाट   (स) त्रिवलनी कपाट   (द) अर्धचंद्र कपाट

    उत्तर: (स) त्रिवलनी (ट्राइकसपिड) कपाट। यह तीन पेशी-पल्लवों से बना कपाट दाएँ अलिंद व दाएँ निलय के बीच के द्वार पर स्थित होता है तथा रक्त को केवल एक ही दिशा (अलिंद से निलय की ओर) में बहने देता है।

    NEET 2026 किसी व्यक्ति के रक्त नमूने में WBC की संख्या 8000/घन मिमी है। इसी नमूने में इओसिनोफिल व लिंफोसाइट लगभग कितनी संख्या में होंगी?
    (अ) 300–500 व 1200–1500/घन मिमी   (ब) 160–240 व 1600–2000/घन मिमी   (स) 300–500 व 500–700/घन मिमी   (द) 100–120 व 160–200/घन मिमी

    उत्तर: (ब) 160–240/घन मिमी (इओसिनोफिल) व 1600–2000/घन मिमी (लिंफोसाइट)। इओसिनोफिल कुल WBC का 2–3% होते हैं (8000 का 2–3% = 160–240), जबकि लिंफोसाइट कुल WBC का 20–25% होते हैं (8000 का 20–25% = 1600–2000) — यह प्रतिशत-आधारित संख्यात्मक प्रश्न WBC के अनुपात याद रखने की परीक्षा लेता है।

    NEET 2026 Rh समूह के संदर्भ में असत्य कथन चुनें: A. इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटैलिस तब देखी जाती है जब भ्रूण का रक्त Rh−ve तथा माता का रक्त Rh+ve हो B. अधिकांश मनुष्यों की RBC पर Rh प्रतिजन उपस्थित होता है C. रक्त-आदान से पहले Rh समूह का भी मिलान होना चाहिए D. Rh असंगति तब देखी जाती है जब गर्भवती माता Rh−ve तथा भ्रूण Rh+ve हो E. दूसरे शिशु के जन्म के तुरंत बाद माता को एंटी-Rh प्रतिरक्षी देकर इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटैलिस से बचा जा सकता है

    उत्तर: A व E असत्य हैं। वास्तविक स्थिति इसके विपरीत है — इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटैलिस तब होती है जब माता Rh−ve व भ्रूण Rh+ve हो (कथन A में यह उल्टा है, इसलिए गलत)। साथ ही, एंटी-Rh प्रतिरक्षी पहले शिशु के जन्म के तुरंत बाद दी जाती है (ताकि दूसरी गर्भावस्था सुरक्षित रहे), न कि दूसरे शिशु के जन्म के बाद — इसलिए कथन E भी गलत है। कथन B, C व D सही तथ्य दर्शाते हैं।

    अन्य NEET संबंधित तथ्य

    परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

    महत्वपूर्ण
    • यह अध्याय (शरीर द्रव तथा परिसंचरण) NEET में लगभग हर वर्ष 2-3 प्रश्न देता है, तथा इसमें सबसे अधिक बार दोहराया जाने वाला प्रारूप संख्यात्मक (numerical) गणनास्तंभ-सुमेलन (match the following) है — हृद निकास, हृद चक्र-अवधि व WBC प्रतिशत पर आधारित सवाल हर 1-2 वर्ष में दोहराए जाते हैं।
    तथ्य
    • एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य में कुल रक्त-आयतन लगभग 5–5.5 लीटर होता है, जो शरीर के कुल भार का लगभग 7–8% होता है।
    • PCV (पैक्ड सेल वॉल्यूम / हिमैटोक्रिट) मुख्यतः रक्त में केवल RBC के आयतन-प्रतिशत को दर्शाता है, न कि सभी संगठित पदार्थों (WBC व प्लेटलेट्स) के — क्योंकि WBC व प्लेटलेट्स का योगदान इसमें नगण्य होता है। इस सूक्ष्म अंतर को अक्सर विकल्पों में ट्रैप की तरह प्रयोग किया जाता है।
    तुलनात्मक
    • एनीमिया बनाम पॉलिसाइथीमिया — एनीमिया में RBC संख्या या हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम हो जाती है, जबकि पॉलिसाइथीमिया में RBC संख्या असामान्य रूप से बढ़ जाती है (जैसे अधिक ऊँचाई वाले स्थानों पर रहने वाले लोगों में ऑक्सीजन की कमी की भरपाई हेतु देखा जाता है) — दोनों शब्दों को उल्टा-सीधा जोड़ना एक सामान्य त्रुटि है।
    तथ्य
    • एरिथ्रोपोइसिस (RBC निर्माण) — वयस्क मनुष्य में लाल अस्थिमज्जा (रेड बोन मैरो) में होता है, जबकि भ्रूणीय अवस्था (गर्भ) में यह कार्य मुख्यतः यकृत व प्लीहा द्वारा किया जाता है।
    तथ्य
    • रक्त समूह की शब्दावली याद रखें — RBC की सतह पर उपस्थित प्रतिजनों को एग्लूटिनोजन तथा प्लाज्मा में उपस्थित प्रतिरक्षियों को एग्लूटिनिन कहा जाता है; इन्हीं के बीच अभिक्रिया से रक्त का थक्कारोहण (एग्लूटिनेशन) होता है, जो रक्त-आदान से पूर्व क्रॉस-मैचिंग का आधार है।
    तुलनात्मक
    • बॉम्बे फीनोटाइप (hh जीनोटाइप) वाले व्यक्तियों में H-प्रतिजन (पूर्ववर्ती अणु) की अनुपस्थिति के कारण, IA या IB एलील होने पर भी RBC पर A अथवा B प्रतिजन नहीं बन पाते — सामान्य जाँच में ये O समूह जैसे प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तविक O रक्त से भी इनका मेल नहीं खाता, ये केवल आपस में ही रक्त-आदान कर सकते हैं। यह एक उच्च-कठिनाई स्तर का ट्रैप-तथ्य है।
    तथ्य
    • हिपैरिन शरीर के भीतर मौजूद एक प्राकृतिक थक्कारोधी (एंटीकोऐगुलेंट) है, जो रक्त-वाहिकाओं के भीतर अनावश्यक स्कंदन को रोकता है, जबकि चोट लगने पर थ्रोंबोकाइनेज (थ्रोंबोप्लास्टिन) क्षतिग्रस्त ऊतक/प्लेटलेट्स से निकलकर स्कंदन-श्रृंखला को सक्रिय करता है — दोनों की भूमिका बिल्कुल विपरीत है, इन्हें भ्रमित न करें।
    तथ्य
    • विटामिन K यकृत में प्रोथ्रोम्बिन सहित कई स्कंदन कारकों (क्लॉटिंग फैक्टर्स) के संश्लेषण हेतु आवश्यक होता है — इसकी कमी से रक्त-स्कंदन की क्षमता प्रभावित होती है, यह एक बार-बार दोहराया जाने वाला अनुप्रयोग-आधारित (applied) तथ्य है।
    तथ्य
    • एक पूर्ण हृद चक्र (0.8 सेकंड) को विभाजित करके याद रखें — आलिंद प्रकुंचन ≈ 0.1 सेकंड, निलयी प्रकुंचन ≈ 0.3 सेकंड तथा संयुक्त अनुशिथिलन (जॉइंट डायस्टोल) ≈ 0.4 सेकंड — इन तीनों का योग ही 0.8 सेकंड की कुल अवधि देता है, जो संख्यात्मक प्रश्नों में सीधे पूछा जा सकता है।
    तुलनात्मक
    • SAN व AVN के स्थान में अंतर — कभी न उलझाएँ — शिरा-अलिंद गाँठ (SAN) दाएँ अलिंद की भित्ति में, महाशिरा (सुपीरियर वेना कावा) के खुलने वाले स्थान के निकट स्थित है; जबकि अलिंद-निलय गाँठ (AVN) दाएँ अलिंद के आधार पर, अलिंद-निलय पट (सेप्टम) के निकट स्थित होती है। इन दोनों के स्थान को उल्टा बताना एक बहुत सामान्य त्रुटि है।
    तथ्य
    • रक्तचाप को स्फिग्मोमैनोमीटर यंत्र से मापा जाता है तथा इसे mmHg इकाई में व्यक्त किया जाता है — सिस्टोलिक (प्रकुंचनी) दाब निलयी संकुचन के समय तथा डायस्टोलिक (अनुशिथिलनी) दाब निलयी विश्राम के समय दर्ज किया जाता है।
    तुलनात्मक
    • हृदशूल (एंजाइना) बनाम हृदपात (हार्ट फेल्योर) बनाम हृद-गति रुकना (कार्डियक अरेस्ट) — एंजाइना में हृद-पेशी को अस्थायी रूप से अपर्याप्त ऑक्सीजन मिलने से परिश्रम के समय सीने में दर्द होता है (प्रायः प्रतिवर्ती); हृदपात में हृदय शरीर की आवश्यकता अनुसार पर्याप्त रक्त पंप करने में असमर्थ रहता है (पर धड़कना बंद नहीं करता); जबकि कार्डियक अरेस्ट में हृदय की धड़कन पूर्णतः रुक जाती है, जो एक आपातकालीन स्थिति है — तीनों शब्दों को एक-दूसरे का पर्याय समझना एक सामान्य त्रुटि है।
    तथ्य
    • तंत्रिका-नियमन केवल हृदय-गति तक सीमित नहीं है — अनुकंपी तंत्रिका संकेत रक्त-वाहिकाओं में वाहिकासंकीर्णन (वैसोकॉन्स्ट्रिक्शन) उत्पन्न कर रक्तचाप बढ़ाते हैं, जबकि परानुकंपी तंत्रिका संकेत वाहिकाविस्फार (वैसोडाइलेशन) उत्पन्न कर रक्तचाप घटाते हैं।
    तुलनात्मक
    • यकृत निवाहिका शिरा (हिपेटिक पोर्टल वेन) बनाम यकृत शिरा (हिपेटिक वेन) — निवाहिका शिरा पोषक-युक्त रक्त को आंत्र से यकृत की ओर (अभिवाही) लाती है, जबकि यकृत शिरा संसाधित रक्त को यकृत से बाहर, पश्च महाशिरा (इनफीरियर वेना कावा) की ओर (अपवाही) ले जाती है — दोनों नाम एक जैसे लगने के कारण अक्सर भ्रमित कर देते हैं।
    तथ्य
    • प्लेटलेट्स की असामान्य कमी को थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कहते हैं, जिससे रक्त-स्कंदन बाधित होकर रक्तस्राव की प्रवृत्ति बढ़ जाती है — डेंगू जैसे संक्रमणों में यह स्थिति सामान्यतः देखी जाती है, जो प्लेटलेट्स के कार्य को अनुप्रयोग-आधारित प्रश्नों में जोड़ने का सामान्य तरीका है।
    तुलनात्मक
    • खुला परिसंचरण में रक्त की प्रकृति — आर्थ्रोपोडा व मोलस्का जैसे जंतुओं में हृदय से पंप हुआ रक्त वाहिकाओं को छोड़कर सीधे शरीर-गुहा (हीमोसील) में बहता है और ऊतकों से सीधे संपर्क में आता है — यहाँ इसे केवल 'रक्त' न कहकर हीमोलिम्फ कहा जाना अधिक उपयुक्त है, जबकि बंद परिसंचरण में रक्त सदैव वाहिकाओं तक ही सीमित रहता है।
    रणनीति
    • दोहराव के लिए सबसे प्रभावी रणनीति — रोज़ एक बार संख्याएँ (RBC/WBC/प्लेटलेट्स की गिनती, हृद चक्र की अवधि, हृद निकास सूत्र, रक्तचाप के मान) व एक बार शब्दावली-जोड़े (एग्लूटिनोजन-एग्लूटिनिन, हिपैरिन-थ्रोंबोकाइनेज, SAN-AVN स्थान, निवाहिका शिरा-यकृत शिरा) दोहराएँ — इसी अध्याय से बनने वाले अधिकांश ट्रैप प्रश्न इन्हीं दो श्रेणियों से आते हैं।

    शरीर द्रव तथा परिसंचरण — जीव विज्ञान अध्याय 15 • सामग्री मौलिक रूप से लिखी गई है, अध्ययन व संदर्भ हेतु उपयोग करें।

    रक्त का प्रवाह, हृदय की धड़कन — यही जीवन की अमिट लय है।

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