श्वसन और गैसों का विनिमय
हर साँस के पीछे एक अदृश्य लेकिन बेहद जरूरी यात्रा छिपी है — बाहर की हवा से ऑक्सीजन शरीर की करोड़ों कोशिकाओं तक पहुँचती है, और वहाँ से बनने वाली कार्बनडाइऑक्साइड वापस बाहर निकाली जाती है। इस अध्याय में हम जानेंगे कि फेफड़े, वायु मार्ग और रक्त मिलकर किस तरह इस अनवरत गैस-विनिमय को संभव बनाते हैं।
भूमिका श्वसन क्यों जरूरी है
जैसा कि आप पहले पढ़ चुके हैं, सजीव अपने पोषक तत्वों — जैसे ग्लूकोज — को तोड़ने के लिए परोक्ष रूप से ऑक्सीजन (O₂) का उपयोग करते हैं, जिससे विभिन्न क्रियाओं को संपादित करने के लिए जरूरी ऊर्जा मिलती है। इसी अपचयी क्रिया में कार्बनडाइऑक्साइड (CO₂) भी मुक्त होती है, जो शरीर के लिए हानिकारक है। इसीलिए यह जरूरी है कि कोशिकाओं को लगातार O₂ मिलती रहे और CO₂ लगातार बाहर निकलती रहे।
इस अध्याय में हम श्वसन के अंगों, श्वासन की क्रियाविधि, गैसों के विनिमय व परिवहन, और इस पूरी प्रक्रिया के तंत्रिकीय नियंत्रण के बारे में विस्तार से जानेंगे।
14.1 श्वसन के अंग (Respiratory Organs)
प्राणियों के विभिन्न वर्गों के बीच श्वसन की क्रियाविधि उनके निवास स्थान और शारीरिक संगठन के अनुसार अलग-अलग होती है। निम्न श्रेणी के अकशेरुकी जीव — जैसे स्पंज, सीलेंटरेटा, चपटेकृमि आदि — अपने पूरे शरीर की सतह से सरल विसरण (diffusion) द्वारा ही O₂ और CO₂ का आदान-प्रदान कर लेते हैं। केंचुए अपनी नम, आर्द्र क्यूटिकल का उपयोग श्वसन के लिए करते हैं। कीटों के शरीर में नलिकाओं का एक पूरा जाल (श्वसन नलिकाएँ, tracheae) होता है, जिनसे वायुमंडलीय हवा सीधे शरीर के भीतरी स्थानों तक पहुँच जाती है, ताकि कोशिकाएँ स्वयं गैसों का आदान-प्रदान कर सकें।
क्लोम / गिल (Gill)
जलीय आर्थोपोडा तथा मोलस्का में विशेष संवहनीय संरचना, जो पानी में घुली ऑक्सीजन को सोखती है।
फुफ्फुस / फेफड़े (Lungs)
स्थलचर प्राणियों में विशेष संवहनीय थैली जैसी संरचना, जो वायुमंडलीय हवा से गैसों का विनिमय करती है।
कशेरुकियों में मछलियाँ क्लोम (गिल) द्वारा श्वसन करती हैं, जबकि एम्फिबिया (उभयचर), सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी फेफड़ों द्वारा श्वसन करते हैं। उभयचर जैसे मेंढक अपनी आर्द्र त्वचा (नम त्वचा) द्वारा भी श्वसन कर सकते हैं। स्तनधारियों में एक पूर्ण विकसित श्वसन प्रणाली होती है।
14.1.1 मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)
हमारे एक जोड़ी बाह्य नासाद्वार होते हैं, जो होठों के ऊपर बाहर की तरफ खुलते हैं। ये नासा मार्ग द्वारा नासा कक्ष तक पहुँचते हैं। नासा कक्ष ग्रसनी (pharynx) में खुलते हैं — ग्रसनी आहार और वायु दोनों के लिए उभयनिष्ठ (साझा) मार्ग है। ग्रसनी कंठ (larynx) द्वारा श्वासनली में खुलती है। कंठ एक उपास्थिमय पेटिका है जो ध्वनि उत्पादन में सहायता करती है, इसीलिए इसे ध्वनि पेटिका भी कहा जाता है।
भोजन निगलते समय घाँटी एक पतली लोचदार उपास्थिल पल्ले/फ्लैप — कंठच्छद (epiglottis) — से ढक जाती है, जिससे आहार ग्रसनी से कंठ में प्रवेश न कर सके। श्वासनली (trachea) एक सीधी नलिका है, जो वक्ष गुहा के मध्य तक — लगभग 5वीं वक्षीय कशेरुकी तक — जाकर दाईं और बाईं दो प्राथमिक श्वसनियों (bronchi) में विभाजित हो जाती है।
चित्र 14.1 — मानव श्वसन तंत्र का सरलीकृत आरेखीय दृश्य: नासा कक्ष से लेकर फेफड़ों व डायाफ्राम तक
प्रत्येक श्वसनी कई बार विभाजित होते हुए द्वितीयक एवं तृतीयक स्तर की श्वसनी, श्वसनिका (bronchiole) और बहुत पतली अंतस्थ श्वसनिकाओं में समाप्त होती हैं। श्वासनली, प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक श्वसनी तथा प्रारंभिक श्वसनिकाएँ अपूर्ण उपास्थिल वलयों से आलंबित (सहारा दी गई) होती हैं। प्रत्येक अंतस्थ श्वसनिका बहुत सारी पतली, अनियमित भित्ति युक्त वाहिकायित थैली जैसी संरचना — कूपिकाओं (alveoli) — में खुलती है।
बाह्य नासारंध्र से अंतस्थ श्वसनिकाओं तक का भाग चालन भाग (conducting part) कहलाता है, जबकि कूपिकाएँ एवं उनकी नलिकाएँ श्वसन तंत्र का श्वसन या विनिमय भाग (respiratory/exchange part) गठित करती हैं। चालन भाग वायुमंडलीय वायु को कूपिकाओं तक संचारित करता है, इसे बाहरी कणों से मुक्त करता है, आर्द्र करता है तथा वायु को शरीर के तापक्रम तक लाता है। विनिमय भाग रक्त एवं वायुमंडलीय वायु के बीच O₂ और CO₂ का वास्तविक विसरण स्थल है।
फेफड़े वक्ष-गुहा में स्थित होते हैं, जो शारीरिक रूप से एक वायुरोधी कक्ष है। वक्ष-गुहा कक्ष पृष्ठ भाग में कशेरुक दंड, अधर भाग में उरोस्थि, पार्श्व में पसलियों और नीचे से गुंबदाकार डायाफ्राम (diaphragm) द्वारा बनता है। वक्ष में फेफड़ों की शारीरिक व्यवस्था ऐसी होती है कि वक्ष गुहा के आयतन में कोई भी परिवर्तन फेफड़े (फुफ्फुसी) की गुहा में सीधे प्रतिबिंबित हो जाता है — श्वसन के लिए यह व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।
श्वसन में निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैं:
14.2 श्वासन की क्रियाविधि (Mechanism of Breathing)
श्वासन में दो चरण सम्मिलित हैं — अंतःश्वसन (inspiration), जिसके दौरान वायुमंडलीय वायु को अंदर खींचा जाता है, और निःश्वसन (expiration), जिसके द्वारा फुफ्फुसी वायु को बाहर मुक्त किया जाता है। वायु को फेफड़ों के अंदर ले जाने के लिए फेफड़ों एवं वायुमंडल के बीच एक दाब प्रवणता (pressure gradient) निर्मित की जाती है।
अंतःश्वसन तभी हो सकता है जब वायुमंडलीय दाब से फेफड़ों की वायु का दाब (आंतर फुफ्फुसी दाब) कम हो, यानी फेफड़ों का दाब वायुमंडलीय दाब के सापेक्ष कम हो जाए। इसी तरह निःश्वसन तब होता है, जब आंतर फुफ्फुसी दाब वायुमंडलीय दाब से अधिक हो जाता है। डायाफ्राम और एक विशिष्ट पेशी समूह (पसलियों के बीच स्थित बाह्य एवं आंतः अंतरापर्शुक/इंटरकोस्टल पेशियाँ) ही ये दाब-प्रवणताएँ उत्पन्न करते हैं।
चित्र 14.2 — (अ) अंतःश्वसन (ब) निःश्वसन दर्शाते हुए श्वसन की क्रियाविधि
अंतःश्वसन डायाफ्राम के संकुचन से प्रारंभ होता है, जो अग्र-पश्च अक्ष (antero-posterior axis) में वक्ष गुहा का आयतन बढ़ा देता है। बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों का संकुचन पसलियों और उरोस्थि को ऊपर उठा देता है, जिससे पृष्ठधार अक्ष (dorso-ventral axis) में वक्ष-गुहा कक्ष का आयतन बढ़ जाता है। वक्ष गुहा के आयतन में हुई किसी भी वृद्धि के कारण फुफ्फुस के आयतन में भी उतनी ही वृद्धि होती है — इससे फुफ्फुसी दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है, जिससे बाहर की वायु बलपूर्वक फेफड़ों के अंदर आ जाती है, यानी अंतःश्वसन की क्रिया होती है।
डायाफ्राम और अंतरापर्शुक पेशियों का शिथिलन (relaxation) डायाफ्राम व उरोस्थि को उनके सामान्य स्थान पर वापस कर देता है और वक्षीय आयतन को घटाता है, जिससे फुफ्फुसी आयतन भी घट जाता है। परिणामस्वरूप आंतर फुफ्फुसी दाब वायुमंडलीय दाब से थोड़ा अधिक हो जाता है, जिससे फेफड़ों की हवा बाहर निकल जाती है — यानी निःश्वसन हो जाता है। हम अपनी अतिरिक्त उदरीय पेशियों की सहायता से अंतःश्वसन और निःश्वसन की क्षमता को बढ़ा सकते हैं।
14.2.1 श्वसन संबंधी आयतन और क्षमताएँ (Respiratory Volumes and Capacities)
ज्वारीय आयतन Tidal Volume (TV)
सामान्य श्वसन क्रिया के समय प्रति श्वास अंतः/निःश्वासित वायु का आयतन — लगभग 500 मिली।
अंतःश्वसन सुरक्षित आयतन IRV
वह अतिरिक्त मात्रा जो बलपूर्वक अंतःश्वासित की जा सकती है — औसतन 2500–3000 मिली।
निःश्वसन सुरक्षित आयतन ERV
वह अतिरिक्त मात्रा जो बलपूर्वक निःश्वासित की जा सकती है — औसतन 1000–1100 मिली।
अवशिष्ट आयतन RV
बलपूर्वक निःश्वसन के बाद भी फेफड़ों में शेष रह जाने वाला आयतन — औसतन 1100–1200 मिली।
ऊपर वर्णित कुछ श्वसन संबंधी आयतनों को जोड़कर फुफ्फुसी क्षमताएँ (धारिताएँ) निकाली जा सकती हैं, जिनका नैदानिक उद्देश्यों में उपयोग किया जा सकता है।
| क्षमता | परिभाषा | सूत्र |
|---|---|---|
| अंतःश्वसन क्षमता (IC) | सामान्य निःश्वसन के बाद अंतःश्वासित की जा सकने वाली कुल वायु | TV + IRV |
| निःश्वसन क्षमता (EC) | सामान्य अंतःश्वसन के बाद निःश्वासित की जा सकने वाली कुल वायु | TV + ERV |
| क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (FRC) | सामान्य निःश्वसन के बाद फेफड़ों में शेष रहने वाली वायु | ERV + RV |
| जैव क्षमता (VC) | बलपूर्वक निःश्वसन के बाद अंतःश्वासित की जा सकने वाली अधिकतम वायु | ERV + TV + IRV |
| फेफड़ों की कुल क्षमता (TLC) | बलपूर्वक निःश्वसन के पश्चात फेफड़ों में उपस्थित वायु की कुल मात्रा | VC + RV |
14.3 गैसों का विनिमय (Exchange of Gases)
कूपिकाएँ गैसों के विनिमय के लिए प्राथमिक स्थल होती हैं। गैसों का विनिमय रक्त और ऊतकों के बीच भी होता है। इन स्थलों पर O₂ और CO₂ का विनिमय दाब अथवा सांद्रता प्रवणता के आधार पर सरल विसरण द्वारा होता है। गैसों की घुलनशीलता के साथ-साथ विसरण में सम्मिलित झिल्लियों की मोटाई भी विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कुछ महत्वपूर्ण घटक हैं।
गैसों के मिश्रण में किसी विशेष गैस की दाब में भागीदारी को आंशिक दाब कहते हैं, और उसे ऑक्सीजन तथा कार्बनडाइऑक्साइड के लिए क्रमशः pO₂ तथा pCO₂ द्वारा दर्शाते हैं।
| श्वसन गैस | वातावरणीय वायु | वायु कूपिका | अनॉक्सीकृत रक्त | ऑक्सीकृत रक्त | ऊतक |
|---|---|---|---|---|---|
| O₂ (mm Hg) | 159 | 104 | 40 | 95 | 40 |
| CO₂ (mm Hg) | 0.3 | 40 | 45 | 40 | 45 |
तालिका 14.1 — वातावरण की तुलना में विसरण में सम्मिलित विभिन्न भागों पर ऑक्सीजन एवं कार्बनडाइऑक्साइड का आंशिक दबाव
सारणी में दिए गए आँकड़े स्पष्ट रूप से कूपिकाओं से रक्त और रक्त से ऊतकों में ऑक्सीजन के लिए सांद्रता प्रवणता का संकेत देते हैं। इसी प्रकार CO₂ के लिए विपरीत दिशा में प्रवणता दर्शाई गई है — यानी ऊतकों से रक्त और रक्त से कूपिकाओं की तरफ। चूँकि CO₂ की घुलनशीलता O₂ की घुलनशीलता से 20–25 गुना अधिक होती है, अतः विसरण झिल्लिका में से प्रति इकाई आंशिक दाब के अंतर पर विसरित होने वाली CO₂ की मात्रा O₂ की तुलना में बहुत अधिक होती है।
चित्र 14.4 — एक फुफ्फुसीय वाहिका की एक वायुकूपिका का अनुप्रस्थ काट
विसरण झिल्लिका मुख्य रूप से तीन स्तरों की बनी होती है — कूपिका की पतली शल्की उपकला (शल्की एपिथिलियम), कूपिकाओं की कोशिकाओं की अंतःकला, और उनके बीच स्थित आधारी तत्व जो एक पतली आधारी झिल्लिका की बनी होती है। इनके अतिरिक्त सहायक शल्की उपकला, आधारी झिल्लिका और रक्त कोशिकाओं की अंतःकला की एकल परत भी इसे घेरे रहती है। फिर भी, इनकी कुल मोटाई एक मिलीमीटर से बहुत कम होती है — इसलिए हमारे शरीर में सभी कारक O₂ के कूपिकाओं से ऊतकों तक और CO₂ के ऊतकों से कूपिकाओं में विसरण के लिए अनुकूल होते हैं।
14.4 गैसों का परिवहन (Transport of Gases)
O₂ और CO₂ के परिवहन का माध्यम रक्त होता है। लगभग 97% O₂ का परिवहन रक्त में लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) द्वारा होता है, जबकि शेष 3% O₂ का परिवहन प्लाज्मा द्वारा घुल्य अवस्था में होता है। लगभग 20–25% CO₂ का परिवहन लाल रक्त कणिकाओं द्वारा होता है, जबकि 70% बाईकार्बोनेट के रूप में परिवहित होती है। लगभग 7% CO₂ प्लाज्मा द्वारा घुल्य अवस्था में परिवहित होती है।
14.4.1 ऑक्सीजन का परिवहन (Transport of Oxygen)
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में स्थित एक लाल रंग का लौहयुक्त वर्णक है। हीमोग्लोबिन के साथ उत्क्रमणीय (reversible) ढंग से बंधकर ऑक्सीजन ऑक्सी-हीमोग्लोबिन का गठन कर सकती है। प्रत्येक हीमोग्लोबिन अणु अधिकतम चार O₂ अणुओं का वहन कर सकता है। हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन का बंधना प्राथमिक तौर पर O₂ के आंशिक दाब से संबंधित है। CO₂ का आंशिक दाब, हाइड्रोजन आयन सांद्रता और तापक्रम कुछ अन्य कारक हैं जो इस बंधन को बाधित कर सकते हैं।
चित्र 14.5 — ऑक्सीजन वियोजन वक्र (सिग्माभ आकृति)
हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन से प्रतिशत संतृप्ति को pO₂ के सापेक्ष आलेखित करने पर एक सिग्माभ वक्र (Sigmoid Curve) प्राप्त होता है, जिसे वियोजन वक्र (Dissociation Curve) कहते हैं — यह हीमोग्लोबिन से O₂ बंधन को प्रभावित करने वाले pCO₂, H⁺ आयन सांद्रता आदि घटकों के अध्ययन में बेहद सहायक होता है।
14.4.2 कार्बनडाइऑक्साइड का परिवहन (Transport of Carbon Dioxide)
कार्बनडाइऑक्साइड हीमोग्लोबिन द्वारा कार्बामीनो-हीमोग्लोबिन (लगभग 20–25%) के रूप में वहन की जाती है। यह बंधनीयता (बंधन) CO₂ के आंशिक दाब से संबंधित होती है। pO₂ इस बंधन को प्रभावित करने वाला एक मुख्य कारक है — ऊतकों में उच्च pCO₂ और निम्न pO₂ की अवस्था होने से हीमोग्लोबिन से CO₂ का बंधन होता है, जबकि कूपिका में जहाँ pCO₂ निम्न और pO₂ उच्च होता है, कार्बामीनो-हीमोग्लोबिन से CO₂ का वियोजन होने लगता है — यानी ऊतकों में हीमोग्लोबिन से बंधित CO₂ कूपिका में मुक्त हो जाती है।
एंजाइम कार्बोनिक एन्हाइड्रेज की सांद्रता लाल रक्त कणिकाओं में उच्च और प्लाज्मा में अल्प होती है। इस एंजाइम से निम्नलिखित प्रतिक्रिया दोनों दिशाओं में सुगम होती है:
ऊतकों में अपचय के कारण pCO₂ अधिक होने से CO₂ रक्त (RBCs और प्लाज्मा) में विसरित होती है और HCO₃⁻ तथा H⁺ बनाती है। कूपिका में pCO₂ कम होने से प्रतिक्रिया की दिशा विपरीत हो जाती है, जिससे CO₂ और H₂O बनते हैं। इस तरह बाईकार्बोनेट के रूप में ऊतक स्तर पर ग्रहित (trapped) और कूपिका तक परिवहित कार्बनडाइऑक्साइड बाहर की तरफ पुनः CO₂ के रूप में मुक्त हो जाती है। प्रति 100 मिलीलीटर विऑक्सीजनित रक्त द्वारा कूपिका में लगभग 4 मिली CO₂ मुक्त होती है।
14.5 श्वसन का नियमन (Regulation of Respiration)
मानव में अपने शरीर के ऊतकों की माँग के अनुरूप श्वसन की लय को संतुलित और स्थिर बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण क्षमता है। यह नियमन तंत्रिका तंत्र द्वारा संपन्न होता है।
14.6 श्वसन के विकार (Respiratory Disorders)
दमा (Asthma)
श्वसनी और श्वसनिकाओं की शोथ के कारण श्वासन के समय घरघराहट होती है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है।
श्वसनी शोथ (Bronchitis)
श्वसनी की शोथ, जिसके विशेष लक्षण श्वसनी में सूजन तथा जलन होना है, जिससे लगातार खाँसी होती है।
वातस्फीति / एम्फाइसिमा (Emphysema)
एक चिरकालिक रोग है, जिसमें कूपिका भित्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है, जिससे गैस विनिमय सतह घट जाती है। धूम्रपान इसके मुख्य कारकों में एक है।
व्यावसायिक श्वसन रोग (Occupational Respiratory Disease)
कुछ उद्योगों में — विशेषकर जहाँ पत्थर की घिसाई-पिसाई या तोड़ने का कार्य होता है — इतने धूल कण निकलते हैं कि शरीर की सुरक्षा प्रणाली उन्हें पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं कर पाती, जिससे शोथ व रेशामयता (रेशीय ऊतकों की प्रचुरता) हो सकती है, जिससे फेफड़ों को गंभीर नुकसान हो सकता है। इन उद्योगों के श्रमिकों को मुखावरण का प्रयोग करना चाहिए।
परिचय वैज्ञानिक — अलफोन्सो कोर्टी
अलफोन्सो कोर्टी (1822 – 1888)
इटैलियन शरीर क्रिया वैज्ञानिक अलफोन्सो कोर्टी का जन्म 1822 में हुआ था। कोर्टी ने अपना वैज्ञानिक जीवन सरीसृपों के हृद-वाहिका तंत्र के अध्ययन से प्रारंभ किया था। बाद में उन्होंने अपना ध्यान स्तनधारियों के श्वसन-तंत्र की ओर केंद्रित किया।
सन् 1951 में उन्होंने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने कर्णावर्त (कॉक्लिया) की आधारस्थ झिल्ली पर स्थित संरचना में समाहित रोम कोशिकाओं की व्याख्या की थी, जो ध्वनि कंपनों को तंत्रकीय आवेगों में परिवर्तित कर देती हैं। इन्हीं संरचनाओं को उनके सम्मान में "कोर्टी का अंग" कहा गया। उनका देहांत वर्ष 1888 में हो गया।
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
इस अध्याय (श्वसन एवं गैसों का विनिमय) से विगत वर्षों में आए प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 निम्नलिखित में से कौन सा श्वसन आयतन/क्षमता सामान्य निःश्वसन के बाद फेफड़ों में शेष रहने वाली वायु को दर्शाता है — TV, IRV, FRC अथवा VC?
उत्तर: FRC (क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता)।
FRC = ERV + RV होता है। यह "श्वसन आयतन व क्षमताओं" वाली तालिका (TV=500mL, IRV≈2500-3000mL, ERV≈1000-1100mL, RV≈1100-1200mL तथा IC, EC, FRC, VC, TLC के सूत्र) NEET का सबसे अधिक दोहराया जाने वाला numerical-conceptual topic है — प्रत्येक क्षमता का सूत्र व मान अलग-अलग व मिलाकर दोनों तरह से पूछा जाता है।
2 जैव क्षमता (Vital Capacity/VC) किन-किन आयतनों को जोड़कर प्राप्त होती है?
उत्तर: VC = ERV + TV + IRV (अर्थात् बलपूर्वक निःश्वसन के बाद अंतःश्वासित की जा सकने वाली अधिकतम वायु)।
ध्यान रहे VC में अवशिष्ट आयतन (RV) सम्मिलित नहीं होता — RV को जोड़ने पर फेफड़ों की कुल क्षमता (TLC = VC + RV) प्राप्त होती है। NEET में VC व TLC के सूत्रों को उलट कर पूछना एक क्लासिक ट्रैप है।
3 मानव श्वसन तंत्र में ध्वनि उत्पादन के लिए उत्तरदायी संरचना कौन सी है, और भोजन निगलते समय श्वासनली के मार्ग को कौन ढक देता है?
उत्तर: ध्वनि उत्पादन — कंठ (लैरिंक्स), इसीलिए इसे ध्वनि-पेटिका भी कहा जाता है; श्वासमार्ग बंद करने वाली संरचना — कंठच्छद (एपिग्लॉटिस)।
कंठच्छद एक पतली लोचदार उपास्थिल पल्ला (फ्लैप) है जो निगलते समय घाँटी को ढक देता है, जिससे भोजन गलती से श्वासनली में प्रवेश न कर जाए — यह "structure-function" वाला direct-recall प्रश्न लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछा जाता है।
4 श्वासनली, प्राथमिक व द्वितीयक श्वसनी को सहारा देने वाली संरचना क्या है, और यह अंतस्थ श्वसनिकाओं में क्यों अनुपस्थित होती है?
उत्तर: अपूर्ण उपास्थिल वलय (incomplete cartilaginous rings) — ये केवल श्वासनली, प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक श्वसनी तथा प्रारंभिक श्वसनिकाओं तक सीमित होते हैं, अंतस्थ श्वसनिकाओं व कूपिकाओं में इनकी अनुपस्थिति गैस-विनिमय हेतु आवश्यक पतली भित्ति व लचीलापन बनाए रखने के लिए होती है।
यह "कहाँ तक उपास्थि है, कहाँ नहीं" वाला structural gradient प्रश्न श्वसन तंत्र के diagram-based MCQ में बहुत आता है।
5 कूपिका (alveolus) में O₂ का आंशिक दाब (pO₂) तथा ऊतकों में O₂ का pO₂ लगभग कितना होता है, तथा इसी क्रम में CO₂ का pCO₂ कितना होता है?
उत्तर: pO₂ — कूपिका में ≈104 mm Hg, ऊतकों में ≈40 mm Hg। pCO₂ — कूपिका में ≈40 mm Hg, ऊतकों में ≈45 mm Hg।
यह आंशिक दाब वाली तालिका (वायुमंडलीय वायु, कूपिका वायु, अनॉक्सीकृत रक्त, ऑक्सीकृत रक्त, ऊतक — प्रत्येक स्थान पर O₂ व CO₂ का मान) NEET में सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले numerical-data topics में से एक है — गैसों की गति की दिशा (उच्च से निम्न प्रवणता की ओर) इन्हीं मानों पर आधारित होती है।
6 रक्त में O₂ का परिवहन किस अनुपात में हीमोग्लोबिन-बद्ध व घुलित अवस्था में होता है, तथा CO₂ का परिवहन किन-किन रूपों में व कितने प्रतिशत होता है?
उत्तर: O₂ — लगभग 97% हीमोग्लोबिन (RBC) द्वारा, 3% प्लाज़्मा में घुलित। CO₂ — लगभग 70% बाईकार्बोनेट के रूप में, 20–25% कार्बामीनो-हीमोग्लोबिन के रूप में, तथा 7% प्लाज़्मा में घुलित अवस्था में।
यह प्रतिशत-वितरण डेटा NEET में लगभग हर वर्ष प्रत्यक्ष रूप से पूछा जाता है — विशेषकर "CO₂ का सर्वाधिक भाग किस रूप में परिवहित होता है" (उत्तर: बाईकार्बोनेट, न कि कार्बामीनो-हीमोग्लोबिन — यह सबसे बड़ा ट्रैप है)।
7 ऑक्सीजन वियोजन वक्र (dissociation curve) का आकार कैसा होता है, तथा उच्च pCO₂, उच्च H⁺ सांद्रता व उच्च तापक्रम की परिस्थिति में यह वक्र किस दिशा में विस्थापित होता है?
उत्तर: सिग्माभ (S-आकार) वक्र; उच्च pCO₂/H⁺/तापक्रम की अवस्था में ऑक्सीजन का हीमोग्लोबिन से वियोजन बढ़ जाता है (यानी वक्र दाईं ओर खिसकता है), जिससे ऊतकों को अधिक ऑक्सीजन प्राप्त होती है।
यह प्रभाव जीव विज्ञान में "बोर प्रभाव" (Bohr Effect) कहलाता है (यद्यपि यह शब्द इस पाठ में सीधे नहीं दिया गया, फिर भी concept रूप में NEET में पूछा जा सकता है) — सक्रिय ऊतकों में उच्च CO₂/H⁺/ताप के कारण हीमोग्लोबिन अधिक आसानी से ऑक्सीजन छोड़ देता है, जो शरीर की चयापचयी माँग के अनुरूप एक स्वाभाविक अनुकूलन है।
8 कार्बोनिक एन्हाइड्रेज एंजाइम की सांद्रता RBC व प्लाज़्मा में किस प्रकार भिन्न होती है, और यह किस अभिक्रिया को उत्प्रेरित करता है?
उत्तर: यह RBC में उच्च तथा प्लाज़्मा में अल्प सांद्रता में पाया जाता है; यह अभिक्रिया CO₂ + H₂O ⇌ H₂CO₃ ⇌ HCO₃⁻ + H⁺ को दोनों दिशाओं में उत्प्रेरित करता है।
ऊतकों में उच्च pCO₂ के कारण यह अभिक्रिया दाईं ओर (HCO₃⁻ व H⁺ बनने की दिशा में) तथा कूपिका में निम्न pCO₂ के कारण बाईं ओर (CO₂ व H₂O बनने की दिशा में) चलती है — इस उभयदिशिक (reversible) अभिक्रिया व एंजाइम-वितरण को NEET में बार-बार पूछा गया है।
9 श्वसन के नियमन में मस्तिष्क के किस भाग में मुख्य लयकेंद्र स्थित है, तथा पोंस में स्थित केंद्र का क्या कार्य है?
उत्तर: मुख्य श्वसन लयकेंद्र मेड्यूला में स्थित होता है; पोंस में स्थित न्यूमोटैक्सिक (श्वासप्रभावी) केंद्र अंतःश्वसन की अवधि को कम करके श्वसन दर को संयत/समायोजित करता है।
NEET में यह प्रश्न कभी-कभी "मस्तिष्क के किस हिस्से में कौन सा श्वसन-केंद्र है" वाले match-the-column प्रारूप में आता है — इसे तंत्रिकीय नियंत्रण अध्याय (मेडुला/पोंस की सामान्य भूमिका) के साथ भी जोड़कर पूछा जा सकता है।
10 श्वसन के नियमन में मुख्य उद्दीपक कारक कौन सा है — CO₂/H⁺ अथवा O₂?
उत्तर: CO₂ व H⁺ आयन सांद्रता — इनकी वृद्धि रसोसंवेदी (chemosensitive) केंद्र को सक्रिय कर श्वसन दर बढ़ाती है, जबकि श्वसन लय के नियमन में O₂ की भूमिका अपेक्षाकृत बहुत कम/महत्वहीन मानी जाती है।
यह भ्रामक-लगने वाला किंतु बार-बार पूछा जाने वाला fact है — अधिकांश छात्र मान लेते हैं कि ऑक्सीजन ही श्वसन-नियंत्रण का मुख्य कारक होगा, जबकि वास्तविकता में CO₂/H⁺ ही प्राथमिक उद्दीपक हैं। महाधमनी चाप व ग्रीवा धमनी की संवेदी संरचनाएँ भी इसी CO₂/H⁺ परिवर्तन को पहचानकर लयकेंद्र को संकेत भेजती हैं।
11 धूम्रपान से जुड़ा वह श्वसन विकार कौन सा है जिसमें कूपिका भित्ति क्षतिग्रस्त होकर गैस विनिमय सतह घट जाती है?
उत्तर: वातस्फीति (एम्फाइसिमा)।
यह एक चिरकालिक (chronic) रोग है, जिसमें कूपिकाओं की भित्ति के क्षतिग्रस्त होने से प्रभावी गैस-विनिमय सतह क्षेत्रफल घट जाता है — इसे दमा (श्वसनी की शोथ से घरघराहट) व श्वसनी शोथ (bronchitis, श्वसनी में सूजन व लगातार खाँसी) से अलग करके पहचानना ज़रूरी है, क्योंकि तीनों विकार अलग-अलग संरचनाओं को प्रभावित करते हैं — यह भेद NEET में असेंशन-रीज़न या match-the-column प्रारूप में पूछा जाता है।
Extra अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु व तुलनाएँ — ऊपर दिए गए प्रश्नों से अलग।
- ऑक्सीजन-वियोजन वक्र (oxygen dissociation curve) की आकृति सिग्मॉइड (S-आकार) होती है — इसका कारण हीमोग्लोबिन के चारों हीम समूहों के मध्य सहकारी बंधन (cooperative binding) है, अर्थात एक O₂ अणु के बंधने के बाद अगले O₂ अणुओं का बंधना क्रमशः आसान होता जाता है — यह वक्र किसी साधारण एकल-स्थल (single-site) प्रोटीन में नहीं, बल्कि केवल बहु-उपइकाई (multi-subunit) प्रोटीन में ही संभव है।
- बोर प्रभाव (Bohr effect) बनाम हैल्डेन प्रभाव (Haldane effect) — बोर प्रभाव में ऊतकों पर उच्च pCO₂, H⁺ सांद्रता व तापमान हीमोग्लोबिन की O₂ बंधुता को घटाते हैं, जिससे ऊतकों में O₂ आसानी से मुक्त हो जाती है; हैल्डेन प्रभाव इसके ठीक विपरीत है — फेफड़ों में O₂ का हीमोग्लोबिन से बंधना, हीमोग्लोबिन की CO₂ बंधुता को घटा देता है, जिससे CO₂ आसानी से मुक्त होकर बाहर निकल जाती है।
- गैसों के परिवहन का प्रतिशत विभाजन याद रखें — O₂ का लगभग 97% हीमोग्लोबिन से जुड़कर (ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में) व शेष 3% प्लाज़्मा में घुलित अवस्था में परिवहित होती है; CO₂ का लगभग 70% बाईकार्बोनेट (HCO₃⁻) के रूप में, 20-25% कार्बऐमीनो-हीमोग्लोबिन (carbamino compounds) के रूप में, तथा शेष 7% प्लाज़्मा में घुलित अवस्था में परिवहित होती है।
- लाल रुधिर कणिकाओं (RBC) में उपस्थित एंजाइम कार्बोनिक एनहाइड्रेस (carbonic anhydrase) CO₂+H₂O से H₂CO₃ बनने की अभिक्रिया को उत्प्रेरित करता है — यह अभिक्रिया प्लाज़्मा में अत्यंत धीमी गति से होती है, परन्तु RBC के भीतर इस एंजाइम की उपस्थिति के कारण हज़ारों गुना तेज़ हो जाती है — इसीलिए अधिकांश CO₂ परिवहन RBC के भीतर होने वाली इस अभिक्रिया पर निर्भर करता है।
- क्लोराइड विस्थापन (Chloride shift / Hamburger phenomenon) — ऊतक स्तर पर जब HCO₃⁻ आयन RBC से बाहर प्लाज़्मा में विसरित होते हैं, तो विद्युत उदासीनता बनाए रखने हेतु समतुल्य मात्रा में Cl⁻ आयन प्लाज़्मा से RBC के भीतर प्रवेश करते हैं — फेफड़ों में इसके ठीक विपरीत दिशा में विस्थापन होता है (जिसे कभी-कभी "रिवर्स क्लोराइड शिफ्ट" भी कहा जाता है)।
- कूपिका (alveoli) व अपचयित रक्त (deoxygenated blood) के मध्य O₂ की आंशिक दाब-प्रवणता (लगभग 104 mmHg बनाम 40 mmHg, अर्थात ~64 mmHg का अंतर) CO₂ की प्रवणता (लगभग 40 mmHg बनाम 45 mmHg, अर्थात केवल ~5 mmHg का अंतर) से कहीं अधिक होती है — फिर भी CO₂ का विनिमय पर्याप्त मात्रा में होता है, क्योंकि CO₂ की जल/प्लाज़्मा में विलेयता O₂ की तुलना में लगभग 20-25 गुना अधिक होती है। "अधिक दाब-प्रवणता वाली गैस ही अधिक तेज़ी से विसरित होगी" जैसा सरलीकृत सामान्यीकरण यहाँ अधूरा है।
- कूपिका-रुधिर अवरोध (blood-air barrier / respiratory membrane) अत्यंत पतला (लगभग 0.2 से 0.6 माइक्रॉन मोटाई) होता है, जो कूपिका की शल्की उपकला (squamous epithelium), रुधिर कोशिका की अंतःस्तर (endothelium) व दोनों के बीच की आधार कला (basement membrane) से मिलकर बनता है — यह न्यूनतम मोटाई ही तीव्र विसरण-दर सुनिश्चित करती है।
- मायोग्लोबिन बनाम हीमोग्लोबिन — मायोग्लोबिन (पेशियों में O₂ संचयन हेतु उपस्थित एकल-शृंखला, एकल-हीम प्रोटीन) की O₂ बंधुता हीमोग्लोबिन से कहीं अधिक होती है, तथा इसका वियोजन वक्र सहकारी बंधन के अभाव में अतिपरवलयिक (hyperbolic) होता है, सिग्मॉइड नहीं — यह भेद संरचना (उपइकाई संख्या) व वक्र-आकृति दोनों को जोड़कर पूछा जा सकता है।
- हेरिंग-ब्रॉयर प्रतिवर्त (Hering-Breuer reflex) — फेफड़ों व श्वसनिकाओं (bronchioles) में उपस्थित खिंचाव-ग्राही (stretch receptors), फेफड़ों के अत्यधिक फूलने पर मेड्यूला स्थित श्वसन केंद्र को संकेत भेजकर अंतःश्वसन को रोक देते हैं — यह एक सुरक्षात्मक प्रतिवर्त है जो फेफड़ों को अति-स्फीति (over-inflation) से बचाता है।
- श्वसन आयतनों में से अवशिष्ट आयतन (residual volume, RV) — फेफड़ों में प्रबलतम निःश्वसन के बाद भी शेष रह जाने वाली वायु — सामान्य स्पाइरोमीटर (spirometer) से सीधे मापा नहीं जा सकता, क्योंकि यह कभी भी बाहर नहीं निकाली जा सकती। इसी कारण RV को सम्मिलित करने वाली सभी क्षमताएँ (जैसे कार्यात्मक अवशिष्ट क्षमता FRC व कुल फेफड़ा क्षमता TLC) भी प्रत्यक्ष स्पाइरोमेट्री से नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष विधियों (जैसे हीलियम तनुकरण विधि) से मापी जाती हैं।
- कीटों में गैसों का परिवहन श्वसन वर्णक (respiratory pigment) की सहायता के बिना, सीधे श्वासनली तंत्र (tracheal system) की महीन श्वासनलिकाओं (tracheoles) द्वारा कोशिकाओं तक होता है — अर्थात कीटों में परिसंचरण तंत्र (हीमोलिम्फ) गैस परिवहन में सम्मिलित नहीं होता, जो कशेरुकियों (जहाँ रक्त वर्णक द्वारा परिवहन आवश्यक है) से पूर्णतः भिन्न है।
- त्वचीय श्वसन (cutaneous respiration) — केंचुए (जिसमें कोई विशिष्ट श्वसन अंग नहीं होता, संपूर्ण गैस-विनिमय नम त्वचा से होता है) व उभयचरों (जैसे मेढक, जो फेफड़ों के साथ-साथ त्वचा से भी सहायक गैस-विनिमय करते हैं) में पाया जाता है — इसके लिए त्वचा का सदैव नम व संवहनी (vascularised) होना आवश्यक है।
- श्वसन केंद्र (respiratory rhythm centre) मेड्यूला ऑब्लांगेटा में स्थित है, जो सामान्य श्वसन-लय बनाए रखता है; इसके ठीक ऊपर पॉन्स क्षेत्र में स्थित श्वासाग्र प्रभावी केंद्र (pneumotaxic centre) अंतःश्वसन की अवधि व दर को घटाकर मेड्यूला केंद्र की गतिविधि को संशोधित (moderate) करता है — दोनों केंद्रों के कार्य को न उलझाना महत्वपूर्ण है, चूँकि दोनों ही श्वसन-लय के नियमन में भूमिका निभाते हैं परन्तु अलग-अलग स्तर पर।
- उच्च तुंगता (high altitude) पर पहुँचने पर वायुमंडलीय pO₂ के निम्न होने के कारण शरीर में पर्वतीय बीमारी (altitude/mountain sickness) हो सकती है, जिसके लक्षणों में थकान, हृदय गति व श्वसन दर में वृद्धि सम्मिलित हैं — इसकी क्षतिपूर्ति हेतु शरीर अस्थि मज्जा से अधिक RBC व हीमोग्लोबिन का उत्पादन बढ़ा देता है (एरिथ्रोपोइटिन द्वारा प्रेरित), जिससे रक्त की O₂-वहन क्षमता बढ़ जाती है।
- चूँकि यह अध्याय क्रियाविधि, आँकड़ों (आयतन/क्षमता/दाब) व विकारों का मिश्रण है, अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) गैसों के परिवहन के प्रतिशत आँकड़े व बोर/हैल्डेन प्रभाव, (2) श्वसन आयतन व क्षमताओं के सभी सूत्र (TV, IRV, ERV, RV व इनसे बनने वाली चार क्षमताएँ), (3) श्वसन विकारों (दमा, श्वसनी शोथ, वातस्फीति, व्यावसायिक फेफड़ा रोग) के बीच स्पष्ट भेद — इन्हीं तीन विषयों से अधिकांश प्रत्यक्ष व अभिकथन-तर्क प्रकार के प्रश्न बनते हैं।
सार संक्षेप में समझें
कोशिकाएँ अपचयी क्रियाओं के लिए ऑक्सीजन का उपयोग करती हैं तथा ऊर्जा के साथ कार्बनडाइऑक्साइड जैसे हानिकारक पदार्थ भी उत्पन्न करती हैं। प्राणियों में कोशिकाओं तक ऑक्सीजन तथा वहाँ से कार्बनडाइऑक्साइड को बाहर करने के लिए कई तरह की क्रियाविधियाँ विकसित हुई हैं — हमारे पास इसके लिए एक पूर्ण विकसित श्वसन तंत्र है, जिसके अंतर्गत दो फेफड़े और इनसे जुड़े वायु मार्ग हैं।
श्वसन का पहला चरण श्वासन है, जिसमें वायुमंडलीय वायु कूपिकाओं में ली जाती है (अंतःश्वसन) और कूपिकाओं से वायु बाहर निकाली जाती है (निःश्वसन)। ऑक्सीजनित-रहित रक्त और कूपिका के बीच O₂ और CO₂ का विनिमय, इन गैसों का रक्त द्वारा पूरे शरीर में परिवहन, ऑक्सीजन युक्त रक्त और ऊतकों के बीच O₂ व CO₂ का विनिमय, और कोशिकाओं द्वारा ऑक्सीजन का उपयोग (कोशिकीय श्वसन) — ये अन्य सम्मिलित चरण हैं। अंतःश्वसन और निःश्वसन के लिए वायुमंडल और कूपिका के बीच अंतरापर्शुक पेशियों तथा डायाफ्राम की सहायता से दाब प्रवणता पैदा की जाती है।
कूपिका एवं ऊतकों में CO₂ और O₂ का विनिमय विसरण द्वारा होता है, जो आंशिक दाब प्रवणता, घुलनशीलता तथा विसरण सतह की मोटाई पर निर्भर है। रक्त में O₂ मुख्यतः हीमोग्लोबिन से बंधकर तथा CO₂ मुख्यतः बाईकार्बोनेट के रूप में परिवहित होती है। श्वसन लय मस्तिष्क के मेड्यूला क्षेत्र स्थित श्वसन केंद्र द्वारा बनाए रखी जाती है, जिसे पोंस क्षेत्र स्थित श्वासप्रभावी केंद्र तथा एक रसो-संवेदी केंद्र संशोधित कर सकते हैं।
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प्रश्न 1 जैव क्षमता की परिभाषा दें और इसका महत्व बताएं?
जैव क्षमता (Vital Capacity, VC) बलपूर्वक निःश्वसन के बाद वायु की वह अधिकतम मात्रा है, जो एक व्यक्ति अंतःश्वासित कर सकता है — इसमें ERV, TV और IRV सम्मिलित हैं (या वायु की वह अधिकतम मात्रा जो बलपूर्वक अंतःश्वसन के बाद निःश्वासित की जा सकती है)। इसका महत्व यह है कि यह फेफड़ों की कार्यक्षमता का एक अहम संकेतक है — कम जैव क्षमता फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों (जैसे प्रतिबंधक फेफड़ा रोग) का संकेत हो सकती है, इसीलिए इसे नैदानिक जाँच में मापा जाता है।
प्रश्न 2 सामान्य निःश्वसन के उपरांत फेफड़ों में शेष वायु के आयतन को बताएं।
सामान्य निःश्वसन के बाद फेफड़ों में शेष रहने वाली वायु की मात्रा को क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity, FRC) कहा जाता है, जो निःश्वसन सुरक्षित आयतन (ERV) और अवशिष्ट आयतन (RV) के योग के बराबर होती है — यानी FRC = ERV + RV।
प्रश्न 3 गैसों का विसरण केवल कूपिकीय क्षेत्र में होता है, श्वसन तंत्र के किसी अन्य भाग में नहीं। क्यों?
गैसों का विसरण केवल कूपिकीय क्षेत्र में होता है, क्योंकि केवल यहीं गैस-विनिमय के लिए आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं — कूपिका की भित्ति बेहद पतली (एक मिलीमीटर से भी कम मोटाई) होती है और वहाँ रक्त वाहिकाओं का घना जाल फैला रहता है, जिससे रक्त और वायु के बीच न्यूनतम दूरी पर विसरण हो सकता है। श्वसन तंत्र के बाकी हिस्से (नासा मार्ग, श्वासनली, श्वसनी, श्वसनिकाएँ) केवल "चालन भाग" हैं, जिनकी भित्तियाँ मोटी और अपेक्षाकृत अभेद्य होती हैं, और वहाँ रक्त वाहिकाओं का इतना सघन जाल भी नहीं होता — इसलिए वहाँ प्रभावी गैस-विनिमय संभव नहीं है, वे सिर्फ वायु को कूपिकाओं तक पहुँचाने का काम करते हैं।
प्रश्न 4 CO₂ के परिवहन (ट्रांसपोर्ट) की मुख्य क्रियाविधि क्या है; व्याख्या करें?
CO₂ के परिवहन की सबसे मुख्य क्रियाविधि है — बाईकार्बोनेट (HCO₃⁻) के रूप में परिवहन, जो लगभग 70% CO₂ को वहन करता है। ऊतकों में बनी CO₂, रक्त में विसरित होकर लाल रक्त कणिकाओं में प्रवेश करती है, जहाँ कार्बोनिक एन्हाइड्रेज एंजाइम की मदद से यह पानी के साथ मिलकर कार्बोनिक अम्ल (H₂CO₃) बनाती है, जो आगे HCO₃⁻ और H⁺ में विघटित हो जाता है। यह बाईकार्बोनेट कूपिका तक पहुँचकर, जहाँ pCO₂ कम होता है, वापस CO₂ और पानी में बदल जाता है और CO₂ के रूप में मुक्त होकर बाहर निकल जाती है। शेष CO₂ में से लगभग 20–25% हीमोग्लोबिन से बंधकर कार्बामीनो-हीमोग्लोबिन के रूप में तथा 7% प्लाज्मा में सीधे घुल्य अवस्था में परिवहित होती है।
प्रश्न 5 कूपिका वायु की तुलना में वायुमंडलीय वायु में pO₂ तथा pCO₂ कितनी होगी, मिलान करें?
(i) pO₂ न्यून, pCO₂ उच्च (ii) pO₂ उच्च, pCO₂ न्यून (iii) pO₂ उच्च, pCO₂ उच्च (iv) pO₂ न्यून, pCO₂ न्यून
सही उत्तर है (ii) pO₂ उच्च, pCO₂ न्यून।
वायुमंडलीय वायु में pO₂ लगभग 159 mm Hg होता है, जो कूपिका वायु के pO₂ (लगभग 104 mm Hg) से काफी अधिक है — क्योंकि कूपिका में लगातार O₂ रक्त में जा रही होती है। इसके विपरीत वायुमंडलीय वायु में pCO₂ बहुत कम (लगभग 0.3 mm Hg) होता है, जबकि कूपिका वायु में यह लगभग 40 mm Hg होता है — क्योंकि ऊतकों से आने वाली CO₂ लगातार कूपिका में जमा हो रही होती है।
प्रश्न 6 सामान्य स्थिति में अंतःश्वसन प्रक्रिया की व्याख्या करें?
सामान्य अंतःश्वसन डायाफ्राम के संकुचन से शुरू होता है, जिससे वक्ष गुहा का आयतन अग्र-पश्च अक्ष में बढ़ जाता है। इसके साथ ही बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों के संकुचन से पसलियाँ और उरोस्थि ऊपर उठ जाती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन पृष्ठधार अक्ष में भी बढ़ जाता है। वक्ष गुहा के इस बढ़े हुए आयतन के अनुरूप फेफड़ों का आयतन भी बढ़ जाता है, जिससे आंतर फुफ्फुसी दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है। इस दाब-अंतर के कारण बाहर की वायु बलपूर्वक फेफड़ों के भीतर खिंच आती है — यही अंतःश्वसन की प्रक्रिया है।
प्रश्न 7 श्वसन का नियमन कैसे होता है?
श्वसन का नियमन मुख्यतः तंत्रिका तंत्र द्वारा किया जाता है। मस्तिष्क के मेड्यूला क्षेत्र में स्थित श्वसन लयकेंद्र श्वसन की मूल लय बनाए रखता है। मस्तिष्क के पोंस क्षेत्र में स्थित श्वासप्रभावी (न्यूमोटैक्सिक) केंद्र लयकेंद्र के कार्यों को संयत करके अंतःश्वसन की अवधि को कम-ज्यादा कर सकता है। इसके अलावा लयकेंद्र के पास मौजूद एक रसोसंवेदी केंद्र रक्त में CO₂ व H⁺ की सांद्रता के प्रति अति संवेदनशील होता है और इनकी वृद्धि होने पर श्वसन दर को समायोजित करता है। महाधमनी चाप व ग्रीवा धमनी की संवेदी संरचनाएँ भी CO₂ व H⁺ सांद्रता में बदलाव पहचानकर लयकेंद्र को संकेत भेजती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे नियंत्रण में ऑक्सीजन की भूमिका अपेक्षाकृत बहुत कम महत्वपूर्ण होती है।
प्रश्न 8 pCO₂ का ऑक्सीजन के परिवहन में क्या प्रभाव है?
pCO₂ हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन के बंधन को सीधे प्रभावित करता है। जब pCO₂ अधिक होता है (जैसे ऊतकों में), तो यह हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति बंधुता को कम कर देता है, जिससे ऑक्सीहीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन जल्दी वियोजित होकर ऊतकों को मिल जाती है — यानी उच्च pCO₂ ऑक्सीजन की मुक्ति को बढ़ावा देता है। इसके विपरीत, जब pCO₂ कम होता है (जैसे कूपिकाओं में), तो हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से आसानी से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बना लेता है। इस तरह pCO₂ यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि ऑक्सीजन ठीक वहीं मुक्त हो, जहाँ उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है — यानी सक्रिय, अधिक CO₂ पैदा करने वाले ऊतकों में।
प्रश्न 9 पहाड़ पर चढ़ने वाले व्यक्ति की श्वसन प्रक्रिया में क्या प्रभाव पड़ता है?
ऊँचाई पर वायुमंडलीय दाब कम हो जाता है, जिससे वायु में ऑक्सीजन का आंशिक दाब (pO₂) भी घट जाता है। इससे फेफड़ों में O₂ की उपलब्धता कम हो जाती है और हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन-संतृप्ति भी घट जाती है — इसे अवकॉसीयता (हाइपोक्सिया) कहा जाता है। शरीर इसकी भरपाई के लिए श्वसन दर व गहराई बढ़ा देता है (हाइपरवेंटिलेशन), हृदय गति तेज हो जाती है, और लंबे समय तक ऊँचाई पर रहने से शरीर अधिक लाल रक्त कणिकाएँ बनाना शुरू कर देता है ताकि ऑक्सीजन-वहन क्षमता बढ़ाई जा सके। यही कारण है कि पहाड़ पर चढ़ते समय शुरुआत में साँस फूलने, थकान व सिरदर्द जैसे लक्षण महसूस होते हैं, जब तक शरीर वहाँ के कम-ऑक्सीजन वातावरण के अनुकूल नहीं ढल जाता।
प्रश्न 10 कीटों में श्वसन क्रियाविधि कैसी होती है?
कीटों में फेफड़ों जैसा कोई अंग नहीं होता — इसके बजाय उनके शरीर में श्वसन नलिकाओं (ट्रेकिया) का एक जाल बिछा होता है, जो शरीर की सतह पर छोटे-छोटे छिद्रों (स्पाइरेकल्स) से खुलता है और शरीर के भीतर बारीक शाखाओं में बँटता हुआ सीधे विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचता है। इस तरह वायुमंडलीय वायु सीधे इन नलिकाओं के जरिए कोशिकाओं तक पहुँच जाती है, और कोशिकाएँ स्वयं गैसों का आदान-प्रदान कर लेती हैं — यानी कीटों में गैस-विनिमय के लिए रक्त की मध्यस्थता (जैसा मनुष्यों में होता है) की जरूरत नहीं पड़ती।
प्रश्न 11 ऑक्सीजन वियोजन वक्र की परिभाषा दें, क्या आप इसकी सिग्माभ आकृति का कोई कारण बता सकते हैं?
ऑक्सीजन वियोजन वक्र वह ग्राफ है, जिसमें हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन से प्रतिशत संतृप्ति को ऑक्सीजन के आंशिक दाब (pO₂) के सापेक्ष आलेखित किया जाता है।
इसकी सिग्माभ (S-आकार की) आकृति का कारण यह है कि हीमोग्लोबिन का प्रत्येक अणु चार O₂ अणुओं को बाँध सकता है, और एक O₂ अणु के जुड़ने से हीमोग्लोबिन की संरचना में ऐसा परिवर्तन आता है, जिससे अगले O₂ अणु का जुड़ना और आसान हो जाता है (इसे सहकारी बंधन या कोऑपरेटिव बाइंडिंग कहा जाता है)। शुरुआत में कम pO₂ पर बंधन धीमा होता है, फिर मध्य में जल्दी-जल्दी बंधन होता है, और अंत में सभी स्थल भर जाने से वक्र फिर सपाट हो जाता है — यही क्रम मिलकर वक्र को S-आकार की सिग्माभ आकृति देता है।
प्रश्न 12 क्या आपने अवकॉसीयता (हाइपोक्सिया) (न्यून ऑक्सीजन) के बारे में सुना है? इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करें व साथियों के बीच चर्चा करें।
अवकॉसीयता (हाइपोक्सिया) वह अवस्था है, जिसमें शरीर के ऊतकों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। यह कई कारणों से हो सकता है — ऊँचाई पर कम वायुमंडलीय दाब के कारण, फेफड़ों की बीमारी (जैसे वातस्फीति या दमा) के कारण, रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी (एनीमिया) के कारण, या रक्त परिसंचरण में रुकावट के कारण। हाइपोक्सिया के लक्षणों में साँस फूलना, थकान, सिरदर्द, चक्कर आना और गंभीर मामलों में त्वचा व होंठों का नीला पड़ना (सायनोसिस) शामिल हो सकते हैं। यह विषय पर्वतारोहियों, ऊँचाई वाले क्षेत्रों में रहने वालों तथा कुछ फेफड़े व हृदय संबंधी रोगों से जुड़े मरीजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 13 निम्न के बीच अंतर करें —
(क) IRV (आई आर वी) और ERV (इ आर वी) (ख) अंतःश्वसन क्षमता (IC) और निःश्वसन क्षमता (ग) जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता
(क) IRV बनाम ERV: IRV (अंतःश्वसन सुरक्षित आयतन) वह अतिरिक्त वायु है जो सामान्य अंतःश्वसन के बाद बलपूर्वक और अंदर खींची जा सकती है (लगभग 2500–3000 मिली)। ERV (निःश्वसन सुरक्षित आयतन) वह अतिरिक्त वायु है जो सामान्य निःश्वसन के बाद बलपूर्वक और बाहर निकाली जा सकती है (लगभग 1000–1100 मिली)।
(ख) अंतःश्वसन क्षमता (IC) बनाम निःश्वसन क्षमता (EC): IC वह कुल वायु है जो सामान्य निःश्वसन के बाद अंतःश्वासित की जा सकती है (TV + IRV)। EC वह कुल वायु है जो सामान्य अंतःश्वसन के बाद निःश्वासित की जा सकती है (TV + ERV)।
(ग) जैव क्षमता (VC) बनाम फेफड़ों की कुल धारिता (TLC): VC बलपूर्वक निःश्वसन के बाद अंतःश्वासित की जा सकने वाली अधिकतम वायु है (TV + IRV + ERV)। TLC फेफड़ों में समा सकने वाली कुल वायु है, जिसमें अवशिष्ट आयतन (RV) भी शामिल है — यानी TLC = VC + RV।
प्रश्न 14 ज्वारीय आयतन क्या है? एक स्वस्थ मनुष्य के लिए एक घंटे के ज्वारीय आयतन (लगभग मात्रा) को आंकलित करें?
ज्वारीय आयतन (Tidal Volume, TV) सामान्य श्वसन क्रिया के दौरान प्रति साँस अंतःश्वासित या निःश्वासित होने वाली वायु की मात्रा है, जो लगभग 500 मिली होती है।
एक स्वस्थ मनुष्य औसतन प्रति मिनट 12–16 बार श्वसन करता है। यदि हम औसत दर 12 प्रति मिनट और TV = 500 मिली मानें, तो प्रति मिनट कुल वायु = 500 × 12 = 6000 मिली। एक घंटे (60 मिनट) में यह मात्रा = 6000 × 60 = 3,60,000 मिली (लगभग 360 लीटर) होगी। (यदि दर 16 प्रति मिनट मानें, तो यह मात्रा लगभग 4,80,000 मिली यानी लगभग 480 लीटर तक पहुँच सकती है — यानी सामान्यतः यह आंकड़ा 360 से 480 लीटर प्रति घंटे के बीच रहता है।)