उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • अध्याय 16

उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन

शरीर की उपापचयी क्रियाओं के दौरान बनने वाले अतिरिक्त व हानिकारक पदार्थों — विशेषकर नाइट्रोजनी अपशिष्टों — को शरीर से बाहर निकालने की पूरी प्रक्रिया, मानव वृक्क की बनावट, मूत्र निर्माण के चरण तथा इस पूरे तंत्र के नियमन का सरल व विस्तृत विवेचन।

1 नाइट्रोजनी अपशिष्ट व उनकी प्रकृति

जीवों की उपापचयी क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट पदार्थ

प्रत्येक जीवधारी अपनी उपापचयी क्रियाओं तथा भोजन के अत्यधिक अवशोषण के कारण शरीर में कई तरह के अनावश्यक पदार्थ इकट्ठा कर लेता है। इनमें अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल, कार्बन डाइऑक्साइड, जल के अतिरिक्त सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड, फॉस्फेट व सल्फेट जैसे आयन भी शामिल हैं। शरीर के आंतरिक वातावरण को संतुलित बनाए रखने के लिए इन पदार्थों का पूर्ण या आंशिक निष्कासन बेहद ज़रूरी होता है, अन्यथा ये शरीर के लिए विषैले सिद्ध हो सकते हैं।

इन सभी अपशिष्टों में सबसे अधिक चिंताजनक श्रेणी नाइट्रोजन-युक्त यौगिकों की है। जीवों में मुख्यतः तीन प्रकार के नाइट्रोजनी अपशिष्ट उत्सर्जित होते हैं — अमोनिया, यूरिया और यूरिक अम्ल। इनमें अमोनिया सर्वाधिक विषैला यौगिक है और इसे शरीर से बाहर निकालने के लिए भारी मात्रा में पानी की दरकार होती है। इसके विपरीत यूरिक अम्ल अपेक्षाकृत कम हानिकारक है और इसे बहुत कम जल के साथ भी बाहर निकाला जा सकता है।

क्यों ज़रूरी है निष्कासन? उपापचयी क्रियाओं से बना अतिरिक्त नाइट्रोजनी पदार्थ यदि शरीर में जमा होता रहे तो वह कोशिकाओं की सामान्य क्रियाशीलता को बिगाड़ सकता है और शरीर द्रवों का परासरणी संतुलन भी गड़बड़ा सकता है। इसीलिए हर जीव में किसी न किसी रूप में उत्सर्जी तंत्र विकसित हुआ है, जो इन अनावश्यक पदार्थों को नियमित रूप से बाहर निकालता रहता है।

जल की उपलब्धता के अनुसार उत्सर्जन के तरीके

किसी जीव में नाइट्रोजनी अपशिष्ट किस रूप में उत्सर्जित होगा, यह मुख्यतः उसके आवास में उपलब्ध जल की मात्रा पर निर्भर करता है। इसी आधार पर जीवों को तीन वर्गों में बाँटा गया है।

वर्गउत्सर्जित पदार्थविशेषताउदाहरण
अमोनियोत्सर्जीअमोनियाअत्यंत सरलता से जल में घुलनशील, विसरण द्वारा शरीर सतह या क्लोम से सीधे बाहर निकल जाती है; वृक्क की भूमिका न्यूनतमअस्थिल मछलियाँ, अधिकांश उभयचर, जलीय कीट
यूरियोत्सर्जीयूरियायकृत में अमोनिया को यूरिया में बदला जाता है, फिर रक्त द्वारा वृक्क तक पहुँचाकर निस्यंदन के बाद उत्सर्जित होता है; जल की तुलनात्मक रूप से कम आवश्यकतास्तनधारी, अधिकांश स्थलीय उभयचर, समुद्री मछलियाँ
यूरिकोत्सर्जीयूरिक अम्लगोलिकाओं या पेस्ट के रूप में बहुत कम जल के साथ बाहर निकलता है; जल-संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक किफ़ायती विधिसरीसृप, पक्षी, स्थलीय घोंघे, कीट

अस्थिल मछलियों, उभयचरों तथा जलीय कीटों जैसे कई जलचरों में अमोनिया सरलता से घुलनशील होने के कारण अमोनियम आयन के रूप में शरीर की सतह अथवा क्लोम (गिल) की सतह से विसरण द्वारा ही बाहर निकल जाती है — इस प्रक्रिया में वृक्क कोई खास भूमिका नहीं निभाते। इसे अमोनियोत्सर्ग प्रक्रिया कहा जाता है और ऐसे जीवों को अमोनियाउत्सर्जी या अमोनोटैलिक कहते हैं।

स्थलीय वातावरण में रहने वाले प्राणियों के सामने जल की कमी एक बड़ी चुनौती होती है, इसलिए वे कम विषैले नाइट्रोजनी अपशिष्टों — यूरिया व यूरिक अम्ल — का उत्सर्जन करना पसंद करते हैं। स्तनधारी, कई स्थलीय उभयचर तथा समुद्री मछलियाँ मुख्यतः यूरिया उत्सर्जित करती हैं और यूरियोत्सर्जी (यूरियोटेलिक) कहलाती हैं। इनमें उपापचयी क्रियाओं से बनी अमोनिया को यकृत यूरिया में परिवर्तित कर रक्त में मुक्त करता है, जिसे वृक्क निस्यंदन के बाद बाहर निकाल देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कुछ प्राणियों के वृक्कों की आधात्री में उचित परासरणता बनाए रखने के लिए यूरिया की थोड़ी मात्रा जान-बूझकर रोक ली जाती है।

सरीसृपों, पक्षियों, स्थलीय घोंघों तथा कीटों में नाइट्रोजनी अपशिष्ट यूरिक अम्ल के रूप में गोलिकाओं या गाढ़े पेस्ट की शक्ल में, बेहद कम जल के साथ, बाहर निकाला जाता है — ऐसे जीव यूरिकअम्लउत्सर्जी (यूरिकोटेलिक) कहलाते हैं।

प्राणी जगत में उत्सर्जी अंगों की विविधता

अकशेरुकियों में उत्सर्जन के लिए प्रायः सरल नलिकाकार संरचनाएँ पाई जाती हैं, जबकि कशेरुकियों में जटिल नलिकाकार अंग विकसित हुए हैं, जिन्हें वृक्क कहा जाता है। नीचे प्राणी जगत में पाए जाने वाले प्रमुख उत्सर्जी अंगों की झलक दी गई है।

  • आदिवृक्कक (प्रोटोनेफ्रिडिया) या ज्वाला कोशिकाएँ: चपटे कृमि (जैसे प्लैनेरिया), रॉटीफर, कुछ एनेलिड व सिफेलोकॉर्डेट (एम्फीऑक्सस) में मिलती हैं। ये मुख्य रूप से आयनों व द्रव के आयतन-नियमन यानी परासरणनियमन से जुड़ी होती हैं।
  • वृक्कक: केंचुए व अन्य एनेलिड कृमियों में पाए जाने वाले नलिकाकार उत्सर्जी अंग हैं, जो नाइट्रोजनी अपशिष्टों को निकालने के साथ-साथ द्रव व आयनों का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • मैलपीगी नलिकाएँ: तिलचट्टे (कॉकरोच) सहित अधिकांश कीटों में उत्सर्जी अंग के रूप में उपस्थित होती हैं और नाइट्रोजनी अपशिष्टों के उत्सर्जन के साथ परासरणनियमन में भी सहायक हैं।
  • शृंगिक ग्रंथियाँ या हरित ग्रंथियाँ: झींगा (प्रॉन) जैसे क्रस्टेशियाई प्राणियों में उत्सर्जन का कार्य करती हैं।

2 मानव उत्सर्जन तंत्र

वृक्क, मूत्र-नलिका, मूत्राशय व मूत्र-मार्ग की बनावट

मनुष्यों का उत्सर्जी तंत्र एक जोड़ी वृक्क, एक जोड़ी मूत्र नलिका (यूरेटर), एक मूत्राशय तथा एक मूत्र मार्ग से मिलकर बना होता है। वृक्क सेम के बीज जैसी आकृति के गहरे भूरे-लाल रंग के अंग हैं, जो उदर गुहा में अंतिम वक्षीय व तीसरी कटि कशेरुका के आस-पास, पृष्ठ की भीतरी सतह से सटे हुए स्थित रहते हैं।

एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य में प्रत्येक वृक्क की लंबाई लगभग 10 से 12 सेंटीमीटर, चौड़ाई 5 से 7 सेंटीमीटर और मोटाई 2 से 3 सेंटीमीटर होती है, जबकि इसका औसत वज़न 120 से 170 ग्राम के बीच रहता है। वृक्क के केंद्रीय हिस्से की भीतरी अवतल सतह के बीचोबीच एक गहरी खांच होती है जिसे हाइलम कहते हैं — इसी रास्ते से मूत्र-नलिका, रक्त वाहिनियाँ व तंत्रिकाएँ वृक्क में प्रवेश करती हैं। हाइलम के ठीक भीतर कीप के आकार की एक रचना होती है जिसे वृक्कीय श्रोणि (पेल्विस) कहा जाता है, और इससे निकलने वाले प्रक्षेपों को चषक (कैलिक्स) कहते हैं।

वृक्क की बाहरी सतह एक मज़बूत संपुट से ढकी रहती है। संरचनात्मक रूप से वृक्क को दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है — बाहरी वल्कुट (कॉर्टेक्स) और भीतरी मध्यांश (मेडुला)। मध्यांश कई शंक्वाकार पिरामिडों में बँटा होता है, जिन्हें मध्यांश पिरामिड कहा जाता है और ये चषकों में खुलते हैं। वल्कुट का वह हिस्सा जो इन पिरामिडों के बीच घुसकर वृक्क-स्तंभ बनाता है, उसे बरतीनी-स्तंभ (Columns of Bertini) कहा जाता है।

याद रखने योग्य आंकड़े वृक्क की लंबाई: 10–12 सेमी • चौड़ाई: 5–7 सेमी • मोटाई: 2–3 सेमी • भार: लगभग 120–170 ग्राम • प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख नेफ्रॉन।

वृक्काणु (नेफ्रॉन) — वृक्क की क्रियात्मक इकाई

प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख अत्यंत महीन, जटिल नलिकाकार संरचनाएँ पाई जाती हैं, जिन्हें वृक्काणु या नेफ्रॉन कहा जाता है — यही वृक्क की वास्तविक क्रियात्मक इकाइयाँ हैं। प्रत्येक नेफ्रॉन दो मुख्य भागों से मिलकर बना होता है — गुच्छ (ग्लोमेरूलस) और वृक्क नलिका।

गुच्छ वास्तव में केशिकाओं (कैपिलरी) का एक जाल है, जो वृक्कीय धमनी की एक शाखा — अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) — से बनता है। गुच्छ से निकलने के बाद रक्त अपवाही धमनिका (efferent arteriole) द्वारा आगे ले जाया जाता है। वृक्क नलिका दोहरी झिल्ली वाले प्यालेनुमा बोमेन संपुट से आरंभ होती है, जिसके अंदर यही गुच्छ स्थित रहता है — गुच्छ व बोमेन संपुट मिलकर मैल्पीगीकाय अथवा वृक्क कणिका (कॉर्पसल) बनाते हैं।

बोमेन संपुट से एक अत्यंत कुंडलित समीपस्थ संवलित नलिका (पीसीटी) शुरू होती है, इसके आगे हेयर-पिन के आकार का हेनले-लूप आता है जिसमें आरोही व अवरोही भुजा होती है। आरोही भुजा से आगे एक और कुंडलित नलिका — दूरस्थ संवलित नलिका (डीसीटी) — प्रारंभ होती है। अनेक नेफ्रॉन की दूरस्थ संवलित नलिकाएँ मिलकर एक सीधी संग्रह नलिका में खुलती हैं, और कई संग्रह नलिकाएँ मिलकर मध्यांश पिरामिड से गुज़रती हुई अंततः वृक्कीय श्रोणि में जा खुलती हैं।

यहाँ एक ज़रूरी बात ध्यान देने योग्य है — नेफ्रॉन के वृक्क कणिका, समीपस्थ संवलित नलिका व दूरस्थ संवलित नलिका वृक्क के वल्कुट भाग में स्थित होते हैं, जबकि हेनले-लूप मध्यांश में धँसा रहता है।

बनावट के आधार पर नेफ्रॉन दो प्रकार के होते हैं। अधिकांश नेफ्रॉन के हेनले-लूप बेहद छोटे होते हैं और मध्यांश में बहुत कम गहराई तक जाते हैं — इन्हें वल्कुटीय वृक्कक कहा जाता है। इसके विपरीत, कुछ नेफ्रॉन के हेनले-लूप लंबे होते हैं और मध्यांश में काफी गहराई तक धँसे रहते हैं — इन्हें सान्निध्य मध्यांश वृक्काणु (जक्सटा मेडुलरी नेफ्रोन) कहते हैं।

गुच्छ से निकलने वाली अपवाही धमनिका, वृक्क नलिका के चारों ओर महीन केशिकाओं का एक जाल बनाती है, जिसे परिनालिका केशिका जाल कहते हैं। इसी जाल से एक पतली वाहिका निकलकर हेनले-लूप के समानांतर चलते हुए 'यू' आकार की संरचना बनाती है, जिसे वासा रेक्टा कहा जाता है। ग़ौरतलब है कि वल्कुटीय नेफ्रॉन में वासा रेक्टा या तो अनुपस्थित होती है या फिर बहुत क्षीण रूप में मौजूद रहती है।

3 मूत्र निर्माण की प्रक्रिया

निस्यंदन, पुनरावशोषण व स्रवण — तीन प्रमुख चरण

मूत्र निर्माण में तीन प्रमुख चरण शामिल होते हैं — गुच्छीय निस्यंदन, पुनरावशोषण तथा स्रवण, और ये सभी क्रियाएँ नेफ्रॉन के अलग-अलग हिस्सों में संपन्न होती हैं।

गुच्छीय निस्यंदन (Glomerular Filtration)

मूत्र निर्माण के पहले चरण में गुच्छ की केशिकाओं द्वारा रक्त का निस्यंदन किया जाता है, जिसे गुच्छ या गुच्छीय निस्यंदन कहते हैं। वृक्क औसतन प्रति मिनट लगभग 1100 से 1200 मिलीलीटर रक्त का निस्यंदन करते हैं, जो हृदय द्वारा एक मिनट में पंप किए गए कुल रक्त के लगभग पाँचवें हिस्से के बराबर है।

गुच्छ की केशिकाओं का रक्त-दाब, रुधिर को तीन परतों से होकर छानता है — गुच्छ की रक्त-केशिका की भीतरी उपकला, बोमेन संपुट की उपकला, तथा इन दोनों परतों के बीच स्थित आधार झिल्ली। बोमेन संपुट की उपकला कोशिकाएँ पदाणु (पोडोसाइट्स) कहलाती हैं, जो एक विशेष तरीके से इस प्रकार सजी होती हैं कि इनके बीच छोटे-छोटे रिक्त स्थान — जिन्हें निस्यंदन खांच या खांच छिद्र (स्लिटपोर) कहते हैं — बन जाते हैं। ये झिल्लियाँ इतनी बारीकी से छानती हैं कि रुधिर के प्लाज़्मा में मौजूद प्रोटीन तो रुक जाती है, जबकि शेष तरल भाग छनकर संपुट की गुहा में इकट्ठा हो जाता है — इसीलिए इसे परा-निस्यंदन (अल्ट्रा फिल्ट्रेशन) कहा जाता है।

गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) = एक स्वस्थ व्यक्ति में लगभग 125 मिली/मिनट अर्थात् 180 लीटर/दिन

वृक्कों द्वारा प्रति मिनट निस्यंदित की गई मात्रा को गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) कहा जाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति में यह दर सामान्यतः 125 मिली प्रति मिनट यानी लगभग 180 लीटर प्रतिदिन होती है।

GFR का स्वनियमन — जक्सटा-ग्लोमेरूलर उपकरण की भूमिका गुच्छ निस्यंदन दर के नियमन के लिए वृक्क एक विशेष क्रियाविधि अपनाते हैं। गुच्छीय आसन्न उपकरण (juxtaglomerular apparatus) — जो अभिवाही व अपवाही धमनिकाओं के संपर्क स्थल पर दूरस्थ संवलित नलिका की कोशिकाओं के रूपांतरण से बनता है — एक बेहद संवेदनशील क्रियाविधि संपन्न करता है। जब गुच्छ निस्यंदन दर में गिरावट आती है, तो यह आसन्न उपकरण रेनिन के स्रवण को सक्रिय कर देता है, जिससे वृक्कीय रुधिर का प्रवाह बढ़कर निस्यंदन दर को पुनः सामान्य स्तर पर ला देता है।

पुनरावशोषण (Reabsorption)

प्रतिदिन बनने वाले निस्यंद का आयतन (लगभग 180 लीटर) यदि रोज़ उत्सर्जित होने वाले वास्तविक मूत्र (लगभग 1.5 लीटर) से तुलना किया जाए तो साफ़ पता चलता है कि इस निस्यंद का करीब 99 प्रतिशत भाग वृक्क नलिकाओं द्वारा वापस रक्त में सोख लिया जाता है — इसी प्रक्रिया को पुनरावशोषण कहा जाता है। यह कार्य वृक्क नलिका की उपकला कोशिकाएँ अलग-अलग खंडों में सक्रिय या निष्क्रिय, दोनों प्रकार की क्रियाविधियों द्वारा संपन्न करती हैं।

उदाहरण के लिए ग्लूकोज, अमीनो अम्ल तथा सोडियम जैसे उपयोगी पदार्थ सक्रिय परिवहन द्वारा पुनः सोख लिए जाते हैं, जबकि नाइट्रोजनी पदार्थ प्रायः निष्क्रिय रूप से अवशोषित होते हैं। नेफ्रॉन के शुरुआती हिस्से में जल का पुनरावशोषण निष्क्रिय क्रिया द्वारा होता है।

नलिकाकार स्रवण (Tubular Secretion)

मूत्र निर्माण के दौरान वृक्क नलिका की कोशिकाएँ निस्यंद में H⁺, K⁺ तथा अमोनिया जैसे कुछ अतिरिक्त पदार्थों को सक्रिय रूप से मिलाती हैं, जिसे नलिकाकार स्रवण कहते हैं। यह क्रिया भी मूत्र निर्माण का एक बेहद अहम हिस्सा है क्योंकि यह शरीर के तरल पदार्थों में आयनी संतुलन तथा अम्ल-क्षार संतुलन को बनाए रखने में सहायक होती है।

4 वृक्क नलिका के विभिन्न भागों के कार्य

प्रत्येक खंड की विशिष्ट भूमिका

समीपस्थ संवलित नलिका (PCT)

वल्कुट में स्थितब्रश बॉर्डर उपकला

यह नलिका सरल घनाकार ब्रश-बॉर्डर उपकला से बनी होती है, जो पुनरावशोषण के लिए उपलब्ध सतह क्षेत्र को काफी बढ़ा देती है। यहाँ लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्व, 70 से 80 प्रतिशत वैद्युत-अपघट्य तथा जल का पुनरावशोषण होता है। इसके साथ ही यह नलिका शरीर के तरलों का pH व आयनी संतुलन बनाए रखने के लिए H⁺ व अमोनिया आयनों का स्रवण तथा बाइकार्बोनेट (HCO₃⁻) का पुनरावशोषण भी करती है।

हेनले-लूप

मध्यांश में स्थितपरासरणी प्रवणता का नियमन

हेनले-लूप की आरोही भुजा में पुनरावशोषण न्यूनतम होता है, लेकिन यह भाग मध्यांश में उच्च अंतराकाशी तरल परासरणता के नियमन में अहम भूमिका निभाता है। अवरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य होती है परंतु वैद्युत-अपघट्यों के लिए सक्रिय या धीमी गति से पारगम्य रहती है, जिससे नीचे जाते हुए निस्यंद क्रमशः सांद्र होता जाता है। इसके ठीक विपरीत आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य होती है, लेकिन वैद्युत-अपघट्यों का अवशोषण सक्रिय अथवा निष्क्रिय दोनों रूपों में करती है — जिससे ऊपर की ओर बढ़ता निस्यंद धीरे-धीरे तनु (पतला) होता जाता है।

दूरस्थ संवलित नलिका (DCT)

वल्कुट में स्थितचयनात्मक स्रवण

विशिष्ट परिस्थितियों में सोडियम व जल का कुछ हिस्सा इसी भाग में पुनः अवशोषित होता है। दूरस्थ संवलित नलिका रक्त में सोडियम-पोटैशियम के संतुलन तथा pH को स्थिर बनाए रखने के लिए बाइकार्बोनेट का पुनरावशोषण तथा H⁺, K⁺ व अमोनिया का चयनात्मक स्रवण करती है।

संग्रह नलिका

वल्कुट से मध्यांश तक विस्तृतमूत्र का सांद्रण

यह लंबी नलिका वृक्क के वल्कुट से लेकर मध्यांश के आंतरिक हिस्से तक फैली रहती है। शरीर की ज़रूरत के अनुसार मूत्र को सांद्र बनाने के लिए जल का बड़ा हिस्सा इसी भाग में अवशोषित किया जाता है। यह मध्यांश की अंतराकाशी परासरणता को बनाए रखने के लिए यूरिया के कुछ अंश को भी मध्यांश तक पहुँचाती है, और साथ ही pH के नियमन तथा H⁺ व K⁺ आयनों के चयनात्मक स्रवण द्वारा रक्त में आयनी संतुलन बनाए रखने में भी योगदान देती है।

5 निस्यंद के सांद्रण की क्रियाविधि

प्रतिधारा क्रियाविधि — सांद्रित मूत्र बनाने का रहस्य

स्तनधारी अपेक्षाकृत सांद्रित मूत्र बनाने में सक्षम होते हैं, और इस कार्य में हेनले-लूप तथा वासा रेक्टा की केंद्रीय भूमिका होती है। हेनले-लूप की दोनों भुजाओं में निस्यंद का प्रवाह विपरीत दिशाओं में होता है, जिससे एक प्रतिधारा तंत्र उत्पन्न हो जाता है। इसी तरह वासा रेक्टा की दोनों भुजाओं में रक्त का बहाव भी प्रतिधारा प्रतिरूप में होता है।

हेनले-लूप व वासा रेक्टा की आपसी नज़दीकी तथा उनमें बना यह प्रतिधारा तंत्र, मध्यांशी अंतराकाश (मेडुलरी इंटरस्टिशियम) के परासरण दाब को बड़ी बारीकी से नियंत्रित करता है। परासरण दाब मध्यांश के बाहरी भाग से भीतरी भाग की ओर लगातार बढ़ता जाता है — वल्कुट की तरफ करीब 300 mOsm/लीटर से लेकर आंतरिक मध्यांश में लगभग 1200 mOsm/लीटर तक। यह प्रवणता मुख्यतः सोडियम क्लोराइड तथा यूरिया की मौजूदगी के कारण बनती है।

NaCl का स्थानांतरण हेनले-लूप की आरोही भुजा द्वारा होता है, जिसे अवरोही भुजा के साथ विनिमित किया जाता है। सोडियम क्लोराइड को अंतराकाश से वासा रेक्टा की आरोही भुजा द्वारा वापस लौटा दिया जाता है। इसी प्रकार यूरिया की कुछ मात्रा हेनले-लूप के पतले आरोही भाग में विसरण द्वारा प्रवेश करती है, जिसे संग्रह नलिका द्वारा दोबारा अंतराकाशी क्षेत्र में लौटा दिया जाता है।

प्रतिधारा क्रियाविधि का महत्व हेनले-लूप तथा वासा रेक्टा की यह विशेष व्यवस्था मिलकर मध्यांश की अंतराकाशी प्रवणता को बनाए रखती है। इसी प्रवणता की वजह से संग्रह नलिका जल का सहज अवशोषण कर पाती है और निस्यंद को काफी सांद्र बना देती है। नतीजा यह होता है कि हमारे वृक्क शुरुआती निस्यंद की तुलना में लगभग चार गुना अधिक सांद्र मूत्र उत्सर्जित करते हैं — यही जल के अनावश्यक ह्रास को रोकने वाली मुख्य क्रियाविधि है।

6 वृक्क क्रियाओं का नियमन

हार्मोन-आधारित नियंत्रण प्रणाली

वृक्कों की क्रियाशीलता का नियंत्रण व नियमन मुख्यतः हाइपोथैलेमस के हार्मोन-आधारित पुनर्भरण (फीडबैक) तंत्र, सान्निध्य गुच्छ उपकरण (JGA) तथा कुछ सीमा तक हृदय द्वारा किया जाता है।

परासरण ग्राहियाँ व ADH

शरीर में उपस्थित परासरण ग्राहियाँ रक्त आयतन, शरीर तरल आयतन तथा आयनी सांद्रण में होने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील होकर सक्रिय हो जाती हैं। जब शरीर से मूत्र के ज़रिए जल की मात्रा अत्यधिक कम होने लगती है (मूत्रलता या डाइयूरेसिस), तो ये ग्राहियाँ सक्रिय हो जाती हैं, जिससे हाइपोथैलेमस प्रतिमूत्रल हार्मोन (एंटीडाइयूरेटिक हार्मोन/ADH) तथा न्यूरोहाइपोफाइसिस को वैसोप्रेसिन के स्रवण हेतु प्रेरित करता है।

ADH वृक्क नलिका के अंतिम भाग में जल के पुनरावशोषण को सुगम बनाता है और इस तरह मूत्रलता को नियंत्रित रखता है। इसके विपरीत, जब शरीर के तरल का आयतन बढ़ जाता है, तो परासरण ग्राहियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं और ADH के स्रवण को रोक देती हैं। इसके अलावा ADH रक्त वाहिनियों पर संकुचनी प्रभाव डालकर भी वृक्क के कार्यों को प्रभावित करता है, जिससे रक्तदाब बढ़ता है, गुच्छ में रक्त प्रवाह बढ़ता है और अंततः GFR भी बढ़ जाता है।

रेनिन-एंजियोटेंसिन क्रियाविधि

सान्निध्य गुच्छ उपकरण (JGA) की भूमिका इस पूरे नियमन तंत्र में काफी जटिल व महत्वपूर्ण है। जब गुच्छीय रक्त प्रवाह, रक्त दाब या GFR में गिरावट आती है, तो JG कोशिकाएँ सक्रिय होकर रेनिन नामक एंजाइम मुक्त करती हैं। रेनिन रक्त में मौजूद एंजियोटेंसिनोजन को एंजियोटेंसिन-I में और फिर एंजियोटेंसिन-द्वितीय में बदल देता है।

रेनिन के स्रवण से गिरावट में सुधार → एंजियोटेंसिनोजन → एंजियोटेंसिन-I → एंजियोटेंसिन-II → वाहिका संकुचन + एल्डोस्टीरोन स्रवण → रक्तदाब व GFR में वृद्धि

एंजियोटेंसिन-द्वितीय एक शक्तिशाली वाहिका संकीर्णक (वेसोकंस्ट्रिक्टर) है, जो गुच्छीय रुधिर दाब तथा GFR को बढ़ा देता है। यह अधिवृक्क वल्कुट को एल्डोस्टीरोन हार्मोन के स्रवण के लिए भी प्रेरित करता है। एल्डोस्टीरोन के प्रभाव से नलिका के दूरस्थ भाग में सोडियम व जल का पुनरावशोषण होता है, जिससे रक्तदाब व GFR दोनों में और वृद्धि होती है। यह पूरी जटिल क्रियाविधि रेनिन-एंजियोटेंसिन क्रियाविधि कहलाती है।

अलिंदीय नेट्रियूरेटिक कारक (ANF)

जब हृदय के अलिंदों में अधिक मात्रा में रक्त का बहाव होता है, तो अलिंदीय नेट्रियूरेटिक कारक (ANF) का स्रवण होता है। ANF रक्त वाहिकाओं का विस्फारण (चौड़ा होना) करता है जिससे रक्तदाब कम हो जाता है। इस तरह ANF की क्रियाविधि रेनिन-एंजियोटेंसिन तंत्र पर एक तरह के नियंत्रक की तरह कार्य करती है और दोनों तंत्र मिलकर शरीर में द्रव-संतुलन को स्थिर बनाए रखते हैं।

7 मूत्रण की क्रियाविधि

मूत्राशय से मूत्र के निष्कासन की प्रक्रिया

वृक्क द्वारा निर्मित मूत्र अंततः मूत्राशय में एकत्र होता जाता है और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र द्वारा ऐच्छिक संकेत न मिलने तक वहीं संग्रहित रहता है। जैसे-जैसे मूत्राशय में मूत्र भरता जाता है, उसकी दीवार खिंचती है और इसी खिंचाव के फलस्वरूप एक तंत्रिकीय संकेत उत्पन्न होता है। यह संकेत मूत्राशय की भित्ति से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचाया जाता है।

इसके जवाब में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र मूत्राशय की चिकनी पेशियों के संकुचन तथा मूत्राशयी-अवरोधिनी के शिथिलन के लिए एक प्रेरक संदेश भेजता है, जिससे मूत्र का उत्सर्जन संभव हो पाता है। मूत्र के इस उत्सर्जन को मूत्रण कहा जाता है, और इसे संपन्न करने वाली तंत्रिकीय क्रियाविधि मूत्रण-प्रतिवर्त कहलाती है।

मूत्र से जुड़े कुछ रोचक तथ्य एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य औसतन प्रतिदिन लगभग 1 से 1.5 लीटर मूत्र उत्सर्जित करता है। मूत्र एक विशेष गंध वाला जलीय तरल है, जिसका रंग हल्का पीला तथा प्रकृति थोड़ी अम्लीय (pH लगभग 6) होती है। इसमें प्रतिदिन औसतन 25 से 30 ग्राम यूरिया का उत्सर्जन होता है। मूत्र का विश्लेषण वृक्कों के कई उपापचयी विकारों तथा उनके ठीक से कार्य न कर पाने की स्थिति (कुसंक्रिया) को पहचानने में डॉक्टरों की मदद करता है — उदाहरण के लिए मूत्र में ग्लूकोज की उपस्थिति (ग्लाइकोसूरिया) तथा कीटोन काय की उपस्थिति (कीटोनयूरिया) मधुमेह (डायबिटीज़ मेलीटस) के प्रमुख लक्षण माने जाते हैं।

8 उत्सर्जन में अन्य अंगों की भूमिका

वृक्कों के अलावा भी शरीर के कई अंग उत्सर्जन में योगदान देते हैं

उत्सर्जन का पूरा भार अकेले वृक्कों पर नहीं रहता — फुफ्फुस (फेफड़े), यकृत और त्वचा भी शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में सहयोग करते हैं।

  • फुफ्फुस (फेफड़े): हमारे फेफड़े प्रतिदिन काफी भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (लगभग 200 मिली प्रति मिनट) तथा पर्याप्त जल-वाष्प का निष्कासन करते हैं।
  • यकृत: हमारे शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि यकृत, पित्त का स्राव करती है, जिसमें बिलिरूबिन, बिलिवर्डिन, कॉलेस्ट्रॉल, निम्नीकृत स्टीरॉयड हार्मोन, विटामिन तथा कुछ औषध जैसे पदार्थ मौजूद रहते हैं। इनमें से अधिकांश पदार्थ अंततः मल के साथ शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं।
  • त्वचा: त्वचा में उपस्थित स्वेद ग्रंथियाँ तथा तैल ग्रंथियाँ भी स्राव के ज़रिए कुछ पदार्थों का निष्कासन करती हैं। स्वेद ग्रंथि से निकलने वाला पसीना एक जलीय द्रव है, जिसमें नमक, कुछ मात्रा में यूरिया तथा लैक्टिक अम्ल पाया जाता है। हालाँकि पसीने का मुख्य कार्य वाष्पीकरण के ज़रिए शरीर की सतह को ठंडा रखना है, फिर भी यह कुछ अपशिष्ट पदार्थों के उत्सर्जन में भी सहायता करता है। तैल ग्रंथियाँ सीबम के ज़रिए स्टेरॉल, हाइड्रोकार्बन व मोम जैसे पदार्थ बाहर निकालती हैं, जो त्वचा को एक सुरक्षात्मक तैलीय परत भी प्रदान करते हैं।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कुछ नाइट्रोजनी अपशिष्टों का निष्कासन लार के ज़रिए भी होता है।

9 वृक्क-विकृतियाँ

वृक्क सम्बन्धी रोग, उपचार व आधुनिक चिकित्सा विधियाँ

जब वृक्कों की कुसंक्रिया (सामान्य रूप से कार्य न कर पाना) होती है, तो इसके परिणामस्वरूप रक्त में यूरिया एकत्र होने लगता है, जिसे यूरिमिया कहा जाता है — यह अवस्था अत्यंत हानिकारक होती है और वृक्क-पात (किडनी फेलियर) के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार मानी जाती है।

रक्त अपोहन (हीमोडायलिसिस)

यूरिमिया के मरीज़ों में यूरिया के निष्कासन के लिए हीमोडायलिसिस (रक्त अपोहन) का सहारा लिया जाता है। इस प्रक्रिया में रोगी की धमनी से रक्त निकालकर, उसमें हिपेरिन जैसा कोई थक्का-रोधी पदार्थ मिलाकर, अपोहनकारी इकाई में भेजा जाता है, जिसे कृत्रिम वृक्क कहा जाता है।

इस इकाई में एक कुंडलित सेलोफेन नली होती है जो एक विशेष एस द्रव से घिरी रहती है, जिसका संगठन नाइट्रोजनी अपशिष्टों को छोड़कर लगभग रक्त-प्लाज़्मा जैसा ही होता है। छिद्रयुक्त सेलोफेन झिल्ली से अपोहनी द्रव में अणुओं का आवागमन सांद्रता प्रवणता के अनुसार होता है। चूँकि अपोहनी द्रव में नाइट्रोजनी अपशिष्ट अनुपस्थित होते हैं, इसलिए ये पदार्थ रक्त से बाहर की ओर गमन करते हैं और रक्त शुद्ध हो जाता है। शुद्ध किए गए रक्त में हिपेरिन-विरोधी पदार्थ मिलाकर, इसे रोगी की शिराओं द्वारा पुनः शरीर में भेज दिया जाता है। यह विधि दुनियाभर में यूरेमिक व्याधि से पीड़ित हज़ारों लोगों के लिए एक बड़ा वरदान साबित हुई है।

वृक्क प्रत्यारोपण

वृक्क की स्थायी क्रियाहीनता को दूर करने का सबसे अंतिम व स्थायी उपाय वृक्क प्रत्यारोपण (किडनी ट्रांसप्लांट) है। प्रत्यारोपण में मुख्यतः किसी निकट संबंधी दाता के स्वस्थ व क्रियाशील वृक्क का उपयोग किया जाता है, ताकि प्राप्तकर्ता का प्रतिरक्षा तंत्र उसे अस्वीकार न करे। आधुनिक क्लीनिकल विधियों ने इस जटिल तकनीक की सफलता दर को काफी हद तक बढ़ा दिया है।

अन्य सामान्य वृक्क विकार

विकारसंक्षिप्त विवरण
रीनल केलकलाई (गुर्दे की पथरी)वृक्क में बनने वाली पथरी या अघुलनशील क्रिस्टलित लवण के पिंड, जैसे ऑक्सलेट आदि के जमाव से बनती है।
ग्लोमेलोनेफ्राइटिस (गुच्छ शोथ)वृक्क के गुच्छ में होने वाली सूजन व प्रदाहकता, जो निस्यंदन क्षमता को प्रभावित कर सकती है।

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय (उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन) से विगत वर्षों में आए प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 निम्नलिखित में से कौन सा प्राणी यूरिकोत्सर्जी (uricotelic) है — (a) मनुष्य (b) मेंढक (c) पक्षी (d) अस्थिल मछली।

उत्तर: (c) पक्षी।

पक्षी, सरीसृप, स्थलीय घोंघे व कीट यूरिक अम्ल को गोलिकाओं या गाढ़े पेस्ट के रूप में बहुत कम जल के साथ उत्सर्जित करते हैं — यह जल-संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक किफ़ायती विधि है, जो अंडे के भीतर विकसित होने वाले भ्रूण के लिए भी लाभदायक है (क्योंकि विषैली अमोनिया अंडे में जमा नहीं होती)। मनुष्य व मेंढक यूरियोत्सर्जी तथा अस्थिल मछली अमोनियोत्सर्जी होती है — यह वर्गीकरण NEET में सबसे अधिक दोहराया जाने वाला प्रश्न है।

2 गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) का सामान्य मान क्या है, तथा इसे किस उपकरण द्वारा स्वनियमित किया जाता है?

उत्तर: सामान्य GFR लगभग 125 मिली/मिनट (180 लीटर/दिन); इसे जक्सटा-ग्लोमेरूलर उपकरण (JGA) द्वारा स्वनियमित किया जाता है।

जब GFR में गिरावट आती है, तो JG कोशिकाएँ रेनिन का स्रवण बढ़ाकर वृक्कीय रक्त प्रवाह को सुधारती हैं और GFR को पुनः सामान्य स्तर पर ले आती हैं। यह संख्यात्मक तथ्य (125 मिली/मिनट, 180 लीटर/दिन) NEET में लगभग हर वर्ष प्रत्यक्ष रूप से पूछा जाता है, कभी-कभी हृदय के कुल रक्त-प्रवाह के अनुपात (लगभग 1/5) के साथ भी जोड़ा जाता है।

3 बोमेन संपुट में स्थित उपकला कोशिकाओं को क्या कहते हैं, और इनकी विशेष संरचना का क्या महत्व है?

उत्तर: पदाणु (पोडोसाइट्स); इनकी विशेष व्यवस्था से बनी निस्यंदन खांच (स्लिट पोर) परा-निस्यंदन (अल्ट्राफिल्ट्रेशन) को संभव बनाती है, जिससे रक्त-प्लाज़्मा की प्रोटीन रुक जाती है और शेष तरल भाग छनकर संपुट में इकट्ठा होता है।

यह वृक्क-कणिका की सूक्ष्म संरचना (गुच्छ केशिका उपकला + आधार झिल्ली + पोडोसाइट परत — तीन परतें) से संबंधित प्रश्न NEET में diagram-based या definition-based दोनों रूपों में पूछा जाता रहा है।

4 निस्यंद के प्रतिदिन बनने वाले आयतन (180 लीटर) की तुलना में वास्तविक उत्सर्जित मूत्र की मात्रा (लगभग 1.5 लीटर) से यह पता चलता है कि निस्यंद का कितना प्रतिशत भाग पुनः अवशोषित हो जाता है?

उत्तर: लगभग 99 प्रतिशत।

यह पुनरावशोषण मुख्यतः समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में होता है, जहाँ ग्लूकोज, अमीनो अम्ल व सोडियम जैसे उपयोगी पदार्थ सक्रिय परिवहन द्वारा तथा जल निष्क्रिय रूप से पुनः अवशोषित होते हैं। यह "99% पुनरावशोषण" वाला numerical concept NEET का बहुत उच्च-आवृत्ति वाला प्रश्न है, जो अक्सर GFR (180 L/day) व वास्तविक मूत्र मात्रा (1.5 L/day) दोनों आंकड़ों के साथ मिलाकर पूछा जाता है।

5 हेनले-लूप की आरोही व अवरोही भुजा में जल व वैद्युत-अपघट्यों (NaCl) की पारगम्यता के संदर्भ में क्या अंतर है?

उत्तर: अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य किंतु वैद्युत-अपघट्यों के लिए अपेक्षाकृत अपारगम्य होती है; आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य किंतु वैद्युत-अपघट्यों (विशेषकर NaCl) के लिए पारगम्य होती है।

यह विपरीत पारगम्यता ही प्रतिधारा क्रियाविधि (countercurrent mechanism) का आधार है, जिससे मध्यांश में परासरणी प्रवणता (300 से 1200 mOsm/L) बनी रहती है। NEET में इस भुजा-विशिष्ट पारगम्यता को अक्सर उलट कर गलत विकल्प के रूप में दिया जाता है — इसलिए "आरोही = अपारगम्य जल के लिए, अवरोही = पारगम्य जल के लिए" यह क्रम बिल्कुल स्पष्ट याद रखें।

6 मध्यांश (मेडुला) में परासरणी प्रवणता वल्कुट से आंतरिक भाग की ओर किस सीमा तक बढ़ती है?

उत्तर: वल्कुट के पास लगभग 300 mOsm/लीटर से आंतरिक मध्यांश में लगभग 1200 mOsm/लीटर तक।

यह प्रवणता मुख्यतः सोडियम क्लोराइड व यूरिया की मौजूदगी के कारण बनती है, और इसी की वजह से संग्रह नलिका मूत्र को सांद्र बना पाती है — हमारे वृक्क शुरुआती निस्यंद की तुलना में लगभग चार गुना अधिक सांद्र मूत्र उत्सर्जित करते हैं। यह "300 से 1200" वाला संख्यात्मक क्रम NEET में सीधे तथा प्रतिधारा क्रियाविधि के diagram-based प्रश्नों दोनों में पूछा जाता है।

7 रेनिन-एंजियोटेंसिन क्रियाविधि में रेनिन के स्रावित होने का ट्रिगर क्या है, तथा इसका अंतिम परिणाम क्या होता है?

उत्तर: ट्रिगर — गुच्छीय रक्त प्रवाह/रक्त दाब/GFR में गिरावट; अंतिम परिणाम — एंजियोटेंसिन-II द्वारा वाहिका संकुचन तथा एल्डोस्टीरोन स्रवण, जिससे रक्तदाब व GFR दोनों में वृद्धि होती है।

यह क्रम है: GFR गिरावट → JG कोशिकाएँ सक्रिय → रेनिन स्रावित → एंजियोटेंसिनोजन → एंजियोटेंसिन-I → एंजियोटेंसिन-II (वाहिका संकीर्णक) → अधिवृक्क वल्कुट से एल्डोस्टीरोन → वृक्क नलिका में Na⁺ व जल पुनरावशोषण। यह पूरा pathway NEET में अक्सर flow-chart पूर्ण करने या क्रम सही करने (sequence-based) प्रश्न के रूप में पूछा जाता है।

8 ADH (एंटीडाइयूरेटिक हार्मोन) की कमी से कौन सी अवस्था उत्पन्न होती है, और इसका मुख्य लक्षण क्या है?

उत्तर: उदकमेह (डायबिटीज़ इन्सीपिडस); इसमें वृक्क की जल-संरक्षण क्षमता में ह्रास हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक तनु (dilute) मूत्र का उत्सर्जन तथा निर्जलीकरण होता है।

यह "डायबिटीज़ इन्सीपिडस" (ADH की कमी से) को "डायबिटीज़ मेलीटस" (इंसुलिन की कमी से) के साथ भ्रमित न करने वाला प्रश्न NEET का classic ट्रैप है — दोनों नाम मिलते-जुलते हैं परंतु कारण व तंत्र पूर्णतः भिन्न हैं (एक वृक्क/हार्मोन से, दूसरा अग्नाशय/इंसुलिन से जुड़ा)।

9 मूत्र में ग्लूकोज की उपस्थिति (ग्लाइकोसूरिया) तथा कीटोन काय की उपस्थिति (कीटोनयूरिया) किस रोग के प्रमुख लक्षण माने जाते हैं?

उत्तर: मधुमेह (डायबिटीज़ मेलीटस)।

सामान्य अवस्था में समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोज का लगभग पूर्ण पुनरावशोषण हो जाता है, परंतु मधुमेह में रक्त-ग्लूकोज स्तर वृक्क की पुनरावशोषण-क्षमता (रीनल थ्रेशोल्ड) से अधिक हो जाने के कारण ग्लूकोज मूत्र में उत्सर्जित होने लगता है — यह मूत्र-विश्लेषण द्वारा वृक्क व उपापचयी विकारों के निदान से जुड़ा एक व्यावहारिक व बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न है।

10 हीमोडायलिसिस (कृत्रिम वृक्क) की प्रक्रिया में अपोहनी द्रव (dialysing fluid) की संरचना रक्त-प्लाज़्मा से किस प्रमुख बिंदु पर भिन्न होती है, और यह भिन्नता ही अपोहन को क्यों संभव बनाती है?

उत्तर: अपोहनी द्रव में नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ अनुपस्थित होते हैं, जबकि शेष संगठन रक्त-प्लाज़्मा जैसा ही होता है — यही सांद्रता प्रवणता (concentration gradient) के कारण नाइट्रोजनी अपशिष्ट रक्त से अपोहनी द्रव की ओर विसरित होकर बाहर निकल जाते हैं।

चूँकि सेलोफेन झिल्ली छिद्रयुक्त होती है और अणुओं का आवागमन सांद्रता प्रवणता के अनुसार होता है, इसलिए यह "अनुपस्थित पदार्थ = नाइट्रोजनी अपशिष्ट" वाला बिंदु NEET में fill-in-the-blank या assertion-reason प्रारूप में पूछा जाता रहा है।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय (उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन) NEET में लगभग हर वर्ष 2-3 प्रश्न देता है, जिसमें सबसे अधिक बार संख्यात्मक तथ्य (GFR, पुनरावशोषण प्रतिशत, परासरणी प्रवणता) व शब्दावली-आधारित (नेफ्रॉन के भागों के नाम, हार्मोन के नाम) प्रश्न दोहराए जाते हैं।
तथ्य
  • बायाँ वृक्क दाएँ वृक्क की तुलना में थोड़ा ऊपर स्थित होता है — इसका कारण यह है कि दाईं ओर यकृत (लिवर) के होने से दायाँ वृक्क थोड़ा नीचे की ओर धकेला जाता है। यह सूक्ष्म शारीरिक-रचना संबंधी तथ्य कभी-कभी सीधे पूछ लिया जाता है।
तथ्य
  • बनावट के आधार पर लगभग 85% नेफ्रॉन वल्कुटीय (कॉर्टिकल) प्रकार के होते हैं, जिनका हेनले-लूप छोटा होता है, जबकि शेष 15% सान्निध्य मध्यांश (जक्सटामेडुलरी) नेफ्रॉन होते हैं, जिनका हेनले-लूप लंबा व मध्यांश में गहराई तक धँसा होता है — वासा रेक्टा मुख्यतः इन्हीं जक्सटामेडुलरी नेफ्रॉन में सुविकसित रूप में पाई जाती है।
  • दोनों वृक्कों को मिलाकर मनुष्य में कुल नेफ्रॉन की संख्या लगभग 20 लाख (प्रत्येक वृक्क में ~10 लाख) होती है — यह इकाई-वार व कुल दोनों रूपों में पूछी जा सकती है, इसलिए इस अंतर को स्पष्ट रखें।
तुलनात्मक
  • काउंटर-करंट मल्टीप्लायर बनाम काउंटर-करंट एक्सचेंजर — हेनले-लूप में विपरीत दिशा में बहने वाला प्रवाह मध्यांश की परासरणी प्रवणता को सक्रिय रूप से 'बढ़ाता' (मल्टीप्लाई करता) है, इसलिए इसे काउंटर-करंट मल्टीप्लायर कहा जाता है; जबकि वासा रेक्टा में रक्त-प्रवाह इस प्रवणता को केवल बनाए रखने का काम करता है (सक्रिय रूप से नहीं बढ़ाता), इसलिए इसे काउंटर-करंट एक्सचेंजर कहा जाता है — दोनों शब्दों को एक-दूसरे की जगह प्रयोग करना एक सामान्य त्रुटि है।
तथ्य
  • वृक्कीय देहली (रीनल थ्रेशोल्ड) — रक्त-प्लाज़्मा में ग्लूकोज की वह सांद्रता (लगभग 180 mg/dL) जिसके ऊपर जाने पर PCT ग्लूकोज का पूर्ण पुनरावशोषण नहीं कर पाता और मूत्र में ग्लूकोज दिखने लगता है (ग्लाइकोसूरिया) — यह संख्यात्मक मान अक्सर मधुमेह से जोड़कर पूछा जाता है।
तथ्य
  • यकृत में अमोनिया को यूरिया में बदलने वाली जैवरासायनिक क्रिया-श्रृंखला को ऑर्निथीन चक्र (यूरिया चक्र) कहा जाता है — यह नाम अक्सर "यकृत यूरिया कैसे बनाता है" जैसे प्रश्नों में उत्तर-विकल्प के रूप में दिया जाता है।
तुलनात्मक
  • वृक्क-कणिका (मैल्पीगीकाय) बनाम संपूर्ण नेफ्रॉन — वृक्क-कणिका केवल गुच्छ + बोमेन संपुट के संयोजन को कहते हैं, न कि पूरी वृक्क नलिका सहित संपूर्ण नेफ्रॉन को — इन दोनों शब्दों को समानार्थी मान लेना एक सामान्य शब्दावली-त्रुटि है।
तथ्य
  • निस्यंदन-अवरोध (फिल्ट्रेशन बैरियर) तीन परतों से मिलकर बनता है — गुच्छ केशिका की भीतरी उपकला, आधार झिल्ली, तथा पदाणु (पोडोसाइट) परत — ये तीनों मिलकर रक्त-कोशिकाओं व प्लाज़्मा-प्रोटीन को रोकते हुए केवल जल व छोटे विलेय पदार्थों को छानने देती हैं।
तुलनात्मक
  • रीनल कैल्कुलाई (गुर्दे की पथरी) के प्रकार — अधिकांश पथरियाँ कैल्सियम ऑक्सलेट के जमाव से बनती हैं, परंतु कुछ मामलों में यूरिक अम्ल के क्रिस्टलीकरण से भी पथरी बन सकती है — पथरी का प्रकार सदैव एक जैसा नहीं होता, यह एक सूक्ष्म पर महत्वपूर्ण अंतर है।
तुलनात्मक
  • हीमोडायलिसिस बनाम वृक्क प्रत्यारोपण — हीमोडायलिसिस एक अस्थायी व बार-बार दोहराई जाने वाली प्रक्रिया है (रोगी को नियमित अंतराल पर करानी पड़ती है), जबकि वृक्क प्रत्यारोपण वृक्क-पात की स्थायी व अंतिम उपचार-विधि है — दोनों को एक-दूसरे का विकल्प (और बराबर स्थायित्व वाला) समझना गलत है।
तुलनात्मक
  • अकशेरुकी उत्सर्जी अंगों का सही मिलान — कभी न उलझाएँ — प्लैनेरिया व अन्य चपटे कृमि: ज्वाला कोशिकाएँ (प्रोटोनेफ्रिडिया); केंचुआ (एनेलिड): वृक्कक (नेफ्रीडिया); कॉकरोच व अधिकांश कीट: मैल्पीगी नलिकाएँ; झींगा (प्रॉन) जैसे क्रस्टेशियाई: शृंगिक/हरित ग्रंथियाँ — इन चारों जोड़ियों को आपस में बदल देना NEET में एक बहुत सामान्य त्रुटि है।
तथ्य
  • वृक्क शरीर के कुल भार का मात्र लगभग 1% होते हुए भी, हृदय द्वारा पंप किए गए कुल रक्त का लगभग 20-25% प्राप्त करते हैं — यह असाधारण रूप से उच्च रक्त-प्रवाह अनुपात वृक्कों की निरंतर उच्च चयापचयी सक्रियता को दर्शाता है।
तथ्य
  • ADH को वैसोप्रेसिन भी कहा जाता है — इसका संश्लेषण हाइपोथैलेमस में होता है, परंतु इसका स्रवण न्यूरोहाइपोफाइसिस (पश्च पीयूष ग्रंथि) से होता है — संश्लेषण-स्थल व स्रवण-स्थल की यह भिन्नता अक्सर ट्रैप के रूप में पूछी जाती है।
तुलनात्मक
  • एल्डोस्टीरोन अधिवृक्क वल्कुट (एड्रीनल कॉर्टेक्स) से स्रावित होता है, न कि अधिवृक्क मध्यांश (एड्रीनल मेड्यूला) से — मेड्यूला तो एपिनेफ्रिन व नॉरएपिनेफ्रिन जैसे हार्मोन स्रावित करता है। कॉर्टेक्स व मेड्यूला के हार्मोनों को आपस में बदल देना एक सामान्य त्रुटि है।
रणनीति
  • दोहराव के लिए सबसे प्रभावी रणनीति — रोज़ एक बार संख्याएँ (GFR 125 mL/min, पुनरावशोषण 99%, परासरणी प्रवणता 300–1200 mOsm/L, रीनल थ्रेशोल्ड 180 mg/dL, नेफ्रॉन अनुपात 85:15) व एक बार शब्दावली-जोड़े (वृक्क-कणिका बनाम नेफ्रॉन, मल्टीप्लायर बनाम एक्सचेंजर, कॉर्टेक्स बनाम मेड्यूला के हार्मोन) दोहराएँ — इसी अध्याय के अधिकांश ट्रैप प्रश्न इन्हीं दो श्रेणियों से बनते हैं।

संक्षिप्त सार

नाइट्रोजनी अपशिष्ट

अमोनिया सबसे विषैला व सर्वाधिक जल की माँग करने वाला अपशिष्ट है, यूरिया मध्यम विषाक्तता वाला है, जबकि यूरिक अम्ल सबसे कम जल में उत्सर्जित होने वाला सुरक्षित पदार्थ है — इसी आधार पर जीवों को अमोनियोत्सर्जी, यूरियोत्सर्जी व यूरिकोत्सर्जी में बाँटा गया है।

मानव उत्सर्जन तंत्र

एक जोड़ी वृक्क, मूत्र-नलिका, मूत्राशय व मूत्र-मार्ग से बना यह तंत्र प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन के ज़रिए रक्त को शुद्ध करता है। नेफ्रॉन गुच्छ व वृक्क नलिका से मिलकर बनता है।

मूत्र निर्माण के चरण

निस्यंदन (गुच्छ द्वारा), पुनरावशोषण (99% निस्यंद वापस अवशोषित) व स्रवण (H⁺, K⁺, अमोनिया) — तीनों मिलकर मूत्र बनाते हैं। प्रतिदिन 180 लीटर निस्यंद से सिर्फ 1–1.5 लीटर मूत्र ही अंततः बाहर निकलता है।

प्रतिधारा क्रियाविधि

हेनले-लूप व वासा रेक्टा मिलकर मध्यांश में परासरणी प्रवणता (300 से 1200 mOsm/L) बनाए रखते हैं, जिससे संग्रह नलिका मूत्र को लगभग चार गुना सांद्र बना पाती है — यही जल-संरक्षण की मुख्य क्रियाविधि है।

हार्मोनी नियमन

ADH जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है, जबकि रेनिन-एंजियोटेंसिन क्रियाविधि व एल्डोस्टीरोन रक्तदाब व GFR को नियंत्रित करते हैं। ANF इस तंत्र पर नियंत्रक की भूमिका निभाता है।

अन्य उत्सर्जी अंग व विकार

फेफड़े CO₂ निकालते हैं, यकृत पित्त-वर्णक निकालता है, त्वचा पसीने से यूरिया व नमक निकालती है। यूरिमिया, गुर्दे की पथरी व गुच्छ-शोथ प्रमुख विकार हैं; हीमोडायलिसिस व वृक्क प्रत्यारोपण इनके उपचार हैं।

? प्रश्न-उत्तर

हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

प्रश्न 1 गुच्छीय निस्यंद दर (GFR) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर

वृक्कों की गुच्छ केशिकाओं द्वारा प्रति मिनट निस्यंदित किए जाने वाले रक्त-प्लाज़्मा (निस्यंद) की मात्रा को गुच्छीय निस्यंद दर या GFR कहते हैं। एक स्वस्थ मनुष्य में यह दर औसतन 125 मिली प्रति मिनट, अर्थात् लगभग 180 लीटर प्रतिदिन होती है। यह वृक्क की छानने की क्षमता को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण मापदंड है।

प्रश्न 2 GFR की स्वनियमन क्रियाविधि को समझाइए।
उत्तर

GFR का स्वनियमन मुख्यतः सान्निध्य गुच्छ उपकरण (जक्सटा-ग्लोमेरूलर एपेरेटस/JGA) के ज़रिए होता है, जो अभिवाही व अपवाही धमनिकाओं के संपर्क बिंदु पर दूरस्थ संवलित नलिका की कोशिकाओं के रूपांतरण से बना विशेष संवेदी उपकरण है। जब गुच्छीय रक्त प्रवाह या रक्तदाब में गिरावट आने से GFR घटता है, तो JG कोशिकाएँ सक्रिय होकर रेनिन एंजाइम मुक्त करती हैं। रेनिन आगे एंजियोटेंसिन-II के निर्माण की श्रृंखला शुरू करता है, जो एक शक्तिशाली वाहिका-संकीर्णक होने के कारण गुच्छीय रक्तदाब बढ़ाकर GFR को वापस सामान्य स्तर पर ले आता है। इस प्रकार यह एक स्वचालित पुनर्भरण तंत्र है, जो वृक्क की निस्यंदन क्षमता को स्थिर बनाए रखता है।

प्रश्न 3 निम्नलिखित कथनों को सही अथवा गलत में इंगित कीजिए।
उत्तर
  • (अ) मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है — सही। मूत्राशय की भित्ति में खिंचाव के फलस्वरूप उत्पन्न संकेत केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचता है, और इसके प्रत्युत्तर में मूत्राशयी पेशियों के संकुचन व अवरोधिनी के शिथिलन से मूत्रण होता है — यह पूरी प्रक्रिया मूत्रण-प्रतिवर्त कहलाती है।
  • (ब) ADH मूत्र को अल्पपरासरणी बनाते हुए जल के निष्कासन में सहायक होता है — गलत। ADH वास्तव में जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है, जिससे मूत्र अधिक सांद्र (परासरणी दृष्टि से गाढ़ा) बनता है तथा जल का निष्कासन घट जाता है, न कि बढ़ता है।
  • (स) बोमेन-संपुट में रक्तप्लाज़्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है — सही। गुच्छ की केशिकाओं व बोमेन संपुट की झिल्लियों से रुधिर इस तरह छनता है कि प्लाज़्मा प्रोटीन रुक जाती है और शेष प्रोटीन-रहित तरल भाग ही बोमेन संपुट की गुहा में इकट्ठा होता है।
  • (द) हेनले-लूप मूत्र के सांद्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है — सही। हेनले-लूप व वासा रेक्टा मिलकर प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा मध्यांश में परासरणी प्रवणता बनाए रखते हैं, जिससे संग्रह नलिका मूत्र को काफी सांद्र बना पाती है।
  • (य) समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है — सही। PCT में लगभग सभी ग्लूकोज, अमीनो अम्ल व अधिकांश वैद्युत-अपघट्यों का पुनरावशोषण सक्रिय परिवहन द्वारा होता है।
प्रश्न 4 प्रतिधारा क्रियाविधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर

प्रतिधारा क्रियाविधि हेनले-लूप की दोनों भुजाओं तथा वासा रेक्टा के बीच मिलकर कार्य करने वाली प्रणाली है। हेनले-लूप की दोनों भुजाओं में निस्यंद विपरीत दिशाओं में बहता है, और इसी तरह वासा रेक्टा में भी रक्त का प्रवाह विपरीत दिशाओं में होता है — इसी वजह से इसे 'प्रतिधारा' (काउंटर-करंट) कहा जाता है। जैसे-जैसे निस्यंद अवरोही भुजा में नीचे उतरता है, वैसे-वैसे यह क्रमशः सांद्र होता जाता है, लेकिन आरोही भुजा में पहुँचते ही यह पुनः तनु (पतला) होने लगता है। इस पूरी व्यवस्था के चलते वैद्युत-अपघट्य तथा यूरिया की कुछ मात्रा मध्यांश के अंतराकाशी क्षेत्र में ही रह जाती है, जिससे वहाँ एक ऊँची परासरणी प्रवणता (300 से 1200 mOsm/लीटर तक) स्थापित हो जाती है। इसी प्रवणता का लाभ उठाकर दूरस्थ संवलित नलिका व संग्रह नलिका निस्यंद को लगभग चार गुना अधिक सांद्र बना देती हैं — यह जल-संरक्षण की सबसे प्रभावी क्रियाविधि है।

प्रश्न 5 उत्सर्जन में यकृत, फुफ्फुस तथा त्वचा का महत्व बताइए।
उत्तर

वृक्कों के अलावा शरीर के तीन अन्य अंग भी उत्सर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फुफ्फुस (फेफड़े) प्रतिदिन भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (लगभग 200 मिली प्रति मिनट) व जल-वाष्प का निष्कासन करते हैं। यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि होने के नाते पित्त के ज़रिए बिलिरूबिन, बिलिवर्डिन, कॉलेस्ट्रॉल, निम्नीकृत हार्मोन, विटामिन व औषध जैसे पदार्थों का निष्कासन करता है, जो अंततः मल के साथ बाहर निकलते हैं। त्वचा में मौजूद स्वेद ग्रंथियाँ पसीने के ज़रिए नमक, यूरिया व लैक्टिक अम्ल बाहर निकालती हैं, जबकि तैल ग्रंथियाँ सीबम द्वारा स्टेरॉल, हाइड्रोकार्बन व मोम जैसे पदार्थों का उत्सर्जन करती हैं। इस तरह ये तीनों अंग वृक्कों के साथ मिलकर शरीर को अपशिष्ट-मुक्त रखने में सहयोग करते हैं।

प्रश्न 6 मूत्रण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

वृक्क द्वारा लगातार बनाया जाने वाला मूत्र मूत्र-नलिकाओं से होकर मूत्राशय में एकत्रित होता रहता है, और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से ऐच्छिक संकेत मिलने तक वहीं संग्रहित रहता है। जैसे ही मूत्राशय पर्याप्त मात्रा में मूत्र से भर जाता है, उसकी दीवार के खिंचाव से एक तंत्रिकीय संकेत उत्पन्न होता है, जो मूत्राशय भित्ति से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक भेजा जाता है। इसके जवाब में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र मूत्राशय की चिकनी पेशियों के संकुचन तथा मूत्राशयी-अवरोधिनी के शिथिलन का प्रेरक संदेश भेजता है, जिससे मूत्र शरीर से बाहर निकल जाता है। मूत्र के इस निष्कासन की पूरी क्रिया को मूत्रण कहा जाता है, और इसे नियंत्रित करने वाली तंत्रिकीय व्यवस्था मूत्रण-प्रतिवर्त कहलाती है।

प्रश्न 7 स्तंभ I के बिंदुओं का मिलान स्तंभ II से कीजिए।
उत्तर
स्तंभ Iस्तंभ IIसंबंध का स्पष्टीकरण
अमोनियोत्सर्जनअस्थिल मछलियाँअस्थिल मछलियाँ अमोनिया को सीधे शरीर सतह या क्लोम से विसरण द्वारा बाहर निकालती हैं।
बोमेन-संपुटजल का पुनः अवशोषणबोमेन संपुट में निस्यंदन के बाद जल व अन्य पदार्थों का पुनरावशोषण वृक्क नलिका के आगे के भागों में होता है।
मूत्रणमूत्राशयमूत्रण की क्रिया मूत्राशय में मूत्र भरने व उसके खिंचाव से जुड़े संकेत पर आधारित है।
यूरिकाअम्ल उत्सर्जनपक्षीपक्षी जल-संरक्षण हेतु यूरिक अम्ल को गाढ़े पेस्ट के रूप में उत्सर्जित करते हैं।
ADHवृक्क नलिकाADH वृक्क नलिका के अंतिम भाग में जल के पुनरावशोषण को नियंत्रित करता है।
प्रश्न 8 परासरण नियमन का अर्थ बताइए।
उत्तर

परासरण नियमन (ऑस्मोरेगुलेशन) शरीर के तरल पदार्थों — जैसे रक्त व अंतराकाशी द्रव — में जल तथा घुले हुए लवणों (विलेय पदार्थों) की सांद्रता को एक स्थिर व संतुलित स्तर पर बनाए रखने की प्रक्रिया है। यह नियमन शरीर की कोशिकाओं को न तो अत्यधिक फूलने देता है और न ही सिकुड़ने देता है, जिससे कोशिकीय क्रियाशीलता सामान्य बनी रहती है। मनुष्यों में यह कार्य मुख्यतः वृक्कों द्वारा हार्मोन (जैसे ADH, एल्डोस्टीरोन) के नियंत्रण में, जल व आयनों के चयनात्मक पुनरावशोषण व स्रवण के ज़रिए संपन्न होता है।

प्रश्न 9 स्थलीय प्राणी सामान्यतया यूरिया उत्सर्जी या यूरिक अम्ल उत्सर्जी होते हैं तथा अमोनिया उत्सर्जी नहीं होते हैं, क्यों?
उत्तर

अमोनिया अत्यंत विषैली होती है और इसे सुरक्षित रूप से शरीर से बाहर निकालने के लिए भारी मात्रा में जल की ज़रूरत पड़ती है, जो कि जलीय आवास में सरलता से उपलब्ध होता है। लेकिन स्थलीय प्राणियों के सामने जल की उपलब्धता सीमित होने की चुनौती रहती है, इसलिए अगर वे अमोनिया उत्सर्जित करने की कोशिश करें तो उन्हें शरीर से बहुत अधिक जल गँवाना पड़ेगा, जो उनके जीवन के लिए घातक हो सकता है। इसी कारण स्थलीय प्राणी कम विषैले व कम जल की माँग करने वाले नाइट्रोजनी अपशिष्टों — यूरिया या यूरिक अम्ल — का उत्सर्जन करना पसंद करते हैं, जिससे शरीर में जल का समुचित संरक्षण बना रहता है।

प्रश्न 10 वृक्क के कार्य में जक्सटा-ग्लोमेरूलर उपकरण (JGA) का क्या महत्व है?
उत्तर

जक्सटा-ग्लोमेरूलर उपकरण (JGA) वृक्क की गुच्छीय निस्यंद दर (GFR) को स्वचालित रूप से नियंत्रित करने वाली एक बेहद संवेदनशील संरचना है, जो अभिवाही व अपवाही धमनिकाओं के संपर्क स्थल पर दूरस्थ संवलित नलिका की कोशिकाओं के रूपांतरण से बनती है। जब किसी कारणवश गुच्छीय रक्त प्रवाह या रक्तदाब घटने से GFR में कमी आती है, तो JG कोशिकाएँ सक्रिय होकर रेनिन एंजाइम को मुक्त करती हैं। रेनिन आगे चलकर एंजियोटेंसिन-II के निर्माण की श्रृंखला शुरू करता है, जो वाहिका संकुचन व एल्डोस्टीरोन स्रवण के ज़रिए रक्तदाब व GFR दोनों को वापस सामान्य कर देता है। इस प्रकार JGA वृक्क की क्रियाशीलता को स्थिर बनाए रखने वाला एक अहम नियामक तंत्र है।

प्रश्न 11 नाम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

(अ) एक कशेरुकी जिसमें ज्वाला कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जन होता है — यद्यपि ज्वाला कोशिकाएँ (आदिवृक्कक/प्रोटोनेफ्रिडिया) मुख्यतः अकशेरुकियों में पाई जाती हैं, फिर भी कशेरुकियों की श्रेणी के निकट माने जाने वाले सिफेलोकॉर्डेट समूह के एम्फीऑक्सस में भी उत्सर्जी संरचना के रूप में इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है।

(ब) मनुष्य के वृक्क के वल्कुट के वे भाग जो मध्यांश के पिरामिड के बीच धँसे रहते हैं — बरतीनी-स्तंभ (Columns of Bertini)।

(स) हेनले-लूप के समानांतर उपस्थित केशिका का लूप — वासा रेक्टा।

प्रश्न 12 रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।
उत्तर

(अ) हेनले-लूप की आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य जबकि अवरोही भुजा इसके लिए पारगम्य है।

(ब) वृक्क नलिका के दूरस्थ भाग द्वारा जल का पुनरावशोषण ADH (एंटीडाइयूरेटिक) हार्मोन द्वारा होता है।

(स) अपोहन द्रव में नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ के अलावा रक्त प्लाज़्मा के अन्य सभी पदार्थ उपस्थित होते हैं।

(द) एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य द्वारा औसतन 25 से 30 ग्राम यूरिया का प्रतिदिन उत्सर्जन होता है।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री मानव उत्सर्जन तंत्र, वृक्क की संरचना, मूत्र निर्माण के चरण, प्रतिधारा क्रियाविधि, वृक्क क्रियाओं के हार्मोनी नियमन तथा वृक्क सम्बन्धी विकारों को सरल व मौलिक भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें तुलनात्मक तालिकाएँ व प्रश्नोत्तर भी शामिल किए गए हैं।

हर बूँद मूत्र के पीछे लाखों नेफ्रॉन की अनथक मेहनत छिपी होती है — यही है शरीर के भीतर की सफ़ाई-व्यवस्था का करिश्मा।

Scroll to Top