पादप वृद्धि एवं परिवर्धन — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • पादप कार्यिकी

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन (Plant Growth and Development)

एक बीज से लेकर एक विशाल वृक्ष बनने तक का सफर आश्चर्यजनक रूप से व्यवस्थित होता है। जड़, तना, पत्तियाँ, फूल — ये सब एक क्रमबद्ध योजना के तहत बनते हैं। इस अध्याय में हम समझेंगे कि पौधे किस तरह बढ़ते हैं, उनकी कोशिकाएँ किस तरह अलग-अलग काम करने लायक बनती हैं, और कुछ खास रासायनिक संकेत — जिन्हें पादप वृद्धि नियामक कहा जाता है — किस तरह इस पूरी यात्रा को दिशा देते हैं।

भूमिका परिवर्धन की सामान्य समझ (Development)

अध्याय 5 में आप पहले ही पुष्पी पौधे (flowering plant) के संगठन के बारे में पढ़ चुके हैं। क्या कभी सोचा है कि जड़, तना, पत्तियाँ, फूल तथा बीज जैसी संरचनाएँ कहाँ और कैसे बनती हैं — और वह भी इतने व्यवस्थित तरीके से? अब आप बीज (seed), पौध या नवांकुरित पौधा (seedling), पादक यानी छोटा पौधा (plantlet) तथा परिपक्व पौधा (mature plant) जैसे शब्दों से परिचित हो चुके हैं।

हर पेड़ समय के साथ ऊँचाई और गोलाई दोनों में लगातार बढ़ता रहता है। दिलचस्प बात यह है कि उसी पेड़ की पत्तियाँ, फूल और फल एक सीमित आकार तक ही पहुँचकर समयानुकूल झड़ भी जाते हैं — यह चक्र लगातार चलता रहता है। सवाल उठता है — किसी पौधे में फूल आने की प्रक्रिया कायिक वृद्धि (vegetative growth) के बाद ही क्यों होती है? हर पौधे के अंग अलग-अलग तरह के ऊतकों से बने होते हैं — तो क्या किसी कोशिका, ऊतक या अंग की बनावट और उसके काम के बीच कोई गहरा नाता है?

पौधे की हर कोशिका असल में एक ही युग्मज (zygote) की संतति होती है। फिर सवाल यह उठता है — क्यों और कैसे इन कोशिकाओं में इतनी भिन्न-भिन्न संरचनात्मक और कार्यात्मक विशेषताएँ विकसित हो जाती हैं?

परिवर्धन (Development) असल में दो प्रक्रियाओं का योग है — वृद्धि (growth) और विभेदन (differentiation)। शुरुआत में यह समझना जरूरी है कि एक परिपक्व वृक्ष का परिवर्धन एक युग्मक (यानी एक निषेचित अंडा) से शुरू होकर एक सुनिश्चित और अत्यंत नियमित वंशानुक्रम (genetically programmed sequence) की घटना है। इस दौरान एक जटिल शरीर-संरचना का गठन होता है, जो जड़ों, पत्तियों, शाखाओं, फूलों, फलों और बीजों को जन्म देती है — और अंततः यह पौधा मर भी जाता है।

पौधों की वृद्धि की यात्रा का पहला चरण होता है बीज का अंकुरण (germination)। जब वातावरण में वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं, तभी बीज अंकुरित होता है। अनुकूल परिस्थितियों के अभाव में बीज निलंबित वृद्धि यानी प्रसुप्त काल (dormancy) में चला जाता है। जैसे ही अनुकूल परिस्थितियाँ लौटती हैं, बीज में उपापचयी क्रियाएँ फिर से सक्रिय हो जाती हैं और वृद्धि शुरू हो जाती है।

इस अध्याय में हम उन कारकों के बारे में जानेंगे जो इस पूरी परिवर्धन प्रक्रिया को चलाते और नियंत्रित करते हैं — ये कारक पौधे के लिए आंतरिक (internal) भी हो सकते हैं और बाहरी (external) भी।

13.1 वृद्धि (Growth)

किसी भी जीवित वस्तु के लिए वृद्धि को सबसे आधारभूत और स्पष्ट विशेषता माना जाता है। वृद्धि को किसी अंग, अवयव या यहाँ तक कि एक अकेली कोशिका के आकार में हुई अपरिवर्तनीय (irreversible), स्थायी बढ़त के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सामान्यतः वृद्धि उपापचयी प्रक्रियाओं — यानी उपचय (anabolism) और अपचय (catabolism) दोनों — से जुड़ी होती है, जो ऊर्जा के व्यय पर टिकी होती है। इसीलिए एक पत्ती का फैलाव भी वृद्धि ही है।

बीज (Seed) नवोद्भिद (Seedling) पादक (Plantlet) परिपक्व पौधा (Mature plant)

चित्र 13.1 — बीज अंकुरण से लेकर परिपक्व पौधे तक के परिवर्धन के चरण

13.1.1 पादप वृद्धि प्रायः अपरिमित है (Indeterminate Growth)

पादप वृद्धि (plant growth) एक अनूठे ढंग से होती है, क्योंकि पौधे जीवन भर असीमित वृद्धि की क्षमता रखते हैं। इस क्षमता का कारण उनके शरीर में कुछ खास जगहों पर विभज्योतक (meristem) ऊतकों की उपस्थिति है। ऐसे विभज्योतकों की कोशिकाओं में विभाजन (division) और स्वशाश्वतता यानी निरंतरता (continuity) बनाए रखने की क्षमता होती है।

हालाँकि इनकी संतति कोशिकाएँ जल्द ही विभाजन की क्षमता खो देती हैं, और ऐसी कोशिकाएँ ही पौधे के शरीर की रचना करती हैं। जिस तरह की वृद्धि में विभज्योतक की सक्रियता से पौधे के शरीर में सदैव नई कोशिकाएँ जुड़ती रहती हैं, उसे वृद्धि का खुला स्वरूप (open form of growth) कहा जाता है।

आपने पिछली कक्षाओं में मूल शिखाग्र विभज्योतक (root apical meristem) तथा प्ररोह शिखाग्र विभज्योतक (shoot apical meristem) के बारे में पढ़ा है। ये पौधों की प्राथमिक वृद्धि (primary growth) के लिए जिम्मेदार होते हैं और मुख्यतः पौधे की धुरी के समानांतर दीर्घीकरण (elongation) में भूमिका निभाते हैं।

प्ररोह अग्रस्थ विभज्योतक संवहनी कैंबियम मूल अग्रस्थ विभज्योतक संवहनी कैंबियम प्ररोह / मूल

चित्र 13.2 — मूल अग्रस्थ विभज्योतक (Root Apical Meristem), प्ररोह अग्रस्थ विभज्योतक (Shoot Apical Meristem) तथा संवहनी कैंबियम (Vascular Cambium) की स्थिति

द्विबीजपत्री (dicot) तथा नग्नबीजी (gymnosperm) पौधों में पार्श्व विभज्योतक (lateral meristem), संवहनी कैंबियम (vascular cambium) तथा कार्क कैंबियम (cork cambium) जीवन में बाद में प्रकट होते हैं। ये विभज्योतक उन अंगों की चौड़ाई बढ़ाते हैं, जहाँ ये सक्रिय होते हैं — इसे द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहा जाता है।

13.1.2 वृद्धि मापन योग्य है (Growth is Measurable)

कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य (protoplasm) की मात्रा में वृद्धि का ही नतीजा है। चूँकि जीवद्रव्य की वृद्धि को सीधे मापना कठिन है, इसलिए कुछ अन्य मात्राओं को मापा जाता है, जो कम-ज्यादा उसी के अनुपात में बदलती हैं — जैसे ताजा भार, शुष्क भार, लंबाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिकाओं की संख्या।

एक मक्के की मूल शिखाग्र विभज्योतक में प्रति घंटे 17,500 या उससे भी अधिक नई कोशिकाएँ बन सकती हैं, जबकि एक तरबूज में कोशिकाओं के आकार में वृद्धि 3,50,000 गुना तक हो सकती है। पहले उदाहरण में वृद्धि को कोशिका-संख्या के रूप में व्यक्त किया गया है, जबकि दूसरे में वृद्धि को कोशिका के आकार में बढ़ोतरी के रूप में मापा गया है।

13.1.3 वृद्धि के चरण (Phases of Growth)

वृद्धि की अवधि को मुख्यतः तीन चरणों में बाँटा गया है — विभज्योतकीय चरण (meristematic phase), दीर्घीकरण चरण (elongation phase), एवं परिपक्वता चरण (maturation phase)।

विभज्योतकीय चरण Meristematic Phase

कोशिकाएँ मूल तथा प्ररोह शिखाग्र में लगातार विभाजित होती हैं। ये कोशिकाएँ जीवद्रव्य से भरपूर होती हैं और बड़ा स्पष्ट केंद्रक रखती हैं। इनकी कोशिका भित्ति पतली और सेलुलोजिक होती है।

दीर्घीकरण चरण Elongation Phase

शिखाग्र से थोड़ा दूर स्थित इस क्षेत्र में कोशिकाओं का रसधानी भवन (vacuolation) बढ़ता है, कोशिका का आकार बड़ा होता है और नई कोशिका भित्ति का निक्षेपण होता है।

परिपक्वता चरण Maturation Phase

इस क्षेत्र की कोशिकाएँ अपने अंतिम आकार तक पहुँच चुकी होती हैं। इनकी भित्ति की मोटाई और रसधानी अपने चरम पर होती है — यही वह अवस्था है जो अधिकांश परिपक्व ऊतकों का प्रतिनिधित्व करती है।

13.1.4 वृद्धि दर (Growth Rate)

समय की प्रति इकाई में हुई वृद्धि को वृद्धि दर कहा जाता है। कोई जीव या उसका अंग कई तरीकों से अधिक कोशिकाएँ पैदा कर सकता है — वृद्धि दर या तो अंकगणितीय (arithmetic) हो सकती है, या ज्यामितीय (geometric) हो सकती है।

(अ) अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth) (ब) ज्यामितीय वृद्धि (Geometric Growth) ■ विभाजन में समर्थ कोशिकाएँ (Cells capable of division) □ विभाजित होने में असमर्थ कोशिकाएँ (Cells unable to divide)

चित्र 13.4 — (अ) अंकगणितीय (Arithmetic) और (ब) ज्यामितीय (Geometric) वृद्धि का तुलनात्मक निरूपण

अंकगणितीय वृद्धि (arithmetic growth) में, समसूत्री विभाजन के बाद केवल एक पुत्री कोशिका (daughter cell) लगातार विभाजित होती रहती है, जबकि दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति है, जिसे हम निश्चित दर पर दीर्घीकृत होते मूल में देख सकते हैं।

Lt = L0 + rt

जहाँ Lt = समय t पर लंबाई, L0 = समय शून्य पर लंबाई, r = वृद्धि दर (दीर्घीकरण प्रति इकाई समय)

ज्यामितीय वृद्धि (geometric growth) में अधिकतर प्रणालियों में शुरुआती वृद्धि — जिसे लैगफेस (lag phase) कहा जाता है — धीमी होती है, और इसके बाद यह तीव्र गति से एक चरघातांकी दर (exponential phase या log phase) में बढ़ती है। यहाँ दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका के विभाजन का अनुकरण करती हैं और विभाजित होने पर लगातार ऐसा करते रहने की क्षमता बनाए रखती हैं। हालाँकि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि धीमी पड़ते हुए स्थिर चरण (stationary phase) की ओर बढ़ जाती है।

पश्चता अवस्था (Lag Phase) चरघातांकी अवस्था (Exponential) अप्रगामी अवस्था (Stationary)

चित्र 13.6 — आदर्श सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (Sigmoid Growth Curve / S-Curve), जो संवर्धित कोशिकाओं और पादप अंगों के लिए विशिष्ट है

यदि समय के प्रति वृद्धि के मापदंड को आरेखित किया जाए तो एक विशिष्ट सिग्मॉइड (sigmoid) या S-वक्र प्राप्त होता है — यह वक्र प्राकृतिक पर्यावरण में बढ़ने वाले लगभग सभी सजीवों की विशेषता है। चरघातांकी वृद्धि (exponential growth) को इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है:

W1 = W0 ert

W₁ = अंतिम आकार, W₀ = प्रारंभिक आकार, r = वृद्धि दर, t = समय, e = स्वाभाविक लघुगणिक का आधार (natural log base)

यहाँ r को सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहा जाता है, जो पौधे की नई सामग्री पैदा करने की क्षमता को मापने का एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) है।

5 वर्ग सेमी 50 वर्ग सेमी

चित्र 13.7 — निरपेक्ष (Absolute) और सापेक्ष (Relative) वृद्धि दर: दोनों पत्तियों 'अ' और 'ब' का क्षेत्रफल एक ही समय में 5 वर्ग सेमी बढ़ा है, पर सापेक्ष दर में अंतर है

सजीव प्रणाली की वृद्धि की मात्रात्मक तुलना दो तरीकों से की जा सकती है — (I) मापन और प्रति यूनिट समय की कुल वृद्धि की तुलना, जिसे परम वृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं, और (II) किसी प्रणाली की प्रति यूनिट समय पर वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रकट करना, यानी प्रति यूनिट प्रारंभिक मापदंड, जिसे सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहते हैं।

13.1.5 वृद्धि के लिए दशाएँ (Conditions for Growth)

पौधों की वृद्धि के लिए जल (water), ऑक्सीजन (oxygen) तथा पोषक तत्व (nutrients) अनिवार्य होते हैं। पौधों की कोशिकाएँ आकार में बड़ी होकर वृद्धि करती हैं, जिसके लिए जल की आवश्यकता होती है। जल वृद्धि के लिए आवश्यक एंजाइमों (enzymes) की क्रियाशीलता के लिए एक माध्यम उपलब्ध कराता है, और ऑक्सीजन उपापचयी ऊर्जा मुक्त करने में मदद करती है।

इसके अतिरिक्त हर पादप जीव के लिए एक इष्टतम तापमान परिसर (optimum temperature range) होता है, जो उसकी वृद्धि के लिए सबसे अनुकूल होता है। इसी के साथ प्रकाश (light) एवं गुरुत्वाकर्षण (gravity) जैसे पर्यावरणीय संकेत भी वृद्धि की कुछ अवस्थाओं को प्रभावित करते हैं।

13.2 विभेदन, निर्विभेदन तथा पुनर्विभेदन

Differentiation, Dedifferentiation and Redifferentiation

मूल शिखाग्र विभज्योतक तथा प्ररोह शिखाग्र विभज्योतक से आने वाली कोशिकाएँ और कैंबियम (cambium) विशिष्ट क्रियाकलाप संपन्न करने के लिए परिपक्व होती हैं। परिपक्वता की ओर बढ़ने वाली इस कार्यवाही को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है। इस दौरान कोशिकाएँ अपनी कोशिका भित्ति एवं जीवद्रव्य दोनों में व्यापक संरचनात्मक बदलावों से गुजरती हैं।

उदाहरण के लिए, एक वाहिकीय तत्व (tracheary element) के बनने में कोशिका अपना जीवद्रव्य खो देती है, और बाद में एक बेहद मजबूत तथा तन्यतापूर्ण लिग्नोसेल्युलोसिक द्वितीय कोशिका भित्ति विकसित होती है, जो लंबी दूरी तक अत्यधिक तनाव में भी जल का परिवहन कर सकती है।

पौधे एक और दिलचस्प तथ्य दिखाते हैं — जीवित विभेदित कोशिकाएँ (differentiated cells) कुछ खास परिस्थितियों में फिर से विभाजन की क्षमता प्राप्त कर सकती हैं। इस क्षमता को निर्विभेदन (Dedifferentiation) कहा जाता है — जैसे अंतरापूल्य वाहिकी कैंबियम (interfascicular vascular cambium) तथा कार्क कैंबियम (cork cambium)।

निर्विभेदित कोशिकाओं/ऊतकों द्वारा उत्पादित कोशिका बाद में फिर से विभाजन की क्षमता खो देती है, ताकि विशिष्ट कार्यों को संपन्न किया जा सके — यानी वे पुनर्विभेदित (Redifferentiation) हो जाती हैं।

याद कीजिए — पौधों में वृद्धि खुली (open) होती है, यानी परिमित या अपरिमित हो सकती है। ठीक इसी तरह पौधों में विभेदन भी खुला होता है — क्योंकि एक ही विभज्योतक से पैदा हुए ऊतक/कोशिकाएँ परिपक्व होने पर भिन्न संरचनाएँ तैयार करती हैं। उदाहरण के लिए, शिखाग्र विभज्योतक से दूरस्थ कोशिकाएँ मूल गोप कोशिका (root cap cells) के रूप में विभेदित होती हैं, जबकि बाहरी वलय की ओर धकेली गई कोशिकाएँ बाह्य त्वचा (epidermis) के रूप में परिपक्व होती हैं।

13.3 परिवर्धन (Development)

परिवर्धन वह शब्द है जिसके अंतर्गत किसी जीव के जीवन चक्र में बीजांकुरण (germination) और जरावस्था (senescence) के बीच आने वाले सारे बदलाव शामिल हैं।

विभज्योतक (Meristem) प्लाज्मेटिक वृद्धि (Plasmatic growth) विभेदन (Differentiation) दीर्घीकरण (Elongation) परिपक्वता (Maturation) परिपक्व कोशिका (Mature cell) जरावस्था (Senescence) मृत्यु (Death)

चित्र 13.8 — एक पादप कोशिका के विकासात्मक प्रक्रम (Developmental sequence) का अनुक्रम

पौधे पर्यावरण के प्रभाव के कारण या जीवन के विभिन्न चरणों में भिन्न पथों का अनुसरण करते हैं, ताकि विभिन्न तरह की संरचनाओं का गठन कर सकें। इस क्षमता को प्लास्टिसिटी (Plasticity) कहते हैं। उदाहरण के तौर पर कपास, धनिया एवं लार्कस्पर (larkspur) में पत्तियों का आकार किशोरावस्था और परिपक्व अवस्था में भिन्न होता है। दूसरी तरफ बटरकप (buttercup) में पत्तियों का आकार जलीय और पार्थिव — दोनों प्रकार के आवासों में अलग होता है।

तरुण (Juvenile) प्रौढ़ (Adult) (अ) लार्कस्पर — पार्थिव आवास जलीय आवास (Aquatic habitat) पार्थिव आवास (Terrestrial) (ब) बटरकप — विषमपर्णी

चित्र 13.9 — (अ) लार्कस्पर एवं (ब) बटरकप में विषमपर्णता (Heterophylly) — प्लास्टिसिटी का उदाहरण

अतः एक पौधे के जीवन में वृद्धि, विभेदन और परिवर्धन बहुत ही निकट संबंध रखने वाली घटनाएँ हैं। व्यापक तौर पर परिवर्धन को वृद्धि एवं विभेदन के योग के रूप में माना जाता है। पौधों में परिवर्धन — यानी वृद्धि एवं विभेदन दोनों — आंतरिक एवं बाह्य कारकों से नियंत्रित होते हैं। आंतरिक कारकों में अंतरकोशिकीय आनुवंशिक तथा अंतरकोशिकीय कारक (जैसे पादप वृद्धि नियामक रसायन) शामिल होते हैं, जबकि बाह्य कारकों में प्रकाश, तापक्रम, जल, ऑक्सीजन तथा पोषक तत्व आदि शामिल होते हैं।

13.4 पादप वृद्धि नियामक (Plant Growth Regulators — PGR)

13.4.1 विशिष्टताएँ (Characteristics)

पादप वृद्धि नियामक (PGR) विविध रासायनिक संघटनों वाले साधारण तथा छोटे अणु होते हैं। ये इंडोल सम्मिश्रण (जैसे इंडोल-3-एसिटिक अम्ल, IAA), एडेनिन व्युत्पन्न फरफ्यूराइल एमिनो प्यूरीन काइनेटिन (केराटिनायड), वसा अम्लों के व्युत्पन्नक (एब्सिसिक एसिड, ABA), टर्पीन (जिबरेलिक एसिड, GA) या गैसें (एथीलिन, C₂H₄) आदि हो सकते हैं। इन्हें पाठ्य सामग्री में पादप वृद्धि तत्व, पादप हार्मोन तथा फाइटोहार्मोन के नाम से भी वर्णित किया जाता है।

पादप वृद्धि नियामकों (PGR) को व्यापक रूप से एक जीवित पौधे में उनकी कार्यशीलता के आधार पर दो समूहों में बाँटा जा सकता है — एक समूह वृद्धि उन्नयन क्रियाकलापों (growth promoting activities) में लगा होता है, जैसे कोशिका विभाजन, कोशिका प्रसार, प्रतिमान संरचना, ट्रापिक (अनुवर्तनी) वृद्धि, पुष्पन, फलीकरण तथा बीज संरचना — इन्हें ऑक्सिन, जिब्बेरेलिंस तथा साइटोकिनिंस कहा जाता है। दूसरा समूह वृद्धि बाधक क्रियाकलापों (growth inhibiting activities) जैसे प्रसुप्ति एवं विलगन में शामिल होता है — एब्सिसिक एसिड इसी समूह का सदस्य है। एथीलिन जैसी गैसीय PGR किसी भी समूह के साथ बैठ जाती है, लेकिन व्यापक तौर पर यह एक वृद्धि बाधक क्रियाकलाप में आती है।

13.4.2 पादप वृद्धि नियामकों की खोज (Discovery)

स (प्रकाश की ओर मुड़ाव)

चित्र 13.10 — प्रांकुर चोल (Coleoptile) का अग्रभाग पादप वृद्धि नियामक ऑक्सिन (Auxin) का उद्गम स्थल है — डार्विन के प्रयोग पर आधारित

रोचक बात यह है कि PGR के पाँच प्रमुख समूहों में हर एक की खोज महज एक संयोग है। इसकी शुरुआत चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) और उनके पुत्र फ्रांसिस डार्विन के अवलोकन से हुई, जब उन्होंने देखा कि कनारी घास का प्रांकुर चोल (coleoptile) एकपार्श्वी प्रदीपन के प्रति अनुक्रिया करता है और प्रकाश के उद्गम की तरफ वृद्धि (प्रकाशानुवर्तन, phototropism) करता है। प्रयोगों की एक लंबी शृंखला के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रांकुर चोल की नोक संचारणीय प्रवाह की जगह है, जो संपूर्ण प्रांकुर चोल के मुड़ने का कारण है। इस पदार्थ यानी ऑक्सिन की खोज एफ. डब्ल्यू. वेंट (F.W. Went) द्वारा जई (oat) के अंकुर के प्रांकुरचोल शिखर से की गई।

'बैकेन' (फूलिश सीडलिंग, foolish seedling) धान के पौध की बीमारी है जो रोगजनक कवक जिबरेला फूजीकोराई (Gibberella fujikuroi) के द्वारा होती है। ई. कुरोसोवा (जापानी वैज्ञानिक) ने रोगरहित धान की पौध में रोग-लक्षण को तब देखा, जब उन्हें कवक के जीवाणुहीन निस्यंदों (फिल्ट्रेट) के साथ उपचारित किया गया। सक्रिय तत्व की पहचान बाद में जिब्बेरेलिक अम्ल (Gibberellic Acid) के रूप में हुई।

एफ. स्कूग (F. Skoog) तथा उनके सहकर्मियों ने देखा कि तंबाकू के तने के अंतरपर्व खंड से (अविभेदित कोशिकाओं का समूह) तभी प्रचुरित हुआ जब ऑक्सिंस के अलावा माध्यम में वाहिका ऊतकों का सत्व, यीस्ट सत्व, नारियल दूध या DNA पूरक रूप में दिया गया। मिलर एट अल (Miller et al., 1955) ने साइटोकाइनेसिस को बढ़ावा देने वाले इस तत्व को पहचाना और इसका क्रिस्टलीकरण किया तथा कायनेटिन (Kinetin) नाम दिया।

1960 के मध्य में तीन अलग-अलग वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से तीन तरह के निरोधकों का शुद्धिकरण एवं रासायनिक स्वरूप प्रस्तुत किया — निरोधक बी, बिलगन II एवं डोरमिन। बाद में ये तीनों रासायनिक रूप से समान पाए गए और इसका नामकरण एब्सिसिक एसिड (Abscisic Acid, ABA) के रूप में हुआ।

एच.एच. कज़िन्स (H.H. Cousins, 1910) ने यह सुनिश्चित किया कि पके हुए संतरों से निकला हुआ एक वाष्पशील तत्व पास में रखे बिना पके केलों को शीघ्रता से पकाता है। बाद में यह वाष्पशील तत्व एथीलिन (Ethylene) के नाम से जाना गया, जो एक गैसीय PGR है।

13.4.3 पादप वृद्धि नियामकों का कायिकीय शरीरक्रियात्मक प्रभाव (Physiological Effects)

13.4.3.1 ऑक्सिन (Auxin)

(ग्रीक शब्द ऑक्सेन: बढ़ना) सर्वप्रथम मनुष्य के मूत्र से निकाला गया। शब्द ऑक्सिन इंडोल-3-एसेटिक अम्ल (IAA) तथा अन्य प्राकृतिक एवं कृत्रिम यौगिक, जिनमें वृद्धि करने की क्षमता हो, के लिए प्रयोग किया जाता है। ये प्रायः तने एवं मूल के बढ़ते हुए शिखर पर बनते हैं। ऑक्सिन जैसे IAA एवं इंडोल ब्यूटेरिक अम्ल (IBA) पौधे से निकाले गए हैं। NAA (नैफ्थेलिन एसेटिक अम्ल) तथा 2,4-D (2,4 डाईक्लोरो फिनोक्सी एसेटिक अम्ल) कृत्रिम (synthetic) ऑक्सिन हैं।

  • ऑक्सिन तनों की कटिंग (कलमों) में जड़ फूटने (रूटिंग) में सहायता करता है — यह पादप प्रवर्धन (plant propagation) में व्यापकता से इस्तेमाल होता है।
  • यह पुष्पन को बढ़ाता है — जैसे अनानास में। यह पौधों के पत्तों एवं फलों को शुरुआती अवस्था में गिरने से बचाता है, तथा पुरानी व परिपक्व पत्तियों एवं फलों के विलगन (abscission) को बढ़ावा देता है।
  • उच्च पादपों में वृद्धि करती अग्रस्थ कलिका, पार्श्व (कक्षस्थ) कलियों की वृद्धि को अवरोधित करती है, जिसे शिखाग्र प्रधान्यता (apical dominance) कहते हैं। प्ररोह सिरों को हटाने (शिरच्छेदन) से प्रायः पार्श्व कलियों की वृद्धि होती है — यह चाय रोपण एवं बाड़ बनाने (हेज मेकिंग) में व्यापक रूप से लागू होती है।
  • ऑक्सिन अनिषेकफलन (parthenocarpy) को प्रेरित करता है — जैसे टमाटर में। इसे शाकनाशी (weedicide) के रूप में भी उपयोग किया जाता है — 2,4-D द्विबीजपत्ती खरपतवारों (dicot weeds) का नाश कर देता है, लेकिन एकबीजपत्ती परिपक्व पौधों को प्रभावित नहीं करता। इसका उपयोग मालियों द्वारा लॉन तैयार करने में किया जाता है।
  • ऑक्सिन जाइलम विभेदन (xylem differentiation) को नियंत्रित करने तथा कोशिका विभाजन में मदद करता है।
  • (अ) अग्रस्थ प्रभाविता (ब) शिखर हटाने के बाद शाखाएँ

    चित्र 13.11 — पादपों में शीर्षस्थ प्रभाविता (Apical Dominance): (अ) अग्रस्थ कलिका की मौजूदगी कक्षस्थ कलिका की वृद्धि रोकती है (ब) अग्रस्थ कलिका हटाने के बाद शाखाओं का प्रस्फुटन

    13.4.3.2 जिबरेलिन (Gibberellins — GA)

    जिबरेलिन एक अन्य प्रकार का प्रोत्साहक PGR है। सौ से अधिक जिबरेलिनों की सूचना विभिन्न जीवों से आ चुकी है — कवकों (fungi) से भी और उच्च पादपों (higher plants) से भी। इन्हें GA₁, GA₂, GA₃ और इसी तरह नामित किया गया है। हालाँकि GA₃ वह जिबरेलिन है जिसकी सबसे पहले खोज की गई थी और यह अभी भी सबसे अधिक सघनता से अध्ययन किया जाने वाला स्वरूप है। सभी GAs अम्लीय होते हैं।

  • ये पौधों में एक व्यापक दायरे की कायिकीय अनुक्रिया देते हैं — ये अक्ष की लंबाई बढ़ाने की क्षमता रखते हैं, इसलिए अंगूर के डंठल की लंबाई बढ़ाने में प्रयोग किए जाते हैं।
  • जिबरेलिन सेव जैसे फलों को लंबा बनाते हैं ताकि वे उचित रूप ले सकें। ये जरावस्था को भी रोकते हैं, ताकि फल पेड़ पर अधिक समय तक लगे रह सकें और बाजार में मिल सकें।
  • GA₃ को आसव (शराब) उद्योग में माल्टिंग (malting) की गति बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है। गन्ने की खेती में जिबरेलिन छिड़कने पर तनों की लंबाई बढ़ती है, जिससे 20 टन प्रति एकड़ ज्यादा उपज बढ़ जाती है।
  • GA छिड़कने पर किशोर शंकुवृक्षों (conifers) में परिपक्वता तीव्र गति से होती है, अतः बीज जल्दी ही तैयार हो जाता है।
  • जिबरेलिन चुकंदर, पत्तागोभी एवं अन्य रोज़ेटी स्वभाव वाले पादपों में बोल्टिंग (bolting, पुष्पन से पहले अंतःपर्व का दीर्घीकरण) को बढ़ा देता है।
  • 13.4.3.3 साइटोकाइनिन (Cytokinin)

    साइटोकाइनिन अपना विशेष प्रभाव साइटोकिनेसिस (cytokinesis, कोशिकाद्रव्य विभाजन) में डालता है। इसे कायनेटिन (एडेनिन का रूपांतरित रूप एक प्यूरीन) के रूप में ऑटोक्लेवड हेरिंग के शुक्राणु से खोजा गया था — कायनेटिन पौधों में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता। साइटोकाइनिन जैसे पदार्थों की खोज के क्रम में मक्का की अस्थि तथा नारियल दूध से जियाटीन (Zeatin) अलग किया जा सका।

  • प्राकृतिक साइटोकाइनिन उन क्षेत्रों में संश्लेषित होता है जहाँ तीव्र कोशिका विभाजन संपन्न होता है — जैसे मूल शिखाग्र, विकासशील प्ररोह कलिकाएँ तथा तरुण फल।
  • यह नई पत्तियों में हरितलवक पार्श्व प्ररोह वृद्धि तथा आपस्थानिक प्ररोह संरचना में मदद करता है।
  • साइटोकाइनिन शिखाग्र प्राधान्यता से छुटकारा दिलाता है। ये पोषकों के संचारण को बढ़ावा देते हैं, जिससे पत्तियों की जरावस्था को देरी करने में मदद मिलती है।
  • 13.4.3.4 एथीलिन (Ethylene)

    एथीलिन एक साधारण गैसीय PGR है, जो जरावस्था को प्राप्त होते ऊतकों तथा पकते हुए फलों द्वारा भारी मात्रा में संश्लेषित की जाती है।

  • एथीलिन पौधों की अनुप्रस्थ (क्षैतिज) वृद्धि, अक्षों में फुलाव एवं द्विबीजी नवोद्भिदों में अंकुश संरचना को प्रभावित करती है।
  • यह जरावस्था एवं विलगन को मुख्यतः पत्तियों एवं फूलों में बढ़ाती है। यह फलों को पकाने में बहुत प्रभावी है — पकने के दौरान यह श्वसन की गति में वृद्धि करता है, जिसे क्लाइमैक्टिक श्वसन (climacteric respiration) कहते हैं।
  • एथीलिन बीज तथा कलिका प्रसुप्ति को तोड़ती है, मूँगफली के बीज में अंकुरण को शुरू करती है तथा आलू के कंदों को अंकुरित करती है।
  • एथीलिन गहरे पानी के धान के पौधों में पर्णवृंत को तीव्र दीर्घीकरण के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे पत्तियाँ पानी की सतह से ऊपर बनी रहती हैं। यह मूल वृद्धि तथा मूल रोमों को भी प्रोत्साहित करती है।
  • एथीलिन अनानास को फूलने तथा फल समकालिकता में सहायता करता है, तथा आम को पुष्पित होने में प्रेरित करता है। सर्वाधिक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला यौगिक एथिफॉन (Ethephon) है, जो टमाटर एवं सेव के फलों के पकने की गति बढ़ाता है और खीरों में मादा पुष्पों को बढ़ाता है।
  • 13.4.3.5 एबसिसिक एसिड (Abscisic Acid — ABA)

    जैसा पहले बताया जा चुका है, एब्सिसिक एसिड (ABA) की खोज विलगन एवं प्रसुप्ति को नियमित करने में उसकी भूमिका के लिए हुई थी। लेकिन अन्य PGR की भाँति यह भी पादप वृद्धि एवं परिवर्धन में व्यापक दायरे में प्रभाव डालता है। यह एक सामान्य पादप वृद्धि तथा उपापचय के निरोधक का काम करता है।

  • ABA बीज के अंकुरण का निरोध करता है। यह बाह्यत्वचीय पट्टिकाओं में रंध्रों (stomata) के बंद होने को प्रोत्साहित करता है तथा पौधों को विभिन्न प्रकार के तनावों को सहने की क्षमता प्रदान करता है — इसी कारण इसे तनाव हार्मोन (stress hormone) भी कहा जाता है।
  • ABA बीज के विकास, परिपक्वता, प्रसुप्ति आदि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रसुप्ति को प्रेरित करने के जरिए ABA बीज को जल-शुष्कन तथा वृद्धि के लिए अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाव देता है।
  • बहुत सारी परिस्थितियों में ABA, GAs के लिए एक विरोधक की भूमिका निभाता है।
  • संक्षेप में कह सकते हैं कि पौधों की वृद्धि, विभेदन तथा परिवर्धन के लिए एक या कई PGR कुछ न कुछ भूमिका निभाते हैं। ये भूमिकाएँ पूरक (complementary) या विरोधक (antagonistic) दोनों हो सकती हैं, और वैयक्तिक (निजी) या योगवाही भी हो सकती हैं। PGR की भूमिका एक तरह के आंतरिक नियंत्रण (internal control) में है — जीनोमिक नियंत्रण एवं बाह्य कारकों के साथ मिलकर ये पौधे की वृद्धि व परिवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    शब्दावली महत्वपूर्ण हिंदी-अंग्रेज़ी शब्दावली

    वृद्धि Growth
    किसी अंग, अवयव या कोशिका के आकार में स्थायी, अपरिवर्तनीय बढ़त।
    विभज्योतक Meristem
    पौधे के वे विशेष ऊतक-क्षेत्र जिनमें कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं।
    प्राथमिक वृद्धि Primary Growth
    शिखाग्र विभज्योतकों द्वारा पौधे की धुरी के समानांतर होने वाली लंबाई की वृद्धि।
    द्वितीयक वृद्धि Secondary Growth
    पार्श्व विभज्योतकों (संवहनी व कार्क कैंबियम) द्वारा अंगों की चौड़ाई में होने वाली वृद्धि।
    विभेदन Differentiation
    कोशिकाओं का विशिष्ट कार्य के लिए संरचनात्मक व कार्यात्मक रूप से परिपक्व होना।
    निर्विभेदन Dedifferentiation
    परिपक्व, विभेदित कोशिकाओं का पुनः विभाजन-क्षमता प्राप्त करना।
    पुनर्विभेदन Redifferentiation
    निर्विभेदित कोशिकाओं से बनी नई कोशिकाओं का पुनः विशिष्ट कार्य हेतु परिपक्व होना।
    परिवर्धन Development
    वृद्धि व विभेदन का योग — बीजांकुरण से जरावस्था तक के सारे परिवर्तन।
    प्लास्टिसिटी Plasticity
    पर्यावरण या जीवन-चरण के अनुसार पौधे का अलग-अलग संरचनाएँ बनाने की क्षमता।
    पादप वृद्धि नियामक Plant Growth Regulator (PGR)
    वृद्धि व परिवर्धन को नियंत्रित करने वाले छोटे रासायनिक अणु (हार्मोन)।
    ऑक्सिन Auxin
    वृद्धि प्रोत्साहक PGR, जड़ फूटने, शिखाग्र प्रधान्यता व अनिषेकफलन में सहायक।
    जिबरेलिन Gibberellin (GA)
    अक्ष-लंबाई बढ़ाने वाला अम्लीय PGR, बोल्टिंग व माल्टिंग में सहायक।
    साइटोकाइनिन Cytokinin
    कोशिकाद्रव्य विभाजन बढ़ाने वाला PGR, जरावस्था रोकने में सहायक।
    एथीलिन Ethylene
    फल पकाने वाली गैसीय PGR, जरावस्था व विलगन को बढ़ावा देती है।
    एब्सिसिक एसिड Abscisic Acid (ABA)
    वृद्धि-निरोधक "तनाव हार्मोन", प्रसुप्ति व रंध्र बंद करने में भूमिका।
    शिखाग्र प्रधान्यता Apical Dominance
    अग्रस्थ कलिका द्वारा पार्श्व कलियों की वृद्धि को रोकना।
    अनिषेकफलन Parthenocarpy
    बिना निषेचन के फल का बनना।
    क्लाइमैक्टिक श्वसन Climacteric Respiration
    फल पकने के दौरान श्वसन दर में अचानक होने वाली वृद्धि।

    सार संक्षेप में समझें

    किसी भी जीवित प्राणी के लिए वृद्धि एक अत्यंत उत्कृष्ट घटना है — यह एक अपरिवर्तनीय, बढ़त-युक्त प्रक्रिया है, जो आकार, क्षेत्रफल, लंबाई, ऊँचाई, आयतन तथा कोशिका-संख्या जैसे मापदंडों में प्रकट होती है। पौधों में विभज्योतक ही वृद्धि की जगहें होती हैं। मूल शिखाग्र विभज्योतक तथा प्ररोह शिखाग्र विभज्योतक के साथ-साथ अंतरवाहिका विभज्योतक पौधे के अक्ष की दीर्घगामी वृद्धि में भागीदारी करते हैं। कोशिका विभाजन का अनुपालन करते हुए वृद्धि अंकगणितीय या ज्यामितीय हो सकती है।

    जब कोशिका अपनी विभाजन क्षमता खो देती है, तो वह विभेदन की ओर बढ़ जाती है। विभेदन ऐसी संरचनाएँ प्रदान करता है जो उत्पाद की क्रियात्मकता के साथ जुड़ी होती हैं। एक विभेदित कोशिका फिर निर्विभेदित हो सकती है या पुनर्विभेदित हो सकती है। पौधों में विभेदन खुला होता है, इसलिए परिवर्धन लचीला हो सकता है — दूसरे शब्दों में, परिवर्धन वृद्धि एवं विभेदन का योग है।

    पादप वृद्धि एवं परिवर्धन बाह्य एवं आंतरिक दोनों कारकों द्वारा नियंत्रित होते हैं। आंतरिक कारक रासायनिक तत्व होते हैं जिन्हें पादप वृद्धि नियामक (PGR) कहा जाता है। पौधों में PGR के मुख्यतः पाँच समूह होते हैं — ऑक्सिन, जिब्बेरेलिंस, साइटोकिनिंस, एब्सिसिक एसिड तथा एथीलिन। ये PGR पौधे के विभिन्न हिस्सों में उत्पादित किए जाते हैं और विभेदन एवं परिवर्धन की घटनाओं को नियंत्रित करते हैं। इसके साथ ही पादप वृद्धि व परिवर्धन प्रकाश, तापक्रम, ऑक्सीजन स्तर, गुरुत्व तथा अन्य बाहरी कारकों से भी प्रभावित होते हैं।

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    प्रश्न 1 वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि, मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर — इन सभी को अपने शब्दों में परिभाषित कीजिए।
    उत्तर
    • वृद्धि (Growth): किसी अंग, अवयव या कोशिका के आकार में होने वाली स्थायी, अपरिवर्तनीय बढ़त।
    • विभेदन (Differentiation): कोशिकाओं का विशिष्ट कार्य के लिए संरचनात्मक व कार्यात्मक रूप से परिपक्व होना।
    • परिवर्धन (Development): वृद्धि व विभेदन का योग — बीजांकुरण से जरावस्था तक होने वाले सारे बदलाव।
    • निर्विभेदन (Dedifferentiation): परिपक्व, विभेदित कोशिकाओं का पुनः विभाजन-क्षमता प्राप्त कर लेना।
    • पुनर्विभेदन (Redifferentiation): निर्विभेदित कोशिकाओं से बनी नई कोशिकाओं का फिर से विशिष्ट कार्य हेतु परिपक्व होना।
    • सीमित वृद्धि (Determinate Growth): वह वृद्धि जो एक निश्चित सीमा तक पहुँचकर रुक जाती है, जैसे पत्ती या फूल की वृद्धि।
    • मेरिस्टेम/विभज्योतक: पौधे के वे ऊतक-क्षेत्र, जिनकी कोशिकाएँ जीवन भर लगातार विभाजित होती रहने की क्षमता रखती हैं।
    • वृद्धि दर (Growth Rate): समय की प्रति इकाई में होने वाली वृद्धि की मात्रा।
    प्रश्न 2 पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (Parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
    उत्तर

    क्योंकि पौधे के अलग-अलग अंग अलग-अलग ढंग से और अलग-अलग गति से बढ़ते हैं। उदाहरण के लिए, ताजा भार में वृद्धि जल की मात्रा से भी प्रभावित हो सकती है, जबकि शुष्क भार वास्तविक जैविक पदार्थ की वृद्धि दिखाता है। इसी तरह कुछ अंगों की वृद्धि लंबाई में मापी जाती है (जैसे परागनलिका), तो कुछ की क्षेत्रफल में (जैसे चौड़ी पत्ती)। चूँकि हर अंग व कोशिका-प्रकार का वृद्धि-स्वरूप भिन्न है, इसलिए किसी एक ही मापदंड — जैसे केवल लंबाई या केवल भार — से पूरे पौधे की वृद्धि को सटीक रूप से नहीं समझा जा सकता। इसीलिए वृद्धि मापने के लिए कई अलग-अलग मापदंड (ताजा भार, शुष्क भार, लंबाई, क्षेत्रफल, आयतन, कोशिका संख्या आदि) उपयोग में लाए जाते हैं।

    प्रश्न 3 संक्षिप्त वर्णन करें —
    (अ) अंकगणितीय वृद्धि (ब) ज्यामितीय वृद्धि (स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (द) संपूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर
    उत्तर

    (अ) अंकगणितीय वृद्धि: इसमें समसूत्री विभाजन के बाद केवल एक पुत्री कोशिका लगातार विभाजित होती रहती है, जबकि दूसरी विभेदित व परिपक्व होती जाती है। यह एक स्थिर, रैखिक (लीनियर) दर पर होने वाली वृद्धि है, जिसे Lt = L0 + rt से व्यक्त किया जाता है।

    (ब) ज्यामितीय वृद्धि: इसमें दोनों संतति कोशिकाएँ विभाजित होते रहने की क्षमता बनाए रखती हैं, जिससे शुरुआत में धीमी (लैग फेज) और बाद में तेज, चरघातांकी (एक्सपोनेंशियल) दर से वृद्धि होती है, जिसे W₁ = W₀ert से व्यक्त किया जाता है।

    (स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र: जब समय के सापेक्ष वृद्धि को आरेखित किया जाता है, तो एक S-आकार का वक्र मिलता है, जिसमें पश्चता अवस्था (धीमी शुरुआत), चरघातांकी अवस्था (तेज वृद्धि) तथा अप्रगामी अवस्था (सीमित संसाधनों के कारण वृद्धि का धीमा होकर स्थिर हो जाना) शामिल हैं। यह प्राकृतिक पर्यावरण में बढ़ने वाले लगभग सभी सजीवों की विशेषता है।

    (द) संपूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर: संपूर्ण (परम) वृद्धि दर प्रति यूनिट समय में हुई कुल वृद्धि की माप है, जबकि सापेक्ष वृद्धि दर प्रति यूनिट प्रारंभिक आकार के हिसाब से मापी गई वृद्धि है — यानी यह बताती है कि वृद्धि पहले से मौजूद आकार के अनुपात में कितनी तेज या धीमी हुई।

    प्रश्न 4 प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखें। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनका प्रयोग के बारे में लिखें।
    उत्तर
    PGR समूहखोजप्रमुख प्रभाव
    ऑक्सिनचार्ल्स व फ्रांसिस डार्विन के प्रयोग; F.W. वेंट द्वारा जई के प्रांकुरचोल से पृथकजड़ फूटना, शिखाग्र प्रधान्यता, अनिषेकफलन, फल-पत्ती विलगन रोकना, शाकनाशी
    जिबरेलिनई. कुरोसोवा द्वारा बैकेन रोग (जिबरेला फूजीकोराई कवक) से पहचानअक्ष-दीर्घीकरण, फल का आकार बढ़ाना, जरावस्था रोकना, बोल्टिंग, माल्टिंग तेज करना
    साइटोकाइनिनF. स्कूग द्वारा तंबाकू ऊतक संवर्धन में; मिलर एट अल द्वारा कायनेटिन का क्रिस्टलीकरणकोशिकाद्रव्य विभाजन बढ़ाना, शिखाग्र प्रधान्यता से मुक्ति, जरावस्था रोकना
    एथीलिनH.H. कज़िन्स द्वारा संतरों से निकले वाष्पशील तत्व के प्रभाव से पहचानफल पकाना (क्लाइमैक्टिक श्वसन), जरावस्था व विलगन बढ़ाना, फूलना प्रेरित करना
    एब्सिसिक एसिडतीन वैज्ञानिकों द्वारा स्वतंत्र रूप से पहचाने गए निरोधकों का एक समान पाया जानाबीज अंकुरण रोकना, रंध्र बंद करना, तनाव सहनशीलता (तनाव हार्मोन)
    प्रश्न 5 एब्सिसिक एसिड को तनाव हार्मोन कहते हैं, क्यों?
    उत्तर

    एब्सिसिक एसिड (ABA) को तनाव हार्मोन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पौधों को जल-शुष्कन (सूखे) तथा अन्य प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों को सहने की क्षमता प्रदान करता है। यह बाह्यत्वचीय पट्टिकाओं में रंध्रों (स्टोमेटा) को बंद करने को प्रोत्साहित करता है, जिससे पौधे से जल की हानि (वाष्पोत्सर्जन) कम हो जाती है — यह विशेष रूप से सूखे जैसे तनावपूर्ण हालात में बहुत उपयोगी साबित होता है। साथ ही यह बीज प्रसुप्ति को प्रेरित करके बीज को प्रतिकूल परिस्थितियों से भी बचाव देता है।

    प्रश्न 6 उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है, टिप्पणी करें?
    उत्तर

    पौधों की वृद्धि "खुले स्वरूप" की होती है, क्योंकि विभज्योतक ऊतकों की सक्रियता से पौधे के शरीर में जीवन भर नई कोशिकाएँ जुड़ती रहती हैं — यानी वृद्धि की कोई निश्चित सीमा नहीं होती (यह अपरिमित है)। ठीक इसी तरह विभेदन भी खुला होता है — क्योंकि एक ही विभज्योतक से पैदा हुई कोशिकाएँ, अपनी अंतिम स्थिति (कोशिकीय स्थिति) के आधार पर परिपक्व होने पर अलग-अलग संरचनाएँ तैयार करती हैं (जैसे शिखाग्र से दूरस्थ कोशिकाएँ मूल गोप बनती हैं, जबकि बाहरी वलय की कोशिकाएँ बाह्य त्वचा बनती हैं)। इसी खुलेपन के कारण ही पौधों में परिवर्धन इतना लचीला (प्लास्टिक) हो पाता है।

    प्रश्न 7 अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक का नाम दें —
    (क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
    (ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
    (ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
    (घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
    (च) एक रोजेट पौधे में 'वोल्ट' हेतु
    (छ) पत्तियों के रंध्र को तुरंत बंद करने हेतु
    उत्तर
    • (क) टहनी में जड़ पैदा करने हेतु — ऑक्सिन (IAA/IBA)
    • (ख) फल को जल्दी पकाने हेतु — एथीलिन (एथिफॉन)
    • (ग) पत्तियों की जरावस्था रोकने हेतु — साइटोकाइनिन
    • (घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु — साइटोकाइनिन (शिखाग्र प्रधान्यता से छुटकारा दिलाकर)
    • (च) रोजेट पौधे में 'बोल्टिंग/वोल्ट' हेतु — जिबरेलिन (GA)
    • (छ) पत्तियों के रंध्र तुरंत बंद करने हेतु — एब्सिसिक एसिड (ABA)
    प्रश्न 8 क्या हो सकता है, अगर —
    (क) GA₃ को धान के नवोद्भिदों पर दिया जाए
    (ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बंद कर दें
    (ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए
    (घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिंस डालना भूल जाएं
    उत्तर

    (क) यदि GA₃ को धान के नवोद्भिदों पर दिया जाए, तो पौधों में असामान्य रूप से तनों का तीव्र दीर्घीकरण हो जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे "बैकेन" (फूलिश सीडलिंग) रोग में देखा जाता है — जिसकी वजह से पौधे बहुत लंबे और कमजोर हो सकते हैं।

    (ख) यदि कोशिकाएँ विभाजित होती रहें लेकिन विभेदन कभी न करें, तो पौधे का शरीर कभी भी विशिष्ट ऊतकों व अंगों (जैसे जड़, पत्ती, फूल) में संगठित नहीं हो पाएगा — सिर्फ अविभेदित कोशिकाओं का एक अव्यवस्थित समूह (जैसे कैलस) बनकर रह जाएगा, कोई कार्यशील पौधा नहीं बन पाएगा।

    (ग) एक सड़ा हुआ फल एथीलिन गैस बड़ी मात्रा में छोड़ता है। यदि उसे कच्चे फलों के साथ रखा जाए, तो एथीलिन गैस के प्रभाव से आसपास के कच्चे फल भी तेजी से पकने लगेंगे — यही कारण है कि सड़ा फल दूसरे कच्चे फलों के पकने की गति को भी तेज कर देता है।

    (घ) यदि संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन डालना भूल जाएँ, तो कोशिकाओं में साइटोकिनेसिस (कोशिकाद्रव्य विभाजन) उचित ढंग से प्रोत्साहित नहीं हो पाएगा, जिससे नई प्ररोह कलिकाओं व शाखाओं का विकास बाधित हो सकता है — ऊतक संवर्धन में वांछित वृद्धि व शाखन नहीं हो पाएगा।

    NEET फोकस इस अध्याय के वे तथ्य जो NEET में पूछे जा सकते हैं

    ऊपर के अध्याय-विवरण में से चुने गए वे बिंदु, जो परीक्षा की दृष्टि से बार-बार MCQ का आधार बनते हैं — रटने के बजाय समझकर याद करें।

    वृद्धि (Growth) से जुड़े तथ्य

    • पादप वृद्धि अपरिमित (indeterminate) होती है क्योंकि मूल व प्ररोह शिखाग्र विभज्योतक जीवन भर सक्रिय रहते हैं — इसे 'वृद्धि का खुला स्वरूप' (open form of growth) कहा जाता है।NEET
    • प्राथमिक वृद्धि मूल/प्ररोह शिखाग्र विभज्योतक से होती है (लंबाई में); द्वितीयक वृद्धि पार्श्व विभज्योतकों — संवहनी कैंबियम व कार्क कैंबियम — से होती है (चौड़ाई में), जो केवल द्विबीजपत्री व नग्नबीजी पौधों में पाई जाती है।NEET
    • वृद्धि के तीन चरण — विभज्योतकीय चरण (पतली भित्ति, सघन जीवद्रव्य), दीर्घीकरण चरण (रसधानीभवन बढ़ता है) व परिपक्वता चरण (अंतिम आकार) — क्रम व लक्षण याद रखें।NEET
    • अंकगणितीय वृद्धि: Lt = L0 + rt (रैखिक/स्थिर दर); ज्यामितीय (चरघातांकी) वृद्धि: W1 = W0ert — इन दोनों सूत्रों पर आधारित संख्यात्मक प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।NEET
    • सिग्मॉइड (S-आकार) वृद्धि वक्र की तीन अवस्थाएँ — पश्चता (lag), चरघातांकी (exponential/log) व अप्रगामी (stationary) — प्राकृतिक रूप से बढ़ने वाले लगभग सभी सजीवों की विशेषता है।NEET
    • परम वृद्धि दर (absolute growth rate) बनाम सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) में अंतर — दो पत्तियाँ समान परम वृद्धि दिखा सकती हैं फिर भी उनकी सापेक्ष दर भिन्न हो सकती है (चित्र 13.7 वाला उदाहरण)।NEET
    • वृद्धि के लिए आवश्यक बाह्य दशाएँ — जल, ऑक्सीजन, पोषक तत्व, इष्टतम तापमान, प्रकाश तथा गुरुत्वाकर्षण।NEET

    विभेदन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन व परिवर्धन

    • विभेदन में कोशिका भित्ति व जीवद्रव्य दोनों में संरचनात्मक परिवर्तन होता है — जैसे वाहिकीय तत्व (tracheary element) का बनना, जिसमें कोशिका जीवद्रव्य खो देती है।NEET
    • निर्विभेदन (dedifferentiation) का उदाहरण — अंतरापूल्य वाहिकी कैंबियम व कार्क कैंबियम, जो परिपक्व स्थायी कोशिकाओं से बनते हैं। यही सिद्धांत ऊतक संवर्धन (tissue culture) का आधार है।NEET
    • परिवर्धन = वृद्धि + विभेदन; यह बीजांकुरण से जरावस्था तक के सभी परिवर्तनों को समाहित करता है।NEET
    • प्लास्टिसिटी (Plasticity): पौधे का पर्यावरण/जीवन-चरण के अनुसार भिन्न-भिन्न संरचनाएँ बनाना — उदाहरण: कपास/धनिया/लार्कस्पर में किशोर व प्रौढ़ पत्तियों का भिन्न आकार, तथा बटरकप में विषमपर्णता (heterophylly, जलीय बनाम पार्थिव पत्ती-आकार)।NEET

    PGR की खोज — वैज्ञानिक व उनसे जुड़े तथ्य (उच्च संभावना वाले प्रश्न)

    • चार्ल्स व फ्रांसिस डार्विन — कनारी घास के प्रांकुरचोल (coleoptile) में एकपार्श्वी प्रकाश के प्रति अनुक्रिया (phototropism) का अवलोकन; एफ.डब्ल्यू. वेंट ने जई के प्रांकुरचोल शिखर से ऑक्सिन को पृथक किया।NEET
    • ई. कुरोसोवा — धान के 'बैकेन/फूलिश सीडलिंग' रोग (कवक Gibberella fujikuroi) से जिबरेलिक अम्ल की पहचान।NEET
    • एफ. स्कूग व सहकर्मी — तंबाकू तने के अंतरापर्वीय खंड में कैलस वृद्धि हेतु ऑक्सिन के साथ वाहिका-ऊतक सत्व/यीस्ट सत्व/नारियल दूध/DNA की आवश्यकता; मिलर एट अल (1955) ने कायनेटिन को क्रिस्टलीकृत किया।NEET
    • एच.एच. कज़िन्स (1910) — पके संतरों से निकले वाष्पशील तत्व (एथीलिन) के कारण पास रखे कच्चे केलों का शीघ्र पकना।NEET
    • एब्सिसिक एसिड — तीन वैज्ञानिकों द्वारा स्वतंत्र रूप से पहचाने गए तीन निरोधकों (निरोधक बी, बिलगन II, डोरमिन) का रासायनिक रूप से समान पाया जाना।NEET

    ऑक्सिन (Auxin)

    • IAA व IBA प्राकृतिक ऑक्सिन हैं; NAA व 2,4-D कृत्रिम (सिंथेटिक) ऑक्सिन हैं — यह अंतर बार-बार पूछा जाता है।NEET
    • ऑक्सिन शिखाग्र प्रधान्यता (apical dominance) को बढ़ावा देता है — अग्रस्थ कलिका पार्श्व कलियों की वृद्धि रोकती है; शिखर हटाने पर पार्श्व शाखाएँ बढ़ती हैं (चाय बागानों व हेज-मेकिंग में उपयोग)।NEET
    • ऑक्सिन अनिषेकफलन (parthenocarpy) प्रेरित करता है (जैसे टमाटर में) तथा तने की कलमों में जड़ फूटने में सहायक है (पादप प्रवर्धन)।NEET
    • 2,4-D शाकनाशी (herbicide) के रूप में द्विबीजपत्री खरपतवार नष्ट करता है, पर एकबीजपत्री (मोनोकॉट) फसलों को हानि नहीं पहुँचाता।NEET
    • ऑक्सिन पत्ती-फल विलगन को रोकता है (प्रारंभिक अवस्था में), जबकि परिपक्व/पुरानी पत्तियों-फलों के विलगन को बढ़ावा भी देता है — संदर्भ पर ध्यान दें।NEET

    जिबरेलिन (Gibberellin — GA)

    • सभी जिबरेलिन अम्लीय होते हैं; GA₃ सबसे पहले खोजा गया व सर्वाधिक अध्ययन किया गया रूप है।NEET
    • बोल्टिंग (bolting) — रोज़ेट पौधों (जैसे पत्तागोभी, चुकंदर) में पुष्पन से पहले अंतःपर्व का तीव्र दीर्घीकरण — जिबरेलिन द्वारा प्रेरित होता है।NEET
    • गन्ने पर जिबरेलिन छिड़कने से तने की लंबाई व उपज (लगभग 20 टन/एकड़ तक) बढ़ती है; माल्टिंग उद्योग में GA₃ का उपयोग होता है।NEET
    • GA₃ को धान के नवोद्भिदों पर देने से 'बैकेन रोग' जैसा असामान्य तना-दीर्घीकरण होता है।NEET
    • जिबरेलिन जरावस्था रोकता है तथा किशोर शंकुधारी (conifer) पौधों में परिपक्वता तेज करके शीघ्र बीज उत्पादन कराता है।NEET

    साइटोकाइनिन (Cytokinin)

    • कायनेटिन एडेनिन (adenine) का व्युत्पन्न है, पौधों में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता (यह ऑटोक्लेवड हेरिंग शुक्राणु DNA से मिला); जियाटीन (Zeatin) मक्का व नारियल दूध से पृथक प्राकृतिक साइटोकाइनिन है।NEET
    • साइटोकाइनिन का विशिष्ट प्रभाव साइटोकिनेसिस (कोशिकाद्रव्य विभाजन) पर होता है।NEET
    • साइटोकाइनिन शिखाग्र प्रधान्यता से मुक्ति दिलाता है (ऑक्सिन के विपरीत प्रभाव) व पत्तियों की जरावस्था में देरी करता है।NEET
    • प्राकृतिक साइटोकाइनिन तीव्र कोशिका-विभाजन क्षेत्रों — मूल शिखाग्र, विकासशील प्ररोह कलिकाएँ, तरुण फल — में संश्लेषित होता है।NEET

    एथीलिन (Ethylene)

    • एकमात्र गैसीय PGR — जरावस्था प्राप्त कर रहे ऊतकों व पकते फलों द्वारा भारी मात्रा में संश्लेषित होती है।NEET
    • फल पकने के दौरान श्वसन दर में अचानक वृद्धि को क्लाइमैक्टिक श्वसन (climacteric respiration) कहते हैं — एथीलिन इसका प्रमुख नियामक है।NEET
    • एथिफॉन (Ethephon) — सबसे व्यापक रूप से प्रयुक्त एथीलिन-यौगिक — टमाटर/सेव पकाने व खीरे में मादा पुष्प बढ़ाने में उपयोगी है।NEET
    • एथीलिन गहरे पानी के धान में पर्णवृंत के तीव्र दीर्घीकरण को प्रेरित करता है ताकि पत्तियाँ जलस्तर से ऊपर रहें; तथा अनानास में पुष्पन-समकालिकता व आम में पुष्पन प्रेरित करता है।NEET
    • एथीलिन बीज व कलिका प्रसुप्ति तोड़ती है (जैसे आलू कंद व मूँगफली बीज में अंकुरण प्रेरित करना)।NEET

    एब्सिसिक एसिड (ABA)

    • ABA को 'तनाव हार्मोन' कहा जाता है — यह पौधों को प्रतिकूल पर्यावरणीय दशाओं (जैसे सूखा) सहने में मदद करता है।NEET
    • ABA रंध्रों (स्टोमेटा) को बंद करने को प्रोत्साहित करता है, जिससे वाष्पोत्सर्जन घटता है।NEET
    • ABA बीज अंकुरण का निरोध व बीज प्रसुप्ति को प्रेरित करता है — बीज को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाता है।NEET
    • अनेक परिस्थितियों में ABA, GA का विरोधक (antagonist) की तरह कार्य करता है — यह वृद्धि-निरोधक PGR समूह का सदस्य है (एकमात्र विशुद्ध निरोधक)।NEET

    Extra अन्य NEET संबंधित तथ्य

    परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु व तुलनाएँ — ऊपर दी गई "NEET हेतु महत्वपूर्ण तथ्य" सूची से अलग।

    तथ्य
    • शिखाग्र विभज्योतक (apical meristem) के भीतर एक विशेष क्षेत्र होता है जिसे स्थिरकेंद्र (quiescent centre) कहते हैं, जिसकी खोज एफ.ए.एल. क्लोज़ (F.A.L. Clowes) ने की थी — यहाँ की कोशिकाएँ अपेक्षाकृत धीमी गति से विभाजित होती हैं तथा क्षति होने पर विभज्योतक के लिए आरक्षित (reserve) स्रोत के रूप में कार्य करती हैं।
    तथ्य
    • अंतर्वेशी विभज्योतक (intercalary meristem) — यह शिखाग्र विभज्योतक का ही एक भाग है जो पर्णाच्छद (leaf sheath) अथवा पर्व (internode) के आधार पर शेष रह जाता है, विशेषकर घास कुल (Poaceae) के पौधों में पाया जाता है — चराई (grazing) या कटाई के बाद घास की तीव्र पुनर्वृद्धि इसी विभज्योतक के कारण संभव होती है।
    तुलनात्मक
    • कालानुक्रमिक आयु (chronological age) बनाम शरीरक्रियात्मक आयु (physiological age) — दो पत्तियाँ समान समय पर उत्पन्न होने के कारण समान कालानुक्रमिक आयु रख सकती हैं, फिर भी उनकी वृद्धि दर भिन्न होने के कारण उनकी शरीरक्रियात्मक आयु भिन्न हो सकती है — यह भेद वृद्धि दर की मापन-आधारित समझ को गहरा करता है।
    तथ्य
    • ऑक्सिन की मात्रा ज्ञात करने हेतु एफ.डब्ल्यू. वेंट द्वारा विकसित जैव-परख (bioassay) विधि को एवीना वक्रता परीक्षण (Avena curvature test) कहा जाता है — इसमें जई (Avena) के प्रांकुरचोल (coleoptile) के अगर-ब्लॉक पर ऑक्सिन रखकर उत्पन्न वक्रता के कोण को मापा जाता है, जो ऑक्सिन की सांद्रता के समानुपाती होता है।
    तथ्य
    • अनाज के बीजों के अंकुरण के दौरान भ्रूण से मुक्त जिबरेलिन, ऐल्यूरोन परत (aleurone layer) को α-ऐमाइलेस जैसे जल-अपघटनी एंजाइम संश्लेषित करने हेतु प्रेरित करता है — ये एंजाइम भ्रूणपोष में संचित स्टार्च को शर्करा में तोड़ते हैं, जो अंकुरित भ्रूण के पोषण हेतु उपयोग होती है। यह जिबरेलिन की क्रियाविधि का एक क्लासिक आणविक उदाहरण है।
    तथ्य
    • एथीलिन की उपस्थिति में उगाए गए दिबीजपत्री बीजाणुओं (seedlings) में त्रिक अनुक्रिया (triple response) देखी जाती है — (1) तने की दीर्घीकरण वृद्धि का अवरोध, (2) तने का मोटा होना (पार्श्व वृद्धि में वृद्धि), तथा (3) तने का क्षैतिज दिशा में मुड़ना (diageotropism)। इसी त्रिक अनुक्रिया के आधार पर एथीलिन की उपस्थिति का जैव-परख (bioassay) किया जाता है।
    तथ्य
    • साइटोकाइनिन द्वारा पत्तियों की जरावस्था (senescence) में देरी की परिघटना को रिचमंड-लैंग प्रभाव (Richmond-Lang effect) कहा जाता है — यह दर्शाता है कि कटी हुई पत्तियों पर साइटोकाइनिन का बाह्य प्रयोग हरितिमा (क्लोरोफिल) को अधिक समय तक बनाए रखता है, जबकि उपचारित क्षेत्र के आसपास की पत्ती जल्दी पीली पड़ जाती है (पोषक तत्वों का संचलन साइटोकाइनिन-उपचारित क्षेत्र की ओर होता है)।
    ट्रैप
    • ऑक्सिन का संचलन पौधे में ध्रुवीय (polar) होता है — तने में यह सदैव एकदिश (unidirectional) रूप से केवल आधारीय दिशा (basipetal, शिखर से आधार की ओर) में संचरित होता है, अग्राभिसारी (acropetal) दिशा में नहीं — जबकि साइटोकाइनिन व जिबरेलिन का संचलन अध्रुवीय (non-polar, दोनों दिशाओं में) होता है। दिशा को उलट कर पूछना एक सामान्य ट्रैप है।
    तथ्य
    • सर्वशक्तता (Totipotency) की अवधारणा — प्रत्येक जीवित पादप कोशिका में संपूर्ण पौधे को पुनर्जीवित करने की क्षमता होती है — सर्वप्रथम गॉटलीब हैबरलैंट (Gottlieb Haberlandt) ने प्रतिपादित की थी। यही सिद्धांत आधुनिक ऊतक संवर्धन (tissue culture) तकनीक की सैद्धांतिक नींव है — निर्विभेदन व पुनर्विभेदन दोनों इसी क्षमता के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
    तथ्य
    • ऊतक संवर्धन में एफ. स्कूग व सी.ओ. मिलर के प्रयोगों से पता चला कि कैलस से अंगों के विकास की दिशा ऑक्सिन व साइटोकाइनिन के सापेक्ष अनुपात पर निर्भर करती है — साइटोकाइनिन की तुलना में ऑक्सिन की अधिकता मूल (जड़) के विकास को प्रेरित करती है, जबकि ऑक्सिन की तुलना में साइटोकाइनिन की अधिकता प्ररोह (शाखा) के विकास को प्रेरित करती है — यह अनुपात-आधारित नियम पादप जैवप्रौद्योगिकी अध्याय से भी जुड़ता है।
    तुलनात्मक
    • ABA रंध्र-बंदी (stomatal closure) की क्रियाविधि रक्षक कोशिकाओं (guard cells) में पोटैशियम आयन (K⁺) के बहिःस्राव (efflux) द्वारा होती है — K⁺ की सांद्रता घटने से रक्षक कोशिकाओं का स्फीति दाब (turgor pressure) कम हो जाता है, जिससे रंध्र बंद हो जाता है — यह क्रियाविधि रंध्र-खुलने के समय K⁺ के अंतर्ग्रहण (influx, प्रकाश की उपस्थिति में) की क्रियाविधि से ठीक विपरीत है।
    तथ्य
    • पादप वृद्धि नियामकों की सांद्रता (dose) उनके प्रभाव की दिशा तय करती है — निम्न सांद्रता पर ऑक्सिन मूल-वृद्धि को प्रोत्साहित कर सकता है, जबकि उच्च सांद्रता पर वही मूल-वृद्धि को निरोधित (inhibit) कर देता है — यह द्वैध (dual) प्रभाव लगभग सभी PGR में किसी-न-किसी रूप में देखा जाता है, जिसे "हार्मीसिस" जैसी सांद्रता-निर्भर अनुक्रिया कहा जा सकता है।
    तुलनात्मक
    • अरैखिक (nonlinear) व रैखिक (linear) वृद्धि में अंतर — अंकगणितीय वृद्धि में वृद्धि दर स्थिर (constant) रहती है, जिससे Lt बनाम t का आलेख एक सरल रेखा (linear graph) देता है; जबकि ज्यामितीय (चरघातांकी) वृद्धि में वृद्धि दर समय के साथ बढ़ती जाती है, जिससे W1 बनाम t का आलेख J-आकार (चरघातांकी वक्र) देता है — यह ग्राफ-आधारित पहचान अक्सर पूछी जाती है।
    तथ्य
    • ब्रैसिनोस्टेरॉइड्स (Brassinosteroids) — यद्यपि इन्हें पाँच प्रमुख PGR समूहों में परंपरागत रूप से नहीं गिना जाता, फिर भी ये स्टेरॉइड-प्रकृति के पादप वृद्धि नियामक हैं जो कोशिका दीर्घीकरण व विभाजन दोनों को प्रभावित करते हैं तथा तनाव सहनशीलता बढ़ाने में भी सहायक हैं — नए पाठ्यक्रम-आधारित प्रश्नों में इनका उल्लेख होने लगा है।
    रणनीति
    • चूँकि इस अध्याय में पाँचों PGR के गुण-धर्म व खोज-इतिहास दोनों सम्मिलित हैं, अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) प्रत्येक PGR की खोज से जुड़े वैज्ञानिकों के नाम व प्रयोग, (2) पाँचों PGR के परस्पर विरोधी (antagonistic) व सहक्रियात्मक (synergistic) प्रभाव — विशेषकर ऑक्सिन-साइटोकाइनिन अनुपात व GA-ABA विरोध, (3) वृद्धि वक्र व वृद्धि-दर से जुड़े सभी सूत्र व परिभाषाएँ — इन्हीं तीन विषयों से अधिकांश प्रत्यक्ष व अनुप्रयोग-आधारित प्रश्न बनते हैं।

    NEET PYQs NEET परीक्षा में अब तक पूछे गए प्रश्न (Previous Year Questions)

    इस अध्याय से NEET परीक्षा (2013–2026) में अब तक पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न, वर्ष के संदर्भ सहित। हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।

    NEET Kar. 2013 जो अनानास (Pineapple) सामान्यतः कठिनाई से पुष्पित होता है, उसे वर्षभर फल देने योग्य किस पदार्थ के प्रयोग से बनाया गया है?
    (अ) IAA, IBA   (ब) NAA, 2,4-D   (स) फिनाइल एसीटिक एसिड   (द) साइटोकाइनिन

    उत्तर: (ब) NAA, 2,4-D। NAA (नैफ्थलीन एसीटिक एसिड) तथा 2,4-D — ये दोनों संश्लेषित (सिंथेटिक) ऑक्सिन हैं। इनके छिड़काव से अनानास तथा लीची जैसे पौधों में, जो सामान्यतः पुष्पन में कठिनाई दिखाते हैं, फूल आना प्रेरित किया जा सकता है — जिससे वर्षभर फल प्राप्त होते रहते हैं।

    AIPMT 2014 टमाटर के कुछ सामान्य नवोद्भिदों को एक अंधेरे कमरे में रखा गया। कुछ दिनों बाद वे ऐल्बिनो (albino) पौधों की तरह सफेद रंग के हो गए। इस अवस्था को किस शब्द से वर्णित किया जाएगा?
    (अ) उत्परिवर्तित (ब) एम्बोलाइज्ड (स) एटियोलेटेड (द) डिफोलिएटेड

    उत्तर: (स) एटियोलेशन (Etiolation)। जब पौधे अंधेरे या बहुत कम प्रकाश में उगते हैं, तो उनमें असामान्य वृद्धि होती है — तना अत्यधिक लंबा हो जाता है, पत्तियाँ अविकसित व हरितहीन (पीली/सफेद) रह जाती हैं क्योंकि क्लोरोफिल नहीं बन पाता। इस असामान्य वृद्धि-दशा को एटियोलेशन कहते हैं।

    AIPMT 2014 निम्नलिखित में से किस वृद्धि नियामक को 'तनाव हार्मोन' (Stress Hormone) कहा जाता है?
    (अ) एब्सिसिक एसिड   (ब) एथीलिन   (स) GA₃   (द) इंडोल एसिटिक एसिड

    उत्तर: (अ) एब्सिसिक एसिड (ABA)। ABA पौधों को प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों (जैसे सूखा, कम जल उपलब्धता) को सहन करने में मदद करता है — इसीलिए इसे तनाव हार्मोन कहा जाता है।

    NEET-II 2016 यदि आपको ऊतक संवर्धन (tissue culture) में विभेदन की क्षमता वाला एक ऊतक दिया जाए, तो जड़ें व प्ररोह दोनों प्राप्त करने के लिए संवर्धन माध्यम में हार्मोनों की कौन-सी जोड़ी मिलानी होगी?
    (अ) जिबरेलिन व एब्सिसिक एसिड   (ब) ऑक्सिन व एब्सिसिक एसिड   (स) ऑक्सिन व साइटोकाइनिन   (द) IAA व जिबरेलिन

    उत्तर: (स) ऑक्सिन व साइटोकाइनिन। ऊतक संवर्धन में ऑक्सिन व साइटोकाइनिन का अनुपात ही यह तय करता है कि कैलस से जड़ें बनेंगी या प्ररोह — दोनों हार्मोनों का संतुलित प्रयोग जड़ व प्ररोह, दोनों प्रकार की वृद्धि को प्रेरित करता है।

    NEET 2020 गन्ने (sugarcane) की फसल पर छिड़कने से तने की लंबाई बढ़ाकर उपज बढ़ाने वाला पादप वृद्धि नियामक कौन-सा है?
    (अ) एथीलिन   (ब) एब्सिसिक एसिड   (स) साइटोकाइनिन   (द) जिबरेलिन

    उत्तर: (द) जिबरेलिन। गन्ने की फसल पर जिबरेलिन के छिड़काव से तने की लंबाई बढ़ जाती है, जिससे प्रति एकड़ उपज में उल्लेखनीय (लगभग 20 टन तक) वृद्धि हो सकती है — क्योंकि गन्ने में तना ही मुख्य आर्थिक भाग है।

    NEET 2020 निम्न में से कौन-सा बीज प्रसुप्ति (seed dormancy) को नियंत्रित करने वाला निरोधात्मक (inhibitory) पदार्थ नहीं है?
    (अ) पैरा-एस्कॉर्बिक एसिड   (ब) एब्सिसिक एसिड   (स) जिबरेलिक एसिड   (द) फिनोलिक एसिड

    उत्तर: (स) जिबरेलिक एसिड (GA)। GA एक निरोधात्मक पदार्थ नहीं, बल्कि बीज प्रसुप्ति को तोड़ने वाला पदार्थ है — यह ऐल्यूरोन परत में α-एमाइलेज़ एंजाइम के संश्लेषण को सक्रिय करता है, जो स्टार्च को सरल शर्करा में तोड़कर अंकुरण में सहायक होता है।

    NEET 2021 खेत में खरपतवार (weeds) नष्ट करने हेतु प्रयुक्त होने वाला पादप हार्मोन कौन-सा है?
    (अ) 2,4-D   (ब) IBA   (स) IAA   (द) NAA

    उत्तर: (अ) 2,4-D। यह एक संश्लेषित ऑक्सिन है, जिसका उपयोग शाकनाशी (herbicide/weedicide) के रूप में किया जाता है — यह अनाज की फसलों में चौड़ी पत्ती वाले (द्विबीजपत्री) खरपतवार को नष्ट कर देता है, जबकि एकबीजपत्री फसल को हानि नहीं पहुँचाता।

    NEET 2021 पौधों में पर्यावरण अथवा जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार अलग-अलग मार्ग अपनाकर भिन्न-भिन्न संरचनाएँ बनाने की क्षमता को क्या कहते हैं?

    उत्तर: प्लास्टिसिटी (Plasticity)। पौधों में वृद्धि व विभेदन खुले स्वरूप के होने के कारण यह लचीलापन (प्लास्टिसिटी) संभव होता है — उदाहरणस्वरूप, विषमपर्णता (heterophylly) में जलमग्न व वायवीय पत्तियों की आकृति भिन्न-भिन्न होती है।

    NEET 2022 (I) हाल के वर्षों में खीरे (cucumber) के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है। किस पादप हार्मोन के प्रयोग से यह संभव हुआ, जो पौधे में मादा पुष्प (female flowers) बनने को बढ़ावा देता है?

    उत्तर: ऑक्सिन (Auxin)। खीरे जैसे कुकरबिट (cucurbit) कुल के पौधों में ऑक्सिन के छिड़काव से मादा पुष्पों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे फल उत्पादन व उपज में बड़ी वृद्धि होती है।

    NEET 2022 (II) निम्नलिखित में से कौन-सा वृद्धि नियामक एडेनीन (adenine) का व्युत्पन्न (derivative) है?
    (अ) एब्सिसिक एसिड   (ब) ऑक्सिन   (स) साइटोकाइनिन   (द) एथीलिन

    उत्तर: (स) साइटोकाइनिन। साइटोकाइनिन एडेनीन (एक प्यूरीन क्षार) के व्युत्पन्न होते हैं। इसके विपरीत, ऑक्सिन इंडोल यौगिकों से, एब्सिसिक एसिड कैरोटिनॉइड्स से, तथा एथीलिन मिथिओनीन नामक अमीनो अम्ल से व्युत्पन्न होता है।

    NEET 2023 किशोर शंकुधारी (juvenile conifer) पौधों पर छिड़कने से उनकी परिपक्वता अवधि जल्दी पूर्ण करके शीघ्र बीज उत्पादन में सहायक कौन-सा पादप हार्मोन है?
    (अ) इंडोल-3-ब्यूटिरिक एसिड   (ब) जिबरेलिक एसिड   (स) ज़िएटिन   (द) एब्सिसिक एसिड

    उत्तर: (ब) जिबरेलिक एसिड (GA)। GA कोशिका दीर्घीकरण, अंकुरण तथा परिपक्वता से जुड़ी कई प्रक्रियाओं को प्रेरित करता है। वानिकी (forestry) में इसका उपयोग किशोर शंकुधारी पौधों की परिपक्वता अवधि को कम करके जल्दी बीज उत्पादन कराने हेतु किया जाता है।

    NEET-UG 2023 ऊतक संवर्धन प्रयोगों में जब पत्ती के मध्योतक (mesophyll) कोशिकाओं को संवर्धन माध्यम में रखकर कैलस बनाया जाता है, तो इस परिघटना को क्या कहते हैं?
    (अ) जरावस्था   (ब) विभेदन   (स) निर्विभेदन   (द) परिवर्धन

    उत्तर: (स) निर्विभेदन (Dedifferentiation)। परिपक्व, विभेदित पत्ती-कोशिकाओं का पुनः विभाजन-क्षमता प्राप्त करके असंगठित कैलस बनाना निर्विभेदन कहलाता है — यही परिघटना पूरे ऊतक संवर्धन (tissue culture) तकनीक का आधार है।

    NEET 2024 (पुनःपरीक्षा) F. स्कूग व उनके सहयोगियों ने देखा कि तंबाकू के तने के अंतरापर्वीय (internodal) खंडों से कैलस केवल तभी बढ़ता है जब पहले से ऑक्सिन-युक्त माध्यम में संवहनी ऊतक का सत, यीस्ट सत, नारियल का दूध या DNA मिलाया जाए। इनमें कौन-सा घटक अतिरिक्त रूप से मिलाया गया था?
    (अ) ऑक्सिन   (ब) जिबरेलिन   (स) एथीलिन   (द) कायनेटिन

    उत्तर: (द) कायनेटिन (साइटोकाइनिन)। इसी प्रयोग के दौरान स्कूग व मिलर आदि वैज्ञानिकों ने कायनेटिन को पृथक व क्रिस्टलीकृत किया था, जो साइटोकाइनिन वर्ग का पहला ज्ञात सदस्य था और कोशिकाद्रव्य विभाजन (cytokinesis) को प्रेरित करता है।

    NEET 2025 निम्नलिखित में से कौन-से पादप वृद्धि नियामक क्रमशः पत्ती-विलगन (leaf abscission) को रोकते व बढ़ावा देते हैं?
    (अ) ऑक्सिन व एथीलिन   (ब) ऑक्सिन व एब्सिसिक एसिड   (स) जिबरेलिन व साइटोकाइनिन   (द) एब्सिसिक एसिड व एथीलिन

    उत्तर: (अ) ऑक्सिन व एथीलिन। ऑक्सिन विलगन क्षेत्र (abscission zone) के बनने को रोककर पत्ती व फल को पौधे से जुड़ा रखने में मदद करता है, जबकि एथीलिन विलगन परत के निर्माण व पृथक्करण को बढ़ावा देकर पत्ती-विलगन को प्रेरित करता है।

    RE-NEET 2026 पर्णविन्यास (Phyllotaxy) किसके व्यवस्थान (arrangement) की पद्धति है?
    (अ) फल   (ब) बाह्यदल   (स) पत्तियाँ   (द) पुष्प

    उत्तर: (स) पत्तियाँ (Leaves)। पर्णविन्यास तने अथवा शाखा पर पत्तियों के व्यवस्थान की पद्धति को कहते हैं, जो प्रकाश-अवशोषण को अधिकतम व परस्पर छायांकन को न्यूनतम करने में मदद करती है। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं — एकांतर (alternate), सम्मुख (opposite) व चक्रिक (whorled)।

    RE-NEET 2026 समय शून्य पर तने की लंबाई 20 cm है। यदि अंकगणितीय वृद्धि दर 30 cm प्रतिदिन है, तो 7वें दिन के अंत में तने की लंबाई कितनी होगी?
    (अ) 230 cm   (ब) 460 cm   (स) 50 cm   (द) 170 cm

    उत्तर: (अ) 230 cm। अंकगणितीय वृद्धि में लंबाई की गणना Lt = L0 + rt सूत्र से की जाती है। यहाँ L0 = 20 cm, r = 30 cm/दिन, t = 7 दिन। अतः Lt = 20 + (30 × 7) = 20 + 210 = 230 cm

    RE-NEET 2026 पत्तागोभी (cabbage) में पुष्पन से पूर्व पर्व-मध्य (internode) के दीर्घीकरण को प्रेरित करने वाला पादप वृद्धि नियामक कौन-सा है?
    (अ) इंडोल ब्यूटिरिक एसिड   (ब) एथिफॉन   (स) एब्सिसिक एसिड   (द) जिबरेलिन

    उत्तर: (द) जिबरेलिन। जिबरेलिन तने व पर्व-मध्य के दीर्घीकरण को प्रेरित करता है। पत्तागोभी जैसे रोजेट पौधों में यह पुष्पन से पहले तेज़ी से पर्व-मध्य को लंबा कर देता है — इसी परिघटना को 'बोल्टिंग' (bolting) कहा जाता है।

    पादप वृद्धि एवं परिवर्धन — जीव विज्ञान अध्याय 13 • सामग्री मौलिक रूप से लिखी गई है, अध्ययन व संदर्भ हेतु उपयोग करें।

    वृद्धि, विभेदन और नियामकों का यह सूक्ष्म जाल — पौधों के जीवन की सबसे रोचक कहानी है।

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