जैव अणु — विस्तृत अध्ययन सामग्री
जीव विज्ञान • जैव रसायन

जैव अणु

किसी पौधे या प्राणी के ऊतक को तोड़कर देखें, तो भीतर मिलेगा कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन जैसे बुनियादी तत्वों से बना एक पूरा रासायनिक संसार — अमीनो अम्ल, शर्करा, वसा अम्ल, न्यूक्लियोटाइड। इस अध्याय में हम इन्हीं जैव अणुओं की दुनिया में उतरेंगे — यह समझने के लिए कि जीवन की हर क्रिया आखिर किस आणविक आधार पर टिकी है।

भूमिका रासायनिक संघटन का विश्लेषण कैसे करें

इस जीवमंडल में तरह-तरह के जीव पाए जाते हैं। मन में सहज ही यह सवाल उठता है — क्या सभी जीव रासायनिक संघटन की दृष्टि से एक जैसे ही तत्वों व यौगिकों से मिलकर बने होते हैं? अगर पादप व प्राणी ऊतकों के साथ-साथ सूक्ष्मजीवी लेई का भी परीक्षण किया जाए, तो हमें कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन व अन्य तत्वों की एक सूची मिलती है, जिनकी मात्रा हर जीव ऊतक में प्रति इकाई अलग-अलग होती है।

जीवित बनाम निर्जीव पदार्थ में तत्वों की तुलना दिलचस्प बात यह है कि अगर हम किसी निर्जीव पदार्थ, जैसे भू-पर्पटी के टुकड़े, का भी वही परीक्षण करें, तो हमें तत्वों की लगभग वही सूची मिलती है। सूक्ष्म परीक्षण के बाद यह ज़रूर स्पष्ट होता है कि किसी भी जीव में भू-पर्पटी की तुलना में कार्बन व हाइड्रोजन की मात्रा सामान्यतः कहीं ज़्यादा होती है। यानी तत्व तो वही हैं, बस उनका अनुपात अलग है।

इसी तरह हम पूछ सकते हैं कि जीवों में कार्बनिक यौगिक किस रूप में मिलते हैं? इस सवाल का जवाब पाने के लिए रासायनिक विश्लेषण करना पड़ता है। किसी भी जीव ऊतक (जैसे सब्ज़ी या यकृत का टुकड़ा) को खरल व मूसल की मदद से ट्राइक्लोरोएसिटिक अम्ल के साथ पीसा जाता है, जिससे एक गाढ़ा कर्दम (स्लरी) मिलता है — इसे महीन कपड़े में रखकर छानने के बाद दो अंश मिलते हैं: एक अंश जो अम्ल में घुल जाता है, उसे निस्यंद कहते हैं, और दूसरा अंश जो अम्ल में अविलेय रहता है, उसे धारित कहते हैं। वैज्ञानिकों ने अम्ल-घुलनशील भाग में हज़ारों कार्बनिक यौगिकों को पहचाना है।

किसी निचोड़ में मिलने वाले विशेष यौगिक को अलग करने के लिए विभिन्न पृथक्करण विधियाँ अपनाई जाती हैं, जब तक कि वह पूरी तरह शुद्ध रूप में अलग न हो जाए — दूसरे शब्दों में, एक वियुक्त यानी एक शुद्ध यौगिक होता है। जीव ऊतकों में मिलने वाले सभी कार्बनिक यौगिकों को जैव अणु कहा जाता है। लेकिन जीवों में अकार्बनिक तत्व व यौगिक भी मिलते हैं, जिन्हें एक अलग, भंजक (जलाने वाली) विधि से पहचाना जाता है — ऊतक की थोड़ी मात्रा को तोलकर (यह नम भार कहलाता है) सुखा लिया जाता है, जिससे पूरा पानी वाष्पित हो जाता है और बचे पदार्थ से शुष्क भार मिलता है। अगर इसे पूरी तरह जला दिया जाए तो सारे कार्बनिक यौगिक ऑक्सीकृत होकर गैसीय रूप में अलग हो जाते हैं, और बचे पदार्थ को भस्म कहा जाता है — इसी भस्म में कैल्सियम, मैग्नीशियम जैसे अकार्बनिक तत्व मिलते हैं।

रसायन विज्ञान के दृष्टिकोण से क्रियात्मक समूह जैसे ऐल्डीहाइड, कीटोन, एरोमेटिक यौगिकों की पहचान की जा सकती है, किंतु जीव विज्ञान की दृष्टि से इन्हें अमीनो अम्ल, न्यूक्लियोटाइड क्षार, वसा अम्ल आदि में वर्गीकृत करते हैं।

अमीनो अम्ल की बुनियादी बनावट अमीनो अम्ल कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनमें एक ही कार्बन (α-कार्बन) पर एक अमीनो समूह व एक अम्लीय समूह प्रतिस्थापित होते हैं — इसीलिए इन्हें अल्फा (α) अमीनो अम्ल कहा जाता है। ये प्रतिस्थापित मेथेन हैं, जिनके चार प्रतिस्थाई समूह — हाइड्रोजन, कार्बोक्सिल समूह, अमीनो समूह तथा परिवर्तनशील R समूह — चार संयोजकता स्थलों से जुड़े रहते हैं। R समूह की प्रकृति के आधार पर अमीनो अम्ल अनेक प्रकार के होते हैं, फिर भी प्रोटीन में उपलब्धता के आधार पर ये कुल 21 प्रकार के होते हैं।

अमीनो अम्लों के भौतिक व रासायनिक गुण मुख्यतः अमीनो, कार्बोक्सिल व R क्रियात्मक समूह पर निर्भर हैं। अमीनो व कार्बोक्सिल समूहों की संख्या के आधार पर अम्लीय (उदाहरण ग्लुटामिक अम्ल), क्षारीय (उदाहरण लाइसिन) और उदासीन (उदाहरण वेलीन) अमीनो अम्ल होते हैं, तथा टायरोसिन, फेनिलएलेनीन, ट्रिप्टोफान जैसे एरोमेटिक अमीनो अम्ल भी पाए जाते हैं। एक खास बात यह है कि अमीनो व कार्बोक्सिल समूह आयनीकरण प्रकृति के होते हैं, इसलिए विभिन्न pH वाले विलयनों में अमीनो अम्लों की संरचना बदलती रहती है — इसका मध्यवर्ती स्वरूप ज्विटर आयनिक प्रारूप कहलाता है।

सामान्यतः लिपिड पानी में अघुलनशील होते हैं — ये साधारण वसा अम्ल हो सकते हैं, जिनमें एक कार्बोक्सिल समूह एक R समूह से जुड़ा रहता है। पामिटिक अम्ल में कार्बोक्सिल कार्बन सहित 16 कार्बन तथा ऐरेकिडोनिक अम्ल में 20 कार्बन परमाणु मिलते हैं। वसा अम्ल संतृप्त (बिना द्विक आबंध) या असंतृप्त (एक या अधिक द्विआबंध) प्रकार के हो सकते हैं। दूसरा साधारण लिपिड ग्लिसरॉल है, जो ट्राइहाइड्रिक्सी प्रोपेन होता है — जब वसा अम्ल इससे एस्टरीकृत होता है, तो मोनोग्लिसराइड, डाइग्लिसराइड तथा ट्राईग्लिसराइड बनते हैं, जिन्हें गलनांक के आधार पर वसा या तेल कहा जाता है। कुछ लिपिड्स में फॉस्फोरस भी मिलता है, जिन्हें फॉस्फोलिपिड्स कहा जाता है (जैसे लेसिथिन), जो कोशिका झिल्ली में पाए जाते हैं।

जीवों में कई कार्बनिक यौगिक विषमचक्रीय वलय युक्त भी होते हैं — इनमें कुछ नाइट्रोजन क्षार, जैसे एडेनीन, ग्वानीन, साइटोसीन, यूरेसिल व थायमीन, शर्करा से जुड़कर न्यूक्लियोसाइड बनाते हैं। यदि इनसे फॉस्फेट समूह भी शर्करा से एस्टरीकृत रूप में जुड़ा हो, तो इन्हें न्यूक्लियोटाइड कहते हैं — डीएनए व आरएनए जैसे न्यूक्लीक अम्ल आनुवंशिक पदार्थ के रूप में काम करते हैं।

1 प्राथमिक व द्वितीयक उपापचयज

रसायन विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा जो जीवों के हज़ारों यौगिकों का विलगन करती है

रसायन विज्ञान की एक अहम शाखा में जीवों के हज़ारों बड़े-छोटे यौगिकों का विलगन (पृथक्करण) किया जाता है, उनकी संरचना निर्धारित की जाती है और संभव हो तो उन्हें संश्लेषित भी किया जाता है। अगर जैव अणुओं की एक तालिका बनाई जाए, तो उनमें हज़ारों कार्बनिक यौगिक जैसे अमीनो अम्ल, शर्करा इत्यादि मिलेंगे — कुछ खास कारणों से इन्हें उपापचयज कहा जाता है।

इन सभी श्रेणी के यौगिकों की उपस्थिति किसी भी प्राणी ऊतक में पहचानी जा सकती है, इन्हें प्राथमिक उपापचयज कहते हैं। लेकिन जब किसी पादप, कवक व सूक्ष्म जीवी कोशिकाओं का विश्लेषण करें, तो इन प्राथमिक उपापचयजों के अतिरिक्त हज़ारों यौगिक जैसे एल्केलायड, फ्लेवेनोयड्स, रबर, वाष्पशील तेल, प्रतिजैविक, रंगीन वर्णक, इत्र, गोंद, मसाले भी मिलते हैं — इन्हें द्वितीयक उपापचयज कहते हैं।

द्वितीयक उपापचयजउदाहरण
वर्णककैरोटीनाएड्स, एंथोसाइनिन्स आदि
एल्केलायड्मार्फीन, कोडीन आदि
टेरपेनाइड्समोनोटरपींस, डाइटरपींस आदि
आवश्यक तेलनींबूघास तेल आदि
टॉक्सीनएब्रिन, रिसीन
लेक्टिन्सकोनकेनेवेलीन ए
ड्रग्सवीनब्लेस्टीन, करकुमीन आदि
बहुलक पदार्थरबर, गोंद

प्राथमिक उपापचयज ज्ञात कार्य करते हैं और सामान्य कार्यिकी प्रक्रिया में इनकी भूमिका भी ज्ञात है, किंतु हम इस समय सभी द्वितीयक उपापचयजों की (जिन प्राणियों में ये पाए जाते हैं, उनमें) भूमिका या कार्य पूरी तरह नहीं जानते। जबकि इनमें से बहुत सारे (जैसे रबर, औषधि, मसाले, इत्र व वर्णक) मनुष्य के कल्याण में बेहद उपयोगी हैं। कुछ द्वितीयक उपापचयजों का पारिस्थितिक महत्व भी है, जिनका विस्तृत अध्ययन आगे के वर्षों में किया जाता है।

2 वृहत् जैव अणु

अणुभार के आधार पर जैव अणुओं का दो प्रकारों में विभाजन

अम्ल घुलनशील भाग में पाए जाने वाले सभी यौगिकों की एक सामान्य विशेषता है कि इनका अणुभार 18 से लगभग 800 डाल्टन के आस-पास होता है। इसके विपरीत, अम्ल अविलेय अंश में केवल चार प्रकार के कार्बनिक यौगिक — प्रोटीन, न्यूक्लीक अम्ल, पॉलीसैकेराइड्स व लिपिड्स — मिलते हैं। लिपिड्स के अतिरिक्त इस श्रेणी के यौगिकों का अणुभार दस हज़ार डाल्टन या इससे ऊपर होता है।

दो प्रकार के जैव अणु इस कारण से जैव अणु, यानी जीवों में मिलने वाले रासायनिक यौगिक, दो प्रकार के होते हैं। एक वे हैं जिनका अणुभार एक हज़ार डाल्टन से कम होता है — इन्हें सामान्यतया सूक्ष्मअणु या जैव अणु कहते हैं। और दूसरे वे जो अम्ल अविलेय अंश में पाए जाते हैं — इन्हें वृहत् अणु या वृहत् जैव अणु कहते हैं।

लिपिड्स के अतिरिक्त अविलेय अंशों में पाए जाने वाले अणु बहुलक पदार्थ होते हैं। लिपिड्स, जिनके अणुभार 800 से अधिक नहीं होते, फिर भी वे अम्ल अविलेय अंश या वृहत् आणविक अंश की श्रेणी में क्यों आते हैं? असल में लिपिड्स कम अणुभार के यौगिक होते हैं, वे ऐसे ही अकेले नहीं मिलते, बल्कि कोशिका झिल्ली और दूसरी झिल्लियों में पाए जाते हैं। जब हम ऊतकों को पीसते हैं तब कोशिकीय संरचना विघटित हो जाती है, और कोशिकाझिल्ली व अन्य दूसरी झिल्लियाँ टुकड़ों में विखंडित होकर पुटिका बनाती हैं, जो पानी में घुलनशील नहीं होतीं — इसलिए इन झिल्लियों के पुटिका रूपी टुकड़े अम्ल अविलेय भाग के साथ पृथक हो जाते हैं। सही अर्थ में लिपिड्स वृहत् अणु नहीं हैं, बल्कि अम्ल विलेय अंश दरअसल कोशिका द्रव्य संगठन का भाग है — कोशिका द्रव्य व अंगकों के वृहत् अणु ही सच्चे अम्ल अविलेय अंश होते हैं, जो आपस में मिलकर जीव ऊतकों या जीवों का संगठन बनाते हैं।

अवयवकुल कोशिकीय भार का प्रतिशत
जल70-90
प्रोटीन10-15
कार्बोहाइड्रेट3
लिपिड2
न्यूक्लीक अम्ल5-7
आयन1

संक्षेप में, अगर जीव ऊतकों में पाए जाने वाले रासायनिक संगठन को बाहुल्यता की दृष्टि से श्रेणीबद्ध किया जाए, तो हम पाते हैं कि जीवों में पानी सबसे सर्वाधिक बाहुल्यता से मिलने वाला रसायन है।

प्रोटीन

प्रोटीन पॉलीपेप्टाइड होते हैं — ये अमीनो अम्ल की रेखीय शृंखलाएँ होती हैं, जो पेप्टाइड बंधों से जुड़ी रहती हैं। प्रत्येक प्रोटीन अमीनो अम्ल का बहुलक है। अमीनो अम्ल 20 प्रकार के (जैसे एलेनीन, सिस्टीन, प्रोलीन, ट्रीप्टोफान, लाइसीन आदि) होने से प्रोटीन समबहुलक नहीं, बल्कि विषम बहुलक होते हैं — एक समबहुलक एक एकलक की कई बार आवर्ती के कारण बनता है।

अमीनो अम्ल के बारे में यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ अमीनो अम्ल स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक होते हैं, जिनकी आपूर्ति खाद्य पदार्थों के ज़रिए होती है — इस तरह आहार की प्रोटीन इन आवश्यक अमीनो अम्ल का स्रोत होती है। इस प्रकार से अमीनो अम्ल अनिवार्य या अनानिवार्य हो सकते हैं — अनानिवार्य वे होते हैं जो हमारे शरीर में ही बन जाते हैं, जबकि अनिवार्य अमीनो अम्लों की आपूर्ति हमें अपने खाद्य पदार्थ से करनी पड़ती है।

प्रोटीनकार्य
कोलेजनअंतरकोशिकीय भरण पदार्थ
ट्रिपसिनएंजाइम
इंसुलिनहार्मोन
प्रतिजीवसंक्रमितकर्ता से लड़ना
ग्राहीसंवेदी ग्रहण (सूंघना, स्वाद, हार्मोन आदि)
जी.एल.यू.टी-4ग्लूकोज का कोशिका में परिवहन

प्रोटीन जीवों में बहुत सारे कार्य करते हैं, जैसे पोषकों का कोशिका झिल्ली से होकर आवागमन कराना, कुछ संक्रामक जीवों से बचाना, तथा कुछ स्वयं एंजाइम के रूप में काम करना।

पॉलीसैकेराइड

अम्ल अविलेय भाग में दूसरी श्रेणी के वृहत् अणुओं की तरह पॉलीसैकेराइड्स (कार्बोहाइड्रेट्स) भी पाए जाते हैं — ये शर्करा की लंबी शृंखला होती है, जो सूत्र की तरह (जैसे कपास के रेशे) विभिन्न प्रकार के एकल सैकेराइड्स से मिलकर बने होते हैं। उदाहरण के लिए, सेलुलोज एक बहुलक पॉलीसैकेराइड होता है जो एक ही प्रकार के मोनोसैकेराइड (जैसे ग्लूकोज) का बना होता है — यह एक सम बहुलक है। इसका एक परिवर्तित रूप स्टार्च (मंड) सेलुलोज से भिन्न होता है, लेकिन पादप ऊतकों में यह ऊर्जा भंडार के रूप में मिलता है। प्राणियों में इसका एक अन्य परिवर्तित रूप ग्लाइकोजन कहलाता है। इनुलिन फ्रुक्टोज का बहुलक है।

आयोडीन परीक्षण से मंड की पहचान मंड में द्वितीयक कुंडलीदार संरचना मिलती है, और आयोडीन अणु इसके कुंडलीय भाग से जुड़कर नीला रंग देते हैं। सेलुलोज में यह जटिल कुंडली नहीं मिलने के कारण आयोडीन उसमें प्रवेश नहीं कर पाता — यही एक सरल परीक्षण दोनों के बीच फर्क बताने में मदद करता है।

पादप कोशिका भित्ति सेलुलोज की बनी होती है — कागज पौधों की लुगदी से बना होता है जो सेलुलोज होता है, और रूई के धागे भी सेलुलोज के ही बने होते हैं। प्रकृति में कई जटिल पॉलीसैकेराइड्स भी मिलते हैं, जो अमीनो शर्करा व रासायनिक रूप से परिवर्तित शर्करा (जैसे ग्लूकोसमीन, एनएसीटाइल ग्लूकोसएमीन) से मिलकर बने होते हैं — जैसे आर्थ्रोपोडा के बाह्यकंकाल के जटिल सैकेराइड्स काइटीन से बने होते हैं। ये जटिल पॉलीसैकेराइड्स अधिकतर समबहुलक होते हैं।

न्यूक्लीक अम्ल

दूसरे प्रकार का एक वृहत् अणु जो किसी भी जीव ऊतक के अम्ल अविलेय अंश में मिलता है, उसे न्यूक्लीक अम्ल कहते हैं — यह पॉलीयूक्लीयोटाइडस होते हैं। यह पॉलीसैकेराइड्स व पॉली पेप्टाइड्स के साथ समाविष्ट होकर किसी भी जीव ऊतक या कोशिका का वास्तविक वृहत्आणविक अंश बनाता है। न्यूक्लीक अम्ल न्यूक्लीयोटाइड से मिलकर बने होते हैं, और एक न्यूक्लीयोटाइड तीन भिन्न रासायनिक घटकों — पहला विषम चक्रीय यौगिक, दूसरा मोनोसैकेराइड व तीसरा फॉस्फोरिक अम्ल या फॉस्फेट — से मिलकर बना होता है।

न्यूक्लीक अम्ल में विषमचक्रीय यौगिक नाइट्रोजन क्षार जैसे एडेनीन, ग्वानीन, यूरेसिल, साइटोसीन व थाईमीन होते हैं। एडेनीन व ग्वानीन प्रतिस्थापित प्यूरीन हैं, जबकि अन्य तीन प्रतिस्थापित पीरीमिडीन कहलाते हैं। पॉलीन्यूक्लीयोटाइड में मिलने वाली शर्करा या तो राइबोज (मोनोसैकेराइड पेंटोज) या डीऑक्सीराइबोज होती है — जिस न्यूक्लीक अम्ल में डीऑक्सीराइबोज मिलता है, उसे डीऑक्सीराइबोन्यूक्लीक अम्ल (डीएनए), और जिसमें राइबोज मिलता है, उसे राइबोन्यूक्लीक अम्ल (आरएनए) कहते हैं।

3 प्रोटीन की संरचना

संरचना के चार स्तर — प्राथमिक से लेकर चतुष्क तक

जैसा पहले बताया जा चुका है, प्रोटीन विषमबहुलक होते हैं जो अमीनो अम्ल की लड़ियों से बने होते हैं। अणुओं की संरचना का अर्थ विभिन्न संदर्भों में भिन्न-भिन्न होता है — अकार्बनिक रसायन में संरचना का संबंध आण्विकसूत्र से होता है, जबकि कार्बनिक रसायनविज्ञानी अणुओं की संरचना को व्यक्त करते समय हमेशा उसका द्विआयामी दृश्य व्यक्त करते हैं। भौतिक वैज्ञानिक आण्विक संरचना के त्रिआयामी दृश्य को व्यक्त करते हैं, जबकि जीव विज्ञानी प्रोटीन की संरचना चार तरह से व्यक्त करते हैं।

1. प्राथमिक संरचना

प्रोटीन में अमीनो अम्ल के क्रम व इसके स्थान के बारे में — जैसे पहला, दूसरा व इसी प्रकार अन्य कौन सा अमीनो अम्ल होगा — की जानकारी को प्रोटीन की प्राथमिक संरचना कहते हैं। कल्पना करें कि प्रोटीन एक रेखा है तो इसके बाएं सिरे पर प्रथम व दाएं सिरे पर अंतिम अमीनो अम्ल मिलता है — प्रथम अमीनो अम्ल को नाइट्रोजनसिरा अमीनो अम्ल कहते हैं, जबकि अंतिम अमीनो अम्ल को कार्बनसिरा (C-सिरा) अमीनो अम्ल कहते हैं।

2. द्वितीयक संरचना

प्रोटीन लड़ी हमेशा फैली हुई दृढ़ छड़ी जैसी रचना नहीं होती है — यह लड़ी कुंडली की तरह मुड़ी होती है (घूमती हुई सीढ़ी की तरह)। वास्तव में प्रोटीन लड़ी कुछ अंश कुंडली के रूप में व्यवस्थित होती है, और इसमें केवल दक्षिणावर्ती कुंडलियाँ मिलती हैं। अन्य जगहों पर प्रोटीन की लड़ी दूसरे रूप में मुड़ी हुई होती है — इन्हें द्वितीयक संरचना कहते हैं, जिसमें अल्फा हैलिक्स तथा बिटा-प्लीटेड शीट जैसी बनावटें शामिल हैं।

3. तृतीयक संरचना

प्रोटीन की लंबी कड़ी अपने ऊपर ही ऊन के एक खोखले गोले के समान मुड़ी हुई होती है, जिसे प्रोटीन की तृतीयक संरचना कहते हैं — यह प्रोटीन के त्रिआयामी रूप को प्रदर्शित करता है। तृतीयक संरचना प्रोटीन के जैविक क्रियाकलापों के लिए नितांत आवश्यक है, क्योंकि इसी बनावट (जैसे हाइड्रोजन बॉन्ड व डाइसल्फाइड बॉन्ड द्वारा स्थिरीकृत) से प्रोटीन अपना सही कार्यात्मक आकार पाता है।

4. चतुष्क संरचना

कुछ प्रोटीन एक से अधिक पॉलीपेप्टाइड्स या उपइकाइयों के समूह होते हैं, जिस ढंग से प्रत्येक पॉलीपेप्टाइड्स या उपइकाई एक दूसरे के सापेक्ष व्यवस्थित होती हैं (उदाहरण: गोले की सीधी लड़ी, गोले एक दूसरे के ऊपर व्यवस्थित होकर घनाभ या पट्टिका की संरचना आदि), वे प्रोटीन के स्थापत्य को प्रदर्शित करती हैं, जिसे प्रोटीन की चतुष्क संरचना कहते हैं। वयस्क मनुष्य का हीमोग्लोबीन चार उपखंडों का बना होता है — इनमें दो-दो एक दूसरे के समान होते हैं (दो उपखंड अल्फा व दो उपखंड बीटा प्रकार के), जो आपस में मिलकर मनुष्य के हीमोग्लोबीन (Hb) का निर्माण करते हैं।

4 एंजाइम

कोशिकाओं में जैव रासायनिक क्रियाओं की उत्प्रेरक शक्ति

लगभग सभी एंजाइम प्रोटीन होते हैं। कुछ न्यूक्लीक अम्ल भी एंजाइम की तरह व्यवहार करते हैं, इन्हें राइबोजाइम्स कहते हैं। किसी भी एंजाइम को रेखीय चित्र द्वारा चित्रित कर सकते हैं। एंजाइम में भी प्रोटीन की तरह प्राथमिक संरचना मिलती है जो अमीनो अम्ल की शृंखला से बना होता है, तथा द्वितीयक व तृतीयक संरचना भी मौजूद रहती है। जब तृतीयक संरचना को देखेंगे तो ध्यान देंगे कि प्रोटीन शृंखला का प्रमुख भाग अपने ऊपर स्वयं कुंडलित होता है और शृंखला स्वयं आड़ी-तिरछी स्थित होती है — इससे बहुत सी दरार या थैलियाँ बन जाती हैं, जिन्हें सक्रिय स्थल कहा जाता है। एंजाइम का सक्रिय स्थल वे दरार या थैली हैं, जिनमें क्रियाधार आकर व्यवस्थित होते हैं, और इस तरह एंजाइम सक्रिय स्थल द्वारा अभिक्रियाओं को तेज़ गति से उत्प्रेरित करता है।

जैविक बनाम अजैविक उत्प्रेरक में अंतर एंजाइम उत्प्रेरक अकार्बनिक उत्प्रेरक से कई प्रकार से भिन्न होते हैं, लेकिन इनमें एक बहुत बड़े अंतर को जानना ज़रूरी है — अकार्बनिक उत्प्रेरक उच्च तापक्रम व दाब पर कुशलता से काम करते हैं, जबकि एंजाइम अणु उच्च तापक्रम (40° से. से ऊपर) पर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। हालाँकि अति उच्च तापक्रम (जैसे गर्म स्रोतों या गंधक के झरनों में) पाए जाने वाले जीवों से प्राप्त एंजाइम स्थाई होते हैं और उनकी उत्प्रेरक शक्ति उच्च तापक्रम (80° से 90° से. तक) पर भी बनी रहती है — इन्हें उष्मास्थाई एंजाइम कहा जाता है।

रासायनिक अभिक्रियाएँ

एंजाइम्स क्या होते हैं, यह समझने से पहले रासायनिक अभिक्रिया की प्रकृति समझना ज़रूरी है। रासायनिक यौगिकों में दो तरह के परिवर्तन होते हैं — पहला भौतिक परिवर्तन, जिसमें बिना बंध टूटे यौगिक के आकार में बदलाव होता है (जैसे बर्फ का पिघलकर पानी बनना), और दूसरा रासायनिक अभिक्रिया, जिसमें रूपांतरण के समय बंधों का टूटना व नए बंधों का बनना होता है।

Ba(OH)₂ + H₂SO₄ → BaSO₄ + 2H₂O

यह एक अकार्बनिक रासायनिक अभिक्रिया का उदाहरण है। ठीक इसी प्रकार स्टार्च का जल अपघटन द्वारा ग्लूकोज में बदलना एक कार्बनिक रासायनिक अभिक्रिया है। भौतिक या रासायनिक अभिक्रिया की दर का सीधा संबंध इकाई समय में बनने वाले उत्पाद से होता है — यदि दिशा निर्धारित हो तो इस दर को वेग भी कहा जाता है। एक सर्वमान्य नियम के अनुसार प्रत्येक 10° सेंटिग्रेड तापक्रम के बढ़ने या घटने पर अभिक्रिया की दर क्रमशः द्विगुणित या आधी हो जाती है। उत्प्रेरित अभिक्रियाएँ, अनुत्प्रेरित अभिक्रियाओं की अपेक्षा उच्च दर से संपन्न होती हैं।

उदाहरण के लिए, कार्बन डाइऑक्साइड व जल से कार्बोनिक अम्ल बनने वाली अभिक्रिया बहुत मंद गति से होती है — बिना एंजाइम के एक घंटे में मात्र 200 अणु बनते हैं। लेकिन कोशिका द्रव्य में मौजूद एंजाइम कार्बोनिक एनहाइड्रेज की मौजूदगी में यही अभिक्रिया तीव्रगति से संपन्न होती है, जिसमें 600000 अणु प्रति सेकेंड बनते हैं — यानी एंजाइम ने इस क्रिया की दर को 10 लाख गुना बढ़ा दिया।

हज़ारों प्रकार के एंजाइम होते हैं जो विशेष प्रकार की रासायनिक व उपापचयी अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। बहुचरणीय रासायनिक अभिक्रियाओं में जहाँ प्रत्येक चरण एक ही जटिल एंजाइम या विभिन्न प्रकार के एंजाइम से उत्प्रेरित होती है, इन्हें उपापचयी पथ कहते हैं। जैसे ग्लूकोज से पाइरूविक अम्ल का निर्माण एक रासायनिक पथ द्वारा होता है, जिसमें दस विभिन्न प्रकार के एंजाइम उपापचयी अभिक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं। हमारी कंकाली पेशियों में अनॉक्सी स्थिति में लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है, जबकि सामान्य ऑक्सी स्थिति में पाइरूविक अम्ल का निर्माण होता है — खमीर में किण्वन के दौरान इसी पथ द्वारा इथेनाल (एल्कोहल) का निर्माण होता है। इस तरह विभिन्न दिशाओं में विभिन्न प्रकार के उत्पाद का निर्माण संभव है।

एंजाइम क्रिया की प्रकृति

प्रत्येक एंजाइम (E) के अणु में क्रियाधार-बंधन-स्थल (सब्सट्रेट बाइंडिंग साइट) मिलता है जो क्रियाधार (S) से बंध कर सक्रिय एंजाइम-क्रियाधार सम्मिश्र (ES) का निर्माण करता है। यह सम्मिश्र अल्पावधि का होता है, जो उत्पाद (P) एवं अपरिवर्तित एंजाइम में विघटित हो जाता है, इसके पूर्व मध्यावस्था के रूप में एंजाइम उत्पाद (EP) जटिल का निर्माण होता है।

एंजाइम + क्रियाधार ⇌ एंजाइम क्रियाधार जटिल → एंजाइम उत्पाद जटिल → एंजाइम + उत्पाद

एंजाइम क्रिया के उत्प्रेरक चक्र को निम्न चरणों में व्यक्त किया जा सकता है:

  1. सर्वप्रथम क्रियाधार सक्रिय स्थल में व्यवस्थित होकर एंजाइम के सक्रिय स्थल से बँध जाता है।
  2. बँधने वाला क्रियाधार एंजाइम के आकार में इस प्रकार से बदलाव लाता है कि क्रियाधार एंजाइम से मज़बूती से बँध जाता है।
  3. एंजाइम का सक्रिय स्थल अब क्रियाधार के काफी समीप होता है जिसके परिणामस्वरूप क्रियाधार के रासायनिक बंध टूट जाते हैं और नए एंजाइम उत्पाद जटिल का निर्माण होता है।
  4. एंजाइम नवनिर्मित उत्पाद को अवमुक्त करता है व एंजाइम स्वतंत्र होकर क्रियाधार के दूसरे अणु से बँधने के लिए तैयार हो जाता है — इस प्रकार पुनः उत्प्रेरक चक्र प्रारंभ हो जाता है।
सक्रियण ऊर्जा क्रियाधार व उत्पाद के बीच ऊर्जा स्तर में अंतर हो सकता है — यदि उत्पाद क्रियाधार से नीचे स्तर का है तो अभिक्रिया बाह्य उष्मीय होती है। फिर भी, चाहे यह बाह्योष्मीय या स्वतः प्रवर्तित अभिक्रिया हो या अंतःउष्मीय या ऊर्जा आवश्यक अभिक्रिया हो, क्रियाधार को उच्च ऊर्जा अवस्था या संक्रमण अवस्था से गुज़रना होता है। क्रियाधार व संक्रमण अवस्था के बीच औसत ऊर्जा के अंतर को सक्रियण ऊर्जा कहते हैं। एंजाइम ऊर्जा अवरोध को घटाकर क्रियाधार से उत्पाद के आसान रूपांतरण में सहयोग करता है।

एंजाइम क्रियाविधि को प्रभावित करने वाले कारक

जो कारक प्रोटीन की तृतीयक संरचना को परिवर्तित करते हैं, वे एंजाइम की सक्रियता को भी प्रभावित करते हैं — जैसे तापक्रम, pH। क्रियाधार की सांद्रता में परिवर्तन या किसी विशिष्ट रसायन का एंजाइम से बंधन, उसकी प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।

तापक्रम व pH

एंजाइम सामान्यतः तापक्रम व pH के लघु परिसर में कार्य करते हैं। प्रत्येक एंजाइम की अधिकतम क्रियाशीलता एक विशेष तापक्रम व pH पर ही होती है, जिसे क्रमशः ईष्टतम तापक्रम व pH कहते हैं। इस ईष्टतम मान के ऊपर या नीचे होने से क्रियाशीलता घट जाती है। निम्न तापक्रम एंजाइम को अस्थायी रूप से निष्क्रिय अवस्था में सुरक्षित रखता है, जबकि उच्च तापक्रम एंजाइम की क्रियाशीलता को समाप्त कर देता है, क्योंकि उच्च तापक्रम एंजाइम के प्रोटीन को विकृत कर देता है।

क्रियाधार की सांद्रता

क्रियाधार की सांद्रता (S) के बढ़ने के साथ-साथ पहले तो एंजाइम क्रिया की गति (v) बढ़ती है। अभिक्रिया अंततोगत्वा सर्वोच्च गति (Vmax) प्राप्त करने के बाद क्रियाधार की सांद्रता बढ़ने पर भी अग्रसर नहीं होती है। ऐसा इसलिए होता है कि एंजाइम के अणुओं की संख्या क्रियाधार के अणुओं से कहीं कम होती है, और इन अणुओं से एंजाइम के संतृप्त होने के बाद एंजाइम का कोई भी अणु क्रियाधार के अतिरिक्त अणुओं से बंधन करने के लिए मुक्त नहीं बचता।

संदमन (इन्हिबिशन) किसी भी एंजाइम की क्रियाशीलता विशिष्ट रसायनों की उपस्थिति में संवेदनशील होती है जो एंजाइम से बँधते हैं। जब रसायन का एंजाइम से बँधने के उपरांत इसकी क्रियाशीलता बंद हो जाती है, तो इस प्रक्रिया को संदमन (इन्हिबिशन) व उस रसायन को संदमक (इन्हिबिटर) कहते हैं। जब संदमक अपनी आणुविक संरचना में क्रियाधार से काफी समानता रखता है और एंजाइम की क्रियाशीलता को संदमित करता हो, तो इसे प्रतिस्पर्धात्मक संदमन कहते हैं — संदमक की क्रियाधार से निकटतम संरचनात्मक समानता के फलस्वरूप यह क्रियाधार से एंजाइम के क्रियाधार-बंधक स्थल से बंधते हुए प्रतिस्पर्धा करता है, जिससे एंजाइम क्रिया मंद पड़ जाती है। ऐसे प्रतिस्पर्धी संदमकों का अक्सर उपयोग जीवाणु जन्य रोगजनकों के नियंत्रण हेतु किया जाता है।

एंजाइम का नामकरण व वर्गीकरण

हज़ारों एंजाइमों की खोज, विलगन व अध्ययन किया जा चुका है। एंजाइम द्वारा विभिन्न अभिक्रिया के उत्प्रेरण के आधार पर, इन्हें विभिन्न समूहों में वर्गीकृत किया गया है — एंजाइम को 6 वर्गों व प्रत्येक वर्ग को 4-13 उपवर्गों में विभाजित किया गया है, जिनका नामकरण चार अंकीय संख्या पर आधारित है।

वर्गक्या उत्प्रेरित करते हैं
ऑक्सीडोरिडक्टेजेज/डीहाइड्रोजीनेजेजदो क्रियाधारकों S व S¹ के बीच ऑक्सीअपचयन
ट्रांसफरेजेजक्रियाधारकों के एक जोड़े के बीच एक समूह (हाइड्रोजन के अतिरिक्त) का स्थानांतरण
हाइड्रोलेजेजएस्टर, ईथर, पेप्टाइड, ग्लाइकोसाइडिक, कार्बन-कार्बन आदि बंधों का जल-अपघटन
लायेजेजजल अपघटन के अतिरिक्त विधि द्वारा क्रियाधारकों से समूहों का अलग होना, द्विबंधों का निर्माण
आइसोमरेजेजप्रकाशीय, ज्यामितिय व स्थितीय समावयवों का अंतर-रूपांतरण
लाइगेजेजदो यौगिकों का आपस में जुड़ना (कार्बन-ऑक्सीजन, कार्बन-सल्फर आदि बंधों का निर्माण)

सहकारक (Co-factors)

एंजाइम एक या अनेक बहुपेप्टाइड शृंखलाओं से मिलकर बना होता है। फिर भी कुछ स्थितियों में इतर प्रोटीन अवयव, जिसे सह-कारक कहते हैं, एंजाइम से बंधकर उसे उत्प्रेरक सक्रिय बनाते हैं। इन उदाहरणों में एंजाइम के केवल प्रोटीन भाग को एपोएंजाइम कहते हैं। सह-कारक तीन प्रकार के होते हैं — प्रोस्थेटिक-समूह, सह-एंजाइम व धातु-आयन।

  • प्रोस्थेटिक-समूह: कार्बनिक यौगिक होते हैं और यह अन्य सह-कारकों से इस रूप में भिन्न होते हैं कि ये एपोएंजाइम्स से दृढ़ता से बंधे होते हैं। उदाहरणस्वरूप एंजाइम परऑक्सीडेज व केटलेज जो हाइड्रोजन पराक्साइड को ऑक्सीजन व पानी में विखंडित करते हैं, हीम प्रोस्थेटिक समूह होता है जो एंजाइम के सक्रिय स्थल से जुड़ा होता है।
  • सह एंजाइम: भी कार्बनिक यौगिक होते हैं और इनका संबंध एपोएंजाइम से अस्थाई होता है जो सामान्यतया उत्प्रेरण के दौरान बनता है। अनेक सह-एंजाइम का मुख्य रासायनिक अवयव विटामिन्स होते हैं, जैसे सहएंजाइम NAD व NADP विटामिन नियासीन से जुड़े होते हैं।
  • धातु आयन: कई एंजाइम की क्रियाशीलता हेतु धातु-आयन की आवश्यकता होती है, जो सक्रिय स्थल पर पार्श्व-शृंखला से समन्वयन बंध बनाते हैं व उसी समय एक या एक से अधिक समन्वयन बंध द्वारा क्रियाधारकों से जुड़े होते हैं। जैसे प्रोटीयोलिटीक एंजाइम कार्बाक्सीपेप्टीडेज से जिंक एक सह-कारक के रूप में जुड़ा होता है।

एंजाइम से यदि सह-कारक को अलग कर दिया जाए तो इनकी उत्प्रेरक क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है — इससे स्पष्ट है कि एंजाइम की उत्प्रेरक क्रियाशीलता हेतु ये निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय से NEET/AIPMT में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष के संदर्भ सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

1NEET 2025 किसी एंजाइम का प्रोटीन वाला भाग क्या कहलाता है?

उत्तर: एपोएंजाइम (Apoenzyme)।

पूर्ण संयुग्मी एंजाइम (होलोएंजाइम) दो भागों से मिलकर बनता है — प्रोटीन वाला भाग एपोएंजाइम कहलाता है, तथा गैर-प्रोटीन (सह-कारक) वाला भाग प्रोस्थेटिक समूह, सहएंजाइम या धातु आयन हो सकता है। दोनों मिलकर सक्रिय होलोएंजाइम बनाते हैं।

2NEET 2024 लेसिथिन, जो जीव ऊतकों में पाया जाने वाला कम अणुभार का एक कार्बनिक यौगिक है, किसका उदाहरण है?

उत्तर: फॉस्फोलिपिड (Phospholipid)।

कुछ लिपिड्स में ग्लिसरॉल व वसा अम्ल के साथ-साथ फॉस्फोरस भी जुड़ा होता है — इन्हें फॉस्फोलिपिड कहा जाता है, जो कोशिका झिल्ली की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेसिथिन इसी वर्ग का एक प्रमुख उदाहरण है।

3NEET 2024 एंजाइम कार्बोक्सीपेप्टिडेस का सह-कारक (cofactor) कौन-सा है?

उत्तर: जिंक (Zn)।

कार्बोक्सीपेप्टिडेस एक धातु-सक्रिय एंजाइम है, जिसकी उत्प्रेरक क्रिया के लिए जिंक आयन अनिवार्य सह-कारक की तरह कार्य करता है। सह-कारकों में धातु आयन, सहएंजाइम व प्रोस्थेटिक समूह — तीनों प्रकार होते हैं, और NEET में अलग-अलग एंजाइमों के साथ उनके विशिष्ट सह-कारक को जोड़कर पूछा जाता है।

4NEET 2017 एंजाइमों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

उत्तर: होलोएंजाइम = एपोएंजाइम + सहएंजाइम (Holoenzyme = Apoenzyme + Coenzyme)।

यह एंजाइम शब्दावली का सबसे बुनियादी व बार-बार दोहराया जाने वाला संबंध है। एपोएंजाइम (प्रोटीन भाग) व सहएंजाइम/सह-कारक (गैर-प्रोटीन भाग) मिलकर पूर्ण सक्रिय होलोएंजाइम बनाते हैं — NEET में यह समीकरण अक्सर उलट कर गलत विकल्प के रूप में दिया जाता है।

5NEET-II 2016 निम्नलिखित में से कौन-सा एक अप्रोटीनी (non-proteinaceous) एंजाइम है?

उत्तर: राइबोज़ाइम (Ribozyme)।

लगभग सभी एंजाइम प्रोटीन प्रकृति के होते हैं, किंतु राइबोज़ाइम एक अपवाद है — यह उत्प्रेरक गतिविधि रखने वाला RNA अणु है, प्रोटीन नहीं। डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिएस, लाइगेस व लाइसोज़ाइम — ये सभी सामान्य प्रोटीन-प्रकृति के एंजाइम हैं।

6NEET-II 2016 अधिकांश प्रोटीनों की त्रिआयामी (तृतीयक) संरचना को स्थिर बनाए रखने में निम्नलिखित में से किसकी भूमिका सबसे कम संभावित है?

उत्तर: एस्टर बंध (Ester bonds)।

प्रोटीन की त्रिआयामी तह-मुड़ाव संरचना मुख्यतः हाइड्रोफोबिक अंतःक्रिया, वैद्युत-स्थैतिक (इलेक्ट्रोस्टेटिक) आकर्षण व हाइड्रोजन बंध द्वारा स्थिर रहती है — डाइसल्फाइड बंध भी इसमें सहायक होते हैं। एस्टर बंध सामान्यतः लिपिड में पाया जाता है, प्रोटीन की तृतीयक संरचना को स्थिर रखने में इसकी कोई प्रमुख भूमिका नहीं है।

7NEET-I 2016 निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

उत्तर: ग्लाइसीन एक गंधक (सल्फर) युक्त अमीनो अम्ल है — यह कथन गलत है।

ग्लाइसीन सबसे सरल अमीनो अम्ल है, जिसमें R समूह केवल हाइड्रोजन (-H) होता है — इसमें सल्फर नहीं होता। सल्फर-युक्त अमीनो अम्ल सिस्टीन व मिथियोनीन हैं।

8पूर्व वर्ष 2015 संधिपादों (arthropods) के काइटिनी बाह्यकंकाल का निर्माण किसके बहुलकीकरण से होता है?

उत्तर: N-एसीटाइल ग्लूकोसैमीन (N-acetyl glucosamine)।

काइटिन एक नाइट्रोजन-युक्त पॉलीसैकेराइड है, जो N-एसीटाइल ग्लूकोसैमीन इकाइयों के बार-बार जुड़ने (बहुलकीकरण) से बनता है। यह कीटों व अन्य संधिपादों के बाह्यकंकाल के साथ-साथ कवक (फंगस) की कोशिका भित्ति में भी पाया जाता है।

9पूर्व वर्ष 2015 निम्नलिखित में से किस जैव अणु में फॉस्फोडाइएस्टर बंध पाया जाता है?

उत्तर: न्यूक्लियोटाइड में न्यूक्लीक अम्लों के बीच का बंध (nucleic acids in a nucleotide)।

DNA व RNA में लगातार दो न्यूक्लियोटाइडों के बीच शर्करा-फॉस्फेट-शर्करा के रूप में फॉस्फोडाइएस्टर बंध बनता है।

10पूर्व वर्ष 2014 एंजाइम क्रिया के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

उत्तर: "अधिक मात्रा में सक्सिनेट मिलाने पर भी मैलोनेट द्वारा सक्सिनिक डिहाइड्रोजिनेस का संदमन दूर नहीं होता" — यह कथन गलत है।

मैलोनेट, सक्सिनिक डिहाइड्रोजिनेस एंजाइम का एक स्पर्धी (प्रतियोगी/competitive) संदमक है — यानी यह क्रियाधार (सक्सिनेट) जैसा दिखने के कारण सक्रिय स्थल पर उसकी जगह बंध जाता है। चूँकि यह संदमन स्पर्धी प्रकार का है, इसलिए क्रियाधार (सक्सिनेट) की मात्रा बहुत अधिक बढ़ा देने पर संदमन को उलटा (रिवर्स) जा सकता है — यही स्पर्धी संदमन की पहचान है।

11NEET 2013 वृहत् अणु काइटिन वास्तव में क्या है?

उत्तर: नाइट्रोजन-युक्त पॉलीसैकेराइड (Nitrogen-containing polysaccharide)।

काइटिन, N-एसीटाइल ग्लूकोसैमीन की इकाइयों से बनता है, जिसमें नाइट्रोजन परमाणु उपस्थित होता है — इसलिए यह फॉस्फोरस या सल्फर-युक्त नहीं, बल्कि नाइट्रोजन-युक्त पॉलीसैकेराइड कहलाता है।

12NEET 2013 एंजाइमों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

उत्तर: "एंजाइम अधिकांशतः प्रोटीन होते हैं, किंतु कुछ लिपिड भी होते हैं" — यह कथन गलत है।

एंजाइम अधिकांशतः प्रोटीन प्रकृति के होते हैं, और अपवाद के रूप में कुछ RNA आधारित (राइबोज़ाइम) होते हैं — लिपिड आधारित एंजाइम की कोई श्रेणी नहीं होती

13पूर्व वर्ष (Mains) 2012 निम्नलिखित में से किस जैव अणु का सही वर्णन किया गया है?

उत्तर: लेसिथिन — कोशिका झिल्ली में पाया जाने वाला एक फॉस्फोरिलेटेड ग्लिसराइड (phosphorylated glyceride)।

शेष विकल्प गलत हैं — ऐलेनीन एक उदासीन अमीनो अम्ल है, अम्लीय नहीं; पामिटिक अम्ल एक संतृप्त वसा अम्ल है जिसमें 16 कार्बन परमाणु होते हैं; तथा एडेनिलिक अम्ल एडेनोसीन व फॉस्फेट समूह से मिलकर बनता है।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

महत्वपूर्ण
  • प्रोटीन में उपलब्ध अमीनो अम्लों की कुल संख्या 21 मानी जाती है — यह संख्या सीधे संख्यात्मक प्रश्न में पूछी जा सकती है, इसे 20 न समझें।
तुलनात्मक
  • चार प्रमुख आबंधों को कभी न उलझाएँ — प्रोटीन में पेप्टाइड बंध, पॉलीसैकेराइड में ग्लाइकोसिडिक बंध, वसा में एस्टर बंध, तथा न्यूक्लीक अम्ल में फॉस्फोडाइएस्टर बंध पाया जाता है — यह चारों बंध NEET में सबसे अधिक बार cross-question के रूप में पूछे जाते हैं।
तथ्य
  • राइबोज़ाइम (Ribozyme) एकमात्र प्रमुख अपवाद है जो यह दर्शाता है कि सभी एंजाइम प्रोटीन नहीं होते — यह RNA प्रकृति का उत्प्रेरक अणु है, जो rRNA प्रोसेसिंग जैसी क्रियाओं में भाग लेता है।
तथ्य
  • एंजाइम संदमन के दो प्रकारस्पर्धी (competitive) संदमक क्रियाधार जैसी संरचना के कारण सक्रिय स्थल पर बंधता है और क्रियाधार की अधिकता से इसे हटाया जा सकता है (जैसे मैलोनेट); अस्पर्धी (non-competitive) संदमक सक्रिय स्थल से अलग किसी अन्य स्थल पर बंधता है, और क्रियाधार बढ़ाने से इसका प्रभाव दूर नहीं होता।
रोचक तथ्य
  • ज्विटर आयन (Zwitter ion) अमीनो अम्ल की वह अवस्था है जिसमें एक ही अणु पर धनावेशित (-NH₃⁺) व ऋणावेशित (-COO⁻) दोनों समूह एक साथ उपस्थित रहते हैं — यह उभयधर्मी (amphoteric) व्यवहार अमीनो अम्लों के pH-निर्भर व्यवहार को समझने की कुंजी है।
रणनीति
  • NEET के विश्लेषण के अनुसार जैव अणु अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 3–5 प्रश्न (लगभग 12–20 अंक) आते हैं, जिनमें एंजाइम उप-विषय से सबसे अधिक प्रश्न पूछे जाते रहे हैं — इसलिए एंजाइम की क्रियाविधि, नामकरण व सह-कारकों को सबसे अधिक प्राथमिकता दें।

संक्षिप्त सार

तत्वीय संघटन

जीव व निर्जीव पदार्थों में तत्व तो समान मिलते हैं, लेकिन जीवों में कार्बन व हाइड्रोजन की सापेक्ष मात्रा काफी अधिक होती है। ऊतक विश्लेषण से निस्यंद व धारित दो अंश मिलते हैं।

उपापचयज

प्राथमिक उपापचयज (अमीनो अम्ल, शर्करा आदि) ज्ञात कार्यों वाले होते हैं, जबकि द्वितीयक उपापचयज (एल्केलायड, रबर, गोंद आदि) की भूमिका अक्सर अज्ञात रहते हुए भी मानव कल्याण में उपयोगी हैं।

वृहत् जैव अणु

प्रोटीन, न्यूक्लीक अम्ल, पॉलीसैकेराइड — तीनों वास्तविक बहुलक वृहत् अणु हैं। लिपिड्स झिल्ली-संबद्ध होने के कारण वृहत् आणविक अंश में आते हैं, पर सही मायने में बहुलक नहीं हैं।

प्रोटीन संरचना व एंजाइम

प्रोटीन की प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक व चतुष्क संरचना होती है। एंजाइम प्रोटीन प्रकृति के उत्प्रेरक हैं, जो सक्रिय स्थल के ज़रिए अभिक्रिया दर को लाखों गुना बढ़ा सकते हैं।

? प्रश्न-उत्तर

हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

प्रश्न 1 वृहत् अणु क्या है? उदाहरण दीजिए?
उत्तर

वृहत् अणु वे जैव अणु हैं जो किसी जीव ऊतक के अम्ल अविलेय अंश में पाए जाते हैं और जिनका अणुभार सामान्यतः दस हज़ार डाल्टन या उससे ऊपर होता है। इस श्रेणी में चार प्रकार के कार्बनिक यौगिक आते हैं — प्रोटीन (जैसे कोलेजन), न्यूक्लीक अम्ल (जैसे डीएनए व आरएनए), पॉलीसैकेराइड (जैसे सेलुलोज, स्टार्च, ग्लाइकोजन), तथा लिपिड्स (जो वैसे तो कम अणुभार के हैं, पर झिल्ली-संबद्ध होने के कारण वृहत् आणविक अंश में गिने जाते हैं)।

प्रश्न 2 प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर

प्रोटीन की तृतीयक संरचना उस अवस्था को कहते हैं जब प्रोटीन की लंबी कड़ी अपने ऊपर ही ऊन के एक खोखले गोले के समान मुड़कर एक त्रिआयामी आकार ले लेती है। यह प्रोटीन के वास्तविक कार्यात्मक (त्रिआयामी) रूप को प्रदर्शित करती है और प्रोटीन के जैविक क्रियाकलापों के लिए बेहद ज़रूरी है — क्योंकि यही तह-मुड़ाव (फोल्डिंग) यह तय करता है कि प्रोटीन का सक्रिय स्थल किस आकार में बनेगा और वह किस विशिष्ट क्रियाधार से जुड़ पाएगा। हाइड्रोजन बॉन्ड व डाइसल्फाइड बॉन्ड जैसे बल इस त्रिआयामी संरचना को स्थिर बनाए रखने में मदद करते हैं।

प्रश्न 3 चिकित्सार्थ अभिकर्ता (therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर

चिकित्सा में उपयोग होने वाले कुछ प्रमुख प्रोटीन: इंसुलिन (मधुमेह के उपचार हेतु), प्रतिरक्षी/एंटीबॉडी (निष्क्रिय प्रतिरक्षण के लिए), क्लॉटिंग फैक्टर VIII (हीमोफीलिया के उपचार में), इंटरफेरॉन (वायरल संक्रमण व कुछ कैंसर के उपचार में), तथा वृद्धि हार्मोन (ग्रोथ हार्मोन)।

प्रश्न 4 ट्राइग्लिसराइड के संगठन का वर्णन कीजिए।
उत्तर

ट्राइग्लिसराइड एक साधारण लिपिड है, जो ग्लिसरॉल (ट्राइहाइड्रिक्सी प्रोपेन) व तीन वसा अम्लों के मिलने से बनता है। जब वसा अम्ल ग्लिसरॉल के तीनों -OH समूहों से एस्टरीकृत हो जाते हैं, तो ट्राइग्लिसराइड बनता है। गलनांक के आधार पर इसे वसा (ठोस) या तेल (तरल) कहा जाता है।

प्रश्न 5 ऐलेनीन अमीनो अम्ल की संरचना बताइए?
उत्तर

ऐलेनीन एक अल्फा (α) अमीनो अम्ल है, जिसमें केंद्रीय अल्फा-कार्बन पर चार समूह जुड़े होते हैं — एक अमीनो समूह (-NH₂), एक कार्बोक्सिल समूह (-COOH), एक हाइड्रोजन परमाणु (-H), तथा एक R समूह जो ऐलेनीन में मेथिल समूह (-CH₃) होता है। इसका सामान्य सूत्र: COOH-CH(NH₂)-CH₃।

प्रश्न 6 गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?
उत्तर

प्राकृतिक गोंद (जैसे बबूल का गोंद) मुख्यतः जटिल पॉलीसैकेराइड्स से बना होता है, जो पौधों का एक द्वितीयक उपापचयज है। फेविकोल इससे पूरी तरह भिन्न है — यह एक सिंथेटिक रासायनिक चिपकाने वाला पदार्थ है, जो मुख्यतः पॉलीविनाइल एसीटेट (PVA) जैसे बहुलक से बना होता है।

प्रश्न 7 एंजाइम के महत्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए?
उत्तर
  • लगभग सभी एंजाइम प्रोटीन प्रकृति के होते हैं (राइबोज़ाइम्स अपवाद हैं)।
  • इनमें एक विशिष्ट सक्रिय स्थल होता है, जो केवल अपने निश्चित क्रियाधार से ही बंधता है — अत्यंत विशिष्ट होते हैं।
  • एंजाइम अभिक्रिया की दर को लाखों गुना तक बढ़ा सकते हैं, फिर भी वे स्वयं अभिक्रिया में स्थायी रूप से खर्च नहीं होते।
  • ईष्टतम तापक्रम व pH पर सर्वाधिक क्रियाशील होते हैं — इससे ऊपर या नीचे जाने पर क्रियाशीलता घट जाती है।
  • क्रियाधार की सांद्रता बढ़ने पर एंजाइम क्रिया की दर Vmax तक ही बढ़ती है, उसके बाद स्थिर हो जाती है।
  • कुछ एंजाइमों को सक्रिय होने के लिए सह-कारक की आवश्यकता होती है।
  • विशिष्ट रसायन (संदमक) एंजाइम से बंधकर उसकी क्रियाशीलता को रोक सकते हैं।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री जैव अणुओं — प्राथमिक व द्वितीयक उपापचयज, वृहत् जैव अणु (प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लीक अम्ल), प्रोटीन संरचना तथा एंजाइम क्रियाविधि — को मौलिक व सरल भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें तुलनात्मक तालिकाएँ तथा प्रश्नोत्तर शामिल हैं।

हर कोशिका के भीतर चलने वाली लाखों रासायनिक क्रियाओं की डोर आखिर इन्हीं छोटे-बड़े जैव अणुओं के हाथ में है।

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