कोशिका: जीवन की इकाई
हाइड्रा के शरीर में हज़ारों कोशिकाएँ हैं, तो मानव शरीर में अरबों — फिर भी दोनों में जीवन की सबसे बुनियादी इकाई एक ही है: कोशिका। इस अध्याय में हम देखेंगे कि यह सूक्ष्म इकाई कैसे बनी है, इसके भीतर कौन-कौन से अंगक (ऑर्गेनेल) मौजूद हैं, और प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक कोशिकाओं में क्या मूलभूत फर्क है।
भूमिका कोशिका क्या है
हर जीवित प्राणी, चाहे वह सूक्ष्म जीवाणु हो या विशाल वृक्ष, कोशिकाओं से बना है। जब हम अपने आस-पास सजीव और निर्जीव चीज़ों में अंतर करते हैं, तो सबसे बड़ा पैमाना यही होता है कि उस वस्तु में कोशिका संरचना मौजूद है या नहीं। कोशिका ही वह आधारभूत इकाई है, जो जीवन की सभी विशेषताओं — पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि और प्रजनन — को संभव बनाती है।
कोशिका की खोज का श्रेय एंटोनी वैन ल्युवेनहाक को जाता है, जिन्होंने सबसे पहले एक सूक्ष्मदर्शी के माध्यम से कोशिका को देखा और उसका वर्णन किया। बाद में रॉबर्ट ब्राउन ने कोशिका के भीतर केंद्रक की पहचान की। सूक्ष्मदर्शी प्रौद्योगिकी में हुए सुधारों — विशेष रूप से इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार — ने कोशिका की आंतरिक संरचना के विस्तृत अध्ययन को संभव बनाया।
कोशिका सिद्धांत
1838 में, जर्मन वनस्पति वैज्ञानिक मैथियस स्लाइडेन ने पौधों की विभिन्न प्रजातियों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि सभी पौधे विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने हैं। इसके एक साल बाद, 1839 में, ब्रिटिश प्राणी वैज्ञानिक थियोडोर श्वान ने जानवरों की कोशिकाओं का अध्ययन किया और पाया कि उनमें भी कोशिकाएँ होती हैं — हालाँकि पौधों के विपरीत, जानवरों की कोशिकाओं में कोशिका भित्ति नहीं होती, बल्कि एक पतली झिल्ली होती है, जिसे आज हम कोशिका झिल्ली कहते हैं।
श्लाइडेन और श्वान ने मिलकर कोशिका सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार सभी जीव कोशिकाओं और उनके उत्पादों से बने होते हैं। हालाँकि, इस सिद्धांत में एक कमी थी — यह नहीं बताया गया था कि नई कोशिकाएँ कैसे बनती हैं। इस कमी को सन् 1855 में रुडोल्फ़ विरचो ने पूरा किया, जिन्होंने स्पष्ट किया कि सभी कोशिकाएँ पूर्व-स्थित कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं। उनका प्रसिद्ध कथन था — "ओमनिस सेलुला-ए सेलुला" (हर कोशिका पूर्व-स्थित कोशिका से)।
- पहला: सभी जीवित जीव कोशिका या कोशिकाओं से बने होते हैं।
- दूसरा: कोशिका जीवन की संरचनात्मक व कार्यात्मक इकाई है।
- तीसरा: सभी कोशिकाएँ पूर्व-स्थित कोशिकाओं के विभाजन से बनती हैं।
- चौथा: कोशिका में वंशागति की जानकारी (DNA) निहित होती है, जो कोशिका विभाजन के दौरान संतति कोशिकाओं में पारित होती है।
1 कोशिका का समग्र अवलोकन
प्याज व मानव गाल की कोशिकाओं की बुनियादी संरचना
अगर आपने कभी प्रयोगशाला में प्याज के छिलके या अपने गाल की भीतरी सतह की कोशिकाओं को सूक्ष्मदर्शी से देखा है, तो आपने दो बिल्कुल अलग तस्वीरें देखी होंगी। प्याज की कोशिका, जो एक प्ररूपी पादप कोशिका है, की सबसे बाहरी सतह पर एक स्पष्ट व दृढ़ कोशिका भित्ति दिखाई देती है, जबकि मानव गाल की कोशिका (एक प्राणी कोशिका) में यह भित्ति अनुपस्थित होती है — इसके बजाय वहाँ केवल एक पतली कोशिका झिल्ली होती है।
यूकैरियोटिक कोशिका में केंद्रक के अलावा कई अन्य झिल्लीयुक्त संरचनाएँ भी मिलती हैं, जिन्हें कोशिकांग (ऑर्गेनेल) कहा जाता है — जैसे अंतर्द्रव्यी जालिका, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी उपकरण, लाइसोसोम और रसधानी। प्रोकैरियोटिक कोशिका में इस प्रकार के झिल्लीयुक्त कोशिकांग पूरी तरह से अनुपस्थित होते हैं।
हालाँकि, दोनों प्रकार की कोशिकाओं में एक झिल्ली-रहित अंगक — राइबोसोम — अवश्य पाया जाता है, जो प्रोटीन-संश्लेषण का केंद्र है। दिलचस्प बात यह है कि यूकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम न केवल कोशिकाद्रव्य में, बल्कि खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका, माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक (पौधों में) पर भी पाए जाते हैं।
आकार, माप व रूप में विविधता
कोशिकाएँ आकार, प्रकार और कार्य में अद्भुत विविधता प्रदर्शित करती हैं। सबसे छोटी ज्ञात कोशिकाएँ माइकोप्लाज़्मा हैं, जिनका व्यास लगभग 0.3 माइक्रोमीटर होता है। जीवाणु कोशिकाएँ सामान्यतः 3 से 5 माइक्रोमीटर की होती हैं। अब तक खोजी गई सबसे बड़ी कोशिका शुतुरमुर्ग का अंडा होता है, जो नग्न आँखों से साफ दिखाई देता है। मानव शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का व्यास लगभग 7 माइक्रोमीटर होता है, जबकि तंत्रिका कोशिकाएँ (न्यूरॉन) शरीर की सबसे लंबी कोशिकाएँ होती हैं।
कोशिकाओं के आकार केवल उनके कार्य पर निर्भर करते हैं — गोलाकार, बेलनाकार, चपटी, बहुभुजी, धागे जैसी या पूरी तरह से अनियमित आकृतियाँ देखी जाती हैं। उदाहरण के लिए, श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBCs) अमीबा की तरह अपनी आकृति बदल सकती हैं, जबकि लाल रक्त कोशिकाएँ एक निश्चित उभयावतल डिस्क (biconcave disc) के आकार की होती हैं, जो ऑक्सीजन परिवहन के लिए इष्टतम सतह क्षेत्र प्रदान करती हैं।
2 प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ
जीवाणु, नीलहरित शैवाल, माइकोप्लाज़्मा व PPLO का बुनियादी संगठन
प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ पृथ्वी पर सबसे पुरानी और सबसे सरल कोशिकीय जीवन-रूप हैं। ये मुख्यतः जीवाणु, नील-हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया), माइकोप्लाज़्मा और PPLO (प्ल्यूरो निमोनिया सम जीव) में पाई जाती हैं। आमतौर पर यूकैरियोटिक कोशिकाओं से आकार में बहुत छोटी होने के कारण, ये अपेक्षाकृत तेज़ी से विभाजित भी होती हैं।
जीवाणुओं के चार प्रमुख आकार पहचाने गए हैं — कोकस (गोलाकार), बैसिलस (दंडाकार), विब्रियो (कॉमा-आकार), और स्पाइरिलम (सर्पिलाकार)। ये आकार अक्सर कोशिका भित्ति की संरचना से निर्धारित होते हैं और प्रजाति-पहचान में सहायक होते हैं।
- इनमें झिल्ली-रहित केंद्रक होता है — आनुवंशिक पदार्थ (DNA) केंद्रक-क्षेत्र (न्यूक्लिऑइड) में नग्न अवस्था में पड़ा रहता है, किसी झिल्ली से घिरा नहीं।
- कोशिका भित्ति अधिकांश प्रोकैरियोट्स में मौजूद होती है (माइकोप्लाज़्मा को छोड़कर), जो कोशिका को आकार और सुरक्षा प्रदान करती है।
- इनमें झिल्ली-युक्त कोशिकांग (माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका आदि) पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं — केवल राइबोसोम (70S) जैसे झिल्ली-रहित अंगक ही पाए जाते हैं।
- प्रोकैरियोटिक DNA वृत्ताकार (गोलाकार) होता है, जो एक एकल गुणसूत्र के रूप में मौजूद रहता है। इसके अलावा कई छोटे वृत्ताकार DNA खंड — प्लाज्मिड — भी हो सकते हैं, जो प्रतिजैविक-प्रतिरोध जैसे अतिरिक्त गुण प्रदान करते हैं।
- प्रोकैरियोटिक कोशिका विभाजन द्विखंडन (बाइनरी फिशन) द्वारा होता है, जो माइटोसिस से भिन्न एक सरल प्रक्रिया है।
कोशिका आवरण और इसके रूपांतर
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं का सबसे बाहरी आवरण एक त्रि-स्तरीय संरचना होती है, जिसे सामूहिक रूप से कोशिका आवरण कहा जाता है। यह तीन परतों से बना होता है:
- ग्लाइकोकेलिक्स: सबसे बाहरी परत, जो शर्करा (कार्बोहाइड्रेट) की बनी होती है। यह कुछ जीवाणुओं में ढीली श्लेष्म परत (स्लाइम लेयर) के रूप में होती है, जबकि दूसरों में मोटी, कठोर संपुटिका (कैप्सूल) के रूप में, जो जीवाणु को प्रतिरक्षा-तंत्र से बचाने और सतह पर चिपकने में मदद करती है।
- कोशिका भित्ति: मध्य परत, जो कोशिका का आकार निर्धारित करती है और आसमाटिक दाब से कोशिका को फटने से बचाती है। यह मुख्यतः पेप्टिडोग्लाइकेन (म्यूरिन) नामक एक विशिष्ट बहुलक से बनी होती है, जो शर्करा और एमिनो अम्ल की शृंखलाओं से मिलकर बनती है।
- कोशिका झिल्ली (प्लाज्मा झिल्ली): सबसे भीतरी परत, जो यूकैरियोटिक कोशिका झिल्ली की तरह ही एक चयनात्मक-पारगम्य लिपिड-प्रोटीन द्विसतह है। यही वह स्थान है जहाँ से पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
प्रोकैरियोटिक कोशिका झिल्ली का एक आंतरिक अंतर्वलन मीसोसोम कहलाता है। यह पुटिका, नलिका या पटलिका के रूप में हो सकता है और यह कोशिका भित्ति निर्माण, DNA प्रतिकृति, संतति कोशिकाओं में DNA के वितरण, तथा श्वसन व स्रावी प्रक्रियाओं में सहायता करता है। नील-हरित जीवाणुओं (सायनोबैक्टीरिया) में झिल्ली के विशेष अंतर्वलन होते हैं जिन्हें वर्णकी लवक (थाइलेकोइड) कहा जाता है, जिनमें प्रकाश-संश्लेषण के वर्णक मौजूद होते हैं।
बैक्टीरिया कोशिकाएँ चलायमान (मोटाइल) या अचलायमान (नॉन-मोटाइल) हो सकती हैं। चलायमान प्रजातियों में कोशिका भित्ति से बाहर निकली एक पतली, प्रोटीनयुक्त संरचना होती है, जिसे कशाभिका (फ्लैजेलम) कहा जाता है — यह गति का मुख्य अंग है। इसके अलावा, जीवाणुओं की सतह पर दो अन्य प्रकार की संरचनाएँ पाई जाती हैं — पिलाई (पिली) लंबी, नलिकाकार प्रोटीन संरचनाएँ होती हैं जो संयुग्मन (जेनेटिक मटेरियल के स्थानांतरण) में सहायक होती हैं, जबकि फिम्ब्री (फिम्ब्रिए) छोटी, बाल-समान संरचनाएँ होती हैं जो कोशिका को सतहों से चिपकने में मदद करती हैं — ये दोनों ही गति के लिए नहीं होतीं, यह एक सामान्य भ्रांति है।
राइबोसोम व अंतर्विष्ट पिंड
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में 70S राइबोसोम पाए जाते हैं, जो दो उप-इकाइयों — 50S (बड़ी) और 30S (छोटी) — से मिलकर बने होते हैं। कई राइबोसोम मिलकर एक ही mRNA अणु पर एक शृंखला बना सकते हैं, जिसे बहु-राइबोसोम (पॉलीराइबोसोम) कहा जाता है, जो एक साथ कई प्रोटीन अणुओं का संश्लेषण करता है।
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अक्सर अंतर्विष्ट पिंड (इनक्लूजन बॉडीज़) पाए जाते हैं — ये संचित पोषक पदार्थ होते हैं, जो किसी झिल्ली से घिरे नहीं होते। इनमें फॉस्फेट कणिकाएँ, साइनोफाइसिन (प्रोटीन-सम) कणिकाएँ, ग्लाइकोजन कणिकाएँ, और कभी-कभी लिपिड बूँदें शामिल होती हैं। प्रकाश-संश्लेषी जीवाणुओं में गैस रसधानियाँ (गैस वैक्यूल) भी पाई जाती हैं, जो उन्हें जल में तैरने में सहायता करती हैं।
3 यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (ससीमकेंद्रकी कोशिकाएँ)
आद्यजीव, पादप, प्राणी व कवक में मिलने वाला जटिल कोशिकीय संगठन
यूकैरियोटिक कोशिकाएँ प्रकृति में अधिक जटिल और संगठित होती हैं। ये आद्यजीव (प्रोटिस्टा), पादप, प्राणी और कवक — सभी में पाई जाती हैं। इनकी सबसे बड़ी पहचान एक झिल्ली-युक्त केंद्रक की उपस्थिति है, जो आनुवंशिक पदार्थ को एक सुरक्षित डिब्बे में बंद रखता है। इसके अलावा, यूकैरियोटिक कोशिका में कई विशिष्ट झिल्ली-युक्त कोशिकांग मौजूद होते हैं, जो विभिन्न कार्यों में विशेषज्ञता रखते हैं — जिससे कोशिका के भीतर श्रम-विभाजन अत्यंत कुशलतापूर्वक होता है।
- कोशिका भित्ति: पादप कोशिका में सेल्युलोसिक कोशिका भित्ति होती है; प्राणी कोशिका में नहीं।
- लवक (प्लास्टिड): पादप कोशिका में हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) सहित विभिन्न प्रकार के लवक मिलते हैं; प्राणी कोशिका में नहीं।
- रसधानी (वैक्यूल): पादप कोशिका में एक बड़ी केंद्रीय रसधानी होती है; प्राणी कोशिका में छोटी, अस्थायी रसधानियाँ पाई जाती हैं।
- तारककाय (सेंट्रोसोम): प्राणी कोशिका में स्पष्ट रूप से विद्यमान; अधिकांश पादप कोशिकाओं में अनुपस्थित।
- रिक्तिकाएँ (लाइसोसोम): प्राणी कोशिका में स्पष्ट रूप से मिलते हैं; पादप कोशिका में इनकी पहचान कम स्पष्ट है।
कोशिका झिल्ली
कोशिका झिल्ली, जिसे प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्यझिल्ली भी कहते हैं, कोशिका की सबसे बाहरी जीवित परत है। यह सभी जीवित कोशिकाओं — प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक — में पाई जाती है। 1950 के दशक में इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार ने इसकी सूक्ष्म संरचना को समझना संभव बनाया।
कोशिका झिल्ली मुख्यतः दो प्रकार के अणुओं से बनी होती है — लिपिड (विशेष रूप से फॉस्फोलिपिड) और प्रोटीन। मानव लाल रक्त कोशिका (RBC) की झिल्ली में लगभग 52% प्रोटीन और 40% लिपिड होता है। फॉस्फोलिपिड अणु एक द्विसतह (बाइलेयर) में व्यवस्थित होते हैं — उनके जल-प्रेमी (हाइड्रोफिलिक) सिरे बाहर की ओर तथा जल-भीरु (हाइड्रोफोबिक) पुच्छ भीतर की ओर होते हैं।
- फॉस्फोलिपिड द्विसतह एक तरल माध्यम की तरह है, जिसमें प्रोटीन अणु स्वतंत्र रूप से तैर सकते हैं और पार्श्विक गति कर सकते हैं — इसीलिए इसे "तरल" कहा गया।
- प्रोटीन अणु झिल्ली में "किर्मीर" (मोज़ेक) की तरह बिखरे होते हैं — कुछ झिल्ली की सतह पर (परिधीय प्रोटीन), तो कुछ झिल्ली के भीतर पूरी तरह धँसे हुए (अंगभूत/इंटीग्रल प्रोटीन)।
- झिल्ली की यह तरलीय प्रकृति कोशिका वृद्धि, विभाजन, अंतरकोशिकीय संयोजन, स्रावण और अंतःकोशिकीय परिवहन के लिए आवश्यक है।
कोशिका झिल्ली चयनात्मक-पारगम्य होती है — यह कुछ पदार्थों को आने-जाने देती है, जबकि दूसरों को रोकती है। पदार्थों के परिवहन की दो मुख्य विधियाँ हैं:
- निष्क्रिय परिवहन: इसमें कोई ऊर्जा (ATP) खर्च नहीं होती। पदार्थ सांद्रता प्रवणता के अनुसार (उच्च सांद्रता से निम्न की ओर) गति करते हैं। इसमें साधारण विसरण (छोटे, अध्रुवीय अणु), सुसाध्य विसरण (वाहक प्रोटीन की सहायता से), और परासरण (जल का विसरण) शामिल हैं।
- सक्रिय परिवहन: इसमें ATP के रूप में ऊर्जा खर्च होती है। पदार्थों को सांद्रता प्रवणता के विपरीत (निम्न सांद्रता से उच्च की ओर) ले जाया जाता है — जैसे सोडियम-पोटैशियम पंप। यह एक "पंप" की तरह काम करता है, जो आयनों को झिल्ली के पार धकेलता है।
कोशिका भित्ति
कोशिका भित्ति कवक और पौधों की कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के बाहर पाई जाने वाली एक दृढ़, निर्जीव परत है। यह कोशिका को न केवल यांत्रिक सुरक्षा प्रदान करती है, बल्कि यह कोशिका का आकार भी निर्धारित करती है और अवांछित बड़े अणुओं के प्रवेश को रोकती है।
शैवाल की कोशिका भित्ति सेल्युलोज़, गैलेक्टेन, मैनान और कैल्सियम कार्बोनेट जैसे खनिजों से बनी होती है। उच्च पादपों में यह मुख्यतः सेल्युलोज़, हेमीसेल्युलोज़, पेक्टीन और प्रोटीन से बनी होती है। कोशिका भित्ति तीन भागों में बँटी होती है:
- मध्य पटलिका (मिडल लैमेला): सबसे बाहरी परत, जो मुख्यतः कैल्सियम पेक्टेट की बनी होती है और पड़ोसी कोशिकाओं को आपस में चिपकाए रखती है।
- प्राथमिक भित्ति (प्राइमरी वॉल): मध्य पटलिका के भीतर पाई जाने वाली पतली, लचीली परत, जिसमें कोशिका वृद्धि के दौरान विस्तार की क्षमता होती है।
- द्वितीयक भित्ति (सेकेंडरी वॉल): सबसे भीतरी परत, जो कोशिका परिपक्व होने पर प्राथमिक भित्ति के भीतर बनती है — यह अधिक मोटी, दृढ़ और अक्सर लिग्निन युक्त होती है (जैसे लकड़ी की कोशिकाओं में)।
पड़ोसी कोशिकाओं के बीच सूक्ष्म नलिकाकार मार्ग होते हैं, जिन्हें जीवद्रव्य तंतु (प्लाज्मोडेस्मेटा) कहा जाता है — ये कोशिका भित्ति और मध्य पटलिका को पार करके दो पड़ोसी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य को आपस में जोड़ते हैं, जिससे अंतरकोशिकीय संचार संभव होता है।
अंतःझिल्लिका तंत्र
यूकैरियोटिक कोशिका में पाए जाने वाले सभी झिल्लीयुक्त कोशिकांग आपस में अलग-अलग कार्य तो करते हैं, लेकिन उनमें से कुछ के कार्य इतने समन्वित होते हैं कि उन्हें एक साथ अंतःझिल्लिका तंत्र (एंडोमेम्ब्रेन सिस्टम) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इस तंत्र में निम्नलिखित कोशिकांग शामिल हैं:
- अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)
- गॉल्जी उपकरण (Golgi apparatus)
- लयनकाय (Lysosomes)
- रसधानी (Vacuoles)
इस तंत्र से बाहर रखे गए कोशिकांग हैं — माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक और परऑक्सीसोम — क्योंकि इनकी क्रियाएँ स्वतंत्र रूप से संपन्न होती हैं और ये अपने स्वयं के DNA व राइबोसोम भी रखते हैं (माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट में)। यह बहिष्करण-सूची NEET में बार-बार पूछी जाती है।
अंतर्द्रव्यी जालिका (एंडोप्लाज्मिक रेटीकुलम — ER)
अंतर्द्रव्यी जालिका कोशिकाद्रव्य में फैली एक विशाल, झिल्ली-युक्त नलिकाकार जालिका है, जो चपटी थैलियों (सिस्टर्नी) और पुटिकाओं से बनी होती है। यह दो प्रकार की होती है:
- खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (RER): इसकी बाहरी सतह पर राइबोसोम चिपके होते हैं, जो इसे "खुरदरी" बनाते हैं। यह प्रोटीन-संश्लेषण का मुख्य स्थल है — विशेष रूप से उन प्रोटीनों का, जो कोशिका से बाहर स्रावित होते हैं या कोशिका झिल्ली में शामिल होते हैं।
- चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (SER): इस पर राइबोसोम नहीं होते, इसलिए चिकनी दिखती है। यह लिपिड-संश्लेषण (वसा, तेल, स्टेरॉयड हार्मोन) का मुख्य स्थल है, साथ ही यह विषाक्त पदार्थों (डिटॉक्सिफिकेशन) को भी हानिरहित बनाती है।
RER की खुरदरी सतह पर बने प्रोटीन को पुटिकाओं में संवेष्टित करके गॉल्जी उपकरण तक पहुँचाया जाता है — यही अंतःझिल्लिका तंत्र का संचार मार्ग है।
गॉल्जी उपकरण (गॉल्जी कॉम्प्लेक्स)
1898 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गॉल्जी ने तंत्रिका कोशिका में एक जालिकावत संरचना देखी, जिसे बाद में उनके नाम पर गॉल्जी उपकरण कहा गया। यह केंद्रक के पास स्थित चपटी, डिस्क-आकार की थैलियों (कुंडिकाएँ या सिस्टर्नी) के ढेर से बना होता है, जो एक-दूसरे के समानांतर व्यवस्थित रहती हैं।
गॉल्जी उपकरण की दो सतहें होती हैं — सिस सतह (निर्माणकारी/ग्रहण सतह), जो अंतर्द्रव्यी जालिका से पुटिकाएँ प्राप्त करती है, और ट्रांस सतह (परिपक्व/स्रावी सतह), जहाँ से परिपक्व पदार्थ पुटिकाओं में बंद होकर कोशिका के विभिन्न भागों या बाहर भेजे जाते हैं।
गॉल्जी उपकरण के मुख्य कार्य हैं:
- प्रोटीनों का संशोधन (ग्लाइकोसिलेशन — शर्करा समूह जोड़ना), छँटाई (सॉर्टिंग) और संवेष्टन (पैकेजिंग)।
- ग्लाइकोप्रोटीन और ग्लाइकोलिपिड का निर्माण।
- लयनकाय (लाइसोसोम) का निर्माण — इन्हें "कोशिका की आत्महत्या की थैली" भी कहा जाता है, क्योंकि इनमें पाचक एंजाइम होते हैं।
लयनकाय (लाइसोसोम)
लयनकाय गॉल्जी उपकरण द्वारा बनाई गई एकल-झिल्लीयुक्त पुटिका संरचना है, जिसमें लगभग 40-50 विभिन्न प्रकार की जल-अपघटकीय एंजाइम (हाइड्रोलेज़, प्रोटिएज़, लाइपेज़, कार्बोहाइड्रेज़, न्यूक्लिएज़) भरी रहती हैं। ये एंजाइम अम्लीय माध्यम (pH ~5) में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं, जो कोशिकाद्रव्य के तटस्थ pH से काफी अलग है — इसी कारण यदि लयनकाय फट जाए तो कोशिकाद्रव्य का तटस्थ pH इन एंजाइमों को निष्क्रिय कर देता है और कोशिका को क्षति से बचाता है।
लयनकाय के कार्य:
- कोशिका के भीतर अंतर्ग्रहण (एंडोसाइटोसिस) द्वारा लाए गए पदार्थों का पाचन।
- क्षतिग्रस्त या अप्रचलित कोशिकांगों का विघटन (ऑटोफैगी)।
- कोशिका की आत्महत्या (एपोप्टोसिस) — आवश्यकता पड़ने पर पूरी कोशिका को पचाना (जैसे टैडपोल की पूँछ का लुप्त होना)।
रसधानी (वैक्यूल)
रसधानी एकल झिल्ली (टोनोप्लास्ट) से घिरी एक कोशिकीय गुहा है, जिसमें पानी, घुले हुए खनिज, रंगद्रव्य, शर्करा और उत्सर्जी पदार्थ भरे रहते हैं। पादप कोशिकाओं में यह कोशिका का 90% तक स्थान घेर सकती है और कोशिका का स्फीति दाब (टर्गर प्रेशर) बनाए रखती है, जो पौधे को सीधा खड़ा रखने में मदद करता है।
प्राणियों में रसधानियाँ आकार में छोटी और संख्या में कम होती हैं, परंतु विशेष कार्यों के लिए विशिष्ट रसधानियाँ बनती हैं:
- संकुचनशील रसधानी (अमीबा में) — अतिरिक्त जल व उत्सर्जी पदार्थों को बाहर निकालती है।
- खाद्य रसधानी (आद्यजीवों में) — अंतर्ग्रहित भोजन को पचाने के लिए बनती है।
सूत्रकणिका (माइटोकॉन्ड्रिया)
सूत्रकणिका कोशिका का "शक्ति गृह" (पॉवरहाउस) कहलाती है, क्योंकि यहाँ कोशिकीय श्वसन द्वारा ATP (ऊर्जा मुद्रा) का निर्माण होता है। यह द्विकला (दोहरी झिल्ली) वाला एक बेलनाकार या तश्तरीनुमा अंगक है, जिसकी लंबाई 1.0–4.1 माइक्रोमीटर और व्यास 0.2–1.0 माइक्रोमीटर होता है।
सूत्रकणिका की दो झिल्लियाँ होती हैं:
- बाह्य झिल्ली: चिकनी और अत्यंत पारगम्य, जो छोटे अणुओं को स्वतंत्र रूप से गुज़रने देती है।
- भीतरी झिल्ली: कम पारगम्य, जो आधात्री (मैट्रिक्स) की ओर क्रिस्टी (क्राइस्टी) नामक अंतर्वलन बनाती है — ये क्रिस्टी भीतरी झिल्ली का सतह क्षेत्रफल काफी बढ़ा देते हैं, जिससे अधिक एंजाइम (विशेष रूप से इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला के) स्थान पा सकते हैं।
सूत्रकणिका की आधात्री (मैट्रिक्स) में निम्नलिखित संरचनाएँ पाई जाती हैं:
- वृत्ताकार DNA (प्रोकैरियोटिक जैसा), जो कुछ माइटोकॉन्ड्रियल प्रोटीनों के लिए कोड करता है।
- 70S राइबोसोम (यूकैरियोटिक 80S से छोटे), जो इन प्रोटीनों का संश्लेषण करते हैं।
- क्रेब्स चक्र (TCA चक्र) के एंजाइम।
सूत्रकणिका अर्ध-स्वायत्त (सेमी-ऑटोनॉमस) होती है — यह अपने कुछ प्रोटीन स्वयं बना सकती है, लेकिन अधिकांश प्रोटीन केंद्रकीय जीनोम द्वारा कोडित होते हैं। यह स्वयं विखंडन (फिशन) द्वारा विभाजित होती है।
लवक (प्लास्टिड)
लवक सभी पादप कोशिकाओं और कुछ प्रोटोज़ोआ (जैसे यूग्लीना) में पाए जाने वाले द्विकला अंगक हैं। ये अपने रंगद्रव्य (वर्णक) के आधार पर तीन प्रकार के होते हैं:
| लवक का प्रकार | वर्णक (पिगमेंट) | कार्य/उदाहरण |
|---|---|---|
| हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) | क्लोरोफिल-a, क्लोरोफिल-b, कैरोटीनॉइड | प्रकाश-संश्लेषण — सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (भोजन) में बदलना। पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं में सर्वाधिक मात्रा में पाए जाते हैं। |
| वर्णीलवक (क्रोमोप्लास्ट) | कैरोटीन, ज़ैंथोफिल (लाल, नारंगी, पीला) | फलों, फूलों और पुरानी पत्तियों को रंग प्रदान करना — परागणकों को आकर्षित करने और बीज प्रसार में सहायक। |
| अवर्णीलवक (ल्यूकोप्लास्ट) | कोई वर्णक नहीं (रंगहीन) | भोजन भंडारण — स्टार्च (मंडलवक/एमाइलोप्लास्ट), तेल (तेल लवक/एलायोप्लास्ट) और प्रोटीन (प्रोटीन लवक/प्रोटीनोप्लास्ट) का भंडारण करते हैं। आलू के कंद (ट्यूबर) मंडलवक का उदाहरण हैं। |
हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की संरचना:
- द्विकला: बाह्य झिल्ली चिकनी, भीतरी झिल्ली कम पारगम्य।
- पीठिका (स्ट्रोमा): भीतरी झिल्ली के भीतर का अर्धतरल आव्यूह, जिसमें प्रकाश-संश्लेषण के अंधकार अभिक्रिया (कैल्विन चक्र) के एंजाइम मौजूद रहते हैं।
- थाइलेकोइड: पीठिका में मौजूद चपटी, झिल्ली-युक्त थैलियाँ, जिनमें क्लोरोफिल और अन्य प्रकाश-संश्लेषी वर्णक मौजूद होते हैं। ये प्रकाश-संश्लेषण के प्रकाश अभिक्रिया का स्थल हैं।
- ग्रेना (ग्रेनम): थाइलेकोइड के ढेर (सिक्कों के चट्टों की तरह), जो प्रकाश अवशोषण की दक्षता बढ़ाते हैं।
हरित लवक में भी वृत्ताकार DNA और 70S राइबोसोम पाए जाते हैं, जो इसे अर्ध-स्वायत्त बनाते हैं।
राइबोसोम
राइबोसोम कोशिका के प्रोटीन संश्लेषण कारखाने हैं। 1953 में जॉर्ज पैलेड ने इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा इन सघन कणिकामय संरचनाओं को पहली बार देखा था। ये राइबोन्यूक्लिक अम्ल (rRNA) और प्रोटीन से बने होते हैं, और किसी भी झिल्ली से घिरे नहीं होते।
राइबोसोम दो प्रकार के होते हैं:
- 70S राइबोसोम: प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं (जीवाणु), माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक में पाए जाते हैं। दो उप-इकाइयाँ — 50S (बड़ी) और 30S (छोटी) — से बने होते हैं।
- 80S राइबोसोम: यूकैरियोटिक कोशिकाद्रव्य में पाए जाते हैं। दो उप-इकाइयाँ — 60S (बड़ी) और 40S (छोटी) — से बने होते हैं।
महत्वपूर्ण: "S" (स्वेडबर्ग इकाई) अवसादन गुणांक को दर्शाता है, जो अणु के आकार, आकृति और घनत्व पर निर्भर करता है — यह द्रव्यमान का सीधा योग नहीं होता। इसीलिए 50S + 30S मिलकर 80S नहीं, बल्कि 70S बनता है। यह अक्सर परीक्षा में भ्रामक विकल्प बनता है।
साइटोपंजर (साइटोस्केलेटन)
साइटोपंजर कोशिकाद्रव्य में फैली प्रोटीनयुक्त तंतुओं की एक जटिल जालिका है, जो कोशिका को आकार, यांत्रिक सहारा और गति प्रदान करती है। यह तीन प्रकार के तंतुओं से बनी होती है:
- सूक्ष्मनलिकाएँ (माइक्रोट्यूब्यूल्स): सबसे मोटे तंतु (लगभग 25 nm), जो कोशिका विभाजन (तर्कु-तंतु निर्माण), अंतरकोशिकीय परिवहन, और पक्ष्माभ/कशाभिका का मूल ढाँचा बनाते हैं।
- मध्यवर्ती तंतु (इंटरमीडिएट फिलामेंट्स): मोटाई में मध्यम (लगभग 10 nm), जो कोशिका को यांत्रिक स्थिरता प्रदान करते हैं और कोशिकाओं को आपस में जोड़ते हैं।
- सूक्ष्मतंतु (माइक्रोफिलामेंट्स): सबसे पतले तंतु (लगभग 5–7 nm), जो मुख्यतः एक्टिन प्रोटीन से बने होते हैं — ये कोशिका गति, संकुचन और कोशिका-आकार परिवर्तन में सहायक होते हैं।
पक्ष्माभ व कशाभिका (सीलिया तथा फ्लैजिला)
पक्ष्माभ (सीलिया) और कशाभिका (फ्लैजिला) कोशिका झिल्ली पर मौजूद रोम-समान अपवृद्धियाँ हैं, जो गति में सहायता करती हैं। पक्ष्माभ छोटी (लगभग 5–10 माइक्रोमीटर) और अधिक संख्या में होते हैं — ये चप्पू की तरह काम करके कोशिका या आसपास के द्रव्य को गति देते हैं (जैसे श्वसनी में श्लेष्मा को ऊपर की ओर धकेलना)। कशाभिका लंबी (15–50 माइक्रोमीटर) होती हैं और एकल या कुछ ही संख्या में होती हैं — ये कोशिका को पूरी तरह से आगे बढ़ाती हैं (जैसे शुक्राणु की कशाभिका)।
तारककाय व तारककेंद्र (सैन्ट्रोसोम तथा सैन्ट्रीयोल)
तारककाय (सेंट्रोसोम) एक झिल्ली-रहित अंगक है, जो मुख्यतः प्राणी कोशिकाओं में पाया जाता है (अधिकांश उच्च पादप कोशिकाओं में अनुपस्थित)। यह दो बेलनाकार तारककेंद्रों (सेंट्रीओल्स) से मिलकर बना होता है, जो एक-दूसरे के लंबवत (90° पर) स्थित होते हैं और अक्रिस्टलीय परिकेंद्रीय द्रव्य से घिरे होते हैं।
हर तारककेंद्र की संरचना बैलगाड़ी के पहिए जैसी होती है — यह 9 × 3 (नौ त्रिक) सूक्ष्मनलिकाओं से बना होता है, जो एक गोलाकार व्यवस्था में होती हैं (9+0 प्रणाली, कोई केंद्रीय सूक्ष्मनलिका नहीं)।
तारककाय के कार्य:
- कोशिका विभाजन के दौरान तर्कु-तंतु (स्पिंडल फाइबर्स) का निर्माण।
- पक्ष्माभ और कशाभिका का आधारीकाय (बेसल बॉडी) बनना।
केंद्रक (न्यूक्लियस)
केंद्रक कोशिका का "मस्तिष्क" है — इसमें आनुवंशिक जानकारी (DNA) सुरक्षित रहती है, जो कोशिका के सभी कार्यों को नियंत्रित करती है। रॉबर्ट ब्राउन ने 1831 में केंद्रक की खोज की थी। यह एक द्विकला (दोहरी झिल्ली) संरचना है:
- केंद्रक आवरण: बाह्य और भीतरी झिल्ली के बीच परिकेंद्रकी अवकाश (पेरीन्यूक्लियर स्पेस) होता है (10–50 nm)। बाह्य झिल्ली अंतर्द्रव्यी जालिका से जुड़ी होती है और इस पर राइबोसोम मौजूद होते हैं।
- केंद्रक छिद्र: केंद्रक आवरण पर निश्चित स्थानों पर बने छिद्र, जिनसे होकर RNA, प्रोटीन और अन्य अणु केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच आते-जाते रहते हैं।
- केंद्रकद्रव्य (न्यूक्लियोप्लाज्म): केंद्रक के भीतर का अर्धतरल आव्यूह।
- क्रोमोटीन: अंतरकाल (इंटरफेज़) में केंद्रक के भीतर फैली हुई DNA-प्रोटीन (हिस्टोन) की तंतुमय जालिका।
- गुणसूत्र (क्रोमोसोम): कोशिका विभाजन के दौरान क्रोमोटीन सघन होकर गुणसूत्र बनाते हैं। मानव कोशिका में 46 गुणसूत्र (23 जोड़े) होते हैं।
- केंद्रिक (न्यूक्लियोलस): एक या अधिक गोलाकार संरचनाएँ — यह सक्रिय rRNA-संश्लेषण (राइबोसोमल RNA) का स्थल है। कोशिका विभाजन के दौरान यह लुप्त हो जाता है और विभाजन के बाद पुनः प्रकट होता है।
- मध्यकेंद्री (मेटासेन्ट्रिक): गुणसूत्रबिंदु ठीक बीच में — दोनों भुजाएँ बराबर लंबाई की (आकार: V या X)।
- उपमध्यकेंद्री (सब-मेटासेन्ट्रिक): गुणसूत्रबिंदु मध्य से थोड़ा हटकर — एक भुजा छोटी, दूसरी बड़ी (आकार: L या J)।
- अग्रबिंदु (एक्रो-सेन्ट्रिक): गुणसूत्रबिंदु किनारे के पास — एक भुजा अत्यंत छोटी, दूसरी बहुत बड़ी।
- अंतकेंद्री (टेलोसेन्ट्रिक): गुणसूत्रबिंदु बिल्कुल सिरे पर — व्यावहारिक रूप से केवल एक भुजा।
कायनेटोकोर: गुणसूत्रबिंदु पर बनी एक विशेष प्रोटीन संरचना, जिससे कोशिका विभाजन के दौरान तर्कु-तंतु जुड़ते हैं।
सूक्ष्मकाय (माइक्रोबॉडी)
सूक्ष्मकाय एकल-झिल्लीयुक्त छोटे अंगक हैं, जिनमें विशिष्ट प्रकार के ऑक्सीडेटिव एंजाइम मौजूद होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख परऑक्सीसोम है, जिसमें कैटालेज़ एंजाइम होता है — यह हाइड्रोजन पेरॉक्साइड (H₂O₂) को पानी और ऑक्सीजन में विघटित करता है, जो कोशिका के लिए एक विषैला उत्पाद है।
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न (2013 के बाद)
इस अध्याय से 2013 के बाद NEET में पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष के संदर्भ सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें
1NEET 2016 निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
उत्तर: "पिलाई व फिम्ब्री मुख्यतः बैक्टीरिया कोशिकाओं की गतिशीलता (motility) में शामिल होते हैं" — यह कथन गलत है।
पिलाई (पिली) और फिम्ब्री (फिम्ब्रिए) बैक्टीरिया की गति के लिए नहीं, बल्कि संयुग्मन (जेनेटिक मटेरियल के स्थानांतरण) और सतह से जुड़ने (अडहेज़न) के काम आते हैं। बैक्टीरिया में गति का मुख्य अंग कशाभिका (फ्लैजेला) होता है। शेष कथन सही हैं — बैक्टीरिया की कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकेन की बनी होती है, सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) कशाभिका-रहित होते हैं, तथा माइकोप्लाज़्मा एक भित्ति-रहित सूक्ष्मजीव है।
2NEET 2016 सूत्रकणिका (माइटोकॉन्ड्रिया) व हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) के संबंध में — (i) ये अर्ध-स्वायत्त अंगक हैं (ii) ये पूर्व-स्थित अंगकों के विभाजन से बनते हैं, इनमें DNA होता है पर प्रोटीन-संश्लेषण तंत्र नहीं होता — इनमें से कौन सा विकल्प सही है?
उत्तर: दोनों (i) व (ii) सही हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट अर्ध-स्वायत्त (सेमी-ऑटोनॉमस) अंगक हैं — इनमें स्वयं का वृत्ताकार DNA तथा 70S राइबोसोम होते हैं, जो स्वयं के कुछ प्रोटीन संश्लेषित करते हैं। फिर भी, इनकी अधिकांश प्रोटीनें केंद्रकीय जीनोम द्वारा कोडित होती हैं, इसीलिए ये "अर्ध-" स्वायत्त हैं। ये सदैव पूर्व-स्थित माइटोकॉन्ड्रिया/क्लोरोप्लास्ट के विखंडन (फिशन) से ही बनते हैं, नए सिरे से नहीं।
3NEET 2016 तर्कु-तंतु (spindle fibers) गुणसूत्र के किस भाग से जुड़ते हैं?
उत्तर: गुणसूत्र के कायनेटोकोर (kinetochore) से।
कायनेटोकोर, गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर) पर स्थित एक विशेष प्रोटीन-संरचना है, जिससे तर्कु-तंतुओं की सूक्ष्मनलिकाएँ जुड़ती हैं। स्वयं गुणसूत्रबिंदु जुड़ाव-स्थल नहीं है — यह तो कायनेटोकोर है जो वास्तविक जुड़ाव का काम करता है। यह अंतर अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है।
4NEET 2016 निम्नलिखित में से कौन-सा कोशिकांग एकल झिल्ली से घिरा होता है?
उत्तर: लयनकाय (Lysosomes)।
लयनकाय गॉल्जी उपकरण से संवेष्टन (बडिंग) द्वारा बनते हैं और केवल एकल झिल्ली से घिरे होते हैं। इसके विपरीत, माइटोकॉन्ड्रिया, हरित लवक और केंद्रक — तीनों द्विकला (दोहरी झिल्ली) से घिरे होते हैं। यह "एकल बनाम द्विकला" वर्गीकरण NEET में बार-बार पूछा जाता है।
5NEET 2017 निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे छोटी ज्ञात जीवित कोशिकाएँ हैं, जिनमें निश्चित कोशिका भित्ति नहीं होती, जो पादप व प्राणी दोनों के लिए रोगजनक हैं, तथा जो ऑक्सीजन के बिना भी जीवित रह सकती हैं?
उत्तर: माइकोप्लाज़्मा (Mycoplasma)।
माइकोप्लाज़्मा एकमात्र ऐसे प्रोकैरियोट हैं जिनमें कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है — यही उन्हें अत्यंत सूक्ष्म (0.3 माइक्रोमीटर) और आकृति में अनिश्चित (प्लीयोमॉर्फिक) बनाता है। ये अवायवीय (ऑक्सीजन-रहित) परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं और मनुष्यों, पशुओं व पौधों में विभिन्न रोगों के कारण होते हैं (जैसे निमोनिया)।
6NEET 2017 निम्नलिखित में से कौन-सा घटक बैक्टीरिया कोशिका को चिपचिपा (sticky) गुण प्रदान करता है?
उत्तर: ग्लाइकोकैलिक्स (Glycocalyx)।
ग्लाइकोकैलिक्स बैक्टीरिया कोशिका भित्ति के बाहर पाई जाने वाली शर्करामय (कार्बोहाइड्रेट) परत है। यह जीवाणु के अनुसार या तो श्लेष्म परत (ढीली) या संपुटिका/कैप्सूल (मोटी व दृढ़) के रूप में हो सकती है — यही चिपचिपाहट (स्टिकीनेस) प्रदान करती है, जो सतहों से जुड़ाव और प्रतिरक्षा-तंत्र से बचाव में मदद करती है।
7NEET 2018 निम्नलिखित में से कौन प्रोकैरियोट नहीं है?
उत्तर: सैकैरोमाइसीज़ (Saccharomyces)।
सैकैरोमाइसीज़ (यीस्ट) एक एककोशिक कवक है, और सभी कवक (फंजाई) यूकैरियोटिक होते हैं — इनमें झिल्ली-युक्त केंद्रक और कोशिकांग मौजूद होते हैं। इसके विपरीत, नॉस्टॉक व ऑसिलेटोरिया (सायनोबैक्टीरिया) और माइकोबैक्टीरियम (बैक्टीरिया) — ये सभी प्रोकैरियोट हैं।
8NEET 2018 केंद्रिका (nucleolus) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
उत्तर: यह सक्रिय राइबोसोमल RNA-संश्लेषण का स्थल है (site for active ribosomal RNA synthesis)।
केंद्रिका एक झिल्ली-रहित संरचना है, जो विभाजन-रहित (इंटरफेज़) कोशिकाओं में स्पष्ट दिखाई देती है। यहाँ rRNA का संश्लेषण होता है, जो राइबोसोम के निर्माण में जाता है। कोशिका विभाजन के दौरान यह लुप्त हो जाती है और विभाजन पूरा होने पर पुनः प्रकट होती है — यह तथ्य NEET में बार-बार पूछा जाता है।
9NEET 2019 निम्नलिखित में से किन दो कोशिकांगों में DNA नहीं पाया जाता?
उत्तर: लयनकाय व रसधानी (Lysosomes and Vacuoles)।
माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक और केंद्रक-आवरण — इन सबमें DNA उपस्थित रहता है (माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट में स्वयं का वृत्ताकार DNA, तथा केंद्रक में केंद्रकीय DNA)। किंतु लयनकाय और रसधानी — दोनों केवल एकल-झिल्ली संग्रहण/पाचन संरचनाएँ हैं, इनमें DNA नहीं होता।
10NEET 2019 कोशिका विभाजन के संबंध में "Omnis cellula-e cellula" (हर कोशिका पूर्व-स्थित कोशिका से बनती है) की अवधारणा सबसे पहले किसने प्रस्तुत की?
उत्तर: रुडोल्फ़ विरचो (Rudolf Virchow)।
1855 में रुडोल्फ़ विरचो ने कोशिका सिद्धांत में यह महत्वपूर्ण संशोधन जोड़ा कि सभी कोशिकाएँ पूर्व-स्थित कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं। इससे पहले, श्लाइडेन (पादप) व श्वान (प्राणी) ने केवल यह प्रस्तावित किया था कि सभी जीव कोशिकाओं से बने हैं — विरचो ने कोशिका-उत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर दिया।
11NEET 2019 (Odisha) कोशिका झिल्ली से होकर सक्रिय व निष्क्रिय परिवहन के बीच मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: निष्क्रिय परिवहन के लिए सांद्रता प्रवणता आवश्यक है, जबकि सक्रिय परिवहन में विलेय को स्थानांतरित करने हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
निष्क्रिय परिवहन (साधारण/सुसाध्य विसरण) सदैव उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर, बिना ऊर्जा-खपत के होता है। सक्रिय परिवहन सांद्रता प्रवणता के विपरीत (निम्न से उच्च) होता है, जिसके लिए ATP के रूप में ऊर्जा अनिवार्य है — जैसे सोडियम-पोटैशियम पंप।
12NEET 2020 अंतर्विष्ट पिंडों (inclusion bodies) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
उत्तर: "ये भोजन कणों के अंतर्ग्रहण (ingestion) में शामिल होते हैं" — यह कथन सही नहीं है।
अंतर्विष्ट पिंड (इनक्लूजन बॉडीज़) प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में झिल्ली-रहित संचित पदार्थ होते हैं — जैसे फॉस्फेट कण, सायनोफाइसीयन, ग्लाइकोजन कण। ये भंडारण (स्टोरेज) का कार्य करते हैं, भोजन के अंतर्ग्रहण में नहीं। भोजन का अंतर्ग्रहण एंडोसाइटोसिस जैसी प्रक्रियाओं द्वारा होता है, जो इन अंतर्विष्ट पिंडों से पूरी तरह अलग है।
13NEET 2021 अंतःझिल्लिका तंत्र (endomembrane system) में निम्नलिखित में से कौन-से कोशिकांग शामिल हैं?
उत्तर: अंतर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लयनकाय व रसधानी (Endoplasmic reticulum, Golgi complex, Lysosomes and Vacuoles)।
अंतःझिल्लिका तंत्र में केवल वे झिल्ली-युक्त कोशिकांग शामिल हैं जिनकी क्रियाएँ आपस में समन्वित (कोऑर्डिनेटेड) होती हैं। माइटोकॉन्ड्रिया (स्वतंत्र DNA/राइबोसोम), हरितलवक (स्वतंत्र DNA/राइबोसोम), और परऑक्सीसोम — ये तीनों इस तंत्र का हिस्सा नहीं माने जाते, क्योंकि इनकी क्रियाएँ स्वतंत्र रूप से संपन्न होती हैं। यह बहिष्करण-सूची NEET में बार-बार पूछी जाती है।
14NEET 2022 अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
उत्तर: "प्रोकैरियोट्स में केवल खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (RER) ही पाई जाती है" — यह कथन गलत है।
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में कोई भी प्रकार (चिकनी या खुरदरी) की अंतर्द्रव्यी जालिका नहीं पाई जाती — यह केवल यूकैरियोटिक कोशिकाओं की विशेषता है। शेष कथन सही हैं — RER पर राइबोसोम जुड़े होते हैं, SER लिपिड-संश्लेषण का स्थल है, तथा SER पर राइबोसोम नहीं होते।
15NEET 2022 कथन-I: माइकोप्लाज़्मा 1 माइक्रोन से भी छोटे छिद्र वाले फिल्टर से गुज़र सकते हैं। कथन-II: माइकोप्लाज़्मा एक कोशिका भित्तियुक्त बैक्टीरिया हैं। इन दोनों कथनों के आलोक में सही उत्तर चुनें।
उत्तर: कथन-I सही है, किंतु कथन-II गलत है।
माइकोप्लाज़्मा वास्तव में इतने सूक्ष्म (लगभग 0.3 माइक्रोमीटर) और लचीले होते हैं कि 1 माइक्रोन से भी छोटे छिद्रों से गुज़र सकते हैं (कथन-I सही) — किंतु इनमें कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है (कथन-II गलत)। यह "भित्ति-रहित प्रोकैरियोट" वाला तथ्य NEET में बार-बार दोहराया जाता है।
16NEET 2023 निम्नलिखित में से कौन-से अंतःझिल्लिका तंत्र (endomembrane system) का भाग नहीं माने जाते — माइटोकॉन्ड्रिया, अंतर्द्रव्यी जालिका, हरित लवक, गॉल्जीकाय, परऑक्सीसोम?
उत्तर: माइटोकॉन्ड्रिया, हरित लवक व परऑक्सीसोम — ये तीनों अंतःझिल्लिका तंत्र का भाग नहीं हैं।
अंतःझिल्लिका तंत्र में केवल अंतर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लयनकाय व रसधानी शामिल हैं। माइटोकॉन्ड्रिया व हरित लवक अपने स्वतंत्र DNA व द्विकला संरचना के कारण, तथा परऑक्सीसोम अपनी स्वतंत्र उत्पत्ति के कारण, इस तंत्र से बाहर रखे जाते हैं — यह बहिष्करण-सूची याद रखना बेहद ज़रूरी है।
17NEET 2023 झिल्ली के आर-पार सांद्रता प्रवणता के विरुद्ध आयनों की गति व संचय को किसके द्वारा समझाया जा सकता है?
उत्तर: सक्रिय परिवहन (Active transport)।
परासरण व निष्क्रिय/सुसाध्य विसरण — दोनों ही सदैव सांद्रता प्रवणता के अनुसार (उच्च से निम्न की ओर) होते हैं। केवल सक्रिय परिवहन ही ATP ऊर्जा का उपयोग करके सांद्रता प्रवणता के विपरीत (निम्न से उच्च) दिशा में विलेय को स्थानांतरित कर सकता है — जैसे सोडियम-पोटैशियम पंप।
18NEET 2024 हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) में पाया जाने वाला DNA किस प्रकार का होता है?
उत्तर: वृत्ताकार, द्विरज्जुकी (Circular, double stranded)।
माइटोकॉन्ड्रिया व हरित लवक — दोनों में ही स्वयं का DNA वृत्ताकार और द्विरज्जुकी (डबल-स्ट्रैंडेड) होता है, तथा प्रोटीन-संश्लेषण हेतु 70S राइबोसोम भी मौजूद रहते हैं — यही तथ्य इन्हें अर्ध-स्वायत्त (सेमी-ऑटोनॉमस) अंगक कहलाने का आधार देता है।
19NEET 2024 कथन-I: माइटोकॉन्ड्रिया व हरित लवक — दोनों ही द्विकला (दोहरी झिल्ली) से घिरे अंगक हैं। कथन-II: माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली, हरित लवक की तुलना में अपेक्षाकृत कम पारगम्य होती है। इन दोनों कथनों के आलोक में सही उत्तर चुनें।
उत्तर: दोनों कथन सही हैं (Both Statement I and Statement II are correct)।
माइटोकॉन्ड्रिया व हरित लवक — दोनों ही द्विकला (दोहरी झिल्ली) संरचना वाले अंगक हैं (कथन-I सही)। इसके अतिरिक्त, माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली अत्यंत विशिष्ट व चयनात्मक-पारगम्य होती है, जो इसे हरित लवक की भीतरी झिल्ली की तुलना में कम पारगम्य बनाती है (कथन-II भी सही)।
20NEET 2025 प्रोकैरियोटिक कोशिका में वह विशेष झिल्लीमय संरचना, जो कोशिका भित्ति निर्माण, DNA प्रतिकृति व श्वसन में मदद करती है, क्या कहलाती है?
उत्तर: मीसोसोम (Mesosome)।
मीसोसोम, जीवद्रव्यझिल्ली के कोशिका के अंदर की ओर पुटिका, नलिका या पटलिका के रूप में फैलाव से बनता है। यह कोशिका भित्ति के निर्माण, DNA-प्रतिकृति व उसके समान वितरण, तथा श्वसन व स्रावी प्रक्रियाओं — चारों में सहायक होता है, साथ ही झिल्ली के पृष्ठ क्षेत्रफल को भी बढ़ाता है।
21NEET 2025 राइबोसोम व उसकी उप-इकाइयों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: यूकैरियोटिक राइबोसोम 80S व प्रोकैरियोटिक 70S होते हैं; प्रत्येक राइबोसोम की दो उप-इकाइयाँ होती हैं; 80S की उप-इकाइयाँ 60S व 40S, तथा 70S की उप-इकाइयाँ 50S व 30S होती हैं।
यह याद रखना ज़रूरी है कि "S" (स्वेडबर्ग इकाई) अवसादन-गुणांक को दर्शाती है, जो द्रव्यमान के सीधे अनुपात में नहीं जुड़ती — इसीलिए 50S + 30S मिलकर 70S बनता है, 80S नहीं। यही गणितीय भ्रम NEET में बार-बार भ्रामक विकल्प के रूप में दिया जाता है।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं
- अंतःझिल्लिका तंत्र (Endomembrane System) — क्या शामिल, क्या नहीं — शामिल: अंतर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लयनकाय, रसधानी। शामिल नहीं: माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक, परऑक्सीसोम, राइबोसोम (क्योंकि इनकी क्रियाएँ स्वतंत्र रूप से संपन्न होती हैं, समन्वित रूप से नहीं)। यह सूची NEET में लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछी जाती है।
- एकल झिल्ली बनाम द्विकला अंगक — एकल झिल्ली: लयनकाय, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, रसधानी, परऑक्सीसोम। द्विकला (दोहरी झिल्ली): माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक (व अन्य लवक), केंद्रक। झिल्ली-रहित: राइबोसोम, तारककाय।
- राइबोसोम की स्वेडबर्ग इकाई (S) कभी सीधे न जोड़ें — 70S राइबोसोम की उप-इकाइयाँ 50S + 30S होती हैं (योग 80 नहीं), तथा 80S राइबोसोम की उप-इकाइयाँ 60S + 40S होती हैं (योग 100 नहीं) — क्योंकि S अवसादन-दर को दर्शाता है, द्रव्यमान को सीधे नहीं।
- निष्क्रिय बनाम सक्रिय परिवहन — निष्क्रिय परिवहन (साधारण/सुसाध्य विसरण) सांद्रता प्रवणता के अनुसार (उच्च से निम्न), बिना ऊर्जा-खपत के होता है। सक्रिय परिवहन सांद्रता प्रवणता के विपरीत (निम्न से उच्च) होता है, जिसके लिए ATP ऊर्जा अनिवार्य है — दोनों को उलझाना NEET का प्रिय तरीका है।
- माइकोप्लाज़्मा — भित्ति-रहित प्रोकैरियोट — यह एकमात्र प्रोकैरियोट समूह है जिसमें कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है, जिससे ये 1 माइक्रोन से भी छोटे छिद्रों से गुज़र सकते हैं और आकृति में अनिश्चित (प्लीयोमॉर्फिक) रहते हैं।
- प्रोकैरियोटिक कोशिका के चार मूल आकार — कोकस (गोलाकार), बैसिलस (दंडाकार), विब्रियो (कॉमा-आकार), स्पाइरिलम (सर्पिलाकार) — ये आकार अक्सर कोशिका भित्ति की संरचना से निर्धारित होते हैं और NEET में "आकार-प्रजाति" मिलान वाले प्रश्नों में पूछे जाते हैं।
- NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 3–8 प्रश्न आते हैं (2019 व 2023 जैसे वर्षों में तो 8-11 तक भी रहे हैं), जिनमें अंतःझिल्लिका तंत्र, माइटोकॉन्ड्रिया/हरितलवक की तुलना, तथा प्रोकैरियोटिक कोशिका (माइकोप्लाज़्मा, मीसोसोम) सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले उप-विषय रहे हैं।
✓ संक्षिप्त सार
कोशिका सिद्धांत
स्लाइडेन-श्वान ने प्रतिपादित किया कि सभी जीव कोशिकाओं से बने हैं; विरचो ने जोड़ा कि सभी कोशिकाएँ पूर्व-स्थित कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं।
प्रोकैरियोट बनाम यूकैरियोट
झिल्ली-युक्त केंद्रक व अंगकों की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर कोशिका प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक कहलाती है। प्रोकैरियोट में केंद्रक-झिल्ली, अधिकांश कोशिकांग व कैंबियम अनुपस्थित होते हैं।
अंतःझिल्लिका तंत्र
अंतर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लयनकाय व रसधानी — इनके कार्य आपस में जुड़े हैं। सूत्रकणिका, हरितलवक व परऑक्सीसोम इसमें शामिल नहीं होते।
ऊर्जा व वंशागति के केंद्र
सूत्रकणिका कोशिका का शक्ति गृह है और हरितलवक प्रकाश-संश्लेषण की ऊर्जा संचित करता है। केंद्रक में क्रोमोटीन व गुणसूत्रों के रूप में आनुवंशिक जानकारी सुरक्षित रहती है।
? प्रश्न-उत्तर
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प्रश्न 1 इनमें कौन सा सही नहीं है?
"कोशिका की खोज रॉबर्ट ब्राउन ने की थी" — यह कथन सही नहीं है।
वास्तव में कोशिका को सर्वप्रथम एंटोनी वैन ल्युवेनहाक ने देखा व वर्णित किया था। रॉबर्ट ब्राउन ने तो बाद में केंद्रक की खोज की थी, न कि कोशिका की।
प्रश्न 2 नई कोशिका का निर्माण होता है।
पूर्व-स्थित कोशिकाओं से — यही कोशिका सिद्धांत का एक बुनियादी नियम है, जिसे सबसे पहले रुडोल्फ़ विरचो (1855) ने स्पष्ट किया था — 'ओमनिस सेलुला-ए सेलुला', यानी हर कोशिका पहले से मौजूद किसी कोशिका के विभाजन से ही बनती है, न कि किण्वन, पुनरुत्पादन या अजैविक पदार्थों से नए सिरे से।
प्रश्न 3 निम्न के जोड़ा बनाइए:
| संरचना | विवरण |
|---|---|
| (अ) क्रिस्टी | (ii) सूत्रकणिका में अंतर्वलन |
| (ब) कुंडिका | (iii) गॉल्जी उपकरण में बिंब आकार की थैली |
| (स) थाइलेकोइड | (i) पीठिका में चपटे कलामय थैली |
प्रश्न 4 इनमें से कौन सा सही है:
प्रोकैरियोटिक की झिल्ली में आवरित अंगक नहीं मिलते हैं — यह कथन सही है, क्योंकि प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में झिल्ली-युक्त कोशिकांगों (जैसे केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय) की पूरी तरह कमी होती है — इनमें सिर्फ राइबोसोम जैसे झिल्ली-रहित अंगक ही मिलते हैं।
प्रश्न 5 प्रोकैरियोटिक कोशिका में क्या मीसोसोम होता है? इसके कार्य का वर्णन करें।
मीसोसोम एक विशेष झिल्लीमय संरचना है, जो जीवद्रव्यझिल्ली के कोशिका में भीतर की ओर पुटिका, नलिका या पटलिका के रूप में फैलाव से बनती है। यह प्रोकैरियोटिक (विशेषकर जीवाणु) कोशिकाओं में पाया जाता है।
मीसोसोम के कार्य:
- कोशिका भित्ति के निर्माण में सहायता।
- DNA की प्रतिकृति (रेप्लिकेशन) व संतति कोशिका में समान वितरण।
- श्वसन व स्रावी प्रक्रियाओं में योगदान।
- जीवद्रव्यझिल्ली का पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ाना।
प्रश्न 6 कैसे उदासीन विलेय जीवद्रव्यझिल्ली से होकर गति करते हैं? क्या ध्रुवीय अणु उसी प्रकार से इससे होकर गति करते हैं? यदि नहीं तो इनका जीवद्रव्यझिल्ली से होकर परिवहन कैसे होता है?
उदासीन (गैर-ध्रुवीय) विलेय जीवद्रव्यझिल्ली से होकर साधारण विसरण के ज़रिए गति करते हैं — यह प्रक्रिया सांद्रता प्रवणता के अनुसार, यानी उच्च सांद्रता से निम्न की ओर, बिना किसी ऊर्जा की खपत के होती है।
ध्रुवीय अणु इस तरह सीधे नहीं जा सकते, क्योंकि झिल्ली की भीतरी परत अध्रुवीय लिपिड की बनी होती है। इन्हें झिल्ली में मौजूद विशेष वाहक प्रोटीन की सहायता चाहिए होती है। यदि परिवहन सांद्रता प्रवणता के अनुसार (उच्च से निम्न) हो — सुसाध्य विसरण (निष्क्रिय परिवहन)। यदि सांद्रता प्रवणता के विपरीत (निम्न से उच्च) हो — सक्रिय परिवहन, जिसके लिए ATP ऊर्जा की ज़रूरत होती है (जैसे सोडियम-पोटैशियम पंप)।
प्रश्न 7 दो कोशिकीय अंगकों का नाम बताइए जो द्विकला से घिरे होते हैं। इन दो अंगकों की क्या विशेषताएं हैं? इनका कार्य व रेखांकित चित्र बनाइए?
द्विकला (दोहरी झिल्ली) से घिरे दो प्रमुख अंगक:
1. सूत्रकणिका (माइटोकॉन्ड्रिया):
- बाह्य झिल्ली — चिकनी; भीतरी झिल्ली — क्रिस्टी (अंतर्वलन) बनाती है, जो सतह क्षेत्रफल बढ़ाती है।
- आधात्री (मैट्रिक्स) में वृत्ताकार DNA व 70S राइबोसोम मौजूद होते हैं।
- कार्य: वायवीय श्वसन द्वारा ATP (ऊर्जा) उत्पादन — कोशिका का शक्ति गृह।