प्राणियों में संरचनात्मक संगठन — विस्तृत अध्ययन सामग्री
जंतु विज्ञान • शारीर व आकारिकी का संगठन

प्राणियों में संरचनात्मक संगठन

एक अकेली कोशिका से लेकर अरबों कोशिकाओं वाले जटिल शरीर तक — जीवन ने संगठन का एक अद्भुत सिलसिला विकसित किया है। इस अध्याय में हम देखेंगे कि कोशिकाएँ कैसे ऊतकों में, ऊतक अंगों में, और अंग पूरे तंत्रों में संगठित होकर शरीर को जीवित रखते हैं — और इसे समझने के लिए हम मेंढक को एक प्ररूपी कशेरुकी प्राणी के तौर पर बारीकी से देखेंगे।

भूमिका कोशिका से अंगतंत्र तक की यात्रा

पिछले अध्याय में आपने प्राणि जगत के कई एककोशिकीय व बहुकोशिकीय जीवों के बारे में पढ़ा। एककोशिकीय प्राणियों में जीवन की सारी जैविक क्रियाएँ — पाचन, श्वसन तथा जनन — एक ही अकेली कोशिका द्वारा संपन्न होती हैं। लेकिन बहुकोशिकीय प्राणियों के जटिल शरीर में यही बुनियादी क्रियाएँ अलग-अलग कोशिका समूहों द्वारा बहुत ही व्यवस्थित ढंग से बाँटी जाती हैं।

आकार में भारी अंतर, फिर भी वही सिद्धांत हाइड्रा जैसे सरल प्राणी का शरीर कई तरह की कोशिकाओं से मिलकर बना है, जिनमें हर तरह की कोशिका हज़ारों की संख्या में मौजूद है। दूसरी ओर मानव शरीर अरबों कोशिकाओं से बना है, जो विविध कार्य संपन्न करती हैं। सवाल यह उठता है — ये सारी कोशिकाएँ शरीर में एक साथ तालमेल से कैसे काम करती हैं? जवाब है: बहुकोशिकीय प्राणियों में समान कोशिकाओं का समूह, अंतरकोशिकीय पदार्थों सहित मिलकर एक विशेष कार्य करता है — कोशिकाओं के इसी संगठन को ऊतक कहा जाता है।

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि चाहे प्राणी कितना भी जटिल क्यों न हो, उसका शरीर मूल रूप से सिर्फ चार तरह के आधारभूत ऊतकों से ही बना होता है। ये सारे ऊतक एक निश्चित अनुपात व प्रतिरूप में संगठित होकर अंगों का निर्माण करते हैं — जैसे आमाशय, फुफ्फुस (फेफड़े), हृदय और वृक्क (किडनी)। जब दो या दो से अधिक अंग अपनी भौतिक व रासायनिक पारस्परिक-क्रिया से मिलकर एक निश्चित कार्य को अंजाम देते हैं, तो वे मिलकर अंग-तंत्र बनाते हैं — जैसे पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र। इस तरह पूरे शरीर की जैविक क्रियाएँ कोशिका, ऊतक, अंग तथा अंगतंत्र के बीच श्रम-विभाजन के ज़रिए संपन्न होती हैं और पूरे शरीर को जीवित रखने में अपना-अपना योगदान देती हैं।

1 अंग और अंगतंत्र

कोशिकाओं का संगठन जो जीव की क्रियाओं को दक्ष व समन्वित बनाता है

बहुकोशिकीय प्राणियों में ऊतक संगठित होकर अंग व अंगतंत्र की रचना करते हैं। इस तरह का संगठन लाखों-करोड़ों कोशिकाओं से बने जीव की सभी क्रियाओं को कहीं अधिक दक्षतापूर्वक और समन्वित रूप से चलाने के लिए बेहद ज़रूरी होता है। शरीर का हर अंग एक या एक से अधिक प्रकार के ऊतकों से मिलकर बना होता है — उदाहरण के लिए, हृदय में चारों ही तरह के ऊतक मौजूद रहते हैं: उपकला, संयोजी, पेशीय तथा तंत्रिकीय ऊतक।

इंद्रियगोचर प्रवृत्ति — एक विकासीय संकेत जब हम अंग व अंगतंत्र की जटिलता का ध्यानपूर्वक अध्ययन करते हैं, तो हमें एक दिलचस्प पैटर्न नज़र आता है — यह जटिलता एक निश्चित इंद्रियगोचर (अवबोधक) प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है, यानी सरल प्राणियों से लेकर जटिल प्राणियों तक जाते हुए संवेदी व नियंत्रण प्रणालियाँ भी क्रमिक रूप से विकसित होती जाती हैं। इसे विकासीय प्रवृत्ति कहा जाता है, जिसका विस्तृत अध्ययन आगे की कक्षाओं में किया जाता है।

इस अध्याय में हम मेंढक की शारीर (एनाटॉमी) तथा आकारिकी (मॉर्फोलॉजी) — दोनों के संगठन व कार्यविधि के बारे में विस्तार से जानेंगे। आकारिकी किसी जीव की बाहरी संरचना या बाहर से दिखने वाले आकार का अध्ययन कराती है — पौधों या सूक्ष्म जीवों के संदर्भ में आकारिकी शब्द का यही मतलब होता है। लेकिन प्राणियों के संबंध में आकारिकी का अर्थ थोड़ा अलग है — यहाँ इसका मतलब शरीर के बाहरी अंगों की बनावट या शरीर के बाहरी भागों का अध्ययन है। प्राणियों में शारीर का पारंपरिक मतलब आंतरिक अंगों की संरचना के अध्ययन से है। अब हम मेंढक — जो कशेरुकी संघ का प्रतिनिधित्व करता है — की आकारिकी व शारीरिकी का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

2 मेंढक

जल और थल दोनों पर जीवन बिताने वाला उभयचर

मेंढक वह प्राणी है जो मीठे जल तथा धरती दोनों पर निवास करता है, और यह कशेरुकी संघ के एम्फीबिया (उभयचर) वर्ग से संबंधित होता है। भारत में पाई जाने वाली मेंढक की सामान्य जाति राना टिग्रीना है।

इसके शरीर का तापमान स्थिर नहीं होता — शरीर का ताप वातावरण के ताप के अनुसार बदलता रहता है। इस तरह के प्राणियों को असमतापी या अनियततापी कहा जाता है। आपने ज़रूर देखा होगा कि जब मेंढक घास या नम ज़मीन पर होते हैं, तो उनके रंग में बदलाव आता है — दरअसल उनमें अपने शत्रुओं से बचने के लिए रंग बदलने की एक खास क्षमता होती है, जिसे छद्मावरण कहा जाता है, और इस रक्षात्मक रंग-परिवर्तन क्रिया को अनुहरण (मिमिक्री) कहते हैं।

मौसमी निष्क्रियता आपने यह भी गौर किया होगा कि मेंढक शीत तथा ग्रीष्म ऋतु में नज़र नहीं आते। इस दौरान वे सर्दी व गर्मी की अति से बचने के लिए ज़मीन में गहरे गड्ढों में चले जाते हैं। इसे क्रमशः शीत निष्क्रियता (हाइबरनेशन) तथा ग्रीष्म निष्क्रियता (एस्टिवेशन) कहा जाता है।

3 बाह्य आकारिकी

मेंढक की बाहरी बनावट व उसके अंग

मेंढक की त्वचा एक श्लेष्मा (म्यूकस) की परत से ढकी रहती है, जिस वजह से यह चिकनी व फिसलनी महसूस होती है, और यह हमेशा नम (आर्द्र) बनी रहती है। इसकी ऊपरी सतह धानी हरे रंग की होती है, जिस पर अनियमित धब्बे बने रहते हैं, जबकि निचली सतह हल्की पीली दिखती है। दिलचस्प बात यह है कि मेंढक कभी पानी मुँह से नहीं पीता — बल्कि उसकी त्वचा ही सीधे पानी को सोख लेती है।

शरीर की बुनियादी बनावट

मेंढक का शरीर सिर तथा धड़ में बँटा रहता है, और इसमें पूँछ व गर्दन दोनों का अभाव होता है। मुख के ठीक ऊपर एक जोड़ी नासिका द्वार खुलते हैं। आँखें बाहर की ओर निकली हुई होती हैं और निमेषकपटल नामक एक विशेष झिल्ली से ढकी रहती हैं, ताकि पानी में डूबते समय भी आँखों की सुरक्षा बनी रहे। आँखों के दोनों ओर टिम्पैनम या कर्ण पटह मौजूद होते हैं, जो ध्वनि संकेतों को ग्रहण करने का काम करते हैं।

पाद और गमन

अग्र व पश्चपाद चलने, फिरने, टहलने तथा गड्ढा बनाने का काम करते हैं। अग्र पाद में चार अंगुलियाँ होती हैं, जबकि पश्चपाद में पाँच अंगुलियाँ पाई जाती हैं, और ये पश्चपाद तुलनात्मक रूप से लंबे व मांसल होते हैं। पश्च पाद की झिल्लीयुक्त अंगुली जल में तैरने में बेहद अहम भूमिका निभाती है।

लैंगिक द्विरूपता मेंढक में नर व मादा को बाहर से भी अलग पहचाना जा सकता है — इसे लैंगिक द्विरूपता कहा जाता है। नर मेंढक में आवाज़ उत्पन्न करने वाले वाक् कोष (वोकल सैक्स) पाए जाते हैं, और साथ ही अग्रपाद की पहली अंगुली में मैथुनांग भी होते हैं। ये दोनों विशेष अंग मादा मेंढक में नहीं मिलते।

4 पाचन तंत्र

आहार नाल तथा आहार ग्रंथियों का समन्वित काम

मेंढक की देह गुहा में पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, संचरण तंत्र तथा जनन तंत्र — सभी पूरी तरह से परिवर्धित संरचनाओं व कार्यों सहित मौजूद रहते हैं। मेंढक का पाचन तंत्र आहार नाल तथा आहार ग्रंथियों से मिलकर बना है। चूँकि मेंढक मांसाहारी है, इसलिए इसकी आहारनाल तुलनात्मक रूप से लंबाई में छोटी होती है।

इसका मुख, मुखगुहिका में खुलता है, जो ग्रसनी से होते हुए ग्रसिका तक जाती है। ग्रसिका असल में एक छोटी नली है जो आमाशय में खुलती है। आमाशय आगे चलकर आंत्र, मलाशय और अंत में अवस्कर (क्लोएका) द्वारा बाहर की ओर खुलता है।

भोजन का शिकार व पाचन की प्रक्रिया मेंढक अपनी द्विपालित जीभ की मदद से भोजन का शिकार पकड़ता है। यकृत पित्त रस स्रावित करता है, जो पित्ताशय में एकत्रित रहता है, जबकि अग्नाशय नामक पाचक ग्रंथि पाचक एंजाइम युक्त अग्नाशयी रस स्रावित करती है। भोजन का पाचन आमाशय की दीवारों से स्रावित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रसों से होता है। अर्ध-पाचित भोजन काइम कहलाता है, जो आमाशय से ग्रहणी में जाता है — वहाँ पित्तरस व अग्नाशयी रस मूल पित्त वाहिनी के ज़रिए मिलते हैं, जो वसा, कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन का पाचन करते हैं। पाचन की अंतिम प्रक्रिया आंत में होती है, जहाँ पाचित भोजन अंकुर व सूक्ष्माकुरों द्वारा अवशोषित हो जाता है, और अपाचित भोजन अवस्कर द्वार से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है।

5 श्वसन तंत्र

दो अलग-अलग माध्यमों से साँस लेने की अनोखी क्षमता

मेंढक जल व थल, दोनों स्थानों पर दो अलग-अलग विधियों से श्वसन कर सकता है। इसकी त्वचा एक जलीय श्वसनांग की तरह काम करती है, जिसे त्वचीय श्वसन कहा जाता है — यहाँ विसरण की प्रक्रिया से पानी में घुली ऑक्सीजन का आदान-प्रदान होता है। जल से बाहर होने पर मुख गुहा और फेफड़े वायवीय श्वसन अंगों का काम करते हैं, और फेफड़ों के ज़रिए होने वाले श्वसन को फुफ्फुसीय श्वसन कहा जाता है।

फेफड़े लंबी, अंडाकार, गुलाबी रंग की थैलीनुमा संरचनाएँ हैं, जो देहगुहा के वक्षीय भाग में पाई जाती हैं। हवा नासा छिद्रों से होकर मुख गुहा और फेफड़ों तक पहुँचती है। दिलचस्प बात यह है कि ग्रीष्म निष्क्रियता व शीत निष्क्रियता के दौरान, जब मेंढक ज़मीन के भीतर गहरे गड्ढों में छिपा रहता है, तब वह सिर्फ अपनी त्वचा के ज़रिए ही साँस लेता है।

6 परिसंचरण तंत्र

रुधिर व लसीका — दो तंत्रों का सुविकसित बंद तंत्र

मेंढक का परिसंचरण तंत्र पूरी तरह सुविकसित तथा बंद प्रकार का होता है, जिसमें लसीका परिसंचरण भी शामिल है — यानी यहाँ ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त हृदय में मिश्रित हो जाते हैं। रुधिर परिसंचरण तंत्र हृदय, रक्त वाहिकाओं तथा रुधिर से मिलकर बनता है, जबकि लसीका तंत्र लसीका, लसीका नलिकाओं व लसीका ग्रंथियों का बना होता है।

हृदय की बनावट

हृदय एक त्रिकोष्ठीय मांसल संरचना है, जो देह गुहा के ऊपरी भाग में स्थित है और एक पतली पारदर्शी झिल्ली — हृदय-आवरण (पेरीकार्डियम) — से ढकी रहती है। एक त्रिकोष्ठीय संरचना, जिसे शिराकोटर (साइनस वेनोसस) कहते हैं, हृदय के दाहिने अलिंद से जुड़ी रहती है और महाशिराओं से रक्त प्राप्त करती है। हृदय की अधर सतह पर दाएँ अलिंद के ऊपर एक थैलीनुमा रचना — धमनी शंकु — होती है, जिसमें निलय (वेंट्रिकल) खुलता है।

हृदय से रक्त धमनियों द्वारा शरीर के सभी भागों में भेजा जाता है, जिसे धमनी तंत्र कहा जाता है। दूसरी ओर शिराएँ शरीर के अलग-अलग भागों से रक्त एकत्रित कर वापस हृदय में पहुँचाती हैं, जिसे शिरा-तंत्र कहा जाता है। मेंढक में कुछ खास संयोजी शिराएँ भी होती हैं — यकृत तथा आँतों के मध्य पाई जाने वाली शिरा को यकृत निवाहिका तंत्र तथा वृक्क व शरीर के निचले भागों के मध्य पाई जाने वाली शिरा को वृक्कीय निवाहिका तंत्र कहते हैं।

रक्त की बनावट रक्त प्लैज्मा तथा रक्त-कणिकाओं से मिलकर बना है। रक्त कणिकाएँ तीन तरह की होती हैं — लाल रुधिर कणिकाएँ (रक्ताणु), श्वेत रुधिर कणिकाएँ (श्वेताणु) तथा पट्टिकाणु (प्लेटलेट)। लाल रुधिर कणिकाओं में लाल रंग का श्वसन रंजक हीमोग्लोबिन पाया जाता है, और इनमें केंद्रक भी मौजूद रहता है — यह मनुष्य की लाल रुधिर कणिकाओं से एक अहम अंतर है। लसीका, रुधिर से थोड़ा भिन्न होती है, क्योंकि इसमें कुछ प्रोटीन तथा लाल रुधिर कणिकाएँ अनुपस्थित रहती हैं। परिसंचरण के दौरान रक्त शरीर के हर हिस्से तक पोषकों, गैसों व जल को नियत स्थानों तक पहुँचाता है, और यह पूरी प्रक्रिया मांसल हृदय की पंपन क्रिया से संचालित होती है।

7 उत्सर्जी तंत्र

नाइट्रोजनी अपशिष्ट को शरीर से बाहर निकालने की व्यवस्था

नाइट्रोजनी अपशिष्ट को शरीर से बाहर निकालने के लिए मेंढक में एक पूर्ण विकसित उत्सर्जी तंत्र मौजूद होता है। उत्सर्जी अंगों में मुख्यतः एक जोड़ी वृक्क, मूत्रवाहिनी, अवस्कर द्वार तथा मूत्राशय शामिल हैं। ये वृक्क गहरे लाल रंग के, सेम के आकार के होते हैं और देहगुहा में केशेरुक दंड के दोनों ओर, थोड़ा पीछे की ओर स्थित रहते हैं।

हर वृक्क कई संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाइयों — मूत्रजन नलिकाओं या वृक्काणुओं — से मिलकर बना होता है। नर मेंढक में मूत्र नलिका वृक्क से मूत्र-जनन नलिका के रूप में बाहर आती है, और मूत्रवाहिनी अवस्कर द्वार में जाकर खुलती है। मादा मेंढक में मूत्रवाहिनी व अंडवाहिनी अवस्कर द्वार में अलग-अलग खुलती हैं। एक पतली दीवार वाला मूत्राशय भी मलाशय के अधर भाग पर स्थित होता है, जो अवस्कर में ही खुलता है।

यूरिया-उत्सर्जी प्राणी मेंढक यूरिया का उत्सर्जन करता है, इसलिए इसे यूरिया-उत्सर्जी प्राणी कहा जाता है। शरीर के उत्सर्जी अपशिष्ट रक्त के ज़रिए वृक्क में पहुँचते हैं, जहाँ इन्हें अलग किया जाता है और फिर उनका उत्सर्जन कर दिया जाता है।

8 तंत्रिका व अंतःस्रावी तंत्र

शरीर की गतिविधियों का नियंत्रण व समन्वय

नियंत्रण व समन्वय तंत्र मेंढक में पूरी तरह विकसित है, जिसमें अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (एंडोक्राइन सिस्टम) तथा तंत्रिका तंत्र — दोनों मौजूद हैं। विभिन्न अंगों में आपसी समन्वय कुछ खास रसायनों के ज़रिए होता है, जिन्हें हॉर्मोन कहा जाता है, और ये अंतःस्रावी ग्रंथियों से स्रावित होते हैं। मेंढक की मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथियाँ हैं — पीयूष (पिट्यूटरी), अवटु (थॉइरॉइड), परावटु (पैराथाइरॉइड), थाइमस, पीनियल काय, अग्नाशयी द्वीपिकाएँ, अधिवृक्क तथा जनद (गोनैड)।

तंत्रिका तंत्र की तीन शाखाएँ

तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क तथा मेरु रज्जु) तीन मुख्य भागों में बँटा होता है — केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, परिधीय तंत्रिका तंत्र (कपालीय व मेरु तंत्र), तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम), जो आगे अनुकंपी व परानुकंपी (सिंपेथेटिक व पैरासिंपेथिटिक) तंत्र में बँटता है। मस्तिष्क से कुल 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ निकलती हैं। मस्तिष्क, हड्डियों से बने मस्तिष्क बॉक्स अथवा कपाल के भीतर सुरक्षित रहता है।

मस्तिष्क तीन बड़े भागों में बँटा है — अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क तथा पश्च मस्तिष्क। अग्र मस्तिष्क में घ्राण पालियाँ, युग्मित प्रमस्तिष्क गोलार्ध तथा एक अग्रमस्तिष्क पश्च (डायएनसेफेलॉन) मौजूद रहते हैं। मध्य मस्तिष्क एक जोड़ा दृक पालियों से बना होता है। पश्च मस्तिष्क अनुमस्तिष्क तथा मेडूला ऑब्लांगेटा का बना होता है, और मेडूला ऑब्लांगेटा महारंध्र से निकलकर मेरुदंड में स्थित मेरुरज्जु से जुड़ा रहता है।

9 संवेदी अंग

स्पर्श, स्वाद, गंध, दृष्टि व श्रवण की व्यवस्था

मेंढक में कई तरह के संवेदी अंग पाए जाते हैं — स्पर्श अंग (संवेदी पिप्पल), स्वाद अंग (स्वाद कलिकाएँ), गंध (नासिका उपकला), दृष्टि (नेत्र) व श्रवण (कर्ण पटह और आंतरिक कर्ण)। इन सबमें आँखें और आंतरिक कर्ण सबसे सुव्यवस्थित होते हैं, जबकि बाकी संवेदी अंग अपेक्षाकृत सरल होते हैं — इनमें आमतौर पर सिर्फ तंत्रिका सिरों पर कोशिकाओं के गुच्छे मौजूद रहते हैं।

मेंढक में एक जोड़ी गोलाकार नेत्र होते हैं, जो नेत्र गड्ढों में स्थित रहते हैं — ये अपेक्षाकृत साधारण नेत्र होते हैं। मेंढक में बाह्य कर्ण अनुपस्थित होता है, केवल कर्णपट बाहर से दिखाई देता है। कर्ण एक ऐसा अंग है जो सुनने के साथ-साथ शरीर के संतुलन का काम भी करता है।

10 जनन तंत्र

नर व मादा में अलग-अलग सुव्यवस्थित जनन अंग

नर जनन तंत्र

नर जननांग एक जोड़ी पीले, अंडाकार वृषण होते हैं, जो वृक्क के ऊपरी भाग से पेरिटोनियम के दोहरीवलय — मेजोर्कियम नामक झिल्ली — द्वारा चिपके रहते हैं। शुक्र वाहिकाएँ संख्या में 10-12 होती हैं, जो वृषण से निकलने के बाद अपनी ओर के वृक्क में धँस जाती हैं। वृक्क में ये विडर नाल में खुलती हैं, जो अंत में मूत्रवाहिनी में खुलती है। इसके बाद मूत्रवाहिनी को मूत्र-जनन वाहिनी कहा जाता है, जो वृक्क से बाहर आकर अवस्कर में खुलती है। अवस्कर एक छोटा मध्यकक्ष होता है, जो उत्सर्जी पदार्थ, मूत्र तथा शुक्राणुओं — तीनों को बाहर भेजने का काम करता है।

मादा जनन तंत्र

मादा में वृक्क के पास एक जोड़ी अंडाशय मौजूद होते हैं, लेकिन इनका वृक्क से कोई क्रियात्मक संबंध नहीं होता। एक जोड़ी अंडवाहिनियाँ अवस्कर में अलग-अलग खुलती हैं। एक परिपक्व मादा एक बार में 2,500 से 3,000 अंडे दे सकती है। इनमें निषेचन बाह्य होता है, यानी अंडे शरीर के बाहर, पानी में निषेचित होते हैं। भ्रूण परिवर्धन लार्वा के माध्यम से होता है, और यह लार्वा टैडपोल कहलाता है।

11 मेंढक का पारिस्थितिक व आर्थिक महत्व

मेंढक मनुष्य के लिए एक लाभदायक प्राणी है। यह कीटों को खाता है और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से फसलों की रक्षा करने में मदद करता है। मेंढक पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण भोजन शृंखला की कड़ी होने के कारण वातावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। कुछ देशों में मांसल पाद मनुष्यों द्वारा भोजन के रूप में भी इस्तेमाल किए जाते हैं।

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय से NEET/AIPMT में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न (2006 से 2026 तक), वर्ष के संदर्भ व विकल्पों सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

1ReNEET 2026 मेंढक में मस्तिष्क से निकलने वाली कपाल तंत्रिकाओं की कुल जोड़ियों की संख्या कितनी है?
(अ) 12 (A)
(ब) 10 (B)
(स) 8 (C)
(द) 31 (D)

उत्तर: (ब) 10 जोड़ी।

मेंढक के मस्तिष्क से कुल 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ निकलती हैं — मनुष्य में यह संख्या 12 जोड़ी होती है, जो अक्सर भ्रामक विकल्प के रूप में दी जाती है। यह अंतर स्तनधारियों व उभयचरों की तंत्रिका तंत्र जटिलता के अंतर को भी दर्शाता है।

2NEET 2026 नर मेंढक को मादा मेंढक से किस लक्षण की उपस्थिति के आधार पर अलग पहचाना जा सकता है?
(अ) उभरी हुई आँखें (A)
(ब) स्वर-कोष (Vocal sacs) (B)
(स) पादों में जालयुक्त अंगुलियाँ (C)
(द) अग्रपाद की प्रथम अंगुली पर मैथुन पैड (Copulatory pad) (D)

उत्तर: (ब) व (द) दोनों — स्वर-कोष तथा अग्रपाद की प्रथम अंगुली पर मैथुन पैड, दोनों केवल नर मेंढक में पाए जाते हैं।

स्वर-कोष नर मेंढक को तेज़ आवाज़ निकालने में मदद करते हैं (प्रजनन काल में मादा को आकर्षित करने हेतु), जबकि मैथुन पैड (नुप्शियल पैड) संगम के दौरान मादा को कसकर पकड़ने में सहायक होता है। उभरी आँखें, जालयुक्त पाद व त्वचा का रंग — ये तीनों दोनों लिंगों में समान रूप से पाए जाते हैं, इसलिए लिंग-निर्धारण के लिए विश्वसनीय नहीं हैं।

3NEET 2026 मेंढक की शारीरिकी के संबंध में सही कथन चुनें — (क) यकृत-निवाहिका तंत्र यकृत व आंत्र के बीच का विशेष शिरा-संबंध है (ख) मस्तिष्क से 12 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ निकलती हैं (ग) मादा मेंढक में मूत्रवाहिनी व अंडवाहिनी अवस्कर में अलग-अलग खुलती हैं (घ) पश्च मस्तिष्क अनुमस्तिष्क, मेडुला ऑब्लांगेटा तथा दृक पालियों से बना है (च) साइनस वीनोसस हृदय के दायें अलिंद से जुड़ा रहता है।
(अ) (क), (ग) व (च) (A)
(ब) (ख), (घ) व (च) (B)
(स) (क), (ख) व (ग) (C)
(द) (ग), (घ) व (च) (D)

उत्तर: (अ) — (क), (ग) व (च) सही हैं।

यकृत-निवाहिका तंत्र सचमुच यकृत व आंत्र के बीच का विशेष शिरा-तंत्र है; मादा मेंढक में मूत्रवाहिनी व अंडवाहिनी वाकई अवस्कर में अलग-अलग खुलती हैं; तथा साइनस वीनोसस वास्तव में दायें अलिंद से जुड़ा रहता है। कथन (ख) गलत है — मेंढक में 12 नहीं, 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ होती हैं। कथन (घ) भी गलत है — दृक पालियाँ मध्य मस्तिष्क का भाग हैं, पश्च मस्तिष्क का नहीं।

4NEET 2024 (Re-Exam) हमारे शरीर में संधि (जंक्शन) के प्रकार व उनकी भूमिका के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(अ) दृढ़-संधि (Tight junction) पदार्थों को कोशिकाओं के बीच रिसने से रोकती है (A)
(ब) आसंजी-संधि (Adhering junction) पदार्थों के तीव्र परिवहन में मदद करती है (B)
(स) विवृत-संधि (Gap junction) कोशिकाओं को एक-दूसरे से जोड़े रखती है (C)
(द) दृढ़-संधि आयनों व छोटे अणुओं का सीधा आदान-प्रदान करती है (D)

उत्तर: (अ) — दृढ़-संधि पदार्थों को कोशिकाओं के बीच के स्थान से रिसने से रोकती है।

दृढ़-संधि पड़ोसी कोशिकाओं को इतनी कसकर जोड़ती है कि पदार्थ अंतरकोशिकीय स्थान से रिस नहीं पाते — यह ऊतक को एक अवरोधक (बैरियर) की तरह कार्य करने देता है। आसंजी-संधि वास्तव में कोशिकाओं को यांत्रिक रूप से सीमेंट की तरह जोड़े रखती है (परिवहन नहीं), जबकि विवृत-संधि (गैप जंक्शन) ही आयनों व छोटे अणुओं के तीव्र आदान-प्रदान का कार्य करती है।

5NEET 2024 (Re-Exam) निम्नलिखित में से किन संयोजी ऊतकों में कोशिकाएँ कोलेजन या इलास्टिन के तंतु स्रावित करती हैं — (क) उपास्थि (ख) अस्थि (ग) वसामय ऊतक (घ) रक्त (च) एरिओलर ऊतक?
(अ) केवल (क), (ख) व (च) (A)
(ब) (क), (ख), (ग) व (च) (B)
(स) केवल (ग) व (घ) (C)
(द) सभी पाँचों (D)

उत्तर: (अ) — केवल उपास्थि, अस्थि व एरिओलर ऊतक में कोशिकाएँ कोलेजन/इलास्टिन तंतु स्रावित करती हैं।

ये तीनों तंतुमय (फाइब्रस) संयोजी ऊतक की श्रेणी में आते हैं, जहाँ कोशिकाएँ (जैसे फाइब्रोब्लास्ट, ओस्टियोब्लास्ट) सक्रिय रूप से कोलेजन/इलास्टिन तंतु बनाती हैं। वसामय ऊतक मुख्यतः वसा-भंडारण के लिए विशिष्ट है (तंतु-स्राव नहीं), तथा रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है जिसमें कोई तंतु-स्रावी कोशिकाएँ नहीं होतीं।

6NEET 2023 दिए गए दो कथनों पर विचार करें — कथन-I: स्नायु (Ligaments) सघन अनियमित (dense irregular) ऊतक हैं। कथन-II: उपास्थि (Cartilage) सघन नियमित (dense regular) ऊतक है। सही उत्तर चुनें।
(अ) कथन-I व कथन-II दोनों सही हैं (A)
(ब) कथन-I सही है, कथन-II गलत है (B)
(स) कथन-I गलत है, कथन-II सही है (C)
(द) कथन-I व कथन-II दोनों गलत हैं (D)

उत्तर: (ब) — कथन-I सही है, किंतु कथन-II गलत है।

स्नायु (लिगामेंट) वास्तव में सघन अनियमित संयोजी ऊतक हैं। किंतु उपास्थि सघन नियमित ऊतक नहीं, बल्कि एक विशिष्ट (specialised) संयोजी ऊतक है, जिसमें कॉन्ड्रियोसाइट कोशिकाएँ काफी दूरी पर स्थित लघु गुहिकाओं (लैकुनी) में बंद रहती हैं — यह "सघन नियमित" श्रेणी से पूरी तरह अलग वर्गीकरण है।

7NEET 2022 Phase 2 निम्नलिखित में से सही कथन चुनें — (क) अस्थियाँ कोमल ऊतकों व अंगों को सहारा व सुरक्षा देती हैं (ख) भार वहन करने का कार्य पाद-अस्थियाँ करती हैं (ग) स्नायु रक्त-कणिकाओं के निर्माण का स्थल है (घ) वसामय ऊतक वसा संचय के लिए विशिष्ट है (च) कंडराएँ (Tendons) एक अस्थि को दूसरी अस्थि से जोड़ती हैं।
(अ) (क), (ख) व (घ) (A)
(ब) (ग), (घ) व (च) (B)
(स) (क), (ग) व (च) (C)
(द) (ख), (ग) व (घ) (D)

उत्तर: (अ) — (क), (ख) व (घ) सही हैं।

अस्थियाँ वास्तव में कोमल ऊतकों को सहारा व सुरक्षा देती हैं, पाद-अस्थियाँ शरीर का भार वहन करती हैं, तथा वसामय ऊतक वसा-संचय के लिए विशिष्ट है — ये तीनों सही हैं। कथन (ग) गलत है क्योंकि रक्त-कणिकाओं का निर्माण अस्थि मज्जा में होता है, स्नायु में नहीं। कथन (च) भी गलत है — कंडरा वास्तव में पेशी को अस्थि से जोड़ती है, अस्थि को अस्थि से नहीं (यह कार्य स्नायु/लिगामेंट का है)।

8NEET 2022 Phase 1 निम्नलिखित में से कौन-सा संयोजी ऊतक नहीं है?
(अ) उपास्थि (A)
(ब) रुधिर (B)
(स) एरिओलर ऊतक (C)
(द) पक्ष्माभी उपकला (D)

उत्तर: (द) पक्ष्माभी उपकला (Ciliated epithelium) — यह उपकला ऊतक (एपिथेलियल टिश्यू) है, संयोजी ऊतक नहीं।

उपास्थि, रुधिर व एरिओलर ऊतक — तीनों सच्चे संयोजी ऊतक हैं, भले ही इनकी बनावट व स्थिरता एक-दूसरे से बहुत अलग हो (रुधिर तरल है, उपास्थि दृढ़ है)। उपकला ऊतक शरीर की सतहों को ढकने या ग्रंथियाँ बनाने का कार्य करता है — यह ऊतकों की एक बिल्कुल अलग श्रेणी है।

9NEET 2021 उन कोशिका-संधियों (सेल जंक्शन) की पहचान करें, जो ऊतक में पदार्थों के रिसाव को रोकने तथा पड़ोसी कोशिकाओं के बीच आयनों व अणुओं के तीव्र स्थानांतरण द्वारा संचार सुगम बनाने — दोनों कार्यों में सहायक हों।
(अ) दृढ़-संधि व आसंजी-संधि (A)
(ब) दृढ़-संधि व विवृत-संधि (B)
(स) आसंजी-संधि व विवृत-संधि (C)
(द) केवल दृढ़-संधि (D)

उत्तर: (ब) दृढ़-संधि (रिसाव रोकने हेतु) तथा विवृत-संधि (संचार हेतु)।

दृढ़-संधि पदार्थों को कोशिकाओं के बीच से रिसने से रोकती है, जबकि विवृत-संधि (गैप जंक्शन) पड़ोसी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य को सीधे जोड़कर आयनों, छोटे व कुछ बड़े अणुओं का तीव्र स्थानांतरण संभव बनाती है — यह प्रश्न में पूछे गए दोनों कार्यों को अलग-अलग संधियाँ पूरा करती हैं। आसंजी-संधि केवल कोशिकाओं को यांत्रिक रूप से जोड़े रखने का कार्य करती है।

10NEET 2020 Phase 1 सूक्ष्मांकुर कूट-सीमा (brush border of microvilli) युक्त घनाकार उपकला (cuboidal epithelium) कहाँ पाई जाती है?
(अ) वृक्क की समीपस्थ संवलित नलिका (A)
(ब) फुफ्फुसकोष्ठिका की भित्ति (B)
(स) वृषण की शुक्रजनक नलिकाएँ (C)
(द) रक्त वाहिकाओं की भित्ति (D)

उत्तर: (अ) वृक्क की समीपस्थ संवलित नलिका (proximal convoluted tubule)।

यहाँ घनाकार उपकला की सतह पर सूक्ष्मांकुर (माइक्रोविली) मौजूद रहते हैं, जो अवशोषण-क्षेत्र (सतह क्षेत्रफल) को कई गुना बढ़ा देते हैं — यह वृक्क की पुनरावशोषण-क्षमता के लिए बेहद ज़रूरी है, क्योंकि यहीं से छनित द्रव में से अधिकांश उपयोगी पदार्थ पुनः रक्त में अवशोषित होते हैं।

11NEET 2019 मनुष्यों में कण या श्लेष्म को एक निश्चित दिशा में गति देने के लिए पक्ष्माभी उपकला कोशिकाएँ मुख्यतः कहाँ पाई जाती हैं?
(अ) आमाशय व यकृत में (A)
(ब) श्वसनी (ब्रोंकिओल) व अंडवाहिनी (फैलोपियन नलिका) में (B)
(स) त्वचा व वृक्क में (C)
(द) हृदय व मस्तिष्क में (D)

उत्तर: (ब) श्वसनी (bronchiole) व अंडवाहिनी (fallopian tube) में।

श्वसनी में पक्ष्माभी उपकला धूल-कणों व श्लेष्म को ऊपर (गले की ओर) धकेलती है, जबकि अंडवाहिनी में यही उपकला अंडाणु को गर्भाशय की ओर गति देने में मदद करती है — दोनों स्थानों पर पक्ष्माभ (सिलिया) की लयबद्ध गति ही इस दिशात्मक परिवहन का आधार है।

12NEET 2017 मेंढक का हृदय शरीर से बाहर निकालने पर भी कुछ समय तक धड़कता रहता है। निम्नलिखित कथनों में से सर्वोत्तम विकल्प चुनें — (क) मेंढक असमतापी (poikilotherm) है (ख) मेंढक में कोई कोरोनरी परिसंचरण नहीं होता (ग) हृदय "मायोजेनिक" प्रकृति का है (घ) हृदय स्व-उद्दीपक (autoexcitable) है।
(अ) (क) व (ग) (A)
(ब) केवल (ग) (B)
(स) (क) व (ख) (C)
(द) (ग) व (घ) (D)

उत्तर: (द) — (ग) व (घ) सही व्याख्या हैं।

मेंढक (व मनुष्य) का हृदय मायोजेनिक होता है, यानी धड़कन की उत्पत्ति तंत्रिका तंत्र से नहीं, बल्कि हृदय की अपनी विशेष पेशी (SA नोड जैसी संरचना) से होती है — यही इसे स्व-उद्दीपक (autoexcitable) बनाता है। इसीलिए शरीर से अलग करने के बाद भी उपयुक्त परिस्थितियों में हृदय कुछ समय तक धड़कता रह सकता है। असमतापी प्रकृति व कोरोनरी परिसंचरण की अनुपस्थिति — ये दोनों तथ्य सही तो हैं, पर हृदय के मायोजेनिक धड़कते रहने का सीधा कारण नहीं हैं।

13AIPMT 2015 विवृत-संधि (Gap junction) का कार्य क्या है?
(अ) कोशिकाद्रव्य को तेज़ी से जोड़कर पड़ोसी कोशिकाओं के बीच संचार सुगम बनाना (A)
(ब) आयनों, छोटे अणुओं व कुछ बड़े अणुओं की गति (B)
(स) आसन्न कोशिकाओं को जोड़ने हेतु सीमेंटीकरण करना (C)
(द) उपर्युक्त सभी (D)

उत्तर: (द) उपर्युक्त सभी — विवृत-संधि (गैप जंक्शन) पड़ोसी कोशिकाओं के बीच कोशिकाद्रव्य को जोड़कर आयनों, छोटे व कुछ बड़े अणुओं का तीव्र व सीधा स्थानांतरण संभव बनाती है।

यह किसी ऊतक में तेज़, समन्वित संचार (जैसे हृदय पेशी में विद्युत संकेतों का प्रसार) के लिए अनिवार्य है। ध्यान रहे — सीमेंटीकरण/यांत्रिक जुड़ाव का कार्य वास्तव में आसंजी-संधि करती है, विवृत-संधि नहीं; यह भ्रामक विकल्पों में एक सामान्य ट्रैप है।

14AIPMT 2012 Prelims मनुष्य की तुलना में मेंढक की लाल रुधिर कणिकाएँ (एरिथ्रोसाइट) कैसी होती हैं?
(अ) केंद्रक-रहित व छोटी (A)
(ब) केंद्रकयुक्त व बड़ी (B)
(स) केंद्रक-रहित व बड़ी (C)
(द) केंद्रकयुक्त व छोटी (D)

उत्तर: (ब) केंद्रकयुक्त (nucleated) व आकार में बड़ी।

मनुष्य (व अधिकांश स्तनधारियों) की लाल रुधिर कणिकाएँ परिपक्व होने पर केंद्रक खो देती हैं तथा आकार में अपेक्षाकृत छोटी होती हैं। इसके विपरीत मेंढक की लाल रुधिर कणिकाओं में केंद्रक जीवनभर बना रहता है, और ये आकार में मनुष्य की तुलना में स्पष्ट रूप से बड़ी होती हैं — यह अंतर कशेरुकी वर्गों की तुलना में बार-बार पूछा जाता है।

15AIPMT 2011 Mains मेंढक मनुष्य से किस लक्षण की उपस्थिति में भिन्न होते हैं?
(अ) केंद्रकयुक्त लाल रुधिर कणिकाएँ (A)
(ब) चतुष्कक्षीय हृदय (B)
(स) फुफ्फुसीय श्वसन (C)
(द) समतापी शरीर (D)

उत्तर: (अ) केंद्रकयुक्त लाल रुधिर कणिकाएँ।

मनुष्य की परिपक्व लाल रुधिर कणिकाओं में केंद्रक नहीं होता, जबकि मेंढक की लाल रुधिर कणिकाओं में केंद्रक जीवनभर बना रहता है — यही सबसे स्पष्ट व बार-बार पूछा जाने वाला अंतर है। मेंढक का हृदय त्रिकक्षीय होता है (चतुष्कक्षीय नहीं) तथा यह असमतापी होता है, समतापी नहीं — ये दोनों भी मनुष्य से भिन्नता के अन्य बिंदु हैं, पर यहाँ प्रश्न में पूछा गया मुख्य अंतर RBC से जुड़ा है।

16AIPMT 2011 Prelims मनुष्यों में पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला (ciliated columnar epithelium) कोशिकाएँ कहाँ पाई जाती हैं?
(अ) आमाशय की भित्ति में (A)
(ब) श्वसनी व अंडवाहिनी में (B)
(स) त्वचा की बाह्य परत में (C)
(द) यकृत की कोशिकाओं में (D)

उत्तर: (ब) श्वसनी (bronchiole) व अंडवाहिनी (fallopian tube) में।

यह प्रश्न NEET 2019 में भी लगभग इसी रूप में दोहराया जा चुका है — पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला की सिलिया की लयबद्ध गति श्वसनी में धूल-कण व श्लेष्म को तथा अंडवाहिनी में अंडाणु को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ाती है।

17AIPMT 2010 Prelims रक्त वाहिकाओं की भीतरी सतह पर आस्तरण करने वाली कोशिकाएँ किस श्रेणी में आती हैं?
(अ) संयोजी ऊतक (A)
(ब) शल्की (Squamous) उपकला ऊतक (B)
(स) पेशीय ऊतक (C)
(द) तंत्रिका ऊतक (D)

उत्तर: (ब) शल्की उपकला ऊतक (Squamous epithelium)।

रक्त वाहिकाओं (व हृदय के कक्षों) की भीतरी सतह चपटी, पतली शल्की उपकला कोशिकाओं से बनी होती है, जिसे विशेष रूप से एंडोथीलियम कहा जाता है — यह चिकनी, कम-घर्षण वाली सतह रक्त के सुगम प्रवाह में मदद करती है।

18AIPMT 2009 श्वसनी (ब्रोंकिओल) व अंडवाहिनी (फैलोपियन नलिका) की भीतरी सतह पर कौन-सा उपकला ऊतक मौजूद है?
(अ) शल्की उपकला (A)
(ब) घनाकार उपकला (B)
(स) पक्ष्माभी उपकला (C)
(द) संयुक्त उपकला (D)

उत्तर: (स) पक्ष्माभी उपकला (Ciliated epithelium)।

यह इस अध्याय में सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला तथ्य है — पक्ष्माभी उपकला की सिलिया की समकालिक गति ही श्वसनी में धूल-कण व अंडवाहिनी में अंडाणु को एक तयशुदा दिशा में आगे बढ़ाती है।

19AIPMT 2006 मास्ट कोशिकाएँ (Mast cells) क्या स्रावित करती हैं?
(अ) इंसुलिन व ग्लूकागॉन (A)
(ब) हिस्टामिन व हिपैरिन (B)
(स) एड्रीनलिन व नॉरएड्रीनलिन (C)
(द) कोलेजन व इलास्टिन (D)

उत्तर: (ब) हिस्टामिन व हिपैरिन।

मास्ट कोशिकाएँ एरिओलर (ढीले) संयोजी ऊतक में पाई जाती हैं तथा हिस्टामिन (जो एलर्जी व शोथ-प्रतिक्रिया में भूमिका निभाता है) व हिपैरिन (एक थक्कारोधी पदार्थ) स्रावित करती हैं — ये दोनों प्रतिरक्षा व रक्त-स्कंदन नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

महत्वपूर्ण
  • तीन कोशिका-संधियों को कभी न उलझाएँ — दृढ़-संधि (Tight junction): रिसाव रोकती है; आसंजी-संधि (Adhering junction): कोशिकाओं को यांत्रिक रूप से सीमेंट की तरह जोड़ती है; विवृत-संधि (Gap junction): आयनों व अणुओं के तीव्र आदान-प्रदान द्वारा संचार करती है। NEET में तीनों की भूमिका आपस में बदलकर पूछी जाती है।
तुलनात्मक
  • मेंढक बनाम मनुष्य के प्रमुख अंतर — मेंढक की RBC केंद्रकयुक्त व बड़ी होती है (मनुष्य की केंद्रक-रहित व छोटी); मेंढक का हृदय त्रिकक्षीय होता है (मनुष्य का चतुष्कक्षीय); मेंढक असमतापी है (मनुष्य समतापी); तथा मेंढक में कपाल तंत्रिकाओं की 10 जोड़ी होती हैं (मनुष्य में 12 जोड़ी)। यह चारों तुलनाएँ NEET में बार-बार दोहराई जाती हैं।
तथ्य
  • पक्ष्माभी उपकला का पता स्थान से लगाएँ — जहाँ भी "श्वसनी (bronchiole)" या "अंडवाहिनी (fallopian tube)" शब्द दिखे, समझ जाएँ कि वहाँ पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला है। यह अकेला तथ्य 2009, 2011 व 2019 में कम-से-कम तीन बार लगभग समान रूप में पूछा जा चुका है।
तुलनात्मक
  • स्नायु (Ligament) बनाम कंडरा (Tendon) — स्नायु एक अस्थि को दूसरी अस्थि से जोड़ता है और सघन अनियमित संयोजी ऊतक से बना है; कंडरा पेशी को अस्थि से जोड़ता है और सघन नियमित संयोजी ऊतक से बना है। "कंडरा अस्थि को अस्थि से जोड़ता है" जैसा कथन हमेशा गलत होता है — यह स्नायु का कार्य है।
तथ्य
  • हृदय की मायोजेनिक प्रकृति — मेंढक व मनुष्य, दोनों का हृदय मायोजेनिक व स्व-उद्दीपक (autoexcitable) होता है, यानी धड़कन शुरू करने का संकेत हृदय की अपनी विशेष पेशी-कोशिकाओं से ही उत्पन्न होता है, तंत्रिका तंत्र से नहीं — इसीलिए शरीर से बाहर निकालने पर भी उपयुक्त परिस्थिति में हृदय कुछ समय तक धड़कता रह सकता है।
रणनीति
  • NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय (उपकला/संयोजी ऊतक + मेंढक शारीरिकी) से प्रतिवर्ष औसतन 2–4 प्रश्न आते हैं, जिनमें कोशिका-संधियों के प्रकार, उपकला ऊतक का स्थान-आधारित मिलान, तथा मेंढक व मनुष्य के तुलनात्मक लक्षण सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले उप-विषय रहे हैं — हाल के वर्षों (2023-2026) में बहु-कथन (statement-based) प्रश्नों की प्रवृत्ति भी तेज़ी से बढ़ी है।

संक्षिप्त सार

संगठन का क्रम

कोशिका, ऊतक, अंग और अंग तंत्र कार्य को इस तरह बाँट लेते हैं कि शरीर का बना रहना सुनिश्चित रहे। कोशिकाओं का समूह जो अंतरकोशीय पदार्थों से बना हो और एक या अधिक कार्य करे, ऊतक कहलाता है।

मेंढक — बाह्य आकारिकी

भारतीय बुलफ्रॉग राना टिग्रीना का शरीर सिर व धड़ में विभक्त रहता है, त्वचा से ढका होता है, जो श्वसन में सहायता करती है। द्विपालित जिह्वा शिकार पकड़ने में मदद करती है।

आंतरिक तंत्र

पाचन तंत्र आहारनाल व ग्रंथियों का बना है जो अवस्कर द्वारा खुलता है। श्वसन जल में त्वचा द्वारा तथा थल पर फेफड़ों द्वारा होता है। परिसंचरण तंत्र बंद व एकल प्रकार का है।

उत्सर्जन व जनन

मेंढक यूरिया-उत्सर्जी प्राणी है। नर में एक जोड़ी वृषण व मादा में एक जोड़ी अंडाशय होते हैं। मादा एक बार में 2500-3000 अंडे देती है, निषेचन बाह्य होता है, और लार्वा (टैडपोल) से कायांतरण द्वारा वयस्क मेंढक बनता है।

? प्रश्न-उत्तर

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प्रश्न 1 मेंढक के पाचन तंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर

यह एक व्यावहारिक (प्रायोगिक) प्रश्न है, जिसमें मेंढक की देहगुहा को खोलकर पाचन तंत्र के अंगों को क्रमवार दिखाना होता है। चित्र में निम्नलिखित भागों को स्पष्ट रूप से नामांकित किया जाना चाहिए, उसी क्रम में जिस क्रम में भोजन उनसे होकर गुज़रता है:

मुख → मुखगुहिका → ग्रसनी → ग्रसिका → आमाशय → आंत्र (ग्रहणी सहित) → मलाशय → अवस्कर।

इसके साथ ही दो सहायक पाचन ग्रंथियाँ — यकृत (जिससे पित्ताशय जुड़ा रहता है) तथा अग्नाशय (जो मूल पित्त वाहिनी के ज़रिए ग्रहणी से जुड़ा रहता है) — को भी उचित स्थान पर दिखाना चाहिए। साथ ही हृदय व फेफड़ों जैसे आसपास के अंगों को भी संदर्भ के लिए हल्के से चिह्नित किया जा सकता है, क्योंकि ये देहगुहा में पाचन तंत्र के पास ही स्थित होते हैं।

प्रश्न 2 निम्न के कार्य बताइए:
उत्तर

(अ) मेंढक की मूत्रवाहिनी: मूत्रवाहिनी वृक्क में बने मूत्र (उत्सर्जी अपशिष्ट सहित) को वृक्क से अवस्कर तक ले जाने का काम करती है। नर मेंढक में यह मूत्र-जनन वाहिनी के रूप में कार्य करती है, यानी यह मूत्र के साथ-साथ शुक्राणुओं का परिवहन भी करती है, जबकि मादा मेंढक में यह केवल मूत्र का परिवहन करती है और अवस्कर द्वार में अंडवाहिनी से अलग खुलती है।

(ब) मैलपिगी नलिका: मैलपिगी नलिका आर्थ्रोपोडा (जैसे कीट) के उत्सर्जी अंग हैं, जो शरीर के गुहा-द्रव (हीमोलिम्फ) से नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों (मुख्यतः यूरिक अम्ल के रूप में) को छानकर आहार नाल में डालती हैं, जहाँ से वे मल के साथ शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं। ये जल के संरक्षण में भी सहायक होती हैं, जिससे स्थलीय आर्थ्रोपोड कम पानी वाले वातावरण में भी जीवित रह पाते हैं।

(स) केंचुए की देहभित्ति: केंचुए की देहभित्ति कई महत्वपूर्ण कार्य करती है — यह शरीर को बाहरी चोट व नुकसान से बचाती है, इसकी नम व श्लेष्म-युक्त सतह त्वचीय श्वसन (गैसों के आदान-प्रदान) में सहायक होती है, तथा इसमें मौजूद अनुदैर्घ्य व वृत्ताकार पेशियाँ मिलकर केंचुए को रेंगने व मिट्टी में गति करने में मदद करती हैं।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री प्राणियों में संरचनात्मक संगठन — अंग व अंगतंत्र स्तर से लेकर मेंढक की संपूर्ण आकारिकी व शारीरिकी — को मौलिक व सरल भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें तुलनात्मक कार्ड तथा प्रश्नोत्तर शामिल हैं।

एक अकेली कोशिका से जटिल अंगतंत्र तक — यही जीवन के संगठन की सबसे खूबसूरत कहानी है।

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