पुष्पी पादपों का शारीर — विस्तृत अध्ययन सामग्री
वनस्पति विज्ञान • भीतरी संरचनात्मक अध्ययन

पुष्पी पादपों का शारीर

बाहर से एक जैसी दिखने वाली दो जड़ें भीतर से पूरी तरह अलग हो सकती हैं। इस अध्याय में हम पौधे की त्वचा के नीचे झाँककर देखेंगे कि कोशिकाएँ किस तरह ऊतकों में और ऊतक किस तरह पूरे तंत्रों में संगठित होते हैं, और कैसे एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री पौधों की भीतरी बनावट एक-दूसरे से अलग होती है।

भूमिका पौधों की भीतरी संरचना को समझना

अगर आप बड़े जीव-जंतुओं और पौधों को सिर्फ बाहर से देखें, तो उनकी बाहरी बनावट में ज़मीन-आसमान का फर्क महसूस होता है। लेकिन जैसे ही हम उनकी भीतरी रचना का अध्ययन शुरू करते हैं, कई ऐसी समानताएँ और भिन्नताएँ सामने आती हैं जो बाहर से बिल्कुल नज़र नहीं आतीं। पौधों की इसी भीतरी संरचना के अध्ययन को शारीर (एनाटॉमी) कहा जाता है।

संगठन का क्रम पौधों में कोशिका सबसे बुनियादी इकाई है। ये कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं, और ऊतक मिलकर ऊतक अंग बनाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि पौधे के अलग-अलग हिस्सों — जड़, तना, पत्ती — की भीतरी बनावट में भी काफी अंतर होता है, और यहाँ तक कि एंजियोस्पर्म के भीतर ही एकबीजपत्री पौधों का शारीर द्विबीजपत्री पौधों से काफी अलग होता है। यह भीतरी संरचना अक्सर उस पौधे के पर्यावरण के प्रति ढल जाने (अनुकूलन) को भी दर्शाती है।

1 ऊतक तंत्र

पौधे में स्थान के अनुसार बदलती ऊतकों की रचना व कार्य

अब तक हम विभिन्न प्रकार के ऊतकों और उनमें मौजूद कोशिकाओं के प्रकार पर चर्चा करते आए हैं। अब हम यह देखेंगे कि पौधे के अलग-अलग हिस्सों में स्थित ऊतक एक-दूसरे से किस तरह भिन्न होते हैं — उनकी रचना और कार्य दोनों ही उनकी स्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। रचना व स्थिति के आधार पर ऊतक तंत्र को तीन प्रकारों में बाँटा गया है: बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र, भरण (मौलिक) ऊतक तंत्र, तथा संवहनी ऊतक तंत्र

बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र

बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र पौधे का सबसे बाहरी आवरण है। इसके अंतर्गत बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ, रंध्र, तथा बाह्यत्वचीय उपांग (जैसे मूलरोम) आते हैं। बाह्यत्वचा पौधे के हर भाग की सबसे बाहरी परत है — इसकी कोशिकाएँ लंबी होती हैं और एक-दूसरे से बेहद सटी रहती हैं, जिससे एक अखंड, अटूट सतह बनती है। ये कोशिकाएँ पैरेंकाइमी होती हैं, जिनमें कोशिकाद्रव्य बेहद कम मात्रा में होता है और वह कोशिका भित्ति के साथ ही लगा रहता है, जबकि बीच में एक बड़ी रसधानी होती है।

क्यूटिकल — पानी बचाने वाला कवच बाह्यत्वचा की सबसे ऊपरी सतह मोम की एक मोटी परत — क्यूटिकल — से ढकी रहती है, जो पौधे से अनावश्यक जल-हानि को रोकती है। दिलचस्प बात यह है कि जड़ में क्यूटिकल बिल्कुल नहीं पाई जाती, क्योंकि वहाँ पानी सोखना ही मुख्य काम है, रोकना नहीं।

रंध्री तंत्र

रंध्र वे विशेष रचनाएँ हैं जो पत्तियों की बाह्यत्वचा पर पाई जाती हैं और वाष्पोत्सर्जन (जल का भाप बनकर उड़ना) तथा गैसों के आदान-प्रदान को नियंत्रित करती हैं। हर रंध्र के इर्द-गिर्द सेम के आकार की दो विशेष कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें द्वार कोशिकाएँ कहा जाता है (घास में ये डंबल के आकार की होती हैं)। द्वार कोशिका की बाहरी भित्ति पतली और भीतरी भित्ति मोटी होती है — इसी में क्लोरोप्लास्ट भी मौजूद होते हैं, जो रंध्र के खुलने-बंद होने के क्रम को नियंत्रित करते हैं।

कई बार रंध्र के आसपास मौजूद कुछ बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ अपनी आकृति, माप व पदार्थों में विशेष हो जाती हैं — इन्हें सहायक कोशिकाएँ कहा जाता है। रंध्रीय छिद्र, द्वार कोशिका तथा सहायक कोशिकाएँ मिलकर पूरा रंध्री तंत्र बनाती हैं।

बाह्यत्वचा की कोशिकाओं पर कई तरह के रोम भी पाए जाते हैं। जड़ में मिलने वाले रोम मूलरोम कहलाते हैं, जो असल में बाह्यत्वचा की ही एक कोशिका के लंबे होकर बन जाने का नतीजा हैं और जल व खनिज तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं। इसके विपरीत तने पर मिलने वाले बाह्यत्वचीय रोम त्वचारोम (ट्राइकोम्स) कहलाते हैं — प्रोरोह तंत्र में ये बहुकोशिकीय होते हैं, शाखित या अशाखित तथा कोमल या नरम हो सकते हैं, कुछ स्रावी भी होते हैं, और वाष्पोत्सर्जन से होने वाली जल-हानि को रोकने में मदद करते हैं।

भरण ऊतक तंत्र

बाह्यत्वचा तथा संवहन बंडल को छोड़कर पौधे के बाकी सभी ऊतक भरण ऊतक कहलाते हैं। इसमें पैरेंकाइमा, कॉलेंकाइमा तथा स्केलेरेंकाइमा जैसे सरल ऊतक शामिल होते हैं। प्राथमिक तने में पैरेंकाइमी कोशिकाएँ आमतौर पर वल्कुट (कॉर्टेक्स), परिरंभ, पिथ तथा मज्जाकिरण में पाई जाती हैं। पत्तियों में यह भरण ऊतक पतली भित्ति वाला व क्लोरोप्लास्ट युक्त होता है, जिसे पर्णमध्योतक (मेजोफिल) कहा जाता है।

संवहनी ऊतक तंत्र

संवहनी तंत्र में जटिल ऊतक — जाइलम तथा फ्लोएम — शामिल होते हैं। ये दोनों मिलकर संवहन बंडल बनाते हैं। द्विबीजपत्री पौधों में जाइलम व फ्लोएम के बीच कैंबियम मौजूद होता है। ऐसे संवहनी बंडल जिनमें कैंबियम होता है और जो लगातार द्वितीयक जाइलम व फ्लोएम बनाते रहते हैं, उन्हें खुला संवहन बंडल कहा जाता है। इसके विपरीत एकबीजपत्री पौधों में कैंबियम नहीं होता, इसलिए वे द्वितीयक ऊतक नहीं बना पाते — इसीलिए उन्हें बंद संवहन बंडल कहते हैं।

प्रकारजाइलम व फ्लोएम की व्यवस्थाउदाहरण
अरीयदोनों एकांतर तरीके से भिन्न त्रिज्या पर स्थितमूल
संयुक्तदोनों एक ही त्रिज्या पर स्थित; फ्लोएम प्रायः जाइलम के बाहरतना व पत्तियाँ

2 द्विबीजपत्री तथा एकबीजपत्री पादपों का शारीर

मूल, तने व पत्तियों की परिपक्व अनुप्रस्थ काट का तुलनात्मक अध्ययन

मूल, तने तथा पत्तियों में ऊतक की संरचना को भलीभाँति समझने के लिए पौधे के इन भागों की परिपक्व अनुप्रस्थ काट (क्रॉस-सेक्शन) का अध्ययन करना ज़रूरी होता है। आइए अब बारी-बारी से हर भाग को देखें।

द्विबीजपत्री मूल

सबसे बाहरी परत मूलीय त्वचा है, जिसमें नलिकाकार सजीव कोशिकाएँ होती हैं और इनमें से कुछ बाहर की ओर निकलकर मूल रोम बनाती हैं। इसके ठीक भीतर वल्कुट होता है, जो पतली भित्ति वाली पैरेंकाइमी कोशिकाओं की कई परतों से बना होता है, जिनके बीच अंतराकोशिकीय स्थान भी मौजूद रहते हैं। वल्कुट की सबसे भीतरी परत अंतस्त्वचा कहलाती है — इसकी कोशिकाओं की स्पर्श रेखीय व अरीय भित्तियों पर कैस्पेरियन पट्टियाँ नामक जल-अपारगम्य, मोमी सूवेरिन की पट्टियाँ मौजूद होती हैं।

अंतस्त्वचा के भीतर मोटी भित्ति वाली पैरेंकाइमी कोशिकाओं की एक परत होती है जिसे परिरंभ कहा जाता है — यही परत द्वितीयक वृद्धि के दौरान संवहन कैंबियम व पार्श्वीय मूल को जन्म देती है। पिथ अक्सर छोटा या अस्पष्ट रहता है। जाइलम-फ्लोएम बंडलों के बीच मौजूद पैरेंकाइमी कोशिकाओं को कंजकटिव ऊतक कहते हैं, और आमतौर पर दो से चार तक जाइलम-फ्लोएम खंड होते हैं। बाद में इनके बीच एक कैंबियम छल्ला बनता है, और अंतस्त्वचा के भीतर सारे ऊतक मिलकर रंभ (स्टेल) कहलाते हैं।

एकबीजपत्री मूल

एकबीजपत्री मूल का शारीर काफी हद तक द्विबीजपत्री मूल जैसा ही होता है — इसमें भी बाह्यत्वचा, वल्कुट, अंतस्त्वचा, परिरंभ, संवहन बंडल तथा पिथ मौजूद रहते हैं। मुख्य अंतर यह है कि एकबीजपत्री मूल में जाइलम-फ्लोएम बंडलों की संख्या आमतौर पर छह से भी अधिक होती है (बहु-आदिदारुक), जबकि द्विबीजपत्री मूल में इनकी संख्या काफी कम होती है।

इसके अलावा एकबीजपत्री मूल में पिथ बड़ा तथा बहुत विकसित होता है, और सबसे अहम बात — इसमें कैंबियम नहीं होता। यही कारण है कि एकबीजपत्री मूल में द्वितीयक वृद्धि कभी नहीं होती।

द्विबीजपत्री तना

सबसे बाहरी रक्षी सतह बाह्यत्वचा होती है, जो पतली क्यूटिकल परत से ढकी रहती है और जिस पर कुछ बहुकोशिकीय त्वचारोम व रंध्र भी मौजूद रहते हैं। बाह्यत्वचा व परिरंभ के बीच कई परतों वाला वल्कुट होता है, जिसके तीन भाग होते हैं — बाहरी अधस्त्वचा (हाइपोडर्मिस), जो कॉलेंकाइमा कोशिकाओं से बनी होकर शैशव तने को यांत्रिक सहारा देती है; इसके नीचे गोलाकार पतली भित्ति वाली पैरेंकाइमा कोशिकाओं की परतें; और सबसे भीतर अंतस्त्वचा, जिसकी कोशिकाओं में स्टार्च प्रचुर मात्रा में होता है (इसलिए इसे स्टार्च आच्छद भी कहते हैं)।

परिरंभ अंतस्त्वचा के नीचे व फ्लोएम के ऊपर स्थित होता है, जिसमें स्केलेरेंकाइमा कोशिकाएँ अर्द्धचंद्राकार समूहों में मिलती हैं। द्विबीजपत्री तने की खास पहचान यह है कि इसके बहुसंख्य संवहन बंडल एक ही छल्ले में व्यवस्थित रहते हैं — हर बंडल संयुक्त, मध्यादिदारुक तथा खुला होता है। तने के बीचोंबीच पिथ स्थित होता है, जिसमें गोलाकार पैरेंकाइमी कोशिकाएँ पाई जाती हैं।

एकबीजपत्री तना

एकबीजपत्री तने की भीतरी बनावट द्विबीजपत्री तने से कुछ अलग है, हालाँकि ऊतकों के व्यवस्थित रहने के क्रम में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। एकबीजपत्री तने की बाह्यत्वचा पर त्वचारोम नहीं होते, और इसकी अधस्त्वचा स्केलेरेंकाइमा कोशिकाओं की बनी होती है।

वल्कुट में कई सतहें होती हैं, जिनमें बहुत सारे बिखरे हुए संवहन बंडल पाए जाते हैं, और हर बंडल के चारों ओर स्केलेरेंकाइमी आच्छद मौजूद रहता है। संवहन बंडल संयुक्त तथा बंद प्रकार के होते हैं। बाहरी (परिधीय) संवहन बंडल आमतौर पर छोटे तथा केंद्र वाले बड़े होते हैं। एक खास बात यह भी है कि इन बंडलों में फ्लोएम पैरेंकाइमा नहीं मिलता, बल्कि इसकी जगह जल रखने वाली गुहिकाएँ पाई जाती हैं।

पृष्ठाधार (द्विबीजपत्री) पत्ती

पृष्ठाधार पत्ती के फलक की लंबवत काट में तीन प्रमुख भाग दिखाई देते हैं — बाह्यत्वचा, पर्णमध्योतक तथा संवहन तंत्र। ऊपरी सतह (अभ्यक्ष बाह्यत्वचा) तथा निचली सतह (अपाक्ष बाह्यत्वचा), दोनों पर क्यूटिकल पाई जाती है, लेकिन निचली बाह्यत्वचा पर रंध्र ऊपरी सतह से कहीं ज़्यादा संख्या में मिलते हैं — ऊपरी सतह पर रंध्र नहीं भी हो सकते।

ऊपरी व निचली बाह्यत्वचा के बीच स्थित सारा ऊतक पर्णमध्योतक कहलाता है, जो पैरेंकाइमा कोशिकाओं से बना होता है और इसमें क्लोरोप्लास्ट मौजूद रहता है (यही प्रकाश-संश्लेषण करता है)। इसमें दो तरह की कोशिकाएँ पाई जाती हैं — खंभ पैरेंकाइमा, जो ऊपरी बाह्यत्वचा के ठीक नीचे लंबी, लंबवत समानांतर कोशिकाओं के रूप में होती हैं, तथा स्पंजी पैरेंकाइमा, जो खंभ कोशिकाओं के नीचे निचली बाह्यत्वचा तक फैली रहती हैं और आकार में अंडाकार या गोल होती हैं, जिनके बीच खाली स्थान व वायु-गुहिकाएँ पाई जाती हैं।

संवहन तंत्र में मौजूद संवहन बंडल संयुक्त, बहिःफ्लोएमी तथा मध्यादिदारुक होते हैं, और हर बंडल के चारों ओर मोटी भित्ति वाली, सघन कोशिकाओं की एक परत होती है जिसे बंडल आच्छद कहा जाता है।

समद्धि पार्श्व (एकबीजपत्री) पत्ती

समद्धि पार्श्व पत्ती का शारीर पृष्ठाधार पत्ती से अधिकांश समान ही है, लेकिन कुछ अहम भिन्नताएँ भी हैं। इसमें ऊपरी व निचली, दोनों बाह्यत्वचा पर एक-समान क्यूटिकल होती है, और दोनों सतहों पर रंध्रों की संख्या भी लगभग बराबर होती है — यही इसे द्विबीजपत्री पत्ती से अलग बनाता है।

घास जैसे पौधों में ऊपरी बाह्यत्वचा की कुछ कोशिकाएँ लंबी, खाली तथा रंगहीन होती हैं, जिन्हें आवर्ध त्वक्कोशिका कहा जाता है। जब ये कोशिकाएँ पानी सोखकर स्फीत हो जाती हैं, तब ये मुड़ी हुई पत्तियों को खुलने में मदद करती हैं — और जब वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक हो जाती है, तब यही पत्तियाँ जल-हानि कम करने के लिए मुड़ जाती हैं। एकबीजपत्री पत्तियों में शिरा विन्यास समानांतर होता है, जिसका पता तब चलता है जब हम पत्ती की लंबवत काट देखते हैं — इसमें संवहन बंडलों का माप भी लगभग एक-समान पाया जाता है।

📝 NEET/AIPMT में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय से NEET/AIPMT में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष के संदर्भ व विकल्पों सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

1AIPMT 2015 काष्ठीय द्विबीजपत्री तने में निम्नलिखित घटकों — (I) द्वितीयक वल्कुट (II) फ्लोएम (III) द्वितीयक फ्लोएम (IV) फेलम — को बाहर से भीतर की ओर सही क्रम में व्यवस्थित करें।
(अ) I → II → III → IV (A)
(ब) II → I → IV → III (B)
(स) IV → I → III → काष्ठ (C)
(द) III → IV → I → II (D)

उत्तर: (स) फेलम → द्वितीयक वल्कुट → द्वितीयक फ्लोएम → काष्ठ (बाहर से भीतर की ओर)।

द्वितीयक वृद्धि के दौरान सबसे बाहर फेलम (कॉर्क), उसके भीतर द्वितीयक वल्कुट (फेलोडर्म), फिर द्वितीयक फ्लोएम, और सबसे भीतर काष्ठ (द्वितीयक जाइलम) की परतें बनती हैं — यह क्रम NEET में बार-बार "बाहर से भीतर" या "भीतर से बाहर" दोनों दिशाओं में पूछा जाता है, इसलिए दिशा पर विशेष ध्यान दें।

2NEET 2018 कैस्पेरियन पट्टी (Casparian strip) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(अ) यह वल्कुट की बाहरी कोशिकाओं में पाई जाती है (A)
(ब) यह अंतश्त्वचा की अरीय व भीतरी अनुप्रस्थ भित्ति पर पाई जाती है, तथा सुबेरिन-युक्त होती है (B)
(स) यह परिरंभ में पाई जाती है तथा सेलुलोज़ की बनी होती है (C)
(द) यह पिथ में स्थित होती है (D)

उत्तर: (ब) यह अंतश्त्वचा (endodermis) की अरीय व भीतरी अनुप्रस्थ भित्ति पर पाई जाती है, तथा सुबेरिन-समृद्ध होती है।

कैस्पेरियन पट्टी मूल की अंतश्त्वचा में स्थित एक जलरोधी पट्टी है, जो जल व खनिजों को कोशिका भित्ति के रास्ते (एपोप्लास्ट) से सीधे गुज़रने से रोकती है — इस कारण उन्हें कोशिका झिल्ली (सिम्प्लास्ट मार्ग) से होकर ही गुज़रना पड़ता है, जिससे चयनात्मक अवशोषण संभव होता है।

3NEET 2018 घास (जैसे मक्का) की पत्ती में रंध्र किस आकार के होते हैं?
(अ) डंबल के आकार के (A)
(ब) सेम के आकार के (B)
(स) आयताकार (C)
(द) बैरल के आकार के (D)

उत्तर: (अ) डंबल (dumb-bell) के आकार के।

अधिकांश द्विबीजपत्री पौधों में द्वार कोशिकाएँ सेम (बीन) के आकार की होती हैं, जबकि घास व अन्य एकबीजपत्री पौधों में ये डंबल-आकार की होती हैं — इनके मध्य भाग की भित्ति मोटी व दोनों सिरों की पतली होती है, जो रंध्र खुलने-बंद होने की क्रियाविधि को अलग बनाती है।

4NEET 2020 किसी पौधे के भाग की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित शारीरिक लक्षण दिखते हैं — (i) असंख्य बिखरे हुए संवहन बंडल, हर एक बंडल-आच्छद से घिरा (ii) बड़ा व स्पष्ट पैरेंकाइमी भरण ऊतक (iii) संवहन बंडल संयुक्त व बंद प्रकार के (iv) फ्लोएम पैरेंकाइमा अनुपस्थित। यह किस श्रेणी के पौधे का कौन-सा भाग है?
(अ) द्विबीजपत्री तना (A)
(ब) द्विबीजपत्री मूल (B)
(स) एकबीजपत्री तना (C)
(द) एकबीजपत्री मूल (D)

उत्तर: (स) एकबीजपत्री तना (Monocotyledonous stem)।

वर्णित सभी चारों लक्षण — असंख्य बिखरे हुए बंडल, बड़ा भरण ऊतक, संयुक्त-बंद बंडल (कैंबियम-रहित) तथा फ्लोएम पैरेंकाइमा की अनुपस्थिति — एकबीजपत्री तने की सर्वमान्य पहचान हैं। यह प्रश्न इस अध्याय से पूछे जाने वाले सबसे विशिष्ट "पहचान करो" (identification-type) प्रश्नों का उदाहरण है।

5NEET 2022 Phase 2 द्वितीयक वृद्धि के दौरान पार्श्व मूलों तथा संवहन कैंबियम की शुरुआत किस ऊतक की कोशिकाओं में होती है?
(अ) परिरंभ (Pericycle) (A)
(ब) एपिब्लेमा (B)
(स) वल्कुट (Cortex) (C)
(द) अंतश्त्वचा (Endodermis) (D)

उत्तर: (अ) परिरंभ (Pericycle)।

परिरंभ की कोशिकाएँ विभज्योतक क्षमता रखती हैं — इन्हीं से पार्श्व (द्वितीयक) मूल उत्पन्न होते हैं, तथा द्वितीयक वृद्धि के समय ये आदिदारुक-वाहिनी के सामने अंतरापूलीय कैंबियम बनाने में भी योगदान देती हैं। यह पहचान NEET में पार्श्व मूल-उत्पत्ति के प्रश्नों में बार-बार आती है।

6हाल के वर्ष आवृतबीजी पौधों में मूलरोम, मूल के किस क्षेत्र से उत्पन्न होते हैं?
(अ) मूल-गोप क्षेत्र (Root cap zone) (A)
(ब) विभज्योतकी सक्रियता का क्षेत्र (B)
(स) दीर्घीकरण क्षेत्र (C)
(द) परिपक्वन क्षेत्र (Region of maturation) (D)

उत्तर: (द) परिपक्वन क्षेत्र (Region of maturation), जिसे रोमश क्षेत्र (piliferous region) भी कहते हैं।

मूलरोम, परिपक्वन क्षेत्र की एपिब्लेमा (त्वक्क) कोशिकाओं से बनते हैं, जिन्हें ट्राइकोब्लास्ट कहा जाता है — यह क्षेत्र दीर्घीकरण क्षेत्र के ठीक बाद आता है, जहाँ कोशिकाएँ अपना अंतिम रूप व कार्य ग्रहण कर चुकी होती हैं।

7हाल के वर्ष घास की पत्तियों में आवर्ध त्वक्कोशिकाओं (Bulliform cells) का प्रमुख कार्य क्या है?
(अ) पत्ती को फफूंद-बीजाणुओं से अभेद्य बनाना (A)
(ब) प्रकाश-संश्लेषण करना (B)
(स) जल-तनाव के समय पत्ती को मोड़कर जल-हानि न्यूनतम करना (C)
(द) जल का परिवहन करना (D)

उत्तर: (स) जल-तनाव (वाटर स्ट्रेस) के समय पत्ती को मोड़कर वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल-हानि को न्यूनतम करना।

आवर्ध त्वक्कोशिकाएँ (मोटर कोशिकाएँ) बड़ी, पतली भित्ति वाली, रिक्तिकायुक्त कोशिकाएँ हैं, जो पानी सोखने पर स्फीत होकर पत्ती को खोलती हैं, तथा जल की कमी होने पर सिकुड़कर पत्ती को मोड़ देती हैं — इस तरह ये सीधे प्रकाश-संश्लेषण या जल-परिवहन नहीं, बल्कि जल-संरक्षण में परोक्ष भूमिका निभाती हैं।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

महत्वपूर्ण
  • द्वितीयक वृद्धि में बाहर से भीतर की ओर सही क्रम — फेलम (कॉर्क) → फेलोजन → फेलोडर्म (द्वितीयक वल्कुट) → द्वितीयक फ्लोएम → संवहन कैंबियम → द्वितीयक जाइलम (काष्ठ)। छाल (bark) में गैर-तकनीकी रूप से संवहन कैंबियम के बाहर की सभी परतें (द्वितीयक फ्लोएम + परिडर्म) शामिल मानी जाती हैं।
तुलनात्मक
  • एकबीजपत्री बनाम द्विबीजपत्री तने के 4 बड़े अंतर — बंडलों की व्यवस्था (बिखरे बनाम एक छल्ले में), कैंबियम (अनुपस्थित/बंद बनाम उपस्थित/खुला), अधस्त्वचा (स्केलेरेंकाइमा बनाम कॉलेंकाइमा), तथा फ्लोएम पैरेंकाइमा (अनुपस्थित बनाम उपस्थित) — इन चारों की एक साथ जाँच करने वाला प्रश्न (जैसे NEET 2020) सबसे अधिक बार दोहराया जाता है।
तथ्य
  • कैस्पेरियन पट्टी केवल अंतश्त्वचा (endodermis) में, वह भी अरीय व अनुप्रस्थ भित्तियों पर पाई जाती है (स्पर्शरेखीय भित्ति पर नहीं) — यह सुबेरिन (व कभी-कभी लिग्निन) से बनी होती है, यह जलरोधी होती है, तथा इसकी उपस्थिति एपोप्लास्ट मार्ग को रोककर पदार्थों को सिम्प्लास्ट मार्ग से गुज़रने पर मजबूर करती है।
तुलनात्मक
  • रंध्र की द्वार कोशिकाओं का आकार — अधिकांश द्विबीजपत्री पौधों में सेम (बीन) के आकार की, जबकि घास (एकबीजपत्री) में डंबल के आकार की — यह अंतर सीधे "रंध्र किस आकार का है, कौन-सा पौधा" जैसे प्रश्न में पूछा जाता है।
तथ्य
  • मूल के चार क्षेत्र, क्रम से — मूल-गोप (सुरक्षा) → विभज्योतकी सक्रियता का क्षेत्र (कोशिका-विभाजन) → दीर्घीकरण क्षेत्र (कोशिका बढ़ना) → परिपक्वन क्षेत्र (मूलरोम यहीं बनते हैं)। यह क्रम व मूलरोम का स्थान NEET में हाल के वर्षों में बार-बार पूछा गया है।
रणनीति
  • NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 2–4 प्रश्न आते हैं (2010–2024 के बीच यह अध्याय कभी अनुपस्थित नहीं रहा), जिसमें द्वितीयक वृद्धि सबसे अधिक बार पूछा जाने वाला उप-विषय है (पिछले 14 वर्षों में लगभग 8-10 प्रश्न), इसके बाद एकबीजपत्री/द्विबीजपत्री तना-मूल की पहचान व कैस्पेरियन पट्टी का स्थान आता है — यह अध्याय NCERT आरेखों (डायग्राम) पर आधारित सीधे प्रश्नों के कारण अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

संक्षिप्त सार

शारीरिक संगठन

पौधा विभिन्न प्रकार के ऊतकों से बना है — मेरिस्टेमेटिक (शीर्षस्थ, पार्श्वीय, अंतर्वेशी) तथा स्थायी (सरल व जटिल)। ये ऊतक स्वांगीकरण, यांत्रिक सहारा, संचय तथा पानी-खनिज-भोजन के संवहन जैसे कई कार्य करते हैं।

तीन ऊतक तंत्र

बाह्यत्वचीय, भरण तथा संवहनी — ये तीनों ऊतक तंत्र पौधे के हर हिस्से में एक साथ काम करते हैं। भरण ऊतक तंत्र के तीन क्षेत्र होते हैं — वल्कुट, परिरंभ तथा पिथ।

संवहन बंडल के प्रकार

जाइलम व फ्लोएम की सापेक्ष स्थिति के आधार पर संवहन बंडल अरीय, संयुक्त-खुला या संयुक्त-बंद हो सकते हैं। द्विबीजपत्री में कैंबियम रहता है, एकबीजपत्री में नहीं।

द्विबीजपत्री बनाम एकबीजपत्री

दोनों की भीतरी रचना में गहरा अंतर है — बंडलों की संख्या, व्यवस्था तथा कैंबियम की मौजूदगी के आधार पर। द्वितीयक वृद्धि सिर्फ द्विबीजपत्री तने व मूल में होती है।

? प्रश्न-उत्तर

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प्रश्न 1 निम्नलिखित में शारीर के आधार पर अंतर करो।
उत्तर

(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल: एकबीजपत्री मूल में जाइलम-फ्लोएम बंडलों की संख्या आमतौर पर छह से अधिक होती है (बहु-आदिदारुक) और पिथ बड़ा व सुविकसित होता है, जबकि द्विबीजपत्री मूल में यह संख्या दो से चार के बीच रहती है और पिथ छोटा या लगभग अनुपस्थित होता है। सबसे बड़ा अंतर यह है कि एकबीजपत्री मूल में कैंबियम बिल्कुल नहीं होता, इसलिए इसमें द्वितीयक वृद्धि कभी नहीं होती — जबकि द्विबीजपत्री मूल में कैंबियम मौजूद होकर द्वितीयक वृद्धि करवाता है।

(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना: द्विबीजपत्री तने में संवहन बंडल एक ही छल्ले में व्यवस्थित रहते हैं, ये संख्या में सीमित, खुले प्रकार के होते हैं (कैंबियम युक्त), और इसकी अधस्त्वचा कॉलेंकाइमा की बनी होती है तथा बाह्यत्वचा पर त्वचारोम पाए जाते हैं। इसके विपरीत एकबीजपत्री तने में असंख्य संवहन बंडल पूरे वल्कुट में बिखरे रहते हैं, ये बंद प्रकार के (कैंबियम रहित) होते हैं, अधस्त्वचा स्केलेरेंकाइमा की बनी होती है, बाह्यत्वचा पर त्वचारोम नहीं होते, और बंडलों में फ्लोएम पैरेंकाइमा की जगह जल रखने वाली गुहिकाएँ मिलती हैं।

प्रश्न 2 आप एक शैशव तने की अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करें। आप कैसे पता करेंगे कि यह एकबीजपत्री तना अथवा द्विबीजपत्री तना है? इसके कारण बताओ।
उत्तर

सूक्ष्मदर्शी के नीचे सबसे पहले संवहन बंडलों की संख्या व व्यवस्था देखी जाएगी। यदि संवहन बंडल एक ही सुव्यवस्थित छल्ले में सजे मिलें, संख्या में सीमित हों, और हर बंडल में जाइलम-फ्लोएम के बीच एक कैंबियम की पट्टी नज़र आए, तो यह द्विबीजपत्री तना है। इसके अलावा अगर बाह्यत्वचा पर रोम (त्वचारोम) दिखें और अधस्त्वचा कॉलेंकाइमा कोशिकाओं की बनी नज़र आए, तो यह भी द्विबीजपत्री होने का संकेत है।

इसके विपरीत यदि असंख्य संवहन बंडल पूरे तने में बिखरे हुए (छल्ले में नहीं) दिखें, हर बंडल के चारों ओर एक स्केलेरेंकाइमी टोपी (आच्छद) नज़र आए, बंडल में कैंबियम अनुपस्थित हो (यानी बंद बंडल), बाह्यत्वचा पर त्वचारोम न हों, और अधस्त्वचा स्केलेरेंकाइमा की बनी दिखे, तो यह निश्चित रूप से एकबीजपत्री तना है।

प्रश्न 3 सूक्ष्मदर्शी किसी पौधे के भाग की अनुप्रस्थ काट निम्नलिखित शारीर रचनाएँ दिखाती है।
उत्तर

(अ) संवहन बंडल संयुक्त, फैले हुए तथा उसके चारों ओर स्केलेरेंकाइमी आच्छद हैं: यह विवरण साफ तौर पर एकबीजपत्री तने की पहचान है, क्योंकि यही खासियत — बिखरे हुए संयुक्त बंडल और उनके चारों ओर स्केलेरेंकाइमी आच्छद — एकबीजपत्री तने में विशेष रूप से पाई जाती है।

(ब) फ्लोएम पैरेंकाइमा नहीं है: फ्लोएम में पैरेंकाइमा का अनुपस्थित होना भी एकबीजपत्री संवहन बंडल की एक विशेष पहचान है — इसकी जगह वहाँ जल रखने वाली गुहिकाएँ मिलती हैं, जो द्विबीजपत्री संवहन बंडलों में नहीं देखी जातीं।

प्रश्न 4 रंध्रीतंत्र क्या है? रंध्र की रचना का वर्णन करो और इसका चिह्नित चित्र बनाओ।
उत्तर

रंध्रीतंत्र पत्ती की बाह्यत्वचा पर पाया जाने वाला वह तंत्र है जो वाष्पोत्सर्जन (जल की भाप बनकर उड़ने की प्रक्रिया) तथा गैसों के आदान-प्रदान को नियंत्रित करता है। यह मुख्यतः तीन घटकों से मिलकर बनता है — रंध्रीय छिद्र, द्वार कोशिकाएँ, तथा (कई बार) सहायक कोशिकाएँ।

रचना: हर रंध्र के इर्द-गिर्द सेम के आकार की दो द्वार कोशिकाएँ होती हैं (घास में डंबल-आकार की), जिनकी बाहरी भित्ति पतली और भीतरी भित्ति मोटी होती है। इन द्वार कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट मौजूद रहते हैं, जो रंध्र के खुलने-बंद होने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। रंध्र के आसपास कुछ बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ आकृति व माप में विशेष होकर सहायक कोशिकाएँ बन जाती हैं, जो द्वार कोशिकाओं की क्रियाशीलता में मदद करती हैं।

प्रश्न 5 पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र बताओ। प्रत्येक तंत्र के ऊतक बताओ।
उत्तर

पुष्पी पादपों में रचना व स्थिति के आधार पर तीन मूलभूत ऊतक तंत्र होते हैं:

1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र: इसमें बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ, रंध्र, तथा बाह्यत्वचीय उपांग (जैसे मूलरोम व त्वचारोम) शामिल होते हैं।

2. भरण (मौलिक) ऊतक तंत्र: इसमें पैरेंकाइमा, कॉलेंकाइमा तथा स्केलेरेंकाइमा जैसे सरल ऊतक शामिल होते हैं, जो वल्कुट, परिरंभ व पिथ में पाए जाते हैं।

3. संवहनी ऊतक तंत्र: इसमें जटिल ऊतक — जाइलम तथा फ्लोएम — शामिल होते हैं, जो मिलकर संवहन बंडल बनाते हैं और जल, खनिज व भोजन का स्थानांतरण करते हैं।

प्रश्न 6 पादप शारीर का अध्ययन हमारे लिए कैसे उपयोगी है?
उत्तर

पादप शारीर का अध्ययन कई तरह से उपयोगी सिद्ध होता है। सबसे पहले, यह हमें द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री पौधों की पहचान में मदद करता है, भले ही उनकी बाहरी बनावट एक-दूसरे से मिलती-जुलती क्यों न हो — भीतरी संवहन बंडलों की व्यवस्था इनके बीच स्पष्ट भेद कर देती है। दूसरा, यह हमें यह समझने में मदद करता है कि पौधा जल, खनिज व भोजन का परिवहन कैसे करता है, जो कृषि व बागवानी में सिंचाई व पोषण प्रबंधन के लिए अहम है। तीसरा, यह पौधे की उम्र, वृद्धि के प्रकार (प्राथमिक या द्वितीयक) तथा पर्यावरण के प्रति उसके अनुकूलन को समझने में सहायक है — जैसे रेगिस्तानी पौधों में मोटी क्यूटिकल व कम रंध्र संख्या पानी बचाने के अनुकूलन को दर्शाती है। इसके अलावा लकड़ी उद्योग, औषध विज्ञान तथा वानिकी में भी शारीरिक अध्ययन से पौधों की गुणवत्ता व उपयोगिता को परखा जाता है।

प्रश्न 7 पृष्ठाधर पत्ती की भीतरी रचना का वर्णन चिह्नित चित्रों की सहायता से करो।
उत्तर

पृष्ठाधार पत्ती की लंबवत काट में तीन प्रमुख भाग दिखाई देते हैं:

बाह्यत्वचा: ऊपरी (अभ्यक्ष) व निचली (अपाक्ष) दोनों सतहों पर क्यूटिकल मौजूद रहती है, लेकिन रंध्र निचली सतह पर कहीं अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

पर्णमध्योतक: ऊपरी व निचली बाह्यत्वचा के बीच का पूरा भाग, जो दो तरह की पैरेंकाइमा कोशिकाओं से बना है — ऊपर की ओर लंबी, समानांतर खंभ पैरेंकाइमा, तथा नीचे की ओर अनियमित आकार की, हवा के खाली स्थानों से भरी स्पंजी पैरेंकाइमा। दोनों में क्लोरोप्लास्ट मौजूद रहते हैं और यही प्रकाश-संश्लेषण करते हैं।

संवहन तंत्र: पत्ती की शिराओं व मध्यशिरा में संवहन बंडल मौजूद होते हैं, जो संयुक्त, बहिःफ्लोएमी व मध्यादिदारुक होते हैं, और हर बंडल के चारों ओर मोटी भित्ति वाली कोशिकाओं की एक बंडल आच्छद परत होती है।

प्रश्न 8 त्वक कोशिकाओं की रचना तथा स्थिति उन्हें किस प्रकार विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है?
उत्तर

त्वक (बाह्यत्वचीय) कोशिकाओं की खास रचना व स्थिति उन्हें कई विशिष्ट काम करने के लिए बिल्कुल उपयुक्त बनाती है। ये कोशिकाएँ आपस में बेहद सटी हुई होती हैं, जिससे एक अखंड सुरक्षा-कवच बनता है और भीतरी ऊतकों को बाहरी नुकसान से बचाता है। इनकी सबसे बाहरी सतह पर मोम की क्यूटिकल परत जमा होती है, जो पौधे को अनावश्यक जल-हानि से बचाती है — यही कारण है कि रेगिस्तानी पौधों में यह परत ज्यादा मोटी होती है।

द्वार कोशिकाओं की खास बीन-जैसी आकृति और उनकी असमान भित्ति मोटाई (बाहरी पतली, भीतरी मोटी) उन्हें पानी सोखकर फूलने या सिकुड़ने पर रंध्र को खोलने-बंद करने की क्षमता देती है, जिससे गैस विनिमय व वाष्पोत्सर्जन नियंत्रित रहता है। इसी तरह मूलरोम की पतली, लंबी संरचना उन्हें मिट्टी के बारीक कणों के बीच घुसकर अधिकतम सतह क्षेत्र से जल व खनिज सोखने में मदद करती है। घास की आवर्ध त्वक्कोशिकाएँ अपनी विशेष स्थिति व फूलने-सिकुड़ने की क्षमता के कारण पत्ती को मोड़कर वाष्पोत्सर्जन कम करने में सहायक होती हैं। इस तरह त्वक कोशिकाओं की हर बारीक विशेषता किसी न किसी विशिष्ट जैविक ज़रूरत से जुड़ी होती है।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री पुष्पी पादपों की भीतरी संरचना — ऊतक तंत्र तथा द्विबीजपत्री व एकबीजपत्री पौधों के शारीर — को मौलिक व सरल भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें तुलनात्मक कार्ड तथा प्रश्नोत्तर शामिल हैं।

त्वचा के नीचे झाँकने पर ही पता चलता है कि हर पौधे की अपनी एक अनूठी भीतरी दुनिया है।

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