प्राणि जगत — विस्तृत अध्ययन सामग्री
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प्राणि जगत

समुद्र की गहराई में तैरते सूक्ष्म स्पंज से लेकर आकाश में उड़ते पक्षियों और थल पर दौड़ते स्तनधारियों तक — प्राणि जगत करोड़ों प्रजातियों की एक विशाल दुनिया है। इस गाइड में हम प्राणियों को समझने-बाँटने के बुनियादी सिद्धांतों से शुरुआत करके, ग्यारह प्रमुख संघों की यात्रा करेंगे — सरल उदाहरणों, तुलनाओं और आसान भाषा के साथ।

भूमिका प्राणियों को समूहों में बाँटने की जरूरत क्यों?

हमारे चारों ओर मौजूद जीव-जंतु आकार, रंग, बनावट और व्यवहार में इतने अलग-अलग हैं कि पहली नज़र में इनमें कोई तालमेल नज़र ही नहीं आता। अब तक धरती पर पाई जाने वाली दस लाख से भी अधिक प्राणी-प्रजातियों का दस्तावेज़ीकरण किया जा चुका है, और हर साल कई नई प्रजातियाँ खोजी जाती रहती हैं। इतनी विशाल संख्या को बिना किसी व्यवस्थित ढाँचे के समझना असंभव है — इसीलिए वर्गीकरण की जरूरत पड़ती है, ताकि हर नई खोजी गई प्रजाति को सही जगह पर रखा जा सके और उसका अध्ययन आसान बन सके।

बाहरी रूप-रंग में चाहे कितनी भी भिन्नता क्यों न हो, वैज्ञानिकों ने पाया कि प्राणियों की आंतरिक बनावट में कुछ बुनियादी समानताएँ बार-बार दोहराई जाती हैं — जैसे कोशिकाओं के संगठित होने का तरीका, शरीर की सममिति, शरीर गुहा की उपस्थिति या अनुपस्थिति, तथा पाचन, परिसंचरण व जनन तंत्र की रचना। यही साझा विशेषताएँ वर्गीकरण की नींव बनती हैं, जिनका विस्तृत परिचय इस अध्याय के पहले भाग में दिया गया है।

1 वर्गीकरण का आधार

वे बुनियादी लक्षण जिनकी मदद से करोड़ों प्राणियों को व्यवस्थित समूहों में बाँटा जाता है

संगठन के स्तर

सभी प्राणी बहुकोशिकीय होते हैं, मगर इसका मतलब यह नहीं कि उनकी कोशिकाएँ एक जैसे ढंग से संगठित होती हैं। स्पंज जैसे सबसे सरल प्राणियों में कोशिकाएँ बिना किसी खास तालमेल के ढीले-ढाले समूहों में बिखरी रहती हैं — इसे कोशिकीय स्तर का संगठन कहा जाता है, क्योंकि यहाँ श्रम-विभाजन लगभग नहीं के बराबर होता है।

संगठन में क्रमिक वृद्धि सिलेंट्रेट प्राणियों में कोशिकाएँ आपस में मिलकर एक निश्चित कार्य करने लगती हैं, जिससे ऊतक स्तर का संगठन बनता है। इससे भी ऊँचे स्तर पर, प्लेटीहेल्मिंथीज से लेकर उच्च संघों तक, ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं जो एक विशिष्ट काम करते हैं — इसे अंग स्तर का संगठन कहते हैं। सबसे जटिल स्तर पर, जैसे ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्म व रज्जुकी प्राणियों में, कई अंग मिलकर एक पूरा तंत्र बनाते हैं और हर तंत्र अपना अलग कार्य संभालता है — इसे अंगतंत्र स्तर का संगठन कहा जाता है।

अंगतंत्र स्तर के संगठन में भी जटिलता के कई दर्जे देखे जाते हैं। उदाहरण के लिए पाचन तंत्र की बात करें तो प्लेटीहेल्मिंथीज जैसे प्राणियों में एक ही द्वार मुख और गुदा दोनों का काम करता है — इसे अपूर्ण पाचन तंत्र कहते हैं। इसके विपरीत अधिक विकसित प्राणियों में मुख और गुदा दो अलग-अलग द्वार होते हैं, जिसे पूर्ण पाचन तंत्र कहा जाता है। इसी तरह परिसंचरण तंत्र भी दो तरह का होता है — खुला परिसंचरण तंत्र, जिसमें रक्त सीधे शरीर गुहा में बहता है और कोशिकाएँ उसमें डूबी रहती हैं, तथा बंद परिसंचरण तंत्र, जिसमें रक्त हमेशा नलिकाओं (धमनी, शिरा व कोशिकाओं) के भीतर ही बहता है।

सममिति

प्राणी को उसके शरीर की बनावट में मौजूद सममिति के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है। स्पंज जैसे प्राणी असममित होते हैं — यानी शरीर के बीच से गुजरने वाली कोई भी रेखा उसे दो बराबर हिस्सों में नहीं बाँट सकती। जब केंद्रीय अक्ष से गुजरने वाली कोई भी रेखा शरीर को दो समरूप हिस्सों में बाँट दे, तो इसे अरीय सममिति कहते हैं — यह सिलेंट्रेट, टीनोफोर और एकाइनोडर्म में पाई जाती है। दूसरी ओर, ऐनेलिड और आर्थ्रोपोड जैसे प्राणियों में केवल एक ही निश्चित अक्ष से गुजरने वाली रेखा शरीर को दाएँ-बाएँ दो बराबर भागों में बाँट सकती है, जिसे द्विपार्श्व सममिति कहा जाता है।

द्विकोरिक तथा त्रिकोरिक संगठन

भ्रूण के विकास के दौरान बनने वाली कोशिका परतों की संख्या भी वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण आधार है। जिन प्राणियों में भ्रूण केवल दो परतों — बाहरी एक्टोडर्म और भीतरी एंडोडर्म — में विकसित होता है, उन्हें द्विकोरिक कहा जाता है, जैसा कि सिलेंट्रेट में देखा जाता है। जिन प्राणियों में इन दो परतों के बीच एक तीसरी परत, मीजोडर्म, भी बनती है, उन्हें त्रिकोरिक कहते हैं — प्लेटीहेल्मिंथीज से लेकर रज्जुकी तक के सभी प्राणी इसी वर्ग में आते हैं।

प्रगुहा (सीलोम)

शरीर की दीवार और आहार नाल के बीच खाली जगह का होना या न होना वर्गीकरण का एक और अहम पैमाना है। जब यह गुहा मीजोडर्म से पूरी तरह घिरी होती है, तो उसे देहगुहा या प्रगुहा कहा जाता है और ऐसे प्राणी प्रगुही कहलाते हैं — जैसे ऐनेलिड, मोलस्क, आर्थ्रोपोड, एकाइनोडर्म तथा रज्जुकी। कुछ प्राणियों में यह गुहा मीजोडर्म से पूरी तरह घिरी नहीं होती, बल्कि मीजोडर्म बाहरी व भीतरी परत के बीच बिखरी हुई थैलियों के रूप में मिलता है — ऐसे प्राणियों को कूटगुहिक कहते हैं, जैसे ऐस्केलमिंथीज। जिन प्राणियों में शरीर गुहा सिरे से ही अनुपस्थित होती है, उन्हें अगुहीय कहा जाता है — जैसे प्लेटीहेल्मिंथीज।

खंडीभवन

कुछ प्राणियों का शरीर बाहर और भीतर, दोनों ओर से क्रमबद्ध खंडों में बँटा होता है, जिनमें कुछ अंग बार-बार दोहराए जाते हैं — इस प्रक्रिया को खंडीभवन कहते हैं। केंचुआ इसका सबसे परिचित उदाहरण है, जहाँ शरीर पूरी तरह से खंडों में विभाजित रहता है, जिसे विखंडावस्था कहा जाता है।

पृष्ठरज्जु

भ्रूणीय विकास के दौरान पीठ की ओर बनने वाली एक शलाका जैसी संरचना को पृष्ठरज्जु या नोटोकॉर्ड कहा जाता है, जो मीजोडर्म से बनती है। जिन प्राणियों में यह संरचना मौजूद होती है, उन्हें रज्जुकी (कॉर्डेट) कहा जाता है, जबकि जिनमें यह अनुपस्थित रहती है, उन्हें अरज्जुकी (नॉनकॉर्डेट) कहते हैं। यही एक लक्षण प्राणि जगत को दो बड़े हिस्सों में बाँट देता है।

2 प्राणियों का वर्गीकरण

उपर्युक्त बुनियादी लक्षणों के आधार पर प्राणि जगत को ग्यारह प्रमुख संघों में बाँटा गया है

संघ पोरीफेरा — छिद्रयुक्त प्राणी

कोशिकीय संगठनअसममितजलीय (समुद्री)

इन्हें सामान्यतः स्पंज के नाम से जाना जाता है। शरीर में असंख्य महीन छिद्र होते हैं — पानी छोटे छिद्रों (ऑस्टिया) से अंदर आता है, केंद्रीय गुहा से होकर बहता है, और बड़े छिद्र (ऑस्कुलम) से बाहर निकल जाता है। यह जल-प्रवाह ही इनका भोजन-संग्रह, श्वसन और अपशिष्ट-निष्कासन का माध्यम है। कोएनोसाइट नामक विशेष कशाभिका-युक्त कोशिकाएँ इस जल-प्रवाह को बनाए रखती हैं। शरीर को सहारा देने के लिए कैल्सियम/सिलिका की कंटिकाओं या स्पंजिन रेशों से बना हल्का कंकाल होता है। ये एक ही व्यष्टि में नर-मादा अंग रखते हैं (उभयलिंगी), और विखंडन या युग्मक-संगलन द्वारा जनन करते हैं। उदाहरण: साइकन, स्पंजिला, यूस्पंजिया

संघ सिलेंट्रेटा (नाइडेरिया) — दंश कोशिका वाले प्राणी

ऊतकीय संगठनअरीय सममितिद्विकोरिक

इस संघ का नाम इनकी विशेष दंश कोशिकाओं (निडोब्लास्ट) पर पड़ा है, जो स्पर्शकों पर मौजूद होती हैं और शिकार पकड़ने व रक्षा में मदद करती हैं। एक केंद्रीय जठर-संवहनी गुहा होती है, जो नीचे की ओर स्थित मुख द्वारा बाहर खुलती है। कुछ सदस्य (जैसे प्रवाल) कैल्सियम कार्बोनेट से कंकाल बनाते हैं। शरीर के दो रूप मिलते हैं — स्थावर पॉलिप (जैसे हाइड्रा) और मुक्त-प्लावी मेडुसा (जैसे ओरेलिया)। जिन प्रजातियों में दोनों रूप जीवन-चक्र में बारी-बारी से आते हैं, उसे पीढ़ी-एकांतरण (मेटाजेनेसिस) कहते हैं। उदाहरण: हाइड्रा, ओबेलिया, फाइसेलिया, एडमसिया, गोरगोनिया, मेन्डरीना

संघ टीनोफोर (कंकतधर)

ऊतकीय संगठनअरीय सममितिद्विकोरिक

समुद्री अखरोट या कॉम्ब जैली के नाम से मशहूर ये प्राणी पूरी तरह समुद्री होते हैं। शरीर पर आठ बाहरी पक्ष्माभी कंकत-पट्टिकाएँ होती हैं जो तैरने में मदद करती हैं। भोजन का पाचन आंशिक रूप से कोशिका के अंदर और आंशिक रूप से बाहर — आहार-गुहा में — होता है। इनमें जीवसंदीप्ति (बायोल्यूमिनेसेंस) की क्षमता पाई जाती है, यानी ये शरीर से स्वयं प्रकाश उत्पन्न कर सकते हैं। नर-मादा एक ही जीव में होते हैं और निषेचन बाह्य होता है। उदाहरण: प्लूरोब्रेकिआ, टीनोप्लाना

संघ प्लेटीहेल्मिंथीज — चपटे कृमि

अंगीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, अगुहीय

जैसा नाम बताता है, इनका शरीर पृष्ठाधर दिशा में चपटा होता है। इनमें से अधिकांश अन्य प्राणियों के अंदर परजीवी के रूप में रहते हैं और उनमें चिपकने के लिए अंकुश व चूषक जैसे अंग विकसित होते हैं। कई तो भोजन सीधे शरीर की सतह से ही सोख लेते हैं। ज्वाला कोशिकाएँ परासरण-नियंत्रण व उत्सर्जन का काम करती हैं। नर-मादा एक ही जीव में होते हैं। मुक्तजीवी सदस्य (जैसे प्लैनेरिया) में क्षतिग्रस्त अंगों को दोबारा उगाने (पुनरुद्भवन) की अद्भुत क्षमता होती है। उदाहरण: टीनिया (फीताकृमि), फैसियोला (यकृत/पर्णकृमि)।

संघ ऐस्केलमिंथीज — गोल कृमि

अंगतंत्रीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, कूटप्रगुही

अनुप्रस्थ काट में गोल होने के कारण इन्हें गोलकृमि भी कहा जाता है। ये मुक्त-जीवी या पौधों व प्राणियों में परजीवी हो सकते हैं। इनकी आहार नाल पूर्ण होती है — मुख और गुदा अलग-अलग होते हैं। एक सुविकसित पेशीय ग्रसनी भोजन चूसने में मदद करती है। नर-मादा अलग होते हैं और अक्सर मादा बड़ी होती है। निषेचन आंतरिक होता है, और परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो सकता है। उदाहरण: एस्केरिस (गोलकृमि), वुचेरेरिया (फाइलेरियाकृमि), एनसाइलोस्टोमा (अंकुशकृमि)।

संघ ऐनेलिडा — वलययुक्त प्राणी

अंगतंत्रीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, प्रगुही, खंडित

ऐनेलिड प्राणी समुद्र, मीठे पानी और थल — तीनों जगह मिलते हैं। अधिकांश मुक्त-जीवी हैं, कुछ परजीवी भी हैं। इनका शरीर स्पष्ट रूप से खंडों या वलयों में बँटा होता है — 'ऐनेलिडा' नाम लैटिन शब्द 'एनुलस' (वलय) से आया है। अनुदैर्घ्य व वृत्ताकार दोनों प्रकार की पेशियाँ गति में मदद करती हैं। जलीय सदस्यों (जैसे नेरिस) में पार्श्वपाद (पैरापोडिया) तैरने के लिए होते हैं। इनमें बंद परिसंचरण तंत्र होता है और उत्सर्जन वृक्कक (नेफ्रिडियम) द्वारा होता है। नेरिस में नर-मादा अलग होते हैं, जबकि केंचुआ व जोंक उभयलिंगी होते हैं। उदाहरण: नेरिस, फेरेटिमा (केंचुआ), हीरुडिनेरिया (जोंक)।

संघ आर्थ्रोपोडा — संधिपादी

अंगतंत्रीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, प्रगुही, खंडित

यह प्राणि जगत का सबसे बड़ा संघ है — सभी ज्ञात प्रजातियों में से लगभग दो-तिहाई अकेले इसी संघ की हैं। शरीर काइटिन से बने कठोर बाह्यकंकाल से ढका रहता है और सिर, वक्ष व उदर — तीन भागों में बँटा होता है, जिन पर संधियुक्त पाद (जोड़दार टाँगें) होती हैं — इसीलिए नाम आर्थ्रोपोडा (यानी संधियुक्त पाद)। श्वसन क्लोम, पुस्तक-क्लोम, पुस्त-फुफ्फुस या श्वसनिकाओं (ट्रेकीया) द्वारा होता है। परिसंचरण तंत्र खुला होता है, और उत्सर्जन मैलपिगी नलिकाओं द्वारा होता है। नर-मादा अलग होते हैं, अधिकांश अंडज होते हैं। उदाहरण: ऐपिस (मधुमक्खी), बांबिक्स (रेशम कीट), लोकस्टा (टिड्डी), लिमूलस (किंग क्रैब)।

संघ मोलस्का — कोमल शरीर वाले प्राणी

अंगतंत्रीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, प्रगुही

प्राणि जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ, ये थल व जल — दोनों जगह पाए जाते हैं। शरीर कोमल होता है, लेकिन एक कठोर कैल्सियमयुक्त कवच (खोल) सुरक्षा प्रदान करता है। शरीर में सिर, पेशीय पाद, और अंतरंग कुकुद शामिल होते हैं। त्वचा की मुलायम परत (प्रावार) कुकुद को ढँकती है और प्रावार-गुहा में क्लोम होते हैं जो श्वसन व उत्सर्जन में सहायक हैं। मुख में रेडुला (रेतीजिह्वा) नामक भोजन-घिसने वाला अंग होता है। नर-मादा अलग होते हैं, अधिकांश अंडज होते हैं। उदाहरण: पाइला (सेबघोंघा), पिंकटाडा (मुक्ता शुक्ति), सीपिया (कटलफिश), लोलिगो (स्क्विड), ऑक्टोपस

संघ एकाइनोडर्मेटा — काँटेदार प्राणी

अंगतंत्रीय संगठनअरीय (वयस्क) / द्विपार्श्व (लार्वा)त्रिकोरिक, प्रगुही

इनमें कैल्सियमयुक्त अंतःकंकाल पाया जाता है, जिससे शरीर काँटेदार लगता है। ये सभी समुद्रवासी होते हैं। वयस्क अवस्था में अरीय सममिति होती है, जबकि लार्वा द्विपार्श्व होते हैं। इनकी सबसे विशिष्ट पहचान जल संवहन तंत्र है, जो गमन, भोजन-ग्रहण व श्वसन में सहायक होता है। पाचन तंत्र पूर्ण होता है — मुख नीचे और गुदा ऊपर की ओर खुलता है। नर-मादा अलग होते हैं, निषेचन बाह्य होता है। उदाहरण: एस्टेरियस (तारामीन), एकाइनस (समुद्री-अर्चिन), कुकुमेरिया (समुद्री ककड़ी), ओफीयूरा (भंगुर तारा)।

संघ हेमीकॉर्डेटा

अंगतंत्रीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, प्रगुही

पहले इसे कशेरुकी संघ का उपसंघ माना जाता था, पर अब इसे अरज्जुकियों में एक स्वतंत्र संघ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनके कॉलर क्षेत्र में एक अल्पविकसित संरचना — स्टोमोकॉर्ड — पाई जाती है, जो पृष्ठरज्जु से मिलती-जुलती है। ये कृमि जैसे समुद्री प्राणी हैं, जिनका बेलनाकार शरीर शुंड, कॉलर व लंबे वक्ष में बँटा होता है। श्वसन क्लोम द्वारा होता है और परिसंचरण तंत्र बंद होता है। नर-मादा अलग होते हैं, निषेचन बाह्य होता है। उदाहरण: बैलेनोग्लोसस, सैकोग्लोसस

संघ कॉर्डेटा — रज्जुकी

अंगतंत्रीय संगठनद्विपार्श्व सममितित्रिकोरिक, प्रगुही

रज्जुकी (कॉर्डेट्स) की पहचान तीन मूलभूत लक्षणों से होती है — पृष्ठरज्जु (नोटोकॉर्ड), पृष्ठीय खोखली तंत्रिका-रज्जु, तथा ग्रसनी में युग्मित क्लोम-छिद्र। गुदा के पीछे एक पुच्छ तथा बंद परिसंचरण तंत्र भी होता है।

लक्षणरज्जुकीअरज्जुकी
पृष्ठ रज्जुउपस्थितअनुपस्थित
केंद्रीय तंत्रिका-तंत्रपृष्ठीय, खोखला व एकलअधरतल में, ठोस व दोहरा
क्लोम छिद्रउपस्थितअनुपस्थित
हृदय की स्थितिअधर भाग मेंपृष्ठ भाग में (यदि उपस्थित हो)
गुदा-पश्च पुच्छउपस्थितअनुपस्थित

संघ कॉर्डेटा को तीन उपसंघों में बाँटा गया है — यूरोकॉर्डेटा (जिसमें पृष्ठरज्जु केवल लार्वा की पूँछ में रहती है, उदा: एसिडिया), सेफैलोकॉर्डेटा (जिसमें पृष्ठरज्जु सिर से पूँछ तक जीवनभर बनी रहती है, उदा: ब्रैंकिओस्टोमा), तथा वर्टीब्रेटा (कशेरुकी)।

कशेरुकियों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इनमें पृष्ठरज्जु केवल भ्रूणीय अवस्था में रहती है — वयस्क होने पर यह मेरुदंड में बदल जाती है। हर कशेरुकी रज्जुकी है, पर हर रज्जुकी कशेरुकी नहीं — यह भेद बहुत महत्वपूर्ण है। कशेरुकियों में दो-तीन या चार कोष्ठ वाला पेशीय अधर हृदय, उत्सर्जन के लिए वृक्क, तथा युग्मित उपांग (पंख या पाद) पाए जाते हैं।

उपसंघ वर्टीब्रेटा के वर्ग

कशेरुकियों को सात प्रमुख वर्गों में बाँटा गया है:

साइक्लोस्टोमेटा — ये जबड़ों से रहित, चूषक-मुख वाले बाह्यपरजीवी हैं। शल्क व युग्मित पख नहीं होते, कपाल व मेरुदंड उपास्थिल होते हैं। उदा: पेट्रोमाइजॉन (लैम्प्रे), मिक्सीन (हैगफिश)।

कांड्रीक्थीज — उपास्थिल मछलियाँ, पूर्णतः समुद्री। मुख अधर तल पर, क्लोम प्रच्छद से ढके नहीं। त्वचा पर पट्टाभ शल्क, वायु-कोष नहीं, इसलिए डूबने से बचने के लिए सदा तैरती रहती हैं। निषेचन आंतरिक, अधिकांश जरायुज। उदा: स्कॉलियोडोन (कुत्ता मछली), कारकेरोडोन (विशाल सफेद शार्क)।

ऑस्टिक्थीज — अस्थिल मछलियाँ, खारे व मीठे दोनों पानी में। अंतःकंकाल अस्थिल, मुख अग्र सिरे पर, क्लोम प्रच्छद से ढके। वायु-कोष उत्प्लावन में सहायक, निषेचन प्रायः बाह्य। उदा: एक्सोसिटस (उड़न मछली), हिपोकेम्पस (समुद्री घोड़ा), कतला

एम्फीबिया (उभयचर) — जल व थल दोनों में जीवन। त्वचा नम व शल्क-रहित, दो जोड़ी पाद, नेत्रों पर पलकें। श्वसन क्लोम, फुफ्फुस व त्वचा — तीनों से। हृदय त्रि-कक्षीय। निषेचन बाह्य। उदा: बूफो (टोड), राना टिग्रीना (मेंढक), सैलामेन्ड्रा

रेप्टिलिया (सरीसृप) — स्थलीय, त्वचा शुष्क व शल्कयुक्त (किरेटिनी प्रशल्क)। हृदय सामान्यतः त्रि-कक्षीय, किंतु मगरमच्छ में चतुष्कक्षीय। असमतापी (शीत-रक्त), निषेचन आंतरिक, अंडज। उदा: टेस्ट्यूडो (कछुआ), केमलियॉन, क्रोकोडाइलस (घड़ियाल), नाजा (कोबरा)।

एवीज (पक्षी) — शरीर पर पंख, अग्रपाद पंख बन गए, चोंच। अस्थियाँ खोखली व वायुकोष युक्त — हल्का शरीर। चतुष्कक्षीय हृदय, समतापी (गर्म-रक्त), अंडज। उदा: कार्वस (कौआ), कोलुम्बा (कपोत), पैवो (मोर), स्ट्रूथिओ (शुतुरमुर्ग)।

मैमेलिया (स्तनधारी) — शरीर पर रोम (बाल), स्तन ग्रंथियाँ (शिशुओं को दूध पिलाने के लिए), बाह्य कर्णपालि (पिन्ना)चतुष्कक्षीय हृदय, समतापी, श्वसन डायफ्राम द्वारा। निषेचन आंतरिक, अधिकांश जरायुज (डकबिल को छोड़कर)। उदा: मैक्रोपस (कंगारू), पैंथरा टाइग्रिस (बाघ), पैंथरा लियो (शेर), वैलेनिप्टेरा (ब्लू व्हेल)।

संघसंगठन स्तरसममितिप्रगुहाखंडीभवनविशेष लक्षण
पोरीफेराकोशिकीयअनियमितअनुपस्थितअनुपस्थितशरीर में छिद्र व नाल तंत्र
सिलेंट्रेटाऊतकअरीयअनुपस्थितअनुपस्थितदंश कोशिका (निडोब्लास्ट)
टीनोफोराऊतकअरीयअनुपस्थितअनुपस्थितगमन हेतु कंकत-पट्टिका
प्लेटीहेल्मिंथीजअंगद्विपार्श्वअगुहीयअनुपस्थितचपटा शरीर, चूषक
ऐस्केलमिंथीजअंगतंत्रद्विपार्श्वकूटप्रगुहीअनुपस्थितप्रायः कृमिरूप, लंबे
ऐनेलिडाअंगतंत्रद्विपार्श्वप्रगुहीउपस्थितशरीर वलयों जैसे खंडित
आर्थ्रोपोडाअंगतंत्रद्विपार्श्वप्रगुहीउपस्थितकाइटिनी संधिपाद बाह्यकंकाल
मोलस्काअंगतंत्रद्विपार्श्वप्रगुहीअनुपस्थितकैल्सियमी कवच, रेडुला
एकाइनोडर्मेटाअंगतंत्रअरीयप्रगुहीअनुपस्थितजल संवहन तंत्र
हेमीकॉर्डेटाअंगतंत्रद्विपार्श्वप्रगुहीअनुपस्थितशुंड, कॉलर व धड़ में विभाजित शरीर
कॉर्डेटाअंगतंत्रद्विपार्श्वप्रगुहीउपस्थितपृष्ठरज्जु, क्लोम छिद्र, पुच्छ

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय से NEET में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न (2016 से 2026 तक), वर्ष के संदर्भ सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

1NEET 2016 पक्षियों (Aves) व स्तनधारियों (Mammalia) में कौन-सा लक्षण समान रूप से नहीं पाया जाता?

उत्तर: जरायुजता (Viviparity)।

पक्षी अंडज (oviparous) होते हैं, जबकि स्तनधारी सामान्यतः जरायुज (viviparous) होते हैं — यही एक बड़ा अंतर है। अस्थिल अंतःकंकाल, फुफ्फुसों से श्वसन तथा समतापी (warm-blooded) प्रकृति — ये तीनों लक्षण दोनों वर्गों में समान रूप से पाए जाते हैं।

2NEET 2016 आर्थ्रोपोडा में कौन-सा लक्षण नहीं पाया जाता?

उत्तर: पार्श्वपाद (Parapodia) — यह आर्थ्रोपोडा का लक्षण नहीं है।

पार्श्वपाद वास्तव में संघ ऐनेलिडा (जैसे नेरीस) की विशेषता है, जो गमन में सहायक होते हैं। इसके विपरीत काइटिनी बाह्यकंकाल, कायांतरित खंडीय शरीर तथा संधियुक्त उपांग (जोड़दार पाद) — ये तीनों आर्थ्रोपोडा के मूल लक्षण हैं।

3NEET 2016 साइक्लोस्टोम्स के बारे में कौन-सा कथन सही है?

उत्तर: सभी साइक्लोस्टोम्स में जबड़े व युग्मित पख अनुपस्थित होते हैं।

साइक्लोस्टोमेटा वर्ग (जैसे पेट्रोमाइज़ॉन व मिक्सीन) की सबसे बड़ी पहचान ही यह है कि इनमें जबड़े (जॉ) विकसित नहीं होते तथा युग्मित पख भी नहीं होते — इसीलिए इन्हें "अजबड़ी" (agnatha) प्राणी भी कहा जाता है।

4NEET 2017 हेमीकॉर्डेटा, कॉर्डेटा के साथ कौन-सा लक्षण साझा करते हैं?

उत्तर: क्लोम छिद्रों (gill slits) से युक्त ग्रसनी (pharynx)।

हेमीकॉर्डेटा (जैसे बैलेनोग्लॉसस) में क्लोम छिद्रयुक्त ग्रसनी पाई जाती है, जो इन्हें कॉर्डेटा के करीब लाती है — यही कारण है कि कभी-कभी इन्हें कॉर्डेटा व नॉन-कॉर्डेटा के बीच की एक कड़ी माना जाता था, हालाँकि अब इन्हें एक स्वतंत्र संघ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि इनमें वास्तविक पृष्ठरज्जु अनुपस्थित होती है।

5NEET 2017 पोरीफेरा में प्रगुहा-कोटर (स्पंजोसील) किससे आस्तरित होता है?

उत्तर: कशाभि-कोशिकाएँ अर्थात् कोएनोसाइट (Choanocytes)।

कोएनोसाइट कशाभिकायुक्त विशेष कोशिकाएँ हैं, जो जल-प्रवाह उत्पन्न कर भोजन-कणों को पकड़ने का कार्य करती हैं — यह स्पंज की सबसे विशिष्ट पहचान है।

6NEET 2018 आहार नाल में फसल (क्रॉप) व पेषणी (गिज़र्ड) किस वर्ग की पहचान है?

उत्तर: एवीज़ (पक्षी वर्ग)।

पक्षियों में दाँतों के अभाव में भोजन को संग्रहित करने के लिए फसल (crop) व पीसने के लिए पेषणी (gizzard) — ये दोनों विशेष रूपांतरित अंग आहार नाल में विकसित हुए हैं, जो पाचन-प्रक्रिया को कुशल बनाते हैं।

7NEET 2018 कौन-सा प्राणी समतापी (होमियोथर्म) नहीं है?

उत्तर: चेलोन (Chelone) — यह एक कछुआ है, जो सरीसृप वर्ग का सदस्य होने के कारण असमतापी (poikilotherm) है।

सरीसृप अपने शरीर का तापमान स्वयं नियंत्रित नहीं कर पाते, इसलिए वातावरण के अनुसार बदलता रहता है (शीत-रक्त)। इसके विपरीत, पक्षी व स्तनधारी — दोनों ही समतापी (गर्म-रक्त) होते हैं, जो शरीर के तापमान को स्थिर बनाए रखते हैं।

8NEET (Odisha) 2019 सच्चे प्रगुहीय (true coelomate) व द्विपार्श्व सममित (bilaterally symmetrical) कौन-से हैं?

उत्तर: ऐनेलिड्स (Annelids)।

ऐनेलिडा संघ के प्राणी (जैसे केंचुआ) पूर्ण रूप से मीजोडर्म से आच्छादित प्रगुहा (सच्चा सीलोम) व द्विपार्श्व सममिति — दोनों लक्षण रखते हैं। इसके विपरीत वयस्क एकाइनोडर्म अरीय सममित होते हैं, ऐस्केलमिंथीज कूटगुहिक (स्यूडोसीलोमेट) होते हैं, तथा प्लेटीहेल्मिंथीज अगुहीय (एसीलोमेट) होते हैं।

9NEET 2019 अंगतंत्र स्तर, द्विपार्श्व सममिति, सच्चा प्रगुही व खंडीभवन — ये चारों लक्षण किनमें मिलते हैं?

उत्तर: ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा तथा कॉर्डेटा।

ये तीनों ही संघ अंगतंत्र स्तर के संगठन, द्विपार्श्व सममिति, सच्चे प्रगुहा तथा शारीरिक खंडीभवन — चारों लक्षण एक साथ प्रदर्शित करते हैं। मोलस्का में सच्चा प्रगुहा तो है पर खंडीभवन नहीं पाया जाता, इसलिए यह इस सूची में शामिल नहीं होता।

10NEET 2020 कॉर्डेटा के बारे में सही कथन चुनें — (क) यूरोकॉर्डेटा में पृष्ठरज्जु जीवनभर बनी रहती है (ख) कशेरुकियों में पृष्ठरज्जु केवल भ्रूणीय अवस्था में रहती है (ग) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पृष्ठीय व खोखला होता है (घ) कॉर्डेटा के तीन उपसंघ हैं।

उत्तर: (ख) व (ग) सत्य हैं।

कशेरुकियों में पृष्ठरज्जु सचमुच केवल भ्रूणीय अवस्था तक ही रहती है, वयस्क होने पर मेरुदंड में बदल जाती है — तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र सदैव पृष्ठीय व खोखला होता है। कथन (क) गलत है क्योंकि यूरोकॉर्डेटा में पृष्ठरज्जु केवल लार्वा अवस्था में पूँछ तक रहती है, वयस्क में लुप्त हो जाती है। कथन (घ) भी गलत है — हेमीकॉर्डेटा अब कॉर्डेटा का उपसंघ नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र संघ माना जाता है।

11NEET 2020 द्विपार्श्व सममित व अगुहीय (acoelomate) प्राणियों का उदाहरण कौन-सा है?

उत्तर: प्लेटीहेल्मिंथीज (Platyhelminthes)।

प्लेटीहेल्मिंथीज द्विपार्श्व सममित तो हैं, किंतु इनमें शरीर भित्ति व आहार नाल के बीच कोई गुहा नहीं पाई जाती (अगुहीय) — मीजोडर्म से बनी कोशिकाएँ पूरे स्थान को भरे रहती हैं।

12NEET 2021 सही कथन चुनें — (क) पीढ़ी-एकांतरण कृमियों में पाया जाता है (ख) एकाइनोडर्म त्रिकोरिक व प्रगुही होते हैं (ग) गोलकृमियों में अंगतंत्र स्तर का संगठन होता है (घ) टीनोफोर की कंकत पट्टिकाएँ पाचन में मदद करती हैं (च) जल संवहन तंत्र एकाइनोडर्मेटा की विशेषता है।

उत्तर: (ख), (ग) व (च) सही हैं।

एकाइनोडर्म सचमुच त्रिकोरिक व सच्चे प्रगुही होते हैं; गोलकृमियों (ऐस्केलमिंथीज) में वास्तव में अंगतंत्र स्तर का संगठन होता है; तथा जल संवहन तंत्र एकाइनोडर्मेटा की सबसे पहचान देने वाली विशेषता है। मेटाजेनेसिस वास्तव में सिलेंट्रेटा (जैसे ओबिलिया) में पाया जाता है, कृमियों में नहीं — तथा टीनोफोर की कंकत पट्टिकाएँ गमन (locomotion) में मदद करती हैं, पाचन में नहीं।

13NEET 2022 आर्थ्रोपोडा का बाह्यकंकाल किससे बना होता है?

उत्तर: काइटिन (Chitin)।

काइटिन एक नाइट्रोजन-युक्त पॉलीसैकेराइड है, जो आर्थ्रोपोडा के बाह्यकंकाल को हल्का पर मजबूत बनाता है — यह प्राणियों में पाया जाने वाला एक विशिष्ट संरचनात्मक पदार्थ है, जो कवक की कोशिका भित्ति में भी पाया जाता है।

14NEET 2022 अभिकथन (A): सभी कशेरुकी रज्जुकी हैं, पर सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं। कारण (R): वयस्क कशेरुकियों में पृष्ठरज्जु, कशेरुक दंड से प्रतिस्थापित हो जाती है।

उत्तर: A व R दोनों सही हैं, तथा R वास्तव में A की सही व्याख्या करता है।

यह इस अध्याय का सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला प्रश्न-प्रारूप है — कशेरुकी उपसंघ में पृष्ठरज्जु का मेरुदंड में बदलना ही वह अतिरिक्त लक्षण है, जो कशेरुकियों को बाकी कॉर्डेट्स से अलग करता है।

15NEET 2023 स्तनधारियों के विशिष्ट (यूनीक) लक्षण कौन-से हैं?

उत्तर: रोम (बाल), बाह्यकर्ण पालि (पिन्ना) तथा स्तन ग्रंथियाँ (mammary glands)।

ये तीनों लक्षण केवल स्तनधारियों में ही पाए जाते हैं व किसी अन्य कशेरुकी वर्ग में नहीं मिलते — इसलिए इन्हें स्तनधारी वर्ग की सबसे विश्वसनीय पहचान माना जाता है।

16NEET 2023 किस संघ के वयस्कों में अरीय सममिति नहीं पाई जाती?

उत्तर: हेमीकॉर्डेटा (Hemichordata)।

हेमीकॉर्डेटा (जैसे बैलेनोग्लॉसस) के वयस्क द्विपार्श्व सममित होते हैं, अरीय नहीं। इसके विपरीत टीनोफोरा, सिलेंट्रेटा तथा एकाइनोडर्मेटा (केवल वयस्क अवस्था में, लार्वा द्विपार्श्व होते हैं) — इन तीनों में अरीय सममिति पाई जाती है।

17NEET 2023 कॉर्डेट्स के संदर्भ में सही कथन चुनें — (क) मध्य-पृष्ठीय, ठोस व द्विक तंत्रिका-रज्जु (ख) बंद परिवहन तंत्र (ग) युग्मित ग्रसनीय क्लोम छिद्र (घ) पृष्ठीय हृदय (च) त्रिकोरिक कूटगुहिक।

उत्तर: (ग) व (घ) सही हैं (साथ में (क) भी — किंतु तंत्रिका-रज्जु पृष्ठीय, खोखली व एकल होती है, ठोस व द्विक नहीं)।

कॉर्डेट्स में युग्मित क्लोम छिद्र व पृष्ठीय हृदय — दोनों वास्तविक लक्षण हैं। कथन (क) में "ठोस व द्विक" गलत विवरण है — वास्तव में तंत्रिका-रज्जु खोखली व एकल होती है। कथन (च) पूर्णतः गलत है — कॉर्डेट्स त्रिकोरिक व सच्चे प्रगुही (कूटगुहिक नहीं) होते हैं।

18NEET 2024 कथनों पर विचार करें — (क) ऐनेलिड्स सच्चे प्रगुही हैं (ख) पोरीफेरा कूटगुहिक हैं (ग) ऐस्केलमिंथीज अगुहीय हैं (घ) प्लेटीहेल्मिंथीज कूटगुहिक हैं। सही कथन चुनें।

उत्तर: केवल (क) सही है।

ऐनेलिड्स सचमुच सच्चे प्रगुही (true coelomate) हैं। शेष तीनों कथन गलत हैं — पोरीफेरा वास्तव में अगुहीय होते हैं, कूटगुहिक नहीं; ऐस्केलमिंथीज वास्तव में कूटगुहिक होते हैं, अगुहीय नहीं; तथा प्लेटीहेल्मिंथीज वास्तव में अगुहीय होते हैं, कूटगुहिक नहीं।

19NEET 2025 नए मिले प्राणी के वयस्क में शरीर भित्ति की ओर मीजोडर्म मौजूद है, किंतु आहार नाल की ओर नहीं। प्रगुहा किस प्रकार की है?

उत्तर: कूटगुहा (Pseudocoelomate)।

यही कूटगुहा (स्यूडोसीलोम) की परिभाषित विशेषता है — इसमें गुहा केवल शरीर भित्ति की ओर आंशिक रूप से मीजोडर्म से आच्छादित होती है, आहार नाल की ओर से नहीं (जैसा कि सच्चे प्रगुही प्राणियों में होता है, जहाँ दोनों ओर मीजोडर्म का पूर्ण आवरण होता है)।

20NEET 2025 साइक्लोस्टोमेटा के सजीव सदस्य किस प्रकृति के होते हैं?

उत्तर: बाह्यपरजीवी (Ectoparasite)।

साइक्लोस्टोमेटा (जैसे पेट्रोमाइज़ॉन/लैम्प्रे व मिक्सीन) सभी बाह्यपरजीवी होते हैं — ये अपने वृत्ताकार चूषण-मुख से मछलियों की त्वचा से चिपककर उनका रक्त व ऊतक चूसते हैं।

21NEET 2026 गलत कथन चुनें — (क) प्लेटीहेल्मिंथीज में आहार तंत्र अपूर्ण (ख) वयस्क एकाइनोडर्म में द्विपार्श्व सममिति (ग) कूटगुहा ऐस्केलमिंथीज में (घ) कांड्रीक्थीज में पृष्ठरज्जु जीवनभर (च) सरीसृप स्थिर शरीर-तापमान रखते हैं।

उत्तर: (ख) व (च) — दोनों कथन गलत हैं।

वयस्क एकाइनोडर्म वास्तव में अरीय सममित होते हैं (केवल लार्वा द्विपार्श्व सममित होते हैं), इसलिए (ख) गलत है। सरीसृप असमतापी (poikilotherm) होते हैं, स्थिर शरीर-तापमान नहीं रख पाते, इसलिए (च) भी गलत है। शेष तीनों कथन ((क), (ग), (घ)) सही हैं।

22ReNEET 2026 कथन-I: अरीय सममिति की परिभाषा। कथन-II: एकाइनोडर्मेटा में वयस्क व लार्वा दोनों अरीय सममित होते हैं।

उत्तर: कथन-I सही है, किंतु कथन-II गलत है।

अरीय सममिति की परिभाषा (कथन-I) सही है। किंतु एकाइनोडर्मेटा में केवल वयस्क ही अरीय सममित होते हैं — इनके लार्वा वास्तव में द्विपार्श्व सममित होते हैं, इसलिए कथन-II गलत है।

23NEET 2026 जल में तैरने के लिए अग्रपाद पैडल जैसी संरचना में रूपांतरित, उड़ान-रहित पक्षी?

उत्तर: एप्टेनोडाइटीज़ (Aptenodytes) — पेंग्विन।

पेंग्विन के अग्रपाद उड़ान के बजाय जल में तैरने के लिए पैडल/फ्लिपर जैसी संरचना में विशेष रूप से रूपांतरित हो गए हैं — यह अनुकूलन इन्हें उत्कृष्ट तैराक बनाता है, भले ही ये उड़ नहीं सकते।

24ReNEET 2026 कॉर्डेट्स का लक्षण क्या नहीं है?

उत्तर: क्लोम (गिल्स) की अनुपस्थिति — यह कॉर्डेट्स का लक्षण नहीं है (क्योंकि क्लोम छिद्र वास्तव में उपस्थित होते हैं)।

कॉर्डेट्स की मूल पहचान ही युग्मित क्लोम छिद्रों की उपस्थिति (कम-से-कम भ्रूणीय अवस्था में) है — इनकी अनुपस्थिति कहना ही गलत होगा। पृष्ठरज्जु की उपस्थिति, पृष्ठीय केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तथा पश्च-गुदीय पूँछ — ये तीनों वास्तविक कॉर्डेट लक्षण हैं।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

महत्वपूर्ण
  • प्रगुहा-वर्गीकरण को कभी न उलटें — अगुहीय (एसीलोमेट): पोरीफेरा, सिलेंट्रेटा, प्लेटीहेल्मिंथीज। कूटगुहिक (स्यूडोसीलोमेट): केवल ऐस्केलमिंथीज। सच्चा प्रगुही (यूसीलोमेट): ऐनेलिडा से लेकर कॉर्डेटा तक बाकी सभी संघ। NEET लगभग हर वर्ष इन तीनों की जोड़ी उलट कर भ्रामक विकल्प बनाता है।
तुलनात्मक
  • अरीय बनाम द्विपार्श्व सममिति — अरीय: टीनोफोरा, सिलेंट्रेटा, तथा वयस्क एकाइनोडर्मेटा। द्विपार्श्व: बाकी लगभग सभी संघ, तथा एकाइनोडर्मेटा के लार्वा भी (केवल वयस्क अरीय होते हैं)। "एकाइनोडर्मेटा वयस्क व लार्वा दोनों अरीय हैं" जैसा कथन हमेशा गलत होता है।
तथ्य
  • संगठन के चार स्तर — कोशिकीय: पोरीफेरा; ऊतक: सिलेंट्रेटा व टीनोफोरा; अंग: प्लेटीहेल्मिंथीज व ऐस्केलमिंथीज; अंगतंत्र: ऐनेलिडा से आगे के सभी संघ। यह क्रम NEET में match-the-column प्रश्नों की रीढ़ है।
तुलनात्मक
  • कशेरुकी बनाम रज्जुकी — सभी कशेरुकी (वर्टीब्रेटा) रज्जुकी (कॉर्डेटा) हैं, पर सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं — क्योंकि यूरोकॉर्डेटा व सेफैलोकॉर्डेटा में पृष्ठरज्जु वयस्क होने पर भी मेरुदंड में नहीं बदलती।
तथ्य
  • असमतापी बनाम समतापी — मत्स्य, उभयचर व सरीसृप — तीनों असमतापी (poikilotherm/शीत-रक्त) हैं, जबकि पक्षी व स्तनधारी — दोनों समतापी (homeotherm/गर्म-रक्त) हैं।
रणनीति
  • NEET विश्लेषण के अनुसार प्राणि जगत से प्रतिवर्ष औसतन 3–7 प्रश्न आते हैं (2026 में सर्वाधिक 7 प्रश्न पूछे गए), जिनमें प्रगुहा-वर्गीकरण, सममिति, तथा कशेरुकी वर्गों (मत्स्य, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी) के विशिष्ट लक्षण सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले उप-विषय रहे हैं — हाल के वर्षों में बहु-कथन (statement-based) प्रश्नों की प्रवृत्ति भी तेज़ी से बढ़ी है।

संक्षिप्त सार

वर्गीकरण के मूल आधार

संगठन का स्तर, सममिति, भ्रूणीय परतों की संख्या, प्रगुहा की उपस्थिति, खंडीभवन तथा पृष्ठरज्जु — ये सभी लक्षण मिलकर प्राणि जगत को व्यवस्थित समूहों में बाँटने का आधार बनते हैं।

सरल संगठन वाले संघ

पोरीफेरा, सिलेंट्रेटा व टीनोफोरा में क्रमशः कोशिकीय व ऊतक स्तर का संगठन पाया जाता है। इनमें प्रगुहा व खंडीभवन दोनों अनुपस्थित रहते हैं।

कृमि व खंडित प्राणी

प्लेटीहेल्मिंथीज, ऐस्केलमिंथीज व ऐनेलिडा में क्रमशः अगुहीय, कूटप्रगुही व प्रगुही शरीर संरचना देखी जाती है; ऐनेलिडा में सच्चा खंडीभवन पाया जाता है।

बड़े व जटिल संघ

आर्थ्रोपोडा सबसे बड़ा तथा मोलस्का दूसरा सबसे बड़ा संघ है। एकाइनोडर्मेटा की पहचान जल संवहन तंत्र से होती है।

कॉर्डेटा

पृष्ठरज्जु, पृष्ठ खोखली तंत्रिका-रज्जु व क्लोम छिद्रों वाले प्राणी रज्जुकी कहलाते हैं। इसे साइक्लोस्टोमेटा, कांड्रीक्थीज, ऑस्टिक्थीज, एम्फीबिया, रेप्टिलिया, एवीज व मैमल्स — सात वर्गों में बाँटा गया है।

? प्रश्न-उत्तर

हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

प्रश्न 1 यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में क्या परेशानियाँ आ सकती हैं?
उत्तर

बिना मूलभूत लक्षणों (जैसे संगठन का स्तर, सममिति, प्रगुहा की स्थिति, खंडीभवन, पृष्ठरज्जु) की जानकारी के हम केवल बाहरी रूप-रंग के आधार पर प्राणी को वर्गीकृत करने को मजबूर हो जाएँगे, जो अक्सर भ्रामक साबित होता है। दो पूरी तरह असंबंधित प्राणी दिखने में एक जैसे लग सकते हैं (जैसे व्हेल और मछली), जबकि करीबी रिश्तेदार प्राणी बाहर से बिल्कुल अलग दिख सकते हैं। इससे प्राणी को गलत समूह में रखे जाने, नई प्रजाति की पहचान न हो पाने तथा जैव विकास संबंधी वास्तविक रिश्तों को समझने में गंभीर त्रुटियाँ हो सकती हैं।

प्रश्न 2 यदि आपको एक नमूना (स्पेसिमेन) दे दिया जाए तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएंगे?
उत्तर

सबसे पहले शरीर की सममिति की जाँच करूँगा — असममित, अरीय या द्विपार्श्व। इसके बाद संगठन के स्तर को देखूँगा कि वह कोशिकीय, ऊतक, अंग अथवा अंगतंत्र स्तर का है। फिर भ्रूणीय परतों की संख्या (द्विकोरिक या त्रिकोरिक), शरीर गुहा की उपस्थिति व प्रकार (अगुहीय, कूटप्रगुही या प्रगुही), खंडीभवन की उपस्थिति, तथा पृष्ठरज्जु व क्लोम छिद्रों जैसी संरचनाओं की मौजूदगी की पड़ताल करूँगा। इन सभी लक्षणों का मिलान करके नमूने को उपयुक्त संघ व वर्ग में रखा जा सकता है।

प्रश्न 3 देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर

शरीर भित्ति और आहार नाल के बीच पाई जाने वाली गुहा की उपस्थिति, अनुपस्थिति तथा उसकी बनावट प्राणियों को तीन स्पष्ट समूहों में बाँटने में मदद करती है — अगुहीय (जैसे प्लेटीहेल्मिंथीज, जहाँ गुहा सिरे से नहीं होती), कूटगुहिक (जैसे ऐस्केलमिंथीज, जहाँ गुहा मीजोडर्म से पूरी तरह घिरी नहीं होती), और प्रगुही (जैसे ऐनेलिडा से लेकर कॉर्डेटा तक, जहाँ गुहा पूरी तरह मीजोडर्म से आच्छादित होती है)। यह वर्गीकरण प्राणियों की शारीरिक जटिलता व विकासात्मक स्तर को समझने में बेहद उपयोगी साबित होता है।

प्रश्न 4 अंतःकोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद करें।
उत्तर

अंतःकोशिकीय पाचन उस स्थिति को कहते हैं जब भोजन का पाचन कोशिका के भीतर ही संपन्न होता है — जैसा कि पोरीफेरा व सिलेंट्रेटा जैसे सरल प्राणियों में होता है, जहाँ कोशिकाएँ भोजन के कणों को सीधे निगल लेती हैं।

बाह्य कोशिकीय पाचन में भोजन का विघटन शरीर के भीतर किसी गुहा या नली (जैसे आहार नाल) में होता है, जिसके बाद पचा हुआ भोजन कोशिकाओं द्वारा अवशोषित किया जाता है — यह अधिकांश उच्च प्राणियों (जैसे ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, कॉर्डेटा आदि) में देखा जाता है।

प्रश्न 5 प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अंतर है?
उत्तर

प्रत्यक्ष परिवर्धन में अंडे से निकलने वाला शिशु सीधे वयस्क जैसी बनावट में ही जन्म लेता है, बिना किसी बीच की लार्वा अवस्था के — जैसे अधिकांश सरीसृप व पक्षी।

अप्रत्यक्ष परिवर्धन में शिशु पहले एक या अधिक लार्वा अवस्थाओं से गुजरता है, जो वयस्क से बिल्कुल अलग दिखती हैं, और फिर कायांतरण द्वारा वयस्क रूप में बदलता है — जैसे मेंढक (टैडपोल अवस्था) व अधिकांश कीट।

प्रश्न 6 परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज के विशेष लक्षण बताएं।
उत्तर

परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज (जैसे टीनिया व फैसियोला) में परपोषी के शरीर से चिपकने के लिए स्पष्ट अंकुश व चूषक पाए जाते हैं। कई प्रजातियाँ भोजन को परपोषी से सीधे अपने शरीर की सतह से ही अवशोषित कर लेती हैं, इसलिए इनकी अपनी आहार नाल अक्सर सरल या अनुपस्थित होती है। ज्वाला कोशिकाएँ परासरण-नियंत्रण व उत्सर्जन में मदद करती हैं। नर व मादा अंग एक ही जीव में पाए जाते हैं (उभयलिंगाश्रयी), निषेचन आंतरिक होता है, और परिवर्धन में कई लार्वा अवस्थाएँ शामिल होती हैं, जो इन्हें एक परपोषी से दूसरे तक फैलने में मदद करती हैं।

प्रश्न 7 आर्थ्रोपोडा प्राणि-समूह का सबसे बड़ा संघ है, इस कथन के प्रमुख कारण बताएं।
उत्तर

पृथ्वी पर पाई जाने वाली कुल ज्ञात प्राणी-प्रजातियों में से लगभग दो-तिहाई हिस्सा अकेले आर्थ्रोपोडा संघ का है, जिसमें सभी कीट भी शामिल हैं। इसका मुख्य कारण इनका बेहद अनुकूलनशील शरीर-ढाँचा है — काइटिन का हल्का पर मजबूत बाह्यकंकाल, संधियुक्त पाद जो अलग-अलग कार्यों (चलना, तैरना, उड़ना, भोजन पकड़ना) के लिए रूपांतरित हो सकते हैं, तथा छोटे आकार व तेज़ प्रजनन दर के कारण ये लगभग हर पारिस्थितिक क्षेत्र (जल, थल, वायु) में सफलतापूर्वक बस गए हैं।

प्रश्न 8 जल संवहन-तंत्र किस संघ के मुख्य लक्षण हैं?
उत्तर

एकाइनोडर्मेटा — जल संवहन तंत्र इसी संघ की सबसे विशिष्ट व पहचान देने वाली संरचना है, जो गमन, भोजन पकड़ने तथा श्वसन में सहायता करता है।

प्रश्न 9 "सभी कशेरुकी रज्जुकी हैं, लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं" — इस कथन को सिद्ध करें।
उत्तर

कॉर्डेटा संघ की पहचान तीन मूलभूत लक्षणों से होती है — पृष्ठरज्जु, पृष्ठ खोखली तंत्रिका-रज्जु तथा क्लोम छिद्र। कशेरुकी (वर्टीब्रेटा) इन सभी लक्षणों के साथ-साथ एक अतिरिक्त विशेषता भी रखते हैं — भ्रूणीय पृष्ठरज्जु का वयस्क होते-होते अस्थिल या उपास्थिल मेरुदंड में बदल जाना। इसलिए हर कशेरुकी में कॉर्डेटा के सभी लक्षण मौजूद होते हैं, यानी हर कशेरुकी रज्जुकी है। लेकिन यूरोकॉर्डेटा व सेफैलोकॉर्डेटा जैसे उपसंघों (उदाहरण: एसिडिया, ब्रैंकिओस्टोमा) में पृष्ठरज्जु जीवनभर बनी रहती है और कभी मेरुदंड में परिवर्तित नहीं होती — इनमें कशेरुकाएँ नहीं बनतीं। इसलिए ये रज्जुकी तो हैं, पर कशेरुकी नहीं।

प्रश्न 10 मछलियों में वायु-आशय (एयर ब्लैडर) की उपस्थिति का क्या महत्व है?
उत्तर

वायु-आशय ऑस्टिक्थीज (अस्थिल मछलियों) में पाया जाने वाला एक थैलीनुमा अंग है, जो मछली को पानी में उत्प्लावन बनाए रखने में मदद करता है — इससे मछली बिना लगातार तैरे भी अपनी गहराई में स्थिर रह पाती है और ऊर्जा की बचत होती है। इसके विपरीत कांड्रीक्थीज (उपास्थिल मछलियों जैसे शार्क) में यह अंग नहीं होता, इसीलिए उन्हें डूबने से बचने के लिए हमेशा गतिशील रहना पड़ता है।

प्रश्न 11 पक्षियों में उड़ने हेतु क्या-क्या रूपांतरण हुए हैं?
उत्तर

पक्षियों के शरीर में उड़ान के लिए कई खास अनुकूलन विकसित हुए हैं: अग्रपाद रूपांतरित होकर पंख बन गए हैं; अंतःकंकाल की लंबी अस्थियाँ खोखली व वायुकोष युक्त होती हैं जिससे शरीर हल्का रहता है; शरीर धारारेखीय आकार का होता है जो हवा में घर्षण कम करता है; त्वचा पर तेल-ग्रंथि के अतिरिक्त कोई ग्रंथि नहीं होती जिससे शरीर हल्का व शुष्क बना रहता है; तथा ये समतापी होते हैं, जिससे ऊँचाई पर भी शरीर का तापमान स्थिर रहता है और उड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा-उपापचय बना रहता है।

प्रश्न 12 अंडजनक तथा जरायुज द्वारा उत्पन्न अंडे या बच्चे संख्या में बराबर होते हैं? यदि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर

नहीं, आमतौर पर ये संख्या में बराबर नहीं होते। अंडजनक प्राणी (जैसे अधिकांश मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप व पक्षी) सामान्यतः बहुत बड़ी संख्या में अंडे देते हैं, क्योंकि निषेचन के बाद अंडा परपोषी शरीर से बाहर विकसित होता है और उसे प्राकृतिक शिकारियों व पर्यावरणीय खतरों का सामना अकेले करना पड़ता है — इसलिए अधिक संख्या में अंडे देकर कुछ के जीवित बचने की संभावना बढ़ाई जाती है। इसके विपरीत जरायुज प्राणी (जैसे अधिकांश स्तनधारी) अपेक्षाकृत बहुत कम संतान को जन्म देते हैं, क्योंकि भ्रूण माता के शरीर के भीतर सुरक्षित रहकर विकसित होता है और जन्म के बाद भी माता-पिता द्वारा उसकी देखभाल की जाती है, जिससे जीवित बचने की दर पहले से ही ऊँची होती है।

प्रश्न 13 निम्नलिखित में से शारीरिक खंडीभवन किसमें पहले देखा गया?
उत्तर

ऐनेलिडा — ऐनेलिडा प्राणि जगत का पहला ऐसा संघ है जिसमें शरीर बाहर व भीतर, दोनों ओर से स्पष्ट क्रमबद्ध खंडों में बँटा हुआ पाया जाता है — केंचुए में यह विशेषता बहुत साफ देखी जा सकती है।

प्रश्न 14 निम्न का मिलान करें:
उत्तर
लक्षणसंबंधित संघ/वर्ग
प्रच्छद (ऑपरकुलम)ऑस्टिक्थीज
पार्श्वपादऐनेलिडा
शल्करेप्टेलिया
कंकत पट्टिका (कॉम्बप्लेट)टीनोफोरा
रेडूलामोलस्का
बाल (रोम)मैमेलिया
कीपकोशिका (कोएनोसाइट)पोरीफेरा
क्लोमछिद्रसाइक्लोस्टोमेटा एवं कांड्रीक्थीज
प्रश्न 15 मनुष्यों पर पाए जाने वाले कुछ परजीवियों के नाम लिखें।
उत्तर

मनुष्य के शरीर में विभिन्न संघों से जुड़े कई परजीवी पाए जाते हैं, जैसे — टीनिया (फीताकृमि, प्लेटीहेल्मिंथीज), फैसियोला (यकृत/पर्णकृमि, प्लेटीहेल्मिंथीज), एस्केरिस (गोलकृमि, ऐस्केलमिंथीज), वुचेरेरिया (फाइलेरियाकृमि, ऐस्केलमिंथीज), एनसाइलोस्टोमा (अंकुशकृमि, ऐस्केलमिंथीज) तथा हीरुडिनेरिया (रक्तचूषक जोंक, ऐनेलिडा)।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री प्राणि जगत के बुनियादी वर्गीकरण-सिद्धांतों तथा ग्यारह प्रमुख संघों को मौलिक व सरल भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें तुलनात्मक तालिकाएँ तथा प्रश्नोत्तर शामिल हैं।

कोशिकीय स्तर से लेकर अंगतंत्र स्तर तक — प्राणियों की संरचनात्मक विविधता प्रकृति की सबसे अद्भुत कहानियों में से एक है।

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