पुष्पी पादपों की आकारिकी — विस्तृत अध्ययन सामग्री
वनस्पति विज्ञान • बाह्य संरचना का अध्ययन

पुष्पी पादपों की आकारिकी

जड़ें जो मिट्टी से पानी खींचती हैं, तना जो पूरे पौधे को सहारा देता है, पत्तियाँ जो भोजन बनाती हैं, और फूल जो अगली पीढ़ी की शुरुआत करते हैं — इस अध्याय में हम पुष्पी पादप के हर बाहरी हिस्से को बारीकी से समझेंगे, ताकि किसी भी पौधे को देखकर उसकी बनावट पढ़ी जा सके।

भूमिका पुष्पी पादप की पहचान कैसे करें

अगर आप कभी बगीचे से कोई खरपतवार जड़ समेत उखाड़ें, तो आप पाएँगे कि उसमें भी मूल, तना और पत्तियाँ ज़रूर मौजूद होती हैं — भले ही वह पौधा कितना भी छोटा या मामूली क्यों न लगे। कई बार उसमें फूल और फल भी लगे मिल जाते हैं। यही बुनियादी बनावट किसी भी पुष्पी पादप (एंजियोस्पर्म) की पहचान है, और इसे समझना आगे के जीव विज्ञान अध्ययन की नींव है।

दो मुख्य तंत्र किसी भी पुष्पी पादप को दो बड़े हिस्सों में बाँटा जा सकता है — मूल तंत्र, जो पौधे का भूमिगत (मिट्टी के भीतर वाला) भाग है, और प्रोरोह तंत्र, जो पौधे का ज़मीन के ऊपर वाला भाग है और जिसमें तना, पत्तियाँ, फूल तथा फल शामिल होते हैं।

पौधों की बाहरी बनावट में भारी विविधता देखने को मिलती है — यह विविधता दरअसल अलग-अलग वातावरण के हिसाब से पौधों के ढल जाने (अनुकूलन) का नतीजा है। कोई पौधा रेगिस्तान में पानी बचाने के लिए मोटी पत्तियाँ विकसित करता है, तो कोई दीवार पर चढ़ने के लिए विशेष अंग बना लेता है। इस विविधता को ठीक से समझने और एक-दूसरे से तुलना करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक साझी, मानक शब्दावली विकसित की है — यही शब्दावली इस अध्याय का मूल आधार है।

1 मूल तंत्र

पौधे की नींव — मिट्टी में गहराई तक फैला हुआ भाग

ज्यादातर द्विबीजपत्री पौधों में बीज के अंकुरण के समय मूलांकुर लंबा होकर एक मुख्य जड़ बनाता है, जिसे प्राथमिक मूल कहा जाता है। इस मुख्य जड़ से समय के साथ पतली-पतली शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें द्वितीयक और उससे भी महीन शाखाओं को तृतीयक मूल कहा जाता है। प्राथमिक मूल और इसकी सारी शाखाएँ मिलकर एक गहरी, मुख्य जड़ वाला ढाँचा बनाती हैं, जिसे मूसला मूलतंत्र कहते हैं — सरसों का पौधा इसका अच्छा उदाहरण है।

तीन तरह की जड़ें एकबीजपत्री पौधों (जैसे गेहूँ) में प्राथमिक मूल जल्दी ही सूख जाती है, और उसकी जगह तने के आधार से कई पतली-पतली जड़ें एक साथ निकल आती हैं — इसे झकड़ा (तंतुक) मूलतंत्र कहते हैं। कुछ पौधों (जैसे घास व बरगद) में जड़ें मूलांकुर से नहीं, बल्कि पौधे के किसी अन्य भाग — जैसे तने या पत्ती — से निकलती हैं। इन्हें अपस्थानिक मूल कहा जाता है।

मूल तंत्र का काम सिर्फ पौधे को मिट्टी में जकड़े रखना नहीं है। यह मिट्टी से पानी और खनिज लवणों को सोखता है, कई बार खाद्य पदार्थों को संचित भी करता है, और पौधे की वृद्धि को नियंत्रित करने वाले कुछ रासायनिक पदार्थों (पादप नियमकों) का संश्लेषण भी करता है।

मूल के विभिन्न क्षेत्र

जड़ का सबसे आगे वाला नुकीला सिरा एक टोपी जैसी संरचना — मूल गोप — से ढका रहता है, जो जड़ को मिट्टी में घुसते समय होने वाली रगड़ से बचाता है। मूल गोप से थोड़ा ऊपर एक क्षेत्र होता है जहाँ कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं — इसे मेरिस्टेमी क्रियाशीलता का क्षेत्र कहते हैं। इस क्षेत्र की कोशिकाएँ बहुत छोटी, पतली भित्ति वाली और घने कोशिकाद्रव्य से भरी होती हैं।

इसके ठीक ऊपर वाला हिस्सा दीर्घीकरण क्षेत्र कहलाता है, जहाँ कोशिकाएँ तेज़ी से लंबाई में बढ़ती हैं और जड़ को आगे धकेलती हैं। दीर्घीकरण क्षेत्र के ठीक बाद वाला हिस्सा परिपक्व क्षेत्र कहलाता है, जहाँ कोशिकाएँ अपनी अंतिम बनावट व कार्यक्षमता हासिल कर लेती हैं। इसी क्षेत्र से बेहद पतले, बाल जैसे रोम निकलते हैं जिन्हें मूलरोम कहा जाता है — यही मूलरोम मिट्टी से पानी व खनिज लवण सोखने का असली काम करते हैं।

2 तना (स्तंभ)

पौधे की ऊपरी धुरी जो पूरे प्रोरोह को थामे रहती है

तना दरअसल अंकुरित बीज के भ्रूण के प्रांकुर से विकसित होने वाला वह अक्ष है जिस पर शाखाएँ, पत्तियाँ, फूल तथा फल लगे होते हैं। तने पर कुछ खास जगहें होती हैं जहाँ से पत्तियाँ निकलती हैं, इन्हें गाँठ कहा जाता है, जबकि दो गाँठों के बीच के हिस्से को पोरी कहते हैं। जब पौधा अपनी शुरुआती अवस्था में होता है, तब तना आमतौर पर हरा व मुलायम रहता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह अक्सर कठोर और गहरे भूरे रंग का काष्ठीय तना बन जाता है।

तना और जड़ में अंतर कैसे करें? तने की पहचान उसकी गाँठों और पोरियों की मौजूदगी, ऊपर की ओर बढ़ने की सीधी वृद्धि प्रवृत्ति (धनात्मक प्रकाशानुवर्तिता), तथा उस पर पाए जाने वाले बहुकोशिक रोमों से होती है — ये तीनों विशेषताएँ जड़ में सामान्यतः नहीं मिलतीं।

तने का मुख्य काम शाखाओं को फैलाना और पत्ती, फूल व फल को सहारा देकर सही स्थिति में रखना है। इसके अंदर से पानी, खनिज लवण तथा प्रकाश-संश्लेषण से बने भोजन का संवहन (आवागमन) होता रहता है। कुछ खास तनों में भोजन का भंडारण, सहारा देना, सुरक्षा प्रदान करना, तथा कायिक प्रवर्धन (बिना बीज के नए पौधे उगाना) जैसे अतिरिक्त काम भी होते हैं।

3 पत्ती

पौधे की खाद्य-निर्माण इकाई

पत्ती तने पर पार्श्व दिशा में लगी एक चपटी संरचना है, जो हमेशा किसी गाँठ पर पाई जाती है और जिसके कक्ष (आधार) में एक कली छिपी होती है, जिसे बाद में शाखा में विकसित हो सकने की क्षमता के कारण कक्षीय कली कहा जाता है। पत्तियाँ तने के सबसे ऊपरी सिरे पर मौजूद मेरिस्टेम ऊतक से निकलती हैं और हमेशा अग्राभिसारी क्रम में (यानी सबसे पुरानी पत्ती सबसे नीचे व सबसे नई सबसे ऊपर) व्यवस्थित रहती हैं। पत्तियाँ पौधे के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यही भोजन का निर्माण करती हैं।

एक प्ररूपी (आदर्श) पत्ती के तीन भाग होते हैं:

पर्णाधार → पर्णवृंत → स्तरिका

पत्ती पर्णाधार की मदद से तने से जुड़ी रहती है, पर्णवृंत उसे सही दिशा और हलचल देता है, और स्तरिका ही पत्ती का हरा, फैला हुआ मुख्य हिस्सा है।

पत्ती अपने पर्णाधार की मदद से तने से जुड़ी रहती है, और इसी आधार से कभी-कभी दो छोटी-छोटी पार्श्व पत्तियाँ भी निकलती हैं जिन्हें अनुपर्ण कहा जाता है। एकबीजपत्री पौधों में पर्णाधार चादर की तरह फैलकर तने को पूरा या आंशिक रूप से ढक लेता है। कुछ फलीदार (लेग्यूमी) पौधों में पर्णाधार ही फूल जाता है, ऐसे पर्णाधार को पर्णवृंततुल्य (पल्वाइनस) कहा जाता है।

पर्णवृंत पत्ती को इस तरह से टिकाए रखता है कि उसे अधिकतम धूप मिल सके — यह लंबा, पतला व लचीला होता है, जिससे स्तरिका हवा में हिलती रहती है और उसे लगातार ताज़ी हवा मिलती रहती है। स्तरिका पत्ती का हरा-भरा, फैला हुआ भाग है जिसमें शिराओं व शिरिकाओं का जाल बिछा रहता है। इनके बीचोंबीच एक स्पष्ट, मोटी शिरा होती है जिसे मध्यशिरा कहते हैं — यह पत्ती को मज़बूती देती है और पानी, खनिज व भोजन के आवागमन के लिए नलिका जैसा काम करती है।

शिराविन्यास

पत्ती पर शिरा व शिरिकाओं के बिछने के तरीके को शिराविन्यास कहा जाता है। जब शिरिकाएँ स्तरिका पर एक जाल जैसी बनावट बनाती हैं, तो इसे जालिका शिराविन्यास कहते हैं — यह अमूमन द्विबीजपत्री पौधों में मिलता है। इसके विपरीत जब शिरिकाएँ आपस में समानांतर चलती हैं, तो उसे समानांतर शिराविन्यास कहा जाता है, जो प्रायः एकबीजपत्री पौधों की पहचान है।

पत्ती के प्रकार

जब पत्ती की स्तरिका बिना किसी गहरे कटाव के पूरी तरह जुड़ी हुई होती है, या कटी भी हो लेकिन वह कटाव मध्यशिरा तक न पहुँचे, तो ऐसी पत्ती को सरल पत्ती कहा जाता है। वहीं जब स्तरिका का कटाव मध्यशिरा तक पहुँच जाता है और वह पूरी तरह अलग-अलग पत्रकों में बँट जाती है, तो उसे संयुक्त पत्ती कहते हैं। पहचान की एक आसान तरकीब यह है कि सरल व संयुक्त, दोनों तरह की पत्तियों में पर्णवृंत के कक्ष में कली होती है, लेकिन संयुक्त पत्ती के अलग-अलग पत्रकों के कक्ष में कोई कली नहीं होती।

संयुक्त पत्ती का प्रकारबनावटउदाहरण
पिच्छाकार संयुक्त पत्तीसारे पत्रक एक ही मुख्य अक्ष (मध्यशिरा) पर व्यवस्थितनीम
हस्ताकार संयुक्त पत्तीसारे पत्रक पर्णवृंत की चोटी वाले एक ही बिंदु से जुड़ेसिल्क कॉटन वृक्ष

पर्णविन्यास

तने या शाखा पर पत्तियों के व्यवस्थित होने के तरीके को पर्णविन्यास कहा जाता है, जो मुख्यतः तीन प्रकार का होता है। एकांतर पर्णविन्यास में हर गाँठ पर बारी-बारी से एक ही पत्ती लगी रहती है (जैसे गुड़हल, सरसों)। सम्मुख पर्णविन्यास में हर गाँठ पर एक जोड़ी पत्तियाँ आमने-सामने लगती हैं (जैसे अमरूद)। और जब एक ही गाँठ पर दो से ज्यादा पत्तियाँ निकलकर एक चक्र-सी आकृति बनाती हैं, तो उसे चक्करदार पर्णविन्यास कहा जाता है (जैसे डेविल ट्री)।

4 पुष्पक्रम

तने पर फूलों के सजने का क्रम

फूल दरअसल एक रूपांतरित प्ररोह ही है, जहाँ प्ररोह के शीर्षस्थ मेरिस्टेम ऊतक ने अपना रास्ता बदलकर खुद को पुष्पी मेरिस्टेम में बदल लिया होता है। इस बदलाव के बाद पोरियाँ लंबाई में बढ़ना बंद कर देती हैं और अक्ष दबकर छोटा रह जाता है, जिसकी गाँठों पर सामान्य पत्तियों की जगह अब पुष्पी उपांग निकलने लगते हैं। पुष्पी अक्ष पर फूलों के लगे रहने के इसी क्रम को पुष्पक्रम कहा जाता है।

दो बड़े प्रकार जिस पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष लगातार लंबाई में बढ़ता रहता है और फूल पार्श्व में अग्राभिसारी क्रम (नीचे से ऊपर की ओर) में लगते हैं, उसे असीमाक्षी पुष्पक्रम कहते हैं। इसके विपरीत जब मुख्य अक्ष के ठीक शीर्ष पर ही फूल लग जाता है — जिससे आगे उस अक्ष की वृद्धि रुक जाती है — तो उसे ससीमाक्षी पुष्पक्रम कहा जाता है, और इसमें फूल तलाभिसारी क्रम (ऊपर से नीचे की ओर) में लगे रहते हैं।

5 पुष्प

पौधे का सबसे ध्यानाकर्षी और लैंगिक जनन के लिए ज़िम्मेदार अंग

एंजियोस्पर्म पौधों में फूल एक बेहद अहम रूपांतरित प्ररोह है, जो पूरी तरह लैंगिक जनन के लिए बना है। किसी भी प्ररूपी फूल में चार तरह की संरचनाएँ एक फूले हुए पुष्पवृंत (जिसे पुष्पासन कहते हैं) पर क्रमबद्ध रूप से सजी रहती हैं — केलिक्स, कोरोला, पुमंग तथा जायांग। इनमें से केलिक्स व कोरोला सहायक (सहायता देने वाले) अंग हैं, जबकि पुमंग व जायांग असली लैंगिक अंग हैं। कुछ फूलों (जैसे प्याज) में केलिक्स और कोरोला में कोई अंतर नहीं होता, तब इन्हें साझे तौर पर परिदलपुंज कहा जाता है।

जब किसी फूल में पुंकेसर और जायांग दोनों मौजूद हों तो उसे द्विलिंगी (उभयलिंगी) कहा जाता है, और यदि उसमें केवल एक ही (या तो पुंकेसर या अंडप) मौजूद हो तो उसे एकलिंगी कहते हैं। सममिति के आधार पर फूल त्रिज्यसममित (जैसे सरसों, धतूरा, मिर्च — जिन्हें किसी भी ऊर्ध्वाधर तल से काटने पर दो बराबर हिस्से मिलते हैं) या एकव्याससममित (जैसे मटर, गुलमोहर, सेम — जिन्हें केवल एक ही निश्चित तल से काटने पर बराबर हिस्से मिलते हैं) हो सकते हैं। जब फूल को किसी भी तल से बराबर हिस्सों में नहीं बाँटा जा सकता, उसे असममित (अनियमित) कहा जाता है, जैसे केना।

पुष्पासन पर अंगों की स्थिति

पुष्पवृंत पर केलिक्स, कोरोला, पुमंग तथा अंडाशय की आपसी सापेक्ष ऊँचाई के आधार पर फूल को तीन प्रकारों में बाँटा जाता है। अधोजायांगता में जायांग सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित होता है और अन्य सभी अंग उससे नीचे रहते हैं — ऐसे फूलों का अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती कहलाता है (जैसे सरसों, गुड़हल, बैंगन)। परिजायांगता में अंडाशय बीचोंबीच होता है जबकि अन्य अंग लगभग उतनी ही ऊँचाई पर पुष्पासन के किनारों पर स्थित रहते हैं, और अंडाशय आधा अधोवर्ती होता है (जैसे गुलाब, आड़ू)। अधिजायांगता में पुष्पासन के किनारे ऊपर की ओर बढ़कर अंडाशय को पूरी तरह घेर लेते हैं तथा उससे जुड़ जाते हैं, जिस कारण फूल के बाकी अंग अंडाशय के ऊपर उगते नज़र आते हैं और अंडाशय अधोवर्ती कहलाता है (जैसे अमरूद, घीया)।

केलिक्स (बाह्यदल पुंज)

फूल का सबसे बाहरी चक्र

केलिक्स फूल की सबसे बाहरी परत है और इसकी हर इकाई को बाह्यदल कहते हैं। बाह्यदल आमतौर पर हरे व पत्तीनुमा होते हैं, और कली अवस्था में फूल की रक्षा करते हैं। केलिक्स के बाह्यदल आपस में जुड़े हुए (संयुक्त बाह्यदली) या अलग-अलग (मुक्त/पृथक बाह्यदली) हो सकते हैं।

कोरोला (दल पुंज)

परागण के लिए कीटों को आकर्षित करने वाला भाग

कोरोला रंग-बिरंगी पंखुड़ियों से बना होता है, जो आमतौर पर चमकीले रंग की होती हैं ताकि परागण के लिए कीटों को अपनी ओर खींच सकें। केलिक्स की तरह कोरोला भी संयुक्त-दली या पृथक-दलीय हो सकता है, और इसकी आकृति नलिकाकार, घंटाकार, कीप-आकार अथवा चक्राकार हो सकती है।

पुष्पदल विन्यास

पुष्पकली में एक ही चक्र की इकाइयों (बाह्यदल या दल) के आपस में लगे रहने के क्रम को पुष्पदल विन्यास कहते हैं। इसके चार मुख्य प्रकार हैं — कोरस्पर्शी (केवल किनारे छूते हैं, जैसे केलोट्रोपिस), व्यावर्तित (हर दल अगले दल पर अतिव्याप्त होता है, जैसे गुड़हल, भिंडी, कपास), कोरछादी (अतिव्याप्ति की कोई तय दिशा नहीं होती, जैसे केसिया, गुलमोहर), और वैक्जीलेरी (पैपिलिओनेसियस), जिसमें पाँच दलों में से सबसे बड़ा दल (मानक/पंख) बाकी दो छोटे दलों (कूटक) को ढँकता है, जैसा मटर व सेम में देखा जाता है।

पुमंग

फूल का नर जनन अंग

पुमंग पुंकेसरों से मिलकर बनता है। हर पुंकेसर में एक तंतु तथा एक परागकोश होता है, जो सामान्यतः द्विपालक होता है और जिसकी हर पालि में दो परागकोष्ठक पाए जाते हैं जिनमें परागकण भरे होते हैं। कुछ पुंकेसर बंध्य होते हैं, यानी जनन में असमर्थ — इन्हें स्टेमिनोएड कहा जाता है। पुंकेसर दल से जुड़े (दललग्न, जैसे बैंगन), परिदलपुंज से जुड़े (परिदल लग्न, जैसे लिली), मुक्त (जैसे कई फूलों में), एक गुच्छे में बंधे (एकसंघी, जैसे गुड़हल), दो गुच्छों में बंटे (द्विसंघी, जैसे मटर), या दो से अधिक बंडलों में (बहुसंघी, जैसे सिट्रस) हो सकते हैं।

जायांग

फूल का मादा जनन अंग

जायांग एक या अधिक अंडपों से मिलकर बनता है। हर अंडप के तीन भाग होते हैं — वर्तिका, वर्तिकाग्र तथा अंडाशय। अंडाशय का आधार फूला हुआ होता है, जिस पर एक लंबी नली — वर्तिका — टिकी रहती है, जो अंडाशय को वर्तिकाग्र से जोड़ती है। वर्तिकाग्र, जो आमतौर पर वर्तिका की चोटी पर होता है, परागकणों को ग्रहण करता है। जब एक से अधिक अंडप आपस में अलग-अलग हों (जैसे गुलाब व कमल में) तो उसे वियुक्तांडपी (एपोकार्पस) कहते हैं, और जब वे आपस में जुड़े हों (जैसे मटर व टमाटर में) तो उसे युक्तांडपी (सिनकार्पस) कहा जाता है।

बीजांडन्यास

अंडाशय में बीजांड के लगे रहने के तरीके को बीजांडन्यास कहा जाता है, जो मुख्यतः छह प्रकार का होता है:

  • सीमांत — बीजांडासन अंडाशय के अधर सीवन के साथ-साथ एक कटक बनाता है और बीजांड दो कतारों में उसी कटक पर लगे रहते हैं (जैसे मटर)।
  • स्तंभीय — बीजांडासन अक्षीय होता है और बीजांड बहुकोष्ठकी अंडाशय पर लगे होते हैं (जैसे गुड़हल, टमाटर, नींबू)।
  • भित्तीय — बीजांड अंडाशय की भीतरी भित्ति या परिधीय भाग पर लगे रहते हैं; अंडाशय एक ही कोष्ठक का होता है लेकिन आभासी पट बनने से दो कोष्ठकों में बँट जाता है (जैसे सरसों/क्रुसीफर कुल)।
  • मुक्तस्तंभीय — बीजांड केंद्रीय अक्ष पर होते हैं और यह अक्ष पुटीय (कोष्ठकों में बँटा हुआ) नहीं होता (जैसे डायएंथस, प्रिमरोज)।
  • आधारी — बीजांडासन अंडाशय के बिल्कुल आधार पर होता है और उसमें सिर्फ एक ही बीजांड लगा होता है (जैसे सूरजमुखी, गेंदा)।

6 फल

निषेचन के बाद बना परिपक्व अंडाशय

फल पुष्पी पादपों की एक प्रमुख पहचान है। यह असल में एक परिपक्व अंडाशय ही है, जो निषेचन के बाद विकसित होता है। लेकिन कुछ पौधों में बिना निषेचन के भी फल बन जाता है — ऐसे फल को अनिषेकी (पार्थेनोकार्पिक) फल कहा जाता है।

आमतौर पर फल में एक फल-भित्ति तथा बीज होते हैं। फल-भित्ति शुष्क या गूदेदार, दोनों तरह की हो सकती है। जब फल-भित्ति मोटी व गूदेदार हो, तो उसमें तीन अलग परतें साफ पहचानी जा सकती हैं — सबसे बाहरी बाह्यफल भित्ति, बीचोंबीच मध्यफल भित्ति, और सबसे भीतरी अंतःफल भित्ति

अष्ठिल फल का उदाहरण आम व नारियल में फल के इस प्रकार को अष्ठिल (ड्रुप) कहते हैं। ये फल एककांडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय से विकसित होते हैं और इनमें केवल एक ही बीज होता है। आम में तीनों परतें साफ पहचानी जा सकती हैं — पतली बाह्यफल भित्ति, गूदेदार व खाने योग्य मध्यफल भित्ति, तथा भीतर की कठोर, पथरीली अंतःफल भित्ति (जिसे हम आम की गुठली कहते हैं)। नारियल में मध्यफल भित्ति रेशों (तंतुओं) से बनी होती है।

7 बीज

निषेचन के बाद बीजांड से बनी अगली पीढ़ी की शुरुआत

निषेचन के बाद बीजांड धीरे-धीरे बीज में बदल जाता है। हर बीज में सामान्यतः एक बीजावरण तथा एक भ्रूण होता है। भ्रूण के भीतर एक मूलांकुर, एक भ्रूणीय अक्ष, तथा एक (गेहूँ, मक्का जैसे एकबीजपत्री पौधों में) या दो (चना, मटर जैसे द्विबीजपत्री पौधों में) बीजपत्र मौजूद होते हैं।

द्विबीजपत्री बीज की संरचना

बीज की सबसे बाहरी परत को बीजावरण कहा जाता है, जिसकी दो सतहें होती हैं — बाहरी सतह को बीजचोल तथा भीतरी सतह को टेगमेन कहते हैं। बीज पर एक क्षत-चिह्न जैसा उभार होता है जिससे बीज फल से जुड़ा रहता था — इसे नाभिका कहते हैं, और हर नाभिका के ठीक ऊपर एक बेहद छोटा छिद्र होता है जिसे बीजांडद्वार कहा जाता है।

बीजावरण हटाने पर बीजपत्रों के बीच भ्रूण साफ नज़र आता है, जिसमें एक भ्रूणीय अक्ष तथा दो गूदेदार बीजपत्र होते हैं — बीजपत्रों में ही पौधे के लिए ज़रूरी भोज्य पदार्थ जमा रहता है। अक्ष के सबसे निचले नुकीले सिरे को मूलांकुर तथा सबसे ऊपरी, पत्तीदार सिरे को प्रांकुर कहा जाता है।

भ्रूणपोष की भूमिका भ्रूणपोष भोजन जमा करने वाला ऊतक है जो द्विनिषेचन के फलस्वरूप बनता है। चना, सेम व मटर जैसे बीजों में यह भ्रूणपोष बेहद पतला रह जाता है, इसलिए इन्हें अभ्रूणपोषी कहा जाता है, जबकि अरंडी जैसे बीजों में यह गूदेदार व मोटा बना रहता है, इसलिए इन्हें भ्रूणपोषी कहा जाता है।

एकबीजपत्री बीज की संरचना

अधिकांश एकबीजपत्री बीज भ्रूणपोषी होते हैं, हालाँकि आर्किड जैसे कुछ अपवाद अभ्रूणपोषी भी होते हैं। मक्का जैसे अनाज के बीजों में बीजावरण झिल्ली जैसा पतला होता है और फल-भित्ति से जुड़ा रहता है। भ्रूणपोष काफी मोटा होता है और भोजन का भंडार होता है — इसकी बाहरी परत भ्रूण से एक प्रोटीनी सतह द्वारा अलग रहती है, जिसे एल्यूरोन सतह कहा जाता है। भ्रूण आकार में बहुत छोटा होता है और भ्रूणपोष के एक किनारे के खाँचे में टिका रहता है, जिसमें एक बड़ा, ढालनुमा बीजपत्र होता है जिसे स्कुटेलम कहते हैं, और उसी में मौजूद छोटे अक्ष में प्रांकुर व मूलांकुर होते हैं, जो क्रमशः प्रांकुरचोल व मूलांकुरचोल नामक चादरों से ढके रहते हैं।

8 प्ररूपी पुष्पी पादप का अर्ध-तकनीकी विवरण

किसी भी फूल वाले पौधे को वैज्ञानिक ढंग से कैसे बताया जाए

किसी पुष्पी पादप का वर्णन करने के लिए बहुत सारे आकारिकी लक्षणों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका वर्णन संक्षिप्त, सरल और वैज्ञानिक भाषा में एक तय क्रम में होना चाहिए — पहले पौधे की सामान्य प्रकृति, फिर कायिक लक्षण (मूल, तना व पत्तियाँ), उसके बाद पुष्पीय लक्षण (पुष्पक्रम व फूल के अलग-अलग भाग)। इन सबके बाद पुष्पीय भागों को दिखाने के लिए पुष्पी चित्र तथा पुष्पी सूत्र भी दिए जाते हैं।

संकेतकिसे दर्शाता है
Brसहपत्र
Kकेलिक्स
Cकोरोला
Pपरिदल पुंज
Aपुमंग
Gजायांग (ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय के लिए रेखा नीचे, अधोवर्ती के लिए रेखा ऊपर)

नर फूल को ♂, मादा फूल को ♀ तथा द्विलिंगी फूल को दोनों चिह्नों से इंगित किया जाता है। त्रिज्य सममिति को एक गोल चिह्न से तथा एकव्यास सममिति को अलग चिह्न से दिखाया जाता है। जुड़े हुए भागों की संख्या ब्रेकेट में बंद की जाती है, और आपस के जुड़ाव को पुष्पी चिह्नों के ऊपर एक रेखा खींचकर दिखाया जाता है। इसी तरह पुष्पी चित्र से फूल के भागों की संख्या, उनके व्यवस्थित होने का क्रम, तथा उनके आपसी संबंध की पूरी जानकारी एक ही नज़र में मिल जाती है — जिसमें केलिक्स सबसे बाहर व जायांग सबसे भीतर दिखाया जाता है।

9 सोलैनेसी कुल

आम भाषा में "आलू कुल" के नाम से पहचाना जाने वाला बड़ा परिवार

सोलैनेसी एक बड़ा पादप कुल है, जिसे अक्सर आलू कुल भी कहा जाता है। इसके सदस्य उष्णकटिबंधीय, उपोष्ण तथा शीतोष्ण — तीनों तरह के मौसमी क्षेत्रों में फैले हुए मिलते हैं।

कायिक अभिलक्षण

इस कुल के पौधे प्रायः शाकीय, झाड़ीनुमा अथवा छोटे वृक्ष के रूप में पाए जाते हैं। तना शाकीय या कभी-कभी काष्ठीय, वायवीय, सीधा, बेलनाकार, शाखित, ठोस अथवा खोखला, रोमयुक्त या रोमरहित होता है, और भूमिगत रूप भी ले सकता है (जैसे आलू का कंद)। पत्तियाँ एकांतर क्रम में लगती हैं, प्रायः सरल होती हैं (कभी-कभी पिच्छाकार संयुक्त), अनुपर्ण रहित होती हैं, और उन पर जालिका शिराविन्यास पाया जाता है।

पुष्पीय अभिलक्षण

पुष्पक्रम: एकल, कक्षीय, प्रायः ससीमाक्षी।
फूल: उभयलिंगी तथा त्रिज्यसममित।
केलिक्स: पाँच बाह्यदल, आपस में जुड़े हुए, दीर्घस्थायी, कोरस्पर्शी पुष्पदल विन्यास वाले।
कोरोला: पाँच दल, संयुक्त, कोरस्पर्शी पुष्पदल विन्यास।
पुमंग: पाँच पुंकेसर, दललग्न।
जायांग: दो अंडप, आपस में जुड़े (युक्तांडपी), तिरछा अंडाशय, ऊर्ध्ववर्ती, द्विकोष्ठी, बीजांडासन फूला हुआ जिस पर बहुत से बीजांड लगे रहते हैं।
फल: संपुट (कैप्सूल) अथवा रसदार बेरी।
बीज: भ्रूणपोषी, संख्या में अनेक।

आर्थिक महत्व

इस कुल के अधिकांश सदस्य हमारे रोज़मर्रा जीवन में कई तरह से काम आते हैं — भोजन के लिए टमाटर, बैंगन व आलू; मसाले के लिए मिर्च; औषधि के लिए बेलाडोना व अश्वगंधा जैसी प्रजातियाँ; धूम्रपान के लिए तंबाकू; तथा सजावटी बगीचों के लिए पिटुनिया जैसे फूल-पौधे।

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय (पुष्पी पादपों की आकारिकी) से विगत वर्षों में आए प्रश्नों की शैली — वर्ष संदर्भ सांकेतिक हैं, क्योंकि पुष्पी आकारिकी NEET के हर सत्र में किसी न किसी रूप में दोहराई जाने वाली सबसे उच्च-आवृत्ति वाली इकाइयों में से एक है; अभ्यास के लिए वास्तविक प्रश्न-पैटर्न पर आधारित हैं

1 NEET 2020 मटर (पी सटाइवम) के फूल में पाया जाने वाला पुष्पदल विन्यास क्या कहलाता है?

उत्तर: वैक्जीलेरी (पैपिलिओनेसियस) पुष्पदल विन्यास।

इसमें पाँच दलों में से सबसे बड़ा दल (मानक/पंख) शेष दो छोटे दलों (कूटक) को ढँकता है — यह फैबेसी (लेग्यूमिनोसी) कुल की विशिष्ट पहचान है। पुष्पदल विन्यास के चारों प्रकारों (कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी, वैक्जीलेरी) में से किसी एक को उदाहरण सहित पहचानना NEET में हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछा जाता रहा है।

2 NEET 2019 सरसों (क्रुसीफर कुल) में कौन सा बीजांडन्यास पाया जाता है?

उत्तर: भित्तीय (Parietal) बीजांडन्यास।

इसमें बीजांड अंडाशय की भीतरी भित्ति पर लगे रहते हैं तथा अंडाशय मूलतः एक-कोष्ठकीय होता है, परंतु आभासी पट (false septum) बनने से यह दो कोष्ठकों में विभाजित दिखता है। छहों बीजांडन्यास प्रकारों (सीमांत—मटर, स्तंभीय—गुड़हल/टमाटर, भित्तीय—सरसों, मुक्तस्तंभीय—डायएंथस, आधारी—सूरजमुखी) की उदाहरण-सहित पहचान NEET का सर्वाधिक दोहराया जाने वाला single-line MCQ topic है।

3 NEET 2018 आम के फल (ड्रुप/अष्ठिल फल) में खाने योग्य गूदेदार भाग फल-भित्ति की किस परत से बनता है, और गुठली किस परत से बनती है?

उत्तर: खाने योग्य गूदा — मध्यफल भित्ति (mesocarp) से; कठोर गुठली — अंतःफल भित्ति (endocarp) से।

बाह्यफल भित्ति (exocarp) आम के छिलके से मेल खाती है। यह तीन-परत वाली संरचना (एक्सोकार्प-मीसोकार्प-एंडोकार्प) अष्ठिल फल की पहचान है, और आम/नारियल के उदाहरणों के साथ इसका उलट-पुलट कर पूछा जाना NEET में बहुत आम है — नारियल में मध्यफल भित्ति गूदेदार न होकर रेशेदार होती है, यह भेद भी अक्सर पूछा जाता है।

4 NEET 2021 मक्का (एकबीजपत्री) के बीज में भ्रूणपोष को भ्रूण से अलग करने वाली प्रोटीनयुक्त परत को क्या कहते हैं?

उत्तर: एल्यूरोन सतह (Aleurone layer)।

मक्का जैसे एकबीजपत्री बीजों में भ्रूणपोष काफी मोटा व भोजन-भंडार का काम करता है, तथा भ्रूण बड़े ढालनुमा बीजपत्र स्कुटेलम के सहारे भ्रूणपोष के एक किनारे में टिका रहता है। यह "एकबीजपत्री बीज की सूक्ष्म संरचना" (एल्यूरोन सतह, स्कुटेलम, प्रांकुरचोल, मूलांकुरचोल) NEET में diagram-based या term-identification प्रश्नों में बार-बार आती है।

5 NEET 2017 गुड़हल (हिबिस्कस) के फूल में पुंकेसर किस प्रकार से जुड़े होते हैं?

उत्तर: एकसंघी (Monoadelphous)।

गुड़हल में सभी पुंकेसर आपस में जुड़कर एक ही गुच्छे में बंधे रहते हैं। मटर द्विसंघी (दो गुच्छों में) तथा सिट्रस बहुसंघी (कई बंडलों में) पुंकेसर व्यवस्था के क्लासिक उदाहरण हैं — इन तीनों उदाहरणों को उलट कर पूछना NEET का बहुत सामान्य ट्रैप-पैटर्न है।

6 NEET 2022 जिस फूल में जायांग सबसे ऊँचे स्थान पर हो और अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती हो, उस स्थिति को क्या कहते हैं, और सरसों व गुड़हल में यह कौन सी स्थिति है?

उत्तर: अधोजायांगता (Hypogyny); सरसों व गुड़हल दोनों में यही स्थिति (ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय) पाई जाती है।

इसके विपरीत गुलाब/आड़ू में परिजायांगता (अंडाशय आधा-अधोवर्ती) तथा अमरूद/घीया में अधिजायांगता (अंडाशय पूर्णतः अधोवर्ती) पाई जाती है — इन तीनों स्थितियों (अधोजायांगता, परिजायांगता, अधिजायांगता) व उनके उदाहरणों को जोड़ने वाला match-the-column प्रश्न NEET में बहुत बार आया है।

7 NEET 2019 जब कई अंडप आपस में स्वतंत्र रहते हैं (जैसे कमल में), तो जायांग की इस अवस्था को क्या कहते हैं?

उत्तर: वियुक्तांडपी (Apocarpous)।

इसके विपरीत जब अंडप आपस में जुड़े होते हैं (जैसे मटर व टमाटर में), तो इसे युक्तांडपी (Syncarpous) कहा जाता है — गुलाब व कमल दोनों वियुक्तांडपी जायांग के क्लासिक उदाहरण हैं, जो अक्सर एक साथ पूछे जाते हैं।

8 NEET 2016 किस मूल तंत्र में जड़ें मूलांकुर से नहीं, बल्कि पौधे के तने या पत्ती जैसे अन्य भाग से निकलती हैं?

उत्तर: अपस्थानिक मूल तंत्र (Adventitious root system)।

बरगद व घास इसके उदाहरण हैं। इसे मूसला मूलतंत्र (सरसों जैसे द्विबीजपत्री पौधों में, मूलांकुर से विकसित प्राथमिक मूल पर आधारित) व झकड़ा/तंतुक मूलतंत्र (गेहूँ जैसे एकबीजपत्री पौधों में, तने के आधार से निकलने वाली पतली जड़ें) से अलग पहचानना ज़रूरी है — तीनों मूल-तंत्र प्रकारों की उत्पत्ति-आधारित पहचान NEET में बार-बार पूछी जाती है।

9 NEET 2023 सोलैनेसी कुल में पाई जाने वाली पुष्पदल विन्यास तथा फल के प्रकार क्या हैं?

उत्तर: पुष्पदल विन्यास — कोरस्पर्शी (Twisted); फल — संपुट (कैप्सूल) अथवा रसदार बेरी।

सोलैनेसी (आलू कुल) का पुष्पी सूत्र सामान्यतः इस प्रकार लिखा जाता है — पंचतयी, त्रिज्यसममित, द्विलिंगी फूल, संयुक्त बाह्यदली केलिक्स व संयुक्त-दली कोरोला, पाँच दललग्न पुंकेसर, तथा द्विअंडपी युक्तांडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय — यह पूरा विवरण व पुष्पी सूत्र लिखना NEET के "कुल-आधारित" (family-based) प्रश्नों का मूल आधार है, विशेषकर टमाटर, बैंगन व आलू जैसे आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण उदाहरणों के साथ।

10 NEET 2015 द्विबीजपत्री पौधों की विशेषता कौन-सी पत्ती है — जालिका शिराविन्यास अथवा समानांतर शिराविन्यास?

उत्तर: जालिका शिराविन्यास (Reticulate venation)।

समानांतर शिराविन्यास प्रायः एकबीजपत्री पौधों की पहचान है — यह भेद पौधे के बीजपत्रों की संख्या (द्विबीजपत्री बनाम एकबीजपत्री) से जुड़े व्यापक वर्गीकरण का ही एक हिस्सा है, और इसे मूल तंत्र के प्रकार (मूसला बनाम झकड़ा) तथा पुष्प भागों की संख्या (पंचतयी बनाम त्रितयी) के साथ मिलाकर संयुक्त तुलनात्मक प्रश्न में भी पूछा जाता है।

अन्य NEET तथ्य

इस अध्याय से जुड़े कुछ अतिरिक्त सूक्ष्म तथ्य व तुलनाएँ, जो ऊपर के अनुभागों में विस्तार से नहीं आए

तथ्य
  • पुष्पी सूत्र के संकेत — Br (सहपत्र), K (केलिक्स), C (कोरोला), P (परिदल पुंज — जब केलिक्स व कोरोला में अंतर न हो, जैसे प्याज), A (पुमंग), G (जायांग) — G के नीचे रेखा ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय तथा ऊपर रेखा अधोवर्ती अंडाशय दर्शाती है। यह चिह्न-प्रणाली objective व diagram-based प्रश्नों दोनों में प्रयुक्त होती है।
तुलनात्मक
  • त्रिज्यसममित (actinomorphic) बनाम एकव्याससममित (zygomorphic) — सरसों, धतूरा, मिर्च त्रिज्यसममित के उदाहरण हैं (किसी भी ऊर्ध्वाधर तल से काटने पर दो बराबर भाग), जबकि मटर, गुलमोहर, सेम एकव्याससममित के उदाहरण हैं (केवल एक निश्चित तल से काटने पर बराबर भाग) — केना असममित (अनियमित) फूल का उदाहरण है, जिसे किसी भी तल से बराबर नहीं बाँटा जा सकता।
तथ्य
  • पर्णवृंततुल्य (Pulvinus) — कुछ फलीदार (लेग्यूमी) पौधों में पर्णाधार फूलकर यह विशेष संरचना बना लेता है — यह "पर्णाधार के रूपांतरण" वाला सूक्ष्म बिंदु objective प्रश्न में पूछा जा सकता है।
तुलनात्मक
  • संयुक्त पत्ती के दो प्रकार — पिच्छाकार संयुक्त पत्ती (सभी पत्रक एक ही मुख्य अक्ष पर, जैसे नीम) व हस्ताकार संयुक्त पत्ती (सभी पत्रक एक ही बिंदु से जुड़े, जैसे सिल्क कॉटन वृक्ष) — पहचान की कसौटी यह है कि संयुक्त पत्ती के अलग-अलग पत्रकों के कक्ष में कली नहीं होती, जबकि पर्णवृंत के कक्ष में कली अवश्य होती है।
तथ्य
  • पर्णविन्यास के तीन प्रकार — एकांतर (गुड़हल, सरसों), सम्मुख (अमरूद), चक्करदार (डेविल ट्री/एलस्टोनिया) — इन उदाहरणों को उलट कर पूछना बहुत सामान्य है।
ट्रैप
  • असीमाक्षी बनाम ससीमाक्षी पुष्पक्रम — असीमाक्षी में मुख्य अक्ष लगातार बढ़ता रहता है व फूल अग्राभिसारी क्रम (नीचे से ऊपर) में लगते हैं; ससीमाक्षी में मुख्य अक्ष के शीर्ष पर ही फूल लगकर वृद्धि रुक जाती है व फूल तलाभिसारी क्रम (ऊपर से नीचे) में लगते हैं — यह क्रम (अग्राभिसारी/तलाभिसारी) उलट कर पूछा जाना आम ट्रैप है।
तुलनात्मक
  • अभ्रूणपोषी बनाम भ्रूणपोषी बीज — चना, मटर, सेम अभ्रूणपोषी (भ्रूणपोष बीजपत्रों में समा जाने के कारण पतला रह जाता है) के उदाहरण हैं; अरंडी व अधिकांश एकबीजपत्री (मक्का सहित) भ्रूणपोषी के उदाहरण हैं — आर्किड इसका एक अपवाद है, जो एकबीजपत्री होते हुए भी अभ्रूणपोषी है।
तथ्य
  • अनिषेकफलन (Parthenocarpy) — बिना निषेचन के फल का बनना; ऐसे फल में बीज नहीं बनते — यह concept कृषि/उद्यान विज्ञान (जैसे बीज-रहित केला/अंगूर) से जुड़े applied प्रश्नों में भी पूछा जाता है।
तथ्य
  • बाह्यदल (केलिक्स) की दीर्घस्थायी प्रकृति — सोलैनेसी कुल में केलिक्स फूल गिरने के बाद भी बना रहता है (दीर्घस्थायी) — यह सूक्ष्म पर बार-बार पूछा जाने वाला फैमिली-विशिष्ट लक्षण है।
तथ्य
  • मूल तंत्र के अतिरिक्त कार्य — जल-खनिज अवशोषण के अलावा मूल तंत्र भोजन का संचय भी करता है तथा कुछ पादप वृद्धि नियामकों (हार्मोन) का संश्लेषण भी करता है — यह पादप-कार्यिकी अध्याय से जुड़ा एक क्रॉस-टॉपिक बिंदु है।
ट्रैप
  • मूलरोम (root hairs) बनाम पार्श्व मूल (lateral roots) — मूलरोम एपिडर्मल कोशिका के एककोशिकीय (unicellular) प्रवर्ध होते हैं, जबकि पार्श्व मूल बहुकोशिकीय (multicellular) संरचनाएँ होती हैं जो मूल के भीतरी ऊतक (पेरिसाइकिल) से उत्पन्न होती हैं — "मूलरोम बहुकोशिकीय होते हैं" जैसा कथन सदैव गलत माना जाता है।
तुलनात्मक
  • पुष्पासन पर पुष्प के अंगों की स्थिति के तीन प्रकारअधोजायांगी (hypogynous): अंडाशय सर्वोच्च स्थिति में, शेष सभी भाग नीचे (जैसे सरसों, बैंगन — ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय); परिजायांगी (perigynous): अंडाशय मध्य में, शेष भाग समान ऊँचाई पर वलय-रूप में (जैसे गुलाब, आड़ू, बेर); उपरिजायांगी (epigynous): अंडाशय पुष्पासन में धँसा हुआ, शेष भाग ऊपर (जैसे अमरूद, खीरा — अधोवर्ती अंडाशय) — यही वर्गीकरण G चिह्न की रेखा (ऊपर/नीचे) से जुड़ा हुआ है।
तुलनात्मक
  • बीजाण्डन्यास (placentation) के पाँच प्रकारसीमांत (marginal): मटर; स्तंभीय (axile): चाइना रोज़, टमाटर, बैंगन; भित्तीय (parietal): सरसों, अरगेमोन; मुक्त स्तंभीय (free central): डायएंथस, प्रिमरोज़; आधारीय (basal): सूरजमुखी, गेंदा — प्रत्येक प्रकार में बीजांड के जुड़ाव का स्थान भिन्न होता है, तथा यह तालिका मैच-द-कॉलम प्रश्नों में अत्यंत उपयोगी है।
तुलनात्मक
  • पुष्पदलपुंज विन्यास (aestivation) के चार प्रकारकोरस्पर्शी (valvate): दल एक-दूसरे को बिना ढके किनारे-किनारे मिलते हैं (जैसे कैलोट्रोपिस); व्यावर्तित (twisted): प्रत्येक दल अगले दल के किनारे को ढकता है (जैसे चाइना रोज़, गुड़हल); कोरछादी (imbricate): कम-से-कम एक दल पूर्णतः बाहर व एक पूर्णतः अंदर, शेष आंशिक रूप से ढके (जैसे कैसिया, गुलमोहर); ध्वजिकीय (vexillary): सबसे बड़ी पंखुड़ी (ध्वजक) शेष दो को ढकती है, जो स्वयं दो पंखों को ढकती हैं (जैसे मटर, सेम, फलीदार पौधे)।
तथ्य
  • विशिष्ट पुष्पक्रम प्रकारसाइएथियम (cyathium): यूफोर्बिया में पाया जाने वाला विशेष प्रकार, जिसमें एकल मादा फूल के चारों ओर कई नर फूल घिरे रहते हैं; हाइपेंथोडियम (hypanthodium): फाइकस (गूलर, बरगद, पीपल) में पाया जाने वाला विशेष अवतल पुष्पासन युक्त पुष्पक्रम, जिसके भीतर नर, मादा व पित्त (gall) फूल सभी होते हैं — दोनों ही "विशिष्ट पुष्पक्रम" के उदाहरण हैं जो सामान्य असीमाक्षी/ससीमाक्षी वर्गीकरण से अलग गिने जाते हैं।
तथ्य
  • तने का रूपांतरण भूमिगत भंडारण हेतु — आलू (कंद/tuber) तने का रूपांतरण है, मूल का नहीं (एक सामान्य गलतफहमी) — इसकी सतह पर उपस्थित "आँखों (eyes)" में कक्षस्थ कलिकाएँ होना ही इसे तना सिद्ध करता है; अदरक (राइज़ोम), प्याज (बल्ब) व अरबी (कॉर्म) भी क्रमशः भूमिगत तने के अन्य रूपांतरित रूप हैं, मूल के नहीं।
रणनीति
  • चूँकि यह अध्याय बाह्य आकारिकी व शब्दावली-प्रधान है, अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) पुष्प के प्रत्येक भाग (केलिक्स, कोरोला, पुमंग, जायांग) से जुड़ी शब्दावली व उनके उदाहरण, (2) बीजाण्डन्यास व पुष्पदलपुंज विन्यास के सभी प्रकार व उदाहरण, (3) मूल व तने के रूपांतरणों को न उलझाना (कौन सी संरचना वास्तव में तना है, कौन-सी मूल) — इन्हीं तीन विषयों से अधिकांश पहचान व मैच-द-कॉलम प्रकार के प्रश्न बनते हैं।

संक्षिप्त सार

मूल व तना

मूल तंत्र मूसला या झकड़ा प्रकार का हो सकता है और मुख्यतः जल-खनिज अवशोषण करता है। तना गाँठों-पोरियों वाला ऊपर की ओर बढ़ने वाला अक्ष है जो पूरे पौधे को थामे रहता है।

पत्ती

पत्ती के तीन भाग (पर्णाधार, पर्णवृंत, स्तरिका) होते हैं। शिराविन्यास जालिका या समानांतर हो सकता है, और पत्तियाँ सरल या संयुक्त तथा अलग-अलग पर्णविन्यासों में लगी हो सकती हैं।

पुष्पक्रम व पुष्प

फूल एक रूपांतरित प्ररोह है जिसमें केलिक्स, कोरोला, पुमंग व जायांग चक्रों में सजे रहते हैं। पुष्पक्रम असीमाक्षी या ससीमाक्षी हो सकता है, और अंडाशय की स्थिति के आधार पर फूल अधो-, परि- या अधिजायांगी हो सकता है।

फल व बीज

फल निषेचन के बाद बना परिपक्व अंडाशय है। बीज में बीजावरण व भ्रूण होता है, जो द्विबीजपत्री या एकबीजपत्री प्रकार का हो सकता है तथा भ्रूणपोषी या अभ्रूणपोषी हो सकता है।

? प्रश्न-उत्तर

हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

प्रश्न 1 एक पिच्छाकार संयुक्त पत्ती हस्ताकार संयुक्त पत्ती से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर

पिच्छाकार संयुक्त पत्ती में बहुत से पत्रक एक ही मुख्य अक्ष (जो मध्यशिरा के रूप में होता है) पर व्यवस्थित रहते हैं — जैसे कि नीम की पत्ती में देखा जा सकता है। इसके विपरीत हस्ताकार संयुक्त पत्ती में सारे पत्रक एक ही केंद्रीय बिंदु — यानी पर्णवृंत की चोटी — से निकलते व जुड़े रहते हैं, जैसे सिल्क कॉटन वृक्ष में देखा जाता है। सरल शब्दों में, पिच्छाकार पत्ती में पत्रक एक रेखा में सजे होते हैं, जबकि हस्ताकार पत्ती में पत्रक एक बिंदु से पंखे की तरह फैलते हैं।

प्रश्न 2 विभिन्न प्रकार के पर्णविन्यास का उदाहरण सहित वर्णन करो।
उत्तर

पर्णविन्यास मुख्यतः तीन प्रकार का होता है:

एकांतर पर्णविन्यास: हर गाँठ पर एक अकेली पत्ती बारी-बारी से लगी रहती है। उदाहरण: गुड़हल, सरसों, सूर्यमुखी।

सम्मुख पर्णविन्यास: हर गाँठ पर एक जोड़ी पत्ती एक-दूसरे के सामने लगी रहती है। उदाहरण: केलोट्रोपिस (आक), अमरूद।

चक्करदार पर्णविन्यास: एक ही गाँठ पर दो से अधिक पत्तियाँ निकलकर उसके चारों ओर एक चक्र-सी बनावट बनाती हैं। उदाहरण: एल्सटोनिया (डेविल ट्री)।

प्रश्न 3 निम्नलिखित की परिभाषा लिखो।
उत्तर

(अ) पुष्पदल विन्यास: पुष्पकली में एक ही चक्र की इकाइयों — बाह्यदल या दल — के आपस में लगे रहने के क्रम को पुष्पदल विन्यास कहते हैं (जैसे कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी, वैक्जीलेरी)।

(ब) बीजांडासन: अंडाशय के भीतर वह स्थान या ऊतक जहाँ बीजांड जुड़े रहते हैं।

(स) त्रिज्या समिमिति: जब किसी फूल को केंद्र से गुजरने वाले किसी भी ऊर्ध्वाधर तल से काटा जाए और वह हमेशा दो बराबर हिस्सों में बँट जाए, तो उसे त्रिज्यसममित कहते हैं (जैसे सरसों, धतूरा, मिर्च)।

(द) एकव्यास समिमित: जब फूल को केवल एक ही निश्चित ऊर्ध्वाधर तल से काटने पर दो बराबर हिस्से मिलें, तो उसे एकव्याससममित कहते हैं (जैसे मटर, गुलमोहर, सेम)।

(इ) ऊर्ध्ववर्ती: जब अंडाशय पुष्पासन पर सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित हो और फूल के बाकी भाग उससे नीचे लगे हों (अधोजायांगता की स्थिति)।

(फ) परिजायांगी पुष्प: ऐसा फूल जिसमें अंडाशय बीचोंबीच स्थित होता है तथा केलिक्स, कोरोला व पुमंग लगभग समान ऊँचाई पर पुष्पासन के किनारों पर लगे रहते हैं, और अंडाशय आधा अधोवर्ती होता है (जैसे गुलाब, आड़ू)।

(ज) दललग्न पुंकेसर: जब पुंकेसर सीधे दल (कोरोला) से जुड़े हुए हों, जैसा बैंगन के फूल में देखा जाता है।

प्रश्न 4 निम्नलिखित में अंतर लिखो।
उत्तर

(अ) असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम: असीमाक्षी पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष लगातार लंबाई में बढ़ता रहता है और फूल अग्राभिसारी क्रम (नीचे से ऊपर) में पार्श्व में लगते हैं, इसलिए इसकी वृद्धि असीमित रहती है। ससीमाक्षी पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष के शीर्ष पर ही फूल लग जाता है, जिससे उसकी आगे की वृद्धि रुक जाती है (सीमित वृद्धि), और फूल तलाभिसारी क्रम (ऊपर से नीचे) में लगे रहते हैं।

(ब) वियुक्तांडपी तथा युक्तांडपी अंडाशय: वियुक्तांडपी (एपोकार्पस) अंडाशय में एक से अधिक अंडप आपस में पूरी तरह अलग-अलग रहते हैं, जैसे गुलाब व कमल में। युक्तांडपी (सिनकार्पस) अंडाशय में एक से अधिक अंडप आपस में जुड़े रहते हैं, जैसे मटर व टमाटर में।

प्रश्न 5 निम्नलिखित के चिह्नित चित्र बनाओ।
उत्तर

यह एक व्यावहारिक (प्रायोगिक) प्रश्न है, जिसके लिए वास्तविक चना व मक्के के बीजों को काटकर देखना होता है। संक्षेप में:

(अ) चने का बीज (द्विबीजपत्री): इसमें बीजावरण, नाभिका, बीजांडद्वार, दो मोटे व गूदेदार बीजपत्र, तथा बीजपत्रों के बीच स्थित भ्रूणीय अक्ष (मूलांकुर व प्रांकुर सहित) दिखाया जाना चाहिए। चूँकि यह अभ्रूणपोषी बीज है, इसमें अलग से भ्रूणपोष नहीं दिखेगा।

(ब) मक्के के बीज का अनुदैर्घ्यकाट (एकबीजपत्री): इसमें झिल्लीदार बीजावरण, मोटा भ्रूणपोष, भ्रूणपोष व भ्रूण के बीच की एल्यूरोन सतह, तथा भ्रूणपोष के एक किनारे में स्थित छोटा भ्रूण — जिसमें स्कुटेलम, प्रांकुर, प्रांकुरचोल, मूलांकुर व मूलांकुरचोल शामिल हैं — दिखाया जाना चाहिए।

प्रश्न 6 सोलैनेसी कुल के एक पुष्प को उदाहरण के रूप में लो तथा उनका अर्ध-तकनीकी विवरण प्रस्तुत करो। पुष्पी चित्र भी बनाओ।
उत्तर

उदाहरण: सोलैनम नाइग्रम (मकोय)

कायिक अभिलक्षण: शाकीय पौधा, तना शाकीय व शाखित, पत्तियाँ एकांतर, सरल, जालिका शिराविन्यास युक्त।

पुष्पीय अभिलक्षण: पुष्पक्रम एकल व कक्षीय, ससीमाक्षी प्रकार का। फूल उभयलिंगी तथा त्रिज्यसममित। केलिक्स में पाँच बाह्यदल, आपस में जुड़े हुए, कोरस्पर्शी विन्यास वाले। कोरोला में पाँच दल, संयुक्त, कोरस्पर्शी विन्यास। पुमंग में पाँच पुंकेसर, दललग्न। जायांग द्विअंडपी, युक्तांडपी, तिरछा अंडाशय, ऊर्ध्ववर्ती, द्विकोष्ठी तथा फूले हुए बीजांडासन पर बहुत से बीजांड। फल रसदार बेरी तथा बीज भ्रूणपोषी व संख्या में अनेक होते हैं।

पुष्पी चित्र में केलिक्स सबसे बाहर, फिर कोरोला, फिर पुमंग, और सबसे भीतर जायांग — इन चारों चक्रों को क्रमवार गोलाकार रूप में दिखाया जाता है, जिसमें मातृ अक्ष की स्थिति फूल के सापेक्ष एक बिंदु से इंगित की जाती है।

प्रश्न 7 पुष्पी पादपों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के बीजांडासन्यासों का वर्णन करो।
उत्तर

बीजांडन्यास मुख्यतः छह प्रकार का होता है:

सीमांत: बीजांडासन अंडाशय की अधर सीवन पर एक कटक बनाता है, बीजांड दो कतारों में उसी कटक पर लगे रहते हैं। उदाहरण: मटर।

स्तंभीय: बीजांडासन अक्षीय होता है, बीजांड बहुकोष्ठकी अंडाशय पर लगे रहते हैं। उदाहरण: गुड़हल, टमाटर, नींबू।

भित्तीय: बीजांड अंडाशय की भीतरी भित्ति या परिधीय भाग पर लगे रहते हैं; आभासी पट के बनने से अंडाशय दो कोष्ठकों में बँट जाता है। उदाहरण: सरसों (क्रुसीफर), आर्जेमोन।

मुक्तस्तंभीय: बीजांड केंद्रीय अक्ष पर लगे होते हैं, यह अक्ष पुटीय नहीं होता। उदाहरण: डायएंथस, प्रिमरोज।

आधारी: बीजांडासन अंडाशय के आधार पर होता है, जिसमें सिर्फ एक बीजांड होता है। उदाहरण: सूरजमुखी, गेंदा।

प्रश्न 8 पत्तियों के विभिन्न रूपांतरण पौधे की कैसे सहायता करते हैं?
उत्तर

पत्तियाँ अपने मूल कार्य (भोजन बनाना) से हटकर कई विशेष कामों के लिए रूप बदल लेती हैं — इसे पत्ती का रूपांतरण कहा जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ पौधों में पत्तियाँ नुकीले कांटों में बदल जाती हैं, जो पौधे को शाकाहारी प्राणियों से बचाती हैं और पानी की कमी वाले क्षेत्रों में वाष्पोत्सर्जन (जल-हानि) कम करती हैं। कुछ बेल वाले पौधों में पत्तियाँ या उनके हिस्से पतले, कुंडलित प्रतान (टेंड्रिल) में बदल जाते हैं, जिससे पौधा किसी सहारे से लिपटकर ऊपर चढ़ सकता है। कुछ मांसाहारी पौधों में पत्तियाँ घड़े या जाल जैसी बनावट में बदल जाती हैं, जो कीड़ों को फँसाकर अतिरिक्त पोषण (विशेषकर नाइट्रोजन) जुटाने में मदद करती हैं। इस तरह पत्तियों के ये रूपांतरण पौधे को सुरक्षा, सहारा, जल-संरक्षण तथा पोषण की अतिरिक्त सुविधा देकर उसके कठिन वातावरण में बेहतर ढंग से जीवित रहने में मदद करते हैं।

प्रश्न 9 पुष्पक्रम की परिभाषा करो। पुष्पी पादपों में विभिन्न प्रकार के पुष्पक्रमों के आधार का वर्णन करो।
उत्तर

परिभाषा: पुष्पी अक्ष पर फूलों के लगे रहने और सजने के क्रम को पुष्पक्रम कहा जाता है। यह दरअसल एक रूपांतरित प्ररोह ही है, जिसमें प्ररोह का शीर्षस्थ मेरिस्टेम पुष्पी मेरिस्टेम में बदल जाता है और पोरियाँ बढ़ना बंद कर देती हैं।

वर्गीकरण का आधार: पुष्पक्रम को इस आधार पर बाँटा जाता है कि मुख्य अक्ष का शीर्ष फूल में बदलता है या वह लगातार वृद्धि करता रहता है। इसी आधार पर पुष्पक्रम को दो बड़े वर्गों में बाँटा गया है — असीमाक्षी (मुख्य अक्ष की वृद्धि लगातार जारी रहती है, फूल अग्राभिसारी क्रम में लगते हैं) तथा ससीमाक्षी (मुख्य अक्ष के शीर्ष पर फूल लगने से वृद्धि सीमित हो जाती है, फूल तलाभिसारी क्रम में लगते हैं)।

प्रश्न 10 पुष्पासन पर स्थिति के अनुसार लगे पुष्पी भागों का वर्णन करो।
उत्तर

पुष्पवृंत पर केलिक्स, कोरोला, पुमंग तथा अंडाशय की आपसी सापेक्ष ऊँचाई के आधार पर फूल को तीन प्रकारों में बाँटा जाता है:

अधोजायांगता (हाइपोगाइनस): जायांग सबसे ऊँचे (सर्वोच्च) स्थान पर स्थित होता है और अन्य सभी भाग उससे नीचे स्थित होते हैं। ऐसे फूलों में अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती होता है। उदाहरण: सरसों, गुड़हल, बैंगन।

परिजायांगता (पेरीगाइनस): अंडाशय बीचोंबीच स्थित होता है और अन्य भाग पुष्पासन के किनारे पर, लगभग समान ऊँचाई पर स्थित रहते हैं। इसमें अंडाशय आधा अधोवर्ती होता है। उदाहरण: पल्म, गुलाब, आड़ू।

अधिजायांगता (एपीगाइनस): पुष्पासन के किनारे ऊपर की ओर बढ़कर अंडाशय को पूरी तरह घेर लेते हैं और उससे जुड़ जाते हैं, जिससे फूल के अन्य भाग अंडाशय के ऊपर उगे नज़र आते हैं। इसमें अंडाशय अधोवर्ती होता है। उदाहरण: सूरजमुखी के अरपुष्पक, अमरूद, घीया।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री पुष्पी पादपों की बाहरी संरचना — मूल, तना, पत्ती, पुष्पक्रम, पुष्प, फल तथा बीज — को मौलिक व सरल भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें तुलनात्मक तालिकाएँ तथा प्रश्नोत्तर शामिल हैं।

जड़ से फल तक — हर हिस्से की अपनी एक कहानी है, बस उसे पढ़ने की भाषा आनी चाहिए।

Scroll to Top