वनस्पति जगत
पानी की एक बूँद में तैरते सूक्ष्म शैवाल से लेकर सौ मीटर ऊँचे विशालकाय वृक्षों तक — पौधों की दुनिया करोड़ों वर्षों के विकास की कहानी कहती है। इस अध्याय में हम पादप जगत के पाँच बड़े समूहों — शैवाल, ब्रायोफाइट, टैरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म — को उनकी विशेषताओं, उदाहरणों और जीवन-चक्रों के साथ समझेंगे।
भूमिका पौधों को वर्गीकृत करने की सोच कैसे बदली
पौधों को समूहों में बाँटने का काम प्राचीन काल से चला आ रहा है। शुरुआत में वनस्पति वैज्ञानिक केवल बाहरी दिखावट — जैसे पत्ती का आकार, फूल का रंग, ऊँचाई, या पौधा झाड़ी है या वृक्ष — के आधार पर वर्गीकरण करते थे। यह तरीका सरल तो था, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत कमज़ोर था, क्योंकि एक ही पौधे की बाहरी बनावट पर्यावरण के अनुसार बदल सकती है।
धीरे-धीरे वैज्ञानिकों ने पाया कि पौधे की असली पहचान उसकी आंतरिक संरचना में छिपी होती है — जैसे कोशिका भित्ति की बनावट, प्रजनन के तरीके, भ्रूण का विकास, और उसमें मौजूद रासायनिक पदार्थ। इस गहन अध्ययन पर आधारित वर्गीकरण को प्राकृतिक वर्गीकरण कहा गया, जिसे जॉर्ज बेंथम और जोसेफ डाल्टन हुकर जैसे वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया।
आज के दौर में वैज्ञानिक जातिवृत्तीय (evolutionary) वर्गीकरण को अधिक महत्व देते हैं — यानी दो पौधों को एक समूह में तभी रखा जाता है जब उनके पूर्वज एक ही हों। इसके लिए अब कंप्यूटर की मदद से हजारों गुणों की तुलना एक साथ की जाती है (संख्यात्मक वर्गिकी), और कोशिका के अंदर क्रोमोसोम की संरचना तथा पौधों में पाए जाने वाले रासायनिक यौगिकों का भी अध्ययन किया जाता है।
पिछले अध्याय में हमने जिस पाँच-जगत वर्गीकरण की चर्चा की थी, उसमें प्लांटी जगत (जिसे हिंदी में वनस्पति जगत कहते हैं) से फंजाई, बैक्टीरिया और एककोशिक प्रोटिस्टा को अलग कर दिया गया है — भले ही उनमें कोशिका भित्ति हो। इसी कारण नील-हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया) अब शैवाल नहीं माना जाता, बल्कि मॉनेरा जगत में रखा गया है। इस अध्याय में हम असली वनस्पति जगत — शैवाल, ब्रायोफाइट, टैरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म — का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1 शैवाल (Algae)
पौधों की दुनिया के सबसे सरल और सबसे पुराने सदस्य
शैवाल वे जीव हैं जिनमें क्लोरोफिल पाया जाता है और वे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (स्वपोषी)। इनका शरीर बहुत सरल होता है — इसे थैलस कहा जाता है, जिसमें असली जड़, तना या पत्तियाँ नहीं होतीं। अधिकांश शैवाल जल में पाए जाते हैं — मीठा पानी हो या समुद्र — लेकिन कुछ प्रजातियाँ नम पत्थरों, गीली मिट्टी और पेड़ों की छाल पर भी उग आती हैं। दिलचस्प बात यह है कि कुछ शैवाल कवक के साथ मिलकर लाइकेन बनाते हैं, और कुछ प्रजातियाँ स्लॉथ (एक प्रकार का प्राणी) के बालों में भी पाई जाती हैं।
शैवाल का आकार माइक्रोस्कोपिक कॉलोनी से लेकर समुद्र में उगने वाले विशालकाय केल्प तक हो सकता है, जो कई मीटर लंबा होता है।
प्रजनन के तीन तरीके
शैवाल में प्रजनन तीन प्रकार से होता है — कायिक (शरीर के टुकड़ों द्वारा), अलैंगिक (तैरने वाले जूस्पोर या अचल बीजाणुओं द्वारा), और लैंगिक (युग्मकों के संलयन द्वारा)। लैंगिक प्रजनन को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है: समयुग्मकी (दोनों युग्मक समान), असमयुग्मकी (युग्मक आकार में थोड़े अलग) और अंडयुग्मकी (एक बड़ा अचल मादा युग्मक और एक छोटा गतिशील नर युग्मक)।
शैवाल का पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व बहुत बड़ा है। पृथ्वी पर कुल कार्बन डाइऑक्साइड स्थिरीकरण का लगभग आधा हिस्सा शैवाल ही करते हैं, और ये समुद्री खाद्य शृंखला की नींव हैं। लाल शैवाल से एगार (agar) प्राप्त होता है, जिसका उपयोग सूक्ष्मजीव संवर्धन और खाद्य उद्योग में होता है। क्लोरैला और स्पिरुलाइना प्रोटीन-युक्त आहार पूरक हैं, जिन्हें अंतरिक्ष यात्रियों के भोजन में भी शामिल किया जाता है।
शैवाल को उनके रंग-द्रव्य और संचित भोजन के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है:
| समूह | सामान्य नाम | प्रमुख रंग-द्रव्य | संचित भोजन | मुख्य उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| क्लोरोफाइसी | हरे शैवाल | क्लोरोफिल a, b | स्टार्च | क्लैमाइडोमोनास, स्पाइरोगायरा |
| फीयोफाइसी | भूरे शैवाल | क्लोरोफिल a, c + फ्यूकोजैंथिन | मैनीटोल, लैमिनेरिन | लैमिनेरिया, फ्यूकस |
| रोडोफाइसी | लाल शैवाल | फाइकोएरिथ्रिन | फ्लोरिडियन स्टार्च | पोरफायरा, ग्रेसिलेरिया |
हरित शैवाल (क्लोरोफाइसी)
इनका रंग हरा होता है क्योंकि इनमें क्लोरोफिल a और b भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये एककोशिक, कॉलोनी या तंतुमय रूप में हो सकते हैं। कोशिका भित्ति सेल्युलोस और पेक्टिन की बनी होती है। प्रमुख उदाहरण: क्लैमाइडोमोनास, वॉल्वॉक्स, यूलोथ्रिक्स, स्पाइरोगायरा, कारा।
भूरे शैवाल (फीयोफाइसी)
ये लगभग पूरी तरह समुद्री होते हैं। इनका आकार छोटे तंतुओं से लेकर 100 मीटर तक लंबे केल्प तक हो सकता है। भूरा-जैतूनी रंग फ्यूकोजैंथिन नामक वर्णक के कारण होता है। भोजन लैमिनेरिन या मैनीटोल के रूप में संचित होता है। पौधा चट्टान से होल्डफास्ट (जड़-सम) द्वारा चिपका रहता है और इसमें डंठल तथा पत्ती-सम भाग होते हैं। उदाहरण: लैमिनेरिया, सरगासम, फ्यूकस।
लाल शैवाल (रोडोफाइसी)
इनका लाल रंग फाइकोएरिथ्रिन वर्णक के कारण होता है। ये मुख्यतः गर्म समुद्रों में मिलते हैं — कुछ सतह पर, तो कुछ गहरे पानी में जहाँ प्रकाश कम है। थैलस प्रायः बहुकोशिक और जटिल होता है। भोजन फ्लोरिडियन स्टार्च के रूप में जमा होता है। उदाहरण: पोरफायरा, ग्रेसिलेरिया, जिलेडियम — इनसे एगार प्राप्त होता है।
2 ब्रायोफाइट
पौधों की दुनिया के "उभयचर" — जो जमीन पर रहते हुए भी पानी के मोहताज हैं
ब्रायोफाइट में मॉस (काई) और लिवरवर्ट शामिल हैं। ये आमतौर पर नम और छायादार स्थानों पर उगते हैं, जैसे पहाड़ी इलाकों में। इन्हें "पादप जगत के उभयचर" कहा जाता है क्योंकि ये जमीन पर तो रह सकते हैं, लेकिन अपने लैंगिक जनन (निषेचन) के लिए पानी की आवश्यकता होती है — ठीक उभयचर प्राणियों की तरह, जिन्हें प्रजनन के लिए पानी चाहिए होता है।
लैंगिक अंग — पुंधानी (नर) और स्त्रीधानी (मादा) — पानी की बूँदों की मदद से नर युग्मक को स्त्रीधानी तक पहुँचाते हैं। निषेचन के बाद द्विगुणित भ्रूण बनता है, जो स्पोरोफाइट (बीजाणु-उद्भिद्) में विकसित होता है, लेकिन यह अपने मातृ युग्मकोद्भिद् से जुड़ा रहकर ही पोषण ले सकता है — स्वतंत्र नहीं होता।
लिवरवर्ट का शरीर चपटा थैलस जैसा होता है, जबकि मॉस में एक पतला सीधा तना दिखाई देता है जिस पर पत्तियाँ सर्पिल क्रम में सजी रहती हैं।
ब्रायोफाइट का पारिस्थितिकी में विशेष महत्व है। स्फेगनम (पीट मॉस) का उपयोग ईंधन और पैकिंग सामग्री के रूप में होता है, क्योंकि इसमें जल-धारण क्षमता अद्भुत होती है। मॉस सबसे पहले नंगी चट्टानों पर उगकर मिट्टी बनाने का काम करते हैं, और मिट्टी के कटाव को रोकने में सहायक होते हैं।
लिवरवर्ट
लिवरवर्ट प्रायः नदी किनारों और दलदलों में उगते हैं। इनका शरीर एक चपटा थैलस होता है जो ज़मीन से चिपका रहता है (जैसे मारकैंशिया में)। अलैंगिक प्रजनन में ये "जेमा कप" नामक प्यालेनुमा रचनाओं में हरी कलियाँ (जेमा) बनाते हैं, जो बारिश की बूँदों से छिटककर नए पौधे में विकसित हो जाती हैं।
मॉस (काई)
मॉस का जीवन-चक्र दो चरणों में होता है — पहले बीजाणु से एक रेंगने वाला तंतु (प्रोटोनिमा) बनता है, जिससे पार्श्व कली के रूप में सीधा पत्तीदार युग्मकोद्भिद् विकसित होता है। यही वह भाग है जो लैंगिक अंग विकसित करता है। फ्यूनेरिया और स्फेगनम इस समूह के सामान्य उदाहरण हैं।
3 टैरिडोफाइट
ज़मीन पर सच्ची जड़-तना-पत्ती वाले पहले पौधे
टैरिडोफाइट (फर्न, हॉर्सटेल) पादप विकास में एक मील का पत्थर हैं। ये पहले ऐसे पौधे थे जिनमें संवहन ऊतक (जाइलम-फ्लोएम) विकसित थे, जिससे वे ब्रायोफाइट से कहीं बड़े हो सके। जीवाश्म रिकॉर्ड बताते हैं कि ये लगभग 35 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर छाए हुए थे और उस समय के वनों में इन्हीं का बोलबाला था।
बीजाणुधानी पत्ती जैसे बीजाणुपर्ण पर लगी होती है — कुछ प्रजातियों में ये सघन होकर शंकु जैसी रचना बना लेती हैं।
बीजाणुधानी में बनने वाले बीजाणु मिट्टी पर गिरकर अंकुरित होते हैं और एक छोटा, हरा, स्वतंत्र-जीवी युग्मकोद्भिद् (प्रोथैलस) बनाते हैं। इसे नम व छायादार स्थान की आवश्यकता होती है, और निषेचन के लिए भी पानी अनिवार्य है — यही कारण है कि टैरिडोफाइट का फैलाव सीमित रहता है।
टैरिडोफाइट के चार वर्ग हैं: साइलोप्सिडा (साइलोटम), लाइकोप्सिडा (सेलैजिनेला, लाइकोपोडियम), स्फीनोप्सिडा (इक्वीसीटम) और टेरोप्सिडा (ड्रायोप्टैरिस, एडिएंटम)।
4 जिम्नोस्पर्म
"नंगे बीज" वाले पौधे — देवदार, चीड़ और साइकस जैसे वृक्ष
जिम्नोस्पर्म शब्द ग्रीक भाषा से आया है — जिम्नोस (नंगा) + स्पर्मा (बीज) — यानी जिनके बीज खुले (अनावृत) होते हैं। ये मध्यम से लेकर बहुत ऊँचे वृक्ष और झाड़ियाँ हो सकते हैं; सिकुआ तो दुनिया के सबसे ऊँचे पौधों में गिना जाता है।
जिम्नोस्पर्म के शंकु ही इनके प्रजनन-अंग हैं — नर शंकु में परागकण और मादा शंकु में बीजांड बनते हैं।
जिम्नोस्पर्म की पत्तियाँ अक्सर सुई जैसी, संकरी और मोटी क्यूटिकल से ढकी होती हैं — यह बनावट ठंडे और शुष्क इलाकों में पानी की कमी से बचाती है। ये विषमबीजाणु होते हैं: नर शंकु में लघुबीजाणु (परागकण) और मादा शंकु में गुरुबीजाणु (बीजांड) बनते हैं। परागकण हवा द्वारा बीजांड तक पहुँचते हैं और वहाँ परागनली बनाकर नर युग्मक को स्त्रीधानी तक पहुँचाते हैं। निषेचन के बाद बीज खुला ही रहता है — कोई फल या आवरण नहीं बनता।
5 एंजियोस्पर्म
फूल वाले पौधे — जीव जगत का सबसे बड़ा और सबसे सफल पादप समूह
एंजियोस्पर्म यानी पुष्पी पादप — इन्होंने पौधों की दुनिया में सबसे बड़ी क्रांति ला दी। इनका सबसे बड़ा आविष्कार है फूल, जिसके भीतर परागकण और बीजांड विकसित होते हैं, और निषेचन के बाद बीज फल के अंदर सुरक्षित रहता है। इनका आकार-विस्तार अद्भुत है — वुल्फिया (माइक्रोस्कोपिक) से लेकर यूकेलिप्टस (100 मीटर+) तक।
एंजियोस्पर्म दो बड़े वर्गों में बँटते हैं — बीज में दो बीजपत्र (द्विबीजपत्री) या एक बीजपत्र (एकबीजपत्री) के आधार पर।
एंजियोस्पर्म ही वे पौधे हैं जो हमें अनाज, फल, लकड़ी, चारा, औषधियाँ और हजारों अन्य उत्पाद देते हैं। इन्हें दो वर्गों में बाँटा गया है: द्विबीजपत्री (दो बीजपत्र, जालिकावत् शिराविन्यास, मूसला जड़) और एकबीजपत्री (एक बीजपत्र, समानांतर शिराविन्यास, रेशेदार जड़)। एंजियोस्पर्म में द्विनिषेचन नामक एक अनोखी प्रक्रिया होती है, जिसमें एक नर युग्मक अंडकोशिका से तथा दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केंद्रक से संलयित होता है — यह विशेषता केवल एंजियोस्पर्म में पाई जाती है।
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न (2013 के बाद)
इस अध्याय (वनस्पति जगत) से पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न — हर प्रश्न पर क्लिक करके रंगीन उत्तर देखें
1NEET 2014 निम्नलिखित में से कौन सा युग्म असुमेलित है — (a) क्लोरोफाइसी—स्टार्च (b) फीयोफाइसी—मैनीटोल (c) रोडोफाइसी—फ्लोरिडियन स्टार्च (d) फीयोफाइसी—फाइकोएरिथ्रिन।
उत्तर: (d) असुमेलित है — फाइकोएरिथ्रिन तो रोडोफाइसी (लाल शैवाल) का रंग-द्रव्य है, फीयोफाइसी का नहीं।
फीयोफाइसी (भूरे शैवाल) में क्लोरोफिल a, c तथा फ्यूकोजैंथिन वर्णक पाया जाता है, जबकि फाइकोएरिथ्रिन रोडोफाइसी (लाल शैवाल) की पहचान है। शैवाल के तीनों वर्गों के वर्णक व संचित भोजन को उलट-पुलट कर पूछना NEET का बहुत प्रिय ट्रैप है — इस पूरी तालिका (वर्ग-वर्णक-भोजन-उदाहरण) को एक साथ याद रखना ज़रूरी है।
2NEET 2016 ब्रायोफाइट को "पादप जगत के उभयचर" क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि ये स्थल पर उगते तो हैं, परंतु इनका लैंगिक प्रजनन (नर युग्मक का स्त्रीधानी तक संचरण) पूर्णतः जल की उपस्थिति पर निर्भर करता है — ठीक जैसे उभयचर प्राणी जमीन पर रहते हुए भी प्रजनन के लिए पानी पर निर्भर होते हैं।
यह एक classic conceptual analogy-based प्रश्न है, जो NEET में सीधे या "क्यों" वाले तर्क-आधारित रूप में पूछा जाता रहा है। ध्यान रहे कि यह गुण केवल ब्रायोफाइट तक सीमित नहीं — टैरिडोफाइट में भी निषेचन के लिए जल आवश्यक है, इसलिए विकल्पों में दोनों समूहों को अलग करके पहचानना ज़रूरी होता है।
3NEET 2017 लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म के जीवन-चक्र में से किसमें युग्मकोद्भिद् (गैमीटोफाइट) प्रमुख, स्वतंत्र-जीवी अवस्था होती है?
उत्तर: केवल ब्रायोफाइट (लिवरवर्ट व मॉस) में — शेष तीनों (फर्न/टैरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म) में स्पोरोफाइट ही प्रमुख अवस्था होती है।
यह "प्रधान पीढ़ी की पहचान" वाला प्रश्न वर्गीकरण अध्याय का सबसे high-yield concept है। ब्रायोफाइट में जो नज़र आने वाला हरा पौधा है वह स्वयं युग्मकोद्भिद् है और स्पोरोफाइट उससे जुड़ा परजीवी जैसा अंश मात्र है — जबकि टैरिडोफाइट से आगे स्पोरोफाइट ही मुख्य दिखने वाला पौधा बन जाता है, और युग्मकोद्भिद् घटकर बीज के भीतर (फूल वाले पौधों में) या स्वतंत्र प्रोथैलस (फर्न में) तक सिमट जाता है।
4NEET 2018 निम्नलिखित पादप संरचनाओं की सूत्रगुणता (अगुणित/द्विगुणित) बताओ — (a) मॉस का प्रोटोनिमा (b) फर्न का प्रोथैलस (c) पाइनस का भ्रूणपोष (d) आवृतबीजी पौधे का प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक।
उत्तर: (a) अगुणित (b) अगुणित (c) अगुणित (d) त्रिगुणित (triploid)।
मॉस का प्रोटोनिमा व फर्न का प्रोथैलस दोनों युग्मकोद्भिद् अवस्था के भाग हैं, इसलिए अगुणित होते हैं। पाइनस (जिम्नोस्पर्म) का भ्रूणपोष मादा युग्मकोद्भिद् से बनता है, इसलिए यह भी अगुणित होता है — यह जिम्नोस्पर्म की एक विशिष्ट पहचान है (एंजियोस्पर्म से भिन्न)। आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पौधों में भ्रूणपोष द्विनिषेचन से बनता है और त्रिगुणित होता है — यह भेद (जिम्नोस्पर्म का अगुणित भ्रूणपोष बनाम एंजियोस्पर्म का त्रिगुणित भ्रूणपोष) NEET में बहुत बार पूछा गया है।
5NEET 2019 जिम्नोस्पर्म में विषमबीजाणुता (heterospory) की उपस्थिति के बावजूद, इन्हें एंजियोस्पर्म से अलग करने वाली सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर: जिम्नोस्पर्म में बीजांड अनावृत (नंगे) होते हैं यानी किसी अंडाशय के भीतर बंद नहीं होते, जबकि एंजियोस्पर्म में बीजांड अंडाशय के भीतर सुरक्षित रहते हैं तथा निषेचन के बाद फल के अंदर बंद बीज बनता है।
दोनों समूह (सेलैजिनेला/साल्वीनिया जैसे कुछ टैरिडोफाइट तथा सभी जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म) विषमबीजाणुता प्रदर्शित करते हैं, इसलिए यह गुण भेद करने के लिए काफी नहीं है — "gymnosperm" शब्द का शाब्दिक अर्थ ही (जिम्नोस = नंगा + स्पर्मा = बीज) यह भेद स्पष्ट कर देता है, और यही व्युत्पत्ति (etymology) आधारित प्रश्न भी NEET में पूछा जाता रहा है।
6NEET 2020 कवक मूल (mycorrhiza) व प्रवाल मूल (coralloid root) में क्या अंतर है, और ये क्रमशः किन जिम्नोस्पर्म वंशों से संबंधित हैं?
उत्तर: कवक मूल — पाइनस की जड़ों व कवक के बीच सहजीवी संबंध (जल-खनिज अवशोषण में सहायक); प्रवाल मूल — साइकस की छोटी जड़ों व नाइट्रोजन-स्थिरीकरण करने वाले सायनोबैक्टीरिया के बीच सहजीवी संबंध।
यह दोनों संबंध अलग-अलग साझेदार जीवों (कवक बनाम सायनोबैक्टीरिया) तथा अलग-अलग जिम्नोस्पर्म वंशों (पाइनस बनाम साइकस) से जुड़े होने के कारण NEET में अक्सर match-the-column या "किस पौधे में कौन सा संबंध पाया जाता है" वाले प्रश्न में आते हैं — इन्हें आपस में बदल कर गलत विकल्प बनाया जाता है, इसलिए सावधानी ज़रूरी है।
7NEET 2022 Phase 1 निम्नलिखित में से कौन सा शैवाल-वर्ग समूह प्रकाश-संश्लेषी वर्णक फाइकोएरिथ्रिन के कारण अपना विशिष्ट रंग प्राप्त करता है, तथा इससे कौन सा व्यावसायिक उत्पाद प्राप्त होता है?
उत्तर: रोडोफाइसी (लाल शैवाल); इनसे एगार (agar) नामक जिलेटिन-सदृश पदार्थ प्राप्त होता है।
एगार का व्यापक उपयोग सूक्ष्मजीव विज्ञान की प्रयोगशालाओं में संवर्धन माध्यम (culture medium) बनाने तथा आइसक्रीम व अन्य खाद्य पदार्थों में गाढ़ापन (thickening agent) लाने के लिए किया जाता है। पोरफायरा, ग्रेसिलेरिया व जिलेडियम इसके स्रोत उदाहरण हैं — यह "शैवाल का आर्थिक महत्व" वाला topic NEET में बहुत बार पूछा जाता है, विशेषकर एगार व कैरेजीनन के स्रोत पूछे जाते हैं।
8NEET 2022 Phase 2 "पादप जगत के भीतर सबसे पहले उन पौधों का उदय हुआ जिनमें असली संवहन ऊतक (जाइलम-फ्लोएम) मौजूद था" — यह कथन पादप जगत के किस समूह के लिए सत्य है?
उत्तर: टैरिडोफाइट (Pteridophyta)।
ब्रायोफाइट में सच्चे संवहन ऊतक नहीं होते, इसलिए इन्हें छोटे व नमी वाले स्थानों तक सीमित रहना पड़ता है। टैरिडोफाइट पहला ऐसा समूह है जिसमें विकसित जाइलम व फ्लोएम मिलते हैं, जिसने इन्हें ब्रायोफाइट से ऊँचा शारीरिक संगठन दिया और स्थलीय पादप-विकास में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ — जीवाश्म साक्ष्यों के अनुसार ये लगभग 35 करोड़ वर्ष पूर्व प्रभावी रहे थे, यह ऐतिहासिक/विकासवादी तथ्य भी objective प्रश्नों में पूछा जाता है।
9NEET 2023 द्विबीजपत्री व एकबीजपत्री पादपों के बीच शिराविन्यास (venation) के आधार पर मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: द्विबीजपत्री पादपों में पत्तियों में जालिकावत् (reticulate) शिराविन्यास पाया जाता है, जबकि एकबीजपत्री पादपों में समानांतर (parallel) शिराविन्यास पाया जाता है।
यह भेद बीज में बीजपत्रों की संख्या (दो बनाम एक) पर आधारित मूल वर्गीकरण से जुड़ा हुआ है, और NEET में अक्सर जड़ तंत्र (मूसला जड़ बनाम रेशेदार जड़) के साथ मिलाकर एक संयुक्त तुलनात्मक तालिका के रूप में पूछा जाता है।
10NEET 2024 पृथ्वी पर कुल वार्षिक कार्बन डाइऑक्साइड स्थिरीकरण में शैवाल का योगदान लगभग कितना है, और इसका पारिस्थितिक महत्व क्या है?
उत्तर: लगभग आधा (50%) — इसीलिए शैवाल को समुद्री खाद्य शृंखला की नींव (आधार) माना जाता है।
यह मात्रात्मक तथ्य (आधा हिस्सा) NEET में प्रत्यक्ष रूप से भी और पारिस्थितिकी अध्याय के साथ एकीकृत करके भी पूछा जाता है — प्राथमिक उत्पादक (primary producer) के रूप में शैवाल की भूमिका को अक्सर स्थलीय पादपों की भूमिका से तुलना करने वाले प्रश्नों में भी संदर्भित किया जाता है।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु व तुलनाएँ — ऊपर दिए गए प्रश्नों से अलग।
- पीढ़ी एकांतरण (alternation of generation) में जीवन-चक्र तीन प्रकार के हो सकते हैं — अगुणित (haplontic) जिसमें मुख्य पादप-शरीर अगुणित होता है (जैसे क्लैमाइडोमोनास की कुछ स्पीशीज); द्विगुणित (diplontic) जिसमें मुख्य पादप-शरीर द्विगुणित होता है व युग्मक ही एकमात्र अगुणित अवस्था होती है (जैसे फ्यूकस); तथा अगुणित-द्विगुणित (haplodiplontic) जिसमें दोनों पीढ़ियाँ (युग्मकोद्भिद् व बीजाणुद्भिद्) स्पष्ट रूप से बहुकोशिकीय होती हैं (जैसे एक्टोकार्पस, पॉलिसाइफोनिया) — शैवाल ही एकमात्र समूह है जिसमें तीनों प्रकार के जीवन-चक्र पाए जाते हैं।
- ब्रायोफाइट में स्पोरोफाइट कभी भी पूर्णतः स्वतंत्र-जीवी (free-living) नहीं होता — यह सदैव युग्मकोद्भिद् से आंशिक अथवा पूर्ण रूप से पोषण हेतु जुड़ा (attached/dependent) रहता है। "ब्रायोफाइट का स्पोरोफाइट भी स्वतंत्र रूप से जीवित रह सकता है" जैसा कथन सदैव गलत माना जाता है।
- टैरिडोफाइट को उनकी संरचना के आधार पर चार मुख्य वर्गों में बाँटा गया है — साइलोप्सिडा (Psilopsida), लाइकोप्सिडा (Lycopsida), स्फीनोप्सिडा (Sphenopsida) व टेरोप्सिडा (Pteropsida) — यह वर्गीकरण अक्सर "टैरिडोफाइट के उपसमूह" पहचानने वाले प्रश्नों में सीधे पूछा जाता है।
- विषमबीजाणुता (heterospory) — अर्थात दो प्रकार के बीजाणु (सूक्ष्मबीजाणु व गुरुबीजाणु) उत्पन्न करने की क्षमता — कुछ टैरिडोफाइट (जैसे सेलैजिनेला व साल्वीनिया) में पाई जाती है, तथा इसे ही बीज-आदत (seed habit) का उद्भव-बिंदु (precursor) माना जाता है — गुरुबीजाणु मादा युग्मकोद्भिद् के रूप में अंकुरित होकर संरक्षित पोषक-ऊतक से घिरा रहता है, जो आगे चलकर बीज-निर्माण की नींव बनता है।
- जिम्नोस्पर्म में परागण सीधे बीजांड (ovule) पर होता है, वर्तिकाग्र (stigma) पर नहीं — क्योंकि जिम्नोस्पर्म में न तो अंडाशय होता है न ही वर्तिकाग्र (चूँकि बीजांड अनावृत होते हैं)। "परागण सदैव वर्तिकाग्र पर होता है" जैसा सामान्यीकरण केवल एंजियोस्पर्म पर लागू होता है, जिम्नोस्पर्म पर नहीं।
- द्विनिषेचन (double fertilization) केवल एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी पौधों) की अद्वितीय व परिभाषात्मक विशेषता है — यह जिम्नोस्पर्म सहित पादप जगत के किसी भी अन्य समूह में नहीं पाई जाती। इसमें एक नर युग्मक अंड कोशिका से संलयित होकर युग्मनज (zygote) तथा दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक से संलयित होकर त्रिगुणित (triploid) प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बनाता है।
- भ्रूणपोष (endosperm) के निर्माण-समय व सूत्रगुणता में जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म में मूलभूत भेद है — जिम्नोस्पर्म में भ्रूणपोष निषेचन से पूर्व बनता है (यह मादा युग्मकोद्भिद् का ही भाग है, अतः अगुणित होता है); जबकि एंजियोस्पर्म में भ्रूणपोष निषेचन के पश्चात् त्रिसंलयन (triple fusion) द्वारा बनता है, अतः त्रिगुणित (triploid) होता है — यह भेद अनेक बार प्रत्यक्ष रूप से पूछा गया है।
- साइकस (Cycas) को जिम्नोस्पर्म का "जीवित जीवाश्म (living fossil)" कहा जाता है — क्योंकि यह करोड़ों वर्ष पूर्व की भूवैज्ञानिक कालावधि (मेसोज़ोइक युग) से लगभग अपरिवर्तित रूप में आज तक जीवित है।
- शैवाल के तीनों वर्गों में क्लोरोफिल के प्रकार का संयोजन भिन्न होता है (सभी में क्लोरोफिल a उभयनिष्ठ रूप से उपस्थित रहता है) — क्लोरोफाइसी में क्लोरोफिल a व b; फीयोफाइसी में क्लोरोफिल a व c; रोडोफाइसी में क्लोरोफिल a व d पाया जाता है — यह "d" प्रकार का क्लोरोफिल सामान्यतः रोडोफाइसी तक ही सीमित होने के कारण एक विशिष्ट पहचान-बिंदु है।
- शैवाल की कोशिका-भित्ति संरचना में भी वर्ग-भेद पाया जाता है — क्लोरोफाइसी में केवल सेलुलोस; फीयोफाइसी में सेलुलोस के साथ-साथ ऐल्जिन (algin); रोडोफाइसी में सेलुलोस के साथ गैलेक्टान्स व सल्फेटयुक्त बहुशर्कराएँ (sulphated polysaccharides) पाई जाती हैं — व्यावसायिक रूप से ऐल्जिन व एगार (agar) इन्हीं भित्ति-घटकों से प्राप्त होते हैं।
- शैवाल में लैंगिक जनन की तीन उत्तरोत्तर विकासवादी अवस्थाएँ पाई जाती हैं — समयुग्मकी (isogamous, दोनों युग्मक समान आकार व गतिशील), विषमयुग्मकी (anisogamous, आकार में भिन्न परन्तु दोनों गतिशील), तथा अंडयुग्मकी (oogamous, एक बड़ा अचल मादा युग्मक व एक छोटा गतिशील नर युग्मक) — क्लैमाइडोमोनास की विभिन्न स्पीशीज में समयुग्मकी व अंडयुग्मकी दोनों प्रकार पाए जाने का उदाहरण अक्सर पूछा जाता है।
- लिवरवर्ट (जैसे मार्केन्शिया) में अलैंगिक जनन विशिष्ट संरचनाओं — जेम्मा कप (gemma cup) में बनने वाले जेम्मी (gemmae) — द्वारा होता है, जो वर्षा की बूँदों से छिटककर नए पौधे में विकसित हो जाते हैं। मॉस में द्वितीयक प्रोटोनिमा भी पौधे के किसी भी भाग से पुनः विकसित हो सकता है — दोनों उदाहरण कायिक/अलैंगिक जनन-आधारित प्रश्नों में विशिष्ट रूप से पूछे गए हैं।
- ब्रायोफाइट के दोनों प्रमुख उपसमूहों की मुख्य काया (main plant body) की बनावट भिन्न होती है — लिवरवर्ट में यह चपटी, पृष्ठाधार सतह वाली थैलस-रूपी (thalloid) होती है; जबकि मॉस में यह उर्ध्व अक्ष पर सर्पिल क्रम में व्यवस्थित पत्तीनुमा संरचनाओं सहित पर्णिल (leafy) होती है — दोनों ही युग्मकोद्भिद् अवस्था के रूप हैं, स्पोरोफाइट के नहीं।
- जिम्नोस्पर्म (जैसे पाइनस) की सूच्याकार (needle-like) पत्तियाँ शुष्कोद्भिद् (xerophytic) परिस्थितियों के अनुकूलन का उदाहरण हैं — इनमें रंध्र (stomata) धँसे हुए (sunken) होते हैं तथा उपत्वचा (cuticle) मोटी होती है, जिससे वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा जल-हानि न्यूनतम होती है — यह अनुकूलन जिम्नोस्पर्म के प्रायः शुष्क/ठंडे आवासों में जीवित रहने से जुड़ा है।
- चूँकि यह अध्याय तुलनात्मक व वर्गीकरण-आधारित है, अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) प्रत्येक समूह (शैवाल, ब्रायोफाइट, टैरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म) में प्रमुख पीढ़ी (गैमीटोफाइट/स्पोरोफाइट) व उसकी सूत्रगुणता, (2) शैवाल के तीनों वर्गों की वर्णक-भित्ति-संचित भोजन तालिका, (3) जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म के बीज व भ्रूणपोष संबंधी सभी भेद — इन्हीं तीन विषयों से अधिकांश तुलनात्मक व मैच-द-कॉलम प्रकार के प्रश्न बनते हैं।
✓ सारांश
शैवाल
सरल, थैलस-रूपी, स्वपोषी, मुख्यतः जलीय। रंग-द्रव्य और संचित भोजन के आधार पर तीन वर्ग — क्लोरोफाइसी, फीयोफाइसी, रोडोफाइसी।
ब्रायोफाइट
मिट्टी पर उगते हैं, पर लैंगिक जनन के लिए पानी अनिवार्य। मुख्यकाय युग्मकोद्भिद् है। लिवरवर्ट व मॉस में विभक्त।
टैरिडोफाइट
सच्ची जड़-तना-पत्ती और संवहन ऊतक वाले पहले पौधे। मुख्यकाय स्पोरोफाइट है, पर निषेचन अब भी जल-निर्भर।
जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म
जिम्नोस्पर्म में बीजांड अनावृत; एंजियोस्पर्म में फूल और फल के भीतर बीज सुरक्षित। एंजियोस्पर्म द्विबीजपत्री व एकबीजपत्री में विभक्त।
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प्रश्न 1 शैवाल के वर्गीकरण का क्या आधार है?
शैवाल को मुख्य रूप से तीन आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है:
- रंग-द्रव्य (वर्णक) का प्रकार — जैसे हरे शैवाल में क्लोरोफिल a व b, भूरे में फ्यूकोजैंथिन, और लाल शैवाल में फाइकोएरिथ्रिन प्रमुख होता है।
- संचित भोजन का रूप — स्टार्च, मैनीटोल, या फ्लोरिडियन स्टार्च।
- कोशिका भित्ति की बनावट और कशाभ (फ्लैजिला) की संख्या व स्थिति।
इन्हीं आधारों पर शैवाल को क्लोरोफाइसी, फीयोफाइसी और रोडोफाइसी — तीन वर्गों में बाँटा गया है।
प्रश्न 2 लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म के जीवन-चक्र में कहाँ और कब न्यूनीकरण विभाजन (मिऑसिस) होता है?
इन सभी समूहों में न्यूनीकरण विभाजन युग्मनज (द्विगुणित) से बीजाणु बनते समय होता है — यानी स्पोरोफाइट अवस्था में बीजाणुधानी के भीतर बीजाणु-मातृ कोशिका में मिऑसिस होता है, जिससे अगुणित बीजाणु बनते हैं।
लिवरवर्ट व मॉस में यह कैप्सूल के भीतर होता है; फर्न में बीजाणुधानी के भीतर; जबकि जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म में यह लघुबीजाणुधानी (परागकण बनते समय) और गुरुबीजाणुधानी/बीजांड (भ्रूणकोष बनते समय) — दोनों जगह होता है।
प्रश्न 3 पौधे के तीन वर्गों के नाम लिखो, जिनमें स्त्रीधानी होती है। इनमें से किसी एक के जीवन-चक्र का संक्षिप्त वर्णन करो।
स्त्रीधानी (आर्किगोनियम) ब्रायोफाइट, टैरिडोफाइट तथा जिम्नोस्पर्म — इन तीनों समूहों में पाई जाती है।
मॉस का जीवन-चक्र: बीजाणु के अंकुरण से एक रेंगने वाला प्रथम तंतु बनता है, जिससे पत्तीदार युग्मकोद्भिद् (गैमेटोफाइट) विकसित होता है। इसी पर पुंधानी व स्त्रीधानी बनती हैं। पानी की मदद से नर युग्मक स्त्रीधानी तक पहुँचकर अंडे से निषेचित होता है, जिससे युग्मनज बनता है। युग्मनज से स्पोरोफाइट (पाद, सीटा व कैप्सूल) विकसित होता है, जो युग्मकोद्भिद् से जुड़ा रहकर पोषण लेता है। कैप्सूल में मिऑसिस द्वारा बीजाणु बनते हैं, जो बिखरकर फिर से नए युग्मकोद्भिद् में अंकुरित होते हैं।
प्रश्न 4 निम्नलिखित की सूत्रगुणता (अगुणित/द्विगुणित) बताओ।
| संरचना | सूत्रगुणता |
|---|---|
| मॉस की प्रथम तंतुक कोशिका | अगुणित (n) |
| द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केंद्रक | त्रिगुणित (3n) |
| मॉस की पत्तियों की कोशिका | अगुणित (n) |
| फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएं | अगुणित (n) |
| मारकेंशिया की जेमा कोशिका | अगुणित (n) |
| एकबीजपत्री की मैरिस्टेम कोशिका | द्विगुणित (2n) |
| लिवरवर्ट के अंडाशय (अंडकोशिका) | अगुणित (n) |
| फर्न के युग्मनज | द्विगुणित (2n) |
प्रश्न 5 शैवाल तथा जिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्त्व पर टिप्पणी लिखो।
शैवाल का महत्व: ये पृथ्वी की कुल स्थिरीकृत कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग आधा भाग स्थिर करते हैं और वातावरण में ऑक्सीजन बढ़ाते हैं। समुद्री खाद्य शृंखला की नींव यही हैं। पोरफायरा, लैमिनेरिया व सरगासम जैसी प्रजातियाँ भोजन के रूप में खाई जाती हैं। लाल व भूरे शैवाल से कैरागीन तथा जिलेडियम/ग्रेसिलेरिया से एगार मिलता है, जो सूक्ष्मजीव संवर्धन व खाद्य उद्योग में उपयोगी है। क्लोरैला व स्पिरुलाइना प्रोटीन-युक्त आहार पूरक के रूप में इस्तेमाल होते हैं।
जिम्नोस्पर्म का महत्व: पाइनस, सीड्रस जैसे वृक्षों से इमारती लकड़ी, कागज़ के लिए लुगदी तथा रेज़िन व तारपीन जैसे उत्पाद मिलते हैं। कुछ प्रजातियों से औषधियाँ भी प्राप्त होती हैं, और ये सजावटी वृक्षों के रूप में भी लगाए जाते हैं।
प्रश्न 6 जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं, फिर भी उनका वर्गीकरण अलग-अलग क्यों हैं?
बीज होना दोनों में समान है, लेकिन इनकी संरचना में एक बुनियादी फर्क है। जिम्नोस्पर्म में बीजांड किसी अंडाशय भित्ति से ढका नहीं होता — यह निषेचन से पहले और बाद में भी पूरी तरह खुला (अनावृत) रहता है, इसीलिए इन्हें "अनावृत बीजी" पौधे कहा जाता है। इसके विपरीत एंजियोस्पर्म में बीजांड अंडाशय के भीतर पूरी तरह सुरक्षित रहता है, और निषेचन के बाद यह अंडाशय ही फल में बदल जाता है जिसके भीतर बीज बंद रहते हैं। इसके अलावा एंजियोस्पर्म में एक विशेष संरचना — फूल — पाई जाती है, जो जिम्नोस्पर्म में नहीं होती; वहाँ इसके बदले शंकु पाए जाते हैं। यही संरचनात्मक अंतर दोनों को अलग-अलग समूहों में रखने का आधार है।
प्रश्न 7 विषम बीजाणुता क्या है? इसकी सार्थकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। इसके दो उदाहरण दो।
विषम बीजाणुता उस स्थिति को कहते हैं जब एक ही पौधे में दो अलग-अलग आकार के बीजाणु बनते हैं — बड़े गुरुबीजाणु (मादा) और छोटे लघुबीजाणु (नर)। बड़े गुरुबीजाणु से मादा युग्मकोद्भिद् और छोटे लघुबीजाणु से नर युग्मकोद्भिद् विकसित होता है।
सार्थकता: यह अवधारणा विकास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी में मादा युग्मकोद्भिद् अपनी ज़रूरतों के लिए मातृ स्पोरोफाइट पर निर्भर रहता है और उसी के भीतर एक नया भ्रूण विकसित होता है — यही घटना आगे चलकर "बीजी प्रकृति" यानी असली बीज के विकास की दिशा में पहला कदम मानी जाती है।
उदाहरण: सेलैजिनेला और साल्वीनिया (दोनों टैरिडोफाइट के सदस्य हैं)।
प्रश्न 8 उदाहरण सहित निम्नलिखित शब्दावली का संक्षिप्त वर्णन करो।
(i) प्रथम तंतु: मॉस के बीजाणु के अंकुरण से बनने वाली पहली, रेंगने वाली हरी संरचना, जिससे बाद में पत्तीदार युग्मकोद्भिद् विकसित होता है।
(ii) पुंधानी: ब्रायोफाइट व टैरिडोफाइट का नर लैंगिक अंग, जिसमें तैरने वाले नर युग्मक (पुमणु) बनते हैं। उदाहरण: मॉस, फर्न।
(iii) स्त्रीधानी: फ्लास्क के आकार का मादा लैंगिक अंग, जिसमें एक अंडकोशिका होती है। उदाहरण: मारकैंशिया, फ्यूनेरिया।
(iv) द्विगुणितक: वह कोशिका या अवस्था जिसमें क्रोमोसोम की दो पूरी शृंखलाएं (2n) मौजूद हों — जैसे स्पोरोफाइट अवस्था।
(v) बीजाणुपर्ण: टैरिडोफाइट व जिम्नोस्पर्म की वह पत्ती जिस पर बीजाणुधानी लगी होती है। उदाहरण: फर्न की पत्तियाँ, पाइनस के शंकु-शल्क।
(vi) समयुग्मकी: लैंगिक जनन का वह प्रकार जिसमें संगलित होने वाले दोनों युग्मक आकार व गति में बिल्कुल समान होते हैं। उदाहरण: यूलोथ्रिक्स।
प्रश्न 9 निम्नलिखित में अंतर करो।
(i) लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल: लाल शैवाल में फाइकोएरिथ्रिन वर्णक प्रमुख होता है और भोजन फ्लोरिडियन स्टार्च के रूप में जमा होता है; ये अधिकांशतः गर्म व गहरे समुद्रों में मिलते हैं। भूरे शैवाल में फ्यूकोजैंथिन वर्णक प्रमुख होता है, भोजन मैनीटोल/लैमिनेरिन के रूप में जमा होता है, और आकार में ये बहुत बड़े (केल्प जैसे) हो सकते हैं।
(ii) लिवरवर्ट तथा मॉस: लिवरवर्ट का शरीर चपटा, पृष्ठाधर थैलस होता है जो ज़मीन से पूरी तरह चिपका रहता है। मॉस का शरीर सीधा तना जैसा होता है जिस पर सर्पिल क्रम में पत्तियाँ लगी होती हैं और यह मूलाभ द्वारा मिट्टी से जुड़ा रहता है। मॉस का स्पोरोफाइट लिवरवर्ट की तुलना में अधिक विकसित होता है।
(iii) विषम बीजाणुक तथा सम बीजाणुक टैरिडोफाइट: समबीजाणुक पौधों (जैसे अधिकांश फर्न) में केवल एक ही प्रकार के बीजाणु बनते हैं। विषमबीजाणुक पौधों (जैसे सेलैजिनेला, साल्वीनिया) में दो अलग आकार के बीजाणु — बड़े गुरुबीजाणु व छोटे लघुबीजाणु — बनते हैं, जो क्रमशः मादा व नर युग्मकोद्भिद् बनाते हैं।
प्रश्न 10 स्तंभ I में दिए गए पादपों की स्तंभ II में दिए गए पादप वर्गों से मिलान करो।
| पादप | वर्ग |
|---|---|
| क्लैमाइडोमोनास | शैवाल |
| साइकस | जिम्नोस्पर्म |
| सेलैजिनेला | टैरिडोफाइट |
| स्फेगनम | मॉस |
प्रश्न 11 जिम्नोस्पर्म के महत्वपूर्ण अभिलक्षणों का वर्णन करो।
जिम्नोस्पर्म की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- इनके बीजांड अनावृत होते हैं — किसी अंडाशय भित्ति से ढके नहीं होते, इसलिए बीज भी खुले रहते हैं।
- ये मध्यम से लंबे वृक्ष व झाड़ियाँ होते हैं, जिनकी जड़ें प्रायः मूसला मूल होती हैं। कुछ प्रजातियों में कवक मूल (पाइनस) या प्रवाल मूल (साइकैस) जैसी विशेष सहजीविता पाई जाती है।
- पत्तियाँ प्रायः सरल, सुई जैसी होती हैं, जिनका सतही क्षेत्रफल कम व क्यूटिकल मोटी होती है — यह अधिक ताप, नमी व वायु सहन करने में मदद करता है।
- ये विषमबीजाणु होते हैं — नर शंकु में लघुबीजाणु (परागकण) व मादा शंकु में गुरुबीजाणु (बीजांड) बनते हैं।
- दोनों नर व मादा युग्मकोद्भिद् स्वतंत्र नहीं होते, बल्कि स्पोरोफाइट पर ही बीजाणुधानी के भीतर विकसित होते हैं।
- परागण वायु के माध्यम से होता है, और निषेचन के बाद बना बीज बिना किसी आवरण के खुला रहता है।