जीव जगत का वर्गीकरण — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • जीव जगत में विविधता

जीव जगत का वर्गीकरण

एक-कोशिक जीवाणु से लेकर बहुकोशिक कवक तक, और अकोशिक विषाणु से लेकर सहजीवी लाइकेन तक — जीव जगत की विविधता को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने समय के साथ कई वर्गीकरण पद्धतियाँ विकसित कीं। इस अध्याय में हम व्हिटेकर द्वारा प्रस्तावित पाँच जगत वर्गीकरण पद्धति तथा मॉनेरा, प्रोटिस्टा एवं फंजाई जगत के विस्तृत लक्षणों को समझेंगे।

भूमिका वर्गीकरण का विकास

सभ्यता के प्रारंभ से ही मानव ने सजीव प्राणियों के वर्गीकरण के अनेक प्रयास किए हैं। वर्गीकरण के ये प्रयास वैज्ञानिक मानदंडों की जगह सहज बुद्धि पर आधारित हमारे भोजन, वस्त्र एवं आवास जैसी सामान्य उपयोगिता की वस्तुओं के उपयोग की आवश्यकताओं पर आधारित थे। इन प्रयासों में जीवों के वर्गीकरण के वैज्ञानिक मानदंडों का उपयोग सर्वप्रथम अरस्तू ने किया था। उन्होंने पादपों को सरल आकारिक लक्षणों के आधार पर वृक्ष, झाड़ी एवं शाक में वर्गीकृत किया था। जबकि उन्होंने प्राणियों का वर्गीकरण लाल रक्त की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति के आधार पर किया था।

लीनियस के काल में सभी पादपों और प्राणियों के वर्गीकरण के लिए एक द्विजगत पद्धति विकसित की गई थी, जिसमें उन्हें क्रमश: प्लांटी (पादप) एवं एनिमेलिया (प्राणि) जगत में वर्गीकृत किया गया था। इस पद्धति के अनुसार यूकैरियोटी (ससीमकेंद्रकी) एवं प्रोकैरियोटी (असीमकेंद्रकी), एक कोशिक एवं बहुकोशिक तथा प्रकाश संश्लेषी (हरित शैवाल) एवं अप्रकाश संश्लेषी (कवक) के बीच विभेद स्थापित करना संभव नहीं था।

पादपों एवं प्राणियों पर आधारित यह वर्गीकरण आसान एवं सरलता से समझे जाने के बावजूद बहुत से जीवधारियों को इनमें से किसी भी वर्ग में रखना संभव नहीं था। इसी कारण अत्यंत लंबे समय से चली आ रही वर्गीकरण की द्विजगत पद्धति अपर्याप्त सिद्ध हो रही थी।

इसके अतिरिक्त, वर्गीकरण के लिए आकारिकी के साथ-साथ कोशिका संरचना, कोशिका भित्ति के लक्षण, पोषण की विधि, आवास, प्रजनन की विधियाँ एवं विकासीय संबंधों को भी समाहित करने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। अत: समय के साथ-साथ सजीवों के वर्गीकरण की पद्धति में अनेक परिवर्तन आए हैं। इसके अतिरिक्त जीवधारियों के विभिन्न जगत की संख्या एवं उनके लक्षणों की विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा अलग-अलग व्याख्या की गई है।

सन् 1969 में आर.एच. व्हिटेकर द्वारा एक पाँच जगत वर्गीकरण की पद्धति प्रस्तावित की गई थी। इस पद्धति के अंतर्गत सम्मिलित किए जाने वाले जगतों के नाम मॉनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी एवं एनिमेलिया हैं। कोशिका संरचना, शारीरिक संरचना, पोषण की प्रक्रिया, प्रजनन एवं जातिवृत्तीय संबंध उनके वर्गीकरण की पद्धति के प्रमुख मानदंड थे।

तालिका 2.1 — पाँच जीव-जगत के लक्षण

लक्षणमॉनेराप्रोटिस्टाफंजाईप्लांटीऐनिमेलिया
कोशिका प्रकारप्रोकैरियोटिकयूकैरियोटिकयूकैरियोटिकयूकैरियोटिकयूकैरियोटिक
कोशिका भित्तिसेलूलोज रहित (बहुशर्कराइड) + एमीनो अम्लकुछ में उपस्थितउपस्थित (सेल्युलोस रहित) काइटिन युक्तउपस्थित (सेल्युलोस सहित)अनुपस्थित
केंद्रक झिल्लीअनुपस्थितउपस्थितउपस्थितउपस्थितउपस्थित
काय संरचनाकोशिकीयकोशिकीयबहुकोशिक/अदृढ़ ऊतकऊतक/अंगऊतक/अंग/अंग तंत्र
पोषण की विधिस्वपोषी (रसायन संश्लेषी एवं प्रकाशसंश्लेषी) तथा परपोषी (मृतपोषी एवं परजीवी)स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) तथा परपोषीपरपोषी (मृतपोषी एवं परजीवी)स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी)परपोषी (प्राणि समभोजी, मृतपोषी इत्यादि)
प्रजनन की विधिसंयुग्मनयुग्मक संलयन एवं संयुग्मननिषेचननिषेचननिषेचन

अब हम पाँच जगत वर्गीकरण से जुड़े मुद्दों एवं धारणाओं पर विचार करेंगे, जिससे वर्गीकरण की यह पद्धति प्रभावित है। इससे पहले की वर्गीकरण पद्धति के अंतर्गत बैक्टीरिया, नील-हरित शैवाल, (फंजाई) मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म एवं एन्जिओस्पर्म को 'पादपों' के साथ रखा गया था। इस जगत के समस्त जीवों की कोशिकाओं में कोशिका भित्ति का उपस्थित रहना एक समानता थी, जबकि उनके अन्य लक्षण एक दूसरे से एक दम अलग थे।

जीवन की तीन अनुक्षेत्र पद्धतियाँ भी प्रस्तावित की गई थीं, जिसमें मॉनेरा जगत् को दो अनुक्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया तथा सारे यूकैरियोटिक जगत् को तीसरे अनुक्षेत्र में रखा गया। अत: एक षट्जगत् वर्गीकरण पद्धति भी प्रस्तावित की गई। प्रोकैरियोटिक बैक्टीरिया तथा नील-हरित शैवाल या साइनोबैक्टीरिया को अन्य यूकैरियोटिक जीवों के साथ वर्गीकृत कर दिया गया। इस पद्धति के अनुसार एक कोशिक जीवों को बहुकोशिक जीवों के साथ वर्गीकृत किया गया, जैसे- क्लेमाइडोमोनास एवं स्पाइरोगायरा शैवाल।

इस वर्गीकरण में कवकों जैसे परपोषी का, हरित पादपों जैसे स्वपोषी, के बीच भी विभेद नहीं किया गया, जबकि कवकों की कोशिका भित्ति काइटिन की एवं हरित पादपों की सेलुलोस की बनी होती है। इन्हीं लक्षणों को ध्यान में रखते हुए कवकों को एक अलग जगत 'फंजाई' के अंतर्गत रखा गया है। सभी प्रोकैरियोटिक जीवधारियों के साथ 'मॉनेरा' तथा एककोशिक जीवधारियों को प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत रखा गया है।

इस प्रकार इस पद्धति में अनेक जीवधारियों को एक साथ रखा गया है, जिन्हें पहले की पद्धतियों में अलग-अलग रखा गया था। ऐसा वर्गीकरण के मानदंडों में परिवर्तन के कारण हुआ है। इस प्रकार के परिवर्तन भविष्य में भी हो सकते हैं, जो लक्षणों तथा विकासीय संबंधों के प्रति हमारी समझ में सुधार पर निर्भर होगी। समय के साथ-साथ वर्गीकरण की एक ऐसी पद्धति विकसित करने का प्रयास किया गया है जो न सिर्फ आकारिक, कायिक एवं प्रजनन संबंधी समानताओं पर आधारित हों, बल्कि जातिवृत्तीय हो और विकासीय संबंधों पर भी आधारित हो।

इस अध्याय में हम व्हिटेकर पद्धति के अंतर्गत मॉनेरा, प्रोटिस्टा एवं फंजाई के लक्षणों का अध्ययन करेंगे। प्लांटी एवं एनिमेलिया जगत, जिन्हें सामान्य भाषा में क्रमश: पादप एवं प्राणि जगत कहते हैं, की चर्चा आगे के दो अध्यायों में अलग-अलग करेंगे।

2.1 मॉनेरा जगत

सभी बैक्टीरिया मॉनेरा जगत के अंतर्गत आते हैं। ये सूक्ष्मजीवियों में सर्वाधिक संख्या में होते हैं और लगभग सभी स्थानों पर पाए जाते हैं। मुट्ठी भर मिट्टी में सैकड़ों प्रकार के बैक्टीरिया देखे गए हैं। ये गर्म जल के झरनों, मरूस्थल, बर्फ एवं गहरे समुद्र जैसे विषम एवं प्रतिकूल वास स्थानों, जहाँ दूसरे जीव मुश्किल से ही जीवित रह पाते हैं, में भी पाए जाते हैं। कई बैक्टीरिया तो अन्य जीवों पर या उनके भीतर परजीवी के रूप में रहते हैं।

बैक्टीरिया को उनके आकार के आधार पर चार समूहों — गोलाकार कोकस (बहुवचन कोकाई), छड़ाकार बैसिलस (बहुवचन बैसिलाई), कॉमा-आकार के विब्रियम (बहुवचन-विब्रियाँ) तथा सर्पिलाकार स्पाइरिलम (बहुवचन स्पाइरिला) — में बाँटा गया है।

कोकाई
बैसिलाई
स्पाइरिला
विब्रियो

चित्र 2.1 — विभिन्न आकार के बैक्टीरिया (कोकाई, बैसिलाई, स्पाइरिला, विब्रियो)

यद्यपि संरचना में बैक्टीरिया अत्यंत सरल प्रतीत होते हैं; परंतु इनका व्यवहार अत्यंत जटिल होता है। चयपचय (उपापचय) की दृष्टि से अन्य जीवधारियों की तुलना में बैक्टीरिया में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। उदाहरण स्वरूप वे अपना भोजन अकार्बनिक पदार्थों से संश्लेषित कर सकते हैं। ये प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी अथवा रसायन संश्लेषी स्वपोषी होते हैं, अर्थात् वे अपना भोजन स्वयं संश्लेषित नहीं करते हैं; अपितु भोजन के लिए अन्य जीवधारियों अथवा मृत कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं।

2.1.1 आद्य बैक्टीरिया

ये विशिष्ट प्रकार के बैक्टीरिया होते हैं, ये बैक्टीरिया अत्यंत कठिन वास स्थानों, जैसे-अत्यंत लवणीय क्षेत्र (हैलोफी), गर्म झरने (थर्मोएसिडोफिलस) एवं कच्छ क्षेत्र (मैथेनोजेन) में पाए जाते हैं। आद्य बैक्टीरिया तथा अन्य बैक्टीरिया की कोशिका भित्ति की संरचना एक दूसरे से भिन्न होती है। यही लक्षण उन्हें प्रतिकूल अवस्थाओं में जीवित रखने के लिए उत्तरदायी हैं। मैथेनोजेन अनेक रूमिनेंट पशुओं (जैसे गाय एवं भैंस) के आंत्र में पाए जाते हैं तथा इनके गोबर से मीथेन (जैव गैस) का उत्पादन करते हैं।

2.1.2 यूबैक्टीरिया

हजारों यूबैक्टीरिया अथवा वास्तविक बैक्टीरिया की पहचान एक कठोर कोशिका भित्ति एवं एक कशाभ (चल बैक्टीरिया) द्वारा की जाती है। सायनो बैक्टीरिया (जिन्हें नील-हरित शैवाल भी कहते हैं) में हरित पादपों की तरह क्लोरोफिल-ए पाया जाता है तथा ये प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी होते हैं। सायनो बैक्टीरिया एककोशिक, क्लोनीय अथवा तंतुमय अलवण जलीय समुद्री अथवा स्थलीय शैवाल हैं।

शलेष्मी आच्छद हेटेरोसिस्ट

चित्र 2.2 — एक तंतुमयी शैवाल-नॉस्टॉक

इनकी क्लोनी प्राय: जेलीनुमा आवरण से ढकी रहती हैं जो प्रदूषित जल में बहुत फलते-फूलते हैं। बैक्टीरिया जैसे नॉस्टॉक एवं एनाबिना पर्यावरण के नाइट्रोजन को टेटरोसिस्ट नामक विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा स्थिर कर सकते हैं। रसायन संश्लेषी बैक्टीरिया नाइट्रेट, नाइट्राइट एवं अमोनिया जैसे विभिन्न अकार्बनिक पदार्थों को ऑक्सीकृत कर उनसे मुक्त ऊर्जा का उपयोग एटीपी उत्पादन के लिए करते हैं। ये नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, आयरन एवं सल्फर जैसे पोषकों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

परपोषी बैक्टीरिया प्रकृति में बहुलता से पाए जाते हैं और इनमें अधिकतर महत्वपूर्ण अपघटक होते हैं। इन परपोषी बैक्टीरिया में से अनेक का मनुष्य के जीवन संबंधी गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। ये दूध से दही बनाने में, प्रतिजैविकों के उत्पादन में, लेग्युम पादप की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायता करते हैं। कुछ बैक्टीरिया रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों, फसलों, फार्म एवं पालतू पशुओं को हानि पहुँचाते हैं। विभिन्न बैक्टीरिया के कारण हैजा, टायफॉयड, टिटनेस, साइट्रस, कैंकर जैसी बीमारियां होती हैं।

कोशिका भित्ति कोशिका झिल्ली डीएनए

चित्र 2.3 — एक विभक्त होता हुआ बैक्टीरिया

बैक्टीरिया प्रमुख रूप से कोशिका विभाजन द्वारा प्रजनन करते हैं। कभी-कभी, विपरीत परिस्थितियों में ये बीजाणु बनाते हैं। ये लैंगिक प्रजनन भी करते हैं, जिनमें एक बैक्टीरिया से दूसरे बैक्टीरिया में डीएनए का पुरातन स्थानांतरण होता है।

माइकोप्लाज्मा ऐसे जीवधारी हैं, जिनमें कोशिका भित्ति बिल्कुल नहीं पाई जाती है। ये सबसे छोटी जीवित कोशिकाएं हैं, जो ऑक्सीजन के बिना भी जीवित रह सकती हैं। अनेक माइकोप्लाज्मा प्राणियों और पादपों के लिए रोगजनक होती हैं।

2.2 प्रोटिस्टा जगत

सभी एककोशिक यूकैरियोटिक को प्रोटिस्टा के अंतर्गत रखा गया है, परंतु इस जगत की सीमाएं ठीक तरह से निर्धारित नहीं हो पाई हैं। एक जीव वैज्ञानिक के लिए जो 'प्रकाशसंश्लेषी प्रोटिस्टा' है, वही दूसरे के लिए 'एक पादप' हो सकता है। क्राइसोफाइट, डायनोफ्लैजिलेट, युग्लीनॉइड, अवपंक कवक एवं प्रोटोजोआ सभी को इस पुस्तक में प्रोटिस्टा के अंतर्गत रखा गया है।

प्राथमिक रूप से प्रोटिस्टा के सदस्य जलीय होते हैं। यूकैरियोटिक होने के कारण इनकी कोशिका में एक सुसंगठित केंद्रक एवं अन्य झिल्लीबद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं। कुछ प्रोटिस्टा में कशाभ एवं पक्षमाभ भी पाए जाते हैं। ये अलैंगिक, तथा कोशिका संलयन एवं युग्मनज (जाइगोट) बनने की विधि द्वारा लैंगिक प्रजनन करते हैं।

2.2.1 क्राइसोफाइट

इस समूह के अंतर्गत डाइएटम तथा सुनहरे शैवाल (डेस्मिड) आते हैं। ये स्वच्छ जल एवं लवणीय (समुद्री) पर्यावरण दोनों में पाए जाते हैं। ये अत्यंत सूक्ष्म होते हैं तथा जलधारा के साथ निश्चेष्ट रूप से बहते हैं। डाइएटम में कोशिका भित्ति साबुनदानी की तरह इसी के अनुरूप दो अतिछादित कवच बनाती है। इन भित्तियों में सिलिका होती है, जिस कारण ये नष्ट नहीं होते हैं। इस प्रकार मृत डाइएटम अपने परिवेश (वास स्थान) में कोशिका भित्ति के अवशेष बहुत बड़ी संख्या में छोड़ जाते हैं।

करोड़ों वर्षों में जमा हुए इस अवशेष को 'डाइएटमी मृदा' कहते हैं। कणमय होने के कारण इस मृदा का उपयोग पॉलिश करने, तेलों तथा सिरप के निस्यंदन में होता है। ये समुद्र के मुख्य उत्पादक हैं।

2.2.2 डायनोफ्लैजिलेट

ये जीवधारी मुख्यत: समुद्री एवं प्रकाशसंश्लेषी होते हैं। इनमें उपस्थित प्रमुख वर्णकों के आधार पीले, हरे, भूरे, नीले अथवा लाल दिखते हैं। इनकी कोशिका भित्ति के बाह्य सतह पर सेल्युलोस की कड़ी पट्टिकाएं होती हैं। अधिकतर डायनोफ्लैजिलेट में दो कशाभ होते हैं, जिसमें एक लंबवत् तथा दूसरा अनुप्रस्थ रूप से भित्ति पट्टिकाओं के बीच की खांच में उपस्थित होता है।

प्राय: लाल डायनोफ्लैसिलेट की संख्या में विस्फोट होता है, जिससे समुद्र का जल लाल (लाल तरंगें) दिखने लगता है। इतनी बड़ी संख्या के जीव से निकले जीव-विष के कारण मछली एवं अन्य समुद्री जीव मर जाते हैं। उदाहरण: गोनियालैक्स

2.2.3 यूग्लीनॉइड

इनमें से अधिकांशत: स्वच्छ जल में पाए जाने वाले जीवधारी हैं, जो स्थिर जल में पाए जाते हैं। इनमें कोशिका भित्ति की जगह एक प्रोटीनयुक्त पदार्थ की पर्त पेलिकिल होती है, जो इनकी संरचना को लचीला बनाती है। इनमें दो कशाभ होते हैं जिसमें एक छोटा तथा दूसरा लंबा होता है।

यद्यपि सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ये प्रकाशसंश्लेषी होते हैं, लेकिन सूर्य के प्रकाश के नहीं होने पर अन्य सूक्ष्म जीवधारियों का शिकार कर परपोषी की तरह व्यवहार करते हैं। आश्चर्यजनक रूप से युग्लीनॉइड में पाए जाने वाले वर्णक उच्च पादपों में उपस्थित वर्णकों के समान होते हैं। उदाहरण: युग्लीना

2.2.4 अवपंक कवक

अवपंक कवक मृतपोषी प्रोटिस्टा हैं। ये सड़ती हुई टहनियों तथा पत्तों के साथ गति करते हुए जैविक पदार्थों का भक्षण करते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में ये समूह (प्लाज्मोडियम) बनाते हैं, जो कई फीट तक की लंबाई का हो सकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में ये बिखरकर सिरों पर बीजाणुयुक्त फलनकाय बनाते हैं। इन बीजाणुओं का परिक्षेपण वायु के साथ होता है।

2.2.5 प्रोटोजोआ

सभी प्रोटोजोआ परपोषी होते हैं, जो परभक्षी अथवा परजीवी के रूप में रहते हैं। ये प्राणियों के पुरातन संबंधी हैं। प्रोटोजोआ को चार प्रमुख समूहों में बाँटा जा सकता है।

(अ) डायनोफ्लैजिलेट
(ब) यूग्लीना
(स) अवपंक कवक
(द) पैरामीशियम

चित्र 2.4 — प्रोटोजोऑन: (अ) डायनोफ्लैजिलेट (ब) यूग्लीना (स) अवपंक कवक (द) पैरामीशियम

अमीबीय प्रोटोजोआ: ये जीवधारी स्वच्छ जल, समुद्री जल तथा नम मृदा में पाए जाते हैं। ये अपने कूटपादों की सहायता से अपने शिकार को पकड़ते हैं। इनके समुद्री प्रकारों की सतह पर सिलिका के कवच होते हैं। इनमें से कुछ जैसे एंटअमीबी परजीवी होते हैं।

कशाभी प्रोटोजोआ: इस समूह के सदस्य स्वच्छंद अथवा परजीवी होते हैं, इनके शरीर पर कशाभ पाया जाता है। परजीवी कशाभी प्रोटोजोआ बीमारी के कारण हैं, जिनसे निद्रालु व्याधि नामक बीमारी होती है। उदाहरण: ट्रिपैनोसोमा

पक्षमाभी प्रोटोजोआ: ये जलीय तथा अत्यंत सक्रिय गति करने वाले जीवधारी हैं, क्योंकि इनके शरीर पर हजारों की संख्या में पक्षमाभ पाए जाते हैं। इनमें एक गुहा (ग्रसिका) होती है जो कोशिका की सतह के बाहर की तरफ खुलती है। पक्षमाभों की लयबद्ध गति के कारण जल से पूरित भोजन गलेट की तरफ भेज दिया जाता है। उदाहरण- पैरामीशियम

स्पोरोजोआ: इस समूह में वे विविध जीवधारी आते हैं जिनके जीवन चक्र में संक्रमण करने योग्य बीजाणु जैसी अवस्था पाई जाती है। इसमें सबसे कुख्यात प्लाज्मोडियम (मलेरिया परजीवी) प्रजाति है, जिसके कारण मानव की जनसंख्या पर आघात पहुँचाने वाला प्रभाव पड़ा है।

2.3 कवक (फंजाई) जगत

परपोषी जीवों में फंजाई (कवक) का जीव जगत में विशेष अद्भुत स्थान है। इनकी आकारिकी तथा वास स्थानों में बहुत भिन्नता होती है। सामान्य छत्रक (मशरूम) तथा कुकुरमुत्ता (टोडस्टूल) भी फंजाई हैं। सरसों की पत्तियों पर स्थित सफेद धब्बे परजीवी फंजाई के कारण होते हैं। कुछ एककोशिक फंजाई जैसे यीस्ट का उपयोग रोटी तथा बीयर बनाने के लिए किया जाता है। अन्य फंजाई पौधों तथा जंतुओं के रोग के कारण होते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि हम अपने भोजन को रेफ्रिजरेटर में क्यों रखते हैं? हाँ, इससे हम अपने भोजन को बैक्टीरिया अथवा फंजाई के कारण खराब होने से बचाते हैं।

फंजाई तंतुमयी है, लेकिन यीस्ट जो एककोशिक है इसका अपवाद है। ये लंबी, पतली धागे की तरह की संरचनाएं होती हैं, जिन्हें कवक तंतु कहते हैं। कवक तंतु के जाल को कवक जाल (माइसीलियम) कहते हैं। कुछ कवक तंतु सतत नलिकाकार होते हैं, जिनमें बहुकेंद्रकित कोशिका द्रव्य (साइटोप्लाज्म) भरा होता है, जिन्हें संकोशिकी कवक तंतु कहते हैं। अन्य कवक तंतुओं में पटीय होते हैं। फंजाई की कोशिका भित्ति काइटिन तथा पॉलिसैकेराइड की बनी होती है।

अधिकांश फंजाई परपोषित होती हैं। वे मृत बस्टेट्स से घुलनशील कार्बनिक पदार्थों को अवशोषित कर लेती हैं, अत: इन्हें मृतजीवी कहते हैं। जो फंजाई सजीव पौधों तथा जंतुओं पर निर्भर करती हैं, उन्हें परजीवी कहते हैं। ये शैवाल तथा लाइकेन के साथ तथा उच्चवर्गीय पौधों के साथ कवक मूल बना कर भी रह सकते हैं, ऐसी फंजाई सहजीवी कहलाती है।

फंजाई में जनन कायिक-खंडन, विखंडन, तथा मुकुलन विधि द्वारा होता है। अलैंगिक जनन बीजाणु, जिसे कोनिडिया कहते है अथवा धानी-बीजाणु अथवा चलबीजाणु, द्वारा होता है। लैंगिक जनन निषिक्तांड (ऊस्पोरा), ऐस्कस बीजाणु तथा बेसिडियम बीजाणु द्वारा होता है। विभिन्न बीजाणु सुस्पष्ट संरचनाओं में उत्पन्न होते हैं जिन्हें फलनकाय कहते हैं।

लैंगिक चक्र के तीन सोपान

  1. दो चल अथवा अचल युग्मकों के प्रोटोप्लाज्म का संलयन होना। इस क्रिया को प्लैज्मोगैमी कहते हैं।
  2. दो केंद्रकों का संलयन होना जिसे केंद्र संलयन कहते हैं।
  3. युग्मनज में मिऑसिस के कारण अगुणित बीजाणु बनना — लैंगिक जनन में संयोज्य संगम के दौरान दो अगुणित कवक तंतु पास-पास आते हैं और संलयित हो जाते हैं।
कुछ फंजाई में दो गुणित कोशिकाओं में संलयन के तुरंत बाद एक द्विगुणित (2n) कोशिका बन जाती है, यद्यपि अन्य फंजाई (ऐस्कोमाइसिटीज) में एक मध्यवर्ती द्विकेंद्रकी अवस्था (n+n) अर्थात् एक कोशिका में दो केंद्रक बनते हैं; ऐसी परिस्थिति को केंद्रक युग्म कहते हैं तथा इस अवस्था को फंगस की द्विकेंद्रक प्रावस्था कहते हैं। बाद में पैतृक केंद्रक संलयन हो जाते हैं और कोशिका द्विगुणित बन जाती है।

फंजाई फलनकाय बनाती है, जिसमें न्यूनीकरण विभाजन होता है जिसके कारण अगुणित बीजाणु बनते हैं। कवक जाल की आकारिकी, बीजाणु बनने तथा फलन काय बनने की विधि जगत को विभिन्न वर्गों में विभक्त करने का आधार बनते हैं।

2.3.1 फाइकोमाइसिटीज

फाइकोमाइसिटीज जलीय आवासों, गली-सड़ी लकड़ी, नम तथा सीलन भरे स्थानों अथवा पौधों पर अविकल्पी परजीवी के रूप में पाए जाते हैं। कवक जाल अपटीय तथा बहुकेंद्रकित होता है। अलैंगिक जनन चल बीजाणु अथवा अचल बीजाणु द्वारा होता है। ये बीजाणु धानी में अंतर्जातीय उत्पन्न होते हैं। दो युग्मकों के संलयन से युग्माणु बनते हैं। इन युग्मकों की आकारिकी एक जैसी (समयुग्मकता) अथवा भिन्न (असमयुग्मकी अथवा विषमयुग्मकी) हो सकती है। इसके सामान्य उदाहरण हैं म्यूकर, राइज़ोपस (रोटी के कवक पहले ही बता चुके हैं) तथा ऐलबूगो (सरसों पर परजीवी फंजाई) हैं।

2.3.2 ऐस्कोमाइसिटीज

इसे सामान्यत: थैली फंजाई भी कहते हैं। विरले पाए जाने वाले ऐस्कोमाइसिटीज एककोशिक जैसे यीस्ट (सकैरोमाइसीज) के अलावा ये बहुकोशिक जैसे पेनिसिलियम, होती है। ये मृतजीवी, अपघटक, परजीवी अथवा शमलरागी (पशुविष्टा पर उगनेवाली) होते हैं। कवक जालशाखित तथा पटीय होता है।

(अ) म्यूकर
(ब) ऐस्परजिलस
(स) एगेरिकस

चित्र 2.5 — फंजाई: (अ) म्यूकर (ब) ऐस्परजिलस (स) एगेरिकस

अलैंगिक बीजाणु कोनिडिया होते हैं जो विशिष्ट कवकजाल जिसे कोनिडिमधर कहते हैं, पर बहिर्जात रूप से उत्पन्न होते हैं। कोनिडिया अंकुरित होकर कवक जाल बनाते हैं। लैंगिक बीजाणु को ऐस्कस बीजाणु कहते हैं। ये बीजाणु थैलीसम ऐस्कस में अंतर्जातीय रूप से उत्पन्न होते हैं। ये ऐसाई (एक वचन ऐस्कस) विभिन्न प्रकार की फलनकाय में लगी रहती हैं, जिन्हें ऐस्कोकार्प कहते हैं। इसके कुछ उदाहरण हैं ऐस्परजिलस, क्लेवीसेप तथा न्यूरोस्पोरा हैं।

न्यूरोस्पोरा का उपयोग जैवरासायनिक तथा आनुवंशिक प्रयोगों में बहुत किया जाता है। इसी कारण यह पादप जगत के ड्रोसोफिला के समान प्रसिद्ध है। इस वर्ग में आने वाले मॉरिल तथा ट्रफल खाने योग्य होते हैं और इन्हें सुस्वादु भोजन समझा जाता है।

2.3.3 बेसिडियोमाइसिटीज

बेसिडियोमाइसिटीज के ज्ञात सामान्य प्रकार – मशरूम, ब्रेकटफंजाई अथवा पफबॉल हैं। ये मिट्टी में, लट्ठे तथा वृक्ष के ठूँठों पर तथा सजीव पादपों के अंदर परजीवी के रूप में उगते हैं जैसे किट्ट तथा कंड (स्मट)। कवकजाल शाखित तथा पटीय होता है। इसमें अलैंगिक बीजाणु प्राय: नहीं होते हैं, लेकिन कायिक जनन खंडन विधि द्वारा बहुत सामान्य है।

इसमें लैंगिक अंग नहीं होते, लेकिन इसमें प्लाज्मोगैमी विभिन्न स्ट्रेनो वाली दो कायिक कोशिकाओं अथवा जीन प्रारूप के संलयन से होती है। इसमें बनने वाली संरचना द्विकेंद्रकी होती है, जिससे अंतत: बेसिडियम बनते हैं। बेसिडियम में केंद्रक संलयन (कैरियोगैमी) तथा मिऑसिस होता है जिसके कारण चार बेसिडियम बीजाणु बनते हैं। बेसिडियमबीजाणु बेसिडियम पर बहिर्जातीय उत्पन्न होते हैं। बेसिडियम फलनकाय में लगे रहते हैं जिसे बेसिडियो कार्प कहते हैं, इसके कुछ सामान्य उदाहरण ऐगैरिकस (मशरूम), आस्टीलैगो (कंड) तथा पक्सिनिया (किट्ट फंगस) हैं।

2.3.4 ड्यूटिरोमाइसिटीज

इसे प्राय: अपूर्ण कवक भी कहते हैं; क्योंकि इसकी केवल अलैंगिक अथवा कायिक प्रवस्था ही ज्ञात हो पाई है। जब इस फंजाई की लैंगिक प्रवस्था की खोज हो जाती है, तब उसे उसके उचित वर्ग में रख दिया जाता है। यह भी संभव है कि अलैंगिक तथा कायिक प्रवस्थाओं को एक नाम दे दिया गया हो (और उन्हें ड्यूटिरोमासिटीज में रख दिया गया हो) और लैंगिक प्रवस्था को दूसरे वर्ग में।

ड्यूटिरोमाइसिटीज केवल अलैंगिक बीजाणुओं, जिन्हें कोनिडिया कहते हैं, से जनन करते हैं। इसके कवक जाल पटीय तथा शाखित होते हैं। इसके कुछ सदस्य मृतजीवी अथवा परजीवी होते हैं। लेकिन उनके अधिकांश सदस्य अपशिष्ट के अपघटक होते हैं और खनिज के चक्रण में सहायता करते हैं। इसके कुछ उदाहरण आल्टरनेरिया, कोलीटोट्राइकम तथा ट्राईकोडर्मा हैं।

2.4 पादप जगत (प्लांटी किंगडम)

पादप जगत में वे सभी जीव आते हैं जो यूकैरिऑटिक हैं और जिनमें क्लोरोफिल होते हैं। ऐसे जीवों को पादप कहते हैं। इनमें से कुछ पादप जैसे कीटभक्षी पौधे तथा परजीवी आंशिक रूप से विषमपोषी होते हैं। ब्लेडरवर्ट तथा वीनस फ्लाईट्रेप कीटभक्षी पौधों के और अमरबेल (डसकूटा) परजीवी का उदाहरण हैं।

पादप कोशिका में कोशिका भित्ति होती है जो सेल्यूलोस की बनी होती है। प्लांटी जगत में शैवाल, ब्रायोफाइट, टैरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म आते हैं।

पादप के जीवन चक्र में दो सुस्पष्ट अवस्थाएँ — द्विगुणित बीजाणु-उद्भिद् तथा अगुणित युग्मकोद्भिद् — होती हैं। इन दोनों में पीढ़ी एकांतरण होता है। युग्मनज (2n) में मिऑसिस विभाजन के द्वारा अगुणित (n) बीजाणु बनते हैं। ये बीजाणु अंकुरित होकर युग्मकोद्भिद् बनाते हैं। युग्मक (नर तथा मादा) युग्मकोद्भिद् पर बनते हैं जो संलयन होकर पुन: द्विगुणित युग्मनज बनाते हैं। युग्मनज से बीजाणु-उद्भिद् विकसित होता है। इस प्रक्रम को संतति एकांतरण कहते हैं।

2.5 जंतु जगत (एनिमेलिया किंगडम)

इस जगत के जीव विषमपोषी यूकैरिऑटिक हैं जो बहुकोशिक हैं और उनकी कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होती। ये भोजन के लिए परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से पौधों पर निर्भर रहते हैं। ये अपने भोजन को एक आंतरिक गुहिका में पचाते हैं और भोजन को ग्लाइकोजन अथवा वसा के रूप में संग्रहण करते हैं। इनमें प्राणि समपोषण, अर्थात् भोजन, का अंतर्ग्रहण करना होता है।

उनमें वृद्धि का एक निर्दिष्ट पैटर्न होता है और वे एक पूर्ण वयस्क जीव बन जाते हैं; जिसकी सुस्पष्ट आकृति तथा माप होती है। उच्चकोटि के जीवों में विस्तृत संवेदी तथा तंत्रिका प्रेरक क्रियाविधि विकसित होती है। इनमें से अधिकांश चलन करने में सक्षम होते हैं।

लैंगिक जनन नर तथा मादा के संगम से होता है और बाद में उसमें भ्रूण का विकास होता है।

2.6 विषाणु, वाइराइड, प्रोसंक तथा लाइकेन

व्हिटेकर द्वारा सुझाए पाँच जगत वर्गीकरण में लाइकेन व अकोशिक जीवों जैसे वाइरस, वाइराइड, तथा प्रोसंक (प्रिओन) का उल्लेख नहीं किया गया है।

हम सभी कभी न कभी जुकाम अथवा फ्लु से ग्रस्त होते हैं। क्या आप जानते हैं कि इसका वाइरस कैसे प्रभावित करता है? वाइरस का नाम वर्गीकरण में नहीं है, क्योंकि ये वास्तविक 'जीवन' नहीं है — यदि हम यह मानते हैं कि सजीवों की कोशिका संरचना होती है। वाइरस अकोशिक जीव हैं जिनकी संरचना सजीव कोशिका के बाहर रवेदार होती है। एक बार जब ये कोशिका को संक्रमित कर देते हैं, तब ये मेजबान कोशिका की मशीनरी का उपयोग अपनी प्रतिकृति बनाने में करते हैं और मेजबान को मार देते हैं।

वाइरस का अर्थ है विष अथवा विषैला तरल। डिमित्री इबानोवस्की (1892) ने तंबाकू के मोजैक रोग के रोगाणुओं को पहचाना था, जिन्हें वाइरस नाम दिया गया। इनका माप बैक्टीरिया से भी छोटा था, क्योंकि ये बैक्टीरिया प्रूफ फिल्टर से भी निकल गए थे। एम. डब्ल्यु बेजेरिनेक (1898) ने पाया कि संक्रमित तंबाकू के पौधों का रस स्वस्थ तंबाकू के पौधे को भी संक्रमित करने में सक्षम है। उन्होंने इस रस (तरल) को 'कंटेजियम वाइवम फ्लुयइडम' (संक्रामक जीवित तरल) कहा। डब्ल्यु. एम. स्टानले (1935) ने बताया कि वाइरस को रवेदार बनाया जा सकता है और इस रवे में मुख्यत: प्रोटीन होता है।

आर.एन.ए. कैप्सिड (अ) टोबैको मोजैक वाइरस (टीएमबी)
शीर्ष कॉलर आच्छद तंतु पुच्छ (ब) जीवाणु भोजी

चित्र 2.6 — (अ) टोबैको मोजैक वाइरस (टीएमबी) (ब) जीवाणु भोजी

वे अपनी विशिष्ट मेजबान कोशिका के बाहर निष्क्रिय होते हैं। वाइरस अविकल्पी परजीवी हैं। वाइरस में प्रोटीन के अतिरिक्त आनुवंशिक पदार्थ भी होता है, जो आरएनए (RNA) अथवा डीएनए (DNA) हो सकता है। किसी भी वाइरस में आरएनए तथा डीएनए दोनों नहीं होते। वाइरस केंद्रक प्रोटीन (न्यूक्लियो प्रोटीन) और इसका आनुवंशिक पदार्थ संक्रामक होता है।

प्राय: सभी पादप वाइरस में एक लड़ी वाला आरएनए होता है, और सभी जंतु वाइरस में एक अथवा दोहरी लड़ी वाला आरएनए अथवा डीएनए होता है। बैक्टीरियल वाइरस अथवा जीवाणुभोजी (बैक्टीरियोफेज-आवरण वाइरस जो बैक्टीरिया पर संक्रमण करता है) प्राय: दोहरी लड़ी वाले डीएनए वाइरस होते हैं। प्रोटीन के आवरण (अस्तर) को कैप्सिड कहते हैं और यह छोटी-छोटी उप-इकाइयों जिन्हें पेटिकोशक (कैप्सोमीयर) कहते हैं, से मिलकर बनता है।

वाइरस से मम्प्स, चेचक, हर्पीज तथा इंफ्लूएंजा नामक रोग हो जाते हैं। मनुष्यों में एड्स (AIDS) भी वाइरस के कारण होता है। पौधों में मोजैक बनना, पत्तियों का मुड़ना तथा कुंचन, पीला होना तथा शिरा स्पष्टता, बौना तथा अवरुद्ध वृद्धि होना इसके लक्षण हैं।

वाइराइड

सन 1971 में टी.ओ. डाइनर ने एक नया संक्रामक कारक खोजा जो वाइरस से भी छोटा तथा जिसके कारण 'पोटेटो स्पिंडल ट्यूबर' नामक रोग होता था। वाइराइडों में आरएनए तथा प्रोटीन आवरण (अस्तर), जो वाइरस में पाए जाते हैं उनका अभाव होता है। इसलिए यह वाइराइड के नाम से जाने जाते हैं। वाइराइड के आरएनए का आण्विक भार कम था।

प्रोसंक (प्रिओन)

आधुनिक चिकित्सा में कुछ संक्रामक न्यूरोलॉजिकल बीमारियाँ असामान्य रूप से फोल्ड प्रोटीन वाले कारकों द्वारा प्रेषित पाई गयीं। इन कारकों का आकार वाइरस के आकार के समान था। इन कारकों को प्रोसंग कहा गया। प्रोसंग द्वारा प्राणियों में होने वाली सबसे उल्लेखनीय बीमारियाँ बोवाइन स्पंजिफॉर्म एन्सेफेलोपैथी है, जिन्हें आमतौर पर मवेशियों में मेडकाऊ रोग कहा जाता है और मनुष्यों में इसका समान प्रकार सी आर जैकब रोग (Creutzfeldt-Jakob Disease) होता है।

लाइकेन

लाइकेन शैवाल तथा कवक के सहजीवी सहवास अर्थात् पारस्परिक उपयोगी सहवास हैं। शैवाल घटक को शैवालांश तथा कवक के घटक को माइकोवायंट (कवकांश) कहते हैं, जो क्रमश: स्वपोषी तथा परपोषित होते हैं। शैवाल कवक (फंजाई) के लिए भोजन संश्लेषित करता है और कवक शैवाल के लिए आश्रय देता है तथा खनिज एवं जल का अवशोषण करता है।

इनका सहवास इतना घनिष्ठ होता है कि यदि प्रकृति में लाइकेन को देख ले तो यह अनुमान लगाना असंभव है कि इसमें दो विभिन्न जीव हैं। लाइकेन प्रदूषण के बहुत अच्छे संकेतक हैं – वे प्रदूषित क्षेत्रों में नहीं उगते।

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न (2013 के बाद)

इस अध्याय से 2013 के बाद NEET में पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष के संदर्भ सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें

1NEET 2014 गतिशील (motile) बैक्टीरिया किसकी सहायता से गति करते हैं?

उत्तर: कशाभिका (Flagella) की सहायता से।

कशाभिका बैक्टीरिया की सतह से निकलने वाली पतली प्रोटीनयुक्त रचना है, जो उन्हें तरल माध्यम में गति करने में सक्षम बनाती है। पिलाई (pili) व फिम्ब्री (fimbriae) गति के लिए नहीं, बल्कि संयुग्मन व सतह से जुड़ाव के लिए उपयोग होते हैं — यह अंतर NEET में अक्सर उलझाया जाता है।

2NEET (Re) 2015 निम्नलिखित में से किसमें कोशिका भित्ति अनुपस्थित होती है?

उत्तर: माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma)।

माइकोप्लाज्मा एकमात्र ऐसे प्रोकैरियोट हैं जिनमें कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है — इसी कारण ये आकृति में अनिश्चित (प्लीयोमॉर्फिक) होते हैं और अत्यंत सूक्ष्म छिद्रों से भी गुज़र सकते हैं। एस्परजिलस (कवक), फ्यूनेरिया (ब्रायोफाइट) व नॉस्टॉक (सायनोबैक्टीरिया) — तीनों में कोशिका भित्ति उपस्थित रहती है।

3NEET (Re) 2015 वे कौन-सी संरचनाएँ हैं जो कुछ बैक्टीरिया को चट्टानों अथवा परपोषी ऊतकों से चिपकने में मदद करती हैं?

उत्तर: फिम्ब्री (Fimbriae)।

फिम्ब्री सूक्ष्म, बालों जैसी सतही संरचनाएँ होती हैं, जो कुछ बैक्टीरिया को ठोस सतहों या परपोषी कोशिकाओं से जुड़ने में सहायता करती हैं — ये गति के लिए नहीं होतीं (यह कार्य कशाभिका का है)। राइज़ॉइड व होल्डफास्ट क्रमशः ब्रायोफाइट/टेरिडोफाइट व शैवाल में मिलने वाली जड़नुमा संरचनाएँ हैं, बैक्टीरिया में नहीं।

4NEET 2016 Phase-I अधिकांश कवकों की कोशिका भित्ति का प्रमुख घटक क्या है?

उत्तर: काइटिन (Chitin)।

कवक की कोशिका भित्ति मुख्यतः काइटिन (एक नाइट्रोजन-युक्त पॉलीसैकेराइड) से बनी होती है, सेलुलोज़ से नहीं। सेलुलोज़ पादप कोशिका भित्ति में तथा पेप्टिडोग्लाइकेन बैक्टीरिया कोशिका भित्ति में मिलता है — यह अंतर लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछा जाता है।

5NEET 2016 Phase-I जुगाली करने वाले पशुओं (रुमिनेंट) के गोबर से बायोगैस उत्पादन के लिए उत्तरदायी आदिम प्रोकैरियोट कौन-से हैं?

उत्तर: मेथेनोजन (Methanogens)।

मेथेनोजन आद्य बैक्टीरिया (आर्किबैक्टीरिया) का एक समूह है, जो ऑक्सीजन-रहित (अवायवीय) वातावरण — जैसे दलदल, गोबर गैस संयंत्र तथा रुमिनेंट पशुओं की आहार नाल — में मीथेन गैस उत्पन्न करते हैं। यही गोबर गैस (बायोगैस) संयंत्रों का जैविक आधार है।

6NEET 2016 Phase-I क्राइसोफाइट, यूग्लीनॉइड, डायनोफ्लैजिलेट व अवपंक कवक (स्लाइम मोल्ड) किस जगत में शामिल किए गए हैं?

उत्तर: प्रोटिस्टा जगत (Kingdom Protista)।

ये सभी एककोशिक यूकैरियोटिक जीव हैं, जिन्हें पाँच जगत वर्गीकरण में प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत रखा गया है — भले ही इनका पोषण-तरीका (स्वपोषी, परपोषी अथवा मिश्रित) अलग-अलग हो।

7NEET 2016 Phase-II कवक (फंजाई) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

उत्तर: "सभी कवकों में पूर्णतः सेल्युलोसिक कोशिका भित्ति होती है" — यह कथन गलत है।

कवक की कोशिका भित्ति काइटिन (N-एसीटाइल-D-ग्लूकोसैमीन का बहुलक) से बनी होती है, सेलुलोज़ से नहीं। शेष कथन सही हैं — कवक यूकैरियोटिक व परपोषी होते हैं, तथा एककोशिक व बहुकोशिक दोनों रूपों में पाए जाते हैं।

8NEET 2016 Phase-II मेथेनोजन किस समूह से संबंधित हैं?

उत्तर: आर्किबैक्टीरिया (Archaebacteria)।

मेथेनोजन आद्य बैक्टीरिया का एक विशिष्ट समूह है, जो ऑक्सीजन-रहित वातावरण (जैसे दलदल, सीवेज संयंत्र व रुमिनेंट पशुओं की आहार नाल) में CO₂ के अपचयन व हाइड्रोजन के ऑक्सीकरण से मीथेन गैस बनाते हैं।

9NEET 2017 विरोइड (वाइराइड) वाइरस से किस प्रकार भिन्न होते हैं?

उत्तर: विरोइड में प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) रहित आरएनए अणु पाया जाता है (RNA molecules without protein coat)।

वाइरस में आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA) एक प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) से घिरा रहता है, जबकि विरोइड में केवल निम्न-आणविक-भार का मुक्त RNA होता है, कोई प्रोटीन आवरण नहीं — यही सबसे बुनियादी अंतर है, जो विरोइड को वाइरस से भी छोटा व सरल बनाता है।

10NEET 2017 निम्नलिखित में से कौन अत्यधिक लवणीय (extreme saline) परिस्थितियों में पाए जाते हैं?

उत्तर: आर्किबैक्टीरिया (Archaebacteria)।

आर्किबैक्टीरिया का एक समूह, हैलोफाइल (लवणरागी), अत्यंत लवणीय परिस्थितियों — जैसे नमक के दलदल, नमक की झीलें व नमक उत्पादन क्षेत्र — में पाया जाता है। आर्किबैक्टीरिया की कोशिका भित्ति संरचना ही इन्हें इतनी विषम (एक्सट्रीम) परिस्थितियों में जीवित रहने में सक्षम बनाती है।

11NEET 2018 निम्नलिखित में से कौन प्रोकैरियोट नहीं है?

उत्तर: सैकैरोमाइसीज़ (Saccharomyces)।

सैकैरोमाइसीज़ (यीस्ट) एक एककोशिक कवक है, और सभी कवक यूकैरियोटिक होते हैं। इसके विपरीत माइकोबैक्टीरियम (बैक्टीरिया), नॉस्टॉक व ऑसिलेटोरिया (दोनों सायनोबैक्टीरिया) — ये सभी प्रोकैरियोट हैं।

12NEET 2018 महासागरों में प्रमुख उत्पादक (chief producers) किसे माना जाता है?

उत्तर: डाइएटम (Diatoms)।

डाइएटम महासागरों में सबसे प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले फाइटोप्लैंकटन हैं, जो प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपार मात्रा में कार्बनिक पदार्थ का उत्पादन करते हैं, इसीलिए ये समुद्री खाद्य श्रृंखला के आधार (प्रमुख उत्पादक) माने जाते हैं।

13NEET 2018 सिलिएट (पक्ष्माभी प्रोटोजोआ) अन्य सभी प्रोटोजोआ से किस लक्षण में भिन्न होते हैं?

उत्तर: इनमें दो प्रकार के केंद्रक (two types of nuclei) पाए जाते हैं।

पैरामीशियम जैसे सिलिएट प्रोटोजोआ में एक बड़ा वृहत्केंद्रक (मैक्रोन्यूक्लियस, कायिक कार्यों हेतु) व एक छोटा सूक्ष्मकेंद्रक (माइक्रोन्यूक्लियस, जनन हेतु) — दोनों एक साथ पाए जाते हैं, जो इन्हें अन्य प्रोटोजोआ समूहों से अलग करता है।

14NEET 2019 निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?

उत्तर: "वाइरस में संक्रामक घटक प्रोटीन आवरण होता है" — यह कथन गलत है।

वाइरस में वास्तविक संक्रामक (इन्फेक्टिव) घटक आनुवंशिक पदार्थ (न्यूक्लीक अम्ल — DNA या RNA) होता है, प्रोटीन आवरण नहीं। प्रोटीन आवरण केवल सुरक्षा प्रदान करता है। शेष कथन सही हैं — प्रिओन असामान्य रूप से मुड़े प्रोटीन से बने होते हैं, विरोइड में प्रोटीन आवरण नहीं होता, तथा वाइरस अविकल्पी परजीवी हैं।

15NEET 2020 विरोइड (वाइराइड) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

उत्तर: इनमें प्रोटीन आवरण रहित मुक्त RNA होता है (free RNA without protein coat)।

टी.ओ. डाइनर द्वारा 1971 में खोजे गए विरोइड, वाइरस से भी छोटे संक्रामक कारक हैं, जिनमें केवल एक वृत्ताकार, निम्न-आणविक-भार वाला RNA अणु होता है — कोई प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) नहीं होता, जो इन्हें वाइरस से भिन्न बनाता है।

16NEET 2021 निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

उत्तर: दो गतिशील अथवा अगतिशील युग्मकों के जीवद्रव्यों (प्रोटोप्लाज्म) के संलयन को प्लाज़्मोगैमी कहते हैं।

प्लाज़्मोगैमी में केवल कोशिकाद्रव्य का संलयन होता है, जबकि दो केंद्रकों के संलयन को कैरियोगैमी कहा जाता है — इन दोनों शब्दों को अक्सर आपस में बदल कर गलत विकल्प बनाया जाता है। साथ ही परपोषी सजीव पौधों पर निर्भर जीव परजीवी कहलाते हैं, मृतजीवी (सैप्रोफाइट) नहीं — यह भी एक सामान्य भ्रम है।

17NEET 2022 Phase 2 गोवंश में मैड काउ रोग तथा मनुष्यों में सी.जे. रोग (Cr Jacob Disease) किसके संक्रमण के कारण होते हैं?

उत्तर: प्रोसंक/प्रिओन (Prion)।

प्रिओन असामान्य रूप से तह-मुड़े (मिसफोल्डेड) प्रोटीन कारक हैं, जिनका आकार वाइरस के बराबर होता है। ये मवेशियों में बोवाइन स्पंजिफॉर्म एन्सेफेलोपैथी (मैड काउ रोग) तथा मनुष्यों में इसके समरूप क्रुट्ज़फेल्ड-जैकब रोग उत्पन्न करते हैं।

18NEET 2024 निम्नलिखित में से कौन-सा कवक के वर्गीकरण का मानदंड नहीं है?

उत्तर: पोषण की विधि (Mode of nutrition)।

कवकों को कोशिका-द्रव्य (मायसीलियम) की बनावट, बीजाणु निर्माण की विधि तथा फलनकाय (फ्रूटिंग बॉडी) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है — पोषण की विधि (जो लगभग सभी कवकों में परपोषी ही होती है) एक विशिष्ट वर्गीकरण मानदंड नहीं है, क्योंकि यह सभी वर्गों में समान रहती है।

19NEET 2024 ड्यूटिरोमाइसिटीज़ (अपूर्ण कवक) के अलैंगिक बीजाणु क्या कहलाते हैं?

उत्तर: कोनिडिया (Conidia)।

ड्यूटिरोमाइसिटीज़ को अपूर्ण कवक (imperfect fungi) भी कहा जाता है, क्योंकि इनकी केवल अलैंगिक (कायिक/असूत्री) अवस्था ही ज्ञात है। ये कोनिडियोफोर नामक विशेष संरचनाओं पर बाह्य रूप से कोनिडिया बीजाणु उत्पन्न करते हैं — इसकी तुलना में एस्कोमाइसिटीज़ में एस्कोस्पोर आंतरिक रूप से तथा बेसिडियोमाइसिटीज़ में बेसिडियोस्पोर बाह्य रूप से बनते हैं।

20NEET 2025 व्हिटेकर द्वारा प्रस्तावित पाँचों जगतों को दैहिक संगठन की जटिलता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करें।

उत्तर: मॉनेरा → प्रोटिस्टा → फंजाई → प्लांटी → ऐनिमेलिया (जटिलता के बढ़ते क्रम में)।

यह क्रम कोशिका संरचना व दैहिक संगठन दोनों पर आधारित है — मॉनेरा (प्रोकैरियोटिक, सरलतम) से शुरू होकर, प्रोटिस्टा (एककोशिक यूकैरियोटिक), फंजाई (बहुकोशिक पर सच्चे ऊतक रहित), प्लांटी (ऊतक व अंग स्तर) होते हुए अंत में ऐनिमेलिया (ऊतक, अंग व अंगतंत्र स्तर — सर्वाधिक जटिल) तक पहुँचता है।

21NEET 2026 (Re-Exam) कवक व शैवाल के बीच सहजीवी सहवास को क्या कहते हैं?

उत्तर: लाइकेन (Lichens)।

लाइकेन शैवाल व कवक के बीच पारस्परिक रूप से उपयोगी सहजीवी सहवास हैं। इसकी तुलना में माइकोराइज़ा उच्च पादपों की जड़ों व कवक के बीच का सहजीवी संबंध है — इन दोनों शब्दों को न उलझाएँ, यह NEET में बार-बार भ्रामक विकल्प के रूप में आता है।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं

महत्वपूर्ण
  • पाँच जगत वर्गीकरण व्हिटेकर द्वारा सन् 1969 में प्रस्तावित किया गया था — इसके मुख्य मानदंड थे: कोशिका संरचना, दैहिक संगठन, पोषण-विधि, प्रजनन व जातिवृत्तीय संबंध। ध्यान रहे, "कशाभिका की उपस्थिति" इसका मानदंड नहीं था — यह NEET 2026 में सीधे पूछा जा चुका है।
महत्वपूर्ण
  • NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 3–5 प्रश्न (लगभग 3–4% वेटेज) आते हैं, जिनमें मॉनेरा जगत (आर्किबैक्टीरिया, यूबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज्मा) सबसे अधिक बार पूछा जाने वाला उप-विषय रहा है, इसके बाद पाँच जगत वर्गीकरण के मानदंड व कवक-वर्गीकरण का स्थान आता है।
तुलनात्मक
  • वाइरस, विरोइड व प्रिओन को कभी न उलझाएँ — वाइरस में न्यूक्लीक अम्ल (DNA/RNA) + प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) दोनों होते हैं; विरोइड में केवल मुक्त, निम्न-आणविक-भार RNA होता है, प्रोटीन आवरण नहीं; प्रिओन में न तो न्यूक्लीक अम्ल होता है और न ही सामान्य प्रोटीन — यह मात्र असामान्य रूप से तह-मुड़ा (मिसफोल्डेड) संक्रामक प्रोटीन है।
तथ्य
  • माइकोप्लाज्मा एकमात्र ऐसा प्रोकैरियोट समूह है जिसमें कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है — यह इन्हें प्लीयोमॉर्फिक (अनिश्चित आकृति वाला) बनाता है, और ये मुक्त-जीवी सबसे छोटे ज्ञात कोशिकीय जीवों में गिने जाते हैं।
तुलनात्मक
  • प्लाज़्मोगैमी बनाम कैरियोगैमी — प्लाज़्मोगैमी में केवल दो कोशिकाओं के जीवद्रव्य (साइटोप्लाज्म) का संलयन होता है, जबकि कैरियोगैमी में दो केंद्रकों (न्यूक्लियस) का संलयन होता है — कवक के जीवन-चक्र में ये दोनों क्रियाएँ अलग-अलग चरणों में होती हैं, और NEET में इन्हें अक्सर उलट कर पूछा जाता है।
तथ्य
  • कवक के चार वर्गों के बीजाणु — फाइकोमाइसिटीज़ में चलबीजाणु (ज़ूस्पोर) व अचलबीजाणु (एप्लेनोस्पोर), एस्कोमाइसिटीज़ में आंतरिक रूप से बनने वाले एस्कोस्पोर, बेसिडियोमाइसिटीज़ में बाह्य रूप से बनने वाले बेसिडियोस्पोर, तथा ड्यूटिरोमाइसिटीज़ (अपूर्ण कवक) में कोनिडिया — इन चारों को क्रम से याद रखना संख्यात्मक व मिलान (match-the-column) प्रश्नों में बेहद उपयोगी है।
तथ्य
  • आद्य बैक्टीरिया (आर्किबैक्टीरिया) की कोशिका भित्ति में सामान्य बैक्टीरिया जैसा पेप्टिडोग्लाइकन (म्यूरामिक अम्ल) नहीं पाया जाता — यही रासायनिक भिन्नता इन्हें अत्यंत प्रतिकूल वातावरण (अति लवणीय, अम्लीय गर्म झरने, कच्छ भूमि) में जीवित रहने योग्य बनाती है।
तुलनात्मक
  • सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) एक भ्रामक नाम है — ये प्रोकैरियोटिक होते हुए भी क्लोरोफिल-a रखते हैं, जो सामान्यतः यूकैरियोटिक हरे पादपों से जोड़ा जाता है; परंतु वास्तव में ये मॉनेरा जगत के बैक्टीरिया ही हैं, यूकैरियोटिक शैवाल नहीं — इनकी नाइट्रोजन-स्थिरीकरण करने वाली विशिष्ट कोशिका को हेटेरोसिस्ट (जैसे नॉस्टॉक, एनाबीना में) कहते हैं।
तथ्य
  • डाइएटम की कोशिका भित्ति सिलिका से बनी होने के कारण अविनाशी होती है — करोड़ों वर्षों में जमा डाइएटम-भित्ति के अवशेष 'डाइएटमी मृदा' (डायटोमेशियस अर्थ) कहलाते हैं, जिसका उपयोग पॉलिशिंग व निस्यंदन में होता है, तथा डाइएटम को समुद्र का प्रमुख उत्पादक भी माना जाता है।
तथ्य
  • यूग्लीनॉइड में कोशिका भित्ति नहीं, बल्कि एक लचीली प्रोटीनयुक्त परत — पेलिकल — होती है; प्रकाश में ये प्रकाशसंश्लेषी (स्वपोषी) रहते हैं, परंतु अंधेरे में अन्य सूक्ष्मजीवों का भक्षण कर परपोषी बन जाते हैं — यह मिश्रपोषी (mixotrophic) व्यवहार एक बहुत ही उच्च-आवृत्ति ट्रैप-तथ्य है।
तथ्य
  • वाइरस की खोज का इतिहास (क्रम याद रखें) — डी. इवानोवस्की (1892) ने तंबाकू मोज़ेक रोग के कारक को बैक्टीरिया-प्रूफ फिल्टर से गुज़रने योग्य पाया; एम. डब्ल्यू. बेजेरिनेक (1898) ने इसे "कंटेजियम वाइवम फ्लुइडम" नाम दिया; डब्ल्यू. एम. स्टेनली (1935) ने वाइरस को क्रिस्टलीय (रवेदार) रूप में प्राप्त कर दिखाया कि यह मुख्यतः प्रोटीन है — इन तीन वैज्ञानिकों व उनके वर्षों का match-the-following प्रारूप में पूछा जाना बहुत सामान्य है।
तथ्य
  • वाइराइड की खोज टी.ओ. डाइनर ने सन् 1971 में 'पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर' रोग के अध्ययन के दौरान की थी — वाइराइड वाइरस से भी छोटा संक्रामक कारक है, जिसमें केवल मुक्त निम्न-आणविक-भार RNA होता है, प्रोटीन आवरण बिल्कुल नहीं।
तुलनात्मक
  • वाइरस जीनोम में या तो DNA या RNA में से कोई एक ही होता है, कभी दोनों एक साथ नहीं — अधिकांश पादप वाइरस एकरज्जुकी (single-stranded) RNA वाले होते हैं, जबकि अधिकांश जीवाणुभोजी (बैक्टीरियोफेज) द्विरज्जुकी (double-stranded) DNA वाले होते हैं — "पादप बनाम जीवाणु वाइरस" वाला यह भेद अक्सर उलझाया जाता है।
तथ्य
  • लाइकेन प्रदूषण के जैव-सूचक (bio-indicator) माने जाते हैं, क्योंकि ये प्रदूषित क्षेत्रों (विशेषकर SO₂ युक्त वायु) में नहीं उग पाते — इसलिए किसी क्षेत्र में लाइकेन की उपस्थिति वायु की शुद्धता का संकेत मानी जाती है।
तुलनात्मक
  • मैडकाउ रोग (बोवाइन स्पंजिफॉर्म एन्सेफेलोपैथी - BSE) गोवंश (मवेशी) में तथा इसका मानव-तुल्य रूप सी.जे. रोग (क्रुट्ज़फेल्ड-जैकब रोग/CJD) मनुष्यों में होता है — दोनों रोगों का कारण एक ही असामान्य फोल्ड प्रोटीन (प्रिओन) है, केवल प्रभावित प्राणी अलग-अलग हैं।
महत्वपूर्ण
  • व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण के बाद प्रस्तावित त्रि-अनुक्षेत्र (three domain) पद्धति में मॉनेरा जगत को दो पृथक अनुक्षेत्रों (आर्किया व बैक्टीरिया) में बाँटा गया, तथा शेष समस्त यूकैरियोटिक जीवों को तीसरे अनुक्षेत्र (यूकैर्या) में रखा गया — इसी आधार पर एक षट्जगत् वर्गीकरण पद्धति भी प्रस्तावित की गई थी।
रणनीति
  • दोहराव के लिए सबसे प्रभावी रणनीति — रोज़ एक बार वैज्ञानिक-वर्ष जोड़े (इवानोवस्की 1892, बेजेरिनेक 1898, स्टेनली 1935, डाइनर 1971, व्हिटेकर 1969) व एक बार शब्दावली-जोड़े (प्लाज़्मोगैमी-कैरियोगैमी, वाइरस-वाइराइड-प्रिओन, ऑटोट्रॉफिक-हेटरोट्रॉफिक अपवाद) दोहराएँ — इसी अध्याय के अधिकांश ट्रैप प्रश्न इन्हीं दो श्रेणियों से बनते हैं।

सारांश

वर्गीकरण का विकास

सरल आकारिक लक्षणों पर आधारित पादपों और प्राणियों के वर्गीकरण को सर्वप्रथम अरस्तू ने प्रस्तावित किया था। बाद में लीनियस द्वारा सभी जीवधारियों को 'प्लांटी' तथा 'ऐनिमेलिया' जगत में वर्गीकृत किया गया।

पाँच जगत वर्गीकरण

व्हिटैकर ने इसके बाद एक वृहत् पाँच जगत वर्गीकरण की पद्धति का प्रस्ताव किया। ये पाँच जगत मॉनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और ऐनिमेलिया हैं — कोशिका संरचना, दैहिक संगठन, पोषण एवं प्रजनन की विधि तथा जातिवृत्तीय संबंध इनके प्रमुख मानदंड हैं।

मॉनेरा एवं प्रोटिस्टा

बैक्टीरिया को मॉनेरा जगत में रखा गया है जो विश्वव्यापी हैं तथा जिनमें उपापचय संबंधी विविधता अत्यंत वृहत् है। प्रोटिस्टा जगत में क्राइसोफाइट, डायनोफ्लैजिलेट, युग्लीनॉइड, अवपंक कवक एवं प्रोटोजोआ जैसे एक कोशिक यूकैरियोटिक जीवधारी सम्मिलित किए गए हैं।

फंजाई, पादप, जंतु व अकोशिक जीव

फंजाई जगत की संरचना तथा आवास में बहुत विभिन्नता होती है और इसमें चार वर्ग होते हैं। प्लांटी में सभी यूकैरियोटिक, क्लोरोफिलयुक्त जीव तथा एनिमेलिया में परपोषित बहुकोशिक जीव आते हैं। वाइरस, विरोइड तथा लाइकेन को पाँच जगत प्रणाली में नहीं रखा गया है।

? अध्याय अभ्यास (सभी 12 प्रश्न उत्तर सहित)

सभी 12 अभ्यास प्रश्नों के उत्तर — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।

प्रश्न 1 वर्गीकरण की पद्धतियों में समय के साथ आए परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

वर्गीकरण पद्धतियों में समय के साथ निम्नलिखित परिवर्तन आए हैं —

  • अरस्तू का वर्गीकरण: सर्वप्रथम अरस्तू ने पादपों को वृक्ष, झाड़ी व शाक में तथा प्राणियों को लाल रक्त की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया।
  • लीनियस की द्विजगत पद्धति: सभी जीवों को प्लांटी (पादप) व एनिमेलिया (प्राणि) — दो जगतों में बाँटा गया। परंतु यह प्रोकैरियोट/यूकैरियोट, एककोशिक/बहुकोशिक तथा स्वपोषी/परपोषी में विभेद नहीं कर पाई।
  • व्हिटेकर की पाँच जगत पद्धति (1969): कोशिका संरचना, दैहिक संगठन, पोषण-विधि, प्रजनन व जातिवृत्तीय संबंधों के आधार पर पाँच जगत — मॉनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी, एनिमेलिया — प्रस्तावित किए गए।
  • त्रि-अनुक्षेत्र व षट्जगत् पद्धति: बाद में मॉनेरा को दो अनुक्षेत्रों (आर्किया व बैक्टीरिया) में बाँटा गया तथा यूकैरियोट्स को तीसरे अनुक्षेत्र में रखा गया, जिससे षट्जगत् पद्धति भी प्रस्तावित हुई।

वर्गीकरण में परिवर्तन का मुख्य कारण नई वैज्ञानिक खोजें, आणविक प्रौद्योगिकी में प्रगति तथा विकासीय संबंधों की बेहतर समझ है।

प्रश्न 2 निम्नलिखित के बारे में आर्थिक दृष्टि से दो महत्वपूर्ण उपयोगों को लिखें: (क) परपोषी बैक्टीरिया (ख) आद्य बैक्टीरिया
उत्तर

(क) परपोषी बैक्टीरिया के आर्थिक उपयोग:

  1. दुग्ध उद्योग: लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया दूध से दही, पनीर व छाछ बनाने में सहायक हैं।
  2. प्रतिजैविक उत्पादन: स्ट्रेप्टोमाइसीस प्रजातियाँ स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन जैसी प्रतिजैविकों के उत्पादन में प्रयुक्त होती हैं।
  3. अपघटन (decomposition): ये कार्बनिक पदार्थों का अपघटन कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं तथा पोषक चक्रण में सहायता करते हैं।
  4. जैविक खाद (composting): कृषि अवशेषों को सड़ाकर जैविक खाद बनाने में सहायक।

(ख) आद्य बैक्टीरिया (आर्किबैक्टीरिया) के आर्थिक उपयोग:

  1. बायोगैस उत्पादन: मेथेनोजन (आद्य बैक्टीरिया) रुमिनेंट पशुओं के गोबर व सीवेज से बायोगैस (मीथेन) उत्पादन में प्रयुक्त होते हैं।
  2. औद्योगिक एंजाइम: थर्मोफिलिक आद्य बैक्टीरिया उच्च ताप पर सक्रिय एंजाइम प्रदान करते हैं, जिनका उपयोग खाद्य, कपड़ा व कागज उद्योगों में होता है।
  3. प्रदूषण नियंत्रण: हैलोफाइल (लवणरागी) आद्य बैक्टीरिया उच्च लवणीय अपशिष्ट जल के शोधन में सहायक हैं।
  4. जैविक खनन (bioleaching): कुछ आद्य बैक्टीरिया निम्न-स्तरीय अयस्कों से धातुओं को निकालने में उपयोगी हैं।
प्रश्न 3 डाइएटम की कोशिका भित्ति के क्या लक्षण हैं?
उत्तर
  • डाइएटम की कोशिका भित्ति सिलिका (SiO₂) से बनी होती है — यह काँच के समान पारदर्शी व कठोर होती है।
  • कोशिका भित्ति दो अतिछादित कवचों (overlapping halves) — ऊपरी (एपीथीका) व निचली (हाइपोथीका) — से मिलकर बनी होती है, जो साबुनदानी (petri dish) की तरह एक-दूसरे पर चढ़ी होती हैं।
  • सिलिका होने के कारण ये अविनाशी (indestructible) होती हैं और मृत्यु के बाद भी नष्ट नहीं होतीं।
  • करोड़ों वर्षों में जमा डाइएटम की कोशिका भित्तियों के अवशेष डाइएटमी मृदा (डायटोमेशियस अर्थ) कहलाते हैं, जिसका उपयोग पॉलिशिंग, तेलों व सिरप के निस्यंदन में होता है।
  • डाइएटम कोशिका भित्ति पर सुस्पष्ट अलंकरण (ornamentations) पाए जाते हैं, जिनका उपयोग प्रजातियों की पहचान में होता है।
प्रश्न 4 'शैवाल पुष्पन' (Algal Bloom) तथा 'लाल तरंगें' (red-tides) क्या दर्शाती हैं।
उत्तर
  • शैवाल पुष्पन (Algal Bloom): यह जल निकायों में पोषक तत्वों (विशेषकर नाइट्रोजन व फॉस्फोरस) की अधिकता के कारण शैवालों की संख्या में अचानक व विस्फोटक वृद्धि को दर्शाता है। यह जल के रंग को हरा, भूरा या लाल कर सकता है तथा जल में ऑक्सीजन की मात्रा घटाकर अन्य जलीय जीवों के लिए घातक हो सकता है।
  • लाल तरंगें (Red Tides): यह डायनोफ्लैजिलेट्स (विशेषतः गोनियालैक्स प्रजाति) की संख्या में विस्फोट के कारण समुद्र का जल लाल दिखने को कहते हैं। ये डायनोफ्लैजिलेट विष (टॉक्सिन) उत्पन्न करते हैं, जिससे मछलियाँ व अन्य समुद्री जीव मर जाते हैं।

महत्वपूर्ण: दोनों ही पर्यावरणीय चिंता के विषय हैं, जो जल प्रदूषण (यूट्रोफिकेशन) का संकेत देते हैं और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर क्षति पहुँचाते हैं।

प्रश्न 5 वाइरस से विरोइड कैसे भिन्न होते हैं?
उत्तर
लक्षणवाइरस (Virus)विरोइड (Viroids)
आनुवंशिक पदार्थDNA या RNA (दोनों में से कोई एक)केवल RNA (निम्न-आणविक-भार, वृत्ताकार)
प्रोटीन आवरण (कैप्सिड)उपस्थितअनुपस्थित
आकारअपेक्षाकृत बड़ावाइरस से भी छोटा
खोजइवानोवस्की (1892), बेजेरिनेक (1898)टी.ओ. डाइनर (1971)
रोगमम्प्स, चेचक, इंफ्लूएंजा, एड्स, TMVपोटैटो स्पिंडल ट्यूबर, सिट्रस एक्ज़ोकॉर्टिस

विरोइड वाइरस से इसलिए भिन्न हैं क्योंकि इनमें प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) का पूर्ण अभाव होता है — ये मात्र मुक्त, निम्न-आणविक-भार, वृत्ताकार RNA अणु होते हैं, जो सीधे संक्रामकता प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 6 प्रोटोजोआ के चार प्रमुख समूहों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर
  • 1. अमीबीय प्रोटोजोआ (Sarcodina): ये कूटपाद (pseudopodia) की सहायता से गति व भोजन ग्रहण करते हैं। उदा: अमीबा, एंटअमीबा (परजीवी)। इनके समुद्री प्रकारों पर सिलिका के कवच पाए जाते हैं (जैसे — रेडिओलेरिया)।
  • 2. कशाभी प्रोटोजोआ (Mastigophora): इनके शरीर पर कशाभ (flagella) पाए जाते हैं, जिनकी सहायता से गति करते हैं। ये स्वच्छंद अथवा परजीवी हो सकते हैं। उदा: यूग्लीना (मिश्रपोषी), ट्रिपैनोसोमा (निद्रालु व्याधि का कारक)।
  • 3. पक्ष्माभी प्रोटोजोआ (Ciliata): इनके शरीर पर हजारों पक्ष्माभ (cilia) पाए जाते हैं, जो लयबद्ध गति करते हैं। इनमें दो प्रकार के केंद्रक (वृहत्केंद्रक व सूक्ष्मकेंद्रक) होते हैं। उदा: पैरामीशियम
  • 4. स्पोरोजोआ (Sporozoa): इनके जीवन चक्र में संक्रामक बीजाणु (spores) अवस्था पाई जाती है। ये सभी परजीवी होते हैं। उदा: प्लाज्मोडियम (मलेरिया परजीवी)।
प्रश्न 7 पादप स्वपोषी है। क्या आप ऐसे कुछ पादपों को बता सकते हैं, जो आंशिक रूप से परपोषित हैं?
उत्तर

हाँ, कुछ पादप पूर्ण स्वपोषी नहीं होते, बल्कि आंशिक रूप से परपोषी (partially heterotrophic) होते हैं। ऐसे पादप अपना कुछ पोषण प्रकाश-संश्लेषण से प्राप्त करते हैं तथा कुछ अन्य स्रोतों से।

  • कीटभक्षी पौधे (Insectivorous plants): ये नाइट्रोजन की कमी वाली मिट्टी में उगते हैं, अतः कीटों को पकड़कर उनका पाचन कर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।
    उदाहरण: वीनस फ्लाईट्रेप (डायोनिया), ब्लेडरवर्ट (यूट्रीक्यूलेरिया), पिचर प्लांट (नेपेन्थीज़)।
  • परजीवी पादप (Parasitic plants): ये अन्य पौधों पर आश्रित होते हैं और अपना भोजन मेज़बान से प्राप्त करते हैं।
    उदाहरण: अमरबेल (कसकूटा) — पूर्ण परजीवी; विस्कम (मिस्टलेटो) — अर्ध-परजीवी, क्योंकि यह प्रकाश-संश्लेषण भी करता है।
प्रश्न 8 शैवालांश तथा कवकांश शब्दों से क्या पता लगता है?
उत्तर
  • शैवालांश (Phycobiont): यह लाइकेन का शैवालीय घटक है, जो स्वपोषी (autotrophic) होता है। यह प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बनिक पदार्थ (भोजन) का संश्लेषण करता है और इसे कवक घटक को प्रदान करता है।
  • कवकांश (Mycobiont): यह लाइकेन का कवकीय घटक है, जो परपोषी (heterotrophic) होता है। यह शैवालांश को आश्रय, खनिज लवण व जल प्रदान करता है, तथा शैवालांश द्वारा संश्लेषित भोजन को अवशोषित करता है।

लाइकेन में शैवालांश व कवकांश के बीच पारस्परिक सहजीवी संबंध (mutualistic symbiosis) होता है। यह सहवास इतना घनिष्ठ होता है कि लाइकेन को एक एकल जीव के रूप में देखा जाता है।

प्रश्न 9 कवक (फंजाई) जगत के वर्गों का तुलनात्मक विवरण निम्नलिखित बिंदुओं पर करो: (क) पोषण की विधि (ख) जनन की विधि
उत्तर
वर्गपोषण की विधिजनन की विधि
फाइकोमाइसिटीज
(जाइगोमाइसिटीज)
मृतजीवी (सैप्रोफाइट) अथवा अविकल्पी परजीवी।
उदा: म्यूकर, राइज़ोपस
अलैंगिक: चलबीजाणु (ज़ूस्पोर) या अचलबीजाणु (एप्लेनोस्पोर) — धानी में अंतर्जातीय।
लैंगिक: युग्मक संलयन से युग्माणु (जाइगोस्पोर) बनते हैं।
ऐस्कोमाइसिटीज
(थैली कवक)
मृतजीवी, अपघटक, परजीवी अथवा शमलरागी (स्कैटोफाइल)।
उदा: ऐस्परजिलस, यीस्ट
अलैंगिक: कोनिडिया (बहिर्जातीय) — कोनिडियोफोर पर उत्पन्न।
लैंगिक: ऐस्कस बीजाणु (एस्कोस्पोर) — ऐस्कस के भीतर अंतर्जातीय उत्पन्न; ऐस्कोकार्प में समूहबद्ध।
बेसिडियोमाइसिटीज
(छत्रक कवक)
मृतजीवी, परजीवी (किट्ट, कंड), सहजीवी।
उदा: मशरूम, पक्सिनिया
अलैंगिक: प्राय: अनुपस्थित; कायिक जनन खंडन द्वारा।
लैंगिक: बेसिडियोस्पोर (बाह्यजातीय) — बेसिडियम पर उत्पन्न; बेसिडियोकार्प में समूहबद्ध।
ड्यूटिरोमाइसिटीज
(अपूर्ण कवक)
मृतजीवी, परजीवी, अपघटक।
उदा: आल्टरनेरिया, ट्राईकोडर्मा
केवल अलैंगिक ज्ञात: कोनिडिया द्वारा जनन।
लैंगिक अवस्था अज्ञात — ज्ञात होने पर उचित वर्ग में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

सारांश: सभी कवक परपोषी (हेटरोट्रॉफ) हैं — मृतजीवी, परजीवी अथवा सहजीवी। जनन की विधि व बीजाणु-प्रकार ही मुख्य वर्गीकरण आधार हैं।

प्रश्न 10 युग्लीनॉइड के विशिष्ट चारित्रिक लक्षण कौन-कौन से हैं?
उत्तर
  • कोशिका भित्ति का अभाव: इनमें कठोर कोशिका भित्ति नहीं होती, बल्कि एक लचीली प्रोटीनयुक्त परत — पेलिकिल (pellicle) — होती है, जो इनकी आकृति में परिवर्तन की अनुमति देती है।
  • दो कशाभ: इनमें दो कशाभ होते हैं — एक लंबा (मुख्य) तथा दूसरा छोटा
  • मिश्रपोषी (Mixotrophic) व्यवहार: प्रकाश में ये प्रकाशसंश्लेषी (स्वपोषी) रहते हैं (इनमें क्लोरोफिल-a व b जैसे हरे पादपों के वर्णक पाए जाते हैं), परंतु अंधेरे में ये अन्य सूक्ष्मजीवों का शिकार कर परपोषी (हेटरोट्रॉफ) बन जाते हैं।
  • निवास स्थान: अधिकांशतः स्वच्छ जल (ताजे जल) में — स्थिर जल निकायों में पाए जाते हैं।
  • केंद्रक: सुसंगठित यूकैरियोटिक केंद्रक होता है (प्रोटिस्टा जगत के अनुसार)।
  • प्रकाशग्राही अंगक: एक आँख धब्बा (eyespot/stigma) होता है, जो प्रकाश की दिशा का पता लगाने में सहायता करता है।

उदाहरण: युग्लीना (जीनस का नाम) — इसी नाम से इस समूह को युग्लीनॉइड कहा जाता है।

प्रश्न 11 संरचना तथा आनुवंशिक पदार्थ की प्रकृति के संदर्भ में वाइरस का संक्षिप्त विवरण दो। वाइरस से होने वाले चार रोगों के नाम भी लिखें।
उत्तर

वाइरस की संरचना:

  • वाइरस अकोशिक (acellular) संक्रामक कारक हैं — इनमें कोशिका संरचना नहीं होती।
  • इनमें आनुवंशिक पदार्थ (न्यूक्लीक अम्ल)या तो DNA या RNA (दोनों एक साथ नहीं) — होता है, जो एक प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) के भीतर बंद होता है।
  • कैप्सिड कैप्सोमीयर (capsomeres) नामक छोटी उप-इकाइयों से बना होता है।
  • कुछ वाइरसों के बाहर आवरण (envelope) भी पाया जाता है (जैसे — HIV, इन्फ्लूएंजा वाइरस)।
  • ये अपनी विशिष्ट मेजबान कोशिका के बाहर निष्क्रिय (inactive) होते हैं, परंतु मेजबान के अंदर जाकर उसकी मशीनरी का उपयोग अपनी प्रतिकृति बनाने में करते हैं — इसलिए अविकल्पी परजीवी (obligate parasites) कहलाते हैं।
  • बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वाइरस को जीवाणुभोजी (bacteriophage) कहते हैं, जिसमें प्राय: द्विरज्जुकी DNA होता है।

वाइरस से होने वाले चार रोग:

  1. मानवों में: मम्प्स (गलसुआ), चेचक (छोटी माता), इंफ्लूएंजा (फ्लू), एड्स (HIV), हर्पीज, पोलियो, रेबीज़ (जल-ज्वर) आदि।
  2. पादपों में: तंबाकू मोज़ेक रोग (TMV), पपीता रिंग स्पॉट, टमाटर मोज़ेक, गेहूँ का पीला बौनापन आदि।
प्रश्न 12 अपनी कक्षा में इस शीर्षक — क्या वाइरस सजीव है अथवा निर्जीव, पर चर्चा करें?
उत्तर (चर्चा-आधारित मॉडल उत्तर)

वाइरस को सजीव क्यों माना जाता है —

  • इनमें आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA) होता है, जो उत्परिवर्तन व पुनर्संयोजन में सक्षम है।
  • ये प्रतिकृति (replication) कर सकते हैं, यद्यपि यह केवल मेजबान कोशिका के भीतर ही संभव है।
  • ये अनुकूलन (adaptation)विकास (evolution) प्रदर्शित करते हैं।
  • इनमें संगठन (organization) — प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) के रूप में — पाया जाता है।

वाइरस को निर्जीव क्यों माना जाता है —

  • इनमें कोशिकीय संरचना (कोशिका झिल्ली, साइटोप्लाज्म, कोशिकांग) नहीं होती।
  • ये मेजबान कोशिका के बाहर निष्क्रिय क्रिस्टलीय रूप में रह सकते हैं और इनमें कोई उपापचयी (मेटाबोलिक) क्रिया नहीं होती।
  • ये स्वतंत्र रूप से प्रजनन नहीं कर सकते — मेजबान की मशीनरी पर निर्भर हैं।
  • इनमें वृद्धि (growth)श्वसन (respiration) जैसी सजीवों की मूलभूत विशेषताएँ नहीं होतीं।

निष्कर्ष: वाइरस सजीव व निर्जीव के मध्य की कड़ी (borderline organism) हैं। इन्हें अकोशिक जीव (acellular organisms) कहा जाता है तथा ये सजीवों की परिभाषा को चुनौती देते हैं। अधिकांश जीव वैज्ञानिक वाइरस को सजीव नहीं मानते, क्योंकि इनमें कोशिकीय संरचना एवं स्वतंत्र उपापचय का अभाव है; तथापि इनके आनुवंशिक पदार्थ व विकासीय क्षमता के कारण इन्हें "सजीवों की सीमा पर" रखा जाता है।

यह अध्ययन सामग्री NCERT जीव विज्ञान कक्षा 11, इकाई 1, अध्याय 2 "जीव जगत का वर्गीकरण" पर आधारित है — पाँच जगत वर्गीकरण, मॉनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई तथा अकोशिक जीवों सहित सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर सहित।

जीव जगत की विविधता को समझने का हर नया प्रयास वर्गीकरण की पद्धति को और परिष्कृत करता है।

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