गति के नियम — सम्पूर्ण अध्ययन
भौतिकी • यांत्रिकी

गति के नियम

अरस्तू की भ्रामक धारणा से लेकर गैलीलियो के जड़त्व के सिद्धांत तक, और न्यूटन के तीन क्रांतिकारी नियमों तक — यह अध्याय बताता है कि वस्तुएँ गति क्यों और कैसे करती हैं। हर अवधारणा, हर उदाहरण, और अध्याय के अंत के सभी प्रश्नों का विस्तृत हल इस पृष्ठ में सम्मिलित है।

4.1 भूमिका

प्रश्न सरल है — पिंड गति क्यों करते हैं? पर इसका सही उत्तर खोजने में सदियाँ लग गईं।

पिछले अध्याय (गतिकी) में हमने केवल गति का वर्णन करना सीखा था — यानी वेग और त्वरण की गणना। परंतु हमने कभी यह नहीं पूछा कि गति का कारण क्या है। यह अध्याय ठीक इसी मूल प्रश्न पर केंद्रित है — भौतिकी की शाखा जो इसका अध्ययन करती है उसे यांत्रिकी (Mechanics) कहते हैं।

अपने रोज़मर्रा के अनुभवों से हम अनुमान लगा सकते हैं:

  • विरामावस्था में पड़ी फुटबॉल को गति देने के लिए उस पर ठोकर मारनी पड़ती है
  • पत्थर को ऊपर फेंकने के लिए उसे प्रक्षेपित करना पड़ता है
  • मंद पवन पेड़ की शाखाओं को झुला देती है; प्रबल वायु भारी पिंडों को भी लुढ़का सकती है
  • बहती नदी बिना किसी के खेवे भी नाव को गतिमान कर देती है

इन उदाहरणों से स्पष्ट है: किसी पिंड को विराम से गति में लाने के लिए किसी बाह्य साधन द्वारा बल लगाने की आवश्यकता होती है। इसी तरह गति को रोकने अथवा मंद करने के लिए भी बाह्य बल चाहिए।

महत्वपूर्ण बिंदु बल का बाह्य साधन (हाथ, वायु, जलधारा आदि) पिंड के संपर्क में हो सकता है, परंतु यह सदैव आवश्यक नहीं। भवन के शिखर से गिराया गया पत्थर पृथ्वी के गुरुत्वीय खिंचाव से त्वरित होता है — यहाँ कोई स्पर्श संपर्क नहीं है। इसी तरह छड़ चुंबक लोहे की कीलों को दूर से ही आकर्षित करता है। यह दर्शाता है कि बाह्य साधन (गुरुत्वीय एवं चुंबकीय बल) एक दूरी से भी किसी पिंड पर बल लगा सकता है।

अब सवाल यह उठता है: क्या किसी पिंड की एकसमान गति बनाए रखने के लिए कोई बाह्य बल आवश्यक है? — जैसे बर्फ के क्षैतिज फर्श पर सीधी रेखा में गतिमान कोई स्केटर। यह प्रश्न सरल प्रतीत होता है, पर इसका उत्तर देने में सदियाँ लग गईं — यही अगले भाग का विषय है।

4.2 अरस्तू की भ्रामकता

एक स्वाभाविक परंतु दोषयुक्त विचार जिसने दो हज़ार वर्ष तक विज्ञान को प्रभावित किया।

ऐतिहासिक

महान ग्रीक विचारक अरस्तू (384 ई.पू. – 322 ई.पू.) ने यह विचार रखा:

अरस्तू का गति नियम किसी पिंड को गतिशील रखने के लिए बाह्य बल की आवश्यकता होती है।

उदाहरण: धनुष से छोड़ा गया तीर उड़ता रहता है क्योंकि तीर के पीछे की वायु उसे धकेलती रहती है — ऐसा अरस्तू मानते थे।

यह विचार बहुत स्वाभाविक लगता है — कोई भी व्यक्ति अपने सामान्य अनुभवों से यह रख सकता है। एक छोटी बालिका जो अवैद्युत खिलौना कार से फर्श पर खेलती है, वह भी अपने अंतर्ज्ञान से जानती है कि कार को चलती रखने के लिए उस पर बंधी डोरी को बराबर खींचना होगा। यदि वह डोरी छोड़ देती है तो कुछ क्षण बाद कार रुक जाती है।

फिर अरस्तू के तर्क में दोष क्या है?

उत्तर है: गतिशील खिलौना कार इसलिए रुक जाती है क्योंकि फर्श द्वारा कार पर लगने वाला बाह्य घर्षण बल इसकी गति का विरोध करता है। इस बल को निष्फल करने के लिए बालिका को कार पर गति की दिशा में बाह्य बल लगाना पड़ता है।

निर्णायक बिंदु जब कार एकसमान गति में होती है तब उस पर कोई नेट बाह्य बल कार्य नहीं करता — बालिका द्वारा लगाया गया बल फर्श के घर्षण बल को निरस्त कर देता है। इसका उपप्रमेय है: यदि कोई घर्षण न हो, तो बालिका को खिलौना कार की एकसमान गति बनाए रखने के लिए किसी भी बल की आवश्यकता नहीं पड़ती।

प्रकृति में सदैव ही विरोधी घर्षण बल (ठोसों के बीच) अथवा श्यान बल (तरलों के बीच) उपस्थित रहते हैं। इसीलिए वस्तुओं में एकसमान गति बनाए रखने के लिए घर्षण बलों को निष्फल करने हेतु बाह्य साधनों द्वारा बल लगाना आवश्यक होता है — और अरस्तू ने अपने इस व्यावहारिक अनुभव को एक मौलिक तर्क का रूप दे दिया, जो कि उनकी त्रुटि थी।

अरस्तू की त्रुटि का सार गति तथा बलों के लिए प्रकृति के यथार्थ नियम को जानने के लिए हमें एक आदर्श संसार की कल्पना करनी होगी जिसमें बिना किसी विरोधी घर्षण बल के एकसमान गति का निष्पादन होता है। यही गैलीलियो ने किया था।

4.3 जड़त्व का नियम

गैलीलियो का विचार-प्रयोग, जिसने न्यूटनी यांत्रिकी की नींव रखी।

गैलीलियो ने वस्तुओं की गति का अध्ययन एक आनत समतल (inclined plane) पर किया था। उनका अवलोकन तीन भागों में था:

  • (i) नीचे की ओर ढालू समतल: गेंद का वेग बढ़ता (त्वरित) जाता है
  • (ii) ऊपर की ओर ढालू समतल: गेंद का वेग घटता (मंदित) जाता है
  • (iii) क्षैतिज समतल: इन दोनों के बीच की स्थिति होनी चाहिए

गैलीलियो ने निष्कर्ष निकाला: किसी घर्षण रहित क्षैतिज समतल पर गतिशील किसी वस्तु में न तो त्वरण होना चाहिए और न ही मंदन — अर्थात् इसे एकसमान वेग से गति करनी चाहिए।

द्विआनत समतल का प्रयोग

गैलीलियो के एक अन्य प्रयोग में द्विआनत समतल का उपयोग किया गया, जिससे भी यही निष्कर्ष निकलता है:

  • एक आनत समतल पर विरामावस्था से छोड़ी गई गेंद नीचे लुढ़कती है और दूसरे आनत समतल पर ऊपर चढ़ती है
  • यदि दोनों आनत समतलों के पृष्ठ अधिक रुक्ष (rough) नहीं हैं तो गेंद की अंतिम ऊंचाई उसकी आरंभिक ऊंचाई के लगभग समान (कुछ कम, परंतु अधिक कभी नहीं) होती है
  • आदर्श स्थिति में जब घर्षण बल पूर्णतः विलुप्त कर दिया जाता है, गेंद की अंतिम ऊंचाई उसकी आरंभिक ऊंचाई के समान होनी चाहिए

अब यदि दूसरे समतल के ढाल को घटाकर प्रयोग दोहराएँ, तो गेंद उसी ऊंचाई तक पहुंचेगी परंतु अधिक दूरी चलेगी। सीमांत स्थिति में जब दूसरे समतल का ढाल शून्य है (यानी क्षैतिज समतल है), गेंद अनंत दूरी तक चलती है — दूसरे शब्दों में इसकी गति कभी नहीं रुकेगी!

जड़त्व का नियम (गैलीलियो) यदि घर्षण न होता तो गेंद क्षैतिज समतल पर एकसमान वेग से निरंतर चलती रहती। किसी पिंड को गतिशील अवस्था में तब तक कोई परिवर्तन नहीं करता जब तक कोई बाह्य बल उसे ऐसा करने के लिए विवश नहीं करता।

इस प्रकार गैलीलियो को गति के संबंध में एक नई अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई, जो अरस्तू तथा उनके अनुयायियों को समझ में नहीं आई। गतिकी में विरामावस्था तथा एकसमान रैखिक गति (यानी एकसमान वेग से गति) तुल्य होती हैं। दोनों ही प्रकरणों में पिंड पर कोई नेट बल नहीं लगता। यह सोचना त्रुटिपूर्ण है कि किसी पिंड की एकसमान गति के लिए उस पर कोई नेट बल लगाना आवश्यक है।

प्राचीन भारतीय विज्ञान में गति संबंधी धारणाएँ

प्राचीन भारतीय विचारकों ने भी गति संबंधी धारणाओं की एक विस्तृत प्रणाली विकसित कर ली थी। बल जो गति का कारण है, भिन्न प्रकार का माना गया:

  • नोदन — सतत दाब के कारण बल, जैसे जल-यात्रा करते पाल-यानों पर लगने वाला पवन का बल
  • संघट्ट (अभिघात) — जो कुम्भकार द्वारा चाक को छड़ से घुमाने पर लगता है
  • वेग — सरल रैखिक गति के लिए, अथवा प्रत्यास्थ पिंडों में आकृति के प्रत्यानयन की दीर्घस्थायी प्रवृत्ति (संस्कार)

वैशेषिक सिद्धांत में वेगों की संकल्पना जड़त्व की संकल्पना के समीपस्थ मानी गई है। भास्कर (1150 ई.) ने तात्क्षणिक गति की अवधारणा प्रस्तावित की, जिससे अवकल गणित के प्रयोग द्वारा तात्क्षणिक वेग की आधुनिक संकल्पना का पूर्वज्ञान हुआ। तरंग तथा धारा (जल की) के बीच अंतर को भली-भांति समझा जा चुका था।

4.4 न्यूटन का गति का प्रथम नियम

जड़त्व की धारणा और शून्य नेट बल की शर्त।

गैलीलियो की सरल परंतु क्रांतिकारी धारणाओं ने अरस्तू की यांत्रिकी को पूर्णतया नकार दिया। सर आइज़क न्यूटन, जिन्हें सभी युगों का महानतम वैज्ञानिक माना जाता है, ने गैलीलियो की धारणाओं के आधार पर गति के तीन नियमों की एक नई यांत्रिकी की आधारशिला रखी।

न्यूटन का प्रथम नियम (जड़त्व का नियम) "प्रत्येक पिंड तब तक अपनी विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था में रहता है जब तक कोई बाह्य बल उसे अन्यथा व्यवहार करने के लिए विवश नहीं करता।"

सरल शब्दों में इसे इस प्रकार भी व्यक्त किया जा सकता है:

यदि किसी पिंड पर लगने वाला नेट बाह्य बल शून्य है, तो उसका त्वरण शून्य होता है।

शून्येतर त्वरण केवल तभी हो सकता है जब पिंड पर कोई नेट बाह्य बल लगता हो।

जड़त्व (Inertia) क्या है?

यदि नेट बाह्य बल शून्य है तो विराम अवस्था में रह रहा पिंड विरामावस्था में ही रहता है और गतिशील पिंड निरंतर एकसमान वेग से गतिशील रहता है। वस्तु के इस गुण को जड़त्व कहते हैं। जड़त्व से तात्पर्य है — "परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध"।

व्यवहार में दो प्रकार की स्थितियाँ

प्रथम नियम के अनुप्रयोग में हमें दो प्रकार की स्थितियों से सामना करना होता है:

  1. जब नेट बाह्य बल शून्य ज्ञात हो: तब हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वस्तु का त्वरण शून्य है। उदाहरण — अंतरातारकीय आकाश में सभी गुरुत्वीय वस्तुओं से बहुत दूर किसी अंतरिक्षयान, जिसके सभी रॉकेट बंद कर दिए जा चुके हों, पर कोई नेट बाह्य बल कार्यरत नहीं होता।
  2. जब गति की अवस्था ज्ञात हो: यदि हमें यह ज्ञात हो कि कोई वस्तु अत्वरित है (यानी विरामावस्था में या एकसमान रैखिक गति में है), तब हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उस वस्तु पर नेट बाह्य बल शून्य होना चाहिए।

गुरुत्व हर स्थान पर है — पृथ्वी पर स्थित सभी वस्तुएँ पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अनुभव करती हैं, साथ ही गतिशील वस्तुएँ सदैव घर्षण बल, श्यान कर्षण आदि का अनुभव करती हैं। तब यदि पृथ्वी पर स्थित कोई वस्तु विरामावस्था अथवा एकसमान रैखिक गति में हो, तो ऐसा होने का कारण यह है कि उस पर कार्यरत विभिन्न बाह्य बल एक दूसरे को निरस्त करके सभी बलों के योग को 'शून्य नेट बाह्य बल' बनाते हैं।

सावधान — सामान्य भ्रांति मेज़ पर विराम अवस्था में रखी पुस्तक के लिए हम कहते हैं "चूंकि W = R, बल एक दूसरे को निरस्त करते हैं, इसीलिए पुस्तक विराम की स्थिति में है" — यह विवेक के विपरीत है। सही प्रकथन यह होना चाहिए: "चूंकि पुस्तक विराम में दिखाई देती है, गति के प्रथम नियम के अनुसार इस पर नेट बाह्य बल शून्य होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि अभिलंब R पुस्तक के भार W के समान तथा विपरीत होना चाहिए।" (कारण पहले आता है, संयोग बाद में नहीं)

अब एक कार पर विचार करें जो विराम से गति आरंभ करके अपनी चाल में वृद्धि करती है और फिर चिकनी सीधी सड़क पर एकसमान वेग से गति करती है। जब यह विराम में होती है तब उस पर कोई नेट बल नहीं होता। चाल में वृद्धि के समय इसमें त्वरण होता है — यह एक बाह्य बल के कारण होना चाहिए (कार के त्वरण के लिए किसी आंतरिक बल को उत्तरदायी नहीं माना जा सकता)। यहाँ अनुदिश विचारणीय बल घर्षण बल ही है — पहियों और सड़क के बीच घर्षण ही कार को त्वरित करता है।

जड़त्व का अनुभव: बस में झटका

मान लीजिए हम किसी रुकी हुई बस में असावधानी से खड़े हैं और यकायक ड्राइवर बस को चला देता है। हम झटके के साथ पीछे की ओर गिर पड़ते हैं। क्यों? हमारे पैर बस के फर्श को स्पर्श कर रहे होते हैं। यदि घर्षण न होता, तो हम वहीं रहते जहां पहले थे जबकि हमारे पैरों के नीचे बस का फर्श केवल आगे की दिशा में सरकता और बस का पीछे का भाग हमसे आकर टकराता। परंतु हमारे पैर और फर्श के बीच कुछ घर्षण होता है।

यदि बस की पिक-अप अति आकस्मिक नहीं है (त्वरण साधारण है) तो घर्षण बल हमारे पैरों को बस के साथ त्वरित करने के लिए पर्याप्त होगा। परंतु वास्तव में हमारा शरीर एक दृढ़ पिंड नहीं है — इसमें विरूपण हो सकता है, यानी इसके विभिन्न भागों के बीच आपेक्ष विस्थापन संभव है। जब हमारे पैर बस के साथ आगे बढ़ते हैं, शरीर का शेष भाग जड़त्व के कारण वहीं रहता है — इसीलिए हम बस के सापेक्ष पीछे की ओर फेंक दिए जाते हैं।

उदाहरण 4.1

कोई अंतरिक्षयात्री अंतरातारकीय आकाश में 100 m s⁻² की एकसमान दर से त्वरित अपने अंतरिक्षयान से दुर्घटनावश बाहर फेंक दिया जाता है। जिस क्षण अंतरिक्षयात्री अंतरिक्षयान से बाहर आ जाता है, उसके तुरंत पश्चात् अंतरिक्षयात्री का त्वरण क्या है? (मान लीजिए कि यात्री पर गुरुत्वाकर्षण बल आरोपित करने के लिए उसके निकट कोई तारा नहीं है)

हल: जिस क्षण वह यात्री यान से बाहर आता है, उसी क्षण से अंतरिक्षयात्री पर कोई बाह्य बल कार्यरत नहीं रहता क्योंकि हमने यह माना है कि यात्री पर गुरुत्वाकर्षण बल आरोपित करने के लिए उसके निकट कोई तारा नहीं है, तथा अंतरिक्षयान छोटा होने के कारण इसके द्वारा यात्री पर लग रहा गुरुत्वाकर्षण बल उपेक्षणीय है।

गति के प्रथम नियम के अनुसार, अंतरिक्षयात्री का त्वरण शून्य है।

उत्तर: त्वरण = 0

4.5 न्यूटन का गति का द्वितीय नियम

बल और त्वरण के बीच का सटीक मात्रात्मक संबंध।

गति का प्रथम नियम उस साधारण प्रकरण से संबंध रखता है जिसमें किसी पिंड पर नेट बाह्य बल शून्य है। द्वितीय नियम उन व्यापक स्थितियों से संबंध रखता है जिनमें पिंड पर कोई नेट बाह्य बल लग रहा हो। यह नियम नेट बाह्य बल और पिंड के त्वरण में संबंध दर्शाता है।

संवेग (Momentum)

किसी पिंड के संवेग को उसकी संहति m तथा वेग v के गुणनफल द्वारा परिभाषित किया जाता है — इसे p द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है:

p = m v     (समीकरण 4.1)

स्पष्ट रूप से संवेग एक सदिश राशि है।

दैनिक जीवन के निम्नलिखित सरल अनुभवों में पिंडों की गतियों पर बलों के प्रभाव पर विचार करते समय संवेग के महत्व का पता चलता है:

  • संहति का प्रभाव: एक कम भार का वाहन (छोटी कार) तथा एक अधिक भार का वाहन (सामान से लदा ट्रक) — दोनों को समान चाल से गति कराने में ट्रक को धकेलने के लिए अपेक्षाकृत अधिक बल चाहिए। इसी तरह समान चाल से गतिमान दो पिंडों में से भारी पिंड को रोकने में अधिक विरोधी बल चाहिए।
  • चाल का प्रभाव: बंदूक से छोड़ी गई गोली रुकने से पूर्व मानव ऊतक को आसानी से वेध सकती है। यदि उसी गोली को साधारण चाल से फेंकें तो अधिक क्षति नहीं होती।

अतः संहति और वेग का गुणनफल, अर्थात संवेग, गति का एक प्रासंगिक चर है। यदि अधिक संवेग परिवर्तन की आवश्यकता है तो लगाने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होगी।

बल केवल संवेग परिवर्तन पर ही निर्भर नहीं करता, वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि यह परिवर्तन कितनी तीव्रता से किया जाता है। क्रिकेट का उदाहरण: कोई अभ्यस्त खिलाड़ी तीव्र गति से आती गेंद को नौसिखिया की तुलना में कहीं अधिक आसानी से लपक लेता है जबकि नौसिखिया खिलाड़ी उसी गेंद को लपकने में हाथों में चोट खा लेता है। अभ्यस्त खिलाड़ी अपने हाथों को पीछे की ओर खींचकर गेंद को रोकने में अधिक समय लगाता है — नौसिखिया खिलाड़ी हाथ स्थिर रखकर गेंद को लगभग तत्क्षण रोकने का प्रयास करता है, जिसके लिए अधिक बल चाहिए।

निष्कर्ष बल केवल संवेग परिवर्तन पर ही निर्भर नहीं करता, वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि यह परिवर्तन कितनी तीव्रता से किया जाता है। समान संवेग परिवर्तन यदि अपेक्षाकृत कम समय में किया जाता है, तो अपेक्षाकृत अधिक बल लगाने की आवश्यकता होती है। संक्षेप में: संवेग परिवर्तन की दर अधिक है, तो बल अधिक होता है।

द्वितीय नियम का सूत्रीकरण

न्यूटन का द्वितीय नियम किसी पिंड के संवेग परिवर्तन की दर आरोपित बल के अनुक्रमानुपाती होती है तथा उसी दिशा में होती है जिस दिशा में बल कार्य करता है।

यदि m संहति के किसी पिंड पर कोई बल F समय अंतराल Δt तक लगाने पर उस पिंड के वेग में v से v+Δv का परिवर्तन हो जाता है, तो:

F ∝ Δp/Δt   ⟹   F = k (dp/dt)     (समीकरण 4.2)

किसी स्थिर संहति m के पिंड के लिए:

dp/dt = d(mv)/dt = m (dv/dt) = m a     (समीकरण 4.3)

अतः द्वितीय नियम को इस प्रकार भी लिख सकते हैं:

F = k m a     (समीकरण 4.4)

SI मात्रकों में सरलता के लिए हम k = 1 चुनते हैं। तब द्वितीय नियम हो जाता है:

F = dp/dt = m a     (समीकरण 4.5)

SI मात्रकों में, एक मात्रक बल वह होता है जो 1 kg के पिंड में 1 m s⁻² का त्वरण उत्पन्न कर देता है। इस मात्रक बल को न्यूटन कहते हैं (प्रतीक N)।

1 N = 1 kg m s⁻²

द्वितीय नियम के महत्वपूर्ण बिंदु

  1. जब F = 0, तब a = 0 — द्वितीय नियम प्रथम नियम के अनुरूप है।
  2. यह एक सदिश नियम है — वास्तव में तीन समीकरणों के तुल्य है, सदिशों के प्रत्येक घटक के लिए एक समीकरण:
    Fx = dpx/dt = max    Fy = dpy/dt = may    Fz = dpz/dt = maz
    इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई बल पिंड के वेग के समांतर नहीं है, वरन उससे कोई कोण बनाता है, तब वह केवल बल की दिशा में वेग के घटक को परिवर्तित करता है। बल के अभिलंबवत् वेग का घटक अपरिवर्तित रहता है — उदाहरण के लिए, ऊर्ध्वाधर गुरुत्वाकर्षण बल के अधीन किसी प्रक्षेप्य की गति में वेग का क्षैतिज घटक अपरिवर्तित रहता है।
  3. यह नियम वस्तुतः एकल बिंदु कण पर लागू होता है। इसे किसी दृढ़ पिंड अथवा कणों के निकाय पर भी लागू किया जाता है — तब F निकाय पर लगे कुल बाह्य बल तथा a समस्त निकाय के त्वरण के लिए होता है। निकाय में किन्हीं भी आंतरिक बलों को F में सम्मिलित नहीं किया जाता।
  4. गति का द्वितीय नियम एक स्थानीय संबंध है — समय के किसी निश्चित क्षण पर किसी बिंदु पर लगा बल F उसी क्षण उसी बिंदु पर त्वरण a से संबंधित है, कण की गति के किसी भी इतिहास द्वारा नहीं।
उदाहरण 4.2

90 m s⁻¹ चाल से गतिमान 0.04 kg संहति की कोई गोली लकड़ी के भारी गुटके में धँसकर 60 cm दूरी चलकर रुक जाती है। गुटके द्वारा गोली पर लगने वाला औसत अवरोधी बल क्या है?

हल: गोली का मंदन (नियत मानते हुए), v² = u² + 2as सूत्र से (यहाँ v = 0):

a = −u²/2s = −(90×90)/(2×0.6) = −6750 m s⁻²

गति के द्वितीय नियम के द्वारा, मंदन बल = 0.04 kg × 6750 m s⁻² = 270 N

इस प्रकरण में वास्तविक अवरोधी बल एकसमान नहीं होता — इसीलिए उत्तर केवल औसत अवरोधी बल को व्यक्त करता है।

उदाहरण 4.3

द्रव्यमान m के एक कण की गति, y = ut + ½gt² से वर्णित है। उस कण पर लगने वाले बल को ज्ञात करो।

हल: हम जानते हैं: y = ut + ½gt²

वेग: v = dy/dt = u + gt

त्वरण: a = dv/dt = g

समीकरण (4.5) से बल: F = ma = mg

अतः दिए गए समीकरण से गुरुत्वीय त्वरण के अधीन कण की गति का वर्णन होता है तथा y गुरुत्वीय त्वरण g की दिशा में स्थान निर्देशांक है। उत्तर: F = mg

आवेग (Impulse)

कभी-कभी हमारा सामना ऐसे दृष्टांतों से होता है जिनमें किसी पिंड पर कोई बड़ा बल, बहुत कम समय के लिए कार्यरत रहकर, उस पिंड के संवेग में परिमित परिवर्तन उत्पन्न करता है। उदाहरण: जब कोई गेंद किसी दीवार से टकराकर वापस परावर्तित होती है, तब दीवार द्वारा गेंद पर लगने वाला बल बहुत कम समय के लिए कार्यरत रहता है — फिर भी यह बल गेंद के संवेग को उत्क्रमित करने के लिए पर्याप्त होता है।

इन स्थितियों में बल तथा समयावधि को पृथक-पृथक सुनिश्चित करना कठिन होता है, परंतु बल तथा समय का गुणनफल, जो कि पिंड का संवेग परिवर्तन है, एक मापने योग्य राशि है। इस गुणनफल को आवेग कहते हैं:

आवेग = बल × समयावधि = संवेग में परिवर्तन     (समीकरण 4.7)

परिमित संवेग परिवर्तन उत्पन्न करने के लिए, कम समय के लिए कार्यरत रहने वाले बड़े बल को आवेगी बल कहते हैं। न्यूटनी यांत्रिकी में आवेगी बलों को अन्य बलों से अलग नहीं माना जाता — यह मात्र बड़ा है और कम समय के लिए कार्यरत रहता है।

उदाहरण 4.4

कोई बल्लेबाज किसी गेंद की आरंभिक चाल जो 12 m s⁻¹ है, में बिना परिवर्तन किए उस पर हिट लगाकर सीधे गेंदबाज की दिशा में वापस भेज देता है। यदि गेंद की संहति 0.15 kg है, तो गेंद को दिया गया आवेग ज्ञात कीजिए।

हल: प्रारंभ में गेंद बल्लेबाज की ओर 12 m s⁻¹ से आ रही है, इसे ऋणात्मक दिशा मानें: प्रारंभिक संवेग = −0.15×12 = −1.8 kg m s⁻¹

हिट के बाद गेंद उसी चाल से गेंदबाज़ की दिशा में (धनात्मक) वापस जाती है: अंतिम संवेग = +0.15×12 = +1.8 kg m s⁻¹

संवेग परिवर्तन = 0.15×12 − (−0.15×12) = 3.6 N s

उत्तर: आवेग = 3.6 N s (बल्लेबाज से गेंदबाज़ की दिशा में)

4.6 न्यूटन का गति का तृतीय नियम

बल सदैव युगलों में पाए जाते हैं — प्रकृति में बल कभी अकेला नहीं होता।

गति का द्वितीय नियम बताता है कि किसी पिंड पर लगे बाह्य बल तथा उसमें उत्पन्न त्वरण में क्या संबंध है। परंतु पिंड पर लगे बाह्य बल का उद्गम क्या है? न्यूटनी यांत्रिकी में इसका सरल उत्तर है: किसी पिंड पर लगने वाला बाह्य बल सदैव ही किसी अन्य पिंड के कारण होता है।

दो पिंडों A और B के युगल पर विचार कीजिए। मान लीजिए पिंड B, पिंड A पर कोई बाह्य बल लगाता है। तब यह प्रश्न भी स्वाभाविक है: क्या पिंड A भी पिंड B पर कोई बाह्य बल लगाता है? कुछ उदाहरणों में उत्तर स्पष्ट है — कुंडलित कमानी को दबाने पर वह प्रत्युत्तर में आपके हाथों पर बल आरोपित करती है। परंतु जब पिंड संपर्क में नहीं होते तब क्या होता है? पृथ्वी गुरुत्वीय बल के कारण किसी पत्थर को अधोमुखी दिशा में खींचती है। क्या पत्थर पृथ्वी पर कोई बल लगाता है? न्यूटन के अनुसार: हाँ, पत्थर भी पृथ्वी पर परिमाण में समान तथा दिशा में विपरीत बल लगाता है। यह बल इसलिए दिखाई नहीं देता क्योंकि पृथ्वी अत्यधिक भारी है, इसलिए उस पर पत्थर द्वारा लगने वाले बल का प्रभाव नगण्य होता है।

न्यूटन का तृतीय नियम प्रत्येक क्रिया की सदैव समान एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।

तृतीय नियम के बारे में महत्वपूर्ण बिंदु

  1. पद 'क्रिया' तथा 'प्रतिक्रिया' का अर्थ 'बल' के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सरल शब्दों में: बल सदैव युगलों में पाए जाते हैं। पिंड A पर B द्वारा आरोपित बल पिंड B पर A द्वारा आरोपित बल के समान एवं विपरीत होता है।
  2. कोई कारण-प्रभाव संबंध नहीं: "क्रिया" तथा "प्रतिक्रिया" शब्दों से यह भ्रम हो सकता है कि क्रिया प्रतिक्रिया से पहले आती है — परंतु तृतीय नियम में ऐसा कोई कारण-प्रभाव संबंध नहीं है। A पर B द्वारा आरोपित बल तथा B पर A द्वारा आरोपित बल एक ही क्षण कार्यरत होते हैं। इसी संकेत के आधार पर इनमें से किसी भी एक को क्रिया तथा दूसरे को प्रतिक्रिया कहा जा सकता है।
  3. क्रिया-प्रतिक्रिया दो भिन्न पिंडों पर कार्य करते हैं, एक ही वस्तु पर नहीं। दो पिंडों A तथा B के युगल पर विचार कीजिए। तृतीय नियम के अनुसार:
    FAB = −FBA    (समीकरण 4.8)
    इस प्रकार, यदि हम किसी एक पिंड (A अथवा B) की गति पर विचार करते हैं तो दो बलों में से केवल एक ही प्रासंगिक है। दोनों बलों का योग करके दृढ़तापूर्वक यह कहना कि नेट बल शून्य है, यह त्रुटिपूर्ण है। फिर भी, यदि आप दो पिंडों के किसी निकाय को एक पिंड मानकर उस पर विचार करते हैं, तो FAB तथा FBA उस निकाय (A+B) के आंतरिक बल हैं — ये दोनों मिलकर एक शून्य बल देते हैं। इस प्रकार किसी पिंड अथवा कणों के निकाय में आंतरिक बल युगलों में निरस्त हो जाते हैं। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है जो द्वितीय नियम को किसी पिंड अथवा कणों के निकाय पर अनुप्रयोज्य होने योग्य बनाता है।
उदाहरण 4.5

दो सर्वसम बिलियर्ड गेंदें किसी दृढ़ दीवार से समान चाल से, परंतु भिन्न कोणों पर, टकराती हैं तथा चाल में बिना क्षय हुए परावर्तित हो जाती हैं। (i) प्रत्येक गेंद के कारण दीवार पर बल की दिशा क्या है? तथा (ii) दीवार द्वारा दोनों गेंदों पर लगे आवेगों का अनुपात क्या है?

हल: दीवार पर लगे बल को कैसे ज्ञात करें? इसके लिए एक युक्ति अपनाते हैं जिसमें पहले द्वितीय नियम का उपयोग करके दीवार के कारण गेंद पर लगे बल (अथवा आवेग) पर विचार करते हैं और तत्पश्चात् तृतीय नियम का उपयोग करते हैं। मान लीजिए प्रत्येक गेंद की संहति m है तथा दीवार से टकराने से पूर्व और टकराने के पश्चात् दोनों गेंदों की चाल u है।

प्रकरण (a) — गेंद दीवार से लंबवत् टकराती है:

(px)आरंभिक = mu, (py)आरंभिक = 0
(px)अंतिम = −mu, (py)अंतिम = 0

आवेग का x-घटक = −2mu, y-घटक = 0। दीवार के कारण गेंद पर लगा बल दीवार के अभिलंबवत्, ऋणात्मक x-दिशा के अनुदिश है। न्यूटन के तृतीय नियम से, गेंद के कारण दीवार पर लगा बल दीवार के अभिलंबवत्, धनात्मक x-दिशा के अनुदिश है।

प्रकरण (b) — गेंद 30° के कोण पर टकराती है:

(px)आरंभिक = mu cos30°, (py)आरंभिक = −mu sin30°
(px)अंतिम = −mu cos30°, (py)अंतिम = −mu sin30°

टकराने के पश्चात् px का चिह्न परिवर्तित हो जाता है जबकि py का नहीं। आवेग का x-घटक = −2mu cos30°, y-घटक = 0। यह भी दीवार के अभिलंबवत् दिशा में है।

दोनों प्रकरणों में दीवार पर लगा बल दीवार के अभिलंबवत् ही है (30° का कोण नहीं बनाता — यह एक सामान्य गलत धारणा है)।

प्रकरण (a) व (b) में गेंद को दीवार द्वारा प्रदान किए गए आवेगों के परिमाणों का अनुपात है:

2mu / (2mu cos30°) = 2/√3 ≈ 1.2

उत्तर: अनुपात ≈ 1.2 : 1

4.7 संवेग-संरक्षण

न्यूटन के द्वितीय तथा तृतीय नियम से निकलने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिणाम।

न्यूटन के गति के द्वितीय तथा तृतीय नियम एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिणाम — संवेग-संरक्षण नियम — की ओर अग्रसर करते हैं। एक परिचित उदाहरण पर विचार कीजिए: किसी बंदूक से एक गोली छोड़ी जाती है। यदि बंदूक द्वारा गोली पर लगा बल F है, तो न्यूटन के तृतीय नियम के अनुसार गोली द्वारा बंदूक पर लगने वाला बल −F है।

दोनों बल समान समय अंतराल Δt तक कार्य करते हैं। द्वितीय नियम के अनुसार गोली का संवेग परिवर्तन FΔt है तथा बंदूक का संवेग परिवर्तन −FΔt है। चूंकि आरंभ में दोनों विराम में हैं, अतः संवेग परिवर्तन अंतिम संवेग के बराबर है। इस प्रकार यदि छोड़ने के पश्चात् गोली का संवेग pb है तथा बंदूक का प्रतिक्षेप संवेग pg है, तो:

pg = −pb अर्थात् pg + pb = 0

अर्थात्, गोली-बंदूक निकाय का कुल संवेग संरक्षित रहता है।

संवेग-संरक्षण नियम अन्योन्य क्रिया करने वाले कणों के किसी वियुक्त निकाय (अर्थात् कोई निकाय जिस पर कोई बाह्य बल नहीं लगता) का कुल संवेग संरक्षित रहता है।

दो पिंडों A व B पर विचार कीजिए जिनके आरंभिक संवेग pA तथा pB हैं। दोनों टकराते हैं और पृथक हो जाते हैं। यदि पृथक होने के पश्चात् उनके अंतिम संवेग क्रमशः p'A तथा p'B हैं, तो द्वितीय नियम के द्वारा:

FABΔt = p'A − pA    तथा    FBAΔt = p'B − pB

चूंकि FAB = −FBA (तृतीय नियम द्वारा):

p'A + p'B = (pA + pB)    (समीकरण 4.9)
महत्वपूर्ण यह दर्शाता है कि वियुक्त निकाय (A+B) का कुल अंतिम संवेग उसके आरंभिक संवेग के बराबर है। ध्यान रहे, यह नियम दोनों प्रकार के संघट्टों — प्रत्यास्थ तथा अप्रत्यास्थ, पर लागू होता है। प्रत्यास्थ संघट्ट में दूसरी शर्त है कि निकाय की कुल आरंभिक गतिज ऊर्जा निकाय की कुल अंतिम गतिज ऊर्जा के बराबर होती है।

4.8 किसी कण की साम्यावस्था

जब पिंड पर नेट बाह्य बल शून्य होता है।

यांत्रिकी में किसी कण की साम्यावस्था का उल्लेख उन स्थितियों के लिए किया जाता है जिनमें कण पर नेट बाह्य बल शून्य हो। प्रथम नियम के अनुसार, इसका अर्थ है कि या तो कण विराम में है अथवा एक समान गति में है।

यदि किसी कण पर दो बल F₁ तथा F₂ कार्यरत हैं, तो साम्यावस्था के लिए आवश्यक है कि:

F₁ = −F₂    (समीकरण 4.10)

तीन संगामी बलों F₁, F₂ तथा F₃ के अधीन साम्यावस्था (अथवा संतुलन) के लिए इन तीनों बलों का सदिश योग शून्य होना चाहिए:

F₁ + F₂ + F₃ = 0    (समीकरण 4.11)

दूसरे शब्दों में, बलों के समांतर चतुर्भुज नियम द्वारा प्राप्त किन्हीं दो बलों, मान लीजिए F₁ तथा F₂, का परिणामी तीसरे बल F₃ के समान एवं विपरीत होना चाहिए। इस परिणाम का व्यापीकरण बलों की किसी भी संख्या के लिए किया जा सकता है — आरोपित बलों F₁, F₂, F₃, ..., Fn के अधीन कोई कण साम्यावस्था में होगा यदि उन बलों को n-भुजा के बंद चक्रीय बहुभुज की भुजाओं द्वारा निरूपित किया जा सके।

F₁ₓ + F₂ₓ + F₃ₓ = 0
F₁ᵧ + F₂ᵧ + F₃ᵧ = 0
F₁𝓏 + F₂𝓏 + F₃𝓏 = 0    (समीकरण 4.12)
उदाहरण 4.6

6 kg संहति के किसी पिंड को छत से 2 m लंबाई की डोरी द्वारा लटकाया गया है। डोरी के मध्य-बिंदु पर क्षैतिज दिशा में 50 N बल लगाया जाता है। साम्यावस्था में डोरी ऊर्ध्वाधर से कितना कोण बनाती है? (g = 10 m s⁻² लीजिए)। डोरी की संहति को नगण्य मानिए।

हल: सर्वप्रथम भार W की साम्यावस्था पर विचार कीजिए। यह पिंड का भार है, जो नीचे की ओर T₂ ताने द्वारा संतुलित होता है:

T₂ = mg = 6 × 10 = 60 N

अब तीन बलों — तनाव T₁ तथा T₂, तथा क्षैतिज बल 50 N की क्रियाओं के अधीन डोरी के मध्य-बिंदु P की साम्यावस्था पर विचार कीजिए। परिणामी बल के क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर घटकों को पृथक-पृथक शून्य होना चाहिए:

T₁ cosθ = T₂ = 60 N
T₁ sinθ = 50 N

इन दोनों समीकरणों को भाग देने पर:

tanθ = 50/60 = 5/6    ⟹    θ = tan⁻¹(5/6) ≈ 40°

ध्यान दीजिए, उत्तर न तो डोरी (जिसका द्रव्यमान नगण्य माना है) की लंबाई पर निर्भर करता है और न ही उस बिंदु की स्थिति पर निर्भर करता है जिस पर क्षैतिज बल लगाया गया है। उत्तर: θ = 40°

4.9 यांत्रिकी में सामान्य बल

संपर्क बल, घर्षण, स्थैतिक-गतिज घर्षण, तथा लोटनिक घर्षण।

यांत्रिकी में हमारा सामना कई प्रकार के बलों से होता है। गुरुत्वाकर्षण बल सर्वव्यापक है — पृथ्वी पर स्थित सभी वस्तुएँ पृथ्वी के गुरुत्व बल का अनुभव करती हैं। यह बल दूरी पर बिना मध्यवर्ती माध्यम के कार्य कर सकता है।

यांत्रिकी में सामान्यतः आने वाले सभी बल संपर्क बल (contact force) हैं — जैसा कि नाम से संकेत मिलता है, किसी पिंड पर संपर्क बल किसी अन्य पिंड ठोस अथवा तरल के संपर्क द्वारा उत्पन्न होता है।

  • अभिलंब बल (Normal force): संपर्क-पृष्ठों के अभिलंबवत् संपर्क बल का घटक
  • घर्षण बल (Friction): संपर्क-पृष्ठों के समांतर घटक
  • उत्प्लावन बल: जब ठोस को तरल में डुबाते हैं, तो एक उपरिमुखी बल जो उस ठोस द्वारा विस्थापित तरल के भार के बराबर होता है
  • श्यान बल, वायु-प्रतिरोध भी संपर्क बलों के उदाहरण हैं

दो सामान्य बल कमानी बल तथा डोरी में तनाव हैं। कमानी बल F को F = −kx द्वारा व्यक्त किया जाता है, यहाँ x विस्थापन है तथा k को कमानी-स्थिरांक कहते हैं।

मूल बलों की संख्या प्रकृति में केवल चार मूल बल हैं — गुरुत्वाकर्षण, विद्युत-चुम्बकीय, दुर्बल, तथा प्रबल। यांत्रिकी में केवल गुरुत्वाकर्षण तथा वैद्युत बल ही प्रासंगिक होते हैं। यांत्रिकी के विभिन्न संपर्क बल (घर्षण, तनाव, अभिलंब बल आदि) मूल रूप से वैद्युत बलों से ही उत्पन्न होते हैं — सूक्ष्म स्तर पर सभी पिंड आवेशित अवयवों (नाभिकों तथा इलेक्ट्रॉनों) से मिलकर बने हैं।

4.9.1 घर्षण (Friction)

पुनः क्षैतिज मेज़ पर रखे m संहति के पिंड वाले उदाहरण पर विचार करें। गुरुत्व बल (mg) को मेज़ का अभिलंब बल (N) निरस्त कर देता है। अब मानिए कि पिंड पर कोई बाह्य बल F क्षैतिजतः आरोपित किया जाता है। अनुभव से हमें ज्ञात है कि परिमाण में छोटा बल आरोपित करने पर पिंड को गतिशील करने में अपर्याप्त हो सकता है।

यह विरोधी बल fs, जो मेज़ के संपर्क में पिंड के पृष्ठ के समांतर लगता है, घर्षण बल अथवा केवल घर्षण कहलाता है।

स्थैतिक घर्षण (Static Friction)

ध्यान दीजिए, स्थैतिक घर्षण का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। जब तक कोई बाह्य बल आरोपित नहीं होता, तब तक स्थैतिक घर्षण भी नहीं होता। पिंड को विराम में रखते हुए जब आरोपित बल F बढ़ता है, आरोपित बल के समान व विपरीत दिशा में रहते हुए fs भी एक सीमा तक बढ़ता है।

(fs)अधिकतम = μsN    (समीकरण 4.13)

जहाँ μs = स्थैतिक घर्षण गुणांक

fs ≤ μsN    (समीकरण 4.14)

गतिज (सर्पी) घर्षण (Kinetic Friction)

यदि आरोपित बल F का मान (fs)अधिकतम से अधिक हो जाता है, तो पिंड पृष्ठ पर सरकना आरंभ कर देता है। जब आपेक्ष गति आरंभ हो जाती है, घर्षण बल अधिकतम स्थैतिक घर्षण बल से कम हो जाता है — इसे गतिज अथवा सर्पी घर्षण कहते हैं:

fk = μkN    (समीकरण 4.15)

जहाँ सदैव μk < μs होता है।

गुणस्थैतिक घर्षण (fs)गतिज घर्षण (fk)
कब कार्यरतजब सापेक्ष गति नहीं हैजब सापेक्ष गति हो रही है
निर्भरताआरोपित बल पर (स्वयं समायोजी)केवल संपर्क सतहों की प्रकृति पर
क्षेत्रफल पर निर्भरतानहींनहीं
तुलनात्मक मानअधिकतम मान अधिकμk सदैव μs से कम
उदाहरण 4.7

कोई बॉक्स रेलगाड़ी के फर्श पर स्थिर रखा है। यदि बॉक्स तथा रेलगाड़ी के फर्श के बीच स्थैतिक घर्षण गुणांक 0.15 है, तो रेलगाड़ी का वह अधिकतम त्वरण ज्ञात कीजिए जो बॉक्स को रेलगाड़ी के फर्श पर स्थिर रखने के लिए आवश्यक है।

हल: चूंकि बॉक्स में त्वरण स्थैतिक घर्षण के कारण ही है, अतः:

ma = fs ≤ μsN = μsmg    ⟹    a ≤ μsg
aअधिकतम = μsg = 0.15 × 10 = 1.5 m s⁻²
उदाहरण 4.8

4 kg का कोई गुटका एक क्षैतिज समतल पर रखा है। समतल को धीरे-धीरे तब तक आनत किया जाता है जब तक क्षैतिज से किसी कोण θ=15° पर वह गुटका सरकना आरंभ नहीं कर देता। पृष्ठ और गुटके के बीच स्थैतिक घर्षण गुणांक क्या है?

हल: आनत समतल पर विरामावस्था में रखे m संहति के गुटके पर कार्यरत बल हैं: (i) गुटके का भार mg ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर, (ii) समतल द्वारा गुटके पर लगाया गया अभिलंब बल N, तथा (iii) समुपस्थित गति का विरोध करने वाला स्थैतिक घर्षण बल fs।

भार mg को दो दिशाओं में अपघटित करने पर:

mg sinθ = fs    तथा    mg cosθ = N

जैसे-जैसे θ बढ़ता है, स्वसमायोजी घर्षण बल fs तब तक बढ़ता है जब तक θ=θअधिकतम पर यह अपना अधिकतम मान प्राप्त नहीं कर लेता, (fs)अधिकतम = μsN। अतः:

tanθअधिकतम = μs    अथवा    θअधिकतम = tan⁻¹μs

θअधिकतम = 15° के लिए: μs = tan15° ≈ 0.27

ध्यान दीजिए, θअधिकतम केवल μs पर ही निर्भर करता है, यह गुटके की संहति पर निर्भर नहीं करता।

उदाहरण 4.9

ब्लॉक-ट्राली निकाय का त्वरण क्या है, यदि ट्राली और पृष्ठ के बीच गतिज घर्षण गुणांक 0.04 है? डोरी में तनाव क्या है? (g=10 m s⁻² लीजिए), डोरी की संहति नगण्य मानिए। (20 kg की ट्राली क्षैतिज मेज़ पर, फुल्ली पर से गुज़रती डोरी से 3 kg का ब्लॉक लटका हुआ)

हल: चूंकि डोरी की लंबाई नियत है तथा घिरनी चिकनी है, 3 kg के ब्लॉक तथा 20 kg की ट्राली दोनों के त्वरणों के परिमाण समान हैं। ब्लॉक की गति पर द्वितीय नियम का अनुप्रयोग करने पर:

30 − T = 3a   ... (i)

ट्राली की गति पर द्वितीय नियम का अनुप्रयोग करने पर:

T − fk = 20a   ... (ii)

यहाँ fk = μkN, जहाँ μk = 0.04, तथा N = 20 × 10 = 200 N ⟹ fk = 0.04 × 200 = 8 N

अतः समीकरण (ii): T − 8 = 20a

समीकरण (i) व (ii) से (T को हटाकर): 30 − 8 = 3a + 20a ⟹ a = 22/23 m s⁻² ≈ 0.96 m s⁻²

T का मान समीकरण (i) से: T = 30 − 3(0.96) = 27.1 N

लोटनिक घर्षण (Rolling Friction)

सिद्धांत रूप से क्षैतिज समतल पर एक वलय (रिंग) के समान वस्तु अथवा गोल गेंद जैसे पिंड जो बिना सरके केवल लोटन कर रहा (लुढ़क) है, पर किसी भी प्रकार का कोई घर्षण बल नहीं लगेगा। इस आदर्श स्थिति में गतिज अथवा स्थैतिक घर्षण शून्य होता है तथा पिंड को एकसमान वेग से निरंतर लोटनिक गति करते रहना चाहिए।

व्यवहार में व्यवहार में ऐसा नहीं होता — गति में कुछ न कुछ अवरोध (लोटनिक घर्षण) अवश्य रहता है। समान भार के पिंड के लिए लोटनिक घर्षण सदैव ही सर्पी अथवा स्थैतिक घर्षण की तुलना में बहुत कम (2 अथवा 3 कोटि तक) होता है। यही कारण है कि मानव सभ्यता के इतिहास में भारी बोझों के परिवहन के लिए पहिए की खोज एक बड़ा मील का पत्थर मानी गई है।

4.10 वर्तुल (वृत्तीय) गति

अभिकेंद्र बल तथा समतल एवं ढालू सड़क पर कार की गति।

अध्याय 3 में हमने देखा था कि R त्रिज्या के किसी वृत्त में एकसमान चाल v से गतिमान किसी पिंड का त्वरण v²/R वृत्त के केंद्र की ओर निर्दिष्ट होता है। द्वितीय नियम के अनुसार इस त्वरण को प्रदान करने वाला बल है:

fc = mv²/R    (समीकरण 4.16)

— इसे अभिकेंद्र बल (Centripetal Force) कहते हैं।

केंद्र की ओर निर्दिष्ट इस बल को अभिकेंद्र बल कहते हैं। डोरी की सहायता से वृत्त में घूर्णन करने वाले पत्थर को डोरी में तनाव अभिकेंद्र बल प्रदान करता है। सूर्य के चारों ओर किसी ग्रह की गति के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल सूर्य के कारण उस ग्रह पर लगे गुरुत्वाकर्षण से मिलता है। किसी क्षैतिज सड़क पर कार को वृत्तीय मोड़ लेने के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल घर्षण बल प्रदान करता है।

समतल सड़क पर कार की गति

कार पर तीन बल आरोपित हैं: (i) कार का भार mg, (ii) अभिलंब प्रतिक्रिया N, (iii) घर्षण बल f। क्योंकि ऊर्ध्वाधर दिशा में कोई त्वरण नहीं है:

N − mg = 0    ⟹    N = mg   (समीकरण 4.17)

वर्तुल गति के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल सड़क के पृष्ठ के अनुदिश है — यह स्थैतिक घर्षण द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए। समीकरण (4.14) तथा (4.16) से:

f ≤ μsN = mv²/R    ⟹    v² ≤ μsRg
vअधिकतम = √(μsRg)    (समीकरण 4.18)

— समतल सड़क पर वर्तुल गति की अधिकतम संभव चाल

ढालू सड़क पर कार की गति

यदि सड़क ढालू है, तो हम वर्तुल गति में घर्षण के योगदान को घटा सकते हैं। ऊर्ध्वाधर दिशा में कोई त्वरण नहीं होने से नेट बल शून्य होगा:

N cosθ = mg + f sinθ   ...(4.19a)
N sinθ + f cosθ = mv²/R   ...(4.19b)

इन समीकरणों को हल करने पर अधिकतम चाल के लिए:

vअधिकतम = [Rg (μs+tanθ)/(1−μstanθ)]1/2    (समीकरण 4.21)

ढालू सड़क पर कार की अधिकतम चाल समतल सड़क पर कार की अधिकतम संभव चाल से अधिक है। यदि μs = 0 (अर्थात् बिना घर्षण के भी):

v₀ = (Rg tanθ)1/2    (समीकरण 4.22)

— अनुकूलतम चाल (घर्षण की आवश्यकता नहीं)

इस चाल पर आवश्यक अभिकेंद्र बल प्रदान करने के लिए घर्षण बल की कोई आवश्यकता नहीं होती — इससे टायरों की कम घिसाई होती है। v < v₀ के लिए घर्षण बल उपरिमुखी होगा तथा कार को स्थिर स्थिति में केवल तभी पार्क किया जा सकता है जब tanθ ≤ μs हो।

उदाहरण 4.10

18 km/h की चाल से समतल सड़क पर गतिमान कोई साइकिल सवार बिना चाल को कम किए 3 m त्रिज्या का तीव्र वर्तुल मोड़ लेता है। टायरों तथा सड़क के बीच स्थैतिक घर्षण गुणांक 0.1 है। क्या साइकिल सवार मोड़ लेते समय फिसल कर गिर जाएगा?

हल: साइकिल सवार के न फिसलने की शर्त है: v² ≤ μsRg

यहाँ R = 3 m, g = 9.8 m s⁻², μs = 0.1

μsRg = 0.1 × 3 × 9.8 = 2.94 m²s⁻²

v = 18 km/h = 5 m s⁻¹, अतः v² = 25 m²s⁻²

चूंकि v² (25) > μsRg (2.94), शर्त का पालन नहीं होता।

उत्तर: साइकिल सवार तीव्र मोड़ लेते समय फिसलकर गिरेगा

उदाहरण 4.11

300 m त्रिज्या वाले किसी वृत्ताकार दौड़ के मैदान का ढाल 15° है। यदि मैदान और रेसकार के पहियों के बीच घर्षण गुणांक 0.2 है, तो (a) टायरों को घिसने से बचाने के लिए रेसकार की अनुकूलतम चाल, तथा (b) फिसलने से बचने के लिए अधिकतम अनुमेय चाल क्या है?

हल (a) अनुकूलतम चाल: इस चाल पर अभिलंब बल का घटक ही आवश्यक अभिकेंद्र बल प्रदान करने के लिए पर्याप्त होता है, घर्षण बल की कोई आवश्यकता नहीं होती:

v₀ = (Rg tanθ)1/2

यहाँ R = 300 m, θ = 15°, g = 9.8 m s⁻²

v₀ = (300 × 9.8 × tan15°)1/2 = 28.1 m s⁻¹

(b) अधिकतम अनुमेय चाल:

vअधिकतम = [Rg(μs+tanθ)/(1−μstanθ)]1/2 = 38.1 m s⁻¹

4.11 यांत्रिकी में समस्याओं को हल करना

बल निर्देशक आरेख — यांत्रिकी की समस्याओं को व्यवस्थित रूप से हल करने की कुंजी।

यांत्रिकी की किसी प्ररूपी समस्या को सुव्यवस्थित ढंग से हल करने के लिए हमें निम्नलिखित चरणों को अपनाना चाहिए:

  1. पिंडों के संयोजन के विभिन्न भागों — संबंधों, टेकों आदि को दर्शाने वाला संक्षिप्त योजनाबद्ध आरेख खींचिए।
  2. संयोजन के किसी सुविधाजनक भाग को निकाय के रूप में चुनिए।
  3. एक पृथक आरेख खींचिए जिसमें केवल निकाय तथा पिंडों के संयोजन के शेष भागों द्वारा निकाय पर आरोपित सभी बलों को सम्मिलित करके दर्शाया गया हो। निकाय द्वारा वातावरण पर आरोपित बलों को इसमें सम्मिलित न कीजिए। इस प्रकार के आरेख को "बल-निर्देशक आरेख" कहते हैं।
  4. बल निर्देशक आरेख में बलों से संबंधित केवल वही सूचनाएँ सम्मिलित कीजिए जो या तो दी गई हैं अथवा जो निर्विवाद निश्चित हैं। शेष को अज्ञात माना जाना चाहिए।
  5. यदि आवश्यक हो, तो संयोजन से किसी अन्य निकाय के लिए भी यही विधि अपनाइए — तृतीय नियम का प्रयोग करके।
उदाहरण 4.12

किसी कोमल क्षैतिज फर्श पर 2 kg संहति का लकड़ी का गुटका रखा है। जब इस गुटके के ऊपर 25 kg संहति का लोहे का बेलन रखा जाता है तो फर्श स्थिर गति से नीचे धँसता है तथा गुटका व बेलन एक साथ 0.1 m s⁻² त्वरण से नीचे जाते हैं। गुटके की फर्श पर क्रिया (a) फर्श के धँसने से पूर्व तथा (b) फर्श के धँसने के पश्चात् क्या है? g=10 m s⁻² लीजिए।

हल (a) — फर्श के धँसने से पूर्व: फर्श पर गुटका विरामावस्था में है। गुटके पर दो बल हैं — पृथ्वी द्वारा आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल = 2×10 = 20 N, तथा गुटके पर फर्श का अभिलंब बल R। प्रथम नियम के द्वारा गुटके पर आरोपित नेट बल शून्य होना चाहिए, अर्थात् R = 20 N। तृतीय नियम का उपयोग करने पर, गुटके की फर्श पर क्रिया = 20 N, दिशा ऊर्ध्वाधरतः अधोमुखी।

(b) — फर्श के धँसने के पश्चात्: निकाय (गुटका+बेलन) नीचे की ओर 0.1 m s⁻² त्वरण से धँस रहा है। निकाय पर दो बल हैं — पृथ्वी के कारण गुरुत्व बल = (2+25)×10 = 270 N, तथा फर्श का अभिलंब बल R'। निकाय पर द्वितीय नियम का अनुप्रयोग करने पर:

270 − R' = 27 × 0.1 ⟹ R' = 267.3 N

तृतीय नियम के अनुसार फर्श पर निकाय की क्रिया 267.3 N के बराबर है, दिशा ऊर्ध्वाधरतः अधोमुखी।

क्रिया-प्रतिक्रिया युगल (a) के लिए: (i) पृथ्वी द्वारा गुटके पर गुरुत्व बल (20N, क्रिया) तथा गुटके द्वारा पृथ्वी पर गुरुत्व बल 20N (उपरिमुखी)। (ii) गुटके द्वारा फर्श पर आरोपित बल (क्रिया); फर्श द्वारा गुटके पर आरोपित बल (प्रतिक्रिया)।

(b) के लिए: (i) पृथ्वी द्वारा निकाय पर गुरुत्व बल (270N, क्रिया); निकाय द्वारा पृथ्वी पर प्रतिक्रिया 270N। (ii) निकाय द्वारा फर्श पर बल (क्रिया); फर्श द्वारा निकाय पर बल (प्रतिक्रिया)। इसके अतिरिक्त बेलन द्वारा गुटके पर बल तथा गुटके द्वारा बेलन पर बल भी क्रिया-प्रतिक्रिया का एक युगल बनाते हैं।

याद रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य किसी क्रिया-प्रतिक्रिया युगल की रचना दो पिंडों के बीच पारस्परिक बलों से होती है, जो सदैव परिमाण में समान तथा दिशा में विपरीत होते हैं। एक ही पिंड पर दो बलों को, जो किसी विशेष परिस्थिति में परिमाण में समान व दिशा में विपरीत हो सकते हैं, से किसी क्रिया-प्रतिक्रिया युगल की रचना नहीं हो सकती! उदाहरण के लिए, mg तथा R में समानता का तृतीय नियम से कोई संबंध नहीं है — ये केवल तभी बराबर हैं जब पिंड साम्यावस्था में हो।

§ सारांश

पूरे अध्याय का संक्षिप्त पुनरावलोकन।

1. अरस्तू की भ्रामकता

यह दृष्टिकोण कि किसी पिंड की एकसमान गति रखने के लिए बल आवश्यक है, गलत है। व्यवहार में विरोधी घर्षण बल को प्रभावहीन करने के लिए ही बल की आवश्यकता होती है।

2. जड़त्व का नियम (प्रथम नियम)

प्रत्येक पिंड तब तक विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एकसमान गति में रहता है जब तक कोई बाह्य बल उसे अन्यथा व्यवहार करने को विवश न करे। यदि नेट बाह्य बल शून्य है तो त्वरण शून्य होता है।

3. संवेग

p = mv — संहति और वेग का गुणनफल, एक सदिश राशि।

4. द्वितीय नियम

F = dp/dt = ma. संवेग परिवर्तन की दर आरोपित बल के अनुक्रमानुपाती तथा उसी दिशा में होती है। यह एक स्थानीय सदिश नियम है।

5. आवेग

आवेग = बल × समयावधि = संवेग परिवर्तन। बड़े बल जो अल्प काल के लिए कार्य करते हैं उन्हें आवेगी बल कहते हैं।

6. तृतीय नियम

प्रत्येक क्रिया की समान तथा विपरीत प्रतिक्रिया होती है। क्रिया और प्रतिक्रिया समक्षणिक बल हैं, दो भिन्न पिंडों पर कार्य करते हैं, और इनमें कारण-प्रभाव संबंध नहीं होता।

7. संवेग-संरक्षण

कणों के किसी वियुक्त निकाय का कुल संवेग संरक्षित रहता है — द्वितीय व तृतीय नियम से व्युत्पन्न।

8. घर्षण

घर्षण बल दो संपर्क पृष्ठों के बीच आपेक्षिक गति का विरोध करता है। fs ≤ μsN (स्थैतिक), fk = μkN (गतिज)। μk सामान्यतः μs से कम होता है।

महत्वपूर्ण राशियाँ, प्रतीक व सूत्र

राशिप्रतीकमात्रकविमाएँसूत्र/टिप्पणी
संवेगpkg m s⁻¹ अथवा N s[MLT⁻¹]सदिश; p = mv
बलFN[MLT⁻²]F = ma (द्वितीय नियम)
आवेग—kg m s⁻¹ अथवा N s[MLT⁻¹]आवेग = बल × समय = संवेग परिवर्तन
स्थैतिक घर्षणfsN[MLT⁻²]fs ≤ μsN
गतिज घर्षणfkN[MLT⁻²]fk = μkN

§ विचारणीय विषय

आम भ्रांतियाँ जिन्हें स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है — NEET/JEE में अक्सर इन्हीं पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं।

  1. बल सदैव गति की दिशा में नहीं होता। परिस्थितियों पर निर्भर करते हुए, F, v के अनुदिश, v के विपरीत, v के अभिलंबवत् अथवा v से कोई अन्य कोण बनाते हुए हो सकता है। प्रत्येक स्थिति में यह त्वरण के समांतर होता है।
  2. यदि किसी क्षण v = 0 है, अर्थात् यदि कोई पिंड क्षणिक विराम में है, तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि उस क्षण पर बल अथवा त्वरण अवश्य ही शून्य हों। उदाहरण के लिए, जब ऊर्ध्वाधर ऊपर फेंकी गई कोई गेंद अपनी अधिकतम ऊँचाई पर पहुँचती है, तो v = 0 होता है, परंतु उस गेंद पर mg के बराबर बल निरंतर लगा रहता है तथा त्वरण शून्य नहीं होता, यह g ही होता है।
  3. किसी दिए गए समय पर किसी पिंड पर आरोपित बल उस समय उस पिंड के स्थान की अवस्थिति द्वारा ज्ञात किया जाता है। कोई पिंड बल का वहन अपनी गति के पूर्व इतिहास से नहीं करता।
  4. गति के द्वितीय नियम F = ma में F पिंड के बाहर सभी भौतिक साधनों द्वारा आरोपित नेट बल है। ma को F के अतिरिक्त अन्य कोई बल नहीं समझा जाना चाहिए।
  5. अभिकेंद्र बल को कोई अन्य प्रकार का बल नहीं समझना चाहिए। यह मात्र एक नाम है जो उस बल को दिया गया है जो वर्तुल मार्ग पर गतिमान किसी पिंड को त्रिज्यतः केंद्र की ओर त्वरण प्रदान करता है।
  6. स्थैतिक घर्षण बल अपनी सीमा μsN (fs ≤ μsN) तक एक स्वयं समायोजी बल है। बिना यह सुनिश्चित किए कि स्थैतिक घर्षण का अधिकतम मान कार्यरत हो गया है, fs = μsN कदापि मत रखिए।
  7. मेज़ पर रखे पिंड के लिए सुपरिचित समीकरण mg = R केवल तभी सही है, जब पिंड साम्यावस्था में हो। ये दोनों बल, mg तथा R, भिन्न भी हो सकते हैं (जैसा कि त्वरित लिफ्ट में रखे पिंड के उदाहरण में)। mg और R में समानता का तृतीय नियम से कोई संबंध नहीं है।
  8. गति के तृतीय नियम में पद 'क्रिया' तथा 'प्रतिक्रिया' का अर्थ किसी पिंडों के युगल के बीच समक्षणिक पारस्परिक बलों से है। क्रिया न तो प्रतिक्रिया से पहले घटित होती है और न ही प्रतिक्रिया का कारण होती है। क्रिया तथा प्रतिक्रिया भिन्न पिंडों पर कार्य करती हैं।
  9. विभिन्न पद जैसे 'घर्षण', 'अभिलंब प्रतिक्रिया', 'तनाव', 'वायु-प्रतिरोध', 'श्यान कर्षण', 'प्रणोद', 'उत्प्लावन बल', 'भार', 'अभिकेंद्र बल' — इन सभी का तात्पर्य विभिन्न संदर्भों में 'बल' ही होता है।
  10. गति के द्वितीय नियम को लागू करने के लिए, सजीव तथा निर्जीव पिंडों के बीच कोई वैचारिक भिन्नता नहीं होती। किसी सजीव पिंड, जैसे किसी मानव को भी त्वरित करने के लिए बाह्य बल चाहिए।
  11. भौतिकी में 'बल' की वस्तुनिष्ठ संकल्पना तथा 'बल के अनुभव' की व्यक्तिनिष्ठ संकल्पना के बीच कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। किसी 'मेरी-गो-राउंड' में हमारे शरीर के सभी अंगों पर अंदर की ओर बल लगता है, परंतु हमें बाहर की ओर धकेले जाने का अनुभव होता है (यह जड़त्व के कारण होता है, कोई वास्तविक बाह्य बल नहीं)।

✏️ अध्याय अभ्यास — संपूर्ण हल (4.1 – 4.23)

NCERT पाठ्यपुस्तक के सभी 23 अभ्यास प्रश्नों का विस्तृत हल (सरलता के लिए g = 10 m s⁻² लिया गया है)।

4.1 निम्नलिखित पर कार्यरत नेट बल का परिमाण व उसकी दिशा लिखिए: (a) एकसमान चाल से नीचे गिरती वर्षा की बूंद, (b) जल में तैरता 10 g का कार्क, (c) कुशलता से आकाश में स्थिर रोकी गई पतंग, (d) 30 km/h के एकसमान वेग से ऊबड़-खाबड़ सड़क पर गतिशील कार, (e) सभी गुरुत्वीय पिंडों से दूर तथा वैद्युत-चुंबकीय क्षेत्रों से मुक्त अंतरिक्ष में तीव्र चाल वाला इलेक्ट्रॉन।

(a) एकसमान चाल से नीचे गिरती वर्षा की बूंद का त्वरण शून्य है (वेग स्थिर है) — प्रथम नियम के अनुसार नेट बल = शून्य। (यहाँ गुरुत्व बल को वायु प्रतिरोध निरस्त कर देता है)

(b) जल में तैरता कार्क विरामावस्था में है (साम्यावस्था) — नेट बल = शून्य (गुरुत्व बल को उत्प्लावन बल निरस्त करता है)

(c) कुशलता से स्थिर रोकी गई पतंग विरामावस्था में है — नेट बल = शून्य

(d) एकसमान वेग से गतिशील कार का त्वरण शून्य है, भले ही सड़क ऊबड़-खाबड़ हो — नेट बल = शून्य

(e) सभी गुरुत्वीय पिंडों से दूर तथा क्षेत्रों से मुक्त इलेक्ट्रॉन पर कोई बाह्य बल कार्यरत नहीं है — नेट बल = शून्य

सभी प्रकरणों में नेट बल = शून्य

4.2 0.05 kg का कंकड़ ऊर्ध्वाधर ऊपर फेंका गया है। नीचे दी गई प्रत्येक परिस्थिति में कंकड़ पर लग रहे नेट बल का परिमाण व दिशा लिखिए: (a) उपरिमुखी गति के समय, (b) अधोमुखी गति के समय, (c) उच्चतम बिंदु पर जहाँ क्षण भर के लिए यह विराम में रहता है। यदि कंकड़ को क्षैतिज दिशा से 45° कोण पर फेंका जाए, तो क्या आपके उत्तर में कोई परिवर्तन होगा? वायु-प्रतिरोध को उपेक्षणीय मानिए।

वायु प्रतिरोध उपेक्षणीय होने पर, कंकड़ पर केवल गुरुत्वाकर्षण बल कार्य करता है, चाहे वह ऊपर जा रहा हो, नीचे आ रहा हो, या उच्चतम बिंदु पर हो।

बल का परिमाण: F = mg = 0.05 × 10 = 0.5 N, दिशा सदैव ऊर्ध्वाधर अधोमुखी।

(a) उपरिमुखी गति: F = 0.5 N, अधोमुखी (मंदन उत्पन्न करता है)

(b) अधोमुखी गति: F = 0.5 N, अधोमुखी (त्वरण उत्पन्न करता है)

(c) उच्चतम बिंदु पर: F = 0.5 N, अधोमुखी (v=0 होने पर भी बल शून्य नहीं है)

यदि 45° के कोण पर फेंका जाए, तब भी कोई परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल प्रक्षेप्य के प्रक्षेप कोण पर निर्भर नहीं करता।

4.3 0.1 kg के पत्थर पर कार्यरत नेट बल का परिमाण व दिशा ज्ञात कीजिए: (a) स्थिर रेलगाड़ी की खिड़की से गिराने के तुरंत पश्चात्, (b) 36 km/h के एकसमान वेग से गतिशील रेलगाड़ी से गिराने के तुरंत पश्चात्, (c) 1 m/s² त्वरण से गतिशील रेलगाड़ी से गिराने के तुरंत पश्चात्, (d) 1 m/s² त्वरण से गतिशील रेलगाड़ी के फर्श पर पड़ा हो तथा रेलगाड़ी के सापेक्ष विराम में हो।

(a),(b),(c): जिस क्षण पत्थर रेलगाड़ी से बाहर आता है, उसी क्षण से रेलगाड़ी का कोई प्रभाव नहीं रहता (पत्थर बल का वहन पूर्व इतिहास से नहीं करता)। अतः तीनों में केवल गुरुत्व बल: F = mg = 0.1 × 10 = 1 N, ऊर्ध्वाधर अधोमुखी

(d): पत्थर त्वरित रेलगाड़ी के फर्श पर है और उसके सापेक्ष विराम में है — अर्थात् पत्थर भी 1 m/s² से त्वरित हो रहा है। इसलिए क्षैतिज बल भी कार्यरत: Fx = 0.1 × 1 = 0.1 N

Fनेट = √[(1)² + (0.1)²] = √1.01 ≈ 1.0 N

दिशा: ऊर्ध्वाधर से θ = tan⁻¹(0.1) ≈ 5.7° झुकी, रेलगाड़ी की दिशा में।

4.4 l लंबाई की डोरी का एक सिरा m संहति के कण से तथा दूसरा सिरा चिकनी क्षैतिज मेज़ पर लगी खूँटी से बँधा है। यदि कण v चाल से वृत्त में गति करता है तो कण पर (केंद्र की ओर निर्देशित) नेट बल है: (i) T (ii) T − mv²/l (iii) T + mv²/l (iv) 0. T डोरी में तनाव है।

चिकनी मेज़ पर घर्षण नहीं है, अतः क्षैतिज दिशा में डोरी का तनाव T ही एकमात्र बल है, जो कण को वृत्तीय गति हेतु आवश्यक अभिकेंद्र बल प्रदान करता है।

अतः नेट बल (केंद्र की ओर) = T ही है, जो कि mv²/l के बराबर होता है।

सही विकल्प: (i) T

4.5 15 m s⁻¹ की आरंभिक चाल से गतिशील 20 kg के पिंड पर 50 N का स्थाई मंदन बल आरोपित किया गया। पिंड को रोकने में कितना समय लगेगा?

u = 15 m/s, m = 20 kg, F = −50 N (मंदन, गति के विपरीत)

a = F/m = −50/20 = −2.5 m s⁻²
v = u + at ⟹ 0 = 15 + (−2.5)t ⟹ t = 15/2.5 = 6 s
4.6 3.0 kg के पिंड पर आरोपित बल 25 s में उसकी चाल को 2.0 m s⁻¹ से 3.5 m s⁻¹ कर देता है। गति की दिशा अपरिवर्तित रहती है। बल का परिमाण व दिशा क्या है?
a = (v−u)/t = (3.5−2.0)/25 = 1.5/25 = 0.06 m s⁻²
F = ma = 3.0 × 0.06 = 0.18 N, पिंड की गति की दिशा में
4.7 4.0 kg के पिंड पर 8 N व 6 N के दो लंबवत् बल आरोपित हैं। पिंड के त्वरण का परिमाण व दिशा ज्ञात कीजिए।
F = √(8² + 6²) = √100 = 10 N
a = F/m = 10/4.0 = 2.5 m s⁻²

दिशा — 6N बल की दिशा से कोण θ: tanθ = 8/6 = 4/3, अतः θ = tan⁻¹(4/3) ≈ 53.1° (8N बल की दिशा से 37° अथवा 6N बल की दिशा से 53°)

4.8 36 km/h की चाल से गतिमान आटो रिक्शा का चालक सड़क के बीच एक बच्चे को देखकर 4.0 s में रोककर बच्चे को बचा लेता है। वाहन पर लगा औसत मंदन बल क्या है? आटोरिक्शा तथा चालक की संहतियाँ क्रमशः 400 kg और 65 kg हैं।

u = 36 km/h = 10 m/s, v = 0, t = 4.0 s

a = (v−u)/t = (0−10)/4.0 = −2.5 m s⁻²

कुल संहति (आटो + चालक) = 400 + 65 = 465 kg

F = ma = 465 × 2.5 = 1162.5 N (गति की विपरीत दिशा में)
4.9 20,000 kg उत्थापन संहति के रॉकेट में 5 m s⁻² के आरंभिक त्वरण के साथ ऊपर की ओर स्फोट किया जाता है। स्फोट का आरंभिक प्रणोद (बल) परिकलित कीजिए।
F − mg = ma ⟹ F = m(g+a)
F = 20000 × (10+5) = 3,00,000 N = 3×10⁵ N
4.10 उत्तर की ओर 10 m s⁻¹ की एकसमान आरंभिक चाल से गतिमान 0.40 kg के पिंड पर दक्षिण दिशा में 8.0 N का स्थाई बल 30 s तक लगाया गया। t=0 पर पिंड की स्थिति x=0 लीजिए। t = −5s, 25s, 100s पर स्थिति ज्ञात कीजिए।

त्वरण: a = F/m = 8.0/0.40 = 20 m s⁻², दक्षिण (उत्तर धनात्मक माने तो a = −20 m s⁻²)

t = −5s: t=0 से पहले कोई बल नहीं था (10 m/s उत्तर, एकसमान): x = 10×(−5) = −50 m

t = 25s: इस पूरे समय बल कार्यरत:

x = 10(25) + ½(−20)(25)² = 250 − 6250 = −6000 m

t = 100s: बल 30s तक ही था। t=30s पर: x = 10(30) + ½(−20)(30)² = −8700 m; v = 10 + (−20)(30) = −590 m/s। शेष 70s में एकसमान:

x = −8700 + (−590×70) = −50000 m
4.11 ट्रक विरामावस्था से 2.0 m/s² त्वरण से चलता है। t = 10 s पर ट्रक पर खड़ा व्यक्ति धरती से 6 m ऊँचाई से पत्थर गिराता है। t = 11 s पर पत्थर का (a) वेग, (b) त्वरण क्या है?

t=10s पर ट्रक का वेग = 20 m/s (क्षैतिज)। गिरने के बाद क्षैतिज वेग अपरिवर्तित (20 m/s), ऊर्ध्वाधर गुरुत्व से।

t=11s पर (गिरने के 1s बाद): vy = 10×1 = 10 m/s (नीचे)

(a)

v = √(20² + 10²) = √500 ≈ 22.36 m/s

दिशा: tanθ = 10/20 = 0.5 ⟹ θ ≈ 26.57° (क्षैतिज से नीचे)

(b) गिरने के बाद केवल गुरुत्व बल ⟹ a = 10 m s⁻², ऊर्ध्वाधर अधोमुखी

4.12 कमरे की छत से 2 m डोरी द्वारा 0.1 kg का गोलक लटकाकर दोलन आरंभ किए गए। माध्य स्थिति पर चाल 1 m/s है। डोरी काटने पर (a) चरम स्थिति पर, (b) माध्य स्थिति पर प्रक्षेप-पथ क्या होगा?

(a) चरम स्थिति पर: वेग शून्य ⟹ केवल गुरुत्व बल ⟹ ऊर्ध्वाधर सीधी रेखा में नीचे गिरेगा (मुक्त पतन)

(b) माध्य स्थिति पर: वेग अधिकतम (1 m/s), क्षैतिज ⟹ गुरुत्व के अधीन प्रक्षेप्य गति (परवलयाकार पथ)

4.13 70 kg का व्यक्ति गतिमान लिफ्ट में तुला पर खड़ा है, जो (a) 10 m s⁻¹ से एकसमान ऊपर, (b) 5 m s⁻² से नीचे, (c) 5 m s⁻² से ऊपर जा रही हो, (d) मुक्त रूप से नीचे गिर रही हो — तो तुला का पाठ्यांक क्या होगा? (g = 10 m s⁻²)

तुला का पाठ्यांक = अभिलंब बल N, द्वितीय नियम से: N = m(g+a)

(a) a=0: N = 70×10 = 700 N

(b) a=−5 (नीचे): N = 70(10−5) = 350 N

(c) a=+5 (ऊपर): N = 70(10+5) = 1050 N

(d) a=−g (मुक्त पतन): N = 70(10−10) = 0 N (भारहीनता)

4.14 4 kg के पिंड का स्थिति-समय ग्राफ दिया गया है। (a) t<0, t>4s, 0<t<4s के लिए पिंड पर आरोपित बल क्या है? (b) t=0 तथा t=4s पर आवेग क्या है?

ग्राफ से: t<0 पर x=0 (विराम); 0<t<4 पर x रैखिक रूप से 0 से 3m तक (एकसमान वेग 0.75 m/s); t>4 पर x=3m स्थिर।

(a) तीनों अंतरालों में पिंड या तो विराम में है या एकसमान वेग से ⟹ त्वरण शून्य ⟹ बल = 0 सभी अंतरालों में (केवल t=0 व t=4 पर आवेगी बल)

(b) t=0 पर: Δv = 0.75 − 0 = 0.75; आवेग = 4 × 0.75 = 3 kg m/s (धनात्मक)

t=4s पर: Δv = 0 − 0.75 = −0.75; आवेग = −3 kg m/s (ऋणात्मक)

4.15 घर्षणरहित मेज़ पर 10 kg तथा 20 kg के दो पिंड डोरी से जुड़े हैं। 600N का क्षैतिज बल (i) A(10kg) पर, (ii) B(20kg) पर लगाया जाता है। प्रत्येक में डोरी का तनाव क्या है?

निकाय की कुल संहति = 30 kg ⟹ a = 600/30 = 20 m/s² (दोनों में समान)

(i) बल A पर: डोरी तनाव केवल B (20kg) को त्वरित करता है: T = 20 × 20 = 400 N

(ii) बल B पर: डोरी तनाव केवल A (10kg) को त्वरित करता है: T = 10 × 20 = 200 N

4.16 8 kg तथा 12 kg के दो पिंड हल्की डोरी से जोड़कर घर्षणरहित घिरनी पर चढ़ाए गए। मुक्त छोड़ने पर त्वरण व डोरी में तनाव ज्ञात कीजिए।

यह एटवुड मशीन है (m₁=8, m₂=12):

a = (m₂−m₁)g/(m₁+m₂) = (12−8)×10/20 = 2 m/s²
T = m₁(g+a) = 8×12 = 96 N
4.17 प्रयोगशाला निर्देश फ्रेम में विराम नाभिक दो छोटे नाभिकों में विघटित होता है। दर्शाइए कि उत्पाद विपरीत दिशाओं में गति करने चाहिए।

प्रारंभिक संवेग = 0 (विराम)। यह वियुक्त निकाय है ⟹ संवेग-संरक्षण लागू।

p₁ + p₂ = 0 ⟹ p₁ = −p₂

दोनों संवेग परिमाण में समान, विपरीत दिशा में ⟹ संहति धनात्मक होने से वेग भी विपरीत दिशाओं में होने चाहिए।

4.18 दो बिलियर्ड गेंदें (प्रत्येक 0.05 kg) 6 m s⁻¹ से विपरीत दिशाओं में टकराकर वापस लौटती हैं। प्रत्येक पर दूसरी गेंद का आवेग?
Δp = m(v_final − v_initial) = 0.05×(−6) − 0.05×(+6) = −0.6 kg m/s

प्रत्येक गेंद पर आवेग = 0.6 N s (विपरीत दिशाओं में)

4.19 100 kg की तोप से 0.020 kg का गोला 80 m s⁻¹ की चाल से दागा जाता है। तोप की प्रतिक्षेप चाल?
0.020 × 80 + 100 × v = 0 ⟹ v = −0.016 m/s

तोप की प्रतिक्षेप चाल = 0.016 m/s (गोले की दिशा के विपरीत)

4.20 बल्लेबाज गेंद को 45° के कोण पर विक्षेपित करता है, चाल (54 km/h) अपरिवर्तित। गेंद (0.15 kg) को दिया गया आवेग?

u = 15 m/s (बल्लेबाज़ की ओर); हिट के बाद 15 m/s, 45° पर

px,आरंभिक = 2.25 kg m/s, py,आरंभिक = 0
px,अंतिम = −15×0.15×cos45° ≈ −1.59 kg m/s
py,अंतिम = +0.15×15×sin45° ≈ +1.59 kg m/s
|Δp| = √[(−3.84)² + (1.59)²] = √17.28 ≈ 4.16 kg m/s
4.21 0.25 kg का पत्थर क्षैतिज तल में 1.5 m त्रिज्या के वृत्त पर 40 rev/min से घूमता है। डोरी में तनाव? अधिकतम 200 N का तनाव सहने वाली डोरी से अधिकतम चाल?

n = 40/60 = 2/3 rev/s ⟹ ω = 2πn = 4π/3 rad/s

T = mω²R = 0.25 × (4π/3)² × 1.5 ≈ 6.6 N
200 = mv²max/R ⟹ vmax = √(200×1.5/0.25) ≈ 34.64 m/s
4.22 यदि डोरी टूट जाए तो पत्थर का प्रक्षेप-पथ: (a) त्रिज्यतः बाहर, (b) स्पर्शरेखीय, (c) किसी कोण पर?

डोरी टूटने पर अभिकेंद्र बल शून्य ⟹ प्रथम नियम ⟹ पत्थर उस बिंदु के स्पर्श रेखा के अनुदिश सीधी रेखा में उड़ जाएगा।

सही विकल्प: (b) स्पर्शरेखीय पथ पर उड़ जाता है

4.23 स्पष्ट कीजिए: (a) रिक्त दिक्स्थान में घोड़ा गाड़ी नहीं खींच सकता, (b) बस के रुकने पर यात्री आगे गिरते हैं, (c) लॉन मूवर खींचना आसान, (d) क्रिकेटर हाथ पीछे खींचता है।

(a): घोड़ा ज़मीन पर पीछे बल लगाता है, ज़मीन प्रतिक्रिया में घोड़े को आगे बल देती है। रिक्त दिक्स्थान में ज़मीन नहीं ⟹ प्रतिक्रिया बल नहीं ⟹ दौड़ नहीं सकता।

(b): यकायक रुकने पर पैर रुकते हैं परंतु शरीर का ऊपरी भाग जड़त्व के कारण आगे बढ़ता रहता है ⟹ यात्री आगे गिरता है।

(c): खींचते समय लगाया गया बल ऊपर की ओर झुका होता है, जिससे N = mg − F sinθ घटता है ⟹ घर्षण घटता है ⟹ खींचना आसान। (धकेलते समय N बढ़ता है, घर्षण बढ़ता है)

(d): हाथ पीछे खींचने से रोकने में अधिक समय लगता है ⟹ F = Δp/Δt घटता है ⟹ चोट से बचाव।

🎯 NEET/JEE स्तरीय अतिरिक्त प्रश्न

बैंकिंग, लिफ्ट, संयोजित गुटके, संवेग-संरक्षण व घर्षण पर आधारित 12 उच्च-स्तरीय अभ्यास प्रश्न, प्रवेश परीक्षा स्तर के अनुसार।

1 20 m त्रिज्या वाली बैंकयुक्त सड़क का tanθ = 0.4, घर्षण गुणांक 0.2। अधिकतम सुरक्षित चाल? NEET
vmax = √[Rg(μ+tanθ)/(1−μ tanθ)] = √[200×(0.6/0.92)] ≈ 11.4 m/s
2 60 kg व्यक्ति लिफ्ट में खड़ा है, जो (a) 2 m/s² ऊपर, (b) 2 m/s² नीचे, (c) एकसमान वेग — तुला का पठन? (g=10 m/s²)

(a) a=+2: N = 60×12 = 720 N

(b) a=−2: N = 60×8 = 480 N

(c) a=0: N = 60×10 = 600 N

3 गुटका m, दूसरे गुटके M के ऊपर (M घर्षणरहित फर्श पर)। m व M के बीच μ। M पर न्यूनतम बल जिससे m फिसलना आरंभ करे? JEE

दोनों साथ चलें तो a = F/(M+m)। m को यह त्वरण घर्षण से: f = ma = mF/(M+m)। सीमा: f = μmg

F = μ(M+m)g
4 स्प्रिंग तुला से 5 kg का पिंड लटका है, लिफ्ट 5 m/s² नीचे गिर रही है। पठन? (g=10 m/s²)
T = m(g−a) = 5×(10−5) = 25 N
5 40 kg की बाल्टी को डोरी (अधिकतम 400 N) से खींचा जाता है। अधिकतम त्वरण? (g=10 m/s²)
a = (T−mg)/m = (400−400)/40 = 0 m/s²

अर्थात् 400N तनाव पर बाल्टी का भार (mg=400N) ठीक संतुलित हो जाता है — इससे अधिक त्वरण देने पर डोरी टूट जाएगी।

6 m₁=2kg, m₂=3kg घर्षणरहित मेज़ पर डोरी से जुड़े, m₂ पर 20N बल। त्वरण व तनाव?
a = 20/5 = 4 m/s²; T = m₁a = 2×4 = 8 N
7 5 kg गुटके पर F₁=6N (पूर्व), F₂=8N (उत्तर) तथा F₃ — साम्यावस्था। F₃?
|F₃| = √(6²+8²) = 10 N

दिशा: F₁+F₂ के परिणामी के ठीक विपरीत — दक्षिण-पश्चिम में, पूर्व से 53° दक्षिण की ओर।

8 0.5 kg की गेंद 20 m/s से दीवार पर लंबवत् टकराकर 15 m/s से वापस। संपर्क-समय 0.02 s। दीवार पर औसत बल?
F = Δp/Δt = 0.5×(20+15)/0.02 = 875 N
9 50 kg व्यक्ति 150 kg की नाव में विराम में। व्यक्ति 2 m/s से आगे दौड़े — नाव का वेग?
50×2 + 150×v = 0 ⟹ v = −100/150 = −0.67 m/s

नाव 0.67 m/s से विपरीत दिशा में।

10 4 kg गुटका (μₛ=0.5, μₖ=0.4), 25N क्षैतिज बल। त्वरण? (g=10 m/s²)

fs,max = 0.5×4×10 = 20 N; 25N > 20N ⟹ गति होगी, fk = 0.4×4×10 = 16 N

a = (25−16)/4 = 2.25 m/s²
11 1000 kg कार 20 m/s से 100 m त्रिज्या के क्षैतिज मोड़ पर। न्यूनतम घर्षण गुणांक? (g=10 m/s²)
μ = v²/(Rg) = 400/1000 = 0.4
12 दो ब्लॉक m₁ (मेज़ पर), m₂ (लटका) घिरनी से। μk मेज़ व m₁ के बीच। त्वरण? JEE
a = (m₂g − μkm₁g)/(m₁+m₂)

➕ अन्य NEET संबंधित तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, सूत्र व तुलनाएँ।

चूक गए
  • छद्म बल (Pseudo Force) — जब किसी निर्देश तंत्र को त्वरण a से त्वरित किया जाता है, तो उस तंत्र के भीतर स्थित प्रेक्षक को न्यूटन के नियम सीधे लागू करने के लिए एक काल्पनिक बल — Fछद्म = −ma (तंत्र के त्वरण की दिशा के ठीक विपरीत) — मानना पड़ता है। यह कोई वास्तविक बल नहीं है। त्वरित लिफ्ट, मुड़ती कार व मेरी-गो-राउंड जैसे सभी संख्यात्मक प्रश्नों में इसका सीधा प्रयोग होता है।
  • विराम कोण (Angle of Repose) — किसी खुरदरे झुके हुए तल का वह अधिकतम कोण θ, जिस तक झुकाने पर भी उस पर रखा पिंड फिसलना प्रारंभ नहीं करता — इस सीमांत स्थिति में tan θ = μs (विराम कोण की स्पर्शज्या, स्थैतिक घर्षण गुणांक के ठीक बराबर)। यह सूत्र घर्षण गुणांक को सीधे मापने की एक प्रायोगिक विधि भी प्रदान करता है।
  • शंक्वाकार लोलक (Conical Pendulum) — डोरी से बँधा पिंड क्षैतिज वृत्त में घूमता है, डोरी शंकु की सतह पर: T cos θ = mg तथा T sin θ = mv²/r ⟹ tan θ = v²/rg — कोण, चाल व त्रिज्या को सीधे जोड़ता है।
तथ्य
  • बंदूक की प्रतिक्षिप्ति (Recoil) — संवेग-संरक्षण का क्लासिक व्यावहारिक उदाहरण: mबंदूकvबंदूक = mगोलीvगोली — चूँकि बंदूक का द्रव्यमान गोली से कहीं अधिक होता है, इसका प्रतिक्षिप्ति-वेग गोली की चाल की तुलना में बहुत कम रहता है।
  • तृतीय नियम की सार्वभौमिकता — क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम केवल संपर्क बलों तक सीमित नहीं है, बल्कि दूरस्थ-क्रिया बलों (गुरुत्वाकर्षण, स्थिरवैद्युत) पर भी समान रूप से लागू होता है।
  • घर्षण गुणांक (μ) की प्रकृति — μs व μk दोनों दो बलों का अनुपात होने के कारण विमाहीन (dimensionless) हैं, इनका कोई मात्रक नहीं होता।
  • घर्षण-रहित आनत तल पर त्वरण — a = g sin θ — यह पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता, केवल तल के झुकाव पर।
  • बिना घर्षण के बैंक्ड सड़क पर अधिकतम चाल — v = √(rg tan θ)
  • द्रव्यमान बनाम भार — द्रव्यमान सार्वभौमिक रूप से स्थिर (अदिश, स्थान-निरपेक्ष); भार W = mg एक सदिश है, जो स्थान के अनुसार बदलता है (चंद्रमा पर g ≈ 1/6, अतः भार भी ≈ 1/6, परंतु द्रव्यमान अपरिवर्तित)।
  • प्रणोद (Thrust) — रॉकेट प्रणोदन — रॉकेट/जेट इंजन गैसों को उच्च वेग से पीछे फेंकता है, संवेग-संरक्षण के अनुसार रॉकेट को अग्र दिशा में प्रणोद बल मिलता है — यह निर्वात में भी कार्य करता है।
तुलनात्मक
  • प्रथम नियम (गुणात्मक) बनाम द्वितीय नियम (मात्रात्मक) — प्रथम नियम स्थापित करता है कि बल किसी पिंड की विराम/एकसमान गति की अवस्था को बदलने का कारण है (बल के अस्तित्व की पहचान); द्वितीय नियम (F=ma) इस बल को मात्रात्मक रूप से मापने योग्य बनाता है।
  • स्थिर संवेग बनाम स्थिर वेग — वियुक्त निकाय का कुल संवेग संरक्षित रहने का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक घटक-कण का वेग भी स्थिर रहेगा — केवल सभी कणों के संवेग का सदिश योग स्थिर रहता है।
ट्रैप
  • स्वतंत्रतापूर्वक गिरती लिफ्ट में भारहीनता — यदि लिफ्ट की डोरी टूट जाए तथा वह स्वतंत्र रूप से नीचे गिरने लगे (a=g, नीचे), तो लिफ्ट के फर्श द्वारा व्यक्ति पर आरोपित अभिलंब बल (N) शून्य हो जाता है। "भारहीनता का अर्थ है कि गुरुत्वाकर्षण बल शून्य हो गया" जैसी सोच सदैव गलत है — वास्तव में केवल अभिलंब बल (अनुभूत भार) शून्य होता है, गुरुत्व बल (mg) तब भी पूर्ववत् कार्यरत रहता है।
  • दो पिंडों के मध्य घर्षण गुणांक की सापेक्षता — घर्षण गुणांक (μ) किसी एक पिंड का गुणधर्म नहीं, बल्कि दो संपर्कशील पृष्ठों के युग्म का सम्मिलित गुणधर्म है।
  • आवेगी बल (Impulsive Force) — बल्ले से गेंद टकराने जैसी घटनाओं में बल अत्यंत उच्च व संपर्क-काल अत्यंत अल्प होता है — इसलिए केवल इनके गुणनफल — आवेग (J = FΔt = Δp) — को ही मापा व प्रयोग किया जाता है।
रणनीति
  • अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) प्रत्येक पिंड का पृथक मुक्त-पिंड आरेख (free-body diagram, FBD) बनाकर सभी बलों को सही दिशा में अंकित करने का अभ्यास, (2) त्वरित निर्देश तंत्र (लिफ्ट, कार, मेरी-गो-राउंड) में छद्म बल का सही प्रयोग, (3) घर्षण व वृत्तीय गति के सभी सूत्र (विराम कोण, बैंकिंग, शंक्वाकार लोलक) — इन्हीं तीन विषयों से अधिकांश संख्यात्मक प्रश्न बनते हैं।

🏆 NEET/AIPMT में पूछे जा चुके प्रश्न (2000 – 2026)

AIPMT/NEET 2000 से RE-NEET 2026 तक — इस अध्याय से पूछे गए 53 प्रश्न, वर्ष-क्रमानुसार (नवीनतम पहले), पूर्ण हल सहित।

इस अध्याय का महत्व इस अध्याय से NEET में सामान्यतः 2–4 प्रश्न (8–16 अंक) पूछे जाते रहे हैं — भौतिकी के सबसे अधिक भारांक वाले अध्यायों में से एक। सर्वाधिक बार दोहराए गए विषय: (1) घर्षण (स्थैतिक व गतिज) पर आधारित संख्यात्मक प्रश्न, (2) संयोजित गुटकों व घिरनी निकाय (Atwood machine), (3) लिफ्ट में आभासी भार, (4) बैंक्ड सड़क पर वृत्तीय गति, तथा (5) संवेग-संरक्षण व आवेग।
1 एक कार 50 m त्रिज्या के वृत्ताकार रेस-ट्रैक पर चल रही है, जो कोण θ पर बैंक्ड है। यदि कार 10 m/s की चाल से चलती है और टायरों में न्यूनतम घिसावट होती है (अर्थात् आदर्श बैंकिंग गति), तो g=10 m/s² लेते हुए θ का मान ज्ञात कीजिए। RE-NEET 2026

चरण 1 — आदर्श बैंकिंग: न्यूनतम घिसावट का अर्थ है कि घर्षण की कोई आवश्यकता नहीं।

tanθ = v²/(Rg) = 100/500 = 0.2
θ = tan⁻¹(0.2) ≈ 11.3°
2 स्थिर ट्रॉली के फर्श पर 15 kg का बॉक्स। बॉक्स-फर्श के बीच μₛ = 0.12। बॉक्स को स्थिर रखते हुए ट्रॉली का अधिकतम त्वरण? (g=10 m/s²) NEET 2026
amax = μsg = 0.12 × 10 = 1.2 m/s²
3 5 kg के पिंड पर दो परस्पर लंबवत् बल 8N व 6N। त्वरण का परिमाण व दिशा? NEET 2026
Fnet = √(8²+6²) = 10 N ⟹ a = 10/5 = 2 m/s²

दिशा: 8N बल की दिशा से tan⁻¹(6/8) ≈ 37° के कोण पर।

4 समान लंबाई (L) व समान झुकाव कोण 45° वाले दो आनत तल — एक खुरदरा, दूसरा चिकना। कोई पिंड खुरदरे तल पर चिकने तल की तुलना में 2 गुना समय लेता है। μₖ = ? NEET 2025

चरण 1 — चिकने तल पर: asmooth = g sin45°; ts² = 2L/asmooth

चरण 2 — खुरदरे तल पर (t=2t_s): L = ½a(2ts)² = 2aroughts²

चरण 3 — दोनों बराबर करें: arough = asmooth/4

चरण 4 — g sin45° − μₖ g cos45° = (g sin45°)/4: 1 − μₖ = 1/4 ⟹ μₖ = 0.75

5 5 kg के बॉक्स को घर्षणरहित 30° झुके तल पर डोरी (तनाव 30N) से ऊपर खींचा जाता है। बॉक्स का त्वरण? (g=10 m/s²) NEET 2024 (Re-Examination)
T − mg sin30° = ma
30 − 25 = 5a ⟹ a = 1 m/s² (ऊपर)
6 गुटके A (2kg) पर 10N क्षैतिज बल, B (3kg) के साथ घर्षणरहित पृष्ठ पर। A द्वारा B पर बल? NEET 2024
a = 10/5 = 2 m/s²
FAB = mBa = 3×2 = 6 N
7 एकसमान चाल से वृत्तीय पथ पर गतिमान कण किसे नियत रखता है? NEET 2024

एकसमान वृत्तीय गति में चाल तथा अभिकेंद्र त्वरण का परिमाण — दोनों नियत; परंतु वेग व त्वरण की दिशा बदलती रहती है।

|v| = नियत, |a| = v²/r = नियत, v̅ · ā = 0
8 2 kg का गुटका खुरदरे आनत पृष्ठ पर (μ=1/3, tanθ=1/3)। g=10 m/s²। नेट बल? NEET 2023 Manipur

चूँकि tanθ = μ, गुरुत्व का आनत-तल के अनुदिश घटक = घर्षण बल:

mg sinθ = μ mg cosθ ⟹ Fnet = 0 (शून्य)
9 फुटबॉल खिलाड़ी दक्षिण दिशा में गतिमान था, समान चाल से पूर्व दिशा में मुड़ा। मुड़ते समय बल की दिशा? NEET 2023
Δv̅ = v î − (−v ĵ) = v(î + ĵ)

यह सदिश उत्तर-पूर्व दिशा में है। बल की दिशा: उत्तर-पूर्व (North-East)

10 गतिशील कार के फर्श पर पड़े पिंड को स्थिर रखने का अधिकतम त्वरण (μₛ=0.15)? (g=10 m/s²) NEET 2023
amax = μₛ g = 1.5 m/s²
11 गोली आयताकार गुटके में 24 cm चलने पर वेग u/3 हो जाता है, तथा गुटके के दूसरे सिरे पर ठीक रुकती है। गुटके की कुल लंबाई? NEET 2023

चरण 1 — 24cm में: (u/3)² = u² − 2a(0.24) ⟹ 2a(0.24) = 8u²/9

चरण 2 — कुल दूरी (v=0): x = u²/(2a) = (9×0.24)/8 = 0.27 m = 27 cm

12 F̅ = 2î + ĵ − k̂ तथा r̅ = 3î + 2ĵ − 2k̂। अदिश व सदिश गुणनफल के परिमाण? NEET 2022 Phase 2
F̅ · r̅ = 6+2+2 = 10
F̅ × r̅ = 0î + ĵ + k̂ ⟹ |F̅ × r̅| = √2
13 1 kg गुटके पर आनत तल (30°) के अनुदिश 18N बल, संयुक्त त्वरण 2 m/s²। 2 kg व 1 kg के बीच अभिलंब बल? (g=10 m/s²) NEET 2022 Phase 2
N − F − m₁g sin30° = m₁a
N − 18 − 5 = 2 ⟹ N = 25 N
14 4 kg व 6 kg, भारहीन डोरी से घिरनी पर। निकाय का त्वरण (g के पदों में)? NEET 2020 Phase 1
a = (m₂−m₁)g/(m₁+m₂) = 2g/10 = g/5
15 10 kg का गुटका खोखले बेलन (त्रिज्या 1m) की भीतरी दीवार पर, μ=0.1। स्थिर रखने के लिए न्यूनतम ω? (g=10 m/s²) NEET 2019
μ m ω² r ≥ mg ⟹ ω ≥ √(g/(μr)) = √100 = 10 rad/s
16 पतले तार से बंधा पिंड ऊर्ध्वाधर वृत्त में घुमाया जाता है। तार टूटने की सर्वाधिक संभावना? NEET 2019

तनाव सबसे अधिक निम्नतम बिंदु (lowest point) पर होता है:

Tbottom = mg + mv²/r (अधिकतम)

उत्तर: निम्नतम बिंदु पर

17 कौन-सा कथन गलत है? (a) लोटनिक घर्षण, सर्पी से कम (b) सीमांत स्थैतिक घर्षण N के अनुक्रमानुपाती (c) घर्षण सापेक्ष गति का विरोध करता है (d) सर्पी घर्षण गुणांक की विमा लंबाई है NEET 2018

μ = f/N, दो बलों का अनुपात ⟹ विमाहीन।

गलत कथन: (d)

18 m द्रव्यमान का गुटका θ आनत घर्षणरहित पच्चर पर। पच्चर को 'a' त्वरण दिया जाता है। गुटके को स्थिर रखने के लिए a व θ संबंध? NEET 2018

पच्चर के त्वरित तंत्र में छद्म-बल (ma, बाईं ओर):

mg sinθ = ma cosθ ⟹ a = g tanθ
19 l लंबाई की डोरी का एक सिरा m के कण से, दूसरा चिकनी मेज़ पर खूँटी से। कण v चाल से वृत्त में। केंद्र की ओर नेट बल? NEET 2017
Fnet = T = mv²/l
20 3m व m के गुटके A व B डोरी से जुड़े, भारहीन स्प्रिंग से लटके। डोरी काटने के तुरंत पश्चात् A व B के त्वरण? NEET 2017

चरण 1 — डोरी काटने से पहले: स्प्रिंग बल F = 4mg (साम्यावस्था)

चरण 2 — काटने के तुरंत बाद स्प्रिंग बल अपरिवर्तित:

A: (4mg − 3mg)/(3m) = g/3 (ऊपर)
B: g (नीचे, मुक्त पतन)
21 त्रिज्या R के बैंक्ड मार्ग (कोण θ, μₛ) पर अधिकतम सुरक्षित वेग? NEET 2016 Phase 1
vmax = √[Rg(μₛ+tanθ)/(1−μₛ tanθ)]
22 तख्ते पर बॉक्स — 30° पर फिसलना आरंभ, 4.0s में 4.0m फिसला। μₛ व μₖ? AIPMT 2015

μₛ: tan30° = 1/√3 ≈ 0.58

μₖ: a = 2s/t² = 8/16 = 0.5 m/s²

μₖ = (g sin30° − a)/(g cos30°) = (5−0.5)/8.66 ≈ 0.52
23 m (r त्रिज्या) व 2m (r/2 त्रिज्या) — समान अभिकेंद्र बल। हल्के की चाल भारी की n गुना। n? AIPMT 2015
mv₁²/r = 2m v₂²/(r/2) = 4m v₂²/r ⟹ v₁ = 2 v₂

n = 2

24 A(4kg), B(2kg), C(1kg) संपर्क में घर्षणरहित। 14N बल A पर। A-B के बीच बल? AIPMT 2015 (Cancelled Paper)
a = 14/7 = 2 m/s² ⟹ FAB = (2+1)×2 = 6 N
25 A (मेज़ पर, m₁), B (लटका, m₂) घिरनी से। μₖ मेज़ व A के बीच। डोरी का तनाव? AIPMT 2015 (Cancelled Paper)
a = (m₂g − μₖm₁g)/(m₁+m₂); T = m₂(g−a)
T = m₁m₂g(1+μₖ)/(m₁+m₂)
26 गुब्बारा (m द्रव्यमान) a (a<g) से नीचे उतर रहा। कितना द्रव्यमान हटाएँ कि समान a से ऊपर उठे? AIPMT 2014

नीचे उतरते समय: mg − F = ma ⟹ F = m(g−a)

ऊपर उठते समय: F − m′g = m′a ⟹ F = m′(g+a)

Δm = m − m′ = 2ma/(g+a)
27 कन्वेयर बेल्ट 2 m/s से गतिमान। बॉक्स को विराम से रखा जाता है। μ=0.5। बेल्ट के सापेक्ष बॉक्स की दूरी? (g=10 m/s²) AIPMT 2011 Mains

a = μg = 5 m/s²; बेल्ट की चाल तक t = 2/5 = 0.4s

sbox = ½at² = 0.4m; sbelt = 2×0.4 = 0.8m; Δs = 0.4 m
28 M द्रव्यमान का पिंड V वेग से दीवार पर टकराकर उसी वेग से वापस। आवेग? AIPMT 2011 Prelims
Δp = M(V−(−V)) = 2MV (दीवार से दूर)
29 60 kg व्यक्ति 940 kg लिफ्ट में। लिफ्ट 1.0 m/s² ऊपर। केबल तनाव? (g=10 m/s²) AIPMT 2011 Prelims
T = M(g+a) = 1000×11 = 11000 N
30 m द्रव्यमान का गुटका ऊर्ध्वाधर गतिशील कार्ट की दीवार पर। μ स्थैतिक। गुटके को गिरने से बचाने का न्यूनतम α? AIPMT 2010 Prelims
fmax = μ m α ≥ mg ⟹ α ≥ g/μ
31 2000 kg लिफ्ट, केबल तनाव 28000 N। त्वरण? (g=10 m/s²) AIPMT 2009
a = T/m − g = 14 − 10 = 4 m/s² (ऊपर)
32 F̅ = 6î − 8ĵ + 10k̂ बल से 1 m/s² त्वरण। पिंड का द्रव्यमान? AIPMT 2009
|F| = √200 = 10√2 N ⟹ m = 10√2 ≈ 14.14 kg
33 तीन बल (एक y-अक्ष पर, दो 60° व 30° पर x-अक्ष से)। परिणामी को केवल y-दिशा में लाने वाला न्यूनतम बल? AIPMT 2008

तीनों बलों के x-घटक जोड़ने पर एक शेष x-घटक (0.5N) बचता है — इसे निरस्त करने वाला बल:

Fmin = 0.5 N (x-अक्ष के अनुदिश)
34 रोलर-कोस्टर पहाड़ी की चोटी (त्रिज्या 20m) पर भारहीनता। चाल किस सीमा में? (g=10 m/s²) AIPMT 2008
mg = mv²/R ⟹ v = √(gR) = √200 = 10√2 ≈ 14.1 m/s
35 M kg/s की दर से कन्वेयर बेल्ट पर रेत। बेल्ट को नियत चाल v पर रखने का बल? AIPMT 2008
F = (dm/dt) × v = Mv
36 क्षैतिज पृष्ठ पर गुटका प्रारंभिक वेग V से धकेला गया। μ घर्षण गुणांक। कितने समय में रुकेगा? AIPMT 2007
a = μg ⟹ t = V/(μg)
37 m का गुटका θ कोण के चिकने पच्चर पर। पूरे निकाय को त्वरित करते हैं कि गुटका न फिसले। पच्चर द्वारा गुटके पर बल? AIPMT 2004

a = g tanθ (फिसलन रहित); N = √[(mg)² + (ma)²]

N = mg secθ
38 A (2kg, मेज़ पर, μₛ=0.2), B (लटका)। B का अधिकतम द्रव्यमान जिससे स्थिर रहें? (g=10 m/s²) AIPMT 2004
Tmax = μₛmAg = 4 N ⟹ mB = 4/10 = 0.4 kg
39 80 kg व्यक्ति लिफ्ट में तुला पर, त्वरण 5 m/s² ऊपर। पठन? (g=10 m/s²) AIPMT 2003
N = 80×15 = 1200 N
40 20 kg का बंदर डोरी पकड़े है, जो 25 kg भार तक नहीं टूटती। अधिकतम चढ़ने का त्वरण? (g=10 m/s²) AIPMT 2003
250 = 20(10+a) ⟹ a = 2.5 m/s²
41 3 kg का पिंड विराम से, बल F̅ = 6t²î + 4tĵ। t=3s पर वेग? AIPMT 2002
v̅ = (1/3)[2t³î + 2t²ĵ]₀³ = 18î + 6ĵ m/s
|v| = √360 = 6√10 ≈ 18.97 m/s
42 10 kg गुटका खुरदरे पृष्ठ पर (μ=0.5), 100N बल। त्वरण? (g=10 m/s²) AIPMT 2002
f = 0.5×100 = 50 N ⟹ a = (100−50)/10 = 5 m/s²
43 1000 kg की लिफ्ट 1 m/s² ऊपर। तनाव? (g=10 m/s²) AIPMT 2002
T = 1000×11 = 11000 N
44 1 kg का स्थिर बम 1:1:3 अनुपात के तीन टुकड़ों में विस्फोट। दो समान टुकड़े परस्पर लंबवत् 30 m/s से। बड़े टुकड़े का वेग? AIPMT 2001

द्रव्यमान: 0.2, 0.2, 0.6 kg। दो समान टुकड़ों का परिणामी संवेग:

pnet = √(6²+6²) = 6√2 kg m/s
v₃ = 6√2/0.6 = 10√2 ≈ 14.14 m/s
45 150 g की गेंद 20 m/s से, 0.1s में पकड़ी। बल? AIPMT 2001
F = 0.15×20/0.1 = 30 N
46 1 kg गुटका ट्रक के पृष्ठ पर (μ=0.6), ट्रक 5 m/s² से। घर्षण बल? (g=10 m/s²) AIPMT 2001

fmax = 6N; आवश्यक = ma = 5N < 6N ⟹ गुटका नहीं फिसलेगा, वास्तविक घर्षण केवल आवश्यक बल के बराबर:

f = 5 N (ट्रक की दिशा में)
47 75 kg को उठाने के लिए 250N। रस्सी 12m खींचने पर भार 3m उठे। दक्षता? (g=10 m/s²) AIPMT 2001
η = (75×10×3)/(250×12) = 2250/3000 = 0.75 ⟹ 75%
48 3 kg पिंड 10 m/s से दीवार पर 60° पर टकराकर उसी कोण पर लौटा। t=0.2s। दीवार पर बल? AIPMT 2000

अभिलंब से कोण 30°:

Δp = 2×3×10×cos30° = 30√3 kg m/s
F = 30√3/0.2 = 150√3 ≈ 259.8 N
49 5kg व 10kg भारहीन घिरनी से। त्वरण? AIPMT 2000
a = (10−5)g/15 = g/3
50 10 kg का गुटका, θ=30° आनत तल पर विराम से विराम तक। μₖ? AIPMT 2000

पूरी दूरी में गुरुत्व का अनुदिश घटक घर्षण से संतुलित:

mg sin30° = μₖ mg cos30° ⟹ μₖ = tan30° = 1/√3 ≈ 0.577
51 कार 10 m त्रिज्या के क्षैतिज मार्ग पर 10 m/s से। छत से 1m तार से गेंद लटकी। तार का ऊर्ध्वाधर से कोण? (g=10 m/s²) NEET 2013 (Karnataka)
tanθ = v²/(rg) = 100/100 = 1 ⟹ θ = 45°
52 θ आनत तल — ऊपरी आधा चिकना, निचला खुरदरा। शीर्ष से विराम से फिसलकर नीचे विराम तक। निचले भाग का μ? NEET 2013

ऊपरी आधे (चिकने) में अर्जित v²=2(g sinθ)L; निचले आधे में v²=2(μg cosθ − g sinθ)L से शून्य।

2g sinθ L = 2(μg cosθ − g sinθ)L ⟹ μ = 2 tanθ
53 m, 2m, 3m तीन गुटके डोरियों से। m पर ऊपर F बल से सभी स्थिर चाल v से ऊपर। 2m गुटके पर नेट बल? NEET 2013

सभी नियत चाल से ⟹ त्वरण शून्य ⟹ प्रत्येक पर नेट बल शून्य:

Fnet(2m) = 0

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री NCERT कक्षा 11 भौतिकी के अध्याय 4 — गति के नियम — को नोट्स, हल किए गए उदाहरण, NCERT अभ्यास हल, अतिरिक्त NEET/JEE प्रश्न तथा 2000–2026 तक के संपूर्ण NEET/AIPMT प्रश्न-बैंक (53 प्रश्न, विस्तृत हल सहित) के साथ प्रस्तुत करती है।

न्यूटन के तीन नियम — यांत्रिकी की वह त्रिपादी जिस पर पूरी शास्त्रीय भौतिकी टिकी है।

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