विकास — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • अध्याय 6

विकास — जीवन की उत्पत्ति से मानव के उद्भव तक

ब्रह्मांड की उत्पत्ति, मिलर-यूरे प्रयोग, डार्विन का प्राकृतिक वरण, समजातता-अनुरूपता, अनुकूली विकिरण, हार्डी-वेनबर्ग साम्यता, तथा मानव-विकास की संपूर्ण कहानी — परीक्षा‑केंद्रित विस्तृत विवेचन।

★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 जीवन की उत्पत्ति — ब्रह्मांड एवं पृथ्वी

बिग बैंग से पृथ्वी के निर्माण तक

विकासीय जीव विज्ञान पृथ्वी पर जीवधारियों के इतिहास का अध्ययन है। रात्रि आकाश में तारे भूतकाल की झलक दिखाते हैं — उनका प्रकाश हम तक पहुँचने में लाखों-करोड़ों वर्ष लगते हैं। इसी प्रकार जीवन के विकास को समझने के लिए हमें ब्रह्मांड, तारों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि जाननी आवश्यक है।

ब्रह्मांड एवं पृथ्वी
  • ब्रह्मांड की आयु: लगभग 13.8 अरब वर्ष
  • पृथ्वी की उत्पत्ति: लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व
  • प्रथम जीवन: लगभग 400 करोड़ वर्ष पूर्व

बिग बैंग सिद्धांत: ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महाविस्फोट से हुई। उसके पश्चात लगातार विस्तार हुआ, तापमान गिरा, हाइड्रोजन व हीलियम गैसें बनीं, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनित होकर आकाशगंगाओं में बदल गईं। हमारी आकाशगंगा 'मिल्की वे' के सौरमंडल में पृथ्वी ~4.5 अरब वर्ष पूर्व बनी। आरंभिक पृथ्वी पर कोई वायुमंडल नहीं था — मीथेन, जलवाष्प, अमोनिया व CO₂ जैसी गैसें सतह से निकलती थीं। सूर्य की पराबैंगनी किरणों ने जल को विघटित किया, ओज़ोन परत बनी, तथा ठंडा होने पर वर्षा से महासागर बने।

NEET फोकस
  • ब्रह्मांड की आयु — 13.8 अरब वर्ष
  • पृथ्वी की आयु — 4.5 अरब वर्ष
  • जीवन की उत्पत्ति — 400 करोड़ वर्ष पूर्व

2 रासायनिक विकास — जीवन की उत्पत्ति

ओपेरिन-हाल्डेन, मिलर-यूरे प्रयोग

पारंपरिक मत — विशेष सृष्टि: यह मानता था कि सभी जीव वर्तमान स्वरूप में सृजित हुए, पृथ्वी 4000 वर्ष पुरानी है, तथा जैव विविधता सदैव स्थिर रही। परंतु 19वीं सदी में इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आया।

स्वतः जनन का सिद्धांत: यह विचार कि जीवन सड़ते-गलते पदार्थों से अपने-आप उत्पन्न हो जाता है — को लुई पाश्चर ने अपने प्रयोगों से पूर्णतः अस्वीकृत कर दिया। उन्होंने दिखाया कि रोगाणुरहित बंद फ्लास्क में कोई नया जीव नहीं बनता, जबकि खुले फ्लास्क में वायु के संपर्क में सूक्ष्मजीव पनपते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि जीवन सदैव पूर्व-विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है

ओपेरिन (रूस) एवं हाल्डेन (इंग्लैंड) ने रासायनिक विकास का सिद्धांत प्रस्तावित किया — पहले जीवन-रूप निर्जीव कार्बनिक अणुओं (जैसे RNA, प्रोटीन) से रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बना।

मिलर-यूरे प्रयोग (1953)

मिलर-यूरे का प्रयोग CH4, NH3, H2O, H2 गैसें विद्युत डिस्चार्ज संघनित्र (ठंडा जल) उबलता जल (पाश्व फ्लास्क) कार्बनिक यौगिक (अमीनो अम्ल) वाला जल
चित्र 6.1 — मिलर-यूरे प्रयोग (स्वनिर्मित)

एस. एल. मिलर ने 1953 में आदि पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ बनाईं — एक बंद फ्लास्क में मीथेन, हाइड्रोजन, अमोनिया व जलवाष्प भरकर 800°C पर विद्युत डिस्चार्ज (चिंगारी) प्रवाहित की। परिणामस्वरूप अमीनो अम्ल जैसे कार्बनिक यौगिक बने। बाद में अन्य वैज्ञानिकों ने शर्करा, नाइट्रोजन क्षारक, वर्णक व वसा भी संश्लेषित किए।

प्रथम जीवन अकोशिकीय (~3 अरब वर्ष पूर्व) तथा कोशिकीय (~200 करोड़ वर्ष पूर्व) अस्तित्व में आया। सभी प्रारंभिक जीवन-रूप जलीय वातावरण में सीमित थे। अजीवात् जनन (निर्जीव से जीवन) आज सर्वाधिक स्वीकृत सिद्धांत है।

NEET फोकस
  • स्वतः जनन को लुई पाश्चर ने अस्वीकृत किया
  • रासायनिक विकास — ओपेरिन एवं हाल्डेन
  • मिलर-यूरे (1953) — अमीनो अम्ल का संश्लेषण
  • प्रथम अकोशिकीय जीवन ~3 अरब वर्ष पूर्व

3 डार्विन का विकासवाद — प्राकृतिक वरण

एच.एम.एस. बीगल यात्रा, वॉलेस का सहयोग

चार्ल्स डार्विन ने एच.एम.एस. बीगल पर विश्व-भ्रमण (1831–1836) के दौरान किए गए अवलोकनों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि सभी जीव आपस में तथा विलुप्त जीवों से भी संबंधित हैं। समय के साथ धीरे-धीरे नए जीव-रूप बने और पुराने विलुप्त हुए — यही क्रमिक विकास है।

प्राकृतिक वरण (Natural Selection): प्रत्येक जनसंख्या में विविधता (variation) होती है। जिन जीवों में वे विशेषताएँ होती हैं जो पर्यावरण में जीवित रहने व अधिक संतान पैदा करने में सहायक होती हैं, वे प्राकृतिक रूप से चुने जाते हैं। यही प्राकृतिक वरण है।

अल्फ्रेड रसेल वॉलेस ने मलय द्वीपसमूह पर स्वतंत्र रूप से लगभग समान सिद्धांत प्रस्तुत किया — इसलिए इस सिद्धांत को डार्विन-वॉलेस सिद्धांत भी कहा जाता है।

लामार्क का अस्वीकृत सिद्धांत: उन्होंने कहा कि अंगों के उपयोग-अनुपयोग से अर्जित लक्षण अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होते हैं (जैसे जिराफ की गर्दन)। आज यह विचार वैज्ञानिक रूप से खारिज है, क्योंकि अर्जित लक्षण जनन-कोशिकाओं के DNA में परिवर्तन नहीं लाते।
NEET फोकस
  • डार्विन की यात्रा — 1831–1836
  • प्राकृतिक वरण के प्रवर्तक — डार्विन एवं वॉलेस
  • लामार्क का सिद्धांत — उपयोग-अनुपयोगअर्जित लक्षणों की वंशागति (अस्वीकृत)

4 विकास के प्रमाण

जीवाश्म, भ्रूणिकी, तुलनात्मक शारीरिकी

जीवाश्मिक (पुराजीवी) प्रमाण

चट्टानों की तलछट परतों में विभिन्न आयु के जीवाश्म मिलते हैं — कुछ आधुनिक जीवों से मिलते-जुलते हैं, कुछ विलुप्त (जैसे डायनासोर)। इससे स्पष्ट है कि अलग-अलग भूवैज्ञानिक कालों में अलग-अलग जीव-रूप प्रकट हुए और विलुप्त हुए।

डायनासोरों का वंश-वृक्ष ट्राइसेरेटॉप्स टाइरैनोसौरस टेरेनोडॉन मगरमच्छ (आज) आर्कियोप्टेरिक्स स्टेगोसौरस ब्रैकियोसौरस
चित्र 6.2 — डायनासोर एवं उनके आधुनिक रिश्तेदार (स्वनिर्मित)

भ्रूणिकीय प्रमाण

अर्नेस्ट हेकल ने कहा कि सभी कशेरुकी भ्रूणों में गलफड़ों की श्रृंखला अस्थायी रूप से दिखती है — यह विकास का प्रमाण है। कार्ल-अर्नेस्ट बेयर ने इसकी सीमाएँ स्पष्ट कीं, कि भ्रूण किसी अन्य जंतु की वयस्क अवस्था से होकर नहीं गुज़रता, फिर भी प्रारंभिक समानताएँ सामान्य पूर्वज की ओर संकेत करती हैं।

तुलनात्मक शारीरिकी — समजातता एवं अनुरूपता

संकल्पनापरिभाषाउदाहरणविकास प्रकार
समजातता (Homology)उत्पत्ति समान, कार्य भिन्नमानव, चमगादड़, व्हेल के अग्रपादअपसारी विकास
तुल्यरूपता (Analogy)कार्य समान, उत्पत्ति भिन्नपक्षी व तितली के पंख; ऑक्टोपस व मानव की आँखअभिसारी विकास
समजात अंग — अग्रपाद मानवचीताव्हेलचमगादड़ ह्यूमरस ह्यूमरस ह्यूमरस ह्यूमरस भिन्न कार्य — परंतु अस्थि-संरचना समान → समजातता
चित्र 6.3 — समजात अंग (स्वनिर्मित)

जैव रासायनिक एवं आनुवंशिक प्रमाण

विभिन्न जीवों में प्रोटीन व जीनों की समानताएँ साझे पूर्वज का संकेत देती हैं — यह आणविक स्तर पर विकास का प्रमाण है।

कृत्रिम वरण

मनुष्य ने कृषि एवं पालतू जानवरों में चयनात्मक प्रजनन द्वारा नई नस्लें (जैसे विभिन्न कुत्तों की नस्लें) बनाईं। यदि मनुष्य सौ वर्षों में ऐसा कर सकता है, तो प्रकृति लाखों वर्षों में कर सकती है — यह प्राकृतिक वरण का प्रबल तर्क है।

औद्योगिक कालिमा — इंग्लैंड के शलभों का अध्ययन

औद्योगिक कालिमा (अ) प्रदूषण-रहित — हल्के तने श्वेत शलभ (छिपा) काला शलभ (दिखता) (ब) प्रदूषित — काले तने श्वेत शलभ (दिखता) काला शलभ (छिपा)
चित्र 6.4 — श्वेत एवं काले शलभों की दृश्यता (स्वनिर्मित)

औद्योगीकरण से पहले श्वेत शलभ छद्मावरण (लाइकेन) के कारण बचते थे; कालिख से तने काले होने पर गहरे शलभ प्रभावी हो गए। यह प्राकृतिक वरण का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

प्रतिजैविक प्रतिरोध

बैक्टीरिया में प्रतिजैविक के प्रति प्रतिरोध, मानव-प्रेरित विकास का तीव्र उदाहरण है। यह दर्शाता है कि विकास प्रसंभाव्य (probabilistic) है — संयोग, उत्परिवर्तन एवं चयन पर निर्भर।

NEET फोकस
  • समजातता → अपसारी विकास (कार्य भिन्न, उत्पत्ति समान)
  • तुल्यरूपता → अभिसारी विकास (कार्य समान, उत्पत्ति भिन्न)
  • औद्योगिक कालिमा — इंग्लैंड के शलभ
  • प्रतिजैविक प्रतिरोध — मानव-प्रेरित विकास

5 अनुकूली विकिरण

एक पूर्वज से अनेक प्रजातियाँ

अनुकूली विकिरण — किसी एक भू-भौगोलिक क्षेत्र में एक साझे पूर्वज से अनेक नई प्रजातियाँ विकसित होकर विभिन्न निकेतनों (niches) में फैल जाती हैं।

डार्विन की फिंच चिड़ियाँ — गैलापैगोस द्वीप

डार्विन फिंच — चोंच विविधता बीजभक्षीकीटभक्षीकली/फल भक्षीशाकाहारी एक पूर्वज से — भोजन के अनुसार चोंच में विविधता
चित्र 6.5 — फिंच पक्षियों की चोंच विविधता (स्वनिर्मित)

ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल

ऑस्ट्रेलिया के शिशुधानी प्राणी (कंगारू, कोआला, तस्मानियाई भेड़िया) एक साझे पूर्वज से विकसित हुए — यह भी अनुकूली विकिरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

समांतर अनुकूली विकिरण: जब अलग-अलग महाद्वीपों में स्वतंत्र रूप से समान अनुकूली विकिरण होता है (जैसे अपरा-स्तनधारी व ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल में समान रूप वाले प्राणी) — इसे अभिसारी विकास भी कहा जा सकता है।
NEET फोकस
  • अनुकूली विकिरण — एक क्षेत्र में, एक पूर्वज से अनेक प्रजातियाँ
  • प्रमुख उदाहरण — डार्विन फिंच, ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल
  • समांतर अनुकूली विकिरण — अभिसारी विकास से संबंधित

6 विकास की क्रियाविधि

उत्परिवर्तन, विविधता, उपयुक्तता

ह्यूगो डी व्रीज़ ने इवनिंग प्रिमरोज़ पर कार्य करके उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) का सिद्धांत दिया — विकास में अचानक बड़े परिवर्तन (साल्टेशन) नई प्रजाति उत्पन्न करते हैं। बाद में समष्टि आनुवंशिकी ने स्पष्ट किया कि छोटी क्रमिक विविधताएँ तथा बड़े उत्परिवर्तन दोनों मिलकर विकास को गति देते हैं।

डार्विन बनाम डी व्रीज़
  • डार्विन: छोटी, क्रमिक विविधताएँ, दिशावान (adaptive)
  • डी व्रीज़: बड़े, अचानक उत्परिवर्तन (साल्टेशन), यादृच्छिक

उपयुक्तता (Fitness)

उपयुक्तता वंशानुगत विशेषताओं पर आधारित होती है — जो जीव पर्यावरण के अनुकूल अधिक होता है, वह अधिक संतान छोड़ता है। उपयुक्तता का आनुवंशिक आधार होता है, और प्राकृतिक वरण का अंतिम परिणाम ही उपयुक्तता है।

NEET फोकस
  • उत्परिवर्तन सिद्धांत — ह्यूगो डी व्रीज़
  • उपयुक्तता — वंशानुगत विशेषताओं पर आधारित
  • विकास की गति — छोटी जीवन-अवधि (बैक्टीरिया) में तीव्र, लंबी अवधि (मछली) में धीमी

7 हार्डी-वेनबर्ग सिद्धांत

आनुवंशिक साम्यता एवं उसे बिगाड़ने वाले घटक

हार्डी-वेनबर्ग सिद्धांत कहता है कि एक जनसंख्या में अलील आवृत्तियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी स्थिर रहती हैं — जब तक उत्परिवर्तन, वरण, प्रवास आदि जैसे विघटनकारी कारक न हों। इसे आनुवंशिक साम्यता कहते हैं।

हार्डी-वेनबर्ग समीकरण: p² + 2pq + q² = 1
जहाँ p = प्रभावी अलील (A) की आवृत्ति, q = अप्रभावी अलील (a) की आवृत्ति, तथा p + q = 1
जीनोटाइपआवृत्ति
AA (समयुग्मजी प्रभावी)
Aa (विषमयुग्मजी)2pq
aa (समयुग्मजी अप्रभावी)

आनुवंशिक साम्यता को प्रभावित करने वाले पाँच घटक

क्र.घटकविवरण
1जीन प्रवाहजनसंख्या के बीच जीवों/युग्मकों का आवागमन → नए अलील आना
2आनुवंशिक विचलनअलील आवृत्ति में यादृच्छिक परिवर्तन (संस्थापक प्रवाह इसका रूप)
3उत्परिवर्तनDNA में अचानक परिवर्तन → नए अलील
4आनुवंशिक पुनर्योगमियोसिस के दौरान नए संयोजन
5प्राकृतिक वरणअधिक उपयुक्तता वाले जीवों का चयन
प्राकृतिक वरण — तीन प्रकार (अ) स्थायीकारक शिखर ऊँचा व सँकरा (ब) दिशात्मक शिखर एक दिशा को सरकता (स) विदारक दो शिखर बनते हैं
चित्र 6.8 — प्राकृतिक वरण के प्रकार (स्वनिर्मित)
NEET फोकस
  • समीकरण — p² + 2pq + q² = 1
  • पाँच विघटनकारी घटक — जीन प्रवाह, आनुवंशिक विचलन, उत्परिवर्तन, पुनर्योग, प्राकृतिक वरण
  • संस्थापक प्रवाह — आनुवंशिक विचलन का रूप

8 विकास का कालक्रम

प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाएँ

समय (वर्ष पूर्व)घटना
~2000 मिलियनप्रथम कोशिकीय जीवन; प्रकाश-संश्लेषण की क्षमता विकसित
~500 मिलियनबहुकोशिकीय व अकशेरुकी जीव सक्रिय
~350 मिलियनजबड़े-रहित मछलियाँ; उभयचरों के पूर्वज
~320 मिलियनसमुद्री पादप व स्थलीय वनस्पति
~200 मिलियनडायनासोरों का युग; सरीसृप प्रभुत्व
~65 मिलियनडायनासोर विलुप्त; स्तनधारियों का प्रभुत्व
सीलाकैंथ (लैटिमेरिया): 1938 में दक्षिण अफ्रीका में एक जीवित मछली मिली, जिसे पहले विलुप्त माना गया था — यह 'जीवित जीवाश्म' है।
NEET फोकस
  • प्रथम कोशिकीय जीवन ~2000 मिलियन वर्ष पूर्व
  • डायनासोर विलुप्त ~65 मिलियन वर्ष पूर्व
  • सीलाकैंथ — जीवित जीवाश्म

9 मानव का उद्भव एवं विकास

नरवानर से आधुनिक मानव तक

जीव-रूपसमय (वर्ष पूर्व)मस्तिष्क क्षमता (cc)प्रमुख विशेषताएँ
ड्रायोपिथिकस/रामापिथिकस~15 मिलियनबालों से ढका; नरवानर; रामापिथिकस अधिक मानव-सदृश
ऑस्ट्रैलोपिथेसिन~2 मिलियन450–550सीधे चलते थे; फलाहारी; पत्थर के हथियार
होमो हैबिलिस~2 मिलियन650–800प्रथम औज़ार-निर्माता ('हैंडी मैन')
होमो इरैक्टस1.5 मिलियन~900सीधा चलना; आग का उपयोग; जावा में जीवाश्म
होमो निएंडरटैलेंसिस1,00,000–40,000~1400मृतकों को दफनाना; खाल पहनना
होमो सैपियंस75,000–10,000~1350–1400अफ्रीका में विकसित; विश्व भर में फैलाव; कृषि ~10,000 वर्ष पूर्व
मानव-खोपड़ी बनाम चिंपैंज़ी आधुनिक मानव वयस्क चिंपैंज़ी शिशु चिंपैंज़ी
चित्र 6.11 — खोपड़ियों की तुलना (स्वनिर्मित)
महत्वपूर्ण: मानव-विकास के साथ भाषा, कौशल व आत्मबोध का भी विकास हुआ। गुफा-चित्रकला ~18,000 वर्ष पूर्व तथा कृषि ~10,000 वर्ष पूर्व आरंभ हुई।
NEET फोकस
  • होमो हैबिलिस — प्रथम औज़ार-निर्माता
  • होमो इरैक्टस — आग का उपयोग
  • निएंडरटाल — मृतकों को दफनाना
  • होमो सैपियंस — अफ्रीका में उत्पत्ति, विश्व भर में फैलाव

NEET फैक्ट‑शीट

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

अवधारणाप्रमुख तथ्य
ब्रह्मांड आयु13.8 अरब वर्ष
पृथ्वी आयु4.5 अरब वर्ष
जीवन आरंभ400 करोड़ वर्ष पूर्व
मिलर-यूरे1953 — अमीनो अम्ल संश्लेषण
प्राकृतिक वरणडार्विन-वॉलेस
समजातताअपसारी विकास
तुल्यरूपताअभिसारी विकास
अनुकूली विकिरणडार्विन फिंच, ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल
हार्डी-वेनबर्गp² + 2pq + q² = 1
होमो हैबिलिस650–800 cc, प्रथम औज़ार-निर्माता
होमो इरैक्टस~900 cc, आग का उपयोग
होमो सैपियंसअफ्रीका, ~75,000–10,000 वर्ष पूर्व

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 मानव विकास का सही कालानुक्रम क्या है?

उत्तर: होमो हैबिलिस → होमो इरैक्टस → होमो निएंडरटैलेंसिस → होमो सैपियंस

यह मानव-विकास का मानक क्रम है। हैबिलिस (प्रथम औज़ार-निर्माता) सबसे पुराना, फिर इरैक्टस (आग का उपयोग), फिर निएंडरटाल (मृतकों को दफनाना), और अंततः आधुनिक मानव होमो सैपियंस।

2 पेंग्विन व डॉल्फिन के फ्लिपर किसका उदाहरण हैं?

उत्तर: अभिसारी विकास (Convergent evolution)

पेंग्विन (पक्षी) व डॉल्फिन (स्तनधारी) — असंबद्ध वंशरेखाएँ, परंतु समान जलीय पर्यावरण के अनुकूलन के कारण समरूप (analogous) फ्लिपर विकसित हुए।

3 हार्डी-वेनबर्ग समीकरण में p² किस जीनोटाइप की आवृत्ति दर्शाता है?

उत्तर: AA (समयुग्मजी प्रभावी)

p² = AA, 2pq = Aa, q² = aa, तथा p + q = 1, p² + 2pq + q² = 1

4 जीवित जीवाश्म का उदाहरण क्या है?

उत्तर: सीलाकैंथ (लैटिमेरिया)

1938 में दक्षिण अफ्रीका में पुनः खोजी गई यह मछली 'जीवित जीवाश्म' कहलाती है, क्योंकि इसे पहले 70 मिलियन वर्ष पूर्व विलुप्त मान लिया गया था।

5 अनुकूली विकिरण का उत्कृष्ट उदाहरण क्या है?

उत्तर: डार्विन की फिंच चिड़ियाँ

गैलापैगोस द्वीप पर एक पूर्वज से अनेक प्रजातियाँ — चोंच के आकार में विविधता के साथ — यह अनुकूली विकिरण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

6 वंशानुगत विभिन्नताओं के आधार पर उत्तरजीविता व प्रजनन-सफलता बढ़ाने का सिद्धांत किसने दिया?

उत्तर: चार्ल्स डार्विन

डार्विन का मूल योगदान यह दिखाना था कि वंशानुगत विभिन्नताएँ प्राकृतिक वरण द्वारा छाँटी जाती हैं, जिससे उपयुक्तता व प्रजनन-सफलता बढ़ती है।

अतिरिक्त NEET तथ्य

सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं

महत्वपूर्ण
  • इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 2–3 प्रश्न (~8–12 अंक) पूछे जाते हैं।
  • सबसे अधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — जीवन की उत्पत्ति, विकास के प्रमाण (समजातता-तुल्यरूपता), हार्डी-वेनबर्ग समीकरण, मानव-विकास क्रम
तुलनात्मक
  • अपसारी (समजात) बनाम अभिसारी (तुल्यरूप): समजात → कार्य भिन्न, उत्पत्ति समान; तुल्यरूप → कार्य समान, उत्पत्ति भिन्न।
  • डार्विन बनाम लामार्क: डार्विन — वंशानुगत विविधता पर वरण; लामार्क — उपयोग-अनुपयोग व अर्जित लक्षण (अस्वीकृत)।
तथ्य
  • पैन-स्पर्मिया: जीवन अंतरिक्ष से स्पोर रूप में पृथ्वी पर आया — एक परिकल्पना, प्रमाणित नहीं।
  • औद्योगिक कालिमा: इंग्लैंड के शलभों में प्राकृतिक वरण का प्रत्यक्ष उदाहरण।
ट्रैप
  • होमो सैपियंस की उत्पत्ति — अफ्रीका (ऑस्ट्रेलिया नहीं) — "आउट ऑफ अफ्रीका" परिकल्पना।
  • हार्डी-वेनबर्ग — केवल द्विगुणित, यादृच्छिक संभोग, बड़ी जनसंख्या पर लागू होता है।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — मिलर प्रयोग, डार्विन-वॉलेस योगदान, समजात-तुल्यरूप अंगों के उदाहरण, तथा हार्डी-वेनबर्ग समीकरण — इन चारों पर विशेष ध्यान दें।

संक्षिप्त सार

जीवन की उत्पत्ति

ब्रह्मांड 13.8 अरब वर्ष; पृथ्वी 4.5 अरब वर्ष; जीवन ~400 करोड़ वर्ष पूर्व। मिलर-यूरे (1953) — अमीनो अम्ल संश्लेषण।

प्राकृतिक वरण

डार्विन-वॉलेस; जनसंख्या में विविधता → अधिक उपयुक्तता वाले जीवों का चयन → क्रमिक परिवर्तन।

विकास के प्रमाण

जीवाश्म, भ्रूणिकी, समजातता (अपसारी), तुल्यरूपता (अभिसारी), औद्योगिक कालिमा, प्रतिजैविक प्रतिरोध।

अनुकूली विकिरण

एक भू-क्षेत्र में एक पूर्वज से अनेक प्रजातियाँ — डार्विन फिंच, ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल।

हार्डी-वेनबर्ग

p² + 2pq + q² = 1; आनुवंशिक साम्यता; बिगाड़ने वाले घटक — जीन प्रवाह, विचलन, उत्परिवर्तन, पुनर्योग, वरण।

मानव विकास

होमो हैबिलिस → इरैक्टस → निएंडरटाल → सैपियंस; अफ्रीका में उत्पत्ति; कृषि ~10,000 वर्ष पूर्व।

? अभ्यास प्रश्न-उत्तर

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें एवं उत्तर देखें

प्रश्न 1 जीवाणुओं में प्रतिजैविक प्रतिरोध की घटना डार्विन के प्राकृतिक वरण सिद्धांत को कैसे पुष्ट करती है?
उत्तर

प्रतिजैविक के संपर्क में आने पर, जीवाणु-जनसंख्या में पहले से मौजूद प्रतिरोधी रूप (उत्परिवर्तन द्वारा उत्पन्न) ही जीवित रह पाते हैं। प्रतिजैविक चयनात्मक दबाव बनाता है, जिससे संवेदनशील रूप मर जाते हैं और प्रतिरोधी रूप बहुगुणित हो जाते हैं। यह ठीक डार्विन के प्राकृतिक वरण का एक तीव्र एवं प्रत्यक्ष उदाहरण है — जो विविधता किसी परिस्थिति में उपयुक्त होती है, वही प्रभावी होती जाती है।

प्रश्न 2 'प्रजाति' की स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर

जैविक प्रजाति संकल्पना (अर्नेस्ट मेयर): प्रजाति समरूप जीवों का वह समूह है जो प्राकृतिक अवस्था में आपस में अंतःप्रजनन करके जननक्षम संतान उत्पन्न कर सकते हैं, तथा अन्य समूहों से जनन-रूप से पृथक रहते हैं।

सरल शब्दों में: एक ही प्रजाति के सदस्य आपस में प्रजनन कर सकते हैं और उनकी संतानें भी प्रजनन-क्षम होती हैं; भिन्न प्रजातियों के बीच संकरण अक्सर बाँझ संतान (जैसे खच्चर) देता है या संभव नहीं होता।

प्रश्न 3 अनुकूली विकिरण को डार्विन की फिंच चिड़ियों के उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर

अनुकूली विकिरण: एक ही पूर्वज-प्रजाति से, एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में, विभिन्न निकेतनों (आहार-स्रोतों) के अनुकूल अनेक नई प्रजातियों का विकास।

डार्विन की फिंच: गैलापैगोस द्वीप समूह पर एक बीजभक्षी फिंच पूर्वज से कई किस्में बनीं — कुछ की चोंच मोटी (बीज चबाने हेतु), कुछ की पतली नुकीली (कीट पकड़ने हेतु), कुछ शाकाहारी (कली/फल खाने हेतु)। यह सब एक ही पूर्वज से, अलग-अलग आहार के अनुकूलन का परिणाम है — यही अनुकूली विकिरण है।

प्रश्न 4 समजातता एवं तुल्यरूपता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
बिंदुसमजातता (Homology)तुल्यरूपता (Analogy)
उत्पत्तिसमानभिन्न
कार्यभिन्नसमान
विकास प्रकारअपसारीअभिसारी
उदाहरणमानव, चमगादड़, व्हेल के अग्रपादपक्षी व तितली के पंख
विकास का प्रमाण?हाँ (सामान्य पूर्वज)नहीं (केवल पर्यावरणीय अनुकूलन)
प्रश्न 5 हार्डी-वेनबर्ग समीकरण को एक उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर

हार्डी-वेनबर्ग समीकरण: p² + 2pq + q² = 1, जहाँ p = प्रभावी अलील (A) की आवृत्ति, q = अप्रभावी अलील (a) की आवृत्ति, तथा p + q = 1।

उदाहरण: यदि किसी जनसंख्या में अप्रभावी अलील a की आवृत्ति q = 0.4 है, तो p = 1 – 0.4 = 0.6। अतः जीनोटाइप आवृत्तियाँ — AA = p² = 0.36, Aa = 2pq = 2×0.6×0.4 = 0.48, aa = q² = 0.16। कुल योग = 0.36 + 0.48 + 0.16 = 1।

यदि वास्तविक आवृत्तियाँ इन मानों से भिन्न हों, तो विकासीय परिवर्तन घटित हो रहा है।

यह अध्ययन सामग्री विकास के सभी प्रमुख पहलुओं — जीवन की उत्पत्ति, डार्विनवाद, विकास के प्रमाण, अनुकूली विकिरण, हार्डी-वेनबर्ग सिद्धांत, तथा मानव-विकास — को सरल, मौलिक एवं परीक्षा-अनुकूल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिसमें NEET-स्तरीय तथ्य, तुलनात्मक तालिकाएँ एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर सम्मिलित हैं।

जीवन की यह अद्भुत यात्रा — अणुओं से मानव तक, विकास की अनवरत कहानी।

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