जैव-अणु — सम्पूर्ण अध्याय नोट्स (अध्याय 10)
रसायन विज्ञान • कक्षा-11 • अध्याय 10

जैव-अणु (Biomolecules)

कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, एन्जाइम, विटामिन, न्यूक्लीक अम्ल तथा हॉर्मोन — जीवन को प्रेरित करने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं का सुव्यवस्थित अध्ययन। नामकरण, संरचना, वर्गीकरण, तथ्य, तालिकाएँ, आरेख, पाठ्यनिहित प्रश्न (10.1–10.8) तथा अभ्यास प्रश्न (10.1–10.25) के विस्तृत हल — एक ही स्थान पर।

Cₙ(H₂O)ₙ — कार्बोहाइड्रेट
α-एमिनो अम्ल — प्रोटीन मोनोमर
A=T, G≡C — DNA क्षारक युग्मन
★ NEET फोकस तथ्य

1 कार्बोहाइड्रेट — परिचय एवं परिभाषा

कार्बोहाइड्रेट जीवजगत में सर्वाधिक मात्रा में पाए जाने वाले कार्बनिक यौगिक हैं। ये मुख्यतः पौधों द्वारा प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा संश्लेषित किए जाते हैं। इनका सामान्य सूत्र Cx(H₂O)y होता है, जिसके कारण इन्हें "कार्बन के जलयोजित" (hydrates of carbon) की संज्ञा दी गई। परंतु यह परिभाषा अपूर्ण है — कुछ यौगिक इस सूत्र को पूरा करते हुए भी कार्बोहाइड्रेट नहीं होते (जैसे ऐसीटिक अम्ल, CH₃COOH, जो C₂(H₂O)₂ के अनुरूप है, पर कार्बोहाइड्रेट नहीं है), तथा कुछ कार्बोहाइड्रेट इस सूत्र का पालन नहीं करते (जैसे रैम्नोस, C₆H₁₂O₅)।

आधुनिक रासायनिक परिभाषा के अनुसार, कार्बोहाइड्रेट बहुहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड अथवा बहुहाइड्रॉक्सी कीटोन होते हैं, अथवा वे यौगिक जो जल-अपघटन पर ऐसी इकाइयाँ उत्पन्न करते हैं। मीठे स्वाद वाले कार्बोहाइड्रेट को शर्करा (sugars) कहा जाता है; सभी कार्बोहाइड्रेट मीठे नहीं होते (जैसे स्टार्च, सेलुलोस)।

स्टार्च, सेलुलोस, ग्लूकोस, फ्रक्टोज़, सूक्रोस — ये सभी कार्बोहाइड्रेट के सामान्य उदाहरण हैं। घरेलू उपयोग की शर्करा (चीनी) सूक्रोस है; दुग्ध में पाई जाने वाली शर्करा लैक्टोस कहलाती है।
त्वरित तथ्य
  • कार्बोहाइड्रेट को सैकैराइड भी कहते हैं (ग्रीक: सैकेरॉन = शर्करा)।
  • सभी कार्बोहाइड्रेट में कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन होते हैं; अधिकांश का सूत्र Cₙ(H₂O)ₘ के अनुरूप होता है, परंतु सभी नहीं।

2 कार्बोहाइड्रेट का वर्गीकरण

कार्बोहाइड्रेटों को जल-अपघटन में उनके व्यवहार के आधार पर मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा गया है:

वर्गपरिभाषाउदाहरण
मोनोसैकेराइडपॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड/कीटोन; और सरल यौगिकों में जल-अपघटित नहीं हो सकतेग्लूकोस, फ्रक्टोज़, राइबोस
ओलिगोसैकेराइडजल-अपघटन से 2–10 मोनोसैकेराइड इकाइयाँ देते हैंडाइसैकेराइड (सूक्रोस, माल्टोस, लैक्टोस)
पॉलिसैकेराइडजल-अपघटन पर अत्यधिक संख्या में मोनोसैकेराइड इकाइयाँ देते हैंस्टार्च, सेलुलोस, ग्लाइकोजन

अपचायी बनाम अनपचायी शर्करा: जो कार्बोहाइड्रेट फेहलिंग विलयन या टॉलेन अभिकर्मक को अपचित कर देते हैं, वे अपचायी शर्करा कहलाते हैं। सभी मोनोसैकेराइड (एल्डोस तथा कीटोस दोनों) अपचायी होते हैं। डाइसैकेराइडों में माल्टोस व लैक्टोस अपचायी हैं, जबकि सूक्रोस अनपचायी है (क्योंकि इसके दोनों अपचायी समूह ग्लाइकोसाइडी बंध निर्माण में प्रयुक्त हो जाते हैं)।

3 मोनोसैकेराइड

मोनोसैकेराइडों का वर्गीकरण कार्बन परमाणुओं की संख्या एवं प्रकार्यात्मक समूह के आधार पर किया जाता है। यदि इसमें ऐल्डिहाइड समूह हो तो ऐल्डोस, तथा यदि कीटो समूह हो तो कीटोस कहलाता है। कार्बन परमाणुओं की संख्या को भी नाम में शामिल किया जाता है (जैसे ऐल्डोट्रायोस, कीटोटेट्रोस आदि)।

कार्बन परमाणुसामान्य पदऐल्डिहाइडकीटोन
3ट्रायोसऐल्डोट्रायोसकीटोट्रायोस
4टेट्रोसऐल्डोटेट्रोसकीटोटेट्रोस
5पेन्टोसऐल्डोपेन्टोसकीटोपेन्टोस
6हैक्सोजऐल्डोहैक्सोजकीटोहैक्सोज
7हेप्टोसऐल्डोहैप्टोसकीटोहैप्टोस

4 ग्लूकोस — विरचन एवं संरचना

ग्लूकोस (C₆H₁₂O₆) प्रकृति में मुक्त अवस्था में (फलों, शहद में) तथा संयुक्त अवस्था में (सूक्रोस, स्टार्च, सेलुलोस आदि के रूप में) पाया जाता है। इसे डेक्सट्रोस भी कहते हैं, क्योंकि यह दक्षिणावर्ती ध्रुवण घूर्णन (dextrorotatory) दर्शाता है।

ग्लूकोस के विरचन की विधियाँ

1. सूक्रोस से: सूक्रोस (C₁₂H₂₂O₁₁) को तनु अम्ल (HCl या H₂SO₄) के साथ ऐल्कोहॉलिक विलयन में क्वथन करने पर ग्लूकोस तथा फ्रक्टोज़ समान मात्रा में प्राप्त होते हैं।

2. स्टार्च से: औद्योगिक स्तर पर स्टार्च को तनु H₂SO₄ के साथ 393K तथा दाब पर क्वथन करने पर ग्लूकोस प्राप्त होता है।

अभिक्रियाएँ C₁₂H₂₂O₁₁ + H₂O →(H⁺)→ C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोस) + C₆H₁₂O₆ (फ्रक्टोस)
(C₆H₁₀O₅)ₙ + nH₂O →(H⁺, 393K)→ nC₆H₁₂O₆ (ग्लूकोस)

ग्लूकोस की संरचना — प्रमाण

1. आण्विक सूत्र C₆H₁₂O₆ है।

2. HI के साथ लंबे समय तक गरम करने पर n-हैक्सेन (CH₃–CH₂–CH₂–CH₂–CH₂–CH₃) प्राप्त होता है — यह सिद्ध करता है कि सभी छ: कार्बन एक ऋजु शृंखला में जुड़े हैं।

3. ग्लूकोस, हाइड्रॉक्सिलऐमीन के साथ ऑक्सिम तथा HCN के साथ सायनोहाइड्रिन बनाता है — यह कार्बोनिल (>C=O) समूह की उपस्थिति दर्शाता है।

4. ब्रोमीन जल (दुर्बल ऑक्सीकारक) द्वारा ऑक्सीकरण से ग्लूकोनिक अम्ल (छ: कार्बन वाला मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल) बनता है — यह सिद्ध करता है कि कार्बोनिल समूह ऐल्डिहाइड (–CHO) है, कीटोन नहीं।

5. ऐसीटिक ऐनहाइड्राइड द्वारा ऐसीटिलन से ग्लूकोस पेन्टाऐसीटेट बनता है — यह पाँच –OH समूहों की उपस्थिति की पुष्टि करता है, जो भिन्न-भिन्न कार्बन पर होने चाहिए (अन्यथा स्थायी नहीं होता)।

6. HNO₃ (प्रबल ऑक्सीकारक) से ऑक्सीकरण पर सैकैरिक अम्ल (डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल) प्राप्त होता है — यह प्राथमिक ऐल्कोहॉलिक (–CH₂OH) समूह की उपस्थिति दर्शाता है।

CHO-(CHOH)₄-CH₂OH →(HI, Δ)→ CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃ (n-हैक्सेन) CHO-(CHOH)₄-CH₂OH →(NH₂OH)→ CH=N-OH-(CHOH)₄-CH₂OH (ऑक्सिम) CHO-(CHOH)₄-CH₂OH →(HCN)→ CH(OH)(CN)-(CHOH)₄-CH₂OH (सायनोहाइड्रिन) CHO-(CHOH)₄-CH₂OH →(Br₂ जल)→ COOH-(CHOH)₄-CH₂OH (ग्लूकोनिक अम्ल) CHO-(CHOH)₄-CH₂OH →(HNO₃)→ COOH-(CHOH)₄-COOH (सैकैरिक अम्ल)
चित्र: ग्लूकोस की संरचना निर्धारण संबंधी अभिक्रियाएँ
ग्लूकोस का पूरा नाम D-(+)-ग्लूकोस है — 'D' विन्यास को दर्शाता है (सबसे नीचे वाले असममित कार्बन पर –OH समूह दाईं ओर है), जबकि '(+)' दक्षिण ध्रुवण घूर्णकता को। 'D' व 'L' का ध्रुवण घूर्णकता से कोई संबंध नहीं है।

5 ग्लूकोस की चक्रीय संरचना

विवृत शृंखला संरचना ग्लूकोस के अधिकांश गुणों को स्पष्ट करती है, परंतु निम्नलिखित तथ्य इससे स्पष्ट नहीं होते:

1. ग्लूकोस शिफ-परीक्षण नहीं देता तथा NaHSO₃ के साथ योगज उत्पाद नहीं बनाता — ऐल्डिहाइड होते हुए भी यह अपेक्षित व्यवहार नहीं दिखाता।

2. ग्लूकोस का पेन्टाऐसीटेट, हाइड्रॉक्सिलऐमीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता — यह मुक्त –CHO की अनुपस्थिति को इंगित करता है।

3. ग्लूकोस दो भिन्न क्रिस्टलीय रूपों (α, गलनांक 419K तथा β, गलनांक 423K) में पाया जाता है — ये ऐनोमर कहलाते हैं।

यह समस्या तब हल हुई जब यह माना गया कि C-5 पर उपस्थित –OH समूह, C-1 के ऐल्डिहाइड समूह के साथ योगज (addition) द्वारा एक चक्रीय हेमीऐसीटैल (hemiacetal) बनाता है। इस प्रकार ग्लूकोस एक छ: सदस्यीय (पाइरैनोस) वलय बनाता है। C-1 पर –OH के विन्यास में भिन्नता से α तथा β ऐनोमर प्राप्त होते हैं; C-1 को ऐनोमरी कार्बन कहते हैं।

पाइरैन (छ: सदस्यीय, 1 O + 5 C) O α-D-(+)-ग्लूकोपाइरैनोस ⇌ विवृत शृंखला (मुक्त CHO) ⇌ β-D-(+)-ग्लूकोपाइरैनोस (दोनों चक्रीय रूप C-1 पर –OH विन्यास में भिन्न — ऐनोमर)
चित्र: पाइरैन वलय तथा α/β ग्लूकोपाइरैनोस साम्य
त्वरित तथ्य
  • ग्लूकोस पाइरैनोस (छ: सदस्यीय) वलय बनाता है; C-5 का –OH वलय निर्माण में भाग लेता है।
  • ऐनोमरी कार्बन (C-1) पर –OH विन्यास के भेद से α व β ऐनोमर बनते हैं।
  • चक्रीय हेमीऐसीटैल रूप में मुक्त –CHO न होने के कारण शिफ-परीक्षण व NaHSO₃ योग नहीं होता।

6 फ्रक्टोज़ की संरचना

फ्रक्टोज़ (C₆H₁₂O₆) एक महत्वपूर्ण कीटोहैक्सोस है, जो सूक्रोस के जल-अपघटन पर ग्लूकोस के साथ प्राप्त होता है। यह फलों एवं सब्जियों में पाया जाता है तथा शुद्ध अवस्था में मधुरक के रूप में उपयोग होता है।

फ्रक्टोज़ में कार्बन संख्या 2 पर कीटोनिक समूह है तथा ग्लूकोस के समान छ: कार्बन की ऋजु शृंखला है। यह D-श्रेणी से संबंधित है तथा वामु ध्रुवण घूर्णक है — अतः इसे D-(–)-फ्रक्टोज़ लिखा जाता है।

फ्रक्टोज़ भी दो चक्रीय रूपों में उपस्थित रहता है, जो C-5 पर उपस्थित –OH तथा >C=O के योगज से बनते हैं। यहाँ पाँच सदस्यीय (फ्यूरेनोस) वलय बनता है, जिसे फ्यूरान (एक ऑक्सीजन + चार कार्बन) के अनुरूप फ्यूरेनोस कहते हैं।

O (फ्यूरान वलय) α-D-(–)-फ्रक्टोफ्यूरेनोस ⇌ विवृत शृंखला ⇌ β-D-(–)-फ्रक्टोफ्यूरेनोस
चित्र: फ्रक्टोज़ की फ्यूरेनोस चक्रीय संरचना

7 डाइसैकेराइड

डाइसैकेराइड दो मोनोसैकेराइड इकाइयों के मध्य ग्लाइकोसाइडी बंध (ऑक्साइड बंध, C–O–C) द्वारा जुड़ने से बनते हैं। जल-अपघटन पर ये समान अथवा भिन्न मोनोसैकेराइड देते हैं।

डाइसैकेराइडघटक मोनोसैकेराइडबंध का प्रकारअपचायी/अनपचायी
सूक्रोसα-D-ग्लूकोस + β-D-फ्रक्टोज़C₁(ग्लूकोस)–C₂(फ्रक्टोज़)अनपचायी
माल्टोसα-D-ग्लूकोस + α-D-ग्लूकोसC₁–C₄अपचायी
लैक्टोसβ-D-गैलेक्टोस + β-D-ग्लूकोसC₁(गैलेक्टोस)–C₄(ग्लूकोस)अपचायी

सूक्रोस (इक्षु-शर्करा): जल-अपघटन पर D-(+)-ग्लूकोस तथा D-(–)-फ्रक्टोज़ की सममोलर मात्रा देता है। दोनों अपचायक समूह बंध निर्माण में प्रयुक्त हो जाते हैं, अतः यह अनपचायी शर्करा है। सूक्रोस दक्षिणावर्ती है, परंतु जल-अपघटन पर मिश्रण वामावर्ती हो जाता है (फ्रक्टोज़ का प्रबल वामावर्तन) — इस परिवर्तन को अपवर्तन (inversion) कहते हैं, तथा प्राप्त उत्पाद को अपवर्तित शर्करा (invert sugar) कहते हैं।

माल्टोस: α-D-ग्लूकोस की दो इकाइयों से बना, जिसमें एक इकाई का C₁ दूसरी इकाई के C₄ से जुड़ता है। दूसरी इकाई का C₁ मुक्त ऐल्डिहाइड दे सकता है, अतः यह अपचायी शर्करा है।

लैक्टोस (दुग्ध शर्करा): β-D-गैलेक्टोस तथा β-D-ग्लूकोस से निर्मित; गैलेक्टोस के C₁ तथा ग्लूकोस के C₄ के मध्य बंध। ग्लूकोस इकाई का C-1 मुक्त ऐल्डिहाइड उत्पन्न कर सकता है, अतः यह भी अपचायी है।

8 पॉलिसैकेराइड

पॉलिसैकेराइड असंख्य मोनोसैकेराइड इकाइयों के ग्लाइकोसाइडी बंधों द्वारा संयुक्त होने से बनते हैं। ये प्रकृति में सर्वाधिक पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट हैं, जो मुख्यतः ऊर्जा-संचयन तथा संरचना-निर्माण का कार्य करते हैं।

पॉलिसैकेराइडमोनोमर व बंधप्राप्ति-स्थान/उपयोग
स्टार्च — ऐमिलोस (15-20%)α-D-ग्लूकोस, अशाखित, α-1,4-बंधपौधों में मुख्य संग्रहित पॉलिसैकेराइड, जल में घुलनशील
स्टार्च — ऐमिलोपेक्टिन (80-85%)α-D-ग्लूकोस, शाखित, α-1,4 (मुख्य) व α-1,6 (शाखन)जल में अविलेय
सेलुलोसβ-D-ग्लूकोस, अशाखित, β-1,4-बंधपादप कोशिका भित्ति का प्रधान अवयव
ग्लाइकोजनα-D-ग्लूकोस, ऐमिलोपेक्टिन से अधिक शाखितप्राणी स्टार्च — यकृत, मांसपेशी में संग्रहित
O O ग्लूकोस इकाइयाँ α-1,4-ग्लाइकोसाइडी बंध द्वारा जुड़कर ऐमिलोस/ग्लाइकोजन शृंखला बनाती हैं
चित्र: α-1,4-ग्लाइकोसाइडी बंध द्वारा ग्लूकोस इकाइयों का जुड़ना
ग्लाइकोजन (प्राणी स्टार्च) ऐमिलोपेक्टिन से अधिक शाखित होता है तथा यकृत, मांसपेशी तथा मस्तिष्क में संग्रहित रहता है। आवश्यकता पड़ने पर एन्जाइम इसे ग्लूकोस में तोड़ देते हैं।

9 ऐमीनो अम्ल

प्रोटीन जीव जगत में सर्वाधिक मात्रा में पाए जाने वाले जैव अणु हैं। "प्रोटीन" शब्द ग्रीक 'प्रोटियोस' (प्राथमिक/अतिमहत्वपूर्ण) से बना है। सभी प्रोटीन α-ऐमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं। ऐमीनो अम्ल में एक अणु में –NH₂ (ऐमीनो) तथा –COOH (कार्बोक्सिल) दोनों समूह उपस्थित होते हैं।

R–CH–COOH | NH₂ α-ऐमीनो अम्ल (R = पार्श्व शृंखला)
चित्र: α-ऐमीनो अम्ल का सामान्य सूत्र

प्रोटीनजनक ऐमीनो अम्लों की संख्या 20 है। इनमें से कुछ को आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहते हैं (जो शरीर में संश्लेषित नहीं हो सकते, भोजन से लेना पड़ता है) — उदाहरण: वैलीन, ल्यूसीन, लाइसीन, फेनिल-ऐलानिन, ट्रिप्टोफेन, मेथाइओनिन, थ्रिऑनीन, आइसोल्यूसीन, हिस्टिडीन, आर्जिनीन (बचपन में)। शेष अनावश्यक ऐमीनो अम्ल शरीर में संश्लेषित हो सकते हैं (जैसे ग्लाइसीन, ऐलानिन, ग्लूटैमिक अम्ल आदि)।

ऐमीनो अम्लपार्श्व शृंखला R3-अक्षर
ग्लाइसीनHGly
ऐलानिन–CH₃Ala
वैलीन*(H₃C)₂CH–Val
ल्यूसीन*(H₃C)₂CH–CH₂–Leu
लाइसीन*H₂N–(CH₂)₄–Lys
ग्लूटैमिक अम्लHOOC–CH₂–CH₂–Glu
ऐस्पार्टिक अम्लHOOC–CH₂–Asp
सेरीनHO–CH₂–Ser
फेनिल-ऐलानिन*C₆H₅–CH₂–Phe
टाइरोसीन(p)HO–C₆H₄–CH₂–Tyr

* आवश्यक ऐमीनो अम्ल (अन्य भी हैं — पूर्ण सूचि: वैलीन, ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन, आर्जिनीन, लाइसीन, थ्रिऑनीन, मेथाइओनिन, फेनिल-ऐलानिन, ट्रिप्टोफेन, हिस्टिडीन)

10 ऐमीनो अम्लों का वर्गीकरण

ऐमीनो अम्लों को –NH₂ तथा –COOH समूहों की संख्या के आधार पर उदासीन, अम्लीय, क्षारकीय में वर्गीकृत किया जाता है:

वर्गशर्त
उदासीनऐमीनो व कार्बोक्सिल समूहों की संख्या समान
क्षारकीयकार्बोक्सिल से अधिक ऐमीनो समूह
अम्लीयऐमीनो से अधिक कार्बोक्सिल समूह

ऐमीनो अम्ल ज्विटर आयन (द्विध्रुवीय आयन) के रूप में रहते हैं, जिसमें –COOH समूह प्रोटॉन त्यागकर –COO⁻ तथा –NH₂ प्रोटॉन ग्रहण करके –NH₃⁺ बनाता है। इस रूप में ऐमीनो अम्ल उभयधर्मी होते हैं (अम्लों एवं क्षारकों दोनों से अभिक्रिया)। ग्लाइसीन के अतिरिक्त अन्य सभी प्राकृतिक ऐमीनो अम्ल प्रकाशिक सक्रिय होते हैं (α-कार्बन असममित है) तथा 'L' विन्यास में पाए जाते हैं।

R–CH(NH₂)–COOH ⇌ R–CH(NH₃⁺)–COO⁻ (ज्विटर आयन / उभयाविष्ट आयन) जलीय विलयन में –COOH प्रोटॉन मुक्त करता है, –NH₂ प्रोटॉन ग्रहण करता है
चित्र: ऐमीनो अम्ल का ज्विटर आयन रूप

11 प्रोटीनों की संरचना

प्रोटीन α-ऐमीनो अम्लों के बहुलक हैं, जो आपस में पेप्टाइड बंध (–CO–NH–) द्वारा जुड़े रहते हैं (एक अणु का –COOH दूसरे के –NH₂ से जल निष्कासन कर बंध बनाता है)। 10 से अधिक ऐमीनो अम्ल वाली शृंखला पॉलिपेप्टाइड कहलाती है; 100 से अधिक तथा आण्विक द्रव्यमान >10,000 u वाली शृंखला प्रोटीन कहलाती है (यह सीमा कड़ाई से नहीं है — जैसे इन्सुलिन में 51 ऐमीनो अम्ल होते हुए भी इसे प्रोटीन माना जाता है)।

प्रोटीन संरचना के चार स्तर

(i) प्राथमिक संरचना: प्रोटीन में ऐमीनो अम्लों का जुड़ाव का विशिष्ट क्रम (अनुक्रम)। यह क्रम प्रोटीन की पहचान व कार्य निर्धारित करता है।

(ii) द्वितीयक संरचना: पॉलिपेप्टाइड शृंखला का त्रिविमी वलन/आकृति — मुख्यतः α-हेलिक्स (कुंडलित, हाइड्रोजन बंध द्वारा स्थायी) तथा β-प्लीटेड शीट (विस्तारित, अंतराआण्विक H-बंध)।

(iii) तृतीयक संरचना: द्वितीयक संरचना के और अधिक वलन/लिपटने से बनी समग्र त्रिविम आकृति — रेशेदार (fibrous) अथवा गोलिकाकार (globular) हो सकती है।

(iv) चतुष्क संरचना: दो या अधिक पॉलिपेप्टाइड शृंखलाओं (उप-इकाइयों) की परस्पर व्यवस्था — उदा. हीमोग्लोबिन (चार उप-इकाइयाँ)।

रेशेदार बनाम गोलिकाकार प्रोटीन
  • रेशेदार: समानांतर शृंखलाएँ, H व डाइसल्फाइड बंधों से जुड़ी — जल में अविलेय। उदा. केराटिन (बाल/ऊन/रेशम), मायोसिन (मांसपेशी)।
  • गोलिकाकार: शृंखलाएँ कुंडली बनाकर गोलाकृति — जल में विलेय। उदा. इन्सुलिन, ऐल्बुमिन, एन्जाइम।
द्वितीयक व तृतीयक संरचना को स्थायी रखने वाले बल: हाइड्रोजन बंध, डाइसल्फाइड बंध, वान्डर वाल बल तथा विद्युत आकर्षण बल।

12 प्रोटीन का विकृतीकरण

प्राकृत (native) प्रोटीन अपनी विशिष्ट त्रिविम संरचना एवं जैविक सक्रियता रखता है। जब इसे भौतिक (ताप) या रासायनिक (pH परिवर्तन) विक्षोभ के अधीन किया जाता है, तो हाइड्रोजन बंधों में अस्तव्यस्तता आ जाती है, जिससे गोलिका खुल जाती है तथा α-हेलिक्स अकुंडलित हो जाती है — प्रोटीन अपनी जैविक सक्रियता खो देता है। इसे प्रोटीन का विकृतीकरण (denaturation) कहते हैं।

ध्यान रहे: विकृतीकरण के दौरान द्वितीयक तथा तृतीयक संरचना नष्ट हो जाती है, परंतु प्राथमिक संरचना (पेप्टाइड बंध, ऐमीनो अम्ल क्रम) अप्रभावित रहती है। उदाहरण: अंडे का उबालना (स्कंदन), दही का जमना (लैक्टिक अम्ल द्वारा)।

13 एन्जाइम

एन्जाइम जैव उत्प्रेरक हैं, जो जैविक अभिक्रियाओं की दर को सक्रियण ऊर्जा घटाकर बढ़ाते हैं। लगभग सभी एन्जाइम गोलिकाकार प्रोटीन होते हैं। वे अत्यंत विशिष्ट होते हैं — एक एन्जाइम एक विशिष्ट क्रियाधार (substrate) पर ही कार्य करता है। एन्जाइम के नाम के अंत में प्रायः "-ऐस (-ase)" लगता है (जैसे माल्टेस, प्रोटीएस, लाइपेस)।

उदाहरण C₁₂H₂₂O₁₁ (माल्टोस) →(माल्टेस)→ 2 C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोस)

एन्जाइम अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा को कम कर देते हैं — उदाहरणार्थ, सूक्रोस के अम्लीय जल-अपघटन के लिए सक्रियण ऊर्जा 6.22 kJ mol⁻¹ है, जबकि सूक्रेस एन्जाइम द्वारा यह केवल 2.15 kJ mol⁻¹ होती है।

एन्जाइम के सक्रिय स्थल (active site) पर क्रियाधार "ताला-कुंजी" या "प्रेरित-फिट" मॉडल के अनुसार बंधता है, जो इसकी उच्च विशिष्टता को स्पष्ट करता है।

14 विटामिन

विटामिन वे कार्बनिक यौगिक हैं जिनकी शरीर को सूक्ष्म मात्रा में आवश्यकता होती है, परंतु इनकी कमी से विशिष्ट रोग हो जाते हैं। अधिकांश विटामिन शरीर में संश्लेषित नहीं हो सकते, अतः इन्हें आहार में लेना आवश्यक है। "विटामिन" शब्द 'विटल' (जीवन) + 'ऐमीन' से बना है, हालाँकि सभी विटामिनों में ऐमीनो समूह नहीं होता।

विटामिनों का वर्गीकरण

वर्गविटामिनसंग्रहण स्थान
वसा विलेयA, D, E, Kयकृत व वसा ऊतक
जल विलेयB-समूह तथा Cसंचित नहीं (B₁₂ के अतिरिक्त)
विटामिनस्रोतहीनता जनित रोग
विटामिन Aगाजर, मछली यकृत तेल, मक्खनज़िरॉफ्थैल्मिया, रात्रि अंधता
विटामिन B₁ (थायमीन)खमीर, दूध, हरी सब्जियाँबेरी-बेरी
विटामिन B₂ (राइबोफ्लेविन)दूध, अंडा, यकृतओष्ठ विदरण (कीलोसिस)
विटामिन B₆ (पिरिडॉक्सिन)खमीर, दालें, अंड-पीतमरोड़ पड़ना (convulsions)
विटामिन B₁₂मांस, मछली, अंडा, दहीप्रणाशी रक्ताल्पता (pernicious anaemia)
विटामिन Cसिट्रस फल, आँवला, हरी सब्जियाँस्कर्वी
विटामिन Dसूर्य प्रकाश, मछली, अंड-पीतरिकेट्स (बच्चे), ऑस्टियोमेलेशिया
विटामिन Eगेहूँ अंकुर तेल, सब्जी तेलRBC भुरभुरापन, मांसपेशी कमज़ोरी
विटामिन Kहरी पत्ती वाली सब्जियाँरक्त थक्का जमने के समय में वृद्धि
विटामिनों की अधिकता (hypervitaminosis) भी हानिकारक हो सकती है, विशेषकर वसा विलेय विटामिनों (A, D, E, K) की, क्योंकि ये शरीर में संचित हो सकते हैं।

15 न्यूक्लीक अम्ल — संघटन

आनुवांशिकता के लिए उत्तरदायी अणु न्यूक्लीक अम्ल हैं — DNA (डिऑक्सीराइबोस न्यूक्लीक अम्ल) तथा RNA (राइबोस न्यूक्लीक अम्ल)। ये न्यूक्लिओटाइडों के बहुलक (पॉलिन्यूक्लिओटाइड) होते हैं।

प्रत्येक न्यूक्लिओटाइड तीन घटकों से मिलकर बनता है: एक पेन्टोस शर्करा, एक फॉस्फेट समूह, तथा एक नाइट्रोजन क्षारक

घटकDNARNA
शर्कराβ-D-2-डिऑक्सीराइबोसβ-D-राइबोस
क्षारकऐडेनीन (A), ग्वानीन (G), साइटोसीन (C), थायमीन (T)ऐडेनीन (A), ग्वानीन (G), साइटोसीन (C), यूरेसिल (U)

क्षारकों का वर्गीकरण: ऐडेनीन व ग्वानीन प्यूरीन (द्वि-चक्रीय) हैं; साइटोसीन, थायमीन, यूरेसिल पिरिमिडीन (एकल-चक्रीय) हैं।

16 न्यूक्लीक अम्ल की संरचना

क्षारक + शर्करा (1′ स्थिति पर) → न्यूक्लिओसाइड; न्यूक्लिओसाइड + फॉस्फेट (5′ स्थिति पर) → न्यूक्लिओटाइड। न्यूक्लिओटाइड आपस में फॉस्फोडाइएस्टर बंध (5′ व 3′ कार्बनों के मध्य) द्वारा जुड़कर पॉलिन्यूक्लिओटाइड शृंखला बनाते हैं।

न्यूक्लीक अम्ल की एक शृंखला का सरल विवरण — शर्करा — फॉस्फेट — शर्करा — फॉस्फेट — शर्करा — ...
      |                            |
क्षारक                    क्षारक

DNA की संरचना द्विकुंडलिनी (double helix) है — दो पूरक रज्जुक एक-दूसरे के चारों ओर कुंडलित होते हैं, तथा क्षारक युग्मों के मध्य हाइड्रोजन बंध होते हैं: A–T (2 बंध) तथा G–C (3 बंध)

A≡T T=A C≡G G≡C A=T T=A 5′ 3′
चित्र: DNA की द्विकुंडलिनी संरचना

RNA सामान्यतः एकरज्जुकी होता है, जो कभी-कभी स्वयं को मोड़कर आंशिक द्विकुंडलित संरचना बना सकता है। RNA तीन प्रकार के होते हैं: m-RNA (संदेशवाहक), r-RNA (राइबोसोमल), t-RNA (अंतरण/स्थानांतरण)।

DNA में शर्करा 2-डिऑक्सीराइबोस (C-2′ पर –OH के स्थान पर –H) होती है, जिससे DNA अधिक स्थायी होता है; RNA में राइबोस (C-2′ पर –OH) होता है, जो इसे रासायनिक रूप से अधिक अस्थिर बनाता है।

17 न्यूक्लीक अम्ल के जैविक कार्य

DNA आनुवांशिकता का रासायनिक आधार है — यह आनुवांशिक सूचनाओं को संचित रखता है तथा कोशिका विभाजन के समय स्वप्रतिकरण (self replication) द्वारा समरूप प्रतियाँ बनाता है।

DNA, RNA के माध्यम से प्रोटीन संश्लेषण का संदेश प्रदान करता है। कोशिका में प्रोटीन का संश्लेषण m-RNA, r-RNA तथा t-RNA के सहयोग से होता है।

DNA अंगुलि छापन (DNA Fingerprinting): प्रत्येक व्यक्ति में DNA का क्षारक अनुक्रम अद्वितीय होता है। इसका उपयोग अपराधी पहचान, पैतृकता निर्धारण, दुर्घटना में शव पहचान तथा जैव विकास अध्ययन में किया जाता है।

18 हॉर्मोन

हॉर्मोन रासायनिक संदेशवाहक हैं, जो अंतःस्रावी ग्रंथियों में बनकर रक्त धारा द्वारा लक्ष्य अंग तक पहुँचते हैं।

रासायनिक प्रकृतिउदाहरण
स्टेरॉयडएस्ट्रोजन, ऐन्ड्रोजन
पॉलिपेप्टाइडइन्सुलिन, एन्डोर्फिन
ऐमीनो अम्ल व्युत्पन्नएपिनेफ्रिन, नॉरएपिनेफ्रिन

इन्सुलिन रक्त-ग्लूकोस को घटाता है; ग्लूकागॉन इसे बढ़ाता है — दोनों मिलकर संतुलन बनाए रखते हैं।

थायरॉक्सिन (T₄) (थायरॉइड ग्रंथि द्वारा स्रावित) उपापचय दर को नियंत्रित करता है; इसकी कमी से हाइपोथायराइडिज़्म व अधिकता से हाइपरथायरॉयडिज़्म होती है। आयोडीन की कमी से गलगंड (गॉइटर) हो जाता है (आयोडाइज़्ड नमक द्वारा निवारण)।

स्टेरॉयड हॉर्मोन (अधिवृक्क वल्कुट, गोनैड्स से) — ग्लूकोकॉर्टिकॉयड, मिनरैलोकॉर्टिकॉयड, टेस्टोस्टेरॉन, एस्ट्राडाइऑल, प्रोजेस्टेरॉन — विविध कार्यों के लिए उत्तरदायी होते हैं।

एक-पंक्ति तथ्य सूची

रिवीज़न कैप्सूल
  • कार्बोहाइड्रेट = बहुहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड/कीटोन अथवा जल-अपघटन पर ऐसी इकाइयाँ देने वाले यौगिक।
  • ग्लूकोस पाइरैनोस (6-सदस्यीय) वलय; फ्रक्टोज़ फ्यूरेनोस (5-सदस्यीय) वलय बनाता है।
  • सूक्रोस अनपचायी (दोनों अपचायक समूह बंध में प्रयुक्त); माल्टोस व लैक्टोस अपचायी।
  • स्टार्च α-बंध, सेलुलोस β-बंध से बना है; मानव सेलुलोस नहीं पचा सकता।
  • प्रोटीन α-ऐमीनो अम्लों के बहुलक हैं, पेप्टाइड बंध (–CO–NH–) से जुड़े।
  • ऐमीनो अम्ल जलीय विलयन में ज्विटर आयन (द्विध्रुवीय) के रूप में — उभयधर्मी।
  • प्राथमिक संरचना = ऐमीनो अम्ल क्रम; द्वितीयक = α-हेलिक्स/β-शीट; तृतीयक = त्रिविम वलन; चतुष्क = उप-इकाइयों की व्यवस्था।
  • विकृतीकरण में द्वितीयक-तृतीयक नष्ट, प्राथमिक सुरक्षित।
  • सभी एन्जाइम गोलिकाकार प्रोटीन हैं; सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, विशिष्ट होते हैं।
  • वसा विलेय विटामिन (A, D, E, K) संचित होते हैं; जल विलेय (B-समूह, C) संचित नहीं (B₁₂ अपवाद)।
  • DNA में डिऑक्सीराइबोस + थायमीन; RNA में राइबोस + यूरेसिल।
  • DNA द्विरज्जुकी (द्विकुंडलिनी); RNA एकरज्जुकी। क्षारक युग्मन: A=T (2 H-बंध), G≡C (3 H-बंध)।
  • m-RNA (संदेशवाहक), r-RNA (राइबोसोमल), t-RNA (अंतरण)।

सूत्र सारांश

संकल्पनासूत्र/विवरण
ऐल्केन सामान्य सूत्र (कार्बोहाइड्रेट नहीं, परंतु उल्लेखनीय)CₙH₂ₙ₊₂
कार्बोहाइड्रेट सामान्य सूत्र (अपूर्ण)Cx(H₂O)y
ग्लूकोस (D-ग्लूकोस)C₆H₁₂O₆
ग्लूकोस HI सेn-हैक्सेन (CH₃–(CH₂)₄–CH₃)
ग्लूकोस Br₂/H₂O सेग्लूकोनिक अम्ल (COOH–(CHOH)₄–CH₂OH)
ग्लूकोस HNO₃ सेसैकैरिक अम्ल (COOH–(CHOH)₄–COOH)
स्टार्च जल-अपघटन(C₆H₁₀O₅)ₙ + nH₂O → nC₆H₁₂O₆ (ग्लूकोस)
सूक्रोस जल-अपघटनC₁₂H₂₂O₁₁ + H₂O → C₆H₁₂O₆ + C₆H₁₂O₆
DNA क्षारक युग्मनA=T (2 H-बंध), G≡C (3 H-बंध)

पाठ्यनिहित प्रश्न (10.1 – 10.8)

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें।

10.1 ग्लूकोस तथा सूक्रोस जल में विलेय हैं जबकि साइक्लोहैक्सेन अथवा बेन्ज़ीन (सामान्य छ: सदस्यीय वलय युक्त यौगिक) जल में अविलेय होते हैं। समझाइए।
ग्लूकोस व सूक्रोस में अनेक ध्रुवीय –OH समूह होते हैं, जो जल के साथ हाइड्रोजन आबंध बना सकते हैं — अतः जल में विलेय हैं।
साइक्लोहैक्सेन तथा बेन्ज़ीन शुद्ध हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें –OH जैसा कोई ध्रुवीय समूह नहीं — ये जलविरागी हैं तथा जल में अविलेय रहते हैं।
10.2 लैक्टोस के जलअपघटन से किन उत्पादों के बनने की अपेक्षा करते हैं?
लैक्टोस के जल-अपघटन से β-D-गैलेक्टोस तथा β-D-ग्लूकोस समान मोलर मात्रा में प्राप्त होते हैं।
10.3 D-ग्लूकोस के पेन्टाऐसीटेट में आप ऐल्डिहाइड समूह की अनुपस्थिति को कैसे समझाएंगे?
ग्लूकोस चक्रीय हेमीऐसीटैल रूप में रहता है, जिसमें C-1 पर मुक्त –CHO नहीं, बल्कि एक हेमीऐसीटैल –OH होता है।
ऐसीटिलन पर यह –OH भी ऐसीटिलीकृत हो जाता है, जिससे पेन्टाऐसीटेट बनता है — इसमें कोई मुक्त –CHO शेष नहीं रहता, इसलिए हाइड्रॉक्सिलऐमीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता।
10.4 ऐमीनो अम्लों के गलनांक एवं जल में विलेयता सामान्यतः संगत हैलो अम्लों की तुलना में अधिक होती है। समझाइए।
ऐमीनो अम्ल ज्विटर आयन (द्विध्रुवीय आयन) रूप में रहते हैं, जिसमें धनात्मक एवं ऋणात्मक आवेश एक साथ होते हैं — आयनिक प्रकृति के कारण इनके मध्य प्रबल स्थिर-वैद्युत आकर्षण होता है, जिससे उच्च गलनांक व जल-विलेयता प्राप्त होती है।
हैलो अम्लों में आंतरिक द्विध्रुवीय आयनिक रूप नहीं होता, इसलिए उनके गलनांक व विलेयता अपेक्षाकृत कम होते हैं।
10.5 अंडे को उबालने पर उसमें उपस्थित जल कहाँ चला जाता है?
उबालने पर अंडे की सफेदी में उपस्थित प्रोटीन का विकृतीकरण होता है — गोलिकाकार संरचना खुलकर एक त्रि-आयामी जालक (नेटवर्क) बनाती है, जो स्कंदित हो जाता है।
जल इस जालक के भीतर भौतिक रूप से बद्ध (trapped) हो जाता है, इसीलिए उबला अंडा ठोस/अर्ध-ठोस बनावट प्राप्त कर लेता है।
10.6 हमारे शरीर में विटामिन C संचित क्यों नहीं होता?
विटामिन C एक जल विलेय विटामिन है — यह वसा ऊतकों में जमा नहीं हो सकता तथा मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है, अतः शरीर में संचित नहीं होता (B₁₂ अपवाद)।
10.7 यदि DNA के थायमीन युक्त न्यूक्लिओटाइड का जलअपघटन किया जाए तो कौन-कौन से उत्पाद बनेंगे?
न्यूक्लिओटाइड (क्षारक + शर्करा + फॉस्फेट) के पूर्ण जल-अपघटन से (i) थायमीन, (ii) 2-डिऑक्सीराइबोस तथा (iii) फॉस्फोरिक अम्ल (H₃PO₄) प्राप्त होते हैं।
10.8 जब RNA का जलअपघटन किया जाता है तो प्राप्त क्षारकों की मात्राओं के मध्य कोई संबंध नहीं होता। यह तथ्य RNA की संरचना के विषय में क्या संकेत देता है?
DNA में A=T, G=C (चारगैफ नियम) होता है, जो द्विरज्जुकी द्विकुंडलिनी संरचना का परिणाम है। RNA में यह अनुपात निश्चित नहीं होता — यह दर्शाता है कि RNA एकरज्जुकी (single-stranded) है, जिसमें पूरक क्षारक-युग्मन नियमित रूप से नहीं होता।

अभ्यास प्रश्न (10.1 – 10.25)

NCERT पाठ्यपुस्तक के अंत में दिए गए सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रश्न पर क्लिक करके देखें।

10.1 मोनोसैकेराइड क्या होते हैं?
वे कार्बोहाइड्रेट जिनको पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड/कीटोन से अधिक सरल यौगिकों में जल-अपघटित नहीं किया जा सकता, मोनोसैकेराइड कहलाते हैं। उदाहरण: ग्लूकोस, फ्रक्टोज़, राइबोस।
10.2 अपचायी शर्करा क्या होती है?
वे सभी कार्बोहाइड्रेट जो फेहलिंग विलयन तथा टॉलेन अभिकर्मक को अपचित कर देते हैं, अपचायी शर्करा कहलाती हैं (इनमें मुक्त ऐल्डिहाइड/कीटो समूह होता है)। सभी मोनोसैकेराइड, माल्टोस व लैक्टोस अपचायी हैं; सूक्रोस अनपचायी है।
10.3 पौधों में कार्बोहाइड्रेटों के दो मुख्य कार्यों को लिखिए।
(i) ऊर्जा/भोजन संग्रहण: स्टार्च के रूप में।
(ii) संरचना निर्माण: सेलुलोस पादप कोशिका भित्ति का प्रमुख घटक है।
10.4 निम्नलिखित को मोनोसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड में वर्गीकृत कीजिए — राइबोस, 2-डीऑक्सीराइबोस, माल्टोस, गैलेक्टोस, फ्रक्टोज़ तथा लैक्टोस
मोनोसैकेराइड: राइबोस, 2-डीऑक्सीराइबोस, गैलेक्टोस, फ्रक्टोज़।
डाइसैकेराइड: माल्टोस, लैक्टोस।
10.5 ग्लाइकोसाइडी बंध से आप क्या समझते हैं?
दो मोनोसैकेराइड इकाइयों के मध्य, जल के एक अणु के निष्कासन के उपरांत बना ऑक्साइड बंध (C–O–C) ग्लाइकोसाइडी बंध कहलाता है।
10.6 ग्लाइकोजन क्या होता है तथा ये स्टार्च से किस प्रकार भिन्न है?
ग्लाइकोजन प्राणियों में कार्बोहाइड्रेट संग्रहण का रूप है, जिसे "प्राणी स्टार्च" भी कहते हैं।
यह स्टार्च से अधिक शाखित होता है तथा यकृत व मांसपेशियों में संग्रहित रहता है; स्टार्च पौधों में पाया जाता है।
10.7 (अ) सूक्रोस तथा (ब) लैक्टोस के जलअपघटन से कौन से उत्पाद प्राप्त होते हैं?
(अ) सूक्रोस → D-(+)-ग्लूकोस + D-(–)-फ्रक्टोज़ (सममोलर)
(ब) लैक्टोस → β-D-गैलेक्टोस + β-D-ग्लूकोस
10.8 स्टार्च तथा सेलुलोस में मुख्य संरचनात्मक अंतर क्या है?
स्टार्च: α-D-ग्लूकोस इकाइयाँ, α-ग्लाइकोसाइडी बंध (C₁–C₄), शाखित (ऐमिलोपेक्टिन) — मानव पाचन योग्य।
सेलुलोस: β-D-ग्लूकोस इकाइयाँ, β-ग्लाइकोसाइडी बंध (C₁–C₄), अशाखित — मानव द्वारा अपाच्य (सेलुलेज़ एन्जाइम न होने के कारण)।
10.9 D-ग्लूकोस की HI, ब्रोमीन जल तथा HNO₃ से अभिक्रियाएँ लिखिए।
HI (लंबे समय तक) → n-हैक्सेन
ब्रोमीन जल → ग्लूकोनिक अम्ल
HNO₃ → सैकैरिक अम्ल
10.11 आवश्यक तथा अनावश्यक ऐमीनो अम्ल क्या होते हैं? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए।
आवश्यक: वे जो शरीर में संश्लेषित नहीं हो सकते — उदा. वैलीन, ल्यूसीन।
अनावश्यक: वे जो शरीर में संश्लेषित हो सकते हैं — उदा. ग्लाइसीन, ऐलानिन।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

चूक गए
  • उत्परिवर्तनी घूर्णन (Mutarotation): α-D-ग्लूकोस अथवा β-D-ग्लूकोस को जल में घोलने पर विशिष्ट घूर्णन धीरे-धीरे बदलकर एक स्थिर मान (+52.7°) पर आ जाता है — यह खुली-शृंखला रूप के माध्यम से α व β एनोमरों के अंतर्रूपांतरण के कारण होता है।
तुलनात्मक
  • एनोमर बनाम एपिमर: एनोमर केवल एनोमेरिक कार्बन (C-1) पर विन्यास में भिन्न होते हैं; एपिमर किसी अन्य एकल कार्बन पर विन्यास में भिन्न होते हैं (जैसे ग्लूकोस व गैलेक्टोस C-4 एपिमर हैं)।
तथ्य
  • चारगैफ का नियम: DNA में A की मात्रा = T की मात्रा, G की मात्रा = C की मात्रा — यह DNA की द्विकुंडलिनी संरचना व क्षार-युग्मन का आधार है।
तुलनात्मक
  • सहएंजाइम (coenzyme) बनाम सहकारक (cofactor) बनाम प्रोस्थेटिक समूह: सहकारक = एंजाइम का गैर-प्रोटीन घटक (अकार्बनिक धातु आयन या कार्बनिक सहएंजाइम); जब यह दृढ़ता से बंधा हो तो प्रोस्थेटिक समूह कहलाता है।
तुलनात्मक
  • ताला-कुंजी बनाम प्रेरित-फिट मॉडल: ताला-कुंजी (Fischer) — सक्रिय स्थल पूर्व-निर्धारित कठोर आकार; प्रेरित-फिट (Koshland) — क्रियाधार के जुड़ने पर सक्रिय स्थल अपना आकार बदल लेता है।
रणनीति
  • रिवीज़न में इन तीन विषयों को प्राथमिकता दें: (1) कार्बोहाइड्रेट वर्गीकरण व एनोमर/एपिमर भेद, (2) प्रोटीन संरचना के चार स्तर, (3) DNA व RNA के संरचनात्मक अंतर (शर्करा, क्षारक, रज्जुक संख्या)।

🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न (जैव-अणु)

AIPMT/NEET में इस अध्याय से पूछे गए वास्तविक प्रश्न, हल सहित।

NEET 1 सेलुलोस की संरचना है: AIPMT 1998
विकल्प: (1) ग्लूकोस अणुओं की शाखित श्रृंखला, α-1,6-ग्लाइकोसाइडिक बंध द्वारा   (2) ग्लूकोस अणुओं की शाखित श्रृंखला, β-1,4 व α-1,6 बंध द्वारा   (3) ग्लूकोस अणुओं की अशाखित श्रृंखला, β-1,4-ग्लाइकोसाइडिक बंध द्वारा   (4) फ्रक्टोज़ अणुओं की अशाखित श्रृंखला
सेलुलोस β-D-ग्लूकोस की अशाखित श्रृंखला है जो β-1,4-बंधों से जुड़ी होती है।
सही विकल्प: (3)
NEET 2 कार्बोहाइड्रेट युक्त संयुग्मित प्रोटीन: AIPMT 2000
विकल्प: (1) ग्लाइकोप्रोटीन   (2) लाइपोप्रोटीन   (3) न्यूक्लियोप्रोटीन   (4) क्रोमोप्रोटीन
सही विकल्प: (1) ग्लाइकोप्रोटीन
NEET 3 निम्न में से कौन-सा कथन सही है? AIPMT 2001
विकल्प: (1) स्टार्च α-ग्लूकोस का बहुलक है   (2) ऐमाइलोस, सेलुलोस का घटक है   (3) प्रोटीन केवल एक प्रकार के ऐमीनो अम्ल से बने होते हैं   (4) फ्रक्टोज़ की चक्रीय संरचना में चार कार्बन व एक ऑक्सीजन होते हैं
स्टार्च α-D-ग्लूकोस का बहुलक है; ऐमाइलोस स्टार्च का घटक है, सेलुलोस का नहीं; प्रोटीन ~20 ऐमीनो अम्लों से बनते हैं; फ्रक्टोज़ फ्यूरेनोस (5-सदस्यीय) है, जिसमें 4 कार्बन व 1 ऑक्सीजन होते हैं (यह कथन भी सही है, परंतु प्रश्न एक ही सही चाहता है)।
सही विकल्प: (1) स्टार्च α-ग्लूकोस का बहुलक है
NEET 4 DNA में हाइड्रोजन-बंधन का सही युग्म: AIPMT 2001
विकल्प: (1) A-T, G-C   (2) A-G, T-C   (3) G-T, A-C   (4) A-A, T-T
सही विकल्प: (1) A-T, G-C
NEET 5 पेप्टाइड बंध के बारे में गलत कथन: AIPMT 2001
विकल्प: (1) C–N बंध की लंबाई सामान्य से अधिक होती है   (2) समतलीय संरचना   (3) आंशिक द्विबंध गुण   (4) C–N के परितः घूर्णन प्रतिबंधित
पेप्टाइड बंध में अनुनाद के कारण C–N बंध सामान्य C–N एकल बंध से छोटा होता है, बड़ा नहीं — अतः कथन (1) गलत है।
सही विकल्प (गलत): (1)
NEET 6 प्रोटीन संश्लेषण में ऐमीनो अम्ल अनुक्रम किसके द्वारा निर्धारित होता है? AIPMT 2006
विकल्प: (1) m-RNA में कोडॉन   (2) t-RNA   (3) राइबोसोमल प्रोटीन   (4) DNA पॉलिमरेज़
सही विकल्प: (1) m-RNA में न्यूक्लियोटाइड (कोडॉन) का अनुक्रम
NEET 7 दो ग्लूकोस अणु से माल्टोस बनने पर सूत्र: NEET 2022
2×C₆H₁₂O₆ = C₁₂H₂₄O₁₂; जल एक अणु (H₂O) निकलता है → C₁₂H₂₂O₁₁
सही विकल्प: (4) C₁₂H₂₂O₁₁

यह अध्ययन-सामग्री NCERT रसायन विज्ञान, कक्षा 11, एकक 10 — "जैव-अणु" (Reprint 2026‑27) पर आधारित है। सभी सूत्र, तथ्य, अभ्यास-हल तथा NEET प्रश्न मानक स्रोतों पर आधारित हैं तथा स्वतंत्र रूप से पुनर्लेखित किए गए हैं।

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