गतिमान आवेश और चुंबकत्व — सम्पूर्ण अध्याय
कक्षा-12 • भौतिकी • अध्याय 4

गतिमान आवेश और चुंबकत्व

ऑस्टेंड के प्रयोग से लेकर बायो-सावर्ट नियम, ऐम्पियर के परिपथीय नियम और चल कुंडली गैल्वेनोमीटर तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आवश्यक चित्र और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।

F = q(v×B) — लोरेंज बल
B = μ₀I/2πr — सीधे तार का क्षेत्र
τ = m×B — बल आघूर्ण
★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 भूमिका

ऑस्टेंड का प्रयोग एवं विद्युत-चुंबकत्व का संबंध

2000 वर्ष से भी पहले विद्युत तथा चुंबकत्व दोनों ही के बारे में लोगों को ज्ञान था। फिर भी लगभग 200 वर्ष पूर्व, 1820 में यह स्पष्ट अनुभव किया गया कि इन दोनों में अटूट संबंध है। 1820 की ग्रीष्म ऋतु में, डच भौतिकविज्ञानी हैंस क्रिश्चियन ऑस्टेंड ने, अपने एक भाषण के दौरान प्रयोग प्रदर्शित करते हुए देखा कि एक सीधे तार में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर पास रखी हुई चुंबकीय सुई में सुस्पष्ट विक्षेप प्राप्त होता है।

उन्होंने पाया कि चुंबकीय सुई तार के अभिलंबवत तल में तार की स्थिति के केंद्रत: वृत्त की स्पर्श रेखा के समांतर सरेखित होती है। यदि तार में धारा की दिशा विपरीत कर दी जाए तो चुंबकीय सुई भी घूम कर विपरीत दिशा में सरेखित हो जाती है। तार में धारा का परिमाण बढ़ाने या सुई को तार के निकट लाने से चुंबकीय सुई का विक्षेप बढ़ जाता है। तार के चारों ओर यदि लौह चूर्ण छिड़कें तो इसके कण तार के चारों ओर संकेंद्री वृत्तों में व्यवस्थित हो जाते हैं। इस परिघटना से ऑस्टेंड ने निष्कर्ष निकाला कि गतिमान आवेश (धारा) अपने चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।

धारावाही सीधा तार तार के चारों ओर संकेंद्री वृत्तों में चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ (ऑस्टेंड का प्रयोग)
चित्र 4.1 — सीधे धारावाही तार के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र; लौह चूर्ण संकेंद्री वृत्तों में व्यवस्थित हो जाता है।

इसके पश्चात प्रयोगों की गति तीव्र हो गई। सन 1864 में विद्युत तथा चुंबकत्व के सर्वमान्य नियमों को जेम्स मैक्सवेल ने एकीकृत करके नए नियम बनाए और यह स्पष्ट अनुभव किया कि प्रकाश वास्तव में विद्युत चुंबकीय तरंगें हैं। हर्ट्ज़ ने रेडियो तरंगों की खोज की तथा 19वीं शताब्दी के अंत तक सर जे.सी. बोस तथा मार्कोनी ने इन तरंगों को उत्पन्न किया।

परिपाटी (चिह्न संकेत): कागज़ के तल से बाहर की ओर निर्गत विद्युत धारा अथवा क्षेत्र (विद्युत अथवा चुंबकीय) को एक बिंदु (⊙) द्वारा व्यक्त किया जाता है। कागज़ के तल में भीतर की ओर जाती विद्युत धारा अथवा विद्युत क्षेत्र को एक क्रॉस (⊗) द्वारा व्यक्त किया जाता है। (कोई डॉट आपकी ओर संकेत करते तीर की नोंक जैसा प्रतीत होता है तथा क्रॉस किसी तीर की पंखयुक्त पूँछ जैसा प्रतीत होता है।)
त्वरित तथ्य
  • ऑस्टेंड का प्रयोग (1820): धारावाही सीधे तार के पास रखी चुंबकीय सुई में विक्षेप होता है — यह विद्युत व चुंबकत्व के बीच पहला आनुभविक प्रमाण था।
  • तार में धारा की दिशा विपरीत करने पर चुंबकीय सुई भी विपरीत दिशा में सरेखित हो जाती है।
  • धारा बढ़ाने या सुई को तार के निकट लाने से चुंबकीय सुई का विक्षेप बढ़ता है।
  • निष्कर्ष: गतिमान आवेश (धारा) अपने चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।
  • जेम्स मैक्सवेल (1864) ने विद्युत व चुंबकत्व के नियमों को एकीकृत किया और दर्शाया कि प्रकाश विद्युत-चुंबकीय तरंगें हैं।
  • चिह्न परिपाटी: कागज़ से बाहर की ओर = बिंदु (⊙); कागज़ में भीतर की ओर = क्रॉस (⊗)।

2 चुंबकीय बल

लोरेंज बल एवं चुंबकीय बल की विशेषताएँ

स्रोत और क्षेत्र

किसी चुंबकीय क्षेत्र B की अभिधारणा को प्रस्तावित करने से पहले हम संक्षेप में यह दोहराएँगे कि हमने अध्याय 1 के अंतर्गत विद्युत क्षेत्र E के विषय में क्या सीखा है। आवेश Q जोकि विद्युत क्षेत्र का स्रोत है, एक विद्युत क्षेत्र E उत्पन्न करता है:

विद्युत क्षेत्र (स्मरण)E = Q r̂ / (4πε₀) r²

कोई आवेश q इस क्षेत्र से अन्योन्य क्रिया करके एक बल F = qE का अनुभव करता है। जिस प्रकार स्थिर आवेश विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते हैं, विद्युत धाराएँ अथवा गतिमान आवेश (विद्युत क्षेत्र के साथ-साथ) चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं जिसे B(r) द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है तथा यह भी एक सदिश क्षेत्र है।

अध्यारोपण का सिद्धांत: बहुत से स्रोतों का चुंबकीय क्षेत्र प्रत्येक व्यष्टिगत स्रोत के चुंबकीय क्षेत्रों का सदिश योग होता है।

चुंबकीय क्षेत्र, लोरेंज बल

मान लीजिए विद्युत क्षेत्र E(r) तथा चुंबकीय क्षेत्र B(r) दोनों की उपस्थिति में कोई बिंदु आवेश q (वेग v से गतिमान तथा किसी दिए गए समय t पर r पर स्थित) विद्यमान है। किसी आवेश q पर इन दोनों क्षेत्रों द्वारा आरोपित बल को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:

लोरेंज बलF = q[E(r) + v × B(r)] = Fविद्युत + Fचुंबकीय

इस बल को सर्वप्रथम एच.ए. लोरेंज ने ऐम्पियर तथा अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विस्तृत पैमाने पर किए गए प्रयोगों के आधार पर व्यक्त किया था। चुंबकीय क्षेत्र के साथ अन्योन्य क्रिया की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:

चुंबकीय बल की विशेषताएँ
  • यह q, v तथा B (कण के आवेश, वेग तथा चुंबकीय क्षेत्र) पर निर्भर करता है। ऋणावेश पर लगने वाला बल धनावेश पर लगने वाले बल के विपरीत होता है।
  • चुंबकीय बल q[v×B] वेग तथा चुंबकीय क्षेत्र का एक सदिश गुणनफल होता है — बल सदैव v व B दोनों के लंबवत होता है (दिशा दक्षिण हस्त/पेंच नियम से)।
  • यदि आवेश गतिमान नहीं है (v=0) तो चुंबकीय बल शून्य होता है — केवल गतिमान आवेश ही बल का अनुभव करता है।
  • चुंबकीय क्षेत्र B का SI मात्रक टेस्ला (T) है; एक अपेक्षाकृत छोटा मात्रक गाउस (=10⁻⁴ टेस्ला) भी प्रयुक्त होता है।
  • यदि F, q, v सभी का मान एकांक मानें तो F=q[v×B]=qvB sinθ (θ = v व B के बीच का कोण)।

विद्युत धारावाही चालक पर चुंबकीय बल

हम किसी एकल गतिमान आवेश पर चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आरोपित बल के विश्लेषण का विस्तार विद्युत धारावाही सीधी छड़ के लिए कर सकते हैं। लंबाई l तथा एकसमान अनुप्रस्थ काट A की किसी छड़ पर विचार करते हैं। इस चालक छड़ में अपरिवर्ती विद्युत धारा I के लिए प्रत्येक गतिशील वाहक का अपवाह वेग vd है। किसी बाह्य चुंबकीय क्षेत्र B की उपस्थिति में इन वाहकों पर बल:

धारावाही छड़ पर चुंबकीय बलF = Il × B

यहाँ l एक सदिश है जिसका परिमाण l है जो कि छड़ की लंबाई है, तथा इसकी दिशा विद्युत धारा I के सर्वसम है। ध्यान दीजिए विद्युत धारा सदिश नहीं है।

NEET फोकस
  • चुंबकीय बल सदैव वेग के लंबवत होता है — अतः यह कोई कार्य नहीं करता, चाल का परिमाण अपरिवर्तित रहता है।
  • चुंबकीय बल का परिमाण F=qvBsinθ — तब अधिकतम जब v ⊥ B, शून्य जब v ∥ B।
  • धारावाही छड़ पर बल: F = Il×B (l की दिशा धारा की दिशा में)।
  • यादृच्छिक आकृति के तार के लिए, बल का परिकलन रेखिक पट्टियों dlj के समूह के रूप में संकलन द्वारा किया जाता है: F = Σ I dlj × B।
  • B का SI मात्रक टेस्ला (T) है; 1 गाउस = 10⁻⁴ T।

3 चुंबकीय क्षेत्र में गति

वृत्तीय एवं कुंडलिनी गति

यांत्रिकी में हमने यह सीखा है कि यदि किसी बल का कण की गति की दिशा में (अथवा उसके विपरीत) कोई अवयव है तो वह बल उस कण पर कार्य करता है। चुंबकीय क्षेत्र में आवेश की गति के प्रकरण में, चुंबकीय बल कण के वेग की दिशा के लंबवत होता है। अतः कोई कार्य नहीं होता तथा वेग के परिमाण में भी कोई परिवर्तन नहीं होता (यद्यपि संवेग की दिशा में परिवर्तन हो सकता है)।

ध्यान दीजिए, यह विद्युत क्षेत्र के कारण बल, qE, से भिन्न है, जिसका गति के समांतर (अथवा प्रतिसमांतर) अवयव हो सकता है और इस प्रकार संवेग के साथ-साथ ऊर्जा को भी स्थानांतरित कर सकता है।

वृत्तीय गति (जब v, B के लंबवत है)

पहले उस स्थिति पर विचार कीजिए जिसमें वेग v चुंबकीय क्षेत्र B के लंबवत है। लंबवत बल qv×B अभिकेंद्र बल की भाँति कार्य करता है तथा चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत वर्तुल गति उत्पन्न करता है। यदि v तथा B एक दूसरे के लंबवत हैं, तो कण (अर्थात किसी वृत्त के अनुदिश) वर्तुल गति करेगा।

यदि किसी कण के वृत्ताकार पथ की त्रिज्या r है तो उस कण पर एक बल mv²/r वृत्त के केंद्र की ओर तथा पथ के लंबवत कार्य करता है जिसे अभिकेंद्र बल कहते हैं। दोनों अभिकेंद्र बल के व्यंजकों को समीकरण के रूप में लिखने पर, mv²/r = qvB:

वृत्ताकार पथ की त्रिज्याr = mv / qB

जितना अधिक संवेग होगा उतनी ही अधिक निर्मित वृत्त की त्रिज्या होगी। यदि कोणीय आवृत्ति ω है तो v=ωr, अत:

साइक्लोट्रॉन कोणीय आवृत्ति (वेग/ऊर्जा से स्वतंत्र)ω = 2πν = qB/m

कोणीय आवृत्ति ω वेग अथवा ऊर्जा पर निर्भर नहीं करती। यहाँ ν घूर्णन की आवृत्ति है। ν के ऊर्जा पर निर्भर न करने का साइक्लोट्रॉन के डिज़ाइन में एक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग है।

कुंडलिनी (सर्पिलाकार) गति (जब v का एक घटक B के समांतर हो)

यदि वेग v का कोई अवयव, B के अनुदिश है तो यह अवयव अपरिवर्तित रहता है, क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र के अनुदिश गति को चुंबकीय क्षेत्र प्रभावित नहीं करेगा। B के लंबवत किसी तल में गति, पहले की भाँति, वर्तुल गति ही है जिससे यह अवयव कुंडलिनी गति उत्पन्न करता है। एक परिक्रमा पूरी करने में लगा समय T = 2π/ω ≡ 1/ν। एक घूर्णन में कण द्वारा चुंबकीय क्षेत्र के अनुदिश चली गई दूरी को पिच या चूड़ी अंतराल कहते हैं:

पिच (चूड़ी अंतराल)p = v|| T = 2πm v|| / qB

गति के वृत्तीय अवयव की त्रिज्या को कुंडलिनी की त्रिज्या कहते हैं।

NEET फोकस
  • चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान आवेश पर बल सदैव वेग के लंबवत होता है — इसलिए कोई कार्य नहीं होता और चाल का परिमाण अपरिवर्तित रहता है।
  • v ⊥ B होने पर पथ वृत्ताकार होता है: त्रिज्या r = mv/qB।
  • साइक्लोट्रॉन (कोणीय) आवृत्ति ω = qB/m — यह वेग या ऊर्जा पर निर्भर नहीं करती (साइक्लोट्रॉन मशीन का आधार)।
  • यदि v का एक घटक B के समांतर हो तो पथ कुंडलिनी (हेलिकल) होता है।
  • पिच p = v||T = 2πmv||/qB — एक घूर्णन में B की दिशा में तय की गई दूरी।

4 विद्युत धारा अवयव के कारण चुंबकीय क्षेत्र, बायो-सावर्ट नियम

धारा द्वारा उत्पन्न क्षेत्र का मूल नियम

जितने चुंबकीय क्षेत्र हमें ज्ञात हैं वे सभी विद्युत धाराओं (अथवा गतिशील आवेशों) तथा कणों के नैज चुंबकीय आघूर्णों के कारण उत्पन्न हुए हैं। यहाँ अब हम विद्युत धारा तथा उसके द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र के बीच संबंध के बारे में अध्ययन करेंगे — यह संबंध बायो-सावर्ट नियम द्वारा प्राप्त होता है।

चित्र में एक परिमित विद्युत धारा चालक XY दर्शाया गया है, जिसमें विद्युत धारा I प्रवाहित हो रही है। चालक के अतिअल्प अवयव dl पर विचार कीजिए। मान लीजिए हमें इस अवयव द्वारा इससे r दूरी पर स्थित किसी बिंदु P पर चुंबकीय क्षेत्र dB का मान निर्धारित करना है। मान लीजिए विस्थापन सदिश r तथा dl के बीच θ कोण बनता है। तब बायो-सावर्ट नियम के अनुसार चुंबकीय क्षेत्र dB का परिमाण विद्युत धारा I, लंबाई अवयव |dl| के अनुक्रमानुपाती तथा दूरी r के वर्ग के व्युक्रमानुपाती है। इस क्षेत्र की दिशा dl तथा r के तलों के लंबवत होगी। अत: सदिश संकेत पद्धति में:

बायो-सावर्ट नियम (सदिश रूप)dB = (μ₀/4π) × (I dl × r)/r³

इस क्षेत्र का परिमाण:

बायो-सावर्ट नियम (परिमाण)|dB| = (μ₀/4π) × (I dl sinθ)/r²

अनुक्रमानुपाती नियतांक μ₀/4π का यथार्थ मान है:

मुक्त आकाश की चुंबकशीलता नियतांकμ₀/4π = 10⁻⁷ Tm/A  (अर्थात μ₀ = 4π×10⁻⁷ Tm/A)

बायो-सावर्ट नियम व कूलॉम नियम में समानताएँ व असमानताएँ

गुणबायो-सावर्ट नियम (चुंबकीय)कूलॉम नियम (स्थिरवैद्युत)
दूरी पर निर्भरतादीर्घ-परासी, 1/r² के अनुक्रमानुपातीदीर्घ-परासी, 1/r² के अनुक्रमानुपाती
अध्यारोपण सिद्धांतलागू होता हैलागू होता है
स्रोत की प्रकृतिसदिश स्रोत, Idlअदिश स्रोत, विद्युत आवेश
क्षेत्र की दिशाविस्थापन सदिश r तथा धारा अवयव Idl दोनों के तलों के लंबवतस्रोत को बिंदु से मिलाने वाले विस्थापन सदिश के अनुदिश
कोण पर निर्भरताहाँ (sinθ पद के रूप में)नहीं
रोचक संबंध: मुक्त दिक्स्थान की विद्युतशीलता, मुक्त दिक्स्थान की चुंबकशीलता तथा निर्वात में प्रकाश के वेग में एक रोचक संबंध है: ε₀μ₀ = 1/c²। चूँकि निर्वात में प्रकाश का वेग नियत है, गुणनफल μ₀ε₀ परिमाण में निश्चित है। SI मात्रकों में μ₀ का एक निश्चित परिमाण 4π×10⁻⁷ है।
NEET फोकस
  • बायो-सावर्ट नियम: dB = (μ₀/4π)(Idl×r)/r³ — परिमाण |dB| = (μ₀/4π)(Idl sinθ)/r²।
  • μ₀/4π = 10⁻⁷ Tm/A (यथार्थ मान); μ₀ = 4π×10⁻⁷ Tm/A।
  • बायो-सावर्ट नियम व कूलॉम नियम दोनों दीर्घ-परासी हैं व अध्यारोपण सिद्धांत का पालन करते हैं।
  • बायो-सावर्ट नियम में कोण θ पर निर्भरता होती है (sinθ पद) — यह स्थिर वैद्युत क्षेत्र में नहीं होती।
  • ε₀μ₀ = 1/c² — विद्युतशीलता, चुंबकशीलता व प्रकाश वेग के बीच संबंध।

5 विद्युत धारावाही वृत्ताकार पाश के अक्ष पर चुंबकीय क्षेत्र

अनुप्रयोग एवं विशेष स्थितियाँ

इस अनुभाग में हम विद्युत धारावाही वृत्ताकार पाश के कारण उसके अक्ष के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्र का मूल्यांकन करेंगे। इस मूल्यांकन में पिछले अनुभाग में वर्णित अत्यल्प विद्युत धारा अवयवों (Idl) के प्रभाव को संयोजित किया जाएगा। हम यह मानते हैं कि प्रवाहित विद्युत धारा अपरिवर्ती है तथा मूल्यांकन मुक्त दिक्स्थान (निर्वात) में किया गया है।

पाश के चालक अवयव dl पर, बायो-सावर्ट नियम के अनुसार उत्पन्न क्षेत्र dB का परिमाण r² = x² + R² का उपयोग करके, तथा यह ध्यान देते हुए कि केवल x-अवयव ही बचता है (लंबवत अवयव त्रिज्यत: विपरीत dl अवयवों के योगदान द्वारा निरस्त हो जाते हैं):

वृत्ताकार पाश के अक्ष पर चुंबकीय क्षेत्रB = μ₀IR² / [2(x²+R²)3/2]

उपरोक्त परिणाम की एक विशेष स्थिति के रूप में हम पाश के केंद्र (x=0) पर चुंबकीय क्षेत्र प्राप्त कर सकते हैं:

वृत्ताकार पाश के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्रB₀ = μ₀I / 2R

वृत्ताकार तार के कारण चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ बंद वृत्ताकार पाश बनाती हैं। चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा होती है:

दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम: वृत्ताकार तार के चारों ओर अपने दाएँ हाथ की हथेली को इस प्रकार मोड़िए कि उँगलियाँ विद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करें, तब इस हाथ का फैला हुआ अँगूठा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताता है।
NEET फोकस
  • वृत्ताकार पाश के अक्ष पर, केंद्र से x दूरी पर: B = μ₀IR²/[2(x²+R²)^(3/2)]।
  • पाश के केंद्र पर (x=0): B₀ = μ₀I/2R।
  • दिशा दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम से प्राप्त होती है।
  • वृत्ताकार तार के कारण क्षेत्र रेखाएँ बंद वृत्ताकार पाश बनाती हैं।

6 ऐम्पियर का परिपथीय नियम

वैकल्पिक सूत्रीकरण एवं अनुप्रयोग

बायो-सावर्ट नियम को अभिव्यक्त करने का एक अन्य वैकल्पिक तथा रुचिकर उपाय भी है। ऐम्पियर के परिपथीय नियम में किसी खुले पृष्ठ जिसकी कोई सीमा हो, पर विचार किया जाता है। इस पृष्ठ से विद्युत धारा प्रवाहित होती है।

ऐम्पियर का परिपथीय नियम∮ B·dl = μ₀I

यहाँ I पृष्ठ से गुज़रने वाली कुल विद्युत धारा है। इस समाकलन को पृष्ठ की सीमारेखा C के संपाती बंद के ऊपर लिया गया है। उपरोक्त संबंध में दिशा सम्मिलित है जो दक्षिण हस्त नियम से प्राप्त होती है।

बहुत से अनुप्रयोगों के लिए समीकरण का कहीं अधिक सरलीकृत रूप पर्याप्त सिद्ध होता है। यदि पाश (जिसे ऐम्पियरीय पाश कहते हैं) का चयन इस प्रकार संभव है कि पाश के प्रत्येक बिंदु पर या तो (i) B पाश के स्पर्शरेखीय है तथा शून्येतर नियतांक B है, अथवा (ii) B पाश के अभिलंबवत है, अथवा (iii) B नष्ट हो जाता है — तो, मान लीजिए L पाश की वह लंबाई (भाग) है जिसके लिए B स्पर्शरेखीय है, तथा Ie पाश में परिबद्ध विद्युत धारा है:

ऐम्पियर के नियम का सरलीकृत रूपBL = μ₀Ie

उदाहरण: लंबे सीधे तार का क्षेत्र

जब किसी निकाय में इस प्रकार की सममिति हो जैसे कि सीधे विद्युत धारावाही अनंत तार के लिए है, तब ऐम्पियर का नियम हमें चुंबकीय क्षेत्र का एक सरल मूल्यांकन करने योग्य बनाता है। पाश की सीमा रेखा का चयन एक वृत्त है तथा चुंबकीय क्षेत्र वृत्त की परिधि के स्पर्शरेखीय है:

लंबे सीधे तार के कारण चुंबकीय क्षेत्रB × 2πr = μ₀I  ⇒  B = μ₀I / (2πr)
दक्षिण हस्त नियम (लंबे तार के लिए): तार को अपने दाएँ हाथ में इस प्रकार पकड़िए कि आपका तना हुआ अँगूठा विद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करे। तब आपकी उँगलियों के मुड़ने की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में होगी।
ऐम्पियर का परिपथीय नियम बायो-सावर्ट नियम से भिन्न नहीं है — दोनों ही नियम विद्युत धारा तथा चुंबकीय क्षेत्र में संबंध व्यक्त करते हैं। जो संबंध ऐम्पियर के नियम तथा बायो-सावर्ट नियम के बीच है ठीक वही संबंध गाउस नियम तथा कूलॉम नियम के बीच में है। ऐम्पियर का परिपथीय नियम केवल उन स्थायी विद्युत धाराओं पर लागू होता है जो समय के साथ परिवर्तित नहीं होतीं।
NEET फोकस
  • ऐम्पियर का परिपथीय नियम: ∮B·dl = μ₀I (कुल परिबद्ध धारा का μ₀ गुना)।
  • सरलीकृत रूप (सममित स्थितियों में): BL = μ₀Ie।
  • लंबे सीधे तार के लिए: B = μ₀I/2πr।
  • ऐम्पियर का नियम केवल स्थायी (समय-अपरिवर्ती) विद्युत धाराओं पर लागू होता है।
  • ऐम्पियर के नियम व बायो-सावर्ट नियम के बीच वही संबंध है जो गाउस नियम व कूलॉम नियम के बीच है।

7 परिनालिका

एकसमान क्षेत्र की युक्ति

लंबी परिनालिका से हमारा तात्पर्य यह है कि परिनालिका की लंबाई उसकी त्रिज्या की तुलना में अधिक है। परिनालिका में एक लंबा तार सर्पिल के आकार में लिपटा होता है जिसमें प्रत्येक फेरा अपने निकट के फेरे के साथ काफी सटा होता है — इस प्रकार फेरे को एक वृत्ताकार पाश माना जा सकता है। परिनालिका के सभी फेरों के कारण उत्पन्न कुल चुंबकीय क्षेत्र प्रत्येक फेरे के चुंबकीय क्षेत्रों का सदिश योग होता है।

किसी परिमित परिनालिका में, अंत:भाग के मध्य बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र एकसमान, प्रबल तथा परिनालिका के अक्ष के अनुदिश है। बाह्य भाग के मध्य बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र दुर्बल है और साथ ही यह परिनालिका के अक्ष के अनुदिश है तथा इसका लंबवत अथवा अभिलंबवत कोई घटक भी नहीं है। जैसे-जैसे परिनालिका की लंबाई में वृद्धि होती है वह लंबी बेलनाकार धातु के पटल जैसी दिखाई देने लगती है — परिनालिका के बाहर चुंबकीय क्षेत्र शून्य होने लगता है।

किसी आयताकार ऐम्पियर-पाश abcd पर विचार करते हुए (जिसमें cd के अनुदिश क्षेत्र शून्य है, तथा अनुप्रस्थ खंडों bc तथा ad के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्र का घटक शून्य है, इसलिए ये दोनों खंड चुंबकीय क्षेत्र में कोई योगदान नहीं देते), मान लीजिए ab के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्र B है, इस प्रकार पाश की प्रासंगिक लंबाई L = h। मान लीजिए प्रति एकांक लंबाई फेरों की संख्या n है, तब फेरों की कुल संख्या nh है। इस प्रकार परिबद्ध विद्युत धारा Ie = I(nh):

परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्रB = μ₀ n I

क्षेत्र की दिशा दक्षिण हस्त नियम से प्राप्त होती है। परिनालिका का सामान्यत: उपयोग एकसमान चुंबकीय क्षेत्र प्राप्त करने के लिए किया जाता है। परिनालिका में भीतर नर्म लौह क्रोड रखकर विशाल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करना संभव है (अगले अध्याय में इसका अध्ययन होगा)।

NEET फोकस
  • लंबी परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र: B = μ₀nI, जहाँ n प्रति एकांक लंबाई फेरों की संख्या है।
  • परिनालिका के भीतर हर बिंदु पर क्षेत्र अक्ष के समांतर तथा एकसमान होता है; बाहर क्षेत्र लगभग शून्य होता है।
  • परिनालिका का उपयोग एकसमान चुंबकीय क्षेत्र प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
  • भीतर नर्म लौह क्रोड रखकर परिनालिका द्वारा विशाल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जा सकता है।

8 दो समांतर विद्युत धाराओं के बीच बल — ऐम्पियर

ऐम्पियर का ऐतिहासिक कार्य एवं परिभाषा

हम यह सीख चुके हैं कि किसी विद्युत धारावाही चालक के कारण चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है तो बायो-सावर्ट नियम का पालन करता है। साथ ही हमने यह भी सीखा है कि विद्युत धारावाही चालक पर बाह्य चुंबकीय क्षेत्र बल आरोपित करता है (लोरेंज बल सूत्र)। अत: यह आशा करना तर्कसंगत है कि एक-दूसरे के पास स्थित दो विद्युत धारावाही चालक एक दूसरे पर (चुंबकीय) बल आरोपित करेंगे।

चालक 'a' के कारण चालक 'b' के अनुदिश प्रत्येक बिंदु पर समान चुंबकीय क्षेत्र Ba लगा रहा है। ऐम्पियर के परिपथीय नियम के अनुसार इस चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण:

'a' के कारण 'b' पर चुंबकीय क्षेत्रBa = μ₀Ia / 2πd

चालक 'b' जिससे विद्युत धारा Ib प्रवाहित हो रही है, Ba के कारण पार्श्वत: एक बल का अनुभव करता है। इस बल की दिशा चालक 'a' की ओर होती है:

'a' के कारण 'b' के खंड L पर बलFba = Ib L Ba = μ₀IaIbL / 2πd

इसी प्रकार के विचारों द्वारा 'b' में प्रवाहित विद्युत धारा के कारण 'a' के खंड L पर बल Fab को भी ज्ञात किया जा सकता है, जो कि परिमाण में Fba के बराबर तथा 'b' की ओर निर्दिष्ट होता है:

न्यूटन के तीसरे नियम के अनुरूपFba = −Fab
यह न्यूटन के तीसरे गति के नियम के अनुरूप है। समांतर चालकों तथा अपरिवर्ती विद्युत धाराओं के लिए बायो-सावर्ट नियम तथा लोरेंज बल द्वारा प्राप्त परिणाम न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुरूप है।
याद रखने योग्य नियम: समांतर धाराएँ आकर्षित तथा प्रतिसमांतर धाराएँ प्रतिकर्षित करती हैं। यह नियम उस नियम के विपरीत है जिसका हमने स्थिरवैद्युतिकी में अध्ययन किया था — "सजातीय आवेशों में प्रतिकर्षण तथा विजातीय आवेशों में आकर्षण होता है।" परंतु सजातीय (समांतर) धाराएँ एक दूसरे को आकर्षित करती हैं।

मान लीजिए fba बल Fba के प्रति एकांक लंबाई पर आरोपित बल के परिमाण को निरूपित करता है:

प्रति एकांक लंबाई पर बलfba = μ₀IaIb / 2πd

ऐम्पियर की परिभाषा

एक ऐम्पियर वह अपरिवर्ती विद्युत धारा है जो दो लंबे, सीधे उपेक्षणीय अनुप्रस्थ काट के निर्वात में एक दूसरे से 1m दूरी पर स्थित समांतर चालकों में प्रवाहित हो, तो इनमें से प्रत्येक चालक की प्रति मीटर लंबाई पर 2×10⁻⁷ N का बल उत्पन्न होता है।

'ऐम्पियर' की यह परिभाषा सन् 1946 में अपनायी गई थी। यह एक सैद्धांतिक परिभाषा है। आवेश के SI मात्रक, अर्थात कूलॉम को अब हम ऐम्पियर के पदों में परिभाषित कर सकते हैं: जब किसी चालक में 1A की अपरिवर्ती विद्युत धारा प्रवाहित होती है तो उसकी अनुप्रस्थ काट से एक सेकंड में प्रवाहित आवेश की मात्रा एक कूलॉम (1C) होती है।

NEET फोकस
  • दो समांतर तारों के बीच प्रति एकांक लंबाई बल: f = μ₀IaIb/2πd।
  • समांतर धाराएँ आकर्षित करती हैं; प्रतिसमांतर धाराएँ प्रतिकर्षित करती हैं।
  • न्यूटन का तीसरा नियम: Fba = −Fab।
  • ऐम्पियर की परिभाषा: 1m दूरी पर स्थित दो समांतर तारों में प्रत्येक की प्रति मीटर लंबाई पर 2×10⁻⁷ N बल उत्पन्न करने वाली धारा = 1 ऐम्पियर।
  • कूलॉम को अब ऐम्पियर के पदों में परिभाषित किया जाता है: 1A धारा से 1 सेकंड में प्रवाहित आवेश = 1 कूलॉम।

9 विद्युत धारा पाश पर बल आघूर्ण, चुंबकीय द्विध्रुव

पाश की गतिकी एवं चुंबकीय आघूर्ण

एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में आयताकार विद्युत धारा पाश पर बल आघूर्ण

एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में स्थित कोई आयताकार पाश जिससे अपरिवर्ती विद्युत धारा I प्रवाहित हो रही है, एक बल आघूर्ण का अनुभव करता है। इस पर कोई नेट बल आरोपित नहीं होता। यह व्यवहार उस द्विध्रुव के व्यवहार के समरूपी है जो यह एकसमान विद्युत क्षेत्र में दर्शाता है।

पहले हम उस सरल प्रकरण पर विचार करते हैं जिसमें आयताकार पाश इस प्रकार स्थित है कि एकसमान चुंबकीय क्षेत्र B पाश के तल में है। चुंबकीय क्षेत्र पाश की दो भुजाओं AD तथा BC पर कोई बल आरोपित नहीं करता। भुजा AB पर बल F₁ = IbB (पाश के तल में भीतर की ओर) तथा भुजा CD पर बल F₂ = IbB = F₁ (पाश के तल के बाहर की ओर) आरोपित होता है। इस प्रकार पाश पर आरोपित नेट बल शून्य है। इन बलों के युगल के कारण पाश पर एक बल आघूर्ण कार्य करता है:

पाश का तल B में होने पर बल आघूर्णτ = F₁(a/2) + F₂(a/2) = I(ab)B = IAB

यहाँ A = ab आयत का क्षेत्रफल है। अब आगे उस व्यापक प्रकरण पर विचार करते हैं जिसमें पाश का तल चुंबकीय क्षेत्र के अनुदिश नहीं है, परंतु इनके बीच कोई θ कोण बनता है (चुंबकीय क्षेत्र B तथा कुंडली पर अभिलंब के बीच का कोण):

व्यापक स्थिति में बल आघूर्णτ = F₁(a/2)sinθ + F₂(a/2)sinθ = I ab B sinθ = I A B sinθ

जैसे-जैसे θ→0, बलयुग्म के बलों के बीच लंबवत दूरी भी शून्य की ओर बढ़ती है — इससे बल आघूर्ण शून्य हो जाता है। समीकरणों के बल आघूर्णों को कुंडली के चुंबकीय आघूर्ण तथा चुंबकीय क्षेत्र के सदिश गुणनफल के रूप में व्यक्त कर सकते हैं। विद्युत धारा पाश के चुंबकीय आघूर्ण को हम इस प्रकार परिभाषित करते हैं:

विद्युत धारा पाश का चुंबकीय आघूर्णm = I A

चूँकि m तथा B के बीच का कोण θ है, इसे एक ही व्यंजक द्वारा व्यक्त किया जा सकता है:

धारा पाश पर बल आघूर्ण (सामान्य)τ = m × B

यह स्थिरवैद्युतिकी के प्रकरण के सदृश है (विद्युत क्षेत्र E में द्विध्रुव आघूर्ण pe का वैद्युत द्विधुव: τ = pe × E)।

जब m चुंबकीय क्षेत्र B के समांतर अथवा प्रतिसमांतर होता है तो बल आघूर्ण τ विलुप्त हो जाता है — तब यह साम्यावस्था की ओर इंगित करता है। जब m तथा B समांतर होते हैं तो साम्यावस्था स्थायी होती है (कुंडली में कोई घूर्णन होने पर बल आघूर्ण वापस मूल स्थिति में ला देता है)। जब ये प्रतिसमांतर होते हैं तो साम्यावस्था अस्थायी होती है।

यदि पाश में पास-पास सटे हुए N फेरे हैं तो बल आघूर्ण के लिए व्यंजक अब भी लागू होता है, इसे इस प्रकार व्यक्त किया जाता है:

N फेरों की कुंडली का चुंबकीय आघूर्णm = N I A

वृत्ताकार विद्युत धारा पाश चुंबकीय द्विध्रुव

अनुभाग 4.5 में हमने R त्रिज्या के वृत्ताकार पाश जिससे अपरिवर्ती विद्युत धारा I प्रवाहित हो रही है, के कारण पाश के अक्ष चुंबकीय क्षेत्र का मूल्यांकन किया था। यदि x >> R है, तो चुंबकीय क्षेत्र:

बहुत दूरी पर वृत्ताकार पाश का चुंबकीय क्षेत्र (द्विध्रुव सन्निकटन)B ≈ μ₀m / (2πx³);   x >> R

यह व्यंजक किसी स्थिरवैद्युत द्विध्रुव के विद्युत क्षेत्र के लिए पहले प्राप्त किए जा चुके व्यंजक (E ≈ pe/4πε₀x³) से काफी मेल खाता है — यह प्रतिस्थापन μ₀→1/ε₀, m→pe, B→E से प्राप्त होता है।

चुंबकत्व व वैद्युत द्विध्रुव के बीच मूल अंतर: कोई वैद्युत द्विध्रुव दो मूल इकाइयों — आवेशों (अथवा विद्युत एकध्रुवों) — से मिलकर बनता है। जबकि चुंबकत्व में कोई चुंबकीय द्विध्रुव (अथवा विद्युत धारा पाश) एक अत्यंत मूल तत्व है। चुंबकत्व में विद्युत आवेशों के समतुल्य अर्थात चुंबकीय एकध्रुवों का अस्तित्व अब तक अज्ञात है।

हमने यह दर्शाया कि कोई विद्युत धारा पाश (i) चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है तथा अधिक दूरियों पर एक चुंबकीय द्विध्रुव की तरह व्यवहार करता है तथा (ii) उस पर एक बल आघूर्ण कार्य करता है जैसे चुंबकीय सुई। इसके आधार पर ऐम्पियर ने यह सुझाव दिया था कि समस्त चुंबकत्व प्रवाहित विद्युत धाराओं के कारण है। तथापि मूल कण जैसे इलेक्ट्रॉन अथवा प्रोटॉन के भी नैज चुंबकीय आघूर्ण हैं जो प्रवाहित विद्युत धाराओं के कारण नहीं हैं।

NEET फोकस
  • पाश का तल B के अनुदिश होने पर बल आघूर्ण τ = IAB (अधिकतम)।
  • व्यापक स्थिति में τ = IAB sinθ, या सदिश रूप में τ = m × B।
  • धारा पाश का चुंबकीय आघूर्ण m = IA (एक फेरे के लिए); N फेरों के लिए m = NIA।
  • m ∥ B ⇒ स्थायी साम्यावस्था; m प्रतिसमांतर B ⇒ अस्थायी साम्यावस्था; τ=0 दोनों स्थितियों में।
  • दूर से वृत्ताकार धारा पाश चुंबकीय द्विध्रुव जैसा व्यवहार करता है।
  • चुंबकीय एकध्रुव का अस्तित्व अब तक अज्ञात है।

10 चल कुंडली गैल्वेनोमीटर

मापन युक्ति एवं इसकी सुग्राहिता

चल कुंडली गैल्वेनोमीटर (moving coil galvanometer — MCG) एक ऐसी युक्ति है जिसके सिद्धांत को हमारे द्वारा अनुभाग 4.9 में की गई चर्चा के आधार पर समझा जा सकता है। इसमें किसी एकसमान त्रिज्य (अरीय) चुंबकीय क्षेत्र में किसी अक्ष पर घूर्णन करने के लिए अनेक फेरों वाली एक कुंडली होती है। इस कुंडली के भीतर एक बेलनाकार नर्म लौह क्रोड होता है जो केवल चुंबकीय क्षेत्र को त्रिज्य ही नहीं बनाता वरन चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता में भी वृद्धि कर देता है।

जब इस कुंडली से कोई विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो इस पर एक बल आघूर्ण कार्य करता है। पूर्व समीकरण के अनुसार इस बल आघूर्ण τ का मान होता है τ = NI AB (चूँकि डिज़ाइन के अनुसार चुंबकीय क्षेत्र त्रिज्य है, sinθ = 1 लिया गया है)। यह चुंबकीय बल आघूर्ण NIAB कुंडली में घूर्णन की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है जिसके फलस्वरूप कुंडली अपने अक्ष पर घूर्णन करती है। कुंडली से जुड़ी कमानी Sp में कुंडली के घूर्णन के विरोध में बल आघूर्ण kφ उत्पन्न हो जाता है जो कुंडली के बल आघूर्ण NIAB को संतुलित करता है; फलस्वरूप कुंडली में φ कोण का स्थायी कोणीय विक्षेप आ जाता है। साम्यावस्था में:

साम्यावस्था में विक्षेपkφ = NI AB  ⇒  φ = (NAB/k) I

कोष्ठक की राशि का मान किसी दिए गए गैल्वेनोमीटर के लिए एक नियतांक है। गैल्वेनोमीटर का उपयोग एक संसूचक के रूप में यह ज्ञात करने के लिए किया जा सकता है कि परिपथ में कोई विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है अथवा नहीं (जैसे व्हीटस्टोन सेतु में)।

धारा सुग्राहिता व वोल्टता सुग्राहिता

ऐमीटर की सुग्राहिता की परिभाषा हम विक्षेप प्रति इकाई धारा के रूप में करते हैं:

धारा सुग्राहिताφ/I = NAB/k

वोल्टमापी की वोल्टता सुग्राहिता की परिभाषा हम विक्षेप प्रति एकांक वोल्टता से करते हैं:

वोल्टता सुग्राहिताφ/V = (NAB/k)(1/R)
रोचक तथ्य: धारा सुग्राहिता में वृद्धि करने पर यह आवश्यक नहीं है कि वोल्टता सुग्राहिता में भी वृद्धि हो जाएगी। यदि N→2N (फेरों की संख्या दोगुनी), तो धारा सुग्राहिता भी दोगुनी हो जाती है। किंतु, गैल्वेनोमीटर का प्रतिरोध भी दोगुना हो जाने की संभावना है (क्योंकि यह तार की लंबाई के अनुक्रमानुपाती है), इसलिए N→2N व R→2R दोनों होने पर वोल्टता सुग्राहिता अपरिवर्तित रहती है।

गैल्वेनोमीटर से ऐमीटर व वोल्टमीटर में रूपांतरण

गैल्वेनोमीटर का उपयोग इसी रूप में किसी परिपथ में प्रवाहित विद्युत धारा को मापने के लिए ऐमीटर की भाँति नहीं किया जा सकता। इसके दो कारण हैं: (i) गैल्वेनोमीटर एक अत्यंत सुग्राही युक्ति है, यह μA कोटि की विद्युत धारा के लिए पूर्ण पैमाना विक्षेप देती है। (ii) विद्युत धारा को मापने के लिए गैल्वेनोमीटर को परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ना होता है, जिससे इसका अधिक प्रतिरोध परिपथ में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के मान को परिवर्तित कर देता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए एक अल्प-मान वाला प्रतिरोध rs जिसे शंट कहते हैं, गैल्वेनोमीटर की कुंडली के पार्श्वक्रम में संयोजित किया जाता है।

धारामापी का उपयोग वोल्टतामापी के रूप में भी हो सकता है। इस उद्देश्य के लिए इसको परिपथ के उस अंश के पार्श्वक्रम में लगाना होगा। माप की परिशुद्धता बनाए रखने के लिए, गैल्वेनोमीटर के श्रेणीक्रम में एक बड़ा प्रतिरोध R जोड़ा जाता है।

NEET फोकस
  • गैल्वेनोमीटर साम्यावस्था में विक्षेप: φ = (NAB/k)I, जहाँ k कमानी का ऐंठन नियतांक है।
  • धारा सुग्राहिता = φ/I = NAB/k; वोल्टता सुग्राहिता = φ/V = NAB/(kR)।
  • N बढ़ाने पर धारा सुग्राहिता बढ़ती है, परंतु प्रतिरोध R भी बढ़ने से वोल्टता सुग्राहिता अपरिवर्तित रह सकती है।
  • गैल्वेनोमीटर को ऐमीटर में बदलने के लिए: कुंडली के पार्श्वक्रम में एक अल्प-मान शंट प्रतिरोध rs लगाया जाता है।
  • गैल्वेनोमीटर को वोल्टमीटर में बदलने के लिए: कुंडली के श्रेणीक्रम में एक बड़ा प्रतिरोध R लगाया जाता है।
  • गैल्वेनोमीटर को सीधे ऐमीटर के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता — यह अति सुग्राही है और श्रेणीक्रम में इसका उच्च प्रतिरोध परिपथ धारा को बदल देता है।

✓ सारांश व सूत्र-सूची

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

लोरेंज बल

F = q(v×B + E); चुंबकीय बल सदैव v के लंबवत, कोई कार्य नहीं

धारावाही छड़ पर बल

F = Il×B

वृत्ताकार गति

r = mv/qB; ω = qB/m (वेग से स्वतंत्र)

बायो-सावर्ट नियम

dB = (μ₀/4π)(Idl×r)/r³

वृत्ताकार पाश का क्षेत्र

B = μ₀IR²/[2(x²+R²)^(3/2)]; केंद्र पर B₀ = μ₀I/2R

ऐम्पियर का नियम

∮B·dl = μ₀I; लंबे तार: B = μ₀I/2πr

परिनालिका

B = μ₀nI (भीतर एकसमान)

समांतर धाराओं में बल

f = μ₀IₐI_b/2πd; समांतर आकर्षण, प्रतिसमांतर प्रतिकर्षण

बल आघूर्ण व गैल्वेनोमीटर

τ = m×B; kφ = NIAB

📊 भौतिक राशियाँ तालिका

प्रतीक, मात्रक एवं सूत्र

भौतिक राशिप्रतीकप्रकृतिमात्रकटिप्पणी
मुक्त आकाश की चुंबकशीलताμ₀अदिशT m A⁻¹4π×10⁻⁷ T m A⁻¹
चुंबकीय क्षेत्रBसदिशT (टेस्ला)1 गाउस = 10⁻⁴ T
चुंबकीय आघूर्णmसदिशA m² अथवा J/Tm = NIA
ऐंठन नियतांकkअदिशN m rad⁻¹गैल्वेनोमीटर में
लोरेंज बलFसदिशN (न्यूटन)F = q(v×B + E)
साइक्लोट्रॉन आवृत्तिν꜀अदिशHzqB/2πm
धारा सुग्राहिताφ/Iअदिशrad/ANAB/k
वोल्टता सुग्राहिताφ/Vअदिशrad/VNAB/kR

★ NEET फैक्ट-शीट

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

अवधारणाप्रमुख तथ्य
ऑस्टेंड का प्रयोग1820 — धारावाही तार के पास चुंबकीय सुई का विक्षेप
लोरेंज बलF = q(v×B + E)
चुंबकीय बल की दिशासदैव v के लंबवत — कोई कार्य नहीं करता
वृत्ताकार पथ की त्रिज्याr = mv/qB
साइक्लोट्रॉन आवृत्तिν꜀ = qB/2πm (वेग से स्वतंत्र)
पिचp = 2πmv||/qB
धारावाही छड़ पर बलF = Il×B
बायो-सावर्ट नियमdB = (μ₀/4π)(Idl×r)/r³
μ₀ का मान4π×10⁻⁷ Tm/A
ε₀μ₀ संबंधε₀μ₀ = 1/c²
वृत्ताकार पाश के केंद्र पर क्षेत्रB₀ = μ₀I/2R
वृत्ताकार पाश के अक्ष पर क्षेत्रB = μ₀IR²/[2(x²+R²)^(3/2)]
ऐम्पियर का नियम∮B·dl = μ₀I
लंबे सीधे तार का क्षेत्रB = μ₀I/2πr
परिनालिका के भीतर क्षेत्रB = μ₀nI
समांतर धाराओं में बलf = μ₀IₐI_b/2πd
धारा की प्रकृतिसमांतर आकर्षण; प्रतिसमांतर प्रतिकर्षण
ऐम्पियर की परिभाषा1m दूरी पर 2×10⁻⁷ N/m बल
धारा पाश का चुंबकीय आघूर्णm = NIA
धारा पाश पर बल आघूर्णτ = m×B
गैल्वेनोमीटर साम्यावस्थाkφ = NIAB
गैल्वेनोमीटर का ऐमीटर में रूपांतरणशंट प्रतिरोध पार्श्वक्रम में
गैल्वेनोमीटर का वोल्टमीटर में रूपांतरणउच्च प्रतिरोध श्रेणीक्रम में

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 त्रिज्या r के एक धात्विक वृत्ताकार पाश में धारा I₀ प्रवाहित हो रही है। पाश के खंड ABC का प्रतिरोध, खंड ADC के प्रतिरोध का आधा है। पाश के केंद्र O पर चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण ज्ञात कीजिए।

उत्तर: μ₀I₀/12r

दोनों अर्ध-भाग पार्श्वक्रम में; I₁=2I₀/3 (ABC में), I₂=I₀/3 (ADC में); B₀ = (μ₀/4r)(I₁−I₂) = μ₀I₀/12r

2 दो अनंत लंबाई के समांतर चालक तार A व B में क्रमशः धाराएँ I तथा 2I एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। तार A का द्रव्यमान/एकांक लंबाई λ है तथा यह एक विद्युतरोधी फर्श पर पड़ा है। तार B, फर्श से h ऊँचाई पर स्थिर रखा गया है। तार A को फर्श से न उठने देने के लिए h का न्यूनतम मान ज्ञात कीजिए (g गुरुत्वीय त्वरण है)।

उत्तर: μ₀I²/πλg

चुंबकीय आकर्षण बल = भार की सीमांत शर्त से: μ₀I²/πh ≤ λg ⟹ h ≥ μ₀I²/πλg

3 5 cm त्रिज्या की एक कसकर लिपटी 100-फेरे वाली वृत्ताकार कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र 3.14×10⁻³ T है। कुंडली में प्रवाहित धारा तथा इसके चुंबकीय आघूर्ण का परिमाण ज्ञात कीजिए।

उत्तर: I=2.5 A, M≈2 A·m²

B = μ₀NI/2r से I ≈ 2.5 A; M = NIπr² ≈ 2 A·m²

4 3×10⁶ m/s की चाल (c/100) से गतिमान एक इलेक्ट्रॉन, 9×10⁻⁴ T तीव्रता के चुंबकीय क्षेत्र (गति के लंबवत) में प्रवेश करता है। इलेक्ट्रॉन को अविक्षेपित रखने के लिए आवश्यक विद्युत क्षेत्र E का परिमाण ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 2.7 × 10³ V/m

वेग वरणकर्ता: E = vB = 3×10⁶ × 9×10⁻⁴ = 2.7×10³ V/m

5 समान धारा (2 A) प्रवाहित करने वाली दो छोटी वृत्ताकार ताँबे की कुंडलियों की त्रिज्याओं का अनुपात 1:2 है। इनके चुंबकीय आघूर्णों का अनुपात ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1 : 4

M = Iπr²; समान धारा पर M ∝ r²; M₁/M₂ = (1/2)² = 1/4

6 10 cm त्रिज्या की एक कसकर लिपटी 100-फेरे वाली कुंडली में 7 A की धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण ज्ञात कीजिए (μ₀ = 4π×10⁻⁷ SI मात्रक)।

उत्तर: 4.4 mT

B = μ₀NI/2r = 4π×10⁻⁷ × 100 × 7 / (2×0.10) ≈ 4.4×10⁻³ T

7 2 m लंबाई तथा 250 g द्रव्यमान का एक सीधा तार, 0.7 T के एकसमान क्षैतिज चुंबकीय क्षेत्र में क्षैतिज रूप से लटकाया गया है। तार में प्रवाहित धारा ज्ञात कीजिए (g = 9.8 m/s²)।

उत्तर: 1.75 A

BIL = mg ⟹ I = mg/(BL) = (0.25×9.8)/(0.7×2) = 1.75 A

8 किसी क्षेत्र में एकसमान विद्युत क्षेत्र E तथा एकसमान चुंबकीय क्षेत्र B एक ही दिशा में कार्यरत हैं। यदि इस क्षेत्र में एक इलेक्ट्रॉन को इस प्रकार प्रक्षेपित किया जाए कि उसका वेग दोनों क्षेत्रों की दिशा में हो, तो इलेक्ट्रॉन की चाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर: चाल घटेगी

v∥B से चुंबकीय बल शून्य; विद्युत बल गति के विपरीत (ऋणात्मक कार्य) — चाल घटेगी।

9 दो अत्यंत लंबे, सीधे, समांतर चालक A व B में क्रमशः 5 A व 10 A धारा प्रवाहित हो रही है तथा वे परस्पर 10 cm दूरी पर हैं। दोनों में धारा की दिशा समान है। दोनों चालकों के बीच प्रति एकांक लंबाई बल तथा उसकी प्रकृति ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1×10⁻⁴ Nm⁻¹, आकर्षी

f = (μ₀/2π)(I₁I₂/r) = 2×10⁻⁷×5×10/0.10 = 1×10⁻⁴ N/m; समांतर धाराएँ आकर्षित करती हैं

10 100 cm त्रिज्या के एक वृत्ताकार पाश में I=√2 A धारा प्रवाहित हो रही है। पाश के अक्ष पर, केंद्र से 1 m दूरी पर स्थित बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 3.14 × 10⁻⁷ T

B = μ₀IR²/[2(R²+x²)^(3/2)] = π×10⁻⁷ T ≈ 3.14×10⁻⁷ T

11 1 mm त्रिज्या की एक लंबी परिनालिका में प्रति mm 100 फेरे लिपटे हैं। यदि इसमें 1 A धारा प्रवाहित हो, तो परिनालिका के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 12.56 × 10⁻² T

n = 10⁵ फेरे/m; B = μ₀nI = 4π×10⁻² ≈ 12.56×10⁻² T

12 किसी लंबे सीधे तार (वृत्ताकार अनुप्रस्थ-काट, समान धारा-वितरण) के लिए ऐम्पियर के परिपथीय नियम से, तार के भीतरी व बाहरी क्षेत्रों में चुंबकीय क्षेत्र किस प्रकार बदलता है?

उत्तर: तार की सीमा तक दूरी r के साथ रैखिक वृद्धि, फिर बाह्य क्षेत्र में 1/r के अनुसार कमी

तार के भीतर (ra): B∝1/r

13 दो टोरॉइड 1 व 2 में फेरों की कुल संख्या क्रमशः 200 व 100 है, तथा उनकी औसत त्रिज्याएँ क्रमशः 40 cm व 20 cm हैं। यदि दोनों में समान धारा i प्रवाहित हो, तो दोनों में चुंबकीय क्षेत्रों का अनुपात ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1 : 1

B ∝ N/R; N₁/R₁ = 200/40 = 5; N₂/R₂ = 100/20 = 5 — संयोगवश बराबर

14 एक अनंत लंबाई के सीधे चालक में 5 A धारा प्रवाहित हो रही है। एक इलेक्ट्रॉन इस चालक के समांतर 10⁵ m/s की चाल से गतिमान है। किसी क्षण इलेक्ट्रॉन तथा चालक के बीच लंबवत दूरी 20 cm है। उस क्षण इलेक्ट्रॉन पर लगने वाले बल का परिमाण ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 8 × 10⁻²⁰ N

B = μ₀I/2πd = 5×10⁻⁶ T; F = evB = 8×10⁻²⁰ N

15 12a लंबाई तथा R प्रतिरोध का एक समरूप चालक तार, (i) भुजा a की एक समबाहु त्रिभुजाकार कुंडली, तथा (ii) भुजा a की एक वर्गाकार कुंडली के रूप में मोड़ा जाता है। दोनों स्थितियों में कुंडली के चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण क्रमशः ज्ञात कीजिए।

उत्तर: त्रिभुज के लिए √3Ia², वर्ग के लिए 3Ia²

वर्ग: n=12a/4a=3, M=3Ia²; त्रिभुज: n=12a/3a=4, M=4×I×(√3/4)a²=√3Ia²

16 50 cm लंबाई तथा 100 फेरे वाली एक लंबी परिनालिका में 2.5 A धारा प्रवाहित हो रही है। परिनालिका के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 6.28 × 10⁻⁴ T

n = 100/0.50 = 200; B = μ₀nI = 4π×10⁻⁷ × 200 × 2.5 ≈ 6.28×10⁻⁴ T

17 समान संवेग से गतिमान आयनित हाइड्रोजन परमाणु (प्रोटॉन) तथा α-कण किसी एकसमान चुंबकीय क्षेत्र B में लंबवत प्रवेश करते हैं। इनके कक्षा-पथों की त्रिज्याओं का अनुपात ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 2 : 1

r = p/qB; समान p पर r ∝ 1/q; प्रोटॉन q=e, α q=2e ⟹ r_H/r_α = 2

18 2.1 cm लंबाई व 1.25 cm चौड़ाई की एक 250-फेरे वाली आयताकार कुंडली में 85 µA धारा प्रवाहित हो रही है, तथा यह 0.85 T तीव्रता के चुंबकीय क्षेत्र में रखी है। कुंडली को बल-आघूर्ण के विरुद्ध 180° घुमाने में किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 9.1 µJ

W = 2MB = 2×NIAB ≈ 9.1×10⁻⁶ J

19 त्रिज्या a का एक लंबा सीधा तार, जिसमें धारा I समान रूप से अनुप्रस्थ-काट पर वितरित है, प्रवाहित हो रही है। तार के अक्ष से क्रमशः a/2 तथा 2a त्रिज्यीय दूरियों पर चुंबकीय क्षेत्रों B तथा B′ का अनुपात ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1 (B:B′ = 1:1)

r=a/2 पर B = μ₀I/4πa; r=2a पर B′ = μ₀I/4πa — संयोगवश बराबर

20 एक लंबे तार को मोड़कर एकल-फेरे की वृत्ताकार कुंडली बनाई जाती है, जिसके केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र B है। यदि इसी तार को (समान कुल लंबाई के साथ) n-फेरों वाली कुंडली में मोड़ा जाए, तो नए केंद्र पर क्षेत्र ज्ञात कीजिए।

उत्तर: n²B

नई त्रिज्या r'=r/n; B' = μ₀(nI)/2(r/n) = n²(μ₀I/2r) = n²B

21 किसी वृत्ताकार कक्षा (त्रिज्या r) में गतिमान एक इलेक्ट्रॉन प्रति सेकंड n परिक्रमण करता है। कक्षा के केंद्र पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण ज्ञात कीजिए।

उत्तर: μ₀en/2r

तुल्य धारा I=en; B = μ₀I/2r = μ₀en/2r

22 3.57×10⁻² T तीव्रता के अनुप्रस्थ चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में एक इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार पथ पर गतिमान है। यदि e/m = 1.76×10¹¹ C/kg हो, तो इलेक्ट्रॉन की परिक्रमण आवृत्ति ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1 GHz

f = (e/m)B/2π = 1.76×10¹¹ × 3.57×10⁻²/2π ≈ 1×10⁹ Hz

23 0.5 kg/m द्रव्यमान/एकांक-लंबाई वाली एक धात्विक छड़ किसी चिकने आनत तल (30° कोण पर) पर क्षैतिज रूप से रखी है। छड़ को फिसलने से रोकने के लिए, इसमें धारा प्रवाहित की जाती है, जबकि 0.25 T तीव्रता का चुंबकीय क्षेत्र ऊर्ध्वाधर दिशा में कार्यरत है। छड़ को स्थिर रखने के लिए आवश्यक धारा ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 11.32 A

mg sin30° = IlB cos30° ⟹ I = mg tan30°/B = 0.5×9.8×0.577/0.25 ≈ 11.32 A

24 2 m लंबाई तथा 250 g द्रव्यमान का एक सीधा तार, 0.7 T के एकसमान क्षैतिज चुंबकीय क्षेत्र में क्षैतिज रूप से लटकाया गया है। तार में प्रवाहित धारा ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1.75 A

BIL = mg; I = mg/(BL) = 1.75 A

25 किसी प्रबल चुंबकीय ध्रुव के सामने एक क्षैतिज तल पर चादर रखी गई है। निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं? A. चुंबकीय चादर को रोकने के लिए बल चाहिए। B. अचुंबकीय चादर को रोकने के लिए बल चाहिए। C. चालक चादर को नियत वेग से हटाने के लिए बल चाहिए। D. अचालक व अध्रुवी चादर को हटाने के लिए बल चाहिए।

उत्तर: केवल A व C

चुंबकीय चादर आकर्षित होगी (A सत्य); चालक चादर में भँवर धाराएँ गति का विरोध करेंगी (C सत्य); अचुंबकीय/अध्रुवी पर कोई बल नहीं (B, D असत्य)

26 100 Ω प्रतिरोध वाला एक गैल्वेनोमीटर 1 mA धारा पर पूर्ण-स्केल विक्षेप देता है। इसे 0-10 A परिसर के अमीटर में बदलने के लिए आवश्यक शंट-प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 0.01 Ω

S = I_gG/(I−I_g) = (10⁻³×100)/(10−10⁻³) ≈ 0.01 Ω

27 5 cm त्रिज्या की एक कसकर लिपटी 100-फेरे वाली वृत्ताकार कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र 3.14×10⁻³ T है। कुंडली में प्रवाहित धारा ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 2.5 A

B = μ₀NI/2r से I ≈ 2.5 A

28 100 cm त्रिज्या के एक वृत्ताकार पाश में I=√2 A धारा प्रवाहित हो रही है। पाश के अक्ष पर, केंद्र से 1 m दूरी पर स्थित बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 3.14 × 10⁻⁷ T

B = μ₀IR²/[2(R²+x²)^(3/2)] = π×10⁻⁷ T

➕ अतिरिक्त NEET तथ्य

सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय NEET में प्रतिवर्ष 2–4 प्रश्न (8–16 अंक) रखता है — भौतिकी के भारी अध्यायों में गिना जाता है; सर्वाधिक बार पूछे गए उप-विषय — चुंबकीय बल, बायो-सावर्ट नियम, ऐम्पियर का परिपथीय नियम, वृत्ताकार पाश का क्षेत्र, समांतर धाराओं के बीच बल, चल कुंडली गैल्वेनोमीटर हैं।
तथ्य
  • हॉल प्रभाव — धारावाही चालक पट्टी को धारा की दिशा के लंबवत् चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर चालक के आर-पार एक अनुप्रस्थ विभवांतर (हॉल विभव) उत्पन्न होता है — यह वाहकों की प्रकृति (इलेक्ट्रॉन/होल) व संख्या घनत्व ज्ञात करने में सहायक है।
तथ्य
  • फ्लेमिंग का बायाँ-हाथ नियम — बाएँ हाथ के अँगूठे, तर्जनी व मध्यमा को परस्पर लंबवत् फैलाएँ — तर्जनी B की दिशा, मध्यमा धारा (I) की दिशा, अँगूठा बल (F) की दिशा बताता है।
सूत्र
  • गतिमान बिंदु आवेश के कारण क्षेत्र — B = (μ₀/4π) × q(v×r̂)/r² — बायो-सावर्ट नियम का एकल-आवेश संस्करण।
तुलनात्मक
  • परिनालिका बनाम टोरॉइड — परिनालिका के सिरों पर किनारा-प्रभाव (क्षेत्र फैलाव) होता है; टोरॉइड में कोई किनारा-प्रभाव नहीं (क्षेत्र भीतर पूर्णतः परिबद्ध)।
तथ्य
  • त्रिज्य चुंबकीय क्षेत्र का महत्व — गैल्वेनोमीटर में ध्रुव-खंडों व लौह क्रोड की विशेष संरचना, θ सदैव 90° रखती है, जिससे τ = NIAB सीधे I पर निर्भर हो जाता है (रैखिक पैमाना)।
तुलनात्मक
  • धारा सुग्राहिता बनाम वोल्टता सुग्राहिता — N बढ़ाने पर धारा सुग्राहिता सीधे बढ़ती है, परंतु R भी बढ़ने से वोल्टता सुग्राहिता आवश्यक नहीं बढ़े।
तथ्य
  • धारा-पाश का चुंबकीय आघूर्ण — केवल क्षेत्रफल पर निर्भर — m=NIA में केवल A महत्वपूर्ण है, पाश की आकृति नहीं।
ट्रैप
  • लोरेंज बल का परिमाण — sinθ पर निर्भरता — θ=90° पर अधिकतम, θ=0°/180° पर शून्य।
तथ्य
  • चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ सदैव बंद पाश बनाती हैं — चुंबकीय एकध्रुव के अस्तित्व-अभाव का परिणाम।
ट्रैप
  • चुंबकीय बल कभी कार्य नहीं करता — परंतु वेग की दिशा बदल सकता है (केवल परिमाण अपरिवर्तित)।
तथ्य
  • ऐम्पियर का परिपथीय नियम — सममिति की अनिवार्यता — अनंत तार, परिनालिका व टोरॉइड जैसी उच्च-सममितियों में ही सरलता से प्रयुक्त।
तथ्य
  • वेग वरणकर्ता — केवल v=E/B चाल के कण बिना विक्षेप गुजरते हैं — थॉमसन के e/m प्रयोग का आधार।
तथ्य
  • नर्म लौह क्रोड — वैद्युत चुंबक में क्षेत्र सैकड़ों गुना बढ़ाता है; धारा हटते ही चुंबकत्व लुप्त हो जाता है।
तथ्य
  • ऐम्पियर व जनित्र का सैद्धांतिक आधार — धारावाही चालक पर बल F=IL×B विद्युत मोटर का सिद्धांत, जबकि गतिमान चालक/परिवर्ती फ्लक्स से धारा उत्पन्न करना विद्युत जनित्र का सिद्धांत।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — चुंबकीय बल (लोरेंज), बायो-सावर्ट नियम, वृत्ताकार पाश का क्षेत्र, ऐम्पियर का परिपथीय नियम, समांतर धाराओं के बीच बल, चल कुंडली गैल्वेनोमीटर — इन छह टॉपिक पर विशेष ध्यान दें।

? अभ्यास प्रश्न-उत्तर

NCERT अध्याय 4 के सभी 13 प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें

प्रश्न 4.1 तार की एक वृत्ताकार कुंडली में 100 फेरे हैं, प्रत्येक की त्रिज्या 8.0 cm है और इनमें 0.40 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है?
उत्तर

N=100, R=0.08 m, I=0.40 A; B = μ₀NI/2R = (4π×10⁻⁷ × 100 × 0.40)/(2 × 0.08)

B ≈ 3.14 × 10⁻⁴ T

प्रश्न 4.2 एक लंबे, सीधे तार में 35 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। तार से 20 cm दूरी पर स्थित किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है?
उत्तर

I=35 A, r=0.20 m; B = μ₀I/2πr = 2×10⁻⁷ × 35/0.20

B = 3.5 × 10⁻⁵ T

प्रश्न 4.3 क्षैतिज तल में रखे एक लंबे सीधे तार में 50 A धारा उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के पूर्व में 2.5 m दूरी पर स्थित बिंदु पर B का परिमाण और दिशा ज्ञात कीजिए।
उत्तर

परिमाण: B = μ₀I/2πr = 2×10⁻⁷ × 50/2.5 = 4 × 10⁻⁶ T

दिशा: दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम से — ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर।

प्रश्न 4.4 व्योमस्थ खिंचे क्षैतिज बिजली के तार में 90 A धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के 1.5 m नीचे B का परिमाण और दिशा ज्ञात कीजिए।
उत्तर

परिमाण: B = μ₀I/2πr = 2×10⁻⁷ × 90/1.5 = 1.2 × 10⁻⁵ T

दिशा: भौगोलिक दक्षिण की ओर (क्षैतिज दिशा में)।

प्रश्न 4.5 एक तार जिसमें 8 A धारा प्रवाहित हो रही है, 0.15 T के एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में, क्षेत्र से 30° का कोण बनाते हुए रखा है। एकांक लंबाई पर लगने वाले बल का परिमाण और दिशा ज्ञात कीजिए।
उत्तर

f = F/L = IB sinθ = 8 × 0.15 × sin30° = 0.6 N/m

दिशा: F = IL×B से — तार व क्षेत्र दोनों के तल के लंबवत।

प्रश्न 4.6 एक 3.0 cm लंबा तार जिसमें 10 A धारा प्रवाहित हो रही है, एक परिनालिका के भीतर उसके अक्ष के लंबवत रखा है। परिनालिका के भीतर B = 0.27 T है। तार पर लगने वाला चुंबकीय बल ज्ञात कीजिए।
उत्तर

F = BIL sin90° = BIL = 0.27 × 10 × 0.03

F = 0.081 N

प्रश्न 4.7 एक-दूसरे से 4.0 cm की दूरी पर रखे दो लंबे, सीधे, समांतर तारों A एवं B से क्रमशः 8.0 A एवं 5.0 A धाराएँ एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। तार A के 10 cm खंड पर बल का आकलन कीजिए।
उत्तर

f/L = μ₀I_A I_B/2πd = 2×10⁻⁷ × 8×5/0.04 = 2×10⁻⁴ N/m

F = (f/L)×L = 2×10⁻⁴ × 0.10 = 2 × 10⁻⁵ N; दिशा तार B की ओर (आकर्षण)

प्रश्न 4.8 80 cm लंबी परिनालिका में 5 परतें हैं, प्रत्येक में 400 फेरे। धारा 8.0 A। परिनालिका के भीतर केंद्र के पास B परिकलित कीजिए।
उत्तर

N = 5×400 = 2000; n = N/L = 2000/0.80 = 2500 फेरे/m

B = μ₀nI = 4π×10⁻⁷ × 2500 × 8.0 ≈ 2.51 × 10⁻² T

प्रश्न 4.9 10 cm भुजा की वर्गाकार कुंडली में 20 फेरे, धारा 12 A; अभिलंब B (0.80 T) से 30° का कोण बनाता है। बलयुग्म आघूर्ण का परिमाण ज्ञात कीजिए।
उत्तर

A = (0.10)² = 0.01 m²; τ = NIAB sinθ = 20 × 12 × 0.01 × 0.80 × sin30°

τ = 0.96 N·m

प्रश्न 4.10 दो गैल्वेनोमीटर M₁ (R=10Ω, N=30, A=3.6×10⁻³ m², B=0.25 T) व M₂ (R=14Ω, N=42, A=1.8×10⁻³ m², B=0.50 T)। (a) धारा-सुग्राहिताओं का अनुपात, (b) वोल्टता-सुग्राहिताओं का अनुपात ज्ञात कीजिए।
उत्तर

(a) (NAB)_M₂/(NAB)_M₁ = (42×1.8×10⁻³×0.50)/(30×3.6×10⁻³×0.25) = 0.0378/0.0270 = 1.4

(b) वोल्टता-सुग्राहिता = (NAB/k)/R; अनुपात = (0.0378/14)/(0.0270/10) = 0.0027/0.0027 = 1.0 (समान)

प्रश्न 4.11 6.5 G के एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में 4.8×10⁶ m/s के वेग से क्षेत्र के लंबवत इलेक्ट्रॉन भेजा गया। पथ वृत्ताकार क्यों? त्रिज्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर

व्याख्या: चुंबकीय बल F=q(v×B) वेग के लंबवत है — यह अभिकेंद्र बल की भाँति कार्य करके कण को वृत्ताकार पथ पर बनाए रखता है।

r = mv/eB = (9.1×10⁻³¹ × 4.8×10⁶)/(1.6×10⁻¹⁹ × 6.5×10⁻⁴)

r ≈ 4.2 × 10⁻² m = 4.2 cm

प्रश्न 4.12 उपरोक्त प्रश्न में इलेक्ट्रॉन की परिक्रमण आवृत्ति ज्ञात कीजिए। क्या यह वेग पर निर्भर है?
उत्तर

ν = eB/2πm = (1.6×10⁻¹⁹ × 6.5×10⁻⁴)/(2π × 9.1×10⁻³¹) ≈ 1.82 × 10⁷ Hz

नहीं — परिक्रमण आवृत्ति केवल e, B व m पर निर्भर है, वेग v या त्रिज्या r पर नहीं (यही साइक्लोट्रॉन का सिद्धांत है)।

प्रश्न 4.13 30 फेरे, त्रिज्या 8.0 cm, धारा 6.0 A, B=1.0 T, θ=60°। (a) आवश्यक प्रतिआघूर्ण ज्ञात कीजिए। (b) यदि कुंडली को अनियमित आकृति की समान क्षेत्रफल वाली कुंडली से बदलें, तो उत्तर परिवर्तित होगा?
उत्तर

(a) A = π(0.08)² = 0.0201 m²; m = NIA = 30×6×0.0201 = 3.619 A·m²

τ = mB sinθ = 3.619 × 1.0 × sin60° ≈ 3.13 N·m

(b) नहीं, बल आघूर्ण का सूत्र केवल क्षेत्रफल A पर निर्भर करता है, आकृति पर नहीं — समान क्षेत्रफल पर समान τ प्राप्त होगा।

यह अध्ययन सामग्री गतिमान आवेश और चुंबकत्व — ऑस्टेंड का प्रयोग, लोरेंज बल, बायो-सावर्ट नियम, ऐम्पियर का परिपथीय नियम, परिनालिका, समांतर धाराओं के बीच बल, चल कुंडली गैल्वेनोमीटर — को सरल, मौलिक एवं परीक्षा-अनुकूल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिसमें NEET-स्तरीय तथ्य, तुलनात्मक तालिकाएँ एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर सम्मिलित हैं।

गतिमान आवेश और चुंबकत्व — विद्युत एवं चुंबकत्व के गहन संबंध का मूल आधार।

↑
Scroll to Top