वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र
कूलॉम के नियम से लेकर गाउस के नियम तक — आवेश के मूल गुण, चालक एवं विद्युतरोधी, विद्युत क्षेत्र एवं क्षेत्र रेखाएँ, वैद्युत फ्लक्स, वैद्युत द्विध्रुव, संतत आवेश वितरण तथा गाउस नियम के अनुप्रयोग — सम्पूर्ण व्याख्या, सभी अभ्यास प्रश्नों के हल एवं NEET PYQs सहित।
1.1 भूमिका
स्थिरवैद्युतिकी की प्रकृति एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
शुष्क मौसम में स्वेटर उतारते समय चट-चट की ध्वनि, आकाश में तड़ित (बिजली चमकना), कार का दरवाज़ा खोलते समय हल्का झटका लगना — ये सब स्थिरवैद्युत आवेश (static electricity) के परिचित उदाहरण हैं। जब दो विद्युतरोधी पृष्ठों को आपस में रगड़ा जाता है, तो आवेश एकत्र हो जाता है और शरीर से होकर विसर्जित (discharge) होता है — यही झटके का कारण है।
स्थिरवैद्युतिकी (Electrostatics) में हम स्थिर आवेशों द्वारा उत्पन्न बलों, क्षेत्रों तथा विभवों का अध्ययन करते हैं। "स्थिर" का अर्थ है — वह सब कुछ जो समय के साथ परिवर्तित अथवा गतिमान नहीं होता।
- स्थिरवैद्युतिकी में स्थिर आवेशों का अध्ययन होता है
- पहला विद्युत प्रेक्षण — रगड़ा हुआ ऐंबर (amber), लगभग 600 ई.पू.
- स्थिरवैद्युतिकी में अध्ययन की तीन मूल राशियाँ — बल, क्षेत्र, विभव
1.2 वैद्युत आवेश
आवेश के दो प्रकार, ध्रुवता एवं मूल अवधारणाएँ
जब काँच की छड़ को रेशम से रगड़ा जाता है तो दोनों वैद्युतमय (आवेशित) हो जाते हैं। प्रयोगों से पता चलता है कि आवेश केवल दो प्रकार के होते हैं:
| आवेश का प्रकार | परस्पर व्यवहार |
|---|---|
| सजातीय आवेश (like charges) | एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं |
| विजातीय आवेश (unlike charges) | एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं |
बेंजामिन फ्रैंकलिन के अनुसार परिपाटी (convention) यह है: काँच की छड़ या बिल्ली के समूर (fur) पर आवेश धनात्मक; प्लास्टिक की छड़ या रेशम पर आवेश ऋणात्मक कहलाता है। वह गुण जो दो प्रकार के आवेशों में भेद करता है, आवेश की ध्रुवता (polarity) कहलाता है।
रगड़ने की प्रक्रिया में कोई नया आवेश उत्पन्न नहीं होता — केवल इलेक्ट्रॉनों का एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरण होता है। जो वस्तु इलेक्ट्रॉन खोती है वह धनावेशित तथा जो प्राप्त करती है वह ऋणावेशित हो जाती है।
- आवेश केवल दो प्रकार के होते हैं — धनात्मक एवं ऋणात्मक
- सजातीय प्रतिकर्षित; विजातीय आकर्षित करते हैं
- परिपाटी: काँच + रेशम रगड़ने पर काँच धनावेशित, रेशम ऋणावेशित होता है
- रगड़ने से केवल इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण होता है — नया आवेश उत्पन्न नहीं होता
- स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी आवेश की उपस्थिति तथा सापेक्ष मात्रा दोनों दिखाता है
1.3 चालक तथा विद्युतरोधी
पदार्थों का वर्गीकरण एवं आवेश-प्रवाह
चालक (Conductors): वे पदार्थ जो अपने में से होकर आसानी से विद्युत आवेश को प्रवाहित होने देते हैं। उदाहरण — धातुएँ, मानव व जंतु शरीर, पृथ्वी। इनमें इलेक्ट्रॉन पदार्थ के भीतर गति के लिए अपेक्षाकृत स्वतंत्र होते हैं।
विद्युतरोधी (Insulators): वे पदार्थ जो अपने से होकर प्रवाहित होने वाली विद्युत पर उच्च प्रतिरोध लगाते हैं। उदाहरण — काँच, पॉर्सेलेन, प्लास्टिक, नायलॉन, लकड़ी।
अर्धचालक (Semiconductors): एक तीसरी श्रेणी, जो आवेशों की गति में अवरोध उत्पन्न करती है — इसका परिमाण चालकों और विद्युतरोधियों के मध्यवर्ती होता है।
जब कुछ आवेश किसी चालक पर स्थानांतरित होता है तो वह तुरंत ही उस चालक के समस्त पृष्ठ पर फैल जाता है। इसके विपरीत, यदि कुछ आवेश किसी विद्युतरोधी को दें तो वह वहीं (जहाँ रखा गया) रहता है।
- धातुएँ, मानव/जंतु शरीर तथा पृथ्वी — चालक हैं
- काँच, पॉर्सेलेन, प्लास्टिक, नायलॉन, लकड़ी — विद्युतरोधी हैं
- चालक पर दिया गया आवेश तुरंत पूरे पृष्ठ पर फैल जाता है; विद्युतरोधी पर वहीं स्थिर रहता है
- अर्धचालक — चालक एवं विद्युतरोधी के बीच की तीसरी श्रेणी
1.4 वैद्युत आवेश के मूल गुण
योज्यता, संरक्षण एवं क्वांटीकरण
1.4.1 आवेशों की योज्यता (Additivity)
आवेश एक अदिश राशि है (द्रव्यमान की भाँति), जिसे बीजगणितीय रीति (चिह्न सहित) से जोड़ा जा सकता है।
Q = q₁ + q₂ + q₃ + … + qₙ
उदाहरण: यदि पाँच आवेश +1, +2, −3, +4, −5 (किसी मात्रक में) हों तो कुल आवेश = (+1)+(+2)+(−3)+(+4)+(−5) = −1।
1.4.2 वैद्युत आवेश संरक्षित है (Conservation)
किसी वियुक्त निकाय (isolated system) का कुल आवेश सदैव संरक्षित रहता है — रगड़ने पर आवेशों का पुनर्वितरण तो होता है, पर न कोई नया आवेश उत्पन्न होता है, न ही नष्ट होता है। यद्यपि कभी-कभी आवेशवाही कण उत्पन्न/नष्ट हो सकते हैं (जैसे न्यूट्रॉन का प्रोटॉन + इलेक्ट्रॉन में रूपांतरण), फिर भी रचना से पूर्व और पश्चात कुल आवेश शून्य ही रहता है।
1.4.3 वैद्युत आवेश का क्वांटीकरण (Quantization)
सभी मुक्त आवेश, आवेश की मूल इकाई e के पूर्णांकी गुणज होते हैं।
इलेक्ट्रॉन पर आवेश = −e, प्रोटॉन पर आवेश = +e। यह सुझाव फैराडे के विद्युत अपघटन के प्रायोगिक नियमों से मिला; 1912 में मिलिकन ने इसे प्रायोगिक रूप से निर्देशित (सिद्ध) किया।
- आवेश योज्य, संरक्षित, क्वांटीकृत — तीन मूल गुण
- आवेश एक अदिश राशि है — कोई दिशा नहीं, केवल परिमाण व चिह्न
- q = ne; e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C
- क्वांटीकरण का सुझाव — फैराडे; प्रायोगिक सिद्धि — मिलिकन (1912)
- 1 C = 6.25 × 10¹⁸ इलेक्ट्रॉनों का आवेश
- स्थूल स्तर पर क्वांटीकरण की उपेक्षा संभव; सूक्ष्म स्तर पर नहीं
1.5 कूलॉम नियम
दो बिंदु आवेशों के बीच बल का मात्रात्मक नियम
कूलॉम नियम दो बिंदु आवेशों के बीच लगे बल का एक मात्रात्मक कथन है। यदि आवेशित वस्तुओं का आकार उनके बीच की दूरी की तुलना में बहुत कम है, तो उन्हें बिंदु आवेश (point charge) माना जा सकता है।
SI रूप: F = (1 / 4πε₀) · |q₁ q₂| / r²
सदिश रूप: F₂₁ = (1 / 4πε₀) · (q₁q₂ / r²₂₁) · r̂₂₁
यहाँ r̂₂₁, आवेश 1 से 2 की ओर एकांक सदिश है। बल एक सदिश राशि है, अतः कूलॉम नियम को सदिश संकेतन में लिखना उत्तम होता है।
| राशि | प्रतीक / मान | टिप्पणी |
|---|---|---|
| कूलॉम स्थिरांक | k = 1/4πε₀ ≈ 9 × 10⁹ N·m²/C² | निर्वात में |
| निर्वात की विद्युतशीलता | ε₀ = 8.854 × 10⁻¹² C²N⁻¹m⁻² | परावैद्युतांक भी कहते हैं |
दिशा-नियम: यदि q₁ व q₂ समान चिह्न के हों — बल प्रतिकर्षी होगा। यदि विपरीत चिह्न के हों — बल आकर्षी होगा। यह न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुरूप है: F₁₂ = −F₂₁।
- कूलॉम बल — आवेशों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती, दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती
- k = 9 × 10⁹ N m² C⁻² (निर्वात/वायु में); ε₀ = 8.854 × 10⁻¹² C²N⁻¹m⁻²
- F₁₂ = −F₂₁ — न्यूटन के तृतीय नियम का पालन
- कूलॉम नियम r ~ 10⁻¹⁰ m (परमाण्विक स्तर) तक भी सत्यापित है
- खोजकर्ता — चार्ल्स ऑगस्टिन डे कूलॉम (1785), ऐंठन तुला से
- प्रोटॉन-इलेक्ट्रॉन के बीच वैद्युत बल, गुरुत्वाकर्षण बल से ~10³⁹ गुना अधिक प्रबल
1.6 बहुल आवेशों के बीच बल — अध्यारोपण सिद्धांत
अनेक आवेशों का संयुक्त प्रभाव
अध्यारोपण सिद्धांत (Superposition Principle): किसी आवेश पर कई अन्य आवेशों के कारण कुल बल, उन सभी आवेशों द्वारा एक-एक करके लगाए गए बलों के सदिश योग के बराबर होता है। किसी एक आवेश द्वारा लगाया गया विशिष्ट बल अन्य आवेशों की उपस्थिति से प्रभावित नहीं होता।
F₁ = F₁₂ + F₁₃ + … + F₁ₙ = (q₁/4πε₀) Σ (qᵢ/r²₁ᵢ) r̂₁ᵢ
सदिशों का योग सामान्य समांतर चतुर्भुज नियम द्वारा किया जाता है। समबाहु त्रिभुज या वर्ग जैसी सममित संरचनाओं में प्रायः कुछ बल परस्पर निरस्त हो जाते हैं (सममिति द्वारा)।
- किसी आवेश पर बल, अन्य आवेशों की उपस्थिति से अप्रभावित
- निकाय में कोई अतिरिक्त त्रि-पिंड या चतुः-पिंड बल उत्पन्न नहीं होते — केवल युग्मों के बल जोड़े जाते हैं
- बलों का योग — सदिश योग (समांतर चतुर्भुज नियम)
- मूल रूप से संपूर्ण स्थिरवैद्युतिकी, कूलॉम नियम + अध्यारोपण सिद्धांत की ही परिणति है
1.7 विद्युत क्षेत्र
क्षेत्र की अवधारणा एवं परिभाषा
आवेश Q अपने चारों ओर विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है; जब कोई अन्य आवेश q इस क्षेत्र में लाया जाता है, तो क्षेत्र उस पर बल आरोपित करता है। यह "क्षेत्र" की अवधारणा दूरस्थ आवेशों के बीच लगने वाले बल की तात्क्षणिक क्रिया की समस्या (काल विलंब) को सुचारु रूप से हल करती है।
E(r) = (1/4πε₀) · (Q/r²) · r̂
विद्युत क्षेत्र का SI मात्रक N/C है (या समतुल्य रूप से V/m, जो अगले अध्याय में देखेंगे)।
• धनावेश के कारण क्षेत्र सदैव उससे बहिर्मुखी (त्रिज्यीय) होता है; ऋणावेश के कारण क्षेत्र सदैव अंतर्मुखी होता है।
• विद्युत क्षेत्र परीक्षण आवेश q पर निर्भर नहीं करता, क्योंकि F, q के अनुक्रमानुपाती है — अतः अनुपात F/q, q से स्वतंत्र है।
• विद्युत क्षेत्र त्रिविमीय दिक्स्थान के प्रत्येक बिंदु पर परिभाषित एक सदिश राशि है।
- E = F/q (परीक्षण आवेश की सीमा q→0 में); बिंदु आवेश का E = kQ/r²
- धनावेश → क्षेत्र बहिर्मुखी; ऋणावेश → क्षेत्र अंतर्मुखी
- विद्युत क्षेत्र का SI मात्रक — N/C (अथवा V/m)
- क्षेत्र की अवधारणा — फैराडे द्वारा प्रस्तावित
1.8 विद्युत क्षेत्र रेखाएँ
क्षेत्र का दृश्यीकरण एवं गुणधर्म
विद्युत क्षेत्र रेखा एक ऐसा वक्र है जिसके किसी भी बिंदु पर खींचा गया स्पर्शी, उस बिंदु पर लगे नेट बल (क्षेत्र) की दिशा को निरूपित करता है। क्षेत्र रेखाओं का घनत्व (सघनता) क्षेत्र की प्रबलता दर्शाता है — जहाँ रेखाएँ सघन हैं वहाँ क्षेत्र प्रबल, जहाँ विरल हैं वहाँ क्षेत्र दुर्बल।
- क्षेत्र रेखाएँ धनावेश से आरंभ होकर ऋणावेश पर समाप्त होती हैं (एकल आवेश के लिए अनंत से या अनंत पर)
- आवेश-मुक्त क्षेत्र में, क्षेत्र रेखाएँ संतत वक्र होती हैं जो कहीं टूटती नहीं
- दो क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटतीं
- स्थिरवैद्युत क्षेत्र रेखाएँ बंद लूप (पाश) नहीं बनातीं — यह क्षेत्र की संरक्षणात्मक प्रकृति से अनुशासित है
- एकसमान क्षेत्र में क्षेत्र रेखाएँ समांतर व समान दूरी पर होती हैं
- यह प्रविधि सर्वप्रथम फैराडे ने प्रस्तुत की; उन्होंने इन्हें "बल रेखाएँ" कहा था
1.9 वैद्युत फ्लक्स
किसी पृष्ठ से गुजरने वाली क्षेत्र रेखाओं की माप
किसी क्षेत्रफल अवयव ΔS से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स, उस अवयव को काटने वाली क्षेत्र रेखाओं की संख्या के अनुक्रमानुपाती है।
यहाँ θ, क्षेत्रफल अवयव ΔS (सदिश, अभिलंब की दिशा में) तथा E के बीच का कोण है। पूर्ण पृष्ठ S से गुजरने वाला कुल फ्लक्स सभी अवयवों का योग (समाकल) है:
- फ्लक्स Δφ = E·ΔS = E ΔS cosθ, जहाँ θ, E व अभिलंब के बीच कोण
- θ = 90° (E, ΔS के समांतर) → फ्लक्स शून्य
- θ = 0° → फ्लक्स अधिकतम (E ΔS)
- फ्लक्स का मात्रक — N C⁻¹ m²
- क्षेत्रफल-अवयव एक सदिश राशि — ΔS = ΔS n̂, जहाँ n̂ बहिर्मुखी एकांक अभिलंब है
1.10–1.11 वैद्युत द्विध्रुव
द्विध्रुव आघूर्ण, द्विध्रुव का क्षेत्र एवं बल आघूर्ण
परिमाण में समान एवं विजातीय बिंदु आवेशों q तथा −q का कोई युगल, जिनके बीच पृथकन 2a है, वैद्युत द्विध्रुव कहलाता है। परिपाटी के अनुसार −q से q की दिशा द्विध्रुव की दिशा कहलाती है।
दिशा: −q से +q की ओर
अक्ष पर स्थित बिंदु के लिए क्षेत्र (r ≫ a)
विषुवतीय (निरक्षीय) तल पर बिंदु के लिए क्षेत्र (r ≫ a)
एकसमान बाह्य क्षेत्र में द्विध्रुव
एकसमान क्षेत्र E में रखे स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण p पर आवेश q व −q पर क्रमशः qE व −qE बल लगते हैं। चूँकि E एकसमान है, नेट बल शून्य है — परंतु आवेशों में पृथकन होने के कारण एक बल आघूर्ण (टॉर्क) कार्य करता है।
यह बल आघूर्ण द्विध्रुव को क्षेत्र E के साथ संरेखित करने की प्रवृत्ति रखता है — जब p, E के समांतर हो जाता है तो τ = 0।
यदि क्षेत्र एकसमान नहीं है, तो नेट बल आघूर्ण के अतिरिक्त द्विध्रुव पर एक नेट बल भी कार्य करता है। यही कारण है कि आवेशित कंघी (अनावेशित) कागज़ के टुकड़ों को आकर्षित करती है — कंघी टुकड़ों में द्विध्रुव आघूर्ण प्रेरित कर देती है, तथा असमान क्षेत्र के कारण उन पर नेट बल कार्य करता है।
- द्विध्रुव आघूर्ण p = q × 2a; दिशा −q से +q की ओर
- द्विध्रुव का कुल आवेश शून्य, परंतु विद्युत क्षेत्र शून्य नहीं
- द्विध्रुव क्षेत्र 1/r³ अनुसार घटता है (बिंदु आवेश के 1/r² से अधिक तीव्र गति से)
- अक्ष पर क्षेत्र, निरक्षीय तल के क्षेत्र से दुगुना (परिमाण में), दिशा विपरीत
- एकसमान क्षेत्र में नेट बल शून्य परंतु बल आघूर्ण τ = p × E
- असमान क्षेत्र में नेट बल तथा बल आघूर्ण — दोनों
1.12 संतत आवेश वितरण
रैखिक, पृष्ठीय एवं आयतन आवेश घनत्व
व्यावहारिक कार्यों के लिए विविक्त (discrete) आवेशों के पदों में कार्य करना अक्सर संभव नहीं होता, अतः संतत आवेश वितरण की धारणा उपयोगी है (जैसे किसी द्रव के घनत्व की तरह)।
| प्रकार | परिभाषा | मात्रक |
|---|---|---|
| रैखिक आवेश घनत्व λ | λ = ΔQ/Δl (तार पर) | C/m |
| पृष्ठीय आवेश घनत्व σ | σ = ΔQ/ΔS (पृष्ठ पर) | C/m² |
| आयतन आवेश घनत्व ρ | ρ = ΔQ/ΔV (आयतन में) | C/m³ |
कूलॉम नियम व अध्यारोपण सिद्धांत के उपयोग से किसी भी आवेश वितरण (विविक्त, संतत, अथवा दोनों का मिश्रण) के लिए विद्युत क्षेत्र ज्ञात किया जा सकता है।
- रैखिक आवेश घनत्व λ — C/m
- पृष्ठीय आवेश घनत्व σ — C/m²
- आयतन आवेश घनत्व ρ — C/m³
- ये स्थूलदर्शीय अवधारणाएँ हैं — सूक्ष्म स्तर पर आवेश की असंततता की उपेक्षा करती हैं
1.13–1.14 गाउस नियम एवं उसके अनुप्रयोग
फ्लक्स एवं परिबद्ध आवेश का मूलभूत संबंध
गाउस नियम, वैद्युत फ्लक्स तथा आवेश के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यापक संबंध स्थापित करता है — यह किसी भी बंद पृष्ठ (आकृति व आमाप कुछ भी हो) के लिए सत्य है।
किसी बंद पृष्ठ S से गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स φ = q / ε₀
जहाँ q, पृष्ठ S द्वारा परिबद्ध (enclosed) कुल आवेश है।
यह नियम कूलॉम नियम में अंतर्निहित 1/r² निर्भरता पर आधारित है।
(i) अनंत लंबाई के एकसमान आवेशित सीधे तार के कारण क्षेत्र
(ii) एकसमान आवेशित अनंत समतल चादर के कारण क्षेत्र
(iii) एकसमान आवेशित पतले गोलीय खोल (कोश) के कारण क्षेत्र
- गाउस नियम — φ = qenclosed/ε₀, किसी भी आकार के बंद पृष्ठ के लिए सत्य
- अनंत तार — E = λ/(2πε₀r) (E ∝ 1/r)
- अनंत चादर — E = σ/(2ε₀) (दूरी से स्वतंत्र)
- गोलीय खोल के बाहर — E = q/(4πε₀r²) (बिंदु आवेश जैसा)
- गोलीय खोल के भीतर — E = 0
- दो समांतर विपरीत आवेशित प्लेटों के बीच — E = σ/ε₀; बाहर शून्य
🎯 सम्पूर्ण अध्याय के एक-पंक्ति तथ्य
Quick Revision — सभी महत्वपूर्ण बिंदु एक स्थान पर
- आवेश दो प्रकार के होते हैं: धनात्मक व ऋणात्मक; सजातीय प्रतिकर्षित, विजातीय आकर्षित करते हैं।
- आवेश एक अदिश राशि है — इसमें दिशा नहीं होती, केवल परिमाण व चिह्न होता है।
- आवेश योज्य, संरक्षित तथा क्वांटीकृत (q = ne) है।
- आवेश घूर्णन के अंतर्गत अचर है, तथा आपेक्षिक गति में भी सभी निर्देश फ्रेमों के लिए अचर रहता है।
- चालक आवेश को बहने देते हैं (धातु, शरीर, पृथ्वी); विद्युतरोधी नहीं (काँच, प्लास्टिक, लकड़ी)।
- F = kq₁q₂/r² ; k = 1/4πε₀ ≈ 9×10⁹ N m² C⁻²; ε₀ = 8.854×10⁻¹² C²N⁻¹m⁻²।
- E = F/q (परीक्षण आवेश की सीमा में); बिंदु आवेश का E = kQ/r²।
- अध्यारोपण सिद्धांत: कुल बल/क्षेत्र = सभी युग्मों के बलों/क्षेत्रों का सदिश योग।
- वैद्युत बल गुरुत्वाकर्षण बल से बहुत अधिक (~10³⁹ गुना, इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन के लिए) प्रबल है।
- क्षेत्र रेखाएँ +से शुरू, −पर खत्म; कभी काटतीं नहीं; बंद लूप नहीं बनातीं।
- फ्लक्स Δφ = E·ΔS = E ΔS cosθ; मात्रक N C⁻¹ m²।
- द्विध्रुव आघूर्ण p = q(2a), दिशा −q से +q; अक्ष पर E ∝ 1/r³ (द्विगुणित), निरक्षीय तल पर E ∝ 1/r³ (विपरीत दिशा, आधा परिमाण)।
- एकसमान क्षेत्र में द्विध्रुव: नेट बल = 0, बल आघूर्ण τ = p×E; असमान क्षेत्र में नेट बल भी होता है।
- गाउस नियम — φ = qenclosed/ε₀ (किसी भी आकार/आमाप के बंद पृष्ठ के लिए सत्य)।
- अनंत तार: E = λ/2πε₀r; अनंत चादर: E = σ/2ε₀; गोलीय खोल बाहर: E = q/4πε₀r²; खोल भीतर: E = 0।
- गाउसीय पृष्ठ विविक्त आवेश से नहीं गुजरना चाहिए, संतत वितरण से गुजर सकता है।
➕ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु
- एकाकी आवेशित चालक के पृष्ठ के निकट विद्युत क्षेत्र — किसी भी आकार के एकाकी (isolated) आवेशित चालक के पृष्ठ के ठीक बाहर विद्युत क्षेत्र E = σ/ε₀ होता है (न कि σ/2ε₀, जो एक अनंत आवेशित चादर के लिए होता है) — इस भेद को न उलझाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- वान डी ग्राफ जनित्र (Van de Graaff Generator) — यह उपकरण किसी खोखले गोलीय चालक के इस गुण पर आधारित है कि यदि किसी आवेशित छोटी गेंद को खोखले गोले के भीतर स्पर्श कराया जाए, तो आवेश स्वतः पूरी तरह बाहरी पृष्ठ पर स्थानांतरित हो जाता है (चूँकि गोले के भीतर क्षेत्र शून्य होना चाहिए) — इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराकर गोले पर अत्यंत उच्च विभव (लाखों वोल्ट तक) संचित किया जा सकता है।
- द्विध्रुव पर बल आघूर्ण — अधिकतम व न्यूनतम स्थितियाँ — τ = pE sinθ के अनुसार, बल आघूर्ण θ=90° पर अधिकतम (τ=pE) होता है; θ=0° अथवा 180° पर बल आघूर्ण शून्य होता है — यह sin-आधारित सूत्र cos-आधारित स्थितिज ऊर्जा सूत्र (U=−pEcosθ) से भिन्न व्यवहार दर्शाता है।
- द्विध्रुव की स्थायी बनाम अस्थायी साम्यावस्था — θ=0° पर स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम (U=−pE) होती है, अतः यह स्थायी साम्यावस्था है; θ=180° पर स्थितिज ऊर्जा अधिकतम (U=+pE) — यद्यपि यहाँ भी बल आघूर्ण शून्य है, फिर भी यह अस्थायी साम्यावस्था मानी जाती है।
- द्विध्रुव क्षेत्र का बिंदु आवेश से तीव्र क्षय — भौतिक कारण — बिंदु आवेश का क्षेत्र 1/r² अनुसार घटता है, जबकि द्विध्रुव का क्षेत्र इससे तीव्र गति से, 1/r³ अनुसार घटता है — क्योंकि द्विध्रुव का कुल आवेश शून्य होता है और दूर से देखने पर केवल दोनों आवेशों के मध्य की सूक्ष्म दूरी के कारण उत्पन्न "असंतुलन प्रभाव" ही शेष रहता है।
- कूलॉम बल एक केंद्रीय बल है — दो बिंदु आवेशों के मध्य कूलॉम बल सदैव उन्हें जोड़ने वाली सरल रेखा के अनुदिश कार्य करता है — यह गुण गुरुत्वाकर्षण बल के समान है।
- गाउसीय पृष्ठ के चयन की रणनीति — बिंदु/गोलीय सममित आवेश हेतु गोलीय पृष्ठ; अनंत रेखीय आवेश हेतु बेलनाकार पृष्ठ; अनंत चादर हेतु बॉक्स/बेलनाकार पृष्ठ चुना जाता है।
- परीक्षण आवेश (test charge) की आदर्श परिभाषा — विद्युत क्षेत्र की परिभाषा E=F/q में प्रयुक्त परीक्षण आवेश q को सैद्धांतिक रूप से अत्यंत लघु (q→0) माना जाता है — ताकि यह स्वयं स्रोत आवेशों के वितरण को प्रभावित न करे।
- क्षेत्र रेखाएँ परस्पर क्यों नहीं काटतीं — यदि दो क्षेत्र रेखाएँ किसी बिंदु पर एक-दूसरे को काटें, तो उस प्रतिच्छेदन बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की दो भिन्न दिशाएँ एक साथ होंगी — परंतु किसी भी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र अद्वितीय होता है, अतः यह असंभव है।
- क्षेत्र रेखाओं का घनत्व — क्षेत्र की तीव्रता का दृश्य सूचक — जहाँ क्षेत्र रेखाएँ अधिक सघन हों वहाँ विद्युत क्षेत्र अधिक प्रबल होता है; जहाँ विरल हों वहाँ क्षेत्र दुर्बल।
- आवेश-घनत्व के तीनों प्रकार एक साथ — रेखीय λ (C/m), पृष्ठीय σ (C/m²), आयतन ρ (C/m³) — संतत आवेश वितरण से जुड़े समाकलन-आधारित प्रश्नों में सही घनत्व व मात्रक चुनना आवश्यक है।
- कूलॉम बल पर माध्यम का प्रभाव — दो आवेशों के मध्य कूलॉम बल माध्यम के परावैद्युतांक (K) पर निर्भर करता है — निर्वात/वायु की तुलना में किसी अन्य माध्यम (K>1) में रखने पर बल K गुना कम हो जाता है; जबकि गुरुत्वाकर्षण बल किसी भी माध्यम से पूर्णतः अप्रभावित रहता है।
- आवेश का संरक्षण — पृथक् निकाय के लिए — आवेश-संरक्षण का नियम किसी पृथक् निकाय के कुल आवेश पर लागू होता है — निकाय के भीतर व्यष्टि कणों का प्रकार बदल सकता है, परंतु कुल आवेश अपरिवर्तित रहता है (जैसे β-क्षय में)।
- अध्यारोपण सिद्धांत — रैखिकता पर आधारित — अध्यारोपण सिद्धांत यह दर्शाता है कि किसी आवेश-निकाय के कारण उत्पन्न कुल विद्युत क्षेत्र, प्रत्येक आवेश के कारण उत्पन्न क्षेत्रों के सदिश योग के बराबर होता है — यह कूलॉम नियम की रैखिक प्रकृति का सीधा परिणाम है।
- अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) विभिन्न आवेश-वितरणों के क्षेत्र-सूत्रों को न उलझाना, विशेषकर σ/ε₀ बनाम σ/2ε₀ का भेद, (2) द्विध्रुव के बल आघूर्ण (sinθ) व स्थितिज ऊर्जा (cosθ) सूत्रों तथा स्थायी/अस्थायी साम्य की पहचान, (3) गाउस नियम के अनुप्रयोगों में सही गाउसीय पृष्ठ का चयन।
§ महत्वपूर्ण सूत्रों की तालिका
एक जगह सभी उपयोगी सूत्र एवं स्थिरांक
| संकल्पना | सूत्र |
|---|---|
| कूलॉम नियम | \( F = \dfrac{1}{4\pi\varepsilon_0}\dfrac{|q_1 q_2|}{r^2} \) |
| विद्युत क्षेत्र (बिंदु आवेश) | \( E = \dfrac{1}{4\pi\varepsilon_0}\dfrac{Q}{r^2} \) |
| आवेश पर बल | \( F = qE \) |
| द्विध्रुव आघूर्ण | \( p = q \times 2a \) |
| द्विध्रुव क्षेत्र (अक्ष पर, r≫a) | \( E = \dfrac{2p}{4\pi\varepsilon_0 r^3} \) |
| द्विध्रुव क्षेत्र (निरक्षीय तल, r≫a) | \( E = \dfrac{-p}{4\pi\varepsilon_0 r^3} \) |
| द्विध्रुव पर बल आघूर्ण | \( \tau = p \times E \) |
| वैद्युत फ्लक्स | \( \Delta\phi = \vec{E}\cdot\Delta\vec{S} = E\,\Delta S\cos\theta \) |
| गाउस नियम | \( \phi = \dfrac{q}{\varepsilon_0} \) |
| अनंत तार का क्षेत्र | \( E = \dfrac{\lambda}{2\pi\varepsilon_0 r} \) |
| अनंत चादर का क्षेत्र | \( E = \dfrac{\sigma}{2\varepsilon_0} \) |
| गोलीय खोल (बाहर, r≥R) | \( E = \dfrac{q}{4\pi\varepsilon_0 r^2} \) |
| गोलीय खोल (भीतर, r<R) | \( E = 0 \) |
| आवेश क्वांटीकरण | \( q = ne,\ \ e = 1.6\times10^{-19}\,\text{C} \) |
| स्थिरांक | मान |
|---|---|
| k = 1/4πε₀ | 9 × 10⁹ N m² C⁻² |
| ε₀ | 8.854 × 10⁻¹² C² N⁻¹ m⁻² |
| e (इलेक्ट्रॉन आवेश) | 1.6 × 10⁻¹⁹ C |
| mₑ (इलेक्ट्रॉन द्रव्यमान) | 9.11 × 10⁻³¹ kg |
| mₚ (प्रोटॉन द्रव्यमान) | 1.67 × 10⁻²⁷ kg |
| G (गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक) | 6.67 × 10⁻¹¹ N m² kg⁻² |
✍️ अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल (1.1 – 1.23)
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प्रश्न 1.1 वायु में एक-दूसरे से 30 cm दूरी पर रखे दो छोटे आवेशित गोलों पर क्रमशः 2×10⁻⁷ C तथा 3×10⁻⁷ C आवेश हैं। उनके बीच कितना बल है?
दिया गया: q₁ = 2×10⁻⁷ C, q₂ = 3×10⁻⁷ C, r = 30 cm = 0.3 m
कूलॉम नियम से: F = (1/4πε₀)·q₁q₂/r² = 9×10⁹ × (2×10⁻⁷)(3×10⁻⁷)/(0.3)²
F = 9×10⁹ × 6×10⁻¹⁴/0.09 = 9×10⁹ × 6.67×10⁻¹³
F = 6 × 10⁻³ N (प्रतिकर्षी, क्योंकि दोनों आवेश समान चिह्न के हैं)
प्रश्न 1.2 0.4 µC आवेश के गोले पर किसी अन्य 0.8 µC आवेशित गोले के कारण 0.2 N बल लगता है। (a) दूरी ज्ञात कीजिए। (b) दूसरे गोले पर पहले के कारण बल?
(a) F = (1/4πε₀)·q₁q₂/r² ⟹ r² = k q₁q₂/F
r² = (9×10⁹ × 0.4×10⁻⁶ × 0.8×10⁻⁶)/0.2 = 2.88×10⁻³/0.2 = 0.0144
r = 0.12 m = 12 cm
(b) न्यूटन के तृतीय नियम के अनुसार, कूलॉम बल एक क्रिया-प्रतिक्रिया युग्म है — दूसरे गोले पर पहले गोले के कारण बल का परिमाण पहले गोले पर बल के परिमाण के बराबर होगा (केवल दिशा विपरीत)।
बल = 0.2 N (परिमाण में समान, दिशा विपरीत)
प्रश्न 1.3 जाँच सुनिश्चित कीजिए कि ke²/(Gmₑmₚ) विमाहीन है। इसका मान ज्ञात कीजिए। यह अनुपात क्या बताता है?
विमीय जाँच: F(कूलॉम) = ke²/r² तथा F(गुरुत्व) = Gmₑmₚ/r² — दोनों बल हैं, इसलिए ke²/(Gmₑmₚ) = F/F = विमाहीन संख्या है। ✓
मान की गणना: k = 9×10⁹, e = 1.6×10⁻¹⁹ C, e² = 2.56×10⁻³⁸
अंश: ke² = 9×10⁹ × 2.56×10⁻³⁸ = 2.304×10⁻²⁸
हर: G mₑ mₚ = 6.67×10⁻¹¹ × 9.11×10⁻³¹ × 1.67×10⁻²⁷ ≈ 1.015×10⁻⁶⁷
अनुपात = 2.304×10⁻²⁸ / 1.015×10⁻⁶⁷ ≈ 2.4 × 10³⁹
निष्कर्ष: यह दर्शाता है कि इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन के बीच वैद्युत (कूलॉम) बल, गुरुत्वाकर्षण बल की तुलना में लगभग 10³⁹ गुना अधिक प्रबल होता है।
प्रश्न 1.4 (a) "किसी वस्तु का वैद्युत आवेश क्वांटीकृत है", इस प्रकथन से क्या तात्पर्य है? (b) स्थूल पैमाने पर हम क्वांटीकरण की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
(a) इसका अर्थ है कि किसी भी वस्तु पर कुल आवेश (q) सदैव आवेश की मूल इकाई e (= 1.6×10⁻¹⁹ C, अर्थात इलेक्ट्रॉन/प्रोटॉन का आवेश) का पूर्णांकी गुणज ही होता है — अर्थात q = ne। आवेश स्वेच्छ भिन्नात्मक मान नहीं ले सकता।
(b) स्थूल स्तर पर हम जिन आवेशों से व्यवहार करते हैं वे कुछ µC कोटि के होते हैं, जो e से लगभग 10¹³ गुना बड़े हैं। इतने बड़े पैमाने पर, आवेश की कणिकीय प्रकृति दृष्टिगोचर नहीं होती और आवेश व्यावहारिक रूप से सतत प्रतीत होता है — जैसे बिंदुकित रेखा दूर से सतत रेखा जैसी दिखती है।
प्रश्न 1.5 काँच की छड़ को रेशम से रगड़ने पर दोनों पर आवेश आ जाता है। स्पष्ट कीजिए कि यह प्रेक्षण आवेश संरक्षण नियम से किस प्रकार सामंजस्य रखता है।
जब काँच की छड़ को रेशम से रगड़ा जाता है, तो कोई नया आवेश उत्पन्न नहीं होता — बल्कि छड़ में उपस्थित कुछ इलेक्ट्रॉन रेशम में स्थानांतरित हो जाते हैं (क्योंकि रेशम इलेक्ट्रॉनों को अधिक दृढ़ता से पकड़ता है)। इस स्थानांतरण से काँच की छड़ में इलेक्ट्रॉनों की कमी हो जाती है, अतः वह धनावेशित हो जाती है, और रेशम में इलेक्ट्रॉनों की अधिकता हो जाती है, अतः वह उतने ही परिमाण के ऋणावेश से आवेशित हो जाता है।
रगड़ने से पहले निकाय (छड़+रेशम) का कुल आवेश शून्य था, और रगड़ने के बाद भी कुल आवेश शून्य ही रहता है (+q तथा −q आपस में रद्द)। यही आवेश संरक्षण नियम है।
प्रश्न 1.6 चार बिंदु आवेश qA = 2 µC, qB = −5 µC, qC = 2 µC तथा qD = −5 µC, 10 cm भुजा के वर्ग ABCD के शीर्षों पर हैं। वर्ग के केंद्र पर रखे 1 µC आवेश पर लगने वाला बल कितना है?
वर्ग ABCD में A व C विकर्ण के विपरीत सिरों पर हैं (दोनों पर +2 µC), तथा B व D दूसरे विकर्ण के विपरीत सिरों पर हैं (दोनों पर −5 µC)।
केंद्र O से चारों शीर्षों की दूरी समान है। A तथा C पर आवेश समान (+2µC) व केंद्र से समान दूरी पर हैं — केंद्र पर रखे परीक्षण आवेश पर A के कारण बल और C के कारण बल, परिमाण में बराबर लेकिन दिशा में विपरीत होते हैं। अतः ये दोनों बल एक-दूसरे को पूर्णतः निरस्त कर देते हैं।
इसी प्रकार, B व D पर आवेश समान (−5µC) व केंद्र से समान दूरी पर हैं — इनके कारण बल भी परिमाण में बराबर व दिशा में विपरीत होकर परस्पर निरस्त हो जाते हैं।
वर्ग के केंद्र पर 1 µC आवेश पर लगने वाला नेट बल = शून्य (0 N)
प्रश्न 1.7 (a) स्थिरवैद्युत क्षेत्र रेखा एक संतत वक्र होती है, कोई क्षेत्र रेखा एकाएक नहीं टूट सकती। क्यों? (b) दो क्षेत्र रेखाएँ कभी भी एक-दूसरे का प्रतिच्छेदन क्यों नहीं करतीं?
(a) विद्युत क्षेत्र दिक्स्थान के प्रत्येक बिंदु पर परिभाषित एक सतत सदिश राशि है (आवेश की स्थिति को छोड़कर)। यदि कोई क्षेत्र रेखा एकाएक टूट जाए (शून्य में समाप्त हो जाए), तो इसका अर्थ होगा कि उस बिंदु पर क्षेत्र अचानक शून्य हो गया या अपरिभाषित हो गया — जो कि किसी भी आवेश की अनुपस्थिति में असंभव है।
(b) किसी भी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र E का मान अद्वितीय होता है — उस बिंदु पर क्षेत्र की केवल एक ही दिशा हो सकती है। यदि दो क्षेत्र रेखाएँ किसी बिंदु पर एक-दूसरे को काटें, तो उस प्रतिच्छेदन बिंदु पर क्षेत्र रेखा को दो भिन्न स्पर्शियाँ खींचनी होंगी, अर्थात उस बिंदु पर क्षेत्र की दो अलग-अलग दिशाएँ होंगी — जो भौतिक रूप से असंभव है।
प्रश्न 1.8 दो बिंदु आवेश qA = 3 µC तथा qB = −3 µC निर्वात में एक-दूसरे से 20 cm दूरी पर स्थित हैं। (a) AB के मध्य बिंदु O पर विद्युत क्षेत्र? (b) यदि 1.5×10⁻⁹ C का ऋणात्मक परीक्षण आवेश O पर रखा जाए तो इस पर कितना बल लगेगा?
प्रत्येक आवेश से मध्य बिंदु O की दूरी r = 10 cm = 0.1 m
qA (धनावेश) के कारण O पर क्षेत्र E_A, A से दूर अर्थात B की ओर दिष्ट है। qB (ऋणावेश) के कारण O पर क्षेत्र E_B भी B की ओर ही दिष्ट है। अतः दोनों क्षेत्र एक ही दिशा (A से B की ओर) में हैं और जुड़ जाते हैं।
E_A = E_B = kq/r² = (9×10⁹ × 3×10⁻⁶)/(0.1)² = 2.7×10⁶ N/C
(a) कुल क्षेत्र E = E_A + E_B = 5.4 × 10⁶ N/C, दिशा A से B की ओर
(b) परीक्षण आवेश q = −1.5×10⁻⁹ C पर बल: F = qE = 1.5×10⁻⁹ × 5.4×10⁶ = 8.1×10⁻³ N
बल = 8.1 × 10⁻³ N, दिशा B से A की ओर (ऋणावेश होने के कारण E के विपरीत)
प्रश्न 1.9 किसी निकाय में दो आवेश qA = 2.5×10⁻⁷ C तथा qB = −2.5×10⁻⁷ C क्रमशः बिंदुओं A: (0,0,−15 cm) तथा B: (0,0,+15 cm) पर हैं। निकाय का कुल आवेश तथा वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण क्या है?
कुल आवेश = qA + qB = 2.5×10⁻⁷ + (−2.5×10⁻⁷) = 0 C
यह एक द्विध्रुव है। आवेशों के बीच पृथकन 2a = 30 cm = 0.3 m (z-अक्ष के अनुदिश)
द्विध्रुव आघूर्ण का परिमाण: p = q × 2a = 2.5×10⁻⁷ × 0.3 = 7.5×10⁻⁸ C·m
दिशा: परिपाटी अनुसार −q से +q की ओर। यहाँ −q, बिंदु B (+15 cm) पर है तथा +q, बिंदु A (−15 cm) पर है — अतः दिशा ऋणात्मक z-दिशा में है।
कुल आवेश = 0; द्विध्रुव आघूर्ण p = 7.5 × 10⁻⁸ C·m, ऋणात्मक z-दिशा में (B से A की ओर)
प्रश्न 1.10 4×10⁻⁹ C·m द्विध्रुव आघूर्ण का कोई वैद्युत द्विध्रुव 5×10⁴ N/C परिमाण के किसी एकसमान विद्युत क्षेत्र की दिशा से 30° पर संरेखित है। द्विध्रुव पर कार्यरत बल आघूर्ण का परिमाण परिकलित कीजिए।
दिया गया: p = 4×10⁻⁹ C·m, E = 5×10⁴ N/C, θ = 30°
τ = pE sinθ = 4×10⁻⁹ × 5×10⁴ × sin30°
τ = 4×10⁻⁹ × 5×10⁴ × 0.5 = 2×10⁻⁴ × 0.5
τ = 1 × 10⁻⁴ N·m
प्रश्न 1.11 ऊन से रगड़े जाने पर कोई पॉलीथीन का टुकड़ा 3×10⁻⁷ C के ऋणावेश से आवेशित पाया गया। (a) स्थानांतरित इलेक्ट्रॉनों की संख्या आकलित कीजिए। (b) क्या ऊन से पॉलीथीन में संहति का स्थानांतरण भी होता है?
(a) स्थानांतरित इलेक्ट्रॉनों की संख्या: n = q/e = 3×10⁻⁷/1.6×10⁻¹⁹ = 1.875 × 10¹² इलेक्ट्रॉन, ऊन से पॉलीथीन में स्थानांतरित हुए
(b) हाँ, चूँकि प्रत्येक इलेक्ट्रॉन का एक निश्चित (यद्यपि बहुत सूक्ष्म) द्रव्यमान (mₑ = 9.11×10⁻³¹ kg) होता है, इसलिए इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण के साथ-साथ संहति का भी स्थानांतरण होता है।
स्थानांतरित द्रव्यमान ≈ n × mₑ = 1.875×10¹² × 9.11×10⁻³¹ ≈ 1.7×10⁻¹⁸ kg (अत्यंत नगण्य)
प्रश्न 1.12 (a) दो विद्युतरोधी आवेशित ताँबे के गोलों A तथा B के केंद्रों के बीच की दूरी 50 cm है। यदि दोनों पर पृथक-पृथक आवेश 6.5×10⁻⁷ C हैं, तो पारस्परिक प्रतिकर्षण बल? (b) यदि आवेश दुगुना व दूरी आधी कर दी जाए तो नया बल?
(a) दिया गया: q = 6.5×10⁻⁷ C (दोनों गोलों पर), r = 50 cm = 0.5 m
F = kq²/r² = (9×10⁹ × (6.5×10⁻⁷)²)/(0.5)² = (9×10⁹ × 4.225×10⁻¹³)/0.25
F = 1.52 × 10⁻² N (प्रतिकर्षी)
(b) नया आवेश q' = 2q, नई दूरी r' = r/2
F' = k(2q)²/(r/2)² = 4kq²/(r²/4) = 16 × kq²/r² = 16F
F' = 16 × 1.52×10⁻² ≈ 2.43 × 10⁻¹ N (मूल बल का 16 गुना)
प्रश्न 1.13 किसी एकसमान स्थिरवैद्युत क्षेत्र में तीन आवेशित कणों के पथचिह्न दर्शाए गए हैं। तीनों आवेशों के चिह्न लिखिए। इनमें से किस कण का आवेश-संहति अनुपात (q/m) अधिकतम है?
चित्र में विद्युत क्षेत्र धनावेशित प्लेट (ऊपर) से ऋणावेशित प्लेट (नीचे) की ओर दिष्ट है। तीनों कण क्षैतिज दिशा में गति करते हुए ऊर्ध्वाधर दिशा में विक्षेपित होते हैं।
बल की दिशा: F = qE। कण 1 व 2 क्षेत्र की दिशा के विपरीत (ऊपर की ओर) विक्षेपित होते हैं — अतः इनका आवेश ऋणात्मक है। कण 3, क्षेत्र की दिशा में (नीचे की ओर, कम विक्षेपण के साथ) विक्षेपित होता है — अतः इसका आवेश धनात्मक है।
किसी दिए गए समय/क्षैतिज दूरी में विक्षेपण, त्वरण a = qE/m के अनुक्रमानुपाती होता है — विक्षेपण जितना अधिक, q/m का परिमाण उतना ही अधिक।
कण 1 व 2 ऋणावेशित; कण 3 धनावेशित। अधिकतम आवेश-संहति अनुपात (q/m) कण 1 का है।
प्रश्न 1.14 एकसमान विद्युत क्षेत्र E = 3×10³ î N/C पर विचार कीजिए। (a) 10 cm भुजा के वर्ग के उस पार्श्व से (जिसका तल yz तल के समांतर है) गुजरने वाला फ्लक्स? (b) यदि तल का अभिलंब x-अक्ष से 60° का कोण बनाए तो फ्लक्स?
वर्ग का क्षेत्रफल A = (0.1 m)² = 0.01 m²
(a) जब वर्ग का तल yz-तल के समांतर है, तो इसका अभिलंब x-अक्ष के समांतर है, अर्थात E के ठीक समांतर (θ = 0°)
φ = E · A cos0° = 3×10³ × 0.01 × 1 = 30 N·m²/C
(b) जब अभिलंब x-अक्ष से 60° कोण बनाता है: φ = EA cos60° = 30 × 0.5 = 15 N·m²/C
प्रश्न 1.15 अभ्यास 1.14 के एकसमान विद्युत क्षेत्र का 20 cm भुजा के किसी घन से (जिसके फलक निर्देशांक तलों के समांतर हैं) कितना नेट फ्लक्स गुजरेगा?
चूँकि विद्युत क्षेत्र E एकसमान है और घन के भीतर कोई आवेश परिबद्ध नहीं है, गाउस नियम के अनुसार घन से गुजरने वाला नेट फ्लक्स शून्य होना चाहिए।
भौतिक रूप से भी: क्षेत्र की दिशा में लंबवत दो फलकों में से एक फलक से क्षेत्र रेखाएँ प्रवेश करती हैं और ठीक उतनी ही संख्या में विपरीत फलक से बाहर निकलती हैं — शेष चार फलक क्षेत्र के समांतर होने के कारण फ्लक्स में कोई योगदान नहीं देते।
नेट फ्लक्स = शून्य (0 N·m²/C)
प्रश्न 1.16 किसी काले बॉक्स के पृष्ठ पर विद्युत क्षेत्र की माप से पता चलता है कि नेट फ्लक्स 8.0×10³ N·m²/C है। (a) बॉक्स के भीतर नेट आवेश कितना है? (b) यदि नेट बहिर्मुखी फ्लक्स शून्य हो तो क्या यह निष्कर्ष निकालेंगे कि बॉक्स में कोई आवेश नहीं है?
(a) गाउस नियम से: φ = q/ε₀ ⟹ q = φ ε₀
q = 8.0×10³ × 8.854×10⁻¹²
q ≈ 7.08 × 10⁻⁸ C (लगभग 0.07 µC)
(b) नहीं। गाउस नियम केवल यह बताता है कि पृष्ठ के भीतर नेट (कुल) आवेश शून्य है — यह आवश्यक नहीं कि बॉक्स के भीतर कोई आवेश ही न हो। बॉक्स के भीतर बराबर परिमाण के धनात्मक व ऋणात्मक आवेश उपस्थित हो सकते हैं, जिनका बीजगणितीय योग शून्य हो जाता है।
प्रश्न 1.17 10 cm भुजा के किसी वर्ग के केंद्र से ठीक 5 cm ऊँचाई पर कोई +10 µC आवेश रखा है। इस वर्ग से गुजरने वाले वैद्युत फ्लक्स का परिमाण क्या है?
चूँकि ऊँचाई (5 cm) वर्ग की भुजा (10 cm) की आधी है, यह आवेश ठीक उस घन के केंद्र पर स्थित होगा जिसकी प्रत्येक भुजा 10 cm है और जिसका एक फलक दिया गया वर्ग है।
गाउस नियम से, इस पूरे घन से गुजरने वाला कुल फ्लक्स: φ_cube = q/ε₀ = 10×10⁻⁶/8.854×10⁻¹² ≈ 1.129×10⁶ N·m²/C
सममिति के कारण यह कुल फ्लक्स घन के सभी 6 फलकों में समान रूप से बँट जाता है। अतः एक फलक (वर्ग) से गुजरने वाला फ्लक्स कुल फ्लक्स का 1/6 भाग होगा:
φ_square = 1.129×10⁶/6 ≈ 1.88 × 10⁵ N·m²/C
प्रश्न 1.18 2.0 µC का कोई बिंदु आवेश किसी 9.0 cm किनारे वाले घनीय गाउसीय पृष्ठ के केंद्र पर स्थित है। पृष्ठ से गुजरने वाला नेट फ्लक्स क्या है?
गाउस नियम के अनुसार, किसी बंद पृष्ठ से गुजरने वाला नेट फ्लक्स केवल उसके भीतर परिबद्ध आवेश पर निर्भर करता है, पृष्ठ की आकृति या आकार पर नहीं। यहाँ घन की भुजा (9 cm) कोई भूमिका नहीं निभाती।
φ = q/ε₀ = 2.0×10⁻⁶/8.854×10⁻¹²
φ ≈ 2.26 × 10⁵ N·m²/C
प्रश्न 1.19 किसी बिंदु आवेश के कारण, उस बिंदु को केंद्र मानकर खींचे गए 10 cm त्रिज्या के गोलीय गाउसीय पृष्ठ पर वैद्युत फ्लक्स −1.0×10³ N·m²/C है। (a) यदि गाउसीय पृष्ठ की त्रिज्या दोगुनी कर दी जाए तो पृष्ठ से कितना फ्लक्स गुजरेगा? (b) बिंदु आवेश का मान क्या है?
(a) गाउस नियम के अनुसार फ्लक्स φ = q/ε₀ केवल परिबद्ध आवेश q पर निर्भर करता है, गाउसीय पृष्ठ की त्रिज्या (आकार) पर नहीं — बशर्ते आवेश उसी के भीतर बना रहे।
फ्लक्स अपरिवर्तित रहेगा = −1.0 × 10³ N·m²/C
(b) q = φ ε₀ = −1.0×10³ × 8.854×10⁻¹²
q ≈ −8.85 × 10⁻⁹ C (ऋणावेश, क्योंकि फ्लक्स ऋणात्मक है)
प्रश्न 1.20 10 cm त्रिज्या के चालक गोले पर अज्ञात परिमाण का आवेश है। यदि गोले के केंद्र से 20 cm दूरी पर विद्युत क्षेत्र 1.5×10³ N/C त्रिज्यत: अंतर्मुखी है तो गोले पर नेट आवेश कितना है?
चूँकि दिया गया बिंदु (20 cm) गोले की त्रिज्या (10 cm) से बाहर है, गाउस नियम के अनुसार गोले के बाहर विद्युत क्षेत्र ऐसा होता है जैसे संपूर्ण आवेश गोले के केंद्र पर संकेंद्रित हो: E = k|q|/r²
क्षेत्र त्रिज्यत: अंतर्मुखी (केंद्र की ओर) है — यह इंगित करता है कि आवेश ऋणात्मक है।
परिमाण: |q| = Er²/k = (1.5×10³ × (0.2)²)/9×10⁹ = (1.5×10³ × 0.04)/9×10⁹
q = −6.67 × 10⁻⁹ C (लगभग −6.67 nC, ऋणावेशित)
प्रश्न 1.21 2.4 m व्यास के किसी एकसमान आवेशित चालक गोले का पृष्ठीय आवेश घनत्व 80.0 µC/m² है। (a) गोले पर आवेश ज्ञात कीजिए। (b) गोले के पृष्ठ से निर्गत कुल वैद्युत फ्लक्स क्या है?
व्यास = 2.4 m ⟹ त्रिज्या R = 1.2 m; σ = 80.0×10⁻⁶ C/m²
(a) गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल: A = 4πR² = 4π(1.2)² ≈ 18.10 m²
आवेश: q = σ × A = 80.0×10⁻⁶ × 18.10
q ≈ 1.45 × 10⁻³ C
(b) गाउस नियम से कुल निर्गत फ्लक्स: φ = q/ε₀ = 1.45×10⁻³/8.854×10⁻¹²
φ ≈ 1.63 × 10⁸ N·m²/C
प्रश्न 1.22 कोई अनंत रैखिक आवेश 2 cm दूरी पर 9×10⁴ N/C विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है। रैखिक आवेश घनत्व ज्ञात कीजिए।
अनंत तार के लिए सूत्र: E = λ/(2πε₀ r) ⟹ λ = 2πε₀ r E
λ = 2π × 8.854×10⁻¹² × 0.02 × 9×10⁴
2πε₀ = 5.563×10⁻¹¹; × 0.02 = 1.113×10⁻¹²; × 9×10⁴
λ ≈ 1.0 × 10⁻⁷ C/m (अर्थात 0.1 µC/m)
प्रश्न 1.23 दो बड़ी, पतली धातु की प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर एवं निकट हैं। इनके भीतरी फलकों पर, प्लेटों के पृष्ठीय आवेश घनत्वों के चिह्न विपरीत हैं तथा इनका परिमाण 17.0×10⁻²² C/m² है। (a) पहली प्लेट के बाह्य क्षेत्र में, (b) दूसरी प्लेट के बाह्य क्षेत्र में, तथा (c) प्लेटों के बीच में विद्युत क्षेत्र E का परिमाण परिकलित कीजिए।
यह एक समांतर-प्लेट संधारित्र जैसी व्यवस्था है — दो बड़ी समांतर प्लेटें, जिनके भीतरी फलकों पर बराबर परिमाण परंतु विपरीत चिह्न के पृष्ठीय आवेश घनत्व (+σ तथा −σ) हैं, σ = 17.0×10⁻²² C/m²।
प्रत्येक प्लेट अपने आप में एक अनंत आवेशित चादर की भाँति क्षेत्र E = σ/2ε₀ उत्पन्न करती है। दोनों प्लेटों के क्षेत्रों का अध्यारोपण करने पर:
(a) व (b) प्लेटों के बाहरी क्षेत्र में: दोनों प्लेटों के कारण क्षेत्र परिमाण में बराबर परंतु दिशा में विपरीत होते हैं — अतः वे एक-दूसरे को पूर्णतः निरस्त कर देते हैं। E = 0
(c) प्लेटों के बीच में: यहाँ दोनों प्लेटों के कारण क्षेत्र एक ही दिशा में होते हैं, अतः वे जुड़ जाते हैं: E = σ/2ε₀ + σ/2ε₀ = σ/ε₀
E = 17.0×10⁻²²/8.854×10⁻¹²
E ≈ 1.92 × 10⁻¹⁰ N/C (प्लेटों के बीच, धनावेशित फलक से ऋणावेशित फलक की ओर दिष्ट)
⚡ NEET/JEE स्तरीय अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
कूलॉम नियम, अध्यारोपण, द्विध्रुव व गाउस नियम पर आधारित 10 उच्च-स्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 तीन आवेश q, q तथा −2q क्रमशः किसी समबाहु त्रिभुज के शीर्षों A, B, C पर रखे हैं, जिसकी प्रत्येक भुजा की लंबाई a है। इस निकाय का कुल द्विध्रुव आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
इस निकाय को दो द्विध्रुवों के रूप में देखा जा सकता है — सरल विधि: निकाय का द्विध्रुव आघूर्ण, प्रत्येक आवेश के स्थिति सदिश व आवेश के गुणनफल का सदिश योग है, जबकि कुल आवेश शून्य है (q+q−2q=0), अतः मूलबिंदु के चयन से स्वतंत्र एक वास्तविक द्विध्रुव आघूर्ण प्राप्त होता है।
यह एक मानक परिणाम है कि ऐसे सममित निकाय का परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण, भुजा a व आवेश q के पदों में परिमाण में p = √3 qa होता है, तथा इसकी दिशा −2q से दूर, कोण द्विभाजक के अनुदिश होती है।
परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण का परिमाण = √3 qa
प्रश्न 2 दो बिंदु आवेश +4q तथा +q, एक-दूसरे से दूरी r पर स्थित हैं। इन्हें मिलाने वाली रेखा पर वह बिंदु ज्ञात कीजिए, जहाँ विद्युत क्षेत्र शून्य होगा।
दोनों आवेश धनात्मक हैं, अतः शून्य-क्षेत्र बिंदु दोनों आवेशों के बीच में स्थित होगा। मान लीजिए यह बिंदु +q से दूरी x पर है (अतः +4q से दूरी r−x):
k(4q)/(r−x)² = k(q)/x² ⟹ 4/(r−x)² = 1/x²
2x = r−x ⟹ 3x = r ⟹ x = r/3
अर्थात शून्य-क्षेत्र बिंदु, आवेश +q से r/3 दूरी पर (तथा +4q से 2r/3 दूरी पर) स्थित है।
प्रश्न 3 किसी खोखले चालक गोले (त्रिज्या R) के केंद्र पर एक बिंदु आवेश +Q रखा है। गोले पर कुल आवेश शून्य है। गोले के भीतरी व बाहरी पृष्ठों पर प्रेरित आवेश तथा गोले के बाहर (r > R) विद्युत क्षेत्र ज्ञात कीजिए।
चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य होना चाहिए। अतः गाउसीय पृष्ठ (चालक पदार्थ के भीतर) से गुजरने वाला नेट फ्लक्स शून्य होगा, जिसके लिए भीतरी पृष्ठ पर परिबद्ध कुल आवेश +Q के बराबर व विपरीत चिह्न का होना चाहिए।
भीतरी पृष्ठ पर प्रेरित आवेश = −Q
चूँकि गोले पर कुल आवेश शून्य है, बाहरी पृष्ठ पर आवेश = 0 − (−Q) = +Q
गोले के बाहर (r>R), चालक का पूरा व्यवहार केंद्र पर रखे +Q आवेश जैसा प्रभावी होता है (चूँकि भीतरी और बाहरी पृष्ठ के आवेश का योग शून्य है):
गोले के बाहर: E = kQ/r² (त्रिज्यत: बहिर्मुखी)
प्रश्न 4 एक विद्युत द्विध्रुव (आघूर्ण p) को एकसमान विद्युत क्षेत्र E में क्षेत्र की दिशा से θ कोण पर रखा गया है। द्विध्रुव को इस स्थिति से क्षेत्र के समांतर (θ=0) घुमाने में किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।
एकसमान क्षेत्र में द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा: U(θ) = −pE cosθ
किया गया कार्य = स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन: W = U(0°) − U(θ)
W = (−pE cos0°) − (−pE cosθ) = −pE + pE cosθ = −pE(1 − cosθ)
W = −pE(1 − cosθ) (ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि क्षेत्र द्वारा द्विध्रुव पर कार्य किया जाता है, अर्थात अनुकूल घूर्णन है)
प्रश्न 5 किसी अनंत लंबाई की, एकसमान रैखिक आवेश घनत्व λ वाली सीधी तार से d दूरी पर स्थित बिंदु पर विद्युत क्षेत्र गाउस नियम की सहायता से ज्ञात कीजिए।
सममिति के अनुसार, तार से d दूरी पर त्रिज्या d व लंबाई l का एक बेलनाकार गाउसीय पृष्ठ लीजिए, जिसका अक्ष तार के अनुदिश हो। सिरों से होकर कोई फ्लक्स नहीं गुजरता; केवल वक्र पृष्ठ से फ्लक्स गुजरता है, जहाँ E सर्वत्र लंबवत व समान परिमाण का है।
φ = E × (2πd l), तथा परिबद्ध आवेश q = λl। गाउस नियम से: E(2πd l) = λl/ε₀
E = λ / (2πε₀d) (तार से त्रिज्यत: बाहर की ओर दिष्ट, यदि λ धनात्मक हो)
प्रश्न 6 दो सर्वसम आवेशित गोलियों को हवा में एक-दूसरे से दूरी r पर लटकाने पर उनके बीच बल F लगता है। जब इन्हें किसी द्रव में डुबोया जाता है (जहाँ गोलियों का घनत्व द्रव के घनत्व का दुगुना है), तो संतुलन में उनके बीच बल अपरिवर्तित रहता है। द्रव का परावैद्युतांक ज्ञात कीजिए।
द्रव में डुबोने पर दो प्रभाव कार्य करते हैं: (i) उत्प्लावन बल (buoyancy) के कारण प्रभावी भार घटता है, जिससे डोरी का तनाव कम होता है व कोण प्रभावित होता है; (ii) परावैद्युत माध्यम के कारण कूलॉम बल F/K हो जाता है। दिया गया है कि ये दोनों प्रभाव एक-दूसरे को ठीक निरस्त कर देते हैं, जिससे कोण व दूरी अपरिवर्तित रहते हैं।
संतुलन में tanθ = F_electric/W_eff: हवा में: tanθ = F/mg; द्रव में: tanθ = (F/K)/(mg − F_B) = (F/K)/(mg(1 − ρ_liquid/ρ_sphere))
दोनों बराबर रखने पर: 1 = 1/[K(1 − ρ_l/ρ_s)] ⟹ K = 1/(1 − ρ_l/ρ_s)
चूँकि गोली का घनत्व, द्रव का दुगुना है (ρ_s = 2ρ_l), अर्थात ρ_l/ρ_s = 1/2:
K = 1/(1 − 1/2) = 2
प्रश्न 7 एक वर्गाकार पृष्ठ (भुजा L) एक बड़े अनंत समतल आवेशित चादर (पृष्ठीय आवेश घनत्व σ) के समांतर, चादर से x दूरी पर स्थित है। इस वर्ग से गुजरने वाला विद्युत फ्लक्स ज्ञात कीजिए।
अनंत आवेशित चादर के कारण क्षेत्र, चादर से दूरी पर निर्भर नहीं करता तथा सदैव चादर के लंबवत दिष्ट होता है: E = σ/2ε₀
चूँकि वर्गाकार पृष्ठ चादर के समांतर है, अतः क्षेत्र वर्ग के तल के ठीक लंबवत है (θ=0°), और चादर से दूरी x का फ्लक्स पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता:
φ = E × A = σL² / (2ε₀) (दूरी x पर निर्भर नहीं करता)
प्रश्न 8 दो बिंदु आवेश +9e तथा +e, दूरी d पर स्थित हैं। इनके बीच रेखा पर तीसरा आवेश q कहाँ व किस चिह्न का रखा जाए कि पूरा निकाय संतुलन में रहे?
तीसरे आवेश q को दोनों आवेशों के बीच रखना होगा। साम्यावस्था के लिए, q पर लगने वाला परिणामी बल शून्य होना चाहिए — यह उसी बिंदु पर होगा जहाँ +9e व +e के कारण क्षेत्र परस्पर निरस्त होते हैं।
माना q, आवेश +e से दूरी x पर है (अतः +9e से दूरी d−x): k(9e)/(d−x)² = k(e)/x² ⟹ 3x = d−x ⟹ x = d/4
अतः q, +e से d/4 दूरी पर (तथा +9e से 3d/4 दूरी पर) स्थित होना चाहिए। अब q का चिह्न व परिमाण ज्ञात करने के लिए +9e पर लगने वाले बल को शून्य करना होगा — इसके लिए q ऋणात्मक होना चाहिए।
+9e पर बल संतुलन: k(9e)(e)/d² = k(9e)|q|/(3d/4)² ⟹ |q| = e × (9d²/16)/d² = 9e/16
q = −9e/16, जो +e से d/4 दूरी पर (दोनों आवेशों के बीच) स्थित होना चाहिए — यह संतुलन अस्थायी होता है।
प्रश्न 9 किसी घनीय गाउसीय पृष्ठ के ठीक एक कोने (vertex) पर बिंदु आवेश q रखा है। घन के प्रत्येक फलक से गुजरने वाला फ्लक्स ज्ञात कीजिए।
आवेश घन के कोने पर होने के कारण, इस घन को कल्पना से 8 समरूप घनों में विस्तारित किया जा सकता है (चारों ओर, ताकि आवेश ठीक इस बड़े घनों के समूह के केंद्र में आ जाए) — यह एक मानक युक्ति है।
केंद्र में स्थित आवेश के लिए कुल फ्लक्स q/ε₀, समान रूप से सभी 8 घनों में बँटता है, अतः प्रत्येक घन से गुजरने वाला फ्लक्स = q/(8ε₀)।
चूँकि प्रत्येक मूल घन की 3 फलकें ही (आवेश वाले कोने से लगी हुई) वास्तव में फ्लक्स प्राप्त करती हैं (शेष 3 फलकों से होकर आवेश के तल के कारण कोई फ्लक्स नहीं गुजरता), अतः घन का कुल फ्लक्स (q/8ε₀) इन्हीं 3 फलकों में बँटेगा:
प्रत्येक फलक से फ्लक्स = q/(24ε₀) — 3 फलकों के लिए, शेष 3 फलकों से फ्लक्स शून्य
प्रश्न 10 किसी ठोस, एकसमान आवेशित गोले (कुल आवेश Q, त्रिज्या R) के भीतर, केंद्र से r (r < R) दूरी पर विद्युत क्षेत्र गाउस नियम से ज्ञात कीजिए।
चूँकि आवेश गोले के आयतन में एकसमान रूप से वितरित है, त्रिज्या r (r<R) की गाउसीय गोलीय सतह के भीतर परिबद्ध आवेश, कुल आवेश का केवल आयतन-अनुपात वाला भाग होगा:
q_enc = Q × (4/3)πr³ / (4/3)πR³ = Q r³/R³
सममिति से E सर्वत्र त्रिज्यत: तथा गाउसीय पृष्ठ पर स्थिर परिमाण का है: E(4πr²) = q_enc/ε₀ = Q r³/(ε₀ R³)
E = Qr / (4πε₀R³) (अर्थात E ∝ r, गोले के भीतर केंद्र से रैखिक रूप से बढ़ता है)
🏆 NEET में पूछे गए प्रश्न
AIPMT/NEET परीक्षाओं में इस अध्याय से पूछे गए 18 वास्तविक प्रश्न, वर्ष-क्रमानुसार, पूर्ण हल सहित
प्रश्न 1 किसी ठोस विद्युतरोधी चालक गोले की गुहा (cavity) के भीतर एक बिंदु आवेश Q रखा है। चित्र में दर्शाए गए बिंदुओं A (गुहा के भीतर), B व C (गोले के बाहर, केंद्र से समान दूरी पर) पर विद्युत क्षेत्रों E_A, E_B, E_C के बीच सही संबंध बताइए। NEET 2024
गुहा के भीतर रखे आवेश Q के कारण बिंदु A पर विद्युत क्षेत्र शून्य नहीं हो सकता (E_A ≠ 0), क्योंकि A, आवेश के निकट किसी विद्युतरोधित क्षेत्र में स्थित है, जहाँ चालक द्वारा कोई परिरक्षण नहीं होता।
आवेश Q, चालक की भीतरी पृष्ठ पर −Q तथा बाहरी पृष्ठ पर +Q प्रेरित करता है। स्थिरवैद्युत परिरक्षण के कारण, बाहरी पृष्ठ पर आवेश हमेशा एकसमान रूप से वितरित होता है (गुहा के भीतर आवेश की स्थिति चाहे जो भी हो) — इसलिए बाहरी पृष्ठ, गोलीय सममिति रखता है।
चूँकि B व C, केंद्र से समान दूरी पर स्थित हैं, तथा बाहरी पृष्ठ पर आवेश-वितरण एकसमान है, अतः इन दोनों बिंदुओं पर क्षेत्र समान होगा: E_A ≠ 0, E_B = E_C
प्रश्न 2 यदि किसी बंद पृष्ठ (गाउसीय पृष्ठ) से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स शून्य है, तो निम्न में से कौन-सा कथन सही है? NEET 2023
गाउस नियम के अनुसार, नेट फ्लक्स φ = q_enc/ε₀ शून्य होने का सीधा अर्थ है कि पृष्ठ के भीतर परिबद्ध नेट आवेश शून्य है — इसका यह अर्थ कतई नहीं कि पृष्ठ पर सर्वत्र E शून्य है, न ही यह कि सभी आवेश पृष्ठ के भीतर ही होने चाहिए।
भौतिक रूप से, यदि नेट फ्लक्स शून्य है, तो पृष्ठ में प्रवेश करने वाली क्षेत्र-रेखाओं की संख्या, पृष्ठ से बाहर निकलने वाली क्षेत्र-रेखाओं की संख्या के बराबर होनी चाहिए।
सही कथन: पृष्ठ में प्रवेश करने वाली फ्लक्स-रेखाओं की संख्या, बाहर निकलने वाली फ्लक्स-रेखाओं की संख्या के बराबर होनी चाहिए।
प्रश्न 3 किसी विद्युत द्विध्रुव (आघूर्ण p) के कारण, द्विध्रुव से समान दूरी r (r≫a) पर, अक्षीय स्थिति तथा निरक्षीय स्थिति में विद्युत क्षेत्रों का अनुपात ज्ञात कीजिए। NEET 2022
अक्षीय स्थिति में क्षेत्र: E_axial = 2kp/r³
निरक्षीय स्थिति में क्षेत्र: E_equatorial = kp/r³
अनुपात: E_axial/E_equatorial = (2kp/r³)/(kp/r³) = 2
E_axial : E_equatorial = 2 : 1
प्रश्न 4 किसी बिंदु आवेश q को भुजा L के घन के ठीक केंद्र पर रखा गया है। घन के किसी एक फलक से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स ज्ञात कीजिए। NEET 2021
गाउस नियम से, संपूर्ण घन से गुजरने वाला कुल फ्लक्स: φ_total = q/ε₀
चूँकि आवेश ठीक घन के केंद्र पर स्थित है, सममिति के कारण यह फ्लक्स घन के सभी 6 सर्वसम फलकों में समान रूप से बँट जाता है:
एक फलक से फ्लक्स = q / (6ε₀)
प्रश्न 5 दो बिंदु आवेश 4 µC व 1 µC वायु में 1 m की दूरी पर रखे हैं। इन्हें मिलाने वाली रेखा पर वह बिंदु ज्ञात कीजिए, जहाँ विद्युत क्षेत्र की तीव्रता शून्य होगी। NEET 2020
दोनों आवेश धनात्मक हैं, अतः शून्य-बिंदु दोनों आवेशों के बीच स्थित होगा। मान लीजिए यह बिंदु 1µC आवेश से दूरी x पर है (अतः 4µC से दूरी 1−x):
k(4)/(1−x)² = k(1)/x² ⟹ 2/(1−x) = 1/x ⟹ 2x = 1−x ⟹ x = 1/3
शून्य-क्षेत्र बिंदु, 1 µC आवेश से 1/3 m (≈33.3 cm) दूरी पर, तथा 4 µC आवेश से 2/3 m दूरी पर स्थित है।
प्रश्न 6 निम्नलिखित में से कौन-सा आवेश किसी वस्तु पर संभव नहीं है (आवेश के क्वांटीकरण के आधार पर, e = 1.6×10⁻¹⁹ C)? NEET 2019
आवेश क्वांटीकरण के अनुसार, किसी भी वस्तु पर आवेश सदैव इलेक्ट्रॉन आवेश e के पूर्णांक गुणज (q=ne) के रूप में ही हो सकता है।
विकल्पों की जाँच के लिए प्रत्येक दिए गए आवेश-मान को e=1.6×10⁻¹⁹ C से भाग दिया जाता है — जो मान पूर्णांक n नहीं देता, वही असंभव आवेश है।
वह आवेश-मान जो e का पूर्णांक गुणज नहीं है (अर्थात q/e एक भिन्न/दशमलव संख्या देता है), संभव नहीं होगा — यही आवेश क्वांटीकरण के नियम की मूल कसौटी है।
प्रश्न 7 किसी बिंदु आवेश के कारण उससे r दूरी पर विद्युत क्षेत्र E है। यदि माध्यम को वायु से परावैद्युतांक K वाले किसी माध्यम में बदल दिया जाए (आवेश व दूरी अपरिवर्तित), तो नए क्षेत्र E' व मूल क्षेत्र E में क्या संबंध होगा? NEET 2018
किसी परावैद्युत माध्यम (dielectric medium) में, कूलॉम नियम व विद्युत क्षेत्र का सूत्र निर्वात/वायु की तुलना में परावैद्युतांक K से भाजित हो जाता है: E = kq/(Kr²)
E' = E/K (अर्थात माध्यम में क्षेत्र, वायु/निर्वात की तुलना में K गुना कम हो जाता है)
प्रश्न 8 किसी अनंत लंबाई की सीधी आवेशित तार (रैखिक आवेश घनत्व λ) से लंबवत दूरी r पर विद्युत क्षेत्र E है। यदि दूरी r को दोगुना कर दिया जाए, तो नया विद्युत क्षेत्र मूल क्षेत्र का कितना गुना होगा? NEET 2017
अनंत तार के लिए सूत्र: E = λ/(2πε₀r) ⟹ E ∝ 1/r
E'/E = r/r' = r/(2r) = 1/2
नया क्षेत्र, मूल क्षेत्र का आधा (1/2 गुना) होगा।
प्रश्न 9 यदि किसी वस्तु द्वारा प्रति सेकंड 10⁹ इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित किए जाते हैं, तो वस्तु पर 1 कूलॉम धनावेश एकत्रित होने में कितना समय लगेगा? NEET 2016
प्रत्येक इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन से वस्तु पर +e आवेश शेष रहता है।
प्रति सेकंड एकत्रित आवेश की दर: dq/dt = ne = 10⁹ × 1.6×10⁻¹⁹ = 1.6×10⁻¹⁰ C/s
1 C आवेश एकत्रित होने में लगा समय: t = q/(dq/dt) = 1/(1.6×10⁻¹⁰)
t ≈ 6.25 × 10⁹ सेकंड (लगभग 198 वर्ष)
प्रश्न 10 +q तथा −q आवेश वाला कोई विद्युत द्विध्रुव, एकसमान विद्युत क्षेत्र E में θ कोण पर रखा है। द्विध्रुव पर लगने वाला बल आघूर्ण किस स्थिति में अधिकतम होगा? AIPMT 2015
द्विध्रुव पर बल आघूर्ण: τ = pE sinθ
यह अधिकतम होगा जब sinθ अधिकतम हो, अर्थात θ = 90°, तब τ_max = pE
बल आघूर्ण अधिकतम तब होता है जब द्विध्रुव आघूर्ण p, विद्युत क्षेत्र E के लंबवत (θ=90°) हो; τ_max = pE
प्रश्न 11 दो बिंदु आवेश +q तथा +9q, एक-दूसरे से दूरी d पर स्थित हैं। इन्हें मिलाने वाली रेखा पर वह बिंदु ज्ञात कीजिए, जहाँ विद्युत क्षेत्र शून्य होगा। AIPMT 2014
माना यह बिंदु +q से दूरी x पर है (अतः +9q से दूरी d−x):
kq/x² = k(9q)/(d−x)² ⟹ (d−x)² = 9x² ⟹ d−x = 3x ⟹ x = d/4
शून्य-क्षेत्र बिंदु, +q आवेश से d/4 दूरी पर (दोनों आवेशों के बीच) स्थित है।
प्रश्न 12 कोई विद्युत द्विध्रुव किसी असमान (non-uniform) विद्युत क्षेत्र में रखा है। द्विध्रुव पर लगने वाले नेट बल तथा बल आघूर्ण के विषय में कौन-सा कथन सही है? AIPMT 2013
एकसमान क्षेत्र में द्विध्रुव पर नेट बल शून्य होता है परंतु बल आघूर्ण उपस्थित रहता है (जब तक θ≠0,180°)।
असमान क्षेत्र में, चूँकि दोनों आवेश भिन्न-भिन्न परिमाण के क्षेत्र में स्थित होते हैं, अतः उन पर लगने वाले बल परिमाण में असमान होते हैं — इस कारण एक परिणामी (नेट) बल भी उत्पन्न होता है, बल आघूर्ण के साथ-साथ।
असमान विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर नेट बल तथा बल आघूर्ण, दोनों ही लगते हैं।
प्रश्न 13 दो समान धनावेश +Q, x-अक्ष पर बिंदु (a,0) व (−a,0) पर स्थित हैं। यदि कोई छोटा धनावेश q₀ मूलबिंदु से थोड़ा y-दिशा में विस्थापित करके छोड़ा जाए, तो इसकी गति की प्रकृति क्या होगी? AIPMT 2012
मूलबिंदु पर संतुलन की स्थिति में जाँच के लिए, y-अक्ष के अनुदिश थोड़े विस्थापन y (y≪a) के लिए परिणामी बल की दिशा देखते हैं। सममिति के कारण दोनों आवेशों के क्षेत्रों के x-घटक निरस्त होते हैं, परंतु y-घटक जुड़ते हैं और मूलबिंदु से दूर कार्य करते हैं, क्योंकि दोनों आवेश धनात्मक हैं व q₀ भी धनात्मक है।
चूँकि पुनर्स्थापक बल के बजाय विस्थापन की दिशा में ही बल लगता है, अतः यह दोलन गति (SHM) नहीं, बल्कि एक अस्थायी संतुलन (unstable equilibrium) है — कण मूलबिंदु से दूर हटता चला जाएगा।
q₀, y-दिशा में विस्थापित होने पर मूलबिंदु से दूर त्वरित होता चला जाएगा (अस्थायी संतुलन); ध्यान दें कि x-अक्ष के अनुदिश विस्थापन के लिए यही निकाय स्थायी संतुलन (व सरल आवर्त गति) दर्शाता है।
प्रश्न 14 विद्युत क्षेत्र रेखाओं (field lines) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है? AIPMT 2011
विद्युत क्षेत्र रेखाओं के मानक गुणधर्म: (i) ये धनावेश से आरंभ होकर ऋणावेश पर समाप्त होती हैं, (ii) दो क्षेत्र-रेखाएँ कभी परस्पर नहीं काटतीं, (iii) ये किसी चालक के पृष्ठ के लंबवत निकलती/प्रवेश करती हैं, (iv) सघन रेखाएँ प्रबल क्षेत्र दर्शाती हैं।
एक सामान्य असत्य कथन यह होता है कि "क्षेत्र रेखाएँ सदैव बंद वक्र (closed loops) होती हैं" — यह चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के लिए सत्य है, परंतु स्थिरवैद्युत क्षेत्र रेखाओं के लिए असत्य है।
असत्य कथन: "विद्युत क्षेत्र रेखाएँ सदैव बंद पाश (closed loops) बनाती हैं" — यह असत्य है, क्योंकि स्थिरवैद्युत क्षेत्र रेखाएँ कभी बंद वक्र नहीं बनातीं।
प्रश्न 15 किसी विद्युत द्विध्रुव को एकसमान विद्युत क्षेत्र E में रखा गया है। द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम किस स्थिति में होगी? AIPMT 2010
द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा: U = −pE cosθ
U न्यूनतम (सर्वाधिक ऋणात्मक) तब होगी जब cosθ अधिकतम (=1) हो, अर्थात θ = 0°, तब U_min = −pE
स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम तब होती है जब द्विध्रुव आघूर्ण p, विद्युत क्षेत्र E की दिशा के समांतर (θ=0°) होता है — यह द्विध्रुव की सबसे स्थायी स्थिति है।
प्रश्न 16 किसी गाउसीय गोलीय पृष्ठ के भीतर बिंदु आवेश q परिबद्ध है। यदि गोले की त्रिज्या दोगुनी कर दी जाए (आवेश केंद्र पर ही रहे), तो पृष्ठ से गुजरने वाले नेट फ्लक्स पर क्या प्रभाव पड़ेगा? AIPMT 2009
गाउस नियम के अनुसार, किसी बंद पृष्ठ से गुजरने वाला नेट फ्लक्स φ = q_enc/ε₀ केवल पृष्ठ के भीतर परिबद्ध आवेश पर निर्भर करता है, पृष्ठ के आकार या क्षेत्रफल पर नहीं।
चूँकि परिबद्ध आवेश q अपरिवर्तित है (केवल त्रिज्या बदली है), नेट फ्लक्स भी पूर्णतः अपरिवर्तित रहेगा।
नेट फ्लक्स अपरिवर्तित रहेगा (φ = q/ε₀, त्रिज्या पर स्वतंत्र); केवल पृष्ठ पर प्रति इकाई क्षेत्रफल फ्लक्स-घनत्व तथा विद्युत क्षेत्र E घटकर 1/4 रह जाएगा।
प्रश्न 17 कूलॉम के नियम व गुरुत्वाकर्षण के नियम के बीच समानता व असमानता से संबंधित कथनों में से सही कथन चुनिए — दोनों बलों की दूरी पर निर्भरता किस प्रकार की है? AIPMT 2008
कूलॉम नियम: F = kq₁q₂/r² तथा न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम: F = Gm₁m₂/r² — दोनों ही व्युत्क्रम-वर्ग नियम (inverse-square law) का पालन करते हैं, अर्थात दोनों बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं (F ∝ 1/r²)।
मुख्य अंतर: गुरुत्वाकर्षण बल सदैव आकर्षी होता है, जबकि कूलॉम बल आवेशों के चिह्न के अनुसार आकर्षी या प्रतिकर्षी दोनों हो सकता है। साथ ही, कूलॉम बल गुरुत्वाकर्षण बल की तुलना में कहीं अधिक प्रबल (परिमाण में) होता है।
दोनों बल व्युत्क्रम-वर्ग नियम (F ∝ 1/r²) का पालन करते हैं — यही दोनों नियमों की मूल समानता है।
प्रश्न 18 किसी चालक की सतह पर स्थिरवैद्युत क्षेत्र सदैव सतह के लंबवत क्यों होता है? AIPMT 2007
यदि स्थिरवैद्युत साम्यावस्था में चालक के पृष्ठ पर क्षेत्र का कोई घटक पृष्ठ के स्पर्शरेखीय दिशा में होता, तो पृष्ठ पर स्थित मुक्त आवेश इस घटक के कारण पृष्ठ के अनुदिश गति करने लगते।
परंतु स्थिरवैद्युत साम्यावस्था की परिभाषा के अनुसार, चालक के भीतर व पृष्ठ पर आवेश स्थिर होने चाहिए। अतः स्पर्शरेखीय घटक शून्य होना ही चाहिए, अन्यथा साम्यावस्था असंभव होगी।
स्थिरवैद्युत साम्यावस्था में चालक के पृष्ठ पर क्षेत्र सदैव लंबवत होता है, क्योंकि स्पर्शरेखीय घटक होने पर पृष्ठ के मुक्त आवेश गति करने लगेंगे — जो साम्यावस्था की परिभाषा का विरोधाभास होगा।