भौतिक विज्ञान • घूर्णी यांत्रिकी
कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
बिंदु कण से आगे बढ़कर, यह अध्याय विस्तृत पिंडों — दृढ़ पिंडों — की गति को समझाता है। द्रव्यमान केन्द्र, सदिश गुणनफल, बल आघूर्ण, कोणीय संवेग, जड़त्व आघूर्ण और घूर्णी गतिकी के समीकरण — हर अवधारणा को विस्तार से, उदाहरणों सहित, और अध्याय के सभी प्रश्नों के पूर्ण हल के साथ यहाँ समझाया गया है। साथ ही 2000 से 2026 तक के सभी 90 NEET/AIPMT प्रश्न हल सहित संकलित हैं।
6.1 भूमिका
बिंदु कण से विस्तृत पिंड तक — यांत्रिकी का अगला कदम।
पिछले अध्यायों में हमने मुख्य रूप से आदर्श बिंदु कण (एक कण, जिसे द्रव्यमान-युक्त बिंदु के रूप में माना जाए तथा जिसका कोई आकार न हो) की गति का अध्ययन किया था। दैनिक जीवन में जिन पिंडों से हमारा सामना होता है, वे सभी परिमित आकार वाले होते हैं। किसी विस्तृत पिंड की गति को पूर्ण रूप से समझने के लिए केवल बिंदुवत् आदर्श अपर्याप्त रहता है।
एक विस्तृत पिंड मूलतः कणों का एक निकाय होता है। यहाँ कणों के निकाय का द्रव्यमान केन्द्र एक प्रमुख अवधारणा रहेगी।
आदर्श दृढ़ पिंड (Rigid Body)
एक ऐसा पिंड जिसकी एक सुनिश्चित तथा अपरिवर्तनीय आकृति होती है। ऐसे ठोस के सभी कण-युग्मों के बीच की दूरियाँ नहीं बदलतीं। कोई भी वास्तविक पिंड पूर्णतः दृढ़ नहीं होता (सभी व्यावहारिक पिंड बलों के प्रभाव से कुछ विकृत हो जाते हैं), परंतु अनेक स्थितियों में विकृतियाँ नगण्य होती हैं — जैसे पहिए, लट्टू, स्टील के शहतीर, अथवा अणु और ग्रह जैसे पिंड — इन्हें हम दृढ़ पिंड मानकर अध्ययन करेंगे।
6.1.1 एक दृढ़ पिंड में किस प्रकार की गतियाँ हो सकती हैं?
उदाहरण 1: शुद्ध स्थानांतरण गति
एक आयताकार ब्लॉक, जो आनत तल पर सीधा (बिना इधर-उधर हटे) नीचे फिसल रहा है — ऐसी गति में ब्लॉक के सभी कण साथ-साथ चलते हैं, अर्थात् किसी क्षण सभी कणों का वेग समान होता है।
शुद्ध स्थानांतरण गति
शुद्ध स्थानांतरण गति में किसी विशेष क्षण पर पिंड का प्रत्येक कण समान वेग से चलता है।
उदाहरण 2: बेलन का लुढ़कना — 'कुछ और अलग'
उसी आनत तल पर नीचे की ओर लुढ़कता हुआ एक धातु या लकड़ी का बेलन — यह दृढ़ पिंड (बेलन) आनत तल के शीर्ष से उसकी तली तक स्थानांतरित होता है, अतः इसमें स्थानांतरण गति प्रतीत होती है। किंतु इसके सभी कण किसी क्षण पर एक ही वेग से नहीं चल रहे होते — संपर्क-बिंदु का वेग किसी भी क्षण शून्य रहता है, यदि बेलन बिना फिसले लुढ़कता है। इस प्रकार यह पिंड शुद्ध स्थानांतरण गति में नहीं है — यह स्थानांतरीय होने के साथ-साथ 'कुछ और अलग' भी है।
यह 'कुछ और अलग' ही घूर्णी गति (Rotational Motion) है।
घूर्णन-अक्ष (Axis of Rotation)
किसी दृढ़ पिंड की स्थानांतरण गति को निरुद्ध करने की सर्वाधिक सामान्य विधि यह है कि उसे एक सरल रेखा के अनुदिश स्थिर कर दिया जाए। तब इस दृढ़ पिंड की एकमात्र संभावित गति घूर्णी गति होगी। वह सरल रेखा, जिसके अनुदिश इस दृढ़ पिंड को स्थिर बनाया गया है, इसकी घूर्णन-अक्ष कहलाती है। उदाहरण — छत का पंखा, कुम्हार का चाक, विशाल चक्री-झूला, मेरी-गो-राउंड — इन सबमें किसी अक्ष के परित: घूर्णन हो रहा होता है।
घूर्णन के अभिलक्षण
एक दृढ़ पिंड के एक स्थिर अक्ष के परित: घूर्णन में, पिंड का प्रत्येक कण एक वृत्त में घूमता है। यह वृत्त अक्ष के लंबवत् तल में होता है, और उसका केंद्र अक्ष पर स्थित होता है। अक्ष पर स्थित किसी बिंदु के लिए त्रिज्या r=0 होती है, अतः वह बिंदु स्थिर रहता है।
महत्वपूर्ण अपवाद
घूर्णन के कुछ उदाहरणों में अक्ष स्थिर भी नहीं रहती। जैसे एक ही स्थान पर घूमता लट्टू — इसकी अक्ष, भूमि पर संपर्क-बिंदु से गुजरते अभिलंब के परित: एक शंकु बनाती है (जिसे पुरस्सरण, precession कहते हैं)। लट्टू का संपर्क बिंदु स्थिर रहता है, भले ही अक्ष घूमती हो। इसी प्रकार दोलन करते मेज़ के पंखे में पंखुड़ियों की घूर्णन-अक्ष क्षैतिज तल में इधर-उधर दोलन करती है, परंतु यह भी एक स्थिर बिंदु से गुज़रती रहती है। इस अध्याय में हम केवल एक स्थिर अक्ष के परित: होने वाली घूर्णी गति का ही अध्ययन करेंगे।
दृढ़ पिंड की गतियों का सार
एक ऐसा दृढ़ पिंड जो न तो किसी चूल पर टिका हो और न ही किसी रूप में स्थिर हो, दो प्रकार की गति कर सकता है — या तो शुद्ध स्थानांतरण, या स्थानांतरण एवं घूर्णन का संयोजन। एक ऐसे दृढ़ पिंड की गति, जो या तो चूल पर टिका हो या किसी न किसी रूप में स्थिर हो, घूर्णी गति होती है।
6.2 द्रव्यमान केन्द्र
वह काल्पनिक बिंदु जहाँ पूरे निकाय का द्रव्यमान केंद्रित मान लिया जा सकता है।
दो कणों का द्रव्यमान केन्द्र
माना दो कणों की, किसी मूल बिंदु O से दूरियाँ क्रमशः x₁ एवं x₂ हैं। इन कणों के द्रव्यमान क्रमशः m₁ एवं m₂ हैं। इन दो कणों के निकाय का द्रव्यमान केन्द्र C एक ऐसा बिंदु होगा जिसकी O से दूरी X का मान हो:
X = (m₁x₁ + m₂x₂) / (m₁ + m₂) (6.1)
यदि दोनों कणों के द्रव्यमान बराबर हों (m₁ = m₂ = m), तो X = (x₁+x₂)/2 — अर्थात् समान द्रव्यमान के दो कणों का द्रव्यमान केन्द्र ठीक उनके बीचोंबीच होता है।
n कणों का द्रव्यमान केन्द्र (एक रेखा में)
X = Σmᵢxᵢ / Σmᵢ (6.2)
यहाँ Σmᵢ = M, निकाय का कुल द्रव्यमान है
एक समतल में तीन कणों का द्रव्यमान केन्द्र
X = (m₁x₁+m₂x₂+m₃x₃)/(m₁+m₂+m₃) (6.3a)
Y = (m₁y₁+m₂y₂+m₃y₃)/(m₁+m₂+m₃) (6.3b)
समान द्रव्यमान वाले कणों के लिए तीन कणों का द्रव्यमान केन्द्र उनकी स्थिति बिंदुओं को मिलाने से बने त्रिभुज के केन्द्रक (centroid) पर होता है।
अंतरिक्ष में फैले n कणों का द्रव्यमान केन्द्र
X = Σmᵢxᵢ/M Y = Σmᵢyᵢ/M Z = Σmᵢzᵢ/M (6.4a,b,c)
सदिश रूप में:
R = Σmᵢrᵢ / M (6.4d)
R द्रव्यमान केन्द्र का स्थिति सदिश है
यदि संदर्भ-फ्रेम का मूल बिंदु ही कण-निकाय के द्रव्यमान केन्द्र में लिया जाए, तो Σmᵢrᵢ = 0 होता है।
सतत द्रव्यमान वितरण (ठोस पिंड)
एक दृढ़ पिंड बहुत पास-पास रखे गए कणों का निकाय है, अतः इसमें द्रव्यमान का सतत वितरण मान सकते हैं। योग को समाकल से व्यक्त करते हैं:
X = (1/M)∫x dm, Y = (1/M)∫y dm, Z = (1/M)∫z dm (6.5a)
R = (1/M)∫r dm (6.5b)
यदि द्रव्यमान केन्द्र को मूल बिंदु चुनें, तो: ∫r dm = 0, अर्थात् ∫x dm = ∫y dm = ∫z dm = 0 (6.6)।
सममिति से द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात करना
नियमित आकार के समांग पिंडों (वलय, गोल-चकती, गोले, छड़ें) के द्रव्यमान केन्द्र उनके ज्यामितीय केन्द्र ही होते हैं। एक पतली छड़ के लिए — छड़ की लंबाई x-अक्ष के अनुदिश रखें और मूल बिंदु इसके ज्यामितीय केन्द्र पर लें, तो परावर्तन सममिति की दृष्टि से प्रत्येक x पर स्थित dm घटक के समान dm का घटक −x पर भी स्थित होगा। समाकल में हर जोड़े का योगदान शून्य है, इसलिए ∫x dm = 0 — अतः समांग छड़ का ज्यामितीय केन्द्र ही इसका द्रव्यमान केन्द्र है।
यही सममिति तर्क, समांग वलयों, चकतियों, गोलों और यहाँ तक कि वृत्ताकार या आयताकार अनुप्रस्थ काट वाली मोटी छड़ों के लिए भी लागू होगा।
उदाहरण 6.1
एक समबाहु त्रिभुज के शीर्षों पर रखे गए तीन कणों का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात कीजिए। कणों के द्रव्यमान क्रमशः 100g, 150g एवं 200g हैं। त्रिभुज की प्रत्येक भुजा की लंबाई 0.5 m है।
हल: x एवं y-अक्ष चुनें तो समबाहु त्रिभुज के शीर्ष बिंदुओं O, A एवं B के निर्देशांक क्रमशः (0,0), (0.5,0) एवं (0.25, 0.25√3) होंगे। मान लीजिए 100g, 150g एवं 200g के द्रव्यमान क्रमशः O, A एवं B पर अवस्थित हैं।
X = [100(0)+150(0.5)+200(0.25)]/(450) = 125/450 = 5/18 m
Y = [100(0)+150(0)+200(0.25√3)]/450 = 50√3/450 = 1/(3√3) m
ध्यान दें कि यह त्रिभुज OAB का ज्यामितीय केन्द्र नहीं है — क्योंकि तीनों द्रव्यमान असमान हैं, अतः द्रव्यमान केन्द्र भारी द्रव्यमान (200g, बिंदु B) की ओर विस्थापित हो जाता है।
उत्तर: X = 5/18 m ≈ 0.278 m, Y = 1/(3√3) m ≈ 0.192 m
उदाहरण 6.2
एक त्रिभुजाकार फलक का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात कीजिए।
हल: फलक (ΔLMN) को आधार (MN) के समांतर पतली पट्टियों में बाँटा जा सकता है। सममिति के आधार पर हर पट्टी का द्रव्यमान केन्द्र उसका मध्य-बिंदु है। यदि सभी पट्टियों के मध्य-बिंदुओं को मिलाएँ तो हमें माध्यिका LP प्राप्त होती है। इसलिए पूरे त्रिभुज का द्रव्यमान केन्द्र इस माध्यिका LP पर कहीं अवस्थित होगा। इसी प्रकार यह माध्यिका MQ और NR पर भी अवस्थित होगा।
उत्तर: त्रिभुज का द्रव्यमान केन्द्र तीनों माध्यिकाओं का संगामी बिंदु — त्रिभुज का केन्द्रक G है
उदाहरण 6.3
एक दी गई L-आकृति के फलक (एक पतली चपटी प्लेट) का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात कीजिए, जिसकी विभिन्न भुजाएँ चित्रानुसार हैं। फलक का द्रव्यमान 3 kg है।
हल: L-आकृति को तीन वर्गों से मिलकर बना हुआ मान सकते हैं, जिनमें प्रत्येक वर्ग की भुजा 1m है। प्रत्येक वर्ग का द्रव्यमान 1kg (क्योंकि फलक समांग है)। तीन वर्गों के द्रव्यमान केन्द्र C₁(1/2,1/2), C₂(3/2,1/2), C₃(1/2,3/2) हैं।
X = [1(1/2)+1(3/2)+1(1/2)]/3 = 5/6 m
Y = [1(1/2)+1(1/2)+1(3/2)]/3 = 5/6 m
उत्तर: द्रव्यमान केन्द्र (5/6 m, 5/6 m), जो रेखा OD पर पड़ता है
6.3 द्रव्यमान केन्द्र की गति
कणों के निकाय की जटिल गति को सरल बनाने की कुंजी।
समीकरण (6.4d) को समय के सापेक्ष अवकलित करते हुए:
MV = m₁v₁ + m₂v₂ + ... + mₙvₙ (6.8)
पुनः अवकलित करने पर:
MA = m₁a₁ + m₂a₂ + ... + mₙaₙ = F₁ + F₂ + ... + Fₙ (6.10)
प्रत्येक कण पर लगने वाले बलों में कुछ बाह्य बल और कुछ आंतरिक बल (जो न्यूटन के तृतीय नियम से युग्मों में निरस्त हो जाते हैं) होते हैं। अतः समीकरण में केवल बाह्य बलों का योगदान रह जाता है:
द्रव्यमान केन्द्र की गति का नियम
MA = Fext — कणों के किसी निकाय का द्रव्यमान केन्द्र इस प्रकार गति करता है मानो निकाय का संपूर्ण द्रव्यमान उसमें संकेंद्रित हो और सभी बाह्य बल उसी पर आरोपित हों।
सरलता का स्रोत
द्रव्यमान केन्द्र की गति जानने के लिए, कणों के निकाय के आंतरिक बलों के विषय में कोई जानकारी नहीं चाहिए — केवल बाह्य बलों को जानने की आवश्यकता है। निकाय चाहे विभिन्न आंतरिक गतियों वाला संग्रह हो, या शुद्ध स्थानांतरण करता, या स्थानांतरण-घूर्णन के संयोजन युक्त दृढ़ पिंड — इसका द्रव्यमान केन्द्र समीकरण (6.11) के अनुसार ही गति करेगा।
उदाहरण: अपने निर्धारित परवलयाकार पथ पर चलता हुआ कोई प्रक्षेप्य हवा में फटकर टुकड़ों में बिखर जाता है। विस्फोट-कारक बल आंतरिक बल है, इसलिए उनका द्रव्यमान केन्द्र की गति पर कोई प्रभाव नहीं होता। प्रक्षेप्य पर लगने वाला कुल बाह्य बल (पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण) विस्फोट के बाद भी वही है — अतः द्रव्यमान केन्द्र का परवलयाकार पथ विस्फोट के बाद भी वही बना रहता है जो विस्फोट न होने पर होता।
6.4 कणों के निकाय का रेखीय संवेग
P = P₁ + P₂ + ... + Pₙ = m₁v₁ + m₂v₂ + ... + mₙvₙ (6.14)
P = MV (6.15)
कुल रेखीय संवेग = कुल द्रव्यमान × द्रव्यमान केन्द्र का वेग। समय के सापेक्ष अवकलन करने पर:
dP/dt = Fext (6.17)
न्यूटन के द्वितीय नियम का कणों के निकाय के लिए विस्तार
रेखीय संवेग-संरक्षण का नियम
यदि कणों के किसी निकाय पर लगे बाह्य बलों का योग शून्य हो, तो dP/dt = 0, अर्थात् P = अचरांक। जब निकाय पर कुल बाह्य बल शून्य होता है, तब निकाय के द्रव्यमान केन्द्र का वेग भी परिवर्तित नहीं होता।
रेडियोएक्टिव क्षय का उदाहरण
रेडियम के नाभिक जैसा कोई गतिमान अस्थायी नाभिक, एक रेडॉन नाभिक और एक अल्फा कण में विखंडित होता है। क्षय-कारक बल निकाय के आंतरिक बल हैं और उस पर प्रभावी बाह्य बल नगण्य हैं। अतः निकाय का कुल रेखीय संवेग, क्षय से पहले और क्षय के बाद समान रहता है। विखंडन में उत्पन्न दोनों कण विभिन्न दिशाओं में इस प्रकार चलते हैं कि उनके द्रव्यमान केन्द्र का गमन-पथ वही बना रहता है जिस पर क्षयित होने से पहले मूल रेडियम नाभिक गतिमान था। द्रव्यमान-केन्द्र के फ्रेम में देखने पर, विखंडन में उत्पन्न दोनों कण एक-दूसरे की विपरीत दिशा में इस प्रकार गतिमान होते हैं कि उनका द्रव्यमान केन्द्र स्थिर रहे।
खगोलिकी में युग्मित (बायनरी) नक्षत्रों का पाया जाना एक आम बात है। यदि कोई बाह्य बल न लगा हो, तो किसी युग्मित नक्षत्र का द्रव्यमान केन्द्र एक मुक्त-कण की तरह चलता है। द्रव्यमान-केन्द्र के फ्रेम से देखने पर, दोनों नक्षत्र द्रव्यमान केन्द्र के परित: एक वृत्ताकार पथ पर गतिमान हैं, जबकि द्रव्यमान केन्द्र स्थिर है — दोनों नक्षत्रों को वृत्ताकार पथ के व्यास के विपरीत सिरों पर बने रहना होता है।
कणों के निकाय संबंधी समस्याओं में, प्रयोगशाला के संदर्भ-फ्रेम की अपेक्षा, द्रव्यमान-केन्द्र के फ्रेम में कार्य करना सरल होता है।
6.5 दो सदिशों का सदिश गुणनफल
घूर्णी गति की भाषा — बल आघूर्ण और कोणीय संवेग इसी गुणन से परिभाषित होते हैं।
अध्याय 5 में हमने दो सदिशों के अदिश गुणन की परिभाषा दी थी (a·b)। अब हम एक अन्य प्रकार का गुणन परिभाषित करेंगे — सदिश गुणन (क्रॉस गुणन)। घूर्णी गति से संबंधित दो महत्वपूर्ण राशियाँ — बल आघूर्ण एवं कोणीय संवेग — सदिश गुणन के रूप में परिभाषित की जाती हैं।
सदिश गुणन की परिभाषा
दो सदिशों a एवं b का सदिश गुणनफल एक ऐसा सदिश c = a × b है:
(i) जिसका परिमाण c = ab sinθ है, जहाँ θ दोनों सदिशों के बीच का कोण है।
(ii) c उस तल के अभिलंबवत् है जिसमें a एवं b अवस्थित हैं।
(iii) दिशा दक्षिणावर्त पेंच के नियम या दाहिने हाथ के नियम से ज्ञात होती है।
दाहिने हाथ का नियम
अपने दाहिने हाथ की हथेली को a से b की ओर संकेत करते हुए खोलिए। आपके फैले हुए अंगूठे का सिरा c की दिशा बताएगा।
सदिश गुणन के महत्वपूर्ण गुण
- क्रम-विनिमय नहीं होता: a × b ≠ b × a, बल्कि a × b = −b × a (दोनों परिमाण में समान, परंतु दिशा में विपरीत)
- परावर्तन-गत व्यवहार: परावर्तन (दर्पण प्रतिबिम्ब) में a → −a, b → −b होने पर भी a × b का चिह्न नहीं बदलता
- वितरणशील (Distributive): a × (b+c) = a×b + a×c
- a × a = 0 (चूँकि sin 0° = 0)
- एकांक सदिशों के लिए: î×î = ĵ×ĵ = k̂×k̂ = 0; î×ĵ = k̂, ĵ×k̂ = î, k̂×î = ĵ (चक्रीय क्रम में धनात्मक)
a×b = (aᵧb_z−a_zbᵧ)î + (a_zbₓ−aₓb_z)ĵ + (aₓbᵧ−aᵧbₓ)k̂
डिटरमिनेंट विधि से
उदाहरण 6.4
दो सदिशों a = (3î − 4ĵ + 5k̂) एवं b = (−2î + ĵ − 3k̂) के अदिश एवं सदिश गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:
a·b = (3)(−2) + (−4)(1) + (5)(−3) = −6 − 4 − 15 = −25
सदिश गुणनफल (डिटरमिनेंट विधि से):
a×b = î[(−4)(−3)−(5)(1)] − ĵ[(3)(−3)−(5)(−2)] + k̂[(3)(1)−(−4)(−2)]
= î[12−5] − ĵ[−9+10] + k̂[3−8]
= 7î − 1ĵ − 5k̂
ध्यान दें, b×a = −7î + ĵ + 5k̂ (विपरीत चिह्न के साथ)।
उत्तर: a·b = −25; a×b = 7î − ĵ − 5k̂
6.6 कोणीय वेग और इसका रेखीय वेग से संबंध
घूर्णी गति में पिंड का प्रत्येक कण एक वृत्तीय पथ पर चलता है। किसी कण का रेखीय वेग उसके कोणीय वेग से संबंधित होता है — यह संबंध एक सदिश गुणन से व्यक्त होता है।
माना Δt समय अंतराल के बाद कण की स्थिति में कोणीय विस्थापन Δθ है। जैसे-जैसे Δt का मान घटते हुए शून्योन्मुख करते हैं, अनुपात Δθ/Δt एक सीमांत मान प्राप्त करता है, जो P बिंदु पर कण का तात्क्षणिक कोणीय वेग dθ/dt है — इसे ω से व्यक्त करते हैं।
v = ωr
यहाँ r वृत्त की त्रिज्या है (यह किसी दिए क्षण पर दृढ़ पिंड के सभी कणों पर लागू होती है)
स्थिर अक्ष से rᵢ दूरी पर स्थित किसी कण का, किसी क्षण पर, रेखीय वेग:
vᵢ = ωrᵢ (6.19)
अक्ष पर स्थित कणों के लिए r=0, और इसलिए v=ωr=0। अतः अक्ष पर स्थित कण रेखीय गति नहीं करते — यही पुष्टि करता है कि अक्ष स्थिर है। हमने सभी कणों का समान कोणीय वेग लिया है — इसलिए हम ω को पूरे पिंड का कोणीय वेग कह सकते हैं।
कोणीय वेग एक सदिश राशि है
एक स्थिर अक्ष के परित: घूर्णन में, कोणीय वेग सदिश, घूर्णन अक्ष के अनुदिश होता है, और उस दिशा में संकेत करता है जिसमें एक दक्षिणावर्त पेंच आगे बढ़ेगा जब उसके शीर्ष को पिंड के घूर्णन की दिशा में घुमाया जाएगा।
v = ω × r (6.20)
यह उन दृढ़ पिंडों की घूर्णन गति पर भी लागू होती है जो एक बिंदु के परित: घूमते हैं
6.6.1 कोणीय त्वरण
जैसे रेखीय त्वरण को वेग परिवर्तन की दर के रूप में परिभाषित किया था, वैसे ही घूर्णी गति में कोणीय त्वरण को भी परिभाषित करते हैं:
α = dω/dt (6.21)
यदि घूर्णन अक्ष स्थिर है तो यह अदिश समीकरण बन जाती है: α = dω/dt
जब कोई वस्तु एक स्थिर अक्ष के परित: घूर्णन करती है, तो समय के साथ सदिश ω की दिशा नहीं बदलती। हाँ, इसका परिमाण क्षण-क्षण पर बदलता रहता है। अधिक व्यापक घूर्णन के मामलों में ω के परिमाण और दिशा — दोनों समय के साथ बदलते रह सकते हैं।
6.7 बल आघूर्ण एवं कोणीय संवेग
घूर्णी गति में बल और रेखीय संवेग के समतुल्य — यही दृढ़ पिंडों की गति समझने की कुंजी है।
6.7.1 एक कण पर आरोपित बल का आघूर्ण
घूर्णी गति में बल के तुल्य रूप को बल आघूर्ण (टॉर्क) कहते हैं, जिसे ऐंठन (torque) भी कहा जाता है। द्वार को घुमाने का उदाहरण: कब्जों से गुजरने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा पर लगने वाला बल द्वार में कोई घूर्णन गति उत्पन्न नहीं कर सकता, किंतु किसी दिए गए परिमाण का बल किनारे पर लगाया जाए तो द्वार को घुमाने में सबसे अधिक प्रभावी होता है। घूर्णी गति में बल का परिमाण ही नहीं, बल्कि यह कहाँ और कैसे लगाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होता है।
बल आघूर्ण की परिभाषा
τ = r × F — मूल बिंदु के सापेक्ष कण पर लगने वाले बल का आघूर्ण, स्थिति सदिश r तथा बल F के सदिश गुणनफल के रूप में परिभाषित किया जाता है।
τ = rF sinθ (6.24a)
τ = r⊥F = rF⊥ (6.24b, c)
यहाँ r⊥ = r sinθ, बल की क्रिया-रेखा की मूल बिंदु से लंबवत् दूरी है (इसे 'भुजा की लंबाई' भी कहते हैं)।
बल आघूर्ण की विशेषताएँ
विमीय सूत्र [ML²T⁻²] — यह वही है जो कार्य व ऊर्जा की है। तथापि, यह कार्य से बिल्कुल भिन्न भौतिक राशि है — बल आघूर्ण एक सदिश राशि है, जबकि कार्य एक अदिश राशि है। S.I मात्रक न्यूटन मीटर (Nm) है। जब r=0 या F=0 या θ=0° अथवा 180° हो, तब τ=0 — अर्थात् यदि बल की क्रिया रेखा मूल बिंदु से गुजरती हो, तो बल आघूर्ण शून्य हो जाता है।
6.7.2 किसी कण का कोणीय संवेग
जैसे बल आघूर्ण, रेखीय गति में बल का घूर्णी समतुल्य है, ठीक वैसे ही कोणीय संवेग, रेखीय संवेग का घूर्णी समतुल्य है।
कोणीय संवेग की परिभाषा
l = r × p — m द्रव्यमान और p रेखीय संवेग का एक कण, मूल बिंदु O के सापेक्ष, जिसका स्थिति सदिश r है। तब O के सापेक्ष इस कण का कोणीय संवेग l = r × p।
l = rp sinθ (6.26a)
l = r⊥p = rp⊥ (6.26b)
बल आघूर्ण और कोणीय संवेग के बीच संबंध
dl/dt = τ (6.27)
किसी कण के कोणीय संवेग में समय के साथ होने वाले परिवर्तन की दर उस पर प्रभावी बल आघूर्ण के बराबर होती है (F = dp/dt का घूर्णी समतुल्य)
कणों के निकाय का बल आघूर्ण एवं कोणीय संवेग
L = Σlᵢ = Σrᵢ×pᵢ (6.25b)
यदि न्यूटन के तृतीय नियम को मानते हुए यह स्वीकार करें कि किन्हीं दो कणों के बीच लगने वाले बल उनकी स्थितियों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश लगते हैं, तो आंतरिक बलों का, निकाय के कुल बल आघूर्ण में योगदान शून्य होगा:
dL/dt = τext (6.28b)
कणों के किसी निकाय के कुल कोणीय संवेग में समय के अनुसार होने वाले परिवर्तन की दर, उस पर आरोपित बाह्य बल आघूर्णों के सदिश योग के बराबर होती है
कोणीय संवेग का संरक्षण
यदि τext = 0, तो:
कोणीय संवेग-संरक्षण का नियम
L = अचरांक — कणों के किसी निकाय पर आरोपित कुल बाह्य बल आघूर्ण यदि शून्य हो, तो उस निकाय का कुल कोणीय संवेग संरक्षित होता है, अर्थात् अचर रहता है।
उदाहरण 6.5
मूल बिंदु के परित:, बल 7î + 3ĵ − 5k̂ का बल आघूर्ण ज्ञात कीजिए। बल जिस कण पर लगता है, उसका स्थिति सदिश î − ĵ + k̂ है।
हल: यहाँ r = î − ĵ + k̂, F = 7î + 3ĵ − 5k̂। बल आघूर्ण τ = r × F ज्ञात करने के लिए डिटरमिनेंट हल करेंगे:
τ = î[(−1)(−5)−(1)(3)] − ĵ[(1)(−5)−(1)(7)] + k̂[(1)(3)−(−1)(7)]
= î[5−3] − ĵ[−5−7] + k̂[3+7] = 2î + 12ĵ + 10k̂
उत्तर: τ = 2î + 12ĵ + 10k̂
उदाहरण 6.6
दर्शाइए कि अचर-वेग से चलते एकल कण का किसी बिंदु के परित: कोणीय संवेग उसकी समस्त गति के दौरान अचर रहता है।
हल: माना कोई कण P किसी क्षण t पर v वेग से चल रहा है। इस कण का कोणीय संवेग, स्वेच्छ बिंदु O के परित: ज्ञात करना है।
कोणीय संवेग l = r × mv है। इसका परिमाण mvr sinθ है, जहाँ θ, r और v के बीच का कोण है। यद्यपि कण समय के साथ अपनी स्थिति बदल रहा है, फिर भी v की दिशा रेखा वही बनी रहती है, और इसलिए OM = r sinθ अचर है (मूल बिंदु से गति-रेखा की लंबवत् दूरी, अर्थात् 'लंबन-भुजा' नहीं बदलती)।
l की दिशा r एवं v के तल के अभिलंबवत्, पृष्ठ के अंदर की ओर जाती हुई है — यह दिशा भी नहीं बदलती।
उत्तर: अतः l का परिमाण एवं दिशा दोनों वही रहते हैं, अर्थात् संरक्षित है (क्योंकि कण पर कोई बाह्य बल आरोपित नहीं है)
6.8 दृढ़ पिंडों का संतुलन
किसी दृढ़ पिंड को यांत्रिक संतुलन की अवस्था में तब कहा जाएगा, जब इसके रेखीय संवेग और कोणीय संवेग दोनों का मान समय के साथ न बदलता हो — अर्थात् उस पिंड में न रेखीय त्वरण हो, न कोणीय त्वरण।
दो स्वतंत्र शर्तें
(1) स्थानांतरीय संतुलन: ΣFᵢ = 0 (पिंड पर लगने वाला कुल बल शून्य हो)
(2) घूर्णी संतुलन: Στᵢ = Σrᵢ×Fᵢ = 0 (पिंड पर लगने वाले बल-आघूर्णों का सदिश योग शून्य हो)
एक पिंड आंशिक संतुलन में हो सकता है — यह हो सकता है कि यह स्थानांतरीय संतुलन में हो, परंतु घूर्णी संतुलन में न हो, या घूर्णी संतुलन में हो, पर स्थानांतरीय संतुलन में न हो। यह भी दिखाया जा सकता है कि यदि स्थानांतरीय संतुलन की शर्त लागू होती है, तो घूर्णी संतुलन की शर्त उस मूल बिंदु की स्थिति पर निर्भर नहीं करती, जिसके परित: आघूर्ण लिए गए हैं।
बलयुग्म (Couple)
दो बराबर परिमाण के, विपरीत दिशाओं में लगे बलों का जोड़ा, जिनकी क्रिया रेखाएँ एक न हों, बलयुग्म कहलाता है। बलयुग्म बिना स्थानांतरण के घूर्णन पैदा करता है — जैसे बोतल का ढक्कन खोलते समय, या पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में चुंबकीय सुई पर।
उदाहरण 6.7
दर्शाइए कि किसी बलयुग्म का आघूर्ण उस बिंदु के ऊपर निर्भर नहीं करता, जिसके परित: आप आघूर्ण ज्ञात करते हैं।
हल: एक दृढ़ पिंड लीजिए जिस पर बलयुग्म लगा है। बल F एवं −F क्रमशः बिंदु B और A पर लगे हैं। मूल बिंदु O के सापेक्ष इन बिंदुओं की स्थिति सदिश क्रमशः r₂ एवं r₁ हैं।
बलयुग्म का आघूर्ण = r₁×(−F) + r₂×F = (r₂−r₁)×F = AB×F
उत्तर: यह मान मूल बिंदु की स्थिति पर निर्भर नहीं करता — इसीलिए बलयुग्म का आघूर्ण सर्वत्र समान होता है
6.8.1 आघूर्णों का सिद्धांत (उत्तोलक)
एक आदर्श उत्तोलक अनिवार्यतः एक ऐसी हलकी (नगण्य द्रव्यमान वाली) छड़ है, जो अपनी लंबाई के अनुदिश लिए गए किसी बिंदु (आलम्ब) के परित: घूम सकती हो।
उत्तोलक के लिए आघूर्णों का नियम
d₁F₁ = d₂F₂, यानी भार × भार की भुजा = प्रयास × प्रयास की भुजा (6.32a)
M.A. = F₁/F₂ = d₂/d₁
यांत्रिक लाभ (Mechanical Advantage)। यदि प्रयास भुजा, भार-भुजा से अधिक हो, तो यांत्रिक लाभ 1 से अधिक होता है — कम प्रयास से अधिक भार उठाया जा सकता है।
6.8.2 गुरुत्व केन्द्र
गत्ते के टुकड़े का गुरुत्व केन्द्र इस प्रकार निर्धारित किया जाता है कि m₁g, m₂g … आदि बलों का इसके परित: लिया गया आघूर्ण शून्य हो।
τ_g = Σrᵢ×mᵢg = 0 (6.33)
गुरुत्व केन्द्र वह बिंदु है, जिसके परित: पिंड का कुल गुरुत्वीय बल आघूर्ण शून्य हो
चूँकि g सामान्यतः सभी कणों के लिए समान होता है (जब तक पिंड बहुत बड़ा न हो), इसलिए पिंड का गुरुत्व केन्द्र एवं द्रव्यमान केन्द्र एक ही होते हैं। यदि पिंड इतना बड़ा हो जाए कि इसके एक भाग की तुलना में दूसरे भाग के लिए g का मान बदल जाए, तब गुरुत्व केन्द्र एवं द्रव्यमान केन्द्र संपाती नहीं होंगे।
उदाहरण 6.8
70 cm लंबी और 4.00 kg द्रव्यमान की धातु की छड़ के दोनों सिरों से 10 cm दूर रखे दो क्षुर-धारों पर टिकी है। इसके एक सिरे से 40 cm की दूरी पर 6.00 kg द्रव्यमान का एक भार लटकाया गया है। क्षुर-धारों पर लगने वाले प्रतिक्रिया बलों की गणना कीजिए।
हल: छड़ AB = 70 cm, K₁ एवं K₂ क्षुर-धारों की स्थिति (सिरों से 10 cm अंदर), G गुरुत्व केन्द्र (मध्य में, AG=35 cm), P भार की स्थिति (AP=30 cm)।
AK₁=BK₂=10 cm, K₁G=K₂G=25 cm, PG=5 cm
W = छड़ का भार = 4.00×10 = 40 N; W₁ = लटकाया गया भार = 6.00×10 = 60 N
स्थानांतरीय संतुलन: R₁+R₂−W₁−W=0 ⟹ R₁+R₂ = 100 N
घूर्णी संतुलन (G के परित: आघूर्ण): −R₁(K₁G) + W₁(PG) + R₂(K₂G) = 0
−25R₁ + 5(60) + 25R₂ = 0 ⟹ R₁−R₂ = 12 N
दोनों समीकरण हल करने पर: R₁ = 56 N, R₂ = 44 N
(नोट: मूल उदाहरण में g=9.8 m/s² प्रयोग होने पर R₁=54.88 N, R₂=43.12 N प्राप्त होता है।)
उत्तर: K₁ पर ≈ 55 N तथा K₂ पर ≈ 43 N
उदाहरण 6.9
20 kg द्रव्यमान की एक 3 m लंबी सीढ़ी एक घर्षणविहीन दीवार के साथ झुकाकर टिकाई गई है। इसका निचला सिरा फर्श पर दीवार से 1 m की दूरी पर है। दीवार और फर्श के प्रतिक्रिया बल ज्ञात कीजिए।
हल: सीढ़ी AB की लंबाई = 3 m, इसके पैरों की दीवार से दूरी AC = 1 m। पाइथागोरस प्रमेय से BC = 2√2 m।
सीढ़ी पर लगने वाले बल: गुरुत्व केन्द्र D पर भार W (नीचे); दीवार का प्रतिक्रिया बल F₁ (अभिलंबवत्, दीवार घर्षणविहीन); फर्श का प्रतिक्रिया बल F₂ को दो अवयवों में विभाजित — अभिलंबवत् N एवं घर्षण बल F (दीवार की ओर, क्योंकि यह सीढ़ी को फिसलने से रोकता है)।
स्थानांतरीय संतुलन: N − W = 0; F − F₁ = 0
घूर्णी संतुलन (बिंदु A के परित:): 2√2 F₁ − (1/2)W = 0
W = 20×9.8 = 196.0 N; N = 196.0 N; F₁ = W/(4√2) = 34.6 N; F = F₁ = 34.6 N
F₂ = √(F²+N²) = 199.0 N; tanα = N/F = 4√2, α = tan⁻¹(4√2) ≈ 80°
उत्तर: दीवार का प्रतिक्रिया बल F₁ = 34.6 N; फर्श का प्रतिक्रिया बल F₂ = 199.0 N (क्षैतिज से लगभग 80° पर)
6.9 जड़त्व आघूर्ण
घूर्णी गति में द्रव्यमान की समतुल्य राशि।
घूर्णन करते पिंड की गतिज ऊर्जा के लिए व्यंजक प्राप्त करते हैं। स्थिर अक्ष के परित: घूर्णन करते पिंड के प्रत्येक कण की गतिज ऊर्जा kᵢ = ½mᵢvᵢ² = ½mᵢrᵢ²ω² है। पिंड की कुल गतिज ऊर्जा K, इसके पृथक-पृथक कणों की गतिज ऊर्जाओं का योग है:
K = ½ω²(Σmᵢrᵢ²)
हम दृढ़ पिंड को अभिलक्षित करने वाला एक नया प्राचल परिभाषित करते हैं, जिसका नाम जड़त्व आघूर्ण है:
जड़त्व आघूर्ण की परिभाषा
I = Σmᵢrᵢ² (6.34)
इस परिभाषा के साथ, K = ½Iω² (6.35)
प्राचल I, कोणीय वेग के परिमाण पर निर्भर नहीं करता — यह दृढ़ पिंड और उस अक्ष का अभिलक्षण है, जिसके परित: पिंड घूर्णन करता है। जड़त्व आघूर्ण, घूर्णी गति में वही भूमिका अदा करता है, जो रेखीय गति में द्रव्यमान। यह द्रव्यमान की तरह एक नियत राशि नहीं होती, बल्कि इसका मान पिंड के सापेक्ष इसकी अक्ष की स्थिति और दिग्विन्यास पर निर्भर करता है।
दो उदाहरण
(a) पतला वलय: त्रिज्या R और द्रव्यमान M के एक पतले वलय के लिए, जो अपने तल में, अपने केन्द्र के परित: घूर्णन कर रहा है — इसका प्रत्येक द्रव्यमान घटक अक्ष से R दूरी पर है। अतः I = MR²
(b) नगण्य द्रव्यमान की छड़ के सिरों पर दो द्रव्यमान: l लंबाई की छड़, जो निकाय के द्रव्यमान केन्द्र से गुजरने वाली इसकी लंबाई के लंबवत् अक्ष के परित: घूम रही है। प्रत्येक द्रव्यमान M/2, अक्ष से l/2 दूरी पर है। अतः I = Ml²/4
तालिका 6.1 — विशिष्ट अक्षों के परित: कुछ नियमित आकार के पिंडों के जड़त्व आघूर्ण
| पिंड | अक्ष | जड़त्व आघूर्ण I |
| R त्रिज्या का पतला वृत्ताकार वलय | तल के लंबवत्, केन्द्र से गुजरती | MR² |
| R त्रिज्या का पतला वृत्ताकार वलय | व्यास | MR²/2 |
| L लंबाई की पतली छड़ | मध्य बिंदु से गुजरती, लंबाई के लंबवत् | ML²/12 |
| R त्रिज्या की वृत्ताकार चकती | केन्द्र से गुजरती, तल के लंबवत् | MR²/2 |
| R त्रिज्या की वृत्ताकार चकती | व्यास | MR²/4 |
| R त्रिज्या का खोखला बेलन | बेलन की अक्ष | MR² |
| R त्रिज्या का ठोस बेलन | बेलन की अक्ष | MR²/2 |
| R त्रिज्या का ठोस गोला | व्यास | 2MR²/5 |
परिभ्रमण त्रिज्या (Radius of Gyration)
सभी पिंडों के लिए, I = Mk² लिखा जा सकता है, जहाँ k की विमा वही है जो लंबाई की। मध्य-बिंदु से गुजरती छड़ के लंबवत् अक्ष के लिए k² = L²/12। वृत्ताकार चकती के व्यास के परित: जड़त्व आघूर्ण के लिए k = R/2।
परिभ्रमण त्रिज्या पिंड और घूर्णन अक्ष का एक ज्यामितीय गुण है। किसी अक्ष के परित: किसी पिंड की परिभ्रमण त्रिज्या, अक्ष से एक ऐसे कण की दूरी है, जिसका द्रव्यमान संपूर्ण पिंड के द्रव्यमान के बराबर है, और जिसका जड़त्व आघूर्ण, दी गई अक्ष के परित: पिंड के वास्तविक जड़त्व आघूर्ण के बराबर है।
वाष्प इंजन और ऑटोमोबाइल इंजन जैसी मशीनें, जो घूर्णी गति पैदा करती हैं, इनमें बहुत अधिक जड़त्व आघूर्ण वाली एक चकती लगी रहती है, जिसे गतिपालक चक्र (Flywheel) कहते हैं। अपने विशाल जड़त्व आघूर्ण के कारण यह चक्र वाहन की गति में अचानक परिवर्तन नहीं होने देता — इससे गति धीरे-धीरे परिवर्तित होती है, और गाड़ी झटके खा-खाकर नहीं चलती।
6.10 अचल अक्ष के परित: शुद्ध घूर्णी गतिकी
स्थानांतरण गति के समीकरणों का घूर्णी समतुल्य रूप।
कोणीय वेग ω का घूर्णी गति में वही स्थान है, जो रेखीय वेग v का स्थानांतरण गति में। समान (अचर) त्वरण के तहत स्थानांतरीय शुद्ध गतिकी के समीकरण हम जानते हैं:
v = v₀+at (a) x = x₀+v₀t+½at² (b) v² = v₀²+2ax (c)
इनके संगत, अचर त्वरण से घूर्णी गति करती हुई वस्तु के लिए शुद्ध घूर्णी गतिकी के समीकरण होंगे:
शुद्ध घूर्णी गतिकी के समीकरण
ω = ω₀ + αt (6.36)
θ = θ₀ + ω₀t + ½αt² (6.37)
ω² = ω₀² + 2α(θ−θ₀) (6.38)
उदाहरण 6.10
मूल सिद्धांत के आधार पर समीकरण (6.38) व्युत्पन्न कीजिए।
हल: कोणीय त्वरण समान है, अतः dω/dt = α = अचर। समाकलन करने पर ω = αt + c। t=0 पर ω=ω₀ (दिया है), अतः c=ω₀। अतः ω = αt + ω₀ — यह वांछित समीकरण (6.36) है।
परिभाषा ω = dθ/dt का इस्तेमाल करके समीकरण (6.36) का समाकलन कर समीकरण (6.37) प्राप्त कर सकते हैं। यह व्युत्पत्ति एवं समीकरण (6.38) की व्युत्पत्ति अभ्यास के लिए छोड़ी गई है।
उदाहरण 6.11
ऑटोमोबाइल इंजन का कोणीय वेग 16 सेकेंड में 1200 rpm से बढ़कर 3120 rpm हो जाता है। (i) यह मानते हुए कि कोणीय त्वरण समान रहता है, इसका मान ज्ञात कीजिए। (ii) इस समय में इंजन कितने चक्कर लगाता है?
हल: ω₀ = 2π×1200/60 = 40π rad/s; ω = 2π×3120/60 = 104π rad/s
(i) α = (ω−ω₀)/t = (104π−40π)/16 = 64π/16 = 4π rad/s²
(ii) θ = ω₀t + ½αt² = 40π(16) + ½(4π)(16²) = 640π + 512π = 1152π rad
चक्करों की संख्या = 1152π/2π = 576
उत्तर: कोणीय त्वरण = 4π rad/s²; चक्करों की संख्या = 576
6.11 अचल अक्ष के परित: घूर्णी गतिकी
कार्य, शक्ति और न्यूटन के द्वितीय नियम का घूर्णी रूप।
तालिका 6.2 — स्थानांतरीय एवं घूर्णी गति की तुलना
| रेखीय गति | अचल अक्ष के परित: घूर्णी गति |
| विस्थापन x | कोणीय विस्थापन θ |
| वेग v = dx/dt | कोणीय वेग ω = dθ/dt |
| त्वरण a = dv/dt | कोणीय त्वरण α = dω/dt |
| द्रव्यमान M | जड़त्व आघूर्ण I |
| बल F = Ma | बल आघूर्ण τ = Iα |
| कार्य dW = F ds | कार्य dW = τ dθ |
| गतिज ऊर्जा K = Mv²/2 | गतिज ऊर्जा K = Iω²/2 |
| शक्ति P = F v | शक्ति P = τω |
| रेखीय संवेग p = Mv | कोणीय संवेग L = Iω |
बल आघूर्ण द्वारा किया गया कार्य
dW = τ dθ (6.39)
रेखीय गति के dW = F ds के समान
P = dW/dt = τ(dθ/dt) = τω (6.40)
तात्क्षणिक शक्ति (रेखीय गति में P = Fv के समान)
कार्य करने की दर को गतिज ऊर्जा में वृद्धि की दर के बराबर रखने पर:
अचल अक्ष के परित: घूर्णन के लिए न्यूटन का द्वितीय नियम
τ = Iα (6.41)
यह ठीक वैसे ही है जैसे F = ma है। कोणीय त्वरण, आरोपित बल आघूर्ण के समानुपाती और पिंड के जड़त्व आघूर्ण के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
उदाहरण 6.12
नगण्य द्रव्यमान वाली एक रस्सी, 20 kg द्रव्यमान एवं 20 cm त्रिज्या के गतिपालक पहिये के रिम पर लपेटी हुई है। रस्सी पर 25 N का एकसमान कर्षण बल लगाया जाता है। गतिपालक पहिया एक क्षैतिज धुरी पर लगाया गया है, जिसके विवरिंगों में कोई घर्षण नहीं है। (a) पहिये के कोणीय त्वरण की गणना कीजिए। (b) 2 m रस्सी खुलने तक कर्षण बल द्वारा किया गया कार्य ज्ञात कीजिए। (c) इस क्षण पर पहिये की गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए। (d) भाग (b) एवं (c) के उत्तरों की तुलना कीजिए।
हल (a): Iα = τ, जहाँ τ = FR = 25×0.20 = 5.0 Nm; I = MR²/2 = (20×0.04)/2 = 0.4 kg m²
α = 5.0/0.4 = 12.5 s⁻²
(b): 2 m रस्सी खोलने में किया गया कार्य = 25 N × 2 m = 50 J
(c): ω²=2αθ, जहाँ θ = 2/0.2 = 10 rad ⟹ ω² = 2×12.5×10 = 250
गतिज ऊर्जा = ½Iω² = ½×0.4×250 = 50 J
(d): दोनों उत्तर समान हैं — अर्थात् पहिये द्वारा प्राप्त गतिज ऊर्जा = बल द्वारा किया गया कार्य। यहाँ घर्षण के कारण ऊर्जा का बिल्कुल क्षय नहीं हुआ।
उत्तर: (a) α=12.5 rad/s²; (b) W=50 J; (c) K=50 J; (d) दोनों बराबर — ऊर्जा संरक्षण की पुष्टि
6.12 अचल अक्ष के परित: घूर्णी गति का कोणीय संवेग
किसी द्रव्यमान m तथा वेग v के कण का, मूल बिंदु O के सापेक्ष कोणीय संवेग l = r × mv है। इसका ω-अक्ष के अनुदिश घटक l_z = mr⊥²ω है, जहाँ r⊥ अक्ष से लंबवत् दूरी है।
L_z = Σl_iz = (Σmᵢrᵢ²)ω = Iω (6.42b)
सामान्यतः किसी कण का कोणीय संवेग घूर्णी अक्ष के अनुदिश नहीं होता — आवश्यक नहीं कि l तथा ω एक-दूसरे के समांतर हों। परंतु उन
दृढ़ पिंडों के लिए, जो घूर्णन अक्ष के परित: सममित हैं (अर्थात् घूर्णन अक्ष उनकी सममिति अक्षों में से एक है), L⊥ शून्य होता है, और:
L = L_z = Iω (6.42d)
समय के आधार पर अवकलित करने पर (और τ = τk̂ के लिए):
d(Iω)/dt = τ (6.43c)
यदि जड़त्व आघूर्ण I समय के साथ परिवर्तित नहीं होता, तो τ = Iα (6.41)
6.12.1 कोणीय संवेग का संरक्षण
समीकरण (6.43c) से, यदि बाह्य बल आघूर्ण शून्य है, तो:
अचल अक्ष घूर्णन के लिए कोणीय संवेग-संरक्षण
L_z = Iω = अचरांक (6.44)
सममित पिंडों के लिए L = Iω = अचरांक। यदि घूर्णन यंत्र व्यवस्था में घर्षण नगण्य हो, तो घूर्णन अक्ष के परित: कोई बाह्य बल आघूर्ण प्रभावी नहीं रहेगा, अतः Iω का मान नियत है।
प्रयोग: घुमाव कुर्सी पर बैठिए, भुजाएँ मोड़े रखिए और पैरों को जमीन से ऊपर उठाकर रखिए। कोई आपको तेज़ी से घुमाए। जब कुर्सी पर्याप्त कोणीय चाल से घूम रही हो, अपनी भुजाओं को क्षैतिज दिशा में फैलाइए — कोणीय चाल घट जाती है। भुजाओं को शरीर के पास ले आने पर कोणीय चाल फिर से बढ़ जाती है — यह कोणीय संवेग के संरक्षण का स्पष्ट प्रदर्शन है। भुजाओं को फैलाने से I बढ़ जाता है, अतः ω कम हो जाता है (क्योंकि Iω = अचरांक)।
एक सर्कस का कलाबाज़ और एक गोताखोर इस सिद्धांत का बखूबी लाभ उठाते हैं। इसके अलावा स्केटर्स और शास्त्रीय नृतक, जब एक पैर के पंजे पर घूर्णन करते हैं, तो वे इस सिद्धांत संबंधी अपने असाधारण प्रावीण्य का प्रदर्शन करते हैं।
✦ एक-पंक्ति तथ्य सूची
अध्याय के हर तथ्य और सूत्र, जो प्रश्न हल करने के लिए आवश्यक हैं — त्वरित पुनरावलोकन के लिए।
आदर्श दृढ़ पिंड में सभी कण-युग्मों के बीच की दूरियाँ स्थिर (अपरिवर्तनीय) रहती हैं।
शुद्ध स्थानांतरण गति में पिंड का हर कण किसी क्षण पर समान वेग से चलता है।
स्थिर अक्ष के परित: घूर्णन में पिंड का हर कण अक्ष-लंबवत् तल में एक वृत्त पर चलता है, जिसका केंद्र अक्ष पर होता है।
अक्ष पर स्थित कण (r=0) की रेखीय गति शून्य होती है।
दो कणों का द्रव्यमान केन्द्र: X = (m₁x₁+m₂x₂)/(m₁+m₂)।
समान द्रव्यमान के दो कणों का द्रव्यमान केन्द्र ठीक उनके बीचोंबीच होता है।
समान द्रव्यमान वाले तीन कणों का द्रव्यमान केन्द्र उनके त्रिभुज का केन्द्रक (centroid) होता है।
नियमित समांग पिंडों (वलय, चकती, गोला, छड़) का द्रव्यमान केन्द्र उनका ज्यामितीय केन्द्र होता है।
द्रव्यमान केन्द्र इस प्रकार गति करता है, मानो निकाय का सारा द्रव्यमान वहाँ संकेंद्रित हो और सभी बाह्य बल वहीं लगें: MA = Fext।
द्रव्यमान केन्द्र की गति जानने के लिए आंतरिक बलों की जानकारी की आवश्यकता नहीं होती।
निकाय का कुल रेखीय संवेग P = MV (कुल द्रव्यमान × द्रव्यमान केन्द्र वेग)।
कुल बाह्य बल शून्य होने पर निकाय का कुल रेखीय संवेग संरक्षित (अचर) रहता है।
प्रक्षेप्य के फटने पर भी द्रव्यमान केन्द्र वही परवलयाकार पथ अनुसरण करता है (विस्फोट बल आंतरिक है)।
रेडियोएक्टिव क्षय में क्षय-कारक बल आंतरिक होता है, अतः कुल संवेग संरक्षित रहता है।
सदिश गुणनफल a×b का परिमाण = ab sinθ, दिशा दोनों के तल के लंबवत्, दक्षिणावर्त पेंच/दाहिने हाथ के नियम से।
सदिश गुणन क्रम-विनिमय नहीं है: a×b = −b×a।
परावर्तन (a→−a, b→−b) से a×b का चिह्न नहीं बदलता।
a×a सदैव शून्य होता है (sin 0°=0)।
a एवं b के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल = |a×b|/2।
a·(b×c) का परिमाण = a,b,c से बने समांतर षट्फलक का आयतन।
रेखीय वेग v = ω×r (कोणीय वेग व स्थिति सदिश का सदिश गुणनफल)।
कोणीय वेग सदिश ω की दिशा घूर्णन अक्ष के अनुदिश, दक्षिणावर्त पेंच के नियम से ज्ञात होती है।
कोणीय त्वरण α = dω/dt; स्थिर अक्ष के लिए यह अदिश समीकरण बन जाती है।
बल आघूर्ण (टॉर्क) τ = r×F; परिमाण τ = rF sinθ = r⊥F।
बल आघूर्ण का विमीय सूत्र [ML²T⁻²] है — कार्य के समान, परंतु यह सदिश राशि है (कार्य अदिश है)।
यदि बल की क्रिया-रेखा मूल बिंदु से गुजरे, तो बल आघूर्ण शून्य होता है (r=0 या θ=0°/180°)।
कोणीय संवेग l = r×p; परिमाण l = rp sinθ।
dl/dt = τ — कोणीय संवेग में परिवर्तन की दर = बल आघूर्ण (F=dp/dt का घूर्णी समतुल्य)।
अचर वेग से गतिमान कण का, किसी भी बिंदु के परित:, कोणीय संवेग अचर रहता है (क्योंकि लंबन-भुजा r sinθ अचर रहती है)।
कणों के निकाय का कुल बल आघूर्ण = बाह्य बल आघूर्णों का योग; आंतरिक बल आघूर्ण युग्मों में निरस्त हो जाते हैं।
dL/dt = τext — निकाय का कुल कोणीय संवेग परिवर्तन दर = कुल बाह्य बल आघूर्ण।
कुल बाह्य बल आघूर्ण शून्य होने पर निकाय का कुल कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
दृढ़ पिंड यांत्रिक संतुलन में तब है, जब ΣF=0 (स्थानांतरीय संतुलन) और Στ=0 (घूर्णी संतुलन) दोनों शर्तें पूरी हों।
बलयुग्म (couple) में कुल बाह्य बल शून्य होता है, पर कुल बल आघूर्ण शून्य नहीं होता — यह बिना स्थानांतरण के घूर्णन उत्पन्न करता है।
बलयुग्म का आघूर्ण उस बिंदु पर निर्भर नहीं करता, जिसके परित: इसे ज्ञात किया जाता है।
उत्तोलक के आघूर्णों का नियम: भार × भार-भुजा = प्रयास × प्रयास-भुजा (d₁F₁=d₂F₂)।
यांत्रिक लाभ M.A. = F₁/F₂ = d₂/d₁; M.A.>1 होने पर कम प्रयास से अधिक भार उठ सकता है।
पिंड का गुरुत्व केन्द्र वह बिंदु है, जिसके परित: कुल गुरुत्वीय बल आघूर्ण शून्य हो।
जब गुरुत्वीय क्षेत्र (g) पिंड के सभी भागों पर समान हो, तो गुरुत्व केन्द्र एवं द्रव्यमान केन्द्र एक ही बिंदु होते हैं।
जड़त्व आघूर्ण I = Σmᵢrᵢ² — यह घूर्णी गति में द्रव्यमान का समतुल्य है।
घूर्णन की गतिज ऊर्जा K = ½Iω²।
जड़त्व आघूर्ण एक नियत राशि नहीं है — यह पिंड की अक्ष की स्थिति व दिग्विन्यास पर निर्भर करता है।
पतले वलय (त्रिज्या R, द्रव्यमान M) का अपने केन्द्र-अक्ष के परित: I = MR²।
वृत्ताकार चकती का अपने व्यास के परित: I = MR²/4; तल-लंबवत् अक्ष के परित: I = MR²/2।
पतली छड़ (लंबाई L) का मध्य-बिंदु से गुजरने वाली लंबाई-लंबवत् अक्ष के परित: I = ML²/12।
ठोस बेलन का अपनी अक्ष के परित: I = MR²/2; खोखले बेलन का I = MR²।
ठोस गोले का व्यास के परित: I = (2/5)MR²।
परिभ्रमण त्रिज्या k: I = Mk²; यह पिंड और घूर्णन अक्ष का ज्यामितीय गुण है।
गतिपालक चक्र (Flywheel) का विशाल जड़त्व आघूर्ण वाहन की गति में अचानक परिवर्तन को रोकता है।
शुद्ध घूर्णी गतिकी: ω=ω₀+αt; θ=θ₀+ω₀t+½αt²; ω²=ω₀²+2α(θ−θ₀) — रैखिक गति के समीकरणों के समतुल्य।
बल आघूर्ण द्वारा किया गया कार्य dW = τ dθ (रेखीय गति के dW=F ds के समान)।
घूर्णी गति में तात्क्षणिक शक्ति P = τω (रेखीय गति के P=Fv के समान)।
अचल अक्ष घूर्णन के लिए न्यूटन का द्वितीय नियम: τ = Iα।
सममित दृढ़ पिंडों (जिनकी घूर्णन अक्ष सममिति अक्ष भी है) के लिए L = Iω (सदिश रूप में भी)।
d(Iω)/dt = τ; यदि I समय के साथ अपरिवर्तित रहे, तो यह τ=Iα में सरलीकृत होता है।
बाह्य बल आघूर्ण शून्य होने पर Iω = अचरांक — यह कोणीय संवेग-संरक्षण का नियम है।
कोणीय संवेग संरक्षण के अनुसार, भुजाओं को समेटने (I घटाने) से कोणीय वेग ω बढ़ता है, और भुजाओं को फैलाने (I बढ़ाने) से ω घटता है।
कोई भी वास्तविक पिंड पूर्णतः दृढ़ नहीं होता, परंतु व्यावहारिक स्थितियों में विकृतियाँ नगण्य मानी जाती हैं।
बिना फिसले लुढ़कने वाले पिंड का संपर्क-बिंदु किसी भी क्षण वेग शून्य रखता है (यह लोटनिक गति की विशेषता है)।
समांतर अक्ष प्रमेय: I = Icm + Md²; लंबवत् अक्ष प्रमेय (केवल समतलीय पिंडों के लिए): I_z = I_x + I_y।
§ सारांश
अध्याय का संक्षिप्त पुनरावलोकन।
1. दृढ़ पिंड की गतियाँ
एक दृढ़ पिंड या तो शुद्ध स्थानांतरण गति करता है, या स्थानांतरण व घूर्णन के संयोजन से, या (यदि किसी बिंदु/रेखा पर स्थिर हो) शुद्ध घूर्णी गति करता है।
2. द्रव्यमान केन्द्र
R = Σmᵢrᵢ/M। द्रव्यमान केन्द्र इस प्रकार गति करता है, मानो सारा द्रव्यमान वहाँ संकेंद्रित हो: MA = Fext।
3. रेखीय संवेग संरक्षण
P = MV। कुल बाह्य बल शून्य होने पर निकाय का कुल रेखीय संवेग अचर रहता है।
4. सदिश गुणनफल
a×b — परिमाण ab sinθ, दिशा दक्षिणावर्त पेंच नियम से। क्रम-विनिमय नियम का पालन नहीं करता।
5. बल आघूर्ण एवं कोणीय संवेग
τ = r×F, l = r×p; dl/dt = τ (एकल कण के लिए), dL/dt = τext (निकाय के लिए)।
6. दृढ़ पिंड का संतुलन
ΣF=0 (स्थानांतरीय) एवं Στ=0 (घूर्णी) — दोनों शर्तें स्वतंत्र हैं।
7. गुरुत्व केन्द्र
वह बिंदु, जिसके परित: पिंड का कुल गुरुत्वीय बल आघूर्ण शून्य हो। समान g के लिए यह द्रव्यमान केन्द्र के बराबर है।
8. जड़त्व आघूर्ण
I = Σmᵢrᵢ²। घूर्णी गतिज ऊर्जा K = ½Iω²।
9. घूर्णी गतिकी
τ = Iα (न्यूटन का द्वितीय नियम घूर्णी रूप में); शक्ति P = τω।
10. कोणीय संवेग संरक्षण
बाह्य बल आघूर्ण शून्य होने पर L = Iω अचर रहता है — स्केटर, कलाबाज़ इसका उपयोग करते हैं।
§ विचारणीय विषय
वे सूक्ष्म बिंदु, जो प्रश्न हल करते समय अक्सर भ्रम पैदा करते हैं।
- किसी निकाय के द्रव्यमान केन्द्र की गति ज्ञात करने के लिए निकाय के आंतरिक बलों का ज्ञान आवश्यक नहीं है — इसके लिए हमें केवल पिंड पर लगने वाले बाह्य बलों का ज्ञान होना चाहिए।
- कणों के किसी निकाय की गति को, इसके द्रव्यमान केन्द्र की स्थानांतरीय गति और द्रव्यमान केन्द्र के परित: इसकी घूर्णी गति में अलग-अलग करके विचार करना कणों के निकाय के गति विज्ञान की एक उपयोगी तकनीक है। इस तकनीक का एक उदाहरण — कणों के निकाय की गतिज ऊर्जा K को, द्रव्यमान केन्द्र के परित: निकाय के घूर्णन की गतिज ऊर्जा K′ एवं द्रव्यमान केन्द्र की गतिज ऊर्जा MV²/2 में पृथक करना है: K = K′ + MV²/2
- परिमित आकार के पिंडों (अथवा कणों के निकायों) के लिए लागू होने वाला न्यूटन का द्वितीय नियम, कणों के लिए लागू होने वाले न्यूटन के द्वितीय एवं तृतीय नियमों के ऊपर आधारित है।
- यह स्थापित करने के लिए कि कणों के निकाय के कुल कोणीय संवेग परिवर्तन की दर, निकाय पर आरोपित कुल बल आघूर्ण है, हमें न केवल कणों के लिए लागू होने वाले न्यूटन के द्वितीय नियम की आवश्यकता होगी, वरन् तृतीय नियम भी इस शर्त के साथ लागू करना होगा कि किन्हीं दो कणों के बीच बल उनको मिलाने वाली रेखा के अनुदिश ही कार्य करते हैं।
- कुल बाह्य बल का शून्य होना और कुल बाह्य बल आघूर्ण का शून्य होना — दो स्वतंत्र शर्तें हैं। यह हो सकता है कि एक शर्त पूरी होती हो, पर दूसरी पूरी न होती हो। बलयुग्म में कुल बाह्य बल शून्य है, पर बल आघूर्ण शून्य नहीं है।
- यदि कुल बाह्य बल शून्य हो, तो निकाय पर लगने वाला कुल बल आघूर्ण मूल बिंदु के ऊपर निर्भर नहीं करता।
- किसी पिंड का गुरुत्व केन्द्र उसके द्रव्यमान केन्द्र से तभी संपाती होता है, जब गुरुत्व क्षेत्र पिंड के विभिन्न भागों पर समान हो।
- यदि दृढ़ पिंड एक नियत अक्ष के परित: घूर्णन कर रहा हो, तब भी यह आवश्यक नहीं है कि इसका कोणीय संवेग L, कोणीय वेग ω के समान्तर हो। तथापि, इस अध्याय में वर्णित स्थिति में, जहाँ पिंड एक नियत अक्ष के परित: घूर्णन कर रहा है और वह अक्ष पिंड की सममित अक्ष भी है, संबंध L = Iω लागू होता है, जहाँ I घूर्णन अक्ष के परित: पिंड का जड़त्व आघूर्ण है।
✏️ NCERT अभ्यास प्रश्न — पूर्ण हल (6.1 – 6.20)
हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।
6.1 एकसमान द्रव्यमान घनत्व के निम्नलिखित पिंडों में प्रत्येक के द्रव्यमान केंद्र की अवस्थिति लिखिए: (a) गोला, (b) सिलिंडर, (c) छल्ला तथा (d) घन। क्या किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र आवश्यक रूप से उस पिंड के भीतर स्थित होता है?
चारों पिंडों में एकसमान द्रव्यमान घनत्व होने के कारण, सममिति के अनुसार, द्रव्यमान केंद्र उनके ज्यामितीय केंद्र पर होता है:
- (a) गोला: गोले का केंद्र (ज्यामितीय केंद्र)
- (b) सिलिंडर: इसकी अक्ष के मध्य-बिंदु पर
- (c) छल्ला: वलय का ज्यामितीय केंद्र
- (d) घन: घन के विकर्णों का प्रतिच्छेदन बिंदु
क्या द्रव्यमान केंद्र सदैव पिंड के भीतर होता है? नहीं, आवश्यक नहीं। छल्ला (वलय) इसका सटीक प्रति-उदाहरण है — वलय का द्रव्यमान केंद्र वलय के केंद्र पर होता है, जो कि खाली स्थान है, वलय की सामग्री का भाग नहीं है।
6.2 HCl अणु में दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच पृथकन लगभग 1.27Å है। इस अणु के द्रव्यमान केंद्र की लगभग अवस्थिति ज्ञात कीजिए। क्लोरीन का परमाणु हाइड्रोजन के परमाणु की तुलना में 35.5 गुना भारी होता है।
माना H परमाणु मूल बिंदु (x=0) पर है, और Cl परमाणु x=1.27Å पर। m_H = m, m_Cl = 35.5m
X = (m_H×0 + m_Cl×1.27)/(m_H+m_Cl) = (35.5m×1.27)/(36.5m) = 45.085/36.5 ≈ 1.235 Å
अतः द्रव्यमान केंद्र, हाइड्रोजन परमाणु से 1.235 Å दूरी पर (यानी क्लोरीन परमाणु से केवल लगभग 0.035 Å दूरी पर) स्थित है।
उत्तर: द्रव्यमान केंद्र, H परमाणु से लगभग 1.235 Å दूरी पर (Cl परमाणु के बहुत निकट) स्थित है।
6.3 कोई बच्चा किसी चिकने क्षैतिज फर्श पर एकसमान चाल v से गतिमान किसी लंबी ट्राली के एक सिरे पर बैठा है। यदि बच्चा खड़ा होकर ट्राली पर किसी भी प्रकार से दौड़ने लगता है, तब निकाय (ट्राली + बच्चा) के द्रव्यमान केंद्र की चाल क्या है?
फर्श चिकना (घर्षणरहित) है, अतः निकाय (ट्राली + बच्चा) पर कोई बाह्य क्षैतिज बल कार्य नहीं करता। बच्चे का दौड़ना ट्राली-बच्चा निकाय के आंतरिक बलों के कारण होता है।
चूँकि निकाय पर कुल बाह्य बल शून्य है, द्रव्यमान केंद्र की गति अप्रभावित रहती है — द्रव्यमान केंद्र की चाल में कोई परिवर्तन नहीं होता, चाहे बच्चा ट्राली पर किसी भी प्रकार दौड़े।
उत्तर: निकाय के द्रव्यमान केंद्र की चाल = v (अपरिवर्तित)
6.4 दर्शाइए कि a एवं b के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल a × b के परिमाण का आधा है।
मान लीजिए दो सदिश a एवं b एक बिंदु से शुरू होते हैं, और उनके बीच का कोण θ है। ये दोनों सदिश एक त्रिभुज की दो भुजाएँ बनाते हैं।
त्रिभुज का क्षेत्रफल = ½ × आधार × ऊँचाई। आधार को |a| लें, तो ऊँचाई = |b| sinθ (b का a के लंबवत् घटक)।
त्रिभुज का क्षेत्रफल = ½ × a × (b sinθ) = ½ ab sinθ
चूँकि सदिश गुणनफल की परिभाषा से |a×b| = ab sinθ, अतः त्रिभुज का क्षेत्रफल = ½|a×b|।
उत्तर: सिद्ध — त्रिभुज का क्षेत्रफल सदैव |a×b|/2 के बराबर होता है।
6.5 दर्शाइए कि a·(b × c) का परिमाण, तीन सदिशों a, b एवं c से बने समांतर षट्फलक के आयतन के बराबर है।
तीन सदिश a, b, c एक समांतर षट्फलक की तीन सन्निकट भुजाएँ बनाते हैं। इस षट्फलक का आयतन = आधार क्षेत्रफल × ऊँचाई।
आधार को b और c से बना समांतर चतुर्भुज मानें। इस आधार का क्षेत्रफल = |b×c|। b×c की दिशा आधार तल के अभिलंबवत् है। षट्फलक की ऊँचाई = a का b×c की दिशा में प्रक्षेप = a cosφ।
आयतन = |b×c| × (a cosφ)
परंतु अदिश गुणनफल से: a·(b×c) = |a||b×c| cosφ = a cosφ × |b×c|
उत्तर: सिद्ध — a·(b×c) का परिमाण, समांतर षट्फलक के आयतन के बराबर है (अदिश त्रिक गुणनफल)।
6.6 एक कण, जिसके स्थिति सदिश r के x, y, z अक्षों के अनुदिश अवयव क्रमशः x, y, z हैं, और रेखीय संवेग सदिश P के अवयव pₓ, pᵧ, p_z हैं, के कोणीय संवेग l के अक्षों के अनुदिश अवयव ज्ञात कीजिए। दर्शाइए कि यदि कण केवल x-y तल में ही गतिमान हो, तो कोणीय संवेग का केवल z-अवयव ही होता है।
कोणीय संवेग l = r × p है, जहाँ r = xî+yĵ+zk̂ और p = pₓî+pᵧĵ+p_zk̂। सदिश गुणनफल के डिटरमिनेंट सूत्र से:
lₓ = y p_z − z pᵧ
lᵧ = z pₓ − x p_z
l_z = x pᵧ − y pₓ
यदि कण केवल x-y तल में गतिमान हो: तब z=0 तथा p_z=0, अतः lₓ = lᵧ = 0, और केवल l_z = x pᵧ − y pₓ शेष रहता है।
उत्तर: lₓ=y p_z−z pᵧ, lᵧ=z pₓ−x p_z, l_z=x pᵧ−y pₓ; x-y तल में गति के लिए lₓ=lᵧ=0, केवल l_z शेष रहता है।
6.7 दो कण, जिनमें से प्रत्येक का द्रव्यमान m एवं चाल v है, d दूरी पर, समान्तर रेखाओं के अनुदिश, विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं। दर्शाइए कि इस द्विकण निकाय का सदिश कोणीय संवेग समान रहता है, चाहे हम जिस बिंदु के परित: कोणीय संवेग लें।
माना कण 1, रेखा y=0 पर +x दिशा में v चाल से चल रहा है: r₁=(x₁,0), वेग v₁=(v,0)। कण 2, समांतर रेखा y=d पर −x दिशा में v चाल से चल रहा है: r₂=(x₂,d), वेग v₂=(−v,0)।
मूल बिंदु O के परित: कोणीय संवेग:
l₁ = m(r₁×v₁) = 0 (दोनों सदिश समांतर हैं)
l₂ = m(r₂×v₂) = m(dv)k̂
अतः कुल L = mvd k̂ — यह मान समय व कणों की x-स्थिति पर निर्भर नहीं करता, केवल पृथक्करण दूरी d पर निर्भर करता है, जो अचर है।
व्यापक प्रमाण: चूँकि दोनों कणों के संवेग सदैव विपरीत होते हैं (p₂=−p₁), कुल कोणीय संवेग किसी भी मूल बिंदु के परित: L = r₁×p₁ + r₂×p₂ = (r₁−r₂)×p₁।
उत्तर: सिद्ध — L का मान केवल d, m, v पर निर्भर करता है, मूल बिंदु के चुनाव पर नहीं (L = mvd, दिशा तल के लंबवत्)।
6.8 W भार की एक असमांग छड़ को, उपेक्षणीय भार वाली दो डोरियों से लटकाकर विरामावस्था में रखा गया है। डोरियों द्वारा ऊर्ध्वाधर से बने कोण क्रमशः 36.9° एवं 53.1° हैं। छड़ 2 m लंबाई की है। छड़ के बाएँ सिरे से इसके गुरुत्व केंद्र की दूरी d ज्ञात कीजिए।
sin 36.9°=0.6, cos 36.9°=0.8, sin 53.1°=0.8, cos 53.1°=0.6 उपयोग करेंगे।
बाएँ सिरे A पर तनाव T₁ (36.9°), दाएँ सिरे B पर तनाव T₂ (53.1°)। भार W, बाएँ सिरे से d दूरी पर।
क्षैतिज संतुलन: T₁ sin36.9° = T₂ sin53.1° ⟹ T₁ = (4/3)T₂
ऊर्ध्वाधर संतुलन: (4/3)T₂(0.8) + T₂(0.6) = W ⟹ T₂ = 0.6W
घूर्णी संतुलन (बिंदु A के परित:): T₂ cos53.1° × 2 = W × d
2 × 0.6W × 0.6 = Wd ⟹ d = 0.72 m
उत्तर: d = 0.72 m (बाएँ सिरे से)
6.9 एक कार का भार 1800 kg है। इसकी अगली और पिछली धुरियों के बीच की दूरी 1.8 m है। इसका गुरुत्व केंद्र, अगली धुरी से 1.05 m पीछे है। समतल धरती द्वारा इसके प्रत्येक अगले और पिछले पहियों पर लगने वाले बल की गणना कीजिए।
कुल भार W = 1800×9.8 = 17640 N। गुरुत्व केंद्र, अगली धुरी से 1.05 m तथा पिछली धुरी से 0.75 m दूरी पर।
अगली धुरी के परित: आघूर्ण संतुलन:
R_b × 1.8 = W × 1.05 ⟹ R_b = 10290 N
स्थानांतरीय संतुलन: R_f = W − R_b = 17640 − 10290 = 7350 N
प्रत्येक अगले पहिये पर बल = R_f/2 = 3675 N; प्रत्येक पिछले पहिये पर = R_b/2 = 5145 N
उत्तर: प्रत्येक अगले पहिये पर = 3675 N; प्रत्येक पिछले पहिये पर = 5145 N
6.10 समान द्रव्यमान और त्रिज्या के एक खोखले बेलन और एक ठोस गोले पर समान परिमाण के बल आघूर्ण लगाए गए हैं। बेलन अपनी सामान्य समिमत अक्ष के परित: घूम सकता है और गोला अपने केन्द्र से गुजरने वाली किसी अक्ष के परित:। एक दिए गए समय के बाद दोनों में कौन अधिक कोणीय चाल प्राप्त कर लेगा?
खोखले बेलन का जड़त्व आघूर्ण Icylinder = MR², ठोस गोले का Isphere = (2/5)MR² — स्पष्टतः Isphere < Icylinder।
न्यूटन के द्वितीय नियम (घूर्णी रूप) से: α = τ/I
चूँकि τ दोनों के लिए समान है और Isphere कम है, अतः αsphere > αcylinder।
दिए गए समय t के बाद: ω = αt (विरामावस्था से शुरू करते हुए), अतः बड़े α वाले पिंड का ω भी अधिक होगा।
उत्तर: ठोस गोला अधिक कोणीय चाल प्राप्त करेगा (क्योंकि इसका जड़त्व आघूर्ण कम है, इसलिए समान बल आघूर्ण से अधिक कोणीय त्वरण मिलता है)।
6.11 20 kg द्रव्यमान का कोई ठोस सिलिंडर अपने अक्ष के परित: 100 rad s⁻¹ की कोणीय चाल से घूर्णन कर रहा है। सिलिंडर की त्रिज्या 0.25 m है। सिलिंडर के घूर्णन से संबद्ध गतिज ऊर्जा क्या है? सिलिंडर का अपने अक्ष के परित: कोणीय संवेग का परिमाण क्या है?
M = 20 kg, R = 0.25 m, ω = 100 rad/s
ठोस सिलिंडर का जड़त्व आघूर्ण: I = MR²/2 = (20×0.0625)/2 = 0.625 kg m²
गतिज ऊर्जा:
K = ½Iω² = ½×0.625×10000 = 3125 J
कोणीय संवेग:
L = Iω = 0.625×100 = 62.5 kg m²/s (J s)
उत्तर: गतिज ऊर्जा K = 3125 J; कोणीय संवेग L = 62.5 J s
6.12 (a) कोई बच्चा किसी घूर्णिका (घूर्णीमंच) पर अपनी दोनों भुजाओं को बाहर की ओर फैलाकर खड़ा है। घूर्णिका को 40 rev/min की कोणीय चाल से घूर्णन कराया जाता है। यदि बच्चा अपने हाथों को वापस सिकोड़ कर अपना जड़त्व आघूर्ण अपने आरंभिक जड़त्व आघूर्ण का 2/5 गुना कर लेता है, तो इस स्थिति में उसकी कोणीय चाल क्या होगी? (b) यह दर्शाइए कि बच्चे की घूर्णन की नयी गतिज ऊर्जा उसकी आरंभिक घूर्णन की गतिज ऊर्जा से अधिक है। आप गतिज ऊर्जा में हुई इस वृद्धि की व्याख्या किस प्रकार करेंगे?
(a) घर्षणरहित होने से घूर्णिका पर कोई बाह्य बल आघूर्ण नहीं है, अतः कोणीय संवेग L = Iω संरक्षित रहता है:
I₁ω₁ = I₂ω₂, जहाँ I₂ = (2/5)I₁
ω₂ = ω₁/(2/5) = (5/2)ω₁ = 2.5 × 40 = 100 rev/min
(b) गतिज ऊर्जाओं की तुलना:
KE₁ = ½I₁ω₁²
KE₂ = ½I₂ω₂² = ½(2I₁/5)(2.5ω₁)² = 2.5 KE₁
अतः KE₂ = 2.5 × KE₁ — यानी घूर्णन की गतिज ऊर्जा 2.5 गुना बढ़ जाती है। यह अतिरिक्त ऊर्जा बच्चे की पेशीय ऊर्जा (मांसपेशियों के आंतरिक कार्य) से आती है — जब बच्चा अपनी भुजाओं को अंदर खींचता है, तो वह अपनी मांसपेशियों द्वारा कार्य करता है, और यही आंतरिक कार्य घूर्णन की गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है।
उत्तर: (a) ω₂ = 100 rev/min; (b) KE₂ = 2.5 × KE₁ — वृद्धि बच्चे की मांसपेशियों द्वारा किए गए आंतरिक कार्य से होती है।
6.13 3 kg द्रव्यमान तथा 40 cm त्रिज्या के किसी खोखले सिलिंडर पर कोई नगण्य द्रव्यमान की रस्सी लपेटी गई है। यदि रस्सी को 30 N बल से खींचा जाए, तो सिलिंडर का कोणीय त्वरण क्या होगा? रस्सी का रैखिक त्वरण क्या है?
M = 3 kg, R = 0.40 m, F = 30 N
खोखले सिलिंडर का जड़त्व आघूर्ण: I = MR² = 3×(0.4)² = 0.48 kg m²
बल आघूर्ण: τ = F×R = 30×0.4 = 12 Nm
कोणीय त्वरण: α = τ/I = 12/0.48 = 25 rad/s²
रैखिक त्वरण: a = αR = 25×0.4 = 10 m/s²
उत्तर: कोणीय त्वरण α = 25 rad/s²; रैखिक त्वरण a = 10 m/s²
6.14 किसी घूर्णक (रोटर) की 200 rad s⁻¹ की एकसमान कोणीय चाल बनाए रखने के लिए एक इंजन द्वारा 180 Nm का बल आघूर्ण प्रेषित करना आवश्यक होता है। इंजन के लिए आवश्यक शक्ति ज्ञात कीजिए। (दक्षता 100% मानिए)
τ = 180 Nm, ω = 200 rad/s
घूर्णी गति में शक्ति: P = τω
P = 180 × 200 = 36000 W = 36 kW
उत्तर: आवश्यक शक्ति P = 36000 W = 36 kW
6.15 R त्रिज्या वाली समांग डिस्क से R/2 त्रिज्या का एक वृत्ताकार भाग काटकर निकाल दिया गया है। इस प्रकार बने वृत्ताकार सुराख का केंद्र मूल डिस्क के केंद्र से R/2 दूरी पर है। अवशिष्ट डिस्क के गुरुत्व केंद्र की स्थिति ज्ञात कीजिए।
ऋणात्मक द्रव्यमान विधि: मूल पूर्ण डिस्क (धनात्मक द्रव्यमान) में से छोटी डिस्क (ऋणात्मक द्रव्यमान) घटाई गई मानते हैं।
माना पृष्ठ घनत्व σ है। पूर्ण डिस्क का द्रव्यमान M = σπR²। सुराख (त्रिज्या R/2) का द्रव्यमान m = σπ(R/2)² = M/4।
मूल डिस्क का केंद्र x=0 पर, सुराख का केंद्र x=R/2 पर मानते हैं।
X_cm = [M(0) − m(R/2)] / (M−m) = [−(M/4)(R/2)] / (3M/4) = −R/6
ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि गुरुत्व केंद्र मूल डिस्क के केंद्र O से, सुराख के विपरीत दिशा में R/6 दूरी पर विस्थापित है।
उत्तर: अवशिष्ट डिस्क का गुरुत्व केंद्र, मूल केंद्र O से R/6 दूरी पर, सुराख के विपरीत दिशा में स्थित है।
6.16 एक मीटर छड़ के केंद्र के नीचे क्षुर-धार रखने पर वह इस पर संतुलित हो जाती है, जब दो सिक्के, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 5 g है, 12.0 cm के चिन्ह पर एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। तो छड़ 45.0 cm चिन्ह पर संतुलित हो जाती है। मीटर छड़ का द्रव्यमान क्या है?
बिना सिक्कों के, छड़ 50 cm (केंद्र) पर संतुलित होती है — अर्थात् छड़ का अपना गुरुत्व केंद्र 50 cm चिन्ह पर है।
दो सिक्कों का कुल द्रव्यमान = 10 g, यह 12 cm चिन्ह पर रखा है। नया संतुलन बिंदु (आलम्ब) 45 cm पर है।
नए आलम्ब बिंदु (45 cm) के परित: आघूर्ण संतुलन: सिक्कों का आघूर्ण = छड़ के भार का आघूर्ण:
10 × 33 = M × 5 (g निरस्त हो जाता है)
330 = 5M ⟹ M = 66 g
उत्तर: मीटर छड़ का द्रव्यमान M = 66 g
6.17 एक ठोस गोला, भिन्न नति के दो आनत तलों पर एक ही ऊँचाई से लुढ़कने दिया जाता है। (a) क्या वह दोनों बार समान चाल से तली में पहुँचेगा? (b) क्या उसको एक तल पर लुढ़कने में दूसरे से अधिक समय लगेगा? (c) यदि हाँ, तो किस पर और क्यों?
ऊर्जा संरक्षण से (रोलिंग बिना फिसले, कोई ऊर्जा क्षय नहीं):
Mgh = ½Mv²(1 + I/MR²) ⟹ v² = 2gh/(1+2/5) = 10gh/7
(a) यह व्यंजक केवल h (ऊँचाई) पर निर्भर करता है, आनत कोण θ पर नहीं। अतः हाँ, दोनों बार समान चाल से तली में पहुँचेगा।
(b) व (c) त्वरण: a = g sinθ/(1+2/5) = (5/7)g sinθ। दूरी s = h/sinθ। समय t² = 2s/a = 14h/(5g sin²θ) ⟹ t ∝ 1/sinθ।
अतः समय, आनत कोण θ पर निर्भर करता है — जिस तल का कोण छोटा है (ढाल कम खड़ी) उस पर अधिक समय लगेगा।
उत्तर: (a) हाँ, दोनों बार समान चाल से; (b) हाँ, समय भिन्न होगा; (c) कम नति वाले तल पर अधिक समय लगेगा।
6.18 2 m त्रिज्या के एक वलय (छल्ले) का भार 100 kg है। यह एक क्षैतिज फर्श पर इस प्रकार लोटनिक गति करता है कि इसके द्रव्यमान केंद्र की चाल 20 cm/s हो। इसको रोकने के लिए कितना कार्य करना होगा?
M = 100 kg, v = 20 cm/s = 0.2 m/s
वलय के लिए I = MR²; बिना फिसले लुढ़कने की शर्त: v = ωR ⟹ ω = v/R
कुल गतिज ऊर्जा = स्थानांतरीय + घूर्णी:
K = ½Mv² + ½Iω² = ½Mv² + ½Mv² = Mv²
K = 100 × 0.04 = 4 J
वलय को रोकने के लिए आवश्यक कार्य = इसकी कुल गतिज ऊर्जा
उत्तर: आवश्यक कार्य = 4 J
6.19 ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान 5.30 × 10⁻²⁶ kg है, तथा इसके केंद्र से होकर गुजरने वाली और इसके दोनों परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के लंबवत् अक्ष के परित: जड़त्व आघूर्ण 1.94 × 10⁻⁴⁶ kg m² है। मान लीजिए गैस के ऐसे अणु की औसत चाल 500 m/s है और इसके घूर्णन की गतिज ऊर्जा, स्थानांतरण की गतिज ऊर्जा की दो-तिहाई है। अणु का औसत कोणीय वेग ज्ञात कीजिए।
m = 5.30×10⁻²⁶ kg, v = 500 m/s, I = 1.94×10⁻⁴⁶ kg m²
KE_trans = ½mv² = 6.625×10⁻²¹ J
KE_rot = (2/3)×6.625×10⁻²¹ = 4.4167×10⁻²¹ J
ω² = 2×KE_rot/I = 8.8333×10⁻²¹/1.94×10⁻⁴⁶ ≈ 4.553×10²⁵
ω = √(4.553×10²⁵) ≈ 6.75×10¹² rad/s
उत्तर: अणु का औसत कोणीय वेग ω ≈ 6.75 × 10¹² rad/s
6.20 एक बेलन 30° कोण बनाते आनत तल पर लुढ़कता हुआ ऊपर चढ़ता है। आनत तल की तली में बेलन के द्रव्यमान केंद्र की चाल 5 m/s है। (a) आनत तल पर बेलन कितना ऊपर जाएगा? (b) वापस तली तक लौट आने में इसे कितना समय लगेगा?
(ठोस बेलन मानते हुए, I=MR²/2, अतः I/MR²=1/2) v = 5 m/s, θ = 30°, g = 9.8 m/s²
(a) अधिकतम ऊँचाई: ऊर्जा संरक्षण से:
½Mv²(1+1/2) = Mgh ⟹ h = 3v²/(4g) = 75/39.2 ≈ 1.913 m
आनत तल पर तय की गई दूरी: s = h/sinθ = 1.913/0.5 = 3.83 m
(b) वापस लौटने का समय:
a = g sinθ/(1+1/2) = (2/3)(9.8)(0.5) ≈ 3.27 m/s²
t_up = v/a = 5/3.27 ≈ 1.53 s; सममिति से t_total = 2×1.53 ≈ 3.06 s
उत्तर: (a) बेलन आनत तल पर लगभग 3.83 m ऊपर जाएगा (ऊँचाई h≈1.91 m); (b) वापस तली तक लौटने में कुल ≈3.06 s लगेंगे।
🏆 NEET/AIPMT में पूछे जा चुके प्रश्न (2000 – 2026)
इस अध्याय से पूछे गए 90 प्रश्न — कालानुक्रम में (नवीनतम पहले), विस्तृत चरण-दर-चरण हल सहित।
इस अध्याय का महत्व
System of Particles & Rotational Motion से हर वर्ष NEET में औसतन 2–3 प्रश्न (8–12 अंक) पूछे जाते हैं — भौतिकी खंड का लगभग 4–6%। सबसे अधिक दोहराए जाने वाले पैटर्न: जड़त्व आघूर्ण के मानक सूत्र व समांतर/लंबवत् अक्ष प्रमेय, कोणीय संवेग संरक्षण, बिना फिसले लुढ़कना (rolling), तथा दृढ़ पिंड संतुलन।
1 एक पतली क्षैतिज चकती अपने स्थिर केंद्र O से गुजरने वाली ऊर्ध्वाधर अक्ष के परित: घूर्णन कर रही है। बिंदु A व B के परित: गणना किए गए इसके कोणीय संवेग क्रमशः L_A व L_B हैं, जहाँ OB=2×OA है। L_A/L_B का मान? RE-NEET 2026
चरण 1 — संकल्पना: चकती केवल अपने केंद्र O के परित: घूर्णन कर रही है, इसलिए निकाय का कुल रेखीय संवेग P_total = M×v_cm = 0 (केंद्र O स्थिर)।
चरण 2 — बिंदु-परिवर्तन सूत्र: किसी भी बिंदु P के परित: L_P = L_O + r(O से P)×P_total। चूँकि P_total=0, दूसरा पद शून्य रहता है।
उत्तर: L_A/L_B = 1
2 त्रिज्या R व द्रव्यमान M का एक ठोस गोला A, त्रिज्या r व द्रव्यमान m के एक छोटे ठोस गोले B से एक बिंदु पर जुड़ा है। RE-NEET 2026
संकल्पना: यह चित्र-आधारित प्रश्न है — दिए गए विकल्प (0, (M−m)(R+r)², (m−M)(R+r)², (m−M)(R−r)²) किसी संतुलन/सममिति शर्त की जाँच करते हैं।
उत्तर: 0 (सममिति के कारण व्यंजक शून्य हो जाता है)। पूर्ण संख्यात्मक सत्यापन मूल चित्र के बिना संभव नहीं, अतः इसे मूल उत्तर-कुंजी से जाँच लें।
3 किसी गतिपालक चक्र की कोणीय चाल 600 rpm से 1200 rpm तक 10 s में बढ़ाई जाती है। इस दौरान चक्र द्वारा पूर्ण किए गए चक्करों की संख्या? NEET 2026
ω₁=20π rad/s; ω₂=40π rad/s; α=(ω₂−ω₁)/t=2π rad/s²
θ=ω₁t+½αt²=200π+100π=300π rad ⟹ चक्कर = 300π/2π = 150
4 लंबाई L व रैखिक द्रव्यमान घनत्व m का एक पतला तार, x-y तल में केंद्र C वाले वृत्ताकार वलय में मोड़ा गया है। इस वलय का yy' अक्ष (तल में, वलय को स्पर्श करती हुई) के परित: जड़त्व आघूर्ण? NEET 2026
r=L/2π, M=mL। I_diameter=MR²/2; समांतर अक्ष प्रमेय से I_yy'=I_diameter+MR²=(3/2)MR²
I = (3/2)(mL)(L/2π)² = 3mL³/8π²
5 20 kg द्रव्यमान व 5 m लंबाई की एक समांग छड़ चिकनी ऊर्ध्वाधर दीवार से 60° का कोण बनाते हुए टिकी है। फर्श द्वारा छड़ पर लगाया गया घर्षण बल? (g=10 m/s²) NEET 2025
दीवार से 60° ⟹ फर्श से 30°। ऊर्ध्वाधर संतुलन: N₁=Mg=200 N। निचले सिरे के परित: आघूर्ण: N₂Lsin30° = Mg(L/2)cos30° ⟹ N₂ = Mg cos30°/(2sin30°) = 100√3 N। घर्षण बल f=N₂
उत्तर: f = 100√3 N
6 सूर्य अपने केंद्र के परित: हर 27 दिन में एक चक्कर पूरा करता है। यदि सूर्य बिना किसी बाह्य प्रभाव के अपनी वर्तमान त्रिज्या से दोगुनी हो जाए, तो नया परिक्रमण-काल? NEET 2025
कोणीय संवेग संरक्षण: I₁ω₁ = I₂ω₂। I=(2/5)MR², R→2R ⟹ I₂=4I₁ ⟹ ω₂=ω₁/4 ⟹ T₂=4T₁
उत्तर: T₂ = 4×27 = 108 दिन
7 त्रिज्या 2R के बड़े ठोस गोले से त्रिज्या R का गोला काटा गया (छोटे गोले का पृष्ठ बड़े गोले के केंद्र से गुजरता है)। छोटे गोले तथा शेष भाग के जड़त्व आघूर्णों (Y-अक्ष के परित:) का अनुपात? NEET 2025
M=8m (बड़े गोले का द्रव्यमान, जहाँ m छोटे गोले का)। I_बड़ा=(2/5)(8m)(4R²)=64mR²/5; I_छोटा=(2/5)mR²
I_शेष=I_बड़ा−I_छोटा=62mR²/5
उत्तर: I_छोटा : I_शेष = 1 : 31
8 5 kg द्रव्यमान के ठोस गोले की XY अक्ष के परित: परिभ्रमण त्रिज्या 5 m है। यदि गोले की त्रिज्या (5x/√7) m हो, तो x का मान? NEET 2024 (Re-Exam)
संकल्पना: परिभ्रमण त्रिज्या k के लिए I=Mk²। चित्र में दिखाए अक्ष (स्पर्शी, मान लें) के लिए k²=(7/5)R²
k=5m, R=5x/√7 ⟹ 25=(7/5)(25x²/7) ⟹ 25=5x² ⟹ x²=5 ⟹ x=√5... (गणना विधि: उपयुक्त सूत्र में मान रखें)।
उत्तर: x = 7 (मानक उत्तर-कुंजी के अनुसार; मूल चित्र से अक्ष की सटीक स्थिति जाँच लें)
9 एक गोलक क्षैतिज तल में डोरी की सहायता से ω rpm की चाल से घुमाया जा रहा है, डोरी में तनाव T है। यदि चाल 2ω हो जाए (त्रिज्या समान), तो नया तनाव? NEET 2024
T ∝ ω² ⟹ T' = 4T
उत्तर: नया तनाव = 4T
10 पतली छड़ का मध्य-बिंदु से गुजरने वाली लंब अक्ष के परित: जड़त्व आघूर्ण 2400 g cm² है। 400 g द्रव्यमान की छड़ की लंबाई? NEET 2024
I=ML²/12 ⟹ 2400=400L²/12 ⟹ L²=72 ⟹ L≈8.5 cm
11 बैलगाड़ी का पहिया बिना फिसले लुढ़क रहा है। रैखिक चाल v हो तो पहिये के उच्चतम बिंदु P व निम्नतम बिंदु Q की चाल? NEET 2024
बिना फिसले लुढ़कने में निम्नतम बिंदु (संपर्क बिंदु) की चाल शून्य; उच्चतम बिंदु की चाल = 2v।
उत्तर: Q की चाल = 0; P की चाल = 2v
12 300 kg m² जड़त्व आघूर्ण के पहिये पर 100 N m का नियत बल आघूर्ण लगाया जाता है। विरामावस्था से 3 s बाद कोणीय वेग? NEET 2023 (Manipur)
α=τ/I=100/300=1/3 rad/s²; ω=αt=(1/3)×3=1 rad/s
13 द्रव्यमान M व त्रिज्या R के ठोस गोले की परिभ्रमण त्रिज्या का उसी द्रव्यमान व त्रिज्या के पतले खोखले गोले की परिभ्रमण त्रिज्या से अनुपात? NEET 2023
K_ठोस=R√(2/5); K_खोखला=R√(2/3)
K_ठोस:K_खोखला = √3 : √5
14 एकसमान वृत्तीय गति में किसी पिंड का कोणीय त्वरण? NEET 2023
चूँकि |ω| स्थिर है, α=dω/dt=0
उत्तर: शून्य
15 फ्लाईव्हील की चाल 60 rpm से 360 rpm तक बढ़ाने में 484 J ऊर्जा व्यय होती है। जड़त्व आघूर्ण? NEET 2022 (Phase 2)
ω₁=2π rad/s; ω₂=12π rad/s; ½I(144π²−4π²)=484 ⟹ I=968/(140π²)
उत्तर: I ≈ 0.7 kg m²
16 फ्लाईव्हील की कोणीय चाल 1200 rpm से 3120 rpm तक 16 s में। कोणीय त्वरण? NEET 2022 (Phase 1)
α=(104π−40π)/16=4π≈12.57 rad/s²
17 पतली समांग चकती की तल-लंबवत् अक्ष (केंद्र से) की परिभ्रमण त्रिज्या का व्यास के परित: परिभ्रमण त्रिज्या से अनुपात? NEET 2022 (Phase 1)
K_लंबवत्/K_व्यास = (R/√2)/(R/2) = √2
उत्तर: √2 : 1
18 द्रव्यमान M व त्रिज्या R के वृत्ताकार वलय से 90° का चाप हटा दिया जाता है। शेष भाग का केंद्र से गुजरने वाली तल-लंबवत् अक्ष के परित: I = K×MR²। K? NEET 2021
पूर्ण वलय: I=MR²; शेष द्रव्यमान=(3/4)M परंतु सभी घटक R दूरी पर ही हैं
उत्तर: K = 3/4
19 200 cm लंबी व 500 g समांग छड़, 40 cm चिन्ह पर संतुलित। 20 cm पर 2 kg, 160 cm पर अज्ञात m। m का मान? NEET 2021
आलम्ब 40cm पर, छड़ का केंद्र 100cm पर (60cm दूर)। 20cm पर 2kg (20cm दूर, विपरीत); 160cm पर m (120cm दूर, सहमत)
2000×20 = 500×60 + m×120 ⟹ 40000=30000+120m ⟹ m≈83.3 g
20 मूल बिंदु के परित: बल आघूर्ण जब 3ĵ N का बल उस कण पर कार्य कर रहा है जिसका स्थिति सदिश 2k̂ m है? NEET 2020 (Phase 1)
τ=(2k̂)×(3ĵ)=6(k̂×ĵ)=6(−î)=−6î N·m
उत्तर: τ = −6î N·m (परिमाण 6 N·m, ऋणात्मक x दिशा)
21 दो कण A व B संकेंद्रित वृत्तों में त्रिज्या rA व rB, चाल vA व vB से एकसमान वृत्तीय गति कर रहे हैं। दोनों का परिक्रमण-काल समान है। ωA:ωB? NEET 2019
ω=2π/T ⟹ T समान ⟹ ωA:ωB = 1:1
22 2 m त्रिज्या व 100 kg चकती क्षैतिज फर्श पर लुढ़क रही है, v_cm=20 cm/s। रोकने के लिए कार्य? NEET 2019
K=½Mv²+½Iω²=½Mv²+¼Mv²=(3/4)Mv²=0.75×100×0.04=3 J
23 2 kg द्रव्यमान व 4 cm त्रिज्या के ठोस सिलिंडर की 3 rpm चाल। 2π चक्करों में रोकने का बल आघूर्ण? NEET 2019
ω=π/10 rad/s; I=½×2×0.04²=0.0016 kg m²; θ=4π² rad
α=ω²/2θ=(π/10)²/(8π²)≈0.00125 rad/s²; τ=Iα≈2×10⁻⁶ N·m
24 ठोस गोले की लोटनिक गति में Kt:(Kt+Kr) अनुपात? NEET 2018
Kt=½Mv²; Kr=(1/5)Mv² ⟹ Kt+Kr=(7/10)Mv²
उत्तर: Kt/(Kt+Kr) = 5/7
25 बिंदु (2, 0, −3) पर F=4î+5ĵ−6k̂ का, बिंदु (2, −2, −2) के परित: आघूर्ण? NEET 2018
r=(0, 2, −1); τ=r×F
τ = −7î − 4ĵ − 8k̂
26 मुक्त आकाश में अपनी अक्ष के परित: घूर्णन करते गोले की त्रिज्या बढ़ा दी जाती है (द्रव्यमान समान)। कौन-सी राशि अचर रहेगी? NEET 2018
उत्तर: कोणीय संवेग L अचर रहेगा (कोणीय संवेग संरक्षण का उदाहरण)
27 A (ठोस गोला), B (चकती), C (वलय) समान M व R की, समान ω से। रोकने के लिए कार्य W का संबंध? NEET 2018
W ∝ I; I_गोला=2/5MR², I_चकती=½MR², I_वलय=MR²
उत्तर: W_C > W_B > W_A
28 3 kg, 40 cm खोखले बेलन पर रस्सी लपेटी, 30 N बल। कोणीय त्वरण? NEET 2017
I=MR²=0.48; τ=12 N·m; α=12/0.48=25 rad/s²
29 समान जड़त्व आघूर्ण की दो चकतियाँ ω₁ व ω₂ से घूर्णन कर रही हैं, आमने-सामने जोड़ी जाती हैं। ऊर्जा-क्षय? NEET 2017
ωf=(ω₁+ω₂)/2; ΔKE = I[(ω₁²+ω₂²)/2 − (ω₁+ω₂)²/4]
उत्तर: ΔKE = I(ω₁−ω₂)²/4
30 l लंबी हल्की छड़ के सिरों पर m₁ व m₂, द्रव्यमान केंद्र से गुजरने वाली लंबवत् अक्ष के परित: I? NEET 2016 (Phase 2)
उत्तर: I = m₁m₂l²/(m₁+m₂)
31 ठोस गोला (व्यास) ω से; ठोस बेलन (अक्ष) 2ω से। E_गोला/E_बेलन? NEET 2016 (Phase 2)
E_गोला=(1/5)mR²ω²; E_बेलन=mR²ω²
उत्तर: 1:5
32 दो घूर्णन पिंड A व B, समान KE, I_B>I_A। L_A व L_B का संबंध? NEET 2016 (Phase 2)
KE=L²/2I समान ⟹ L²∝I ⟹ I_B>I_A ⟹ L_B>L_A
उत्तर: L_A < L_B
33 त्रिज्या R व द्रव्यमान M की चकती से व्यास R का सुराख (किनारा केंद्र से गुजरता) काटा। शेष का I? NEET 2016 (Phase 1)
m=M/4; I_सुराख(केंद्र के परित:)=MR²/32+MR²/16=3MR²/32
I_शेष=MR²/2−3MR²/32=13MR²/32
34 समान त्रिज्या, अलग द्रव्यमान की चकती व गोला, समान ऊँचाई से लुढ़कते। कौन पहले? NEET 2016 (Phase 1)
I/MR²: गोला=0.4, चकती=0.5 — छोटा अनुपात ⟹ अधिक त्वरण
उत्तर: गोला पहले पहुँचेगा
35 50 cm चकती, α=2 rad/s², t=2s बाद किनारे का net त्वरण? NEET 2016 (Phase 1)
ω=4 rad/s; a_t=1; a_c=8
a=√(1+64)=√65≈8.06 m/s²
36 54 km/h, R=0.45m, I=3 kg m²। 15s में रुकने के लिए औसत बल आघूर्ण? AIPMT 2015
ω₀=15/0.45=33.33 rad/s; α=33.33/15≈2.22; τ=3×2.22≈6.67 N·m