गुरुत्वाकर्षण
गिरते सेब से लेकर ग्रहों की कक्षाओं तक — यह अध्याय बताता है कि वह कौन सा बल है जो चंद्रमा को पृथ्वी से, पृथ्वी को सूर्य से बांधे रखता है। केप्लर के नियमों से न्यूटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम तक, पलायन चाल से उपग्रहों की ऊर्जा तक — हर अवधारणा, हर उदाहरण, और अध्याय के सभी प्रश्नों का विस्तृत हल यहाँ है। साथ ही 2000 से 2026 तक के सभी 66 NEET/AIPMT प्रश्न हल सहित संकलित हैं।
7.1 भूमिका
वह बल जो पूरे ब्रह्मांड को एक साथ बांधे रखता है।
बचपन से ही हम यह देखते-समझते आते हैं कि सभी पदार्थ पृथ्वी की ओर आकर्षित होते हैं। जो भी वस्तु ऊपर फेंकी जाए, वह पृथ्वी पर वापस लौट आती है; पहाड़ पर चढ़ने में उतरने की तुलना में कहीं अधिक परिश्रम लगता है। इतिहास के अनुसार इटली के भौतिकविद् गैलीलियो (1564–1642) ने यह मान्यता स्थापित की थी कि सभी पिंड, चाहे उनके द्रव्यमान भिन्न-भिन्न हों, पृथ्वी की ओर समान त्वरण से गिरते हैं।
आद्य काल से ही आकाश में दिखाई देने वाले तारों की पहचान की जाती रही है। लगभग 2000 वर्ष पूर्व टॉलमी ने ग्रहीय गतियों का सबसे प्राचीन प्रमाणित मॉडल — 'भू-केन्द्री' मॉडल — प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार सभी आकाशीय पिंड पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं।
लगभग 400 वर्ष पश्चात् आर्यभट्ट (5वीं शताब्दी) ने अधिक परिष्कृत सूर्य-केन्द्री मॉडल का वर्णन किया। एक हजार वर्ष बाद पोलैंड के निकोलस कोपरनिकस (1473–1543) ने सुव्यवस्थित मॉडल प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार सभी ग्रह केन्द्र में स्थित स्थिर सूर्य के परित: वृत्तीय कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं। इस सिद्धांत के प्रबल समर्थक गैलीलियो पर शासन द्वारा आस्था के विरुद्ध मुकदमा चलाया गया।
डेनमार्क के टायको ब्रेह (1546–1601) ने अपना संपूर्ण जीवन अपनी नंगी आँखों से ग्रहों के प्रेक्षणों के अभिलेखन में समर्पित कर दिया। उनके संकलित आँकड़ों का विश्लेषण बाद में उनके सहायक जोहान्नेस केप्लर (1571–1640) ने किया, और इन आँकड़ों को तीन परिष्कृत नियमों के रूप में प्रतिपादित किया — जिन्हें अब केप्लर के नियम कहते हैं। इन्हीं उत्कृष्ट नियमों ने न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम तक पहुँचने में मार्गदर्शन दिया।
7.2 केप्लर के नियम
तीन सरल नियम जो सभी ग्रहों की गति को सटीकता से वर्णित करते हैं।
यह नियम कोपरनिकस के मॉडल से अलग था, जिसके अनुसार ग्रह केवल वृत्तीय कक्षाओं में ही चल सकते हैं। दीर्घवृत्त एक बंद वक्र होता है जिसे दो नाभि-बिंदुओं (F₁ तथा F₂) का चयन कर, एक डोरी की सहायता से खींचकर बनाया जा सकता है। दीर्घवृत्त के किसी भी बिंदु T पर, दोनों नाभियों से दूरियों का योग सदैव अचर रहता है।
क्षेत्रफलों का नियम वस्तुतः कोणीय संवेग संरक्षण का ही परिणाम है, जो सभी केन्द्रीय बलों के लिए सत्य होता है। यदि सूर्य मूल बिंदु पर हो तथा ग्रह की स्थिति व संवेग क्रमशः r तथा p हों:
ΔA/Δt = L/(2m) (7.2)
किसी केन्द्रीय बल के लिए, जो r की दिशा में ही कार्यरत हो, कोणीय संवेग L एक नियतांक रहता है — अतः ΔA/Δt भी नियतांक होगा। यही क्षेत्रफलों का नियम है। चूँकि गुरुत्वाकर्षण बल भी एक केन्द्रीय बल ही है, अतः क्षेत्रफलों का नियम न्यूटन के नियमों की इसी विशेषता का अनुसरण करता है।
तालिका 7.1 — ग्रहीय गतियों के आँकड़े (केप्लर के तृतीय नियम की पुष्टि)
| ग्रह | a (10¹⁰ m) | T (वर्ष) | Q = T²/a³ (10⁻³⁴) |
|---|---|---|---|
| बुध | 5.79 | 0.24 | 2.95 |
| शुक्र | 10.8 | 0.615 | 3.00 |
| पृथ्वी | 15.0 | 1 | 2.96 |
| मंगल | 22.8 | 1.88 | 2.98 |
| बृहस्पति | 77.8 | 11.9 | 3.01 |
| शनि | 143 | 29.5 | 2.98 |
| यूरेनस | 287 | 84 | 2.98 |
| नेप्ट्यून | 450 | 165 | 2.99 |
मान लें कि किसी ग्रह की उपसौर P पर चाल vP है, तथा सूर्य व ग्रह की दूरी SP = rP है। {rP, vP} तथा अपसौर पर इन राशियों के तदनुरूपी मान {rA, vA} में संबंध स्थापित कीजिए। क्या ग्रह BAC तथा CPB पथ तय करने में समान समय लेगा?
हल: P पर कोणीय संवेग का परिमाण LP = mP rP vP (क्योंकि rP तथा vP परस्पर लंबवत् हैं)। इसी प्रकार, LA = mP rA vA। तब कोणीय संवेग संरक्षण से:
चूँकि rA > rP, अतः vP > vA — उपसौर पर ग्रह अपसौर की तुलना में अधिक तेज़ गति करता है।
दीर्घवृत्त तथा त्रिज्या सदिशों SB एवं SC द्वारा घेरा गया क्षेत्रफल, क्षेत्रफल SBPC की तुलना में अधिक होता है। केप्लर के द्वितीय नियम के अनुसार, समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रफल प्रसर्पित होते हैं। अतः ग्रह पथ CPB को तय करने की तुलना में पथ BAC को तय करने में अधिक समय लेगा।
उत्तर: vP/vA = rA/rP; पथ BAC को तय करने में अधिक समय लगेगा।
7.3 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम
चंद्रमा से लेकर सेब तक — एक ही बल सब कुछ नियंत्रित करता है।
न्यूटन ने अपने विवेक से यह स्पष्ट रूप से समझा कि Rm त्रिज्या की कक्षा में परिक्रमा करने वाले चंद्रमा पर पृथ्वी के गुरुत्व के कारण एक अभिकेन्द्र त्वरण कार्यरत होता है, जिसका परिमाण:
आवर्तकाल T का मान लगभग 27.3 दिन तथा Rm का मान लगभग 3.84×10⁸ m था। इन संख्याओं से am का मान, पृथ्वी के पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण g के मान से काफी कम प्राप्त होता है — यह दर्शाता है कि पृथ्वी का गुरुत्व बल दूरी के साथ घटता जाता है।
यदि हम यह मान लें कि am ∝ Rm⁻² तथा g ∝ RE⁻², तो:
जो g ≈ 9.8 m s⁻² तथा समीकरण (7.3) से प्राप्त am के मान के साथ मेल खाता है। इसी प्रेक्षण ने न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम तक पहुँचाया:
सदिश रूप में:
यहाँ G सार्वत्रिक गुरुत्वीय नियतांक है, r̂, m₁ से m₂ तक का एकांक सदिश है तथा r = r₂−r₁।
समीकरण (7.5) का अनुप्रयोग बिंदु द्रव्यमानों पर होता है। यदि हमारे पास बिंदु द्रव्यमानों का कोई संचयन हो, तो अध्यारोपण सिद्धांत के अनुसार, किसी एक बिंदु द्रव्यमान पर बल, अन्य सभी बिंदु द्रव्यमानों के कारण लगने वाले गुरुत्वीय बलों के सदिश योग के बराबर होता है:
किसी समबाहु त्रिभुज ABC के प्रत्येक शीर्ष पर m kg के तीन समान द्रव्यमान रखे हैं। (a) इस त्रिभुज के केन्द्रक G पर रखे 2m kg के द्रव्यमान पर कितना बल कार्य करता है? (b) यदि शीर्ष A पर रखे द्रव्यमान को दो गुना कर दिया जाए, तो कितना बल कार्य करेगा? AG=BG=CG=1m लीजिए।
हल (a): धनात्मक x-अक्ष तथा GC के बीच का कोण 30° है, और इतना ही कोण ऋणात्मक x-अक्ष तथा GB के बीच होता है।
FGB = Gm(2m)/1 (−î cos30° − ĵ sin30°)
FGC = Gm(2m)/1 (+î cos30° − ĵ sin30°)
अध्यारोपण सिद्धांत व सदिश योग नियम से परिणामी बल:
सममिति के आधार पर भी यह अपेक्षित है कि सममित त्रिभुज के केन्द्र पर तीन समान द्रव्यमानों के आकर्षण परस्पर निरस्त हो जाएँ।
(b) यदि शीर्ष A पर द्रव्यमान 2m हो तो F'GA = G(2m)(2m)/1 ĵ = 4Gm² ĵ, तथा F'GB=FGB, F'GC=FGC:
उत्तर: (a) FR = 0 (सममिति से); (b) F'R = 2Gm² ĵ (y-दिशा में)
विस्तारित पिंडों के लिए दो विशिष्ट परिणाम
- किसी एकसमान घनत्व के खोखले गोलीय खोल तथा खोल के बाहर स्थित किसी बिंदु द्रव्यमान के बीच आकर्षण बल ठीक उतना ही होता है, जितना कि खोल के समस्त द्रव्यमान को उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित मानकर ज्ञात किया जाता है।
- एकसमान घनत्व के खोखले गोले के कारण उसके भीतर स्थित किसी बिंदु द्रव्यमान पर आकर्षण बल शून्य होता है (खोल के विभिन्न क्षेत्र भीतर स्थित बिंदु द्रव्यमान को विभिन्न दिशाओं में आकर्षित करते हैं, और ये बल परस्पर पूर्णतः निरस्त हो जाते हैं)।
7.4 गुरुत्वीय नियतांक
सार्वत्रिक गुरुत्वीय स्थिरांक G के मान को प्रायोगिक आधार पर ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार का प्रयोग सर्वप्रथम अंग्रेज वैज्ञानिक हेनरी कैवेन्डिश ने 1797 में किया था।
छड़ AB के दोनों सिरों पर दो छोटे सीसे के गोले जुड़े होते हैं, जिसे एक पतले तार द्वारा दृढ़ टेक से निलंबित किया जाता है। छड़ पर कोई नेट बल नहीं लगता, परंतु एक बल आघूर्ण कार्य करता है। इस बल आघूर्ण के कारण निलंबन तार में तब तक ऐंठन आती है जब तक प्रत्यानयन बल आघूर्ण गुरुत्वीय बल आघूर्ण के बराबर नहीं हो जाता।
θ का प्रेक्षण करके इस समीकरण की सहायता से G का मान परिकलित किया जा सकता है। कैवेन्डिश प्रयोग के बाद G के मापन में परिष्करण हुए तथा अब G का प्रचलित मान:
7.5 पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण
पृथ्वी को गोल होने के कारण बहुत से संकेन्द्री गोलीय खोलों का मिलकर बना माना जा सकता है। पृथ्वी के बाहर किसी भी बिंदु पर, गुरुत्वाकर्षण बल को यही मानकर ज्ञात किया जाता है कि पृथ्वी का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित है।
यह मानते हैं कि समस्त पृथ्वी का घनत्व एकसमान है, अतः इसका द्रव्यमान ME = (4/3)πRE³ρ है। इससे:
यदि द्रव्यमान m पृथ्वी के पृष्ठ पर स्थित है (r=RE):
द्रव्यमान m द्वारा अनुभव किया जाने वाला त्वरण, जिसे g से निर्दिष्ट किया जाता है:
g सहज ही मापन योग्य है, RE एक ज्ञात राशि है। कैवेन्डिश-प्रयोग द्वारा प्राप्त G की माप, g तथा RE के ज्ञान के साथ सम्मिलित करने पर ME का आकलन किया जा सकता है — यही कारण है कि कैवेन्डिश के बारे में एक प्रचलित कथन है कि "कैवेन्डिश ने पृथ्वी को तोला"।
7.6 पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे तथा ऊपर गुरुत्वीय त्वरण
पृष्ठ से ऊँचाई h पर
h ≪ RE के लिए द्विपद व्यंजक का उपयोग करने पर:
अतः कम ऊँचाई h के लिए g का मान गुणक (1−2h/RE) द्वारा घटता है।
पृष्ठ के नीचे गहराई d पर
गहराई d की बाह्य खोल के कारण आरोपित बल शून्य होता है (खोखले गोले के परिणाम से)। केवल (RE−d) त्रिज्या के छोटे गोले के कारण बल कार्य करता है:
7.7 गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा
गुरुत्व बल एक संरक्षी बल है — जिन बलों द्वारा किया गया कार्य चले गए पथों पर निर्भर नहीं करता, वे बल संरक्षी बल होते हैं तथा केवल ऐसे बलों के लिए ही किसी पिंड की स्थितिज ऊर्जा की कोई सार्थक परिभाषा संभव होती है।
पृथ्वी के पृष्ठ के निकट (जहाँ g व्यावहारिक दृष्टि से नियत रहता है), h ऊँचाई तक ले जाने में किया गया कार्य W₁₂ = mg(h₂−h₁), जिससे स्थितिज ऊर्जा W(h) = mgh + W₀ मिलती है। परंतु यादृच्छिक दूरियों के लिए यह सन्निकटन प्रामाणिक नहीं रहता।
पृथ्वी के बाहर किसी दूरी r पर स्थित किसी द्रव्यमान को r₁ से r₂ तक ऊपर उठाने में किए गए कार्य का परिकलन करने पर:
पूर्व विवेचन के आधार पर, m₁ एवं m₂ द्रव्यमान के एक-दूसरे से r दूरी पर रखे दो कणों की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा है:
l भुजा के किसी वर्ग के शीर्षों पर स्थित चार कणों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए। वर्ग के केंद्र पर विभव भी ज्ञात कीजिए।
हल: प्रत्येक कण का द्रव्यमान m तथा वर्ग की भुजा l है। हमारे पास l दूरी वाले 4 द्रव्यमान-युग्म तथा √2 l दूरी वाले 2 द्रव्यमान-युग्म हैं। अतः निकाय की स्थितिज ऊर्जा:
वर्ग के केंद्र (r=√2 l/2) पर गुरुत्वीय विभव:
उत्तर: स्थितिज ऊर्जा = −5.41 Gm²/l; केंद्र पर विभव = −4√2 Gm/l
7.8 पलायन चाल
वह न्यूनतम चाल जिससे कोई पिंड सदा के लिए पृथ्वी के गुरुत्वीय खिंचाव से बाहर निकल सकता है।
ऊर्जा संरक्षण नियम से: यदि पिंड को (h+RE) ऊँचाई से आरंभिक चाल Vi से फेंका जाए, और वह अनन्त तक पहुँच सके (अनन्त पर चाल Vf≥0), तो ऊर्जा संरक्षण से:
चूँकि दायाँ पक्ष धनात्मक है, Vi का न्यूनतम मान उस प्रकरण के तदनुरूपी है जिसमें बायाँ पक्ष शून्य के बराबर हो:
यदि पिंड को पृथ्वी के पृष्ठ से छोड़ा जाता है (h=0):
संख्यात्मक मान रखने पर (Vi)min ≈ 11.2 km/s प्राप्त होता है। इसे पलायन चाल कहते हैं।
समान त्रिज्या R परंतु M तथा 4M द्रव्यमान के दो एकसमान ठोस गोले इस प्रकार रखे हैं कि इनके केन्द्रों के बीच पृथकन 6R है। दोनों गोले स्थिर रखे गए हैं। m द्रव्यमान के किसी प्रक्षेप्य को M द्रव्यमान के गोले के पृष्ठ से 4M द्रव्यमान के गोले के केन्द्र की ओर सीधे प्रक्षेपित किया जाता है। प्रक्षेप्य की उस न्यूनतम चाल के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए जिससे फेंके जाने पर वह दूसरे गोले के पृष्ठ पर पहुँच जाए।
हल: प्रक्षेप्य पर दो गोलों के परस्पर विरोधी गुरुत्वीय बल कार्य करते हैं। उदासीन बिन्दु N वह बिंदु है जहाँ दोनों बल यथार्थतः एक-दूसरे को निरस्त करते हैं। यदि ON=r है, तो:
इससे r=2R अथवा r=−6R प्राप्त होता है — इस उदाहरण में उदासीन बिन्दु r=−6R हमसे संबंधित नहीं है। अतः ON=r=2R।
कण को उस चाल से प्रक्षेपित करना पर्याप्त है जो उसे N तक पहुँचने योग्य बना दे। M द्रव्यमान के गोले के पृष्ठ पर यांत्रिक ऊर्जा:
उदासीन बिन्दु N पर कण की चाल शून्य की ओर प्रवृत्त होती है, अतः N पर ऊर्जा शुद्ध रूप से स्थितिज ऊर्जा होती है:
यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण नियमानुसार:
उत्तर: न्यूनतम चाल v = √(3GM/5R)
7.9 भू उपग्रह
भू उपग्रह वे पिंड हैं जो पृथ्वी के परित: परिक्रमण करते हैं। इनकी गतियाँ, ग्रहों की सूर्य के परित: गतियों के बहुत समान होती हैं, अतः केप्लर के ग्रहीय गति नियम इन पर भी समान रूप से लागू होते हैं। पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा है, जिसकी कक्षा लगभग वृत्ताकार है तथा परिक्रमण-काल लगभग 27.3 दिन है।
पृथ्वी के केन्द्र से (RE+h) दूरी पर स्थित वृत्तीय कक्षा में गतिमान उपग्रह के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा प्रदान किया जाता है:
जब h=0, तो उपग्रह की चाल V = √(GME/RE) = √(gRE) (7.36)
प्रत्येक कक्षा में उपग्रह 2π(RE+h) दूरी तय करता है, अतः इसका आवर्तकाल:
पृथ्वी के पृष्ठ के अति निकट भू उपग्रहों के लिए (h नगण्य):
संख्यात्मक मान रखने पर T₀ ≈ 85 मिनट प्राप्त होता है।
मंगल ग्रह के फोबोस तथा डेल्मोस नामक दो चन्द्रमा हैं। (i) यदि फोबोस का आवर्तकाल 7 घंटे 39 मिनट तथा कक्षीय त्रिज्या 9.4×10³ km है तो मंगल का द्रव्यमान परिकलित कीजिए। (ii) यह मानते हुए कि पृथ्वी तथा मंगल सूर्य के परित: वृत्तीय कक्षाओं में परिक्रमण कर रहे हैं तथा मंगल की कक्षा की त्रिज्या पृथ्वी की कक्षा की त्रिज्या की 1.52 गुनी है, तो मंगल-वर्ष की अवधि दिनों में क्या है?
हल (i): समीकरण (7.38) का उपयोग ME को Mm से प्रतिस्थापित करते हुए:
T = 7h 39min = 459×60 s, R=9.4×10³ km=9.4×10⁶ m
(ii) केप्लर के आवर्तकालों के नियम से:
उत्तर: (i) Mमंगल = 6.48×10²³ kg; (ii) मंगल-वर्ष = 684 दिन
पृथ्वी को तोलना: आपको निम्नलिखित आंकड़े दिए गए हैं: g=9.81 m s⁻², RE=6.37×10⁶ m, पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी R=3.84×10⁸ m, पृथ्वी के परित: चन्द्रमा के परिक्रमण का आवर्त काल = 27.3 दिन। दो भिन्न विधियों द्वारा पृथ्वी का द्रव्यमान प्राप्त कीजिए।
हल (i) पहली विधि (समीकरण 7.12 से):
(ii) दूसरी विधि (केप्लर के आवर्तकालों के नियम से):
उत्तर: दोनों विधियों से लगभग समान उत्तर प्राप्त होते हैं, जिनमें 1% से भी कम का अंतर है।
समीकरण (7.38) में स्थिरांक k को दिनों तथा किलोमीटरों में व्यक्त कीजिए। k=10⁻¹³ s² m⁻³ है। चन्द्रमा पृथ्वी से 3.84×10⁵ km दूर है। चन्द्रमा के परिक्रमण के आवर्तकाल को दिनों में प्राप्त कीजिए।
हल: हम जानते हैं कि k=10⁻¹³ s² m⁻³। इकाइयों को बदलने पर:
समीकरण (7.38) तथा k के दिए गए मान का उपयोग करने पर चन्द्रमा के परिक्रमण का आवर्तकाल:
उत्तर: T = 27.3 दिन
7.10 कक्षा में गतिशील उपग्रह की ऊर्जा
समीकरण (7.35) का उपयोग करने पर वृत्ताकार कक्षा में चाल v से गतिशील उपग्रह की गतिज ऊर्जा:
अनन्त पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य मानें, तब पृथ्वी के केन्द्र से (R+h) दूरी पर उपग्रह की स्थितिज ऊर्जा:
400 kg द्रव्यमान का कोई उपग्रह पृथ्वी के परित: 2RE त्रिज्या की वृत्तीय कक्षा में परिक्रमण कर रहा है। इसे 4RE की वृत्तीय कक्षा में स्थानांतरित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा परिकलित कीजिए। इसकी गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा में कितने परिवर्तन होंगे?
हल: आरंभ में Ei = −GMEm/4RE; अंत में Ef = −GMEm/8RE। कुल ऊर्जा में परिवर्तन:
गतिज ऊर्जा घट जाती है और यह ΔE की अनुहारक है, अर्थात् ΔK = Kf−Ki = −3.13×10⁹ J।
स्थितिज ऊर्जा में होने वाला परिवर्तन कुल ऊर्जा का दो गुना है, अर्थात् ΔV = Vf−Vi = −6.25×10⁹ J।
उत्तर: ΔE = 3.13×10⁹ J; ΔK = −3.13×10⁹ J; ΔV = −6.25×10⁹ J
✦ एक-पंक्ति तथ्य सूची
अध्याय के हर वे तथ्य व सूत्र जो प्रश्न हल करने के लिए आवश्यक हैं — त्वरित पुनरावलोकन हेतु।
§ सारांश
1. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम
F = Gm₁m₂/r², G = 6.672×10⁻¹¹ N m² kg⁻²। बलों का योग अध्यारोपण सिद्धांत द्वारा।
2. केप्लर के ग्रहगति नियम
दीर्घवृत्तीय कक्षाएँ, समान क्षेत्रफल-समान समय, T²∝a³। वृत्तीय कक्षा में T²=(4π²/GMs)R³।
3. गुरुत्वीय त्वरण
g(h) = GME/(RE+h)² ≈ GME/RE²(1−2h/RE); g(d) = g(0)(1−d/RE)।
4. गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा
V = −Gm₁m₂/r; r→∞ पर V=0। निकाय की कुल स्थितिज ऊर्जा सभी युग्मों के योग से।
5. उपग्रह की कुल ऊर्जा
E = −GMm/2a (परिबद्ध निकाय के लिए ऋणात्मक); K.E = GMm/2a, V = −GMm/a।
6. पलायन चाल
v_e = √(2GME/RE) = √(2gRE) ≈ 11.2 km/s।
7. गोलीय खोल का सिद्धांत
बाहर स्थित कण के लिए द्रव्यमान केंद्र पर संकेंद्रित; भीतर स्थित कण पर बल शून्य (एकसमान खोल के लिए)।
महत्वपूर्ण राशियाँ
| भौतिक राशि | प्रतीक | विमाएँ | मात्रक | टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|
| गुरुत्वीय स्थिरांक | G | [M⁻¹L³T⁻²] | N m² kg⁻² | 6.67×10⁻¹¹ |
| गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा | V(r) | [ML²T⁻²] | J | −GMm/r (अदिश) |
| गुरुत्वीय विभव | U(r) | [L²T⁻²] | J kg⁻¹ | −GM/r (अदिश) |
| गुरुत्वीय तीव्रता | E/g | [LT⁻²] | m s⁻² | (GM/r²)r̂ (सदिश) |
§ विचारणीय विषय
- किसी पिंड की किसी अन्य पिंड के गुरुत्वीय प्रभाव के अंतर्गत गति का अध्ययन करते समय निम्नलिखित राशियाँ संरक्षित रहती हैं: (a) कोणीय संवेग, (b) कुल यांत्रिक ऊर्जा। रैखिक संवेग संरक्षित नहीं होता।
- कोणीय संवेग संरक्षण, केप्लर के द्वितीय नियम की ओर उन्मुख कराता है। तथापि यह गुरुत्वाकर्षण के व्युत्क्रम वर्ग नियम के लिए विशिष्ट नहीं है — यह किसी भी केन्द्रीय बल पर लागू होता है।
- केप्लर के तृतीय नियम T² = KS R³ में स्थिरांक KS वृत्तीय कक्षाओं में गति करने वाले प्रत्येक ग्रह के लिए समान होता है। यह ग्रहों के अनुसार परिवर्तित नहीं होता। पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों पर भी यही टिप्पणी लागू होती है।
- अंतरिक्ष उपग्रहों में अंतरिक्ष यात्री भारहीनता का अनुभव करते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि अंतरिक्ष की उस अवस्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल कम होता है; वरन इसका कारण यह है कि अंतरिक्ष यात्री तथा उपग्रह दोनों ही पृथ्वी की ओर स्वतंत्रतापूर्वक गिरते हैं।
- दूरी R के पृथकन वाले दो बिन्दुओं से संबद्ध गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा V = −Gm₁m₂/r + स्थिरांक। इस स्थिरांक के चयन से गुरुत्वीय बल परिवर्तित नहीं होता — शून्य चुनना सरलतम चयन है।
- किसी पिंड की कुल यांत्रिक ऊर्जा, इसकी गतिज ऊर्जा (जो सदैव धनात्मक होती है) तथा स्थितिज ऊर्जा का योग होती है। अनन्त के सापेक्ष, किसी पिंड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक होती है। किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है।
- स्थितिज ऊर्जा के लिए प्रायः दिखाई देने वाला व्यंजक mgh वस्तुतः, ऊपर बिंदु 6 में स्पष्ट किए अनुसार, गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जाओं के अंतर का एक सन्निकट मान है।
- यद्यपि दो बिन्दुओं के बीच गुरुत्वाकर्षण बल केन्द्रीय है, तथापि दो परिमित दृढ़ पिंडों के बीच लगने वाले बल का इन दोनों द्रव्यमानों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होना आवश्यक नहीं है। किसी गोलीय सममित पिंड के लिए यह बल केन्द्रीय होता है।
- गोलीय खोल के भीतर किसी कण बिन्दु पर गुरुत्वीय बल शून्य होता है। तथापि (किसी धात्विक खोल के विपरीत, जो विद्युत बलों से परिरक्षण करता है) यह खोल अपने से बाहर स्थित दूसरे पिंडों को गुरुत्वीय बलों के आरोपित होने से अपने भीतर स्थित कणों का परिरक्षण नहीं करता। गुरुत्वीय परिरक्षण संभव नहीं है।
✏️ NCERT अभ्यास प्रश्न — पूर्ण हल (7.1 – 7.21)
हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।
7.1 निम्नलिखित के उत्तर दीजिए: (a) आप किसी आवेश का वैद्युत बलों से परिरक्षण, उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिंड का परिरक्षण, निकट में रखे पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साधनों द्वारा कर सकते हैं? (b) पृथ्वी के परित: परिक्रमण करने वाले छोटे अंतरिक्षयान में बैठा कोई अंतरिक्ष यात्री गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परित: परिक्रमण करने वाला अंतरिक्ष स्टेशन आकार में बड़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है? (c) यदि आप पृथ्वी पर सूर्य के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएंगे कि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा के खिंचाव की तुलना में अधिक है, तथापि चन्द्रमा के खिंचाव का ज्वारीय प्रभाव सूर्य के ज्वारीय प्रभाव से अधिक है। क्यों?
(a) नहीं, गुरुत्वाकर्षण बल से परिरक्षण संभव नहीं है। विद्युत परिरक्षण संभव है क्योंकि आवेश धनात्मक और ऋणात्मक दोनों हो सकते हैं (विपरीत आवेश निरस्त कर सकते हैं), परंतु द्रव्यमान सदैव धनात्मक होता है — कोई ऋणात्मक द्रव्यमान नहीं होता जो गुरुत्वीय बल को निरस्त कर सके। अतः खोखले गोले में रखने से भी गुरुत्वीय प्रभाव से बचाव नहीं होगा।
(b) छोटे अंतरिक्षयान में अंतरिक्ष यात्री तथा यान दोनों समान त्वरण से गिरते हैं (मुक्त पतन), इसलिए यात्री गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर पाता (भारहीनता)। यदि अंतरिक्ष स्टेशन आकार में बड़ा हो, तो स्टेशन के विभिन्न भागों पर गुरुत्वीय क्षेत्र में सूक्ष्म अंतर (ज्वारीय प्रभाव) होगा — अतः बड़े स्टेशन में यात्री गुरुत्व बल का संसूचन (ज्वारीय प्रभावों के माध्यम से) कर सकता है।
(c) सूर्य का पूर्ण गुरुत्वीय आकर्षण बल (F∝M/r²) चन्द्रमा से अधिक है क्योंकि सूर्य का द्रव्यमान बहुत अधिक है। परंतु ज्वारीय प्रभाव गुरुत्वीय क्षेत्र की प्रवणता (gradient) पर निर्भर करता है, जो 1/r³ के अनुक्रमानुपाती होता है, न कि 1/r² के। चूँकि चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत निकट है (सूर्य की तुलना में), r³ के हर में यह निकटता प्रभावी हो जाती है, और चन्द्रमा का ज्वारीय प्रभाव सूर्य से अधिक हो जाता है, यद्यपि उसका पूर्ण आकर्षण बल कम है।
7.2 सही विकल्प का चयन कीजिए: (a) बढ़ती तुंगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है। (b) बढ़ती गहराई के साथ (पृथ्वी को एकसमान घनत्व का गोला मानकर) गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है। (c) गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान/पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। (d) पृथ्वी के केन्द्र से r₂ तथा r₁ दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जा-अंतर के लिए सूत्र −GMm(1/r₂−1/r₁), सूत्र mg(r₂−r₁) से अधिक/कम यथार्थ है।
(a) घटता है। g(h)=GME/(RE+h)² — ऊँचाई h बढ़ने पर हर बढ़ता है, अतः g घटता है।
(b) घटता है। g(d)=g(1−d/RE) — गहराई d बढ़ने पर गुणक (1−d/RE) घटता है, अतः g घटता है।
(c) पृथ्वी के द्रव्यमान पर निर्भर करता है, पिंड के द्रव्यमान पर नहीं। g=GME/RE² सूत्र में गिरने वाले पिंड का द्रव्यमान (m) सम्मिलित ही नहीं है — इसीलिए सभी पिंड (चाहे उनका द्रव्यमान कुछ भी हो) समान त्वरण g से गिरते हैं (गैलीलियो का अवलोकन)।
(d) अधिक यथार्थ है। −GMm(1/r₂−1/r₁) सटीक सूत्र है जो किसी भी दूरी के लिए वैध है, जबकि mg(r₂−r₁) केवल एक सन्निकटन है जो तभी वैध है जब r₂,r₁ पृथ्वी की त्रिज्या के बहुत निकट हों।
7.3 मान लीजिए एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के परित: पृथ्वी की तुलना में दो गुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है?
माना ग्रह की कक्षीय त्रिज्या R तथा चाल v है। आवर्तकाल T = 2πR/v। केप्लर के तृतीय नियम से T²∝R³:
यदि vग्रह = 2vपृथ्वी:
उत्तर: ग्रह की कक्षा का आमाप पृथ्वी की कक्षा का 1/4 गुना है।
7.4 बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो (Io), की कक्षीय अवधि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिज्या 4.22×10⁸ m है। यह दर्शाइए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।
T = 1.769 दिन = 1.769×24×3600 s = 152841.6 s; R = 4.22×10⁸ m
बृहस्पति का द्रव्यमान MJ = 4π²R³/(GT²) (Io बृहस्पति का उपग्रह है, केप्लर के आवर्तकाल नियम से):
MJ = (4π²×7.515×10²⁵)/(6.67×10⁻¹¹×(152841.6)²)
सूर्य का द्रव्यमान Msun ≈ 2×10³⁰ kg। अतः:
उत्तर: M_बृहस्पति ≈ 1.90×10²⁷ kg ≈ (1/1000)×M_सूर्य — सिद्ध
7.5 मान लीजिए कि हमारी आकाशगंगा में एक सौर द्रव्यमान के 2.5×10¹¹ तारे हैं। मंदाकिनी के केन्द्र से 50,000 ly दूरी पर स्थित कोई तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में कितना समय लेगा? आकाशगंगा का व्यास 10⁵ ly लीजिए।
यहाँ हम मानते हैं कि आकाशगंगा का कुल द्रव्यमान (2.5×10¹¹ सौर द्रव्यमान) केन्द्र पर संकेंद्रित है, और तारा उसके परित: कक्षा में परिक्रमण करता है (जैसे कोई ग्रह सूर्य के परित:)।
M = 2.5×10¹¹×1.989×10³⁰ kg ≈ 4.97×10⁴¹ kg
R = 50,000 ly = 5×10⁴×9.46×10¹⁵ m = 4.73×10²⁰ m
केप्लर के आवर्तकालों के नियम से: T² = 4π²R³/(GM)
T² = (4π²×1.058×10⁶²)/(6.67×10⁻¹¹×4.97×10⁴¹) ≈ 1.26×10³² s²
उत्तर: तारे को एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 3.6×10⁸ वर्ष (36 करोड़ वर्ष) लगेंगे।
7.6 सही विकल्प का चयन कीजिए: (a) यदि स्थितिज ऊर्जा का शून्य अनन्त पर है, तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है। (b) कक्षा में परिक्रमा करने वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा, समान ऊंचाई के किसी स्थिर पिंड को पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक/कम होती है।
(a) उपग्रह की कुल ऊर्जा E=K.E+P.E, तथा K.E=−½P.E (यानी P.E=−2K.E) होता है। अतः:
अतः कुल ऊर्जा गतिज ऊर्जा का ऋणात्मक है।
(b) कक्षा में परिक्रमारत उपग्रह की कुल ऊर्जा Eकक्षा = −GMm/2r; इसे हटाने के लिए ऊर्जा = GMm/2r। समान ऊंचाई पर स्थिर पिंड (वेग=0) की कुल ऊर्जा = −GMm/r; इसे हटाने के लिए ऊर्जा = GMm/r। चूंकि GMm/2r < GMm/r, अतः कक्षा में परिक्रमारत उपग्रह को हटाने के लिए कम ऊर्जा चाहिए (उपग्रह के पास पहले से गतिज ऊर्जा है)।
7.7 क्या किसी पिंड की पृथ्वी से पलायन चाल (a) पिंड के द्रव्यमान, (b) प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्थिति, (c) प्रक्षेपण की दिशा, (d) पिंड के प्रमोचन की अवस्थिति की ऊंचाई पर निर्भर करती है?
पलायन चाल का सूत्र: ve = √(2GME/R), जहाँ R प्रक्षेपण बिंदु की पृथ्वी के केन्द्र से दूरी है।
(a) पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती। सूत्र में पिंड का द्रव्यमान m सम्मिलित ही नहीं है (यह ऊर्जा संरक्षण समीकरण में निरस्त हो जाता है)।
(b) प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्थिति (R) पर निर्भर करती है। R जितना बड़ा, पलायन चाल उतनी ही कम होगी।
(c) प्रक्षेपण की दिशा पर निर्भर नहीं करती (वायु प्रतिरोध की उपेक्षा करते हुए) — क्योंकि यह केवल ऊर्जा संरक्षण पर आधारित है।
(d) प्रमोचन बिंदु की ऊँचाई पर निर्भर करती है (यह भाग (b) के समान ही है, क्योंकि ऊँचाई सीधे R=RE+h को प्रभावित करती है)।
7.8 कोई धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा अत्यधिक दीर्घवृत्तीय कक्षा में कर रहा है। क्या अपनी कक्षा में धूमकेतु की शुरू से अंत तक (a) रैखिक चाल, (b) कोणीय चाल, (c) कोणीय संवेग, (d) गतिज ऊर्जा, (e) स्थितिज ऊर्जा (f) कुल ऊर्जा नियत रहती है।
गुरुत्वाकर्षण एक केन्द्रीय बल है, अतः इसके अंतर्गत गति में कोणीय संवेग (c) संरक्षित रहता है (केप्लर के द्वितीय नियम के अनुसार)। साथ ही, यह एक संरक्षी बल है, इसलिए कुल यांत्रिक ऊर्जा (f) भी संरक्षित रहती है।
परंतु दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य से दूरी लगातार बदलती रहती है — उपसौर पर तेज़, अपसौर पर धीमी गति। इसलिए (a) रैखिक चाल, (b) कोणीय चाल, (d) गतिज ऊर्जा, (e) स्थितिज ऊर्जा — ये सभी नियत नहीं रहते, कक्षा में स्थिति के अनुसार बदलते हैं।
7.9 निम्नलिखित में से कौन से लक्षण अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्री के लिए दुखदायी हो सकते हैं? (a) पैरों में सूजन, (b) चेहरे पर सूजन, (c) सिरदर्द, (d) दिक्विन्यास समस्या।
शून्य गुरुत्व (भारहीनता) की अवस्था में, शरीर के तरल पदार्थ पृथ्वी पर की तरह पैरों की ओर नहीं खिंचते — वे शरीर के ऊपरी भाग (सिर व चेहरे) की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं। इससे (b) चेहरे पर सूजन, (c) सिरदर्द, (d) दिक्विन्यास समस्या होते हैं। जबकि (a) पैरों में सूजन नहीं होती — इसके विपरीत, भारहीनता में तरल पैरों से दूर हट जाता है।
7.10 एकसमान द्रव्यमान घनत्व की अर्धगोलीय खोलों द्वारा परिभाषित ढोल के पृष्ठ के केन्द्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा किस तीर द्वारा दर्शायी जाएगी?
दिया गया आकार अर्धगोलीय खोल से बना "ढोल" जैसा पात्र है। बिंदु C इस अर्धगोलीय खोल के समतल खुले मुख के केंद्र पर स्थित है। चूंकि द्रव्यमान केवल नीचे के अर्धगोलीय भाग में वितरित है, सममिति अक्ष के अनुदिश शुद्ध गुरुत्वीय बल शून्य नहीं होता — यह अर्धगोले के भीतर की ओर (द्रव्यमान की दिशा में) निर्देशित होता है।
उत्तर: सही विकल्प (iii) c — गुरुत्वीय तीव्रता ढोल के भीतर की ओर (सममिति अक्ष के अनुदिश) निर्देशित होती है।
7.11 उपरोक्त समस्या में किसी यादृच्छिक बिन्दु P पर गुरुत्वीय तीव्रता किस तीर (i) d, (ii) e, (iii) f, (iv) g द्वारा व्यक्त की जाएगी?
बिंदु P अर्धगोलीय खोल के वक्र पृष्ठ पर स्थित एक सामान्य बिंदु है। P पर कुल गुरुत्वीय तीव्रता, खोल के सभी अवयवों के योगदान का सदिश योग है — दिए गए चित्र में मानक अभिविन्यास के अनुसार, यह गोले के केंद्र की दिशा में (आंतरिक/नीचे की ओर झुका हुआ) निर्देशित होता है, जो चित्र में तीर "f" द्वारा दर्शाया गया है।
उत्तर: सही विकल्प (iii) f।
7.12 पृथ्वी से किसी रॉकेट को सूर्य की ओर दागा गया है। पृथ्वी के केन्द्र से किस दूरी पर रॉकेट पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है? सूर्य का द्रव्यमान = 2×10³⁰ kg, पृथ्वी का द्रव्यमान = 6×10²⁴ kg। कक्षीय त्रिज्या = 1.5×10¹¹ m।
माना उदासीन बिंदु (जहाँ दोनों बल बराबर व विपरीत हैं) पृथ्वी के केंद्र से x दूरी पर है (सूर्य की दिशा में)। कुल दूरी d=1.5×10¹¹ m।
उत्तर: पृथ्वी के केन्द्र से लगभग 2.6×10⁸ m दूरी पर (सूर्य की दिशा में) गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है।
7.13 आप सूर्य को कैसे तोलेंगे, अर्थात् उसके द्रव्यमान का आकलन कैसे करेंगे? सूर्य के परित: पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिज्या 1.5×10⁸ km है।
पृथ्वी सूर्य के परित: वृत्तीय कक्षा में परिक्रमण करती है, अतः केप्लर के तृतीय नियम का उपयोग करते हैं: T² = 4π²R³/(GMsun)
R = 1.5×10⁸ km = 1.5×10¹¹ m; T = 1 वर्ष = 3.156×10⁷ s
Msun = (4π²×3.375×10³³)/(6.67×10⁻¹¹×(3.156×10⁷)²)
उत्तर: सूर्य का द्रव्यमान Msun ≈ 2.0×10³⁰ kg।
7.14 एक शनि वर्ष एक पृथ्वी-वर्ष का 29.5 गुना है। यदि पृथ्वी सूर्य से 1.5×10⁸ km दूरी पर है, तो शनि सूर्य से कितनी दूरी पर है?
केप्लर के तृतीय नियम से T²∝R³:
उत्तर: शनि सूर्य से लगभग 1.43×10⁹ km दूरी पर है।
7.15 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 63 N है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊंचाई पर पृथ्वी के कारण इस वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना है?
ऊँचाई h = RE/2, अतः (RE+h) = 1.5RE
चूँकि बल भार के अनुपात में बदलता है (F=mg):
उत्तर: इस ऊँचाई पर गुरुत्वीय बल = 28 N।
7.16 यह मानते हुए कि पृथ्वी एकसमान घनत्व का एक गोला है तथा इसके पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 250 N है, यह ज्ञात कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी पर इस वस्तु का भार क्या होगा?
पृथ्वी के केंद्र की ओर आधी दूरी का अर्थ है — पृष्ठ से गहराई d=RE/2 पर।
गहराई के सूत्र g(d)=g(1−d/RE) से d=RE/2 पर:
उत्तर: आधी दूरी पर वस्तु का भार = 125 N।
7.17 पृथ्वी के पृष्ठ से ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर कोई रॉकेट 5 km s⁻¹ की चाल से दागा जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट पृथ्वी से कितनी दूरी तक जाएगा? पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0×10²⁴ kg; पृथ्वी की माध्य त्रिज्या = 6.4×10⁶ m; G = 6.67×10⁻¹¹ N m² kg⁻²।
ऊर्जा संरक्षण से (अधिकतम दूरी rmax पर चाल शून्य होगी):
GM = 6.67×10⁻¹¹×6.0×10²⁴ = 4.002×10¹⁴; v² = (5×10³)² = 2.5×10⁷
1/R = 1/(6.4×10⁶) = 1.5625×10⁻⁷
यह पृथ्वी के केंद्र से दूरी है। पृष्ठ से ऊँचाई = 8.0×10⁶ − 6.4×10⁶ = 1.6×10⁶ m
उत्तर: रॉकेट पृथ्वी के पृष्ठ से लगभग 1.6×10⁶ m (1600 km) की अधिकतम ऊँचाई तक जाएगा।
7.18 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी प्रक्षेप्य की पलायन चाल 11.2 km s⁻¹ है। किसी वस्तु को इस चाल की तीन गुनी चाल से प्रक्षेपित किया जाता है। पृथ्वी से अत्यधिक दूर जाने पर इस वस्तु की चाल क्या होगी? सूर्य तथा अन्य ग्रहों की उपस्थिति की उपेक्षा कीजिए।
vप्रक्षेपण = 3×ve = 3×11.2 = 33.6 km/s
ऊर्जा संरक्षण से (अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा=0):
चूँकि ½ve² = GM/R (पलायन चाल की परिभाषा से):
उत्तर: अत्यधिक दूर जाने पर वस्तु की चाल ≈ 31.7 km/s।
7.19 कोई उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 400 km ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इस उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा खर्च होगी? उपग्रह का द्रव्यमान = 200 kg; पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0×10²⁴ kg; पृथ्वी की त्रिज्या = 6.4×10⁶ m; G = 6.67×10⁻¹¹ N m² kg⁻²।
R+h = 6.4×10⁶+4×10⁵ = 6.8×10⁶ m
कक्षा में उपग्रह की कुल ऊर्जा: E = −GMEm/(2(R+h))
हर = 2×6.8×10⁶ = 1.36×10⁷
पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा = −E:
उत्तर: आवश्यक ऊर्जा ≈ 5.89×10⁹ J।
7.20 दो तारे, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान (2×10³⁰ kg) के बराबर है, एक दूसरे की ओर सम्मुख टक्कर के लिए आ रहे हैं। जब वे 10⁹ km दूरी पर हैं तब इनकी चाल उपेक्षणीय हैं। ये तारे किस चाल से टकराएंगे? प्रत्येक तारे की त्रिज्या 10⁴ km है।
प्रारंभिक पृथक्करण di=10⁹ km=10¹² m, अंतिम पृथक्करण (सतहें स्पर्श करते समय, दोनों त्रिज्याओं का योग) df=2×10⁴ km=2×10⁷ m।
सममिति के कारण (समान द्रव्यमान), दोनों तारे समान चाल v से एक-दूसरे की ओर गति करेंगे। ऊर्जा संरक्षण से:
चूंकि di (10¹² m) की तुलना में df (2×10⁷ m) बहुत छोटा है, 1/di नगण्य है:
उत्तर: तारे लगभग 2.58×10⁶ m/s (≈2580 km/s) की चाल से टकराएंगे।
7.21 दो भारी गोले जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 100 kg व त्रिज्या 0.10 m है, किसी क्षैतिज मेज पर एक दूसरे से 1.0 m दूरी पर स्थित हैं। दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु पर गुरुत्वीय बल तथा विभव क्या है? क्या इस बिन्दु पर रखा कोई पिंड संतुलन में होगा? यदि हाँ, तो यह संतुलन स्थायी होगा अथवा अस्थायी?
मध्य बिंदु पर प्रत्येक गोले के केंद्र से दूरी r=0.5 m।
बल: मध्य बिंदु दोनों गोलों से समान दूरी पर है, अतः दोनों गोलों के आकर्षण बल परिमाण में बराबर परंतु दिशा में विपरीत होंगे — नेट बल = शून्य।
विभव (दोनों विभव जुड़ेंगे):
संतुलन की प्रकृति: चूंकि इस बिंदु पर नेट बल शून्य है, यह एक संतुलन बिंदु है। परंतु यह संतुलन अस्थायी (unstable) होगा — यदि रखा गया पिंड किसी एक गोले की ओर थोड़ा भी विस्थापित हो जाए, तो उस निकटतम गोले का आकर्षण बल दूसरे की तुलना में अधिक हो जाएगा, जिससे पिंड उसी गोले की ओर और अधिक खिंचता चला जाएगा।
उत्तर: मध्य बिंदु पर बल = 0, विभव = −2.7×10⁻⁸ J/kg; यह संतुलन बिंदु अस्थायी (unstable) है।
➕ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, सूत्र व तुलनाएँ — ऊपर दी गई "एक-पंक्ति तथ्य सूची" व "विचारणीय विषय" से अलग।
- अक्षांश के साथ g का परिवर्तन (पृथ्वी के घूर्णन के कारण) — पृथ्वी के घूर्णन के कारण किसी अक्षांश φ पर प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण gप्रभावी = g − ω²R cos²φ होता है, जहाँ ω पृथ्वी का कोणीय वेग है — ध्रुवों (φ=90°) पर cos²φ=0, अतः g अधिकतम (लगभग 9.83 m/s²); भूमध्य रेखा (φ=0°) पर cos²φ=1, अतः g न्यूनतम (लगभग 9.78 m/s²) होता है।
- भू-स्थिर उपग्रह (Geostationary) व ध्रुवीय उपग्रह (Polar Satellite) — भू-स्थिर उपग्रह पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल में, पृथ्वी के घूर्णन की समान दिशा व समान आवर्तकाल (ठीक 24 घंटे) से परिक्रमा करता है, जिससे यह पृथ्वी से देखने पर सदैव स्थिर प्रतीत होता है — इसकी ऊँचाई पृष्ठ से लगभग 36,000 km होती है; ध्रुवीय उपग्रह अपेक्षाकृत निम्न ऊँचाई (लगभग 500–800 km) पर, ध्रुवों के ऊपर से गुजरने वाली कक्षा में परिक्रमा करता है, जिससे यह थोड़े समय में संपूर्ण पृथ्वी का सर्वेक्षण कर सकता है।
- उपग्रह की बंधन ऊर्जा (Binding Energy) — किसी उपग्रह को उसकी कक्षा से अनंत तक भेजने हेतु आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा, जो कक्षा में उसकी कुल ऊर्जा के परिमाण के ठीक बराबर परंतु धनात्मक होती है: बंधन ऊर्जा = GmME/2(RE+h) — चूँकि परिबद्ध निकाय की कुल ऊर्जा सदैव ऋणात्मक होती है, अतः बंधन ऊर्जा सदैव धनात्मक राशि होती है।
- पलायन चाल व कक्षीय चाल के मध्य संबंध — समान त्रिज्या (R) पर किसी वृत्तीय कक्षा की चाल vo = √(GM/R) होती है, जबकि उसी बिंदु से पलायन चाल ve = √(2GM/R) होती है — दोनों की तुलना करने पर ve = √2 × vo (पलायन चाल, कक्षीय चाल से सदैव ठीक √2 गुना अधिक)।
- गुरुत्वीय विभव (Gravitational Potential, V) — गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा से भिन्न एक स्वतंत्र राशि — किसी बिंदु पर गुरुत्वीय विभव, उस बिंदु पर इकाई द्रव्यमान रखने पर उत्पन्न स्थितिज ऊर्जा है — V = −GM/r (मात्रक: J/kg) — जबकि स्थितिज ऊर्जा U = −GMm/r (मात्रक: J) वास्तविक द्रव्यमान m पर निर्भर करती है — दोनों राशियों में U = m×V का संबंध होता है।
- केप्लर के नियम — आनुभविक (empirical) बनाम न्यूटन का नियम — सैद्धांतिक (theoretical) — केप्लर ने अपने तीनों नियम टायको ब्राहे के दीर्घकालिक प्रेक्षणों के विश्लेषण से आनुभविक रूप से प्रतिपादित किए; न्यूटन ने बाद में दर्शाया कि केप्लर के तीनों नियम, गुरुत्वाकर्षण के व्युत्क्रम-वर्ग नियम से गणितीय रूप से व्युत्पन्न किए जा सकते हैं — अर्थात न्यूटन का नियम, केप्लर के आनुभविक नियमों का सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है।
- न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम बनाम कूलॉम का नियम — दोनों नियम व्युत्क्रम-वर्ग रूप (F ∝ 1/r²) में समान गणितीय संरचना रखते हैं; परंतु गुरुत्वाकर्षण बल सदैव केवल आकर्षी होता है (द्रव्यमान सदैव धनात्मक), जबकि वैद्युत बल आवेशों की प्रकृति के अनुसार आकर्षी अथवा प्रतिकर्षी दोनों हो सकता है — यही कारण है कि गुरुत्वीय परिरक्षण असंभव है, जबकि वैद्युत परिरक्षण (जैसे फैराडे पिंजर) संभव है।
- ऊँचाई व गहराई के साथ g में कमी की असमान दर — पृष्ठ के निकट (h,d << RE) के लिए — ऊँचाई के लिए g(h)≈g(1−2h/RE) तथा गहराई के लिए g(d)=g(1−d/RE) — समान दूरी (h=d) के लिए, ऊपर जाने पर g में कमी की दर, नीचे जाने पर होने वाली कमी की दर से दोगुनी होती है।
- पृथ्वी के केंद्र पर भार शून्य — गहराई d पर g(d) = g(1−d/RE) सूत्र में d = RE रखने पर g(केंद्र) = 0 प्राप्त होता है — अर्थात पृथ्वी के केंद्र पर किसी पिंड का भार शून्य हो जाता है (यद्यपि उसका द्रव्यमान अपरिवर्तित रहता है)।
- पलायन चाल की स्वतंत्रता — प्रक्षेपण-दिशा से व प्रक्षेपण-पथ के आकार से — पलायन चाल न तो प्रक्षेपण की दिशा पर निर्भर करती है, न ही पिंड द्वारा अपनाए गए वास्तविक पथ के आकार पर — यह केवल प्रक्षेपण-बिंदु की पृथ्वी-केंद्र से दूरी (R) पर निर्भर करती है।
- कक्षीय चाल की द्रव्यमान-स्वतंत्रता — किसी उपग्रह की वृत्तीय कक्षीय चाल vo का सूत्र उपग्रह के अपने द्रव्यमान (m) पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता — यह केवल पृथ्वी के द्रव्यमान (ME) व कक्षा की त्रिज्या पर निर्भर करता है।
- प्रथम कृत्रिम उपग्रह — ऐतिहासिक तथ्य — विश्व का पहला सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 था, जिसे तत्कालीन सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर 1957 को प्रक्षेपित किया — इसी घटना ने अंतरिक्ष युग (Space Age) की शुरुआत को चिह्नित किया।
- कक्षा में उपग्रह की स्थिरता की शर्त — GmME/(RE+h)² = mv²/(RE+h) — इसी समीकरण से कक्षीय चाल का सूत्र सीधे व्युत्पन्न होता है; यह भी दर्शाता है कि किसी स्थिर त्रिज्या पर परिक्रमा हेतु केवल एक ही निश्चित चाल संभव है।
- केप्लर के तीसरे नियम का व्यापक रूप — जब दोनों पिंडों (जैसे द्वि-तारा निकाय) के द्रव्यमान तुलनीय हों, तो सरलीकृत रूप T² ∝ a³ के स्थान पर व्यापक सूत्र T² = 4π²a³/G(M+m) प्रयुक्त होता है।
- अपकेंद्र प्रभाव व अक्षांश-निर्भर g — भूमध्य रेखा पर अतिरिक्त प्रभाव — भूमध्य रेखा पर g सबसे कम होने के दो कारण संयुक्त रूप से कार्य करते हैं — (1) पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्री प्रभाव, तथा (2) पृथ्वी की ध्रुवों पर चपटी व भूमध्य रेखा पर उभरी हुई आकृति के कारण भूमध्य रेखा, पृथ्वी के केंद्र से ध्रुवों की तुलना में थोड़ी अधिक दूर स्थित है।
- चूँकि यह अध्याय सूत्र-सघन (formula-heavy) है, अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) g में परिवर्तन के तीनों कारण (ऊँचाई, गहराई, अक्षांश) व उनके सूत्रों को न उलझाना, (2) उपग्रह से जुड़े सभी सूत्र (कक्षीय चाल, आवर्तकाल, ऊर्जा, बंधन ऊर्जा) व इनकी त्रिज्या पर निर्भरता, (3) स्थितिज ऊर्जा व विभव के सूत्रों में m का समावेश/बहिष्करण याद रखना।
🏆 NEET/AIPMT में पूछे जा चुके प्रश्न (2000 – 2026)
इस अध्याय से पूछे गए 66 प्रश्न — कालानुक्रम में (नवीनतम पहले), विस्तृत चरण-दर-चरण हल सहित।
1 समान द्रव्यमान वाले दो ग्रह P₁ व P₂ की त्रिज्याएँ क्रमशः R₁ व R₂ हैं, जहाँ R₂=R₁/2। इनकी पलायन चालें क्रमशः v₁ व v₂ हैं। v₂/v₁ का मान? RE-NEET 2026
चरण 1: पलायन चाल v_e = √(2GM/R), समान द्रव्यमान M होने पर v_e ∝ 1/√R
चरण 2: v₂/v₁ = √(R₁/R₂) = √2
उत्तर: v₂/v₁ = √2
2 त्रिज्या R की वृत्तीय कक्षा में परिक्रमा कर रहे किसी ग्रह का परिक्रमण-काल किसके अनुक्रमानुपाती है? RE-NEET 2026
केप्लर के तृतीय नियम से T² ∝ R³ ⟹ T ∝ R^(3/2)
उत्तर: T ∝ R^(3/2)
3 द्रव्यमान m को पृथ्वी के पृष्ठ से पृथ्वी की त्रिज्या R के बराबर ऊँचाई तक उठाने में किया गया कार्य? NEET 2026
4 मंगल की कक्षा की त्रिज्या, बुध की कक्षा की त्रिज्या से लगभग 4 गुना है। मंगल का वर्ष 687 पृथ्वी-दिन का है। बुध का 1 वर्ष? NEET 2025
(T_मंगल/T_बुध)² = (R_मंगल/R_बुध)³ = 4³ = 64 ⟹ T_बुध = 687/8
उत्तर: T_बुध ≈ 86 दिन
5 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 48 N है। पृथ्वी की त्रिज्या के एक-तिहाई ऊँचाई पर इस पर गुरुत्वीय बल? NEET 2025
W(h)/W = R²/(R+h)² = R²/(4R/3)² = 9/16
उत्तर: W(h) = 48×9/16 = 27 N
6 पृथ्वी की पलायन चाल v है। किसी ग्रह का द्रव्यमान पृथ्वी से 9 गुना तथा त्रिज्या 16 गुना है। इस ग्रह की पलायन चाल? NEET 2024 (Re-Exam)
v_ग्रह/v = √[(9M/16R)/(M/R)] = √(9/16) = 3/4
उत्तर: v_ग्रह = (3/4)v
7 100 kg की वस्तु A (h=2R_E) से B (h=3R_E/2) तक गिरती है (g=10 m/s²)। भार में परिवर्तन? NEET 2024 (Re-Exam)
r_A=3R_E, r_B=2.5R_E
W_A = 1000/9 ≈ 111.1 N; W_B = 1000/6.25 = 160 N
उत्तर: ΔW ≈ 49 N
8 किसी ग्रह का द्रव्यमान पृथ्वी के 1/10 तथा व्यास आधा। गुरुत्वीय त्वरण? NEET 2024
g_ग्रह/g_पृथ्वी = (1/10)×(2)² = 0.4
उत्तर: g_ग्रह = 3.92 m/s²
9 पृथ्वी के पृष्ठ से 2R ऊँचाई पर उपग्रह को वृत्तीय कक्षा में स्थापित करने हेतु न्यूनतम ऊर्जा? NEET 2024
E_कक्षा = −GMm/6R; E_पृष्ठ = −GMm/R
उत्तर: ΔE = 5GMm/6R
10 पृथ्वी की पलायन चाल 11.2 km/s है। यदि वस्तु को 22.4 km/s से प्रक्षेपित करें, अनन्त पर चाल? NEET 2023 (Manipur)
v_अनंत² = v_प्रक्षेपण² − v_e² = (22.4)² − (11.2)² = 3×(11.2)²
उत्तर: v_अनंत = 11.2√3 km/s
11 यदि R पृथ्वी की त्रिज्या तथा g पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण हो, तो पृथ्वी का माध्य घनत्व? NEET 2023 (Manipur)
g = (4/3)πGρR
उत्तर: ρ = 3g/(4πGR)
12 द्रव्यमान m व 9m, दूरी R पर। जहाँ गुरुत्वीय क्षेत्र शून्य है, वहाँ विभव? NEET 2023
Gm/x² = G(9m)/(R−x)² ⟹ x=R/4
13 पृष्ठ के ठीक ऊपर परिक्रमा करते उपग्रह का आवर्तकाल T है। राशि 3π/(Gd) क्या निरूपित करती है (d घनत्व)? NEET 2023
T² = 4π²R³/[G×d×(4/3)πR³] = 3π/(Gd)
उत्तर: 3π/(Gd) = T² (आवर्तकाल का वर्ग)
14 गुरुत्वीय क्षेत्र में द्रव्यमान A से B तक विभिन्न पथों से। W₁, W₂, W₃ के बीच संबंध? NEET 2022 (Phase 2)
गुरुत्वीय बल संरक्षी है ⟹ कार्य पथ-स्वतंत्र
उत्तर: W₁ = W₂ = W₃
15 गुरुत्वीय विभव V = −K/x (J/kg)। बिंदु (2, 0, 3) पर गुरुत्वीय क्षेत्र तीव्रता? NEET 2022 (Phase 2)
E = −dV/dx = K/x²; x=2 पर E_x = K/4
उत्तर: E = (K/4) î (केवल x-दिशा में)
16 60 g की वस्तु 3.0 N गुरुत्वीय बल अनुभव करती है। गुरुत्वीय क्षेत्र तीव्रता? NEET 2022 (Phase 1)
E = F/m = 3.0/0.06
उत्तर: E = 50 N/kg
17 विमा मिलान: गुरुत्वीय नियतांक, स्थितिज ऊर्जा, विभव, तीव्रता NEET 2022 (Phase 1)
G=[M⁻¹L³T⁻²]; स्थितिज ऊर्जा=[ML²T⁻²]; विभव=[L²T⁻²]; तीव्रता=[LT⁻²]
18 किसी ग्रह की त्रिज्या पृथ्वी से 4 गुना, घनत्व समान। पलायन चाल? NEET 2021
v_e = R√(8πGρ/3) ⟹ v_e ∝ R
उत्तर: v_ग्रह = 4v
19 कण को υ=kV_e (k<1) चाल से प्रक्षेपित। अधिकतम ऊँचाई H? NEET 2021
½k²V_e² − GM/R = −GM/(R+H); GM/R=V_e²/2
20 वस्तु का भार 72 N, ऊँचाई R/2 पर गुरुत्वीय बल? NEET 2020 (Phase 1)
W(h)/W = R²/(1.5R)² = 4/9
उत्तर: W(h) = 72×4/9 = 32 N
21 द्रव्यमान m को ऊँचाई h=R तक उठाने में कार्य? NEET 2019
उत्तर: W = GMm/2R = mgR/2
22 भार 200 N, केंद्र की ओर आधी दूरी पर भार? NEET 2019
g(d)/g = 1 − d/R = 1/2 (d=R/2)
उत्तर: भार = 100 N
23 सूर्य का द्रव्यमान 10 गुना कम तथा G 10 गुना अधिक — कौन-सा कथन सही नहीं? NEET 2018
G×M_सूर्य का गुणनफल वही रहता है, अतः ग्रहों के परिक्रमण अप्रभावित। परंतु पृथ्वी पर g=GM_पृथ्वी/R² में केवल G बढ़ा है ⟹ g 10 गुना बढ़ेगा।
उत्तर: "पृथ्वी पर g अपरिवर्तित रहेगा" वाला कथन गलत है
24 दीर्घवृत्तीय कक्षा में KA, KB, KC का संबंध? NEET 2018
A व C दीर्घ अक्ष के सिरे, B मध्यवर्ती
उत्तर: KC > KB > KA (A अपसौर, C उपसौर मानते हुए)
25 1 km ऊँचाई पर g = गहराई d पर g। d=? NEET 2017
1−2h/R = 1−d/R ⟹ d = 2h
उत्तर: d = 2 km
26 दो अंतरिक्षयात्री गुरुत्व-मुक्त अंतरिक्ष में, संपर्क टूटा। क्या करेंगे? NEET 2017
परस्पर गुरुत्वीय आकर्षण
उत्तर: एक-दूसरे की ओर धीरे-धीरे आकर्षित होंगे
27 द्रव्यमान m का उपग्रह पृष्ठ से h ऊँचाई पर। कुल ऊर्जा? NEET 2016 (Phase 2)
E = −GMm/(2(R+h)) = −mg₀R²/[2(R+h)]
28 पृथ्वी के केंद्र से r के साथ g का ग्राफ? NEET 2016 (Phase 2)
भीतर (r<R): रैखिक वृद्धि; बाहर (r>R): 1/r² अनुसार ह्रास; अधिकतम मान r=R पर
29 v_e/v_p जब ग्रह की त्रिज्या व घनत्व दोनों 2 गुने? NEET 2016 (Phase 1)
v_e ∝ R√ρ ⟹ v_p/v_e = 2√2
उत्तर: v_e/v_p = 1/(2√2)
30 विभव V=−5.4×10⁷ J/kg, g=6.0 m/s² पर ऊँचाई? NEET 2016 (Phase 1)
R+h = −V/g = 9×10⁶ m ⟹ h = 9×10⁶ − 6.4×10⁶
उत्तर: h = 2600 km
31 उपग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षा में, संरक्षित राशियाँ? AIPMT 2015
उत्तर: कुल ऊर्जा E व कोणीय संवेग L
32 सुदूर संवेदी उपग्रह h=0.25×10⁶ m, R=6.38×10⁶ m, g=9.8 m/s²। कक्षीय चाल? AIPMT 2015
v = R√[g/(R+h)] = 6.38×10⁶×1.216×10⁻³
उत्तर: v ≈ 7.76 km/s
33 T²=Kr³ तथा F=GMm/r² — G व K का संबंध? AIPMT 2015 (Cancelled Paper)
GM/r² = 4π²r/T² ⟹ T² = 4π²r³/(GM) ⟹ K = 4π²/(GM)
उत्तर: G = 4π²/(KM)
34 r के साथ गुरुत्वीय क्षेत्र तीव्रता E का ग्राफ? AIPMT 2014
r=0 से R तक रैखिक, फिर 1/r² अनुसार ह्रास
35 पृथ्वी को ब्लैक होल बनाने हेतु संपीडित त्रिज्या? AIPMT 2014
R = 2GM/c² = 2×6.67×10⁻¹¹×5.98×10²⁴/(9×10¹⁶)
उत्तर: R ≈ 9 mm
36 ग्रह की त्रिज्या पृथ्वी से 2 गुना, घनत्व समान। V_P/V_E? NEET 2013 (Karnataka)
v_e ∝ R
उत्तर: V_P = 2V_E
37 कण 3R ऊँचाई से, वापस न लौटने की न्यूनतम चाल? NEET 2013 (Karnataka)
½v² = GM/(4R) = gR/4 ⟹ v² = gR/2
उत्तर: v = √(gR/2)
38 अनंत पिंड (2 kg प्रत्येक) 1, 2, 4, 8 m दूरी पर। मूल बिंदु पर विभव? NEET 2013
V = −2G(1+1/2+1/4+1/8+...) = −2G×2 = −4G
उत्तर: V = −2.668×10⁻¹⁰ J/kg
39 द्रव्यमान m को h=2R ऊँचाई तक, स्थितिज ऊर्जा परिवर्तन? NEET 2013
ΔU = GMm[1/R − 1/3R] = 2GMm/3R
40 v_e व v₀ (पृष्ठ के निकट कक्षीय चाल) का संबंध? AIPMT 2012 (Mains)
v₀=√(GM/R), v_e=√(2GM/R)
उत्तर: v_e = √2 × v₀
41 पतले गोलीय कोश के कारण r के साथ क्षेत्र? AIPMT 2012 (Mains)
r<R: E=0; r=R पर अचानक GM/R²; r>R: 1/r² अनुसार
42 ग्रह (द्रव्यमान M_P, व्यास D_P) के पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण? AIPMT 2012 (Prelims)
g = GM_P/(D_P/2)²
उत्तर: g = 4GM_P/D_P²
43 भार (1/16) होने की ऊँचाई? AIPMT 2012 (Prelims)
R²/(R+h)² = 1/16 ⟹ h = 3R
44 भू-स्थिर उपग्रह h=5R पर T=24h। h=2R पर T? AIPMT 2012 (Prelims)
r_भूस्थिर=6R, r_नया=3R; (T/24)² = (1/2)³ = 1/8
उत्तर: T = 24/√8 ≈ 8.49 घंटे
45 द्रव्यमान M कोश के केंद्र पर, केंद्र से a/2 दूरी पर विभव? AIPMT 2011 (Mains)
V = −2GM/a − GM/a = −3GM/a
उत्तर: |V| = 3GM/a
46 पृष्ठ से u चाल से ऊपर, वापस न लौटने की न्यूनतम चाल? AIPMT 2011 (Mains)
उत्तर: u_न्यूनतम = √(2GM/R) = √(2gR)
47 दीर्घवृत्तीय कक्षा में r₁ व r₂ पर चालें v₁, v₂। अनुपात? AIPMT 2011 (Prelims)
mv₁r₁ = mv₂r₂
उत्तर: v₁/v₂ = r₂/r₁
48 केंद्र से r के साथ g का ग्राफ? AIPMT 2010 (Mains)
भीतर रैखिक, बाहर 1/r²; अधिकतम r=R पर
49 C.G. व परिभ्रमण त्रिज्या संबंधी चार कथनों में सही युग्म? AIPMT 2010 (Mains)
उत्तर: कथन (2) व (3) सही
50 उपग्रह को R₁ से R₂ कक्षा में ले जाने की अतिरिक्त गतिज ऊर्जा? AIPMT 2010 (Mains)
ΔKE = GMm/2R₁ − GMm/2R₂ = (GMm/2)(1/R₁ − 1/R₂)
51 50 kg व्यक्ति गुरुत्व-मुक्त अंतरिक्ष में 10 m ऊँचाई पर, 0.5 kg पत्थर 2 m/s से नीचे फेंकता। पत्थर फर्श तक पहुँचने पर व्यक्ति की दूरी? AIPMT 2010 (Prelims)
v_व्यक्ति = 0.02 m/s (ऊपर); t=5s; Δx=0.1 m
उत्तर: 10.1 m
52 द्रव्यमान M कोश के केंद्र पर, a/2 दूरी पर विभव? AIPMT 2010 (Prelims)
उत्तर: |V| = 3GM/a
53 दो उपग्रह A (r=4R, 3V) व B (r=R)। B की चाल? AIPMT 2010 (Prelims)
v ∝ 1/√r; v_B/v_A = √(4R/R) = 2
उत्तर: v_B = 6V
54 छायांकित SCD = 2×SAB, t₁/t₂? AIPMT 2009
केप्लर द्वितीय नियम: t₁ = 2t₂
55 S₁ (m₁) व S₂ (m₂=4m₁) एक ही कक्षा में। कौन-सा कथन सत्य? AIPMT 2007
v=√(GM_E/r) द्रव्यमान-स्वतंत्र
उत्तर: दोनों की कक्षीय चाल बराबर
56 पृष्ठ से R ऊँचाई पर पलायन चाल fv, जहाँ v पृष्ठ की पलायन चाल। f=? AIPMT 2006
v_e(2R) = √(GM/R); v = √(2GM/R); f = 1/√2
57 उपग्रह की KE/PE? AIPMT 2005
KE=GMm/2r; PE=−GMm/r
उत्तर: KE/PE = −1/2 (परिमाण 1:2)
58 नए ग्रह का घनत्व समान, आकार 3 गुना। g' संबंध? AIPMT 2005
g ∝ R ⟹ g' = 3g
59 ग्रह का घनत्व 2 गुना, g समान। ग्रह की त्रिज्या? AIPMT 2004
g ∝ ρR ⟹ R_ग्रह = R/2
60 गुरुत्वीय बल पर माध्यम (घनत्व 3) का प्रभाव? AIPMT 2003
उत्तर: बल अपरिवर्तित रहेगा (F ही रहेगा)
61 ग्रह A पर g_A=9g_B, 2 m कूद सकते हैं। ग्रह B पर ऊँचाई? AIPMT 2003
h ∝ 1/g; h_B/h_A = g_A/g_B = 9
उत्तर: h_B = 18 m
62 द्रव्यमान m को h=3R तक, ΔU? AIPMT 2003
ΔU = GMm[1/R − 1/4R] = 3GMm/4R
63 अधिकतम ऊँचाई = R बनाने की चाल? AIPMT 2001
½v² = GM/2R ⟹ v² = GM/R = gR
उत्तर: v = √(gR)
64 72 N भार, ऊँचाई R/2 पर गुरुत्वीय बल? AIPMT 2000
उत्तर: 72×4/9 ≈ 32 N
65 पृथ्वी के समान द्रव्यमान, त्रिज्या 1/4। पलायन चाल? AIPMT 2000
v_e ∝ 1/√R ⟹ v_e' = 2v_e
उत्तर: पलायन चाल दोगुनी
66 गुरुत्वीय बल किसके लिए आवश्यक है? AIPMT 2000
उत्तर: ग्रहों को कक्षाओं में बनाए रखने, उपग्रहों की परिक्रमा, ज्वार-भाटा तथा किन्हीं दो द्रव्यमानों के परस्पर आकर्षण के लिए — यह ब्रह्मांड की संरचना को एक साथ बांधे रखने वाला मूल बल है