कार्य, ऊर्जा और शक्ति
दैनिक बोलचाल में "कार्य" शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है, पर भौतिकी में इसे परिशुद्ध रूप से परिभाषित किया जाता है। कार्य, ऊर्जा और शक्ति — यह तीन धारणाएँ यांत्रिकी की मूल नींव हैं, जिन पर ऊष्मागतिकी, विद्युत एवं आधुनिक भौतिकी के अनेक नियम टिके हुए हैं। साथ ही, 2006 से NEET 2022 तक के सभी 14 संबंधित PYQ हल सहित यहाँ संकलित हैं।
5.1 भूमिका
कार्य और ऊर्जा की परिशुद्ध परिभाषा की ओर पहला कदम — अदिश गुणनफल।
रोज़मर्रा की भाषा में "कार्य" शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक रूप से करते हैं — किसान खेत जोतता है, मिस्त्री ईंट ढोता है, छात्र पढ़ता है — इन सभी को "कार्य करना" कहते हैं। परंतु भौतिकी में कार्य को एक परिशुद्ध (precise) रूप में परिभाषित करते हैं। जिस व्यक्ति में लंबी अवधि तक कार्य करते रहने की सामर्थ्य होती है, उसे अधिक ऊर्जा या शक्ति वाला मानते हैं — इसी से एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि निकलती है: ऊर्जा, कार्य करने की सामर्थ्य है।
इस अध्याय का लक्ष्य कार्य, ऊर्जा तथा शक्ति की धारणाओं का परिशुद्ध विकास करना है। इसके लिए सर्वप्रथम दो सदिशों के अदिश गुणनफल को समझना आवश्यक है, क्योंकि कार्य का सूत्र वस्तुतः बल तथा विस्थापन के सदिशों का अदिश गुणनफल ही है।
5.1.1 अदिश गुणनफल (Scalar Product)
दो सदिशों को गुणा करने की दो विधियाँ हैं: (1) अदिश गुणनफल (जिसे डॉट गुणनफल भी कहते हैं) — इसका परिणाम एक अदिश राशि होती है; (2) सदिश गुणनफल (जिसे क्रॉस गुणनफल कहते हैं) — इसका परिणाम एक सदिश राशि होती है (इसका विवेचन अध्याय 6 में)। यहाँ हम केवल अदिश गुणनफल पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
जहाँ θ दोनों सदिशों A तथा B के बीच का कोण है। चूँकि A, B तथा cos θ — तीनों ही अदिश राशियाँ हैं, इसलिए A·B भी एक अदिश राशि ही होगी। A व B की अपनी-अपनी दिशाएँ हैं, किंतु उनके इस गुणनफल की कोई दिशा नहीं होती।
समीकरण (5.1a) को इस प्रकार भी लिख सकते हैं: A·B = A(B cos θ) = B(A cos θ)। ज्यामितीय दृष्टि से B cos θ, सदिश B का सदिश A की दिशा पर प्रक्षेप (projection) है। इसी प्रकार A cos θ, सदिश A का सदिश B की दिशा पर प्रक्षेप है। इस प्रकार A·B का मान, सदिश A के परिमाण तथा B के अनुदिश A के घटक के गुणनफल के बराबर होता है।
(ii) A · (B + C) = A · B + A · C (वितरण नियम)
(iii) A · (λB) = λ (A · B), जहाँ λ कोई अदिश है
एकांक सदिशों î, ĵ, k̂ के अदिश गुणनफल — क्योंकि ये तीनों परस्पर लंबवत् हैं:
î · ĵ = ĵ · k̂ = k̂ · î = 0
अतः दो सदिशों A = Axî+Ayĵ+Azk̂ तथा B = Bxî+Byĵ+Bzk̂ का अदिश गुणनफल इस प्रकार होगा:
इससे दो उपयोगी परिणाम निकलते हैं: (i) A · A = Ax² + Ay² + Az² = A² (ii) यदि A व B परस्पर लंबवत् हों तो A · B = 0।
बल F = (3î+4ĵ−5k̂) तथा विस्थापन d = (5î+4ĵ+3k̂) के बीच का कोण ज्ञात करें। साथ ही F का d पर प्रक्षेप भी ज्ञात करें।
हल:
d · d = d² = 25+16+9 = 50 इकाई
F का d पर प्रक्षेप = F cos θ = (F·d)/d = 16/√50 ≈ 2.26 इकाई
5.2 कार्य और गतिज ऊर्जा की धारणा
कार्य-ऊर्जा प्रमेय की नींव।
अध्याय 2 में हमने नियत त्वरण के अंतर्गत सरल रेखीय गति के लिए यह संबंध स्थापित किया था: v² − u² = 2as। अब इस समीकरण के दोनों पक्षों को m/2 से गुणा करने पर:
जहाँ अंतिम चरण में न्यूटन के द्वितीय नियम (F = ma) का प्रयोग किया गया है। सदिशों का प्रयोग करते हुए इस परिणाम को त्रिविमीय गति तक व्यापक बनाया जा सकता है: v² − u² = 2a · d, अतः दोनों पक्षों को m/2 से गुणा करके:
यह समीकरण हमें कार्य तथा गतिज ऊर्जा को परिभाषित करने की दिशा में प्रेरित करती है:
- बायाँ पक्ष: वस्तु के द्रव्यमान के आधे तथा उसकी चाल के वर्ग के गुणनफल का अंतिम व आरंभिक मानों का अंतर — इसे गतिज ऊर्जा (K) कहते हैं।
- दायाँ पक्ष: वस्तु पर आरोपित बल का विस्थापन की दिशा में घटक तथा विस्थापन के परिमाण का गुणनफल — इसे कार्य (W) कहते हैं।
1.00 g द्रव्यमान की वर्षा की बूँद 1.00 km ऊँचाई से गिरकर धरातल पर 50.00 m/s की चाल से टकराती है। (a) गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य क्या है? (b) अज्ञात प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य क्या है?
हल:
(a) बूँद की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन: ΔK = ½mv² − 0 = ½×10⁻³×50×50 = 1.25 J
(b) कार्य-ऊर्जा प्रमेय से ΔK = Wg + Wr, अतः Wr = ΔK − Wg = 1.25 − 10 = −8.75 J (ऋणात्मक — प्रतिरोधी बल गति का विरोध करता है)
5.3 कार्य
कार्य की परिशुद्ध परिभाषा, चिह्न परिपाटी तथा मात्रक।
मान लें कोई अचर बल F, किसी m द्रव्यमान के पिंड पर कार्यरत है जिसके कारण पिंड में d विस्थापन होता है। किसी बल द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार परिभाषित किया जाता है — "बल के विस्थापन की दिशा में घटक तथा विस्थापन के परिमाण का गुणनफल":
(i) विस्थापन शून्य हो: जैसे भारोत्तोलक 150 kg के भार को 30s तक कंधे पर स्थिर उठाए खड़ा रहे — कोई विस्थापन नहीं, अतः कोई कार्य नहीं।
(ii) बल शून्य हो: जैसे चिकनी क्षैतिज मेज पर गतिमान पिंड पर क्षैतिज बल कार्य नहीं करता क्योंकि घर्षण नहीं है — यद्यपि विस्थापन हो सकता है।
(iii) बल और विस्थापन परस्पर लंबवत् हों (θ=90°): जैसे चिकनी मेज पर गतिमान पिंड पर गुरुत्वाकर्षण बल mg कोई कार्य नहीं करता (क्योंकि यह विस्थापन के लंबवत् है); चंद्रमा की वृत्ताकार कक्षा में पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल भी शून्य कार्य करता है।
कार्य धनात्मक तथा ऋणात्मक — दोनों प्रकार का हो सकता है। यदि θ का मान 0° से 90° के बीच हो तो cos θ धनात्मक होगा, अतः कार्य धनात्मक। यदि θ का मान 90° से 180° के बीच हो तो cos θ ऋणात्मक होगा, अतः कार्य ऋणात्मक होगा — जैसे घर्षण बल विस्थापन का विरोध करता है (θ=180°, cos 180°=−1)।
कार्य तथा ऊर्जा की विमाएँ समान हैं — [M L²T⁻²]। इसका SI मात्रक जूल (J) है, जिसे महान ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी जेम्स प्रेस्कॉट जूल के सम्मान में नामित किया गया। कुछ अन्य प्रायः प्रयुक्त होने वाले मात्रक निम्नलिखित हैं:
| मात्रक | जूल में मान |
|---|---|
| अर्ग (erg) | 10⁻⁷ J |
| इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) | 1.6×10⁻¹⁹ J |
| कैलोरी (cal) | 4.186 J |
| किलोवाट-घंटा (kWh) | 3.6×10⁶ J |
कोई साइकिल सवार ब्रेक लगाने पर फिसलता हुआ 10 m दूर जाकर रुकता है। सड़क द्वारा साइकिल पर लगाया गया बल 200 N है जो गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है। (a) सड़क द्वारा साइकिल पर कितना कार्य किया गया? (b) साइकिल द्वारा सड़क पर कितना कार्य किया गया?
हल (a): विरोधी बल तथा विस्थापन के बीच कोण 180° है, अतः:
इसी ऋणात्मक कार्य के कारण साइकिल की गति धीमी होकर अंततः शून्य हो जाती है।
(b): न्यूटन के तृतीय नियमानुसार साइकिल द्वारा सड़क पर लगाया गया बल 200 N है (परंतु विपरीत दिशा में); सड़क का विस्थापन नहीं होता, अतः साइकिल द्वारा सड़क पर किया गया कार्य शून्य होगा।
5.4 गतिज ऊर्जा
गति के कारण किसी पिंड में संचित ऊर्जा।
यदि किसी पिंड का द्रव्यमान m तथा वेग v हो, तो उसकी गतिज ऊर्जा:
गतिज ऊर्जा एक अदिश राशि है और यह उस कार्य की माप है जो कोई पिंड अपनी गति के कारण कर सकता है। इसकी विमा [M L²T⁻²] तथा SI मात्रक जूल है।
कुछ परिचित पिंडों की गतिज ऊर्जा के कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं, जो इस बात का आभास देते हैं कि सूक्ष्म व विराट — दोनों स्तरों पर यह राशि किस प्रकार व्यापक परिसर (range) में फैली हुई है:
| पिंड | द्रव्यमान (kg) | चाल (m/s) | K (J) |
|---|---|---|---|
| कार | 2000 | 25 | 6.3×10⁵ |
| धावक | 70 | 10 | 3.5×10³ |
| गोली | 5×10⁻² | 200 | 10³ |
| 10 m से गिरता पत्थर | 1 | 14 | 10² |
| अंतिम वेग से गिरती वर्षा की बूँद | 3.5×10⁻⁵ | 9 | 1.4×10⁻³ |
| वायु का अणु | ~10⁻²⁶ | 500 | ~10⁻²¹ |
50 g द्रव्यमान की गोली को 2 cm मोटी नरम परतदार लकड़ी (प्लाइवुड) पर 200 m/s की चाल से फायर किया जाता है। लकड़ी को भेदने के पश्चात् गोली की गतिज ऊर्जा प्रारंभिक ऊर्जा की 10% रह जाती है। लकड़ी से निकलते समय गोली की चाल क्या होगी?
हल:
अंतिम गतिज ऊर्जा = 0.1 × 1000 = 100 J
अर्थात् नरम लकड़ी को भेदने के पश्चात् गोली की चाल लगभग 68% कम हो जाती है (90% नहीं!)।
5.5 परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य
जब बल अचर न हो — ग्राफ के क्षेत्रफल से कार्य की गणना।
अचर बल दुर्लभ होता है — अधिकांश वास्तविक उदाहरणों में हमें परिवर्ती बल ही देखने को मिलते हैं। यदि विस्थापन Δx बहुत सूक्ष्म हो, तो उस सूक्ष्म अंतराल में बल F(x) को लगभग नियत मान सकते हैं, और तब उस अंतराल में किया गया कार्य ΔW = F(x)Δx होगा। क्रमिक छोटे-छोटे आयताकार क्षेत्रफलों का योग करने पर हमें कुल किया गया कार्य प्राप्त होता है:
यदि विस्थापनों को अत्यंत सूक्ष्म मान लिया जाए (Δx → 0), तब यह योगफल एक निश्चित मान के समीप पहुँच जाता है, जो वक्र के नीचे के क्षेत्रफल के समान होता है। इस प्रकार परिवर्ती बल के लिए कार्य को बल का विस्थापन पर सीमांकित समाकलन (definite integral) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है:
कोई स्त्री खुरदरी सतह वाले रेलवे प्लेटफॉर्म पर संदूक को खिसकाती है। वह 10 m की दूरी तक 100 N का बल आरोपित करती है। उसके पश्चात् वह उत्तरोत्तर थक जाती है और उसके द्वारा आरोपित बल रेखीय रूप से घटकर 50 N हो जाता है। संदूक को कुल 20 m की दूरी तक खिसकाया जाता है। स्त्री द्वारा आरोपित बल तथा घर्षण बल (50 N) द्वारा 20 m तक किए गए कार्य की गणना कीजिए।
हल: स्त्री द्वारा किया गया कार्य = (आयत का क्षेत्रफल + समलंब का क्षेत्रफल):
= 1000 + 750 = 1750 J
घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य = (−50)×20 = −1000 J (चूँकि घर्षण बल गति के विपरीत दिशा में कार्य करता है, इसका ग्राफ बल-अक्ष के ऋणात्मक पक्ष में होता है, अतः क्षेत्रफल का चिह्न भी ऋणात्मक होगा)
5.6 परिवर्ती बल के लिए कार्य-ऊर्जा प्रमेय
कार्य-ऊर्जा प्रमेय का व्यापक रूप।
गतिज ऊर्जा परिवर्तन की दर निकालने के लिए:
= F (dx/dt)
अतः dK = F dx। अब प्रारंभिक स्थिति xi से अंतिम स्थिति xf तक समाकलन करने पर:
इस प्रकार परिवर्ती बल के लिए भी कार्य-ऊर्जा प्रमेय की स्थापना हो जाती है। यद्यपि यह प्रमेय अनेक प्रकार के प्रश्नों को हल करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है, यह न्यूटन के द्वितीय नियम की पूर्ण गतिकीय सूचना का समावेश नहीं करती — वास्तव में यह न्यूटन के द्वितीय नियम का ही समाकल रूप है। दो या तीन विमाओं में न्यूटन का द्वितीय नियम सदिश रूप में व्यक्त होता है, जबकि कार्य-ऊर्जा प्रमेय अदिश रूप में होती है — यह भेद परीक्षा में वैचारिक प्रश्नों का स्रोत बन सकता है।
m (=1 kg) द्रव्यमान का एक गुटका क्षैतिज सतह पर vi=2 m/s की चाल से चलते हुए x=0.10 m से x=2.01 m के खुरदरे हिस्से में प्रवेश करता है। गुटके पर लगने वाला मंदक बल Fr = −k/x (0.1 < x < 2.01 m के लिए, अन्यथा शून्य), जहाँ k=0.5 J है। गुटका जैसे ही खुरदरे हिस्से को पार करता है, इसकी अंतिम गतिज ऊर्जा तथा चाल vf की गणना कीजिए।
हल:
= ½mvi² − k ln(2.01/0.1)
= 2 − 0.5 × ln(20.1)
= 2 − 1.5 = 0.5 J
5.7 स्थितिज ऊर्जा की अभिधारणा
"संग्रहित" ऊर्जा की धारणा तथा संरक्षी बल की पहचान।
यहाँ "स्थितिज" शब्द किसी कार्य को कर पाने की संभावना या क्षमता को व्यक्त करता है। स्थितिज ऊर्जा की धारणा "संग्रहित" ऊर्जा से संबंधित है — जैसे खींचे हुए तीर-कमान के तार में, अथवा संपीडित कमानियों (जैसे भ्रंश रेखाओं में) में संचित ऊर्जा।
पृथ्वी की सतह के समीप m द्रव्यमान की किसी गेंद पर आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल mg है (यदि ऊँचाई h, पृथ्वी की त्रिज्या की तुलना में बहुत कम हो, तो g को अचर मान सकते हैं)। गेंद को h ऊँचाई तक उठाने में बाह्य कारक द्वारा गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध जो कार्य mgh किया जाता है, वह उस गेंद में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है:
दिलचस्प बात यह है कि गुरुत्वाकर्षण बल F, ऊँचाई h के सापेक्ष V(h) के ऋणात्मक अवकलज के बराबर है: F = −dV(h)/dh = −mg। अब यदि गेंद को स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया जाए, तो v²=2gh से स्पष्ट है कि ½mv²=mgh — अर्थात् h ऊँचाई पर संचित गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा, पृथ्वी पर पहुँचने तक पूर्णतः गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।
यह ध्यान देने योग्य है कि स्थितिज ऊर्जा की धारणा केवल उन्हीं बलों की श्रेणी में लागू होती है जहाँ बल के विरुद्ध किया गया कार्य ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है, और बाह्य कारक के हट जाने पर स्वतः ही गतिज ऊर्जा के रूप में प्रकट हो जाता है। ऐसे बल संरक्षी (Conservative) कहलाते हैं। सामान्यतः एकविमीय संरक्षी बल के लिए स्थितिज ऊर्जा फलन V(x) को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है:
यह संबंध बताता है कि संरक्षी बल द्वारा किया गया कार्य पिंड की केवल आरंभिक तथा अंतिम स्थिति पर निर्भर करता है — गति के दौरान चली गई विशेष पथ-लंबाई पर निर्भर नहीं करता। यदि किया गया कार्य अथवा गतिज ऊर्जा में परिवर्तन, पथ की लंबाई पर निर्भर करता है, तब वह बल असंरक्षी होता है — घर्षण इसका सर्वाधिक परिचित उदाहरण है।
5.8 यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण
गतिज व स्थितिज ऊर्जा का नियत योगफल।
मान लें किसी पिंड का संरक्षी बल F के कारण विस्थापन Δx होता है। कार्य-ऊर्जा प्रमेय से ΔK=F(x)Δx; तथा संरक्षी बल के लिए स्थितिज ऊर्जा फलन V(x) के लिए −ΔV=F(x)Δx। इन दोनों को मिलाने पर:
इसका अर्थ है कि पिंड की गतिज तथा स्थितिज ऊर्जाओं का योगफल, K+V, नियत रहता है। संपूर्ण पथ पर विचार करने पर:
यहाँ राशि K+V(x), निकाय की कुल यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है। अतः यांत्रिक ऊर्जा-संरक्षण नियम के अनुसार, किसी भी निकाय की कुल यांत्रिक ऊर्जा अचर रहती है, यदि उस पर कार्य करने वाले बल संरक्षी हों।
(i) कोई बल F(x) संरक्षी है यदि इसे किसी अदिश राशि V(x) से समीकरण F = −dV/dx के माध्यम से प्राप्त किया जा सके।
(ii) संरक्षी बल द्वारा किया गया कार्य केवल सिरे के बिंदुओं पर निर्भर करता है: W = Kf − Ki = V(xi) − V(xf)।
(iii) संरक्षी बल द्वारा किसी बंद पथ में किया गया कार्य सदैव शून्य होता है।
m द्रव्यमान का एक गोलक L लंबाई की हलकी डोरी से लटका है। निम्नतम बिंदु A पर क्षैतिज वेग v0 इस प्रकार लगाया जाता है कि यह ऊर्ध्वाधर तल में अर्धवृत्ताकार प्रक्षेप्य पथ इस प्रकार तय करता है कि डोरी केवल उच्चतम बिंदु C पर ढीली होती है। (a) v0, (b) बिंदुओं B तथा C पर गोलक की चाल, तथा (c) बिंदु B तथा C पर गतिज ऊर्जाओं का अनुपात (KB/KC) ज्ञात कीजिए।
हल: डोरी का तनाव कोई कार्य नहीं करता (चूँकि विस्थापन सदैव डोरी के लंबवत् होता है)। अतः यांत्रिक ऊर्जा E नियत रहती है। स्थितिज ऊर्जा का शून्य बिंदु A पर मान लें।
बिंदु A पर: E = ½mv0²; तथा न्यूटन के द्वितीय नियम से TA − mg = mv0²/L
बिंदु C पर (जहाँ डोरी ढीली है, TC=0): E = ½mvC² + 2mgL; तथा mg = mvC²/L ⟹ vC² = gL
इन दोनों संबंधों को मिलाने पर: E = (5/2)mgL
(a) बिंदु A पर ऊर्जा के व्यंजक से समीकृत करने पर: v0² = 5gL ⟹ v0 = √(5gL)
(b) बिंदु B (जहाँ डोरी क्षैतिज है, ऊँचाई L): E = ½mvB²+mgL = (5/2)mgL ⟹ vB = √(3gL); तथा पहले से vC = √(gL)
(c) KB/KC = vB²/vC² = 3gL/gL = 3:1
5.9 किसी स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा
हुक का नियम तथा संरक्षी बल के रूप में स्प्रिंग।
स्प्रिंग-बल एक परिवर्ती बल का उत्कृष्ट उदाहरण है जो संरक्षी भी होता है। किसी आदर्श स्प्रिंग में, स्प्रिंग-बल Fs का मान गुटके के अपनी साम्यावस्था स्थिति से विस्थापन x के समानुपाती होता है — इस नियम को हुक का नियम कहते हैं:
जहाँ k स्प्रिंग नियतांक है (मात्रक N/m)। k का मान अधिक होने पर स्प्रिंग दृढ़ तथा कम होने पर नर्म (मृदु) कहलाती है। ऋणात्मक चिह्न यह इंगित करता है कि स्प्रिंग-बल सदैव विस्थापन की विपरीत दिशा में कार्य करता है, अर्थात् यह गुटके को साम्यावस्था की ओर वापस खींचता है।
यदि गुटके को स्थिति xi से xf तक विस्थापित किया जाए, तो स्प्रिंग-बल द्वारा किया गया कार्य:
यह व्यंजक केवल सिरे के बिंदुओं (xi व xf) पर निर्भर करता है — अतः स्प्रिंग-बल एक संरक्षी बल सिद्ध होता है। साम्यावस्था (x=0) पर V(x)=0 मान लेने पर, किसी भी विस्थापन x के लिए स्थितिज ऊर्जा:
जब m द्रव्यमान के गुटके को xm तक खींचकर विरामावस्था से छोड़ा जाता है, तब इसकी संपूर्ण यांत्रिक ऊर्जा किसी भी स्थिति x (−xm से +xm के बीच) पर निम्न प्रकार व्यक्त की जा सकती है:
इससे स्पष्ट है कि गुटके की चाल तथा गतिज ऊर्जा साम्यावस्था (x=0) पर अधिकतम होंगी:
1000 kg द्रव्यमान की एक कार एक चिकनी सड़क पर 18 km/h की चाल से चलते हुए, क्षैतिज फ्रेम पर लगे स्प्रिंग से संघट्ट करती है जिसका स्प्रिंग नियतांक 5.25×10³ N/m है। स्प्रिंग का अधिकतम संपीडन क्या होगा?
हल: कार की चाल 18 km/h = 5 m/s। कार की गतिज ऊर्जा K = ½ × 1000 × 5 × 5 = 1.25×10⁴ J
½ k xm² = 1.25×10⁴ J
xm² = 2×1.25×10⁴ / (5.25×10³) = 4.762
उदाहरण 5.8 में घर्षण गुणांक μ=0.5 लेकर कमानी के अधिकतम संपीडन का परिकलन कीजिए।
हल: कार्य-ऊर्जा प्रमेय से: ΔK = −½kxm² − μmg xm
½mv² = ½kxm² + μmg xm
इस द्विघातीय समीकरण को हल करने पर: xm = 1.35 m — जो उदाहरण 5.8 के परिणाम से कम है (जैसा घर्षण की उपस्थिति में अपेक्षित था)।
5.10 शक्ति
कार्य करने की दर, तथा इसकी व्यावहारिक इकाइयाँ।
बहुधा केवल यह जानना पर्याप्त नहीं होता कि किसी पिंड पर कितना कार्य किया गया, बल्कि यह जानना भी आवश्यक होता है कि यह कार्य किस दर से किया गया। शक्ति को उस समय-दर से परिभाषित किया जाता है जिससे कार्य किया गया या ऊर्जा स्थानांतरित हुई:
तात्क्षणिक शक्ति: P = dW/dt = F · v (5.20, 5.21)
शक्ति भी एक अदिश राशि है। इसका SI मात्रक वाट (W) है (जेम्स वाट के सम्मान में), विमा [M L²T⁻³]। 1 W = 1 J/s। पुराना मात्रक अश्व शक्ति (hp) — 1 hp = 746 W। विद्युत ऊर्जा की खपत के लिए मात्रक किलोवाट-घंटा (kWh) प्रयोग किया जाता है (जिसे विद्युत बिल की "यूनिट" कहा जाता है): 1 kWh = 3.6×10⁶ J। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि kWh वस्तुतः ऊर्जा का मात्रक है, शक्ति का नहीं।
कोई लिफ्ट जिसका कुल द्रव्यमान (लिफ्ट+यात्रियों का) 1800 kg है, ऊपर की ओर 2 m/s की अचर चाल से गतिमान है। 4000 N का घर्षण बल इसकी गति का विरोध करता है। लिफ्ट को मोटर द्वारा प्रदत्त न्यूनतम शक्ति का आकलन वाट तथा अश्व शक्ति में कीजिए।
हल: लिफ्ट पर लगने वाला अधोमुखी बल:
5.11 संघट्ट (Collision)
संवेग-संरक्षण तथा ऊर्जा-संरक्षण के अनुप्रयोग।
भौतिकी के अध्ययन में हम सदैव ऐसी भौतिक राशियों की खोज करते रहते हैं जो किसी भौतिक प्रक्रम में अपरिवर्तित रहती हैं — ऊर्जा-संरक्षण तथा संवेग-संरक्षण इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन नियमों का प्रयोग अब हम संघट्टों के विश्लेषण में करेंगे।
5.11.1 प्रत्यास्थ एवं अप्रत्यास्थ संघट्ट
सभी संघट्टों में निकाय का कुल रेखीय संवेग नियत रहता है (क्योंकि न्यूटन के तृतीय नियमानुसार F12=−F21, अतः Δp1+Δp2=0)। परंतु निकाय की कुल गतिज ऊर्जा आवश्यक रूप से संरक्षित नहीं रहती — संघट्ट के दौरान विकृति, ऊष्मा तथा ध्वनि उत्पन्न होती है।
प्रत्यास्थ संघट्ट (Elastic): आरंभिक गतिज ऊर्जा = अंतिम गतिज ऊर्जा।
अप्रत्यास्थ संघट्ट (Inelastic): कुछ गतिज ऊर्जा की क्षति होती है, परन्तु संवेग संरक्षित रहता है।
पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट (Perfectly Inelastic): संघट्ट के बाद दोनों पिंड सटे रहकर एक साथ गति करते हैं — गतिज ऊर्जा की अधिकतम क्षति होती है।
5.11.2 एकविमीय संघट्ट
पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट: m1 द्रव्यमान का पिंड v1i चाल से स्थिर m2 से संघट्ट करता है और दोनों साथ चलते हैं:
यह राशि सदैव धनात्मक होती है — इसका अर्थ है कि पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा की क्षति अनिवार्य है।
प्रत्यास्थ संघट्ट: संवेग तथा गतिज ऊर्जा दोनों संरक्षित रहते हैं (θ1=θ2=0 लेकर):
v2f = [2m1/(m1+m2)] v1i (5.26, 5.27)
दशा I (समान द्रव्यमान, m1=m2): v1f=0, v2f=v1i — पहला द्रव्यमान रुक जाता है, दूसरा पहले का आरंभिक वेग प्राप्त कर लेता है।
दशा II (m2 ≫ m1): v1f≈−v1i, v2f≈0 — भारी द्रव्यमान लगभग स्थिर रहता है, जबकि हलके पिंड का वेग लगभग उत्क्रमित हो जाता है (यही बात किसी दीवार से गेंद के टकराने पर देखी जाती है)।
किसी नाभिकीय रिएक्टर में तीव्रगामी न्यूट्रॉन (वेग ~10⁷ m/s) को 10³ m/s तक मंदित किया जाना है। सिद्ध कीजिए कि न्यूट्रॉन एक हल्के नाभिक (जैसे ड्यूटीरियम या कार्बन) से प्रत्यास्थ संघट्ट करने में अपनी अधिकांश गतिज ऊर्जा की क्षति कर देता है।
हल: यदि मंदक नाभिक का द्रव्यमान m2=Am1 (जहाँ A द्रव्यमान संख्या) हो, तो न्यूट्रॉन की बची भिन्नात्मक ऊर्जा:
f2 = 1 − f1 (मंदक को स्थानांतरित ऊर्जा)
ड्यूटीरियम (A=2): f1 = (1/3)² = 1/9 ≈ 0.11; f2 ≈ 0.89 — अर्थात् न्यूट्रॉन की लगभग 89% ऊर्जा ड्यूटीरियम को स्थानांतरित हो जाती है।
कार्बन (A=12): f1 = (11/13)² ≈ 0.716; f2 ≈ 0.284 — लगभग 28% ऊर्जा स्थानांतरित।
इसीलिए भारी जल (D₂O) तथा ग्रेफाइट जैसे हल्के नाभिकों वाले पदार्थ नाभिकीय रिएक्टरों में "मंदक" (moderator) के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
5.11.3 द्विविमीय संघट्ट
जब संघट्ट किसी सीधी रेखा के अनुदिश न होकर किसी समतल में हो, तो संवेग-संरक्षण को x व y दोनों दिशाओं में अलग-अलग लागू करना पड़ता है:
y-दिशा में: 0 = m1v1fsinθ1 − m2v2fsinθ2
प्रत्यास्थ संघट्ट के लिए एक अतिरिक्त समीकरण गतिज ऊर्जा संरक्षण से प्राप्त होता है।
बिलियर्ड की समान द्रव्यमान (m1=m2) वाली दो गेंदों के मध्य संघट्ट होता है। खिलाड़ी लक्ष्य गेंद को θ2=37° के कोण पर थैली में गिराना चाहता है। संघट्ट प्रत्यास्थ है तथा घर्षण/घूर्णन के प्रभाव महत्वपूर्ण नहीं हैं। कोण θ1 ज्ञात कीजिए।
हल: समान द्रव्यमान होने से संवेग-संरक्षण का रूप बनता है: v1i = v1f + v2f
गतिज ऊर्जा संरक्षण से (प्रत्यास्थ, समान द्रव्यमान): v1i² = v1f² + v2f²
दोनों समीकरणों की तुलना से: cos(θ1+37°) = 0 ⟹ θ1+37° = 90° ⟹ θ1 = 53°
अर्थात् समान द्रव्यमान के दो पिंडों में से एक स्थिर हो, तो प्रत्यास्थ संघट्ट के पश्चात् वे सदैव एक-दूसरे से समकोण (90°) बनाते हुए गति करते हैं।
✦ एक-पंक्ति तथ्य — त्वरित पुनरावृत्ति
अंतिम रिवीजन के लिए छोटे-छोटे निर्णायक बिंदु।
- कार्य W = F·d = Fd cos θ — यह एक अदिश राशि है; SI मात्रक जूल (J); विमा [ML²T⁻²]।
- बल तथा विस्थापन परस्पर लंबवत् होने पर (θ=90°) किया गया कार्य शून्य होता है — जैसे वृत्तीय कक्षा में गुरुत्वाकर्षण बल।
- गतिज ऊर्जा K = ½mv² — सदैव धनात्मक अदिश राशि; कार्य-ऊर्जा प्रमेय: Kf − Ki = Wnet।
- परिवर्ती बल के लिए कार्य = बल-विस्थापन ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल = ∫F(x) dx।
- संरक्षी बल: कार्य केवल आरंभिक व अंतिम स्थिति पर निर्भर; बंद पथ में कार्य शून्य; F(x) = −dV/dx।
- असंरक्षी बल (जैसे घर्षण): कार्य पथ पर निर्भर करता है; बंद पथ में कार्य शून्य नहीं होता।
- गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा V(h) = mgh (पृथ्वी सतह से h ऊँचाई पर, g अचर मानते हुए)।
- स्प्रिंग स्थितिज ऊर्जा V(x) = ½kx²; हुक का नियम Fs = −kx।
- यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण: K + V = अचर — केवल तभी जब सभी कार्यरत बल संरक्षी हों।
- शक्ति P = dW/dt = F·v — अदिश राशि; SI मात्रक वाट (W); 1 hp = 746 W; 1 kWh = 3.6×10⁶ J (यह ऊर्जा का मात्रक है, शक्ति का नहीं)।
- सभी संघट्टों में संवेग सदैव संरक्षित; गतिज ऊर्जा केवल प्रत्यास्थ संघट्ट में संरक्षित।
- पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट में गतिज ऊर्जा की क्षति = ½[m₁m₂/(m₁+m₂)]v₁ᵢ² — सदैव धनात्मक।
- समान द्रव्यमान के प्रत्यास्थ संघट्ट में: गतिमान पिंड रुक जाता है, स्थिर पिंड उसका वेग प्राप्त कर लेता है।
- बहुत भारी स्थिर द्रव्यमान से हलके पिंड के प्रत्यास्थ संघट्ट में हलके पिंड का वेग उत्क्रमित हो जाता है।
- समान द्रव्यमान के दो पिंडों में एक स्थिर हो — तिरछे प्रत्यास्थ संघट्ट के बाद वे परस्पर समकोण (90°) बनाकर गति करते हैं।
- न्यूट्रॉन मंदन में हल्के नाभिक (जैसे D₂O) सर्वाधिक ऊर्जा अवशोषित करते हैं — इसीलिए भारी जल/ग्रेफाइट "मंदक" कहलाते हैं।
- दो सदिशों का अदिश गुणनफल: A·B = AB cos θ; î·î = ĵ·ĵ = k̂·k̂ = 1; î·ĵ = ĵ·k̂ = k̂·î = 0।
- कार्य-ऊर्जा प्रमेय कोई स्वतंत्र नियम नहीं, बल्कि न्यूटन के द्वितीय नियम का समाकल रूप है।
✏️ NCERT अभ्यास प्रश्न — पूर्ण हल (5.1 – 5.23)
हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।
5.1 निम्नलिखित कार्यों के चिह्न बताइए: (a) कुएँ से बाल्टी निकालने वाले बल द्वारा कार्य (b) गुरुत्वीय बल द्वारा कार्य (c) आनत तल पर फिसलती वस्तु पर घर्षण द्वारा कार्य (d) खुरदरे तल पर एकसमान वेग से गतिमान वस्तु पर लगाए बल द्वारा कार्य (e) दोलायमान लोलक को रोकने में वायु प्रतिरोध द्वारा कार्य
(a) धनात्मक — बाल्टी निकालने वाला बल तथा विस्थापन दोनों ऊपर की ओर (θ=0°)।
(b) ऋणात्मक — गुरुत्वाकर्षण बल नीचे, विस्थापन ऊपर (θ=180°)।
(c) ऋणात्मक — घर्षण सदैव गति का विरोध करता है (θ=180°)।
(d) धनात्मक — एकसमान वेग बनाए रखने के लिए लगाया गया बल गति की दिशा में (घर्षण को संतुलित करने हेतु)।
(e) ऋणात्मक — वायु प्रतिरोध सदैव लोलक की गति का विरोध करता है।
5.2 2 kg द्रव्यमान की वस्तु जो आरंभ में विरामावस्था में है, 7 N के क्षैतिज बल से मेज पर गति करती है। मेज का गतिज-घर्षण गुणांक 0.1 है। (a) लगाए बल द्वारा 10s में कार्य (b) घर्षण द्वारा 10s में कार्य (c) वस्तु पर कुल बल द्वारा 10s में कार्य (d) वस्तु की गतिज ऊर्जा में 10s में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
घर्षण बल f = μmg = 0.1×2×10 = 2 N; निवल बल Fnet = 7−2 = 5 N; त्वरण a = 5/2 = 2.5 m/s²
10s में तय दूरी: s = ½at² = ½×2.5×100 = 125 m
(a) लगाए बल द्वारा कार्य = F×s = 7×125 = 875 J
(b) घर्षण द्वारा कार्य = −f×s = −2×125 = −250 J
(c) कुल बल द्वारा कार्य = Fnet×s = 5×125 = 625 J (अथवा 875−250=625 J)
(d) कार्य-ऊर्जा प्रमेय से गतिज ऊर्जा में परिवर्तन = कुल कार्य = 625 J
5.3 एकविमीय स्थितिज ऊर्जा-फलनों के लिए, प्रत्येक स्थिति में कण को किन क्षेत्रों में नहीं पाया जा सकता, तथा कण की कुल न्यूनतम ऊर्जा भी निर्देशित कीजिए।
सामान्य सिद्धांत: कण की गतिज ऊर्जा K = E − V(x); जहाँ भी V(x) > E होगा, वहाँ K ऋणात्मक हो जाएगी (असंभव) — अतः वह क्षेत्र वर्जित (forbidden) होगा। कण की न्यूनतम कुल ऊर्जा, उपलब्ध परिसर में V(x) के न्यूनतम मान के बराबर होती है।
(i) चूँकि x > a के लिए V(x) = V₀ > E, अतः कण x > a क्षेत्र में नहीं पाया जा सकता। न्यूनतम कुल ऊर्जा = शून्य।
(ii) सोपान (step) फलन में जहाँ भी V(x) > E है — वहाँ कण नहीं पाया जा सकता। न्यूनतम कुल ऊर्जा = V₁।
(iii) 0 से a के मध्य तथा x > b के लिए V(x) > E — इन क्षेत्रों में कण नहीं। न्यूनतम कुल ऊर्जा = −V₁।
(iv) −b/2 से −a/2 के मध्य तथा a/2 से b/2 के मध्य V(x) > E — इन क्षेत्रों में कण नहीं। न्यूनतम कुल ऊर्जा = −V₁।
5.4 रेखीय सरल आवर्त गति कर रहे कण का स्थितिज ऊर्जा फलन V(x) = kx²/2 है, k = 0.5 N/m। दिखाइए कि 1 J कुल ऊर्जा वाले कण को x = ±2 m पर अवश्य 'वापस आना' चाहिए।
x = 2 m पर: V(2) = ½ × 0.5 × 4 = 1 J
चूँकि कण की कुल ऊर्जा E = 1 J है, x = ±2 m पर V(x) = E = 1 J, अतः गतिज ऊर्जा K = E − V(x) = 0। अर्थात् x = ±2 m पर कण की चाल शून्य हो जाती है — यह परिवर्तन बिंदु (turning point) है, जहाँ से कण अपनी दिशा उलट कर वापस आता है।
x > 2 m या x < −2 m के लिए V(x) > E होगा जो असंभव है (K ऋणात्मक हो जाएगी), अतः कण इन क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर सकता।
5.5 कारण सहित स्पष्ट कीजिए: (a) रॉकेट का बाह्य आवरण घर्षण से क्यों जलता है? (b) धूमकेतु की संपूर्ण कक्षा में गुरुत्वीय बल द्वारा कार्य शून्य क्यों? (c) पृथ्वी के निकट घूमते उपग्रह की चाल वायुमंडलीय प्रतिरोध के बावजूद क्यों बढ़ती है? (d) दो स्थितियों में किया गया कार्य किसमें अधिक है?
(a) जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा रॉकेट की गतिज ऊर्जा के व्यय से प्राप्त होती है (घर्षण बल रॉकेट की गति का विरोध करता है, अतः ऋणात्मक कार्य करता है — यही ऊर्जा ऊष्मा में परिवर्तित होकर आवरण को जलाती है)।
(b) गुरुत्वाकर्षण बल एक संरक्षी बल है — किसी बंद पथ (पूर्ण कक्षा) में संरक्षी बल द्वारा किया गया कार्य सदैव शून्य होता है, क्योंकि धूमकेतु प्रत्येक चक्कर के बाद अपनी उसी आरंभिक स्थिति व चाल पर लौट आता है।
(c) उपग्रह की कुल यांत्रिक ऊर्जा वायुमंडलीय घर्षण के कारण धीरे-धीरे घटती है, जिससे उसकी कक्षा की त्रिज्या कम हो जाती है। जैसे-जैसे त्रिज्या घटती है, स्थितिज ऊर्जा (जो ऋणात्मक तथा त्रिज्या की व्युत्क्रमानुपाती होती है) उससे भी तेज़ी से घटती है, जिससे गतिज ऊर्जा (व चाल) वास्तव में बढ़ जाती है।
(d) चित्र (i) में व्यक्ति 15 kg भार हाथों में लेकर 2 m क्षैतिज चलता है — भार का विस्थापन क्षैतिज है जबकि गुरुत्वाकर्षण बल ऊर्ध्वाधर (θ=90°), अतः गुरुत्व के विरुद्ध कार्य लगभग शून्य। चित्र (ii) में व्यक्ति घिरनी से लटके 15 kg भार को 2 m ऊपर उठाता है — कार्य = mgh = 15×10×2 = 300 J। अतः स्थिति (ii) में किया गया कार्य अधिक है।
5.6 सही विकल्प रेखांकित कीजिए: (a) संरक्षी बल द्वारा धनात्मक कार्य पर स्थितिज ऊर्जा बढ़ती/घटती/अपरिवर्ती (b) घर्षण के विरुद्ध कार्य का परिणाम गतिज/स्थितिज ऊर्जा में क्षय (c) बहुकण निकाय के संवेग-परिवर्तन की दर बाह्य/आंतरिक बलों के अनुक्रमानुपाती (d) अप्रत्यास्थ संघट्ट में न बदलने वाली राशियाँ: गतिज ऊर्जा/संवेग/कुल ऊर्जा
(a) स्थितिज ऊर्जा घटती है — संरक्षी बल द्वारा धनात्मक कार्य ⟹ −ΔV = W > 0 ⟹ ΔV < 0।
(b) घर्षण के विरुद्ध कार्य का परिणाम गतिज ऊर्जा में क्षय होता है (यह ऊष्मा के रूप में क्षीण होती है)।
(c) कुल संवेग-परिवर्तन की दर केवल बाह्य बलों के अनुक्रमानुपाती होती है (आंतरिक बल युगलों में निरस्त हो जाते हैं)।
(d) अप्रत्यास्थ संघट्ट में कुल रेखीय संवेग नहीं बदलता (गतिज ऊर्जा में क्षय होता है)।
5.7 सत्य/असत्य बताइए: (a) प्रत्यास्थ संघट्ट में प्रत्येक पिंड का संवेग व ऊर्जा संरक्षित रहती है (b) निकाय की कुल ऊर्जा सदैव संरक्षित (c) प्रकृति में प्रत्येक बल के लिए बंद लूप में कार्य शून्य (d) अप्रत्यास्थ संघट्ट में अंतिम गतिज ऊर्जा सदैव आरंभिक से कम
(a) असत्य — प्रत्यास्थ संघट्ट में निकाय का कुल संवेग व गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है, न कि प्रत्येक पिंड की अलग-अलग।
(b) सत्य — ऊर्जा-संरक्षण नियमानुसार निकाय की कुल ऊर्जा सदैव संरक्षित।
(c) असत्य — यह केवल संरक्षी बलों के लिए सत्य है; घर्षण जैसे असंरक्षी बलों के लिए बंद पथ में कार्य शून्य नहीं होता।
(d) सत्य — अप्रत्यास्थ संघट्ट में कुछ गतिज ऊर्जा ऊष्मा/ध्वनि/विकृति में परिवर्तित हो जाती है।
5.8 कारण सहित उत्तर दीजिए — (a) बिलियर्ड गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट की अल्पावधि में कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है? (b) क्या कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है? (c) अप्रत्यास्थ संघट्ट के लिए (a),(b) के उत्तर? (d) यदि स्थितिज ऊर्जा केवल केंद्रों की दूरी पर निर्भर करे तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा या अप्रत्यास्थ?
(a) नहीं — संपर्क की अल्पावधि में गेंदों की कुछ गतिज ऊर्जा अस्थायी रूप से विकृति की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है; संघट्ट पूर्ण होने के बाद कुल गतिज ऊर्जा पुनः पूर्ववत हो जाती है।
(b) हाँ — संपर्क की लघु अवधि में भी कुल रेखीय संवेग हर क्षण संरक्षित रहता है।
(c) अप्रत्यास्थ संघट्ट में (a) का उत्तर अब भी नहीं है, तथा (b) का उत्तर हाँ रहेगा।
(d) यदि स्थितिज ऊर्जा केवल केंद्रों के मध्य दूरी पर निर्भर करे (संरक्षी बल, कोई ऊर्जा-क्षय तंत्र नहीं), तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा।
5.9 कोई पिंड जो विरामावस्था में है, अचर त्वरण से एकविमीय गति करता है। इसको t समय पर दी गई शक्ति अनुक्रमानुपाती है: (i) t1/2 (ii) t (iii) t3/2 (iv) t²
अचर त्वरण a: वेग v = at (विरामावस्था से आरंभ)। बल F = ma = अचर।
उत्तर: (ii) t
5.10 कोई पिंड अचर शक्ति के स्रोत के प्रभाव में एक ही दिशा में गतिमान है। इसका t समय में विस्थापन अनुक्रमानुपाती है: (i) t1/2 (ii) t (iii) t3/2 (iv) t²
अचर शक्ति P = Fv = m(dv/dt)v = अचर ⟹ v dv = (P/m)dt ⟹ v²/2 = (P/m)t ⟹ v = √(2Pt/m) ⟹ v ∝ t1/2
चूँकि dx/dt ∝ t1/2, समाकलन करने पर x ∝ t3/2
उत्तर: (iii) t3/2
5.11 किसी पिंड पर नियत बल F = (−î+2ĵ+3k̂) N लगाकर उसे z-अक्ष के अनुदिश 4 m गति कराया जाता है। आरोपित बल द्वारा किया गया कार्य?
विस्थापन d = 4k̂ m (केवल z-दिशा में)
5.12 अंतरिक्ष किरण प्रयोग में एक इलेक्ट्रॉन (K = 10 keV) और एक प्रोटॉन (K = 100 keV) का संसूचन होता है। इनमें कौन तीव्रगामी है? चालों का अनुपात ज्ञात कीजिए।
K = ½mv² ⟹ v = √(2K/m)
इलेक्ट्रॉन अधिक तीव्रगामी है (कम द्रव्यमान के कारण); अनुपात ≈ 13.5:1
5.13 2 mm त्रिज्या की वर्षा की बूँद 500 m ऊँचाई से गिरती है, आधी दूरी (250 m) घटते त्वरण से गिरकर सीमांत चाल (10 m/s) प्राप्त कर लेती है, फिर एकसमान चाल से गिरती है। यात्रा के दोनों अर्ध भागों में गुरुत्वीय कार्य तथा संपूर्ण यात्रा में प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।
बूँद का आयतन = (4/3)πr³ = (4/3)π(2×10⁻³)³ = 3.351×10⁻⁸ m³; द्रव्यमान m = आयतन × घनत्व = 3.351×10⁻⁵ kg
गुरुत्वीय बल अचर (g=10 m/s²), अतः दोनों अर्ध भागों (प्रत्येक 250 m) में गुरुत्वीय कार्य समान:
संपूर्ण यात्रा में कुल गुरुत्वीय कार्य = 2×8.38×10⁻² ≈ 0.1675 J; पृथ्वी पर पहुँचने पर चाल = 10 m/s, अंतिम गतिज ऊर्जा = ½mv² ≈ 1.676×10⁻³ J
5.14 किसी गैस-पात्र में अणु 200 m/s की चाल से अभिलंब के साथ 30° का कोण बनाते हुए क्षैतिज दीवार से टकराकर पुनः उसी चाल से वापस लौट जाता है। क्या इस संघट्ट में संवेग संरक्षित है? यह प्रत्यास्थ है या अप्रत्यास्थ?
अणु की चाल संघट्ट से पहले व बाद में समान (200 m/s) है — अतः गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है, यह प्रत्यास्थ संघट्ट है।
संघट्ट में अभिलंब दिशा का संवेग-घटक उलट जाता है (Δp⊥ = 2mv cos30°), जबकि दीवार के समांतर घटक अपरिवर्तित रहता है। केवल अणु का संवेग अकेले संरक्षित नहीं रहता — परंतु यदि पूरे अणु+दीवार (पात्र) निकाय पर विचार करें, तो कुल संवेग संरक्षित रहता है।
5.15 कोई पंप 30 m³ आयतन की पानी की टंकी को 15 मिनट में भर देता है। यदि टंकी पृथ्वी तल से 40 m ऊपर हो और पंप की दक्षता 30% हो तो पंप द्वारा कितनी विद्युत शक्ति का उपयोग किया गया?
जल का द्रव्यमान m = 30×1000 = 30000 kg; t = 15 मिनट = 900 s; h = 40 m
दक्षता 30% होने से वास्तविक इनपुट शक्ति = उपयोगी शक्ति/दक्षता = 13333/0.30 ≈ 44.4 kW
5.16 दो समरूप बॉल-बियरिंग एक-दूसरे के संपर्क में हैं तथा घर्षणरहित मेज पर विरामावस्था में हैं। इनके साथ समान द्रव्यमान की तीसरी बॉल-बियरिंग, जो V चाल से गतिमान है, सम्मुख संघट्ट करती है। यदि संघट्ट प्रत्यास्थ है तो कौन-सा परिणाम संभव है?
प्रत्येक विकल्प में संवेग तथा गतिज ऊर्जा दोनों की जाँच करें (कुल द्रव्यमान के लिए आरंभिक संवेग = mV, आरंभिक KE = ½mV²):
विकल्प (i): गेंद 1 रुकती है, 2 व 3 मिलकर V/2 चाल से गति करती हैं। संवेग = 2m×(V/2) = mV ✓ परंतु KE = ½(2m)(V/2)² = mV²/4 ≠ ½mV² — असंभव।
विकल्प (ii): गेंदें 1 व 2 विरामावस्था में रहती हैं, गेंद 3, V चाल से गति करती है। संवेग = mV ✓; KE = ½mV² ✓ — यही सही व संभव परिणाम है।
विकल्प (iii): तीनों गेंदें मिलकर V/3 चाल से गति करती हैं। संवेग = 3m×(V/3) = mV ✓ परंतु KE = ½(3m)(V/3)² = mV²/6 ≠ ½mV² — असंभव।
केवल विकल्प (ii) संभव है — यह Newton's Cradle के सिद्धांत के अनुरूप है।
5.17 किसी लोलक के गोलक A को, जो ऊर्ध्वाधर से 30° का कोण बनाता है, छोड़े जाने पर मेज पर विरामावस्था में रखे दूसरे गोलक B से टकराता है। संघट्ट के पश्चात् गोलक A कितना ऊँचा उठता है? (गोलक समान द्रव्यमान के, संघट्ट प्रत्यास्थ)
दोनों गोलक समान पदार्थ व आकार के होने से समान द्रव्यमान के हैं। प्रत्यास्थ संघट्ट में समान द्रव्यमान के दो पिंडों में से एक स्थिर हो, तो गतिमान पिंड (A) पूर्णतः रुक जाता है और स्थिर पिंड (B) A का पूरा वेग प्राप्त कर लेता है (दशा I, अनुभाग 5.11.2)।
अतः संघट्ट के पश्चात् गोलक A बिल्कुल नहीं उठता — यह विरामावस्था में ही रहता है (ऊँचाई = 0), जबकि गोलक B, A के आरंभिक वेग से गति करने लगता है।
5.18 किसी लोलक के गोलक को क्षैतिज अवस्था से छोड़ा गया है। यदि लोलक की लंबाई 1.5 m है तो निम्नतम बिंदु पर आने पर गोलक की चाल क्या होगी? (आरंभिक ऊर्जा का 5% अंश वायु प्रतिरोध में क्षय हो जाता है)
क्षैतिज स्थिति से निम्नतम बिंदु तक ऊँचाई का गिरना h = L = 1.5 m। आरंभिक स्थितिज ऊर्जा = mgL। 5% ऊर्जा क्षय होने से केवल 95% ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित होती है:
v = √(2×0.95×g×L) = √(2×0.95×10×1.5) = √28.5 ≈ 5.34 m/s
5.19 300 kg द्रव्यमान की ट्रॉली, 25 kg रेत का बोरा लिए, घर्षणरहित पथ पर 27 km/h की एकसमान चाल से गतिमान है। कुछ समय पश्चात् बोरे में छिद्र से रेत 0.05 kg/s की दर से रिसकर ट्रॉली के फर्श पर गिरने लगती है। रेत का बोरा खाली होने के पश्चात् ट्रॉली की चाल क्या होगी?
रेत ट्रॉली के फर्श पर सीधे नीचे की ओर रिसती है (ट्रॉली के सापेक्ष शून्य क्षैतिज वेग) — अतः यह ट्रॉली पर कोई बाह्य क्षैतिज बल आरोपित नहीं करती। चूँकि पथ घर्षणरहित है और कोई अन्य बाह्य क्षैतिज बल कार्यरत नहीं है, ट्रॉली (रेत सहित निकाय) का संवेग संरक्षित रहता है और चाल में कोई परिवर्तन नहीं होता।
रेत का बोरा खाली होने के बाद भी ट्रॉली की चाल 27 km/h ही अपरिवर्तित रहेगी।
5.20 0.5 kg द्रव्यमान का कोई कण v = ax3/2 वेग से सरल रेखीय गति करता है जहाँ a = 5 m⁻¹/² s⁻¹ है। x = 0 से x = 2 m तक इसके विस्थापन में कुल बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
x = 0 पर v = 0; x = 2 m पर v = 5×(2)3/2 = 5×2.828 ≈ 14.14 m/s ⟹ v² = a²x³ = 25×8 = 200 m²/s²
5.21 पवनचक्की के ब्लेड, क्षेत्रफल A के वृत्त जितना क्षेत्रफल प्रसर्प करते हैं। (a) यदि हवा v वेग से वृत्त के लंबवत् बहती है तो t समय में इससे गुजरने वाली वायु का द्रव्यमान? (b) वायु की गतिज ऊर्जा? (c) पवनचक्की हवा की 25% ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करती है; A = 30 m², v = 36 km/h, वायु घनत्व = 1.2 kg/m³ के लिए विद्युत शक्ति ज्ञात कीजिए।
(a) t समय में गुजरने वाला आयतन = A × v × t; द्रव्यमान = ρAvt
(b) वायु की गतिज ऊर्जा K = ½(ρAvt)v² = ½ρAv³t
(c) विद्युत शक्ति = 25% × (K/t) = ¼ × (½ρAv³) = (1/8)ρAv³
v = 36 km/h = 10 m/s, A = 30 m², ρ = 1.2 kg/m³
5.22 कोई व्यक्ति वजन कम करने के लिए 10 kg द्रव्यमान को 0.5 m की ऊँचाई तक 1000 बार उठाता है। हर बार द्रव्यमान को नीचे लाने में खोई हुई ऊर्जा क्षय हो जाती है। (a) गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध कार्य? (b) वसा 3.8×10⁷ J/kg ऊर्जा देती हो जो 20% दक्षता से यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित होती है — कितनी वसा खर्च होगी?
(a) प्रति उत्थापन कार्य = mgh = 10×10×0.5 = 50 J; कुल 1000 बार:
(b) 20% दक्षता से 1 kg वसा से उपलब्ध यांत्रिक ऊर्जा = 0.2×3.8×10⁷ = 7.6×10⁶ J/kg
5.23 कोई परिवार 8 kW विद्युत-शक्ति का उपभोग करता है। (a) क्षैतिज सतह पर सौर ऊर्जा की औसत दर 200 W/m² है; इसका 20% भाग उपयोगी विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो सकता है — 8 kW हेतु कितने क्षेत्रफल की आवश्यकता? (b) इसकी तुलना विशिष्ट भवन की छत के क्षेत्रफल से कीजिए।
उपयोगी शक्ति प्रति m² = 0.20 × 200 = 40 W/m²
(b) एक विशिष्ट (मध्यम आकार के) घर की छत का क्षेत्रफल सामान्यतः लगभग 100–150 m² के आसपास होता है — अतः 200 m² आवश्यक क्षेत्रफल इससे थोड़ा अधिक/लगभग तुलनीय है, जो दर्शाता है कि केवल सामान्य घर की छत पर सौर पैनल लगाकर संपूर्ण विद्युत आवश्यकता पूरी करना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है — छायांकन, पैनल का कोण व मौसम जैसी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए।
🎯 NEET/JEE स्तरीय अतिरिक्त प्रश्न
NCERT अभ्यास से आगे बढ़कर — कार्य-ऊर्जा प्रमेय, स्थितिज ऊर्जा, स्प्रिंग, शक्ति व संघट्ट पर आधारित 10 उच्च-स्तरीय अभ्यास प्रश्न।
1 किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा को चार गुना कर दिया जाए, तो उसका संवेग कितने गुना हो जाएगा? NEET
2 लंबी कमानी को 2 cm खींचने पर संचित स्थितिज ऊर्जा U है। इसे 8 cm खींचने पर संचित स्थितिज ऊर्जा? NEET
3 किसी आनत तल (ऊँचाई 10 m) पर 2 kg के गुटके को खिसकाने में 300 J कार्य किया जाता है। घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य? (g = 10 m/s²) NEET
गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध आवश्यक कार्य = mgh = 2×10×10 = 200 J
4 किसी ऊर्ध्वाधर स्प्रिंग (नियतांक k) के मुक्त सिरे से m द्रव्यमान का गुटका जोड़कर विरामावस्था से छोड़ा जाता है (स्प्रिंग आरंभ में अतानित)। स्प्रिंग में अधिकतम खिंचाव? JEE
ऊर्जा संरक्षण से: गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा में कमी = स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि (अधिकतम खिंचाव xm पर वेग शून्य)
5 कोई इंजन नली से जल को v वेग से बाहर फेंकता है। यदि नली में प्रति एकांक लंबाई जल का द्रव्यमान m हो, तो जल को दी जा रही गतिज ऊर्जा की दर? NEET
प्रति सेकंड बाहर निकलने वाला द्रव्यमान (द्रव्यमान प्रवाह दर) = mv
6 विरामावस्था से आरंभ कर, नियत त्वरण से गतिमान M द्रव्यमान के पिंड को समय T में चाल v प्राप्त होती है। समय t पर पिंड को दी जा रही तात्क्षणिक शक्ति? NEET
त्वरण a = v/T; बल F = Ma = Mv/T (अचर); समय t पर वेग = at = vt/T
7 कोई गेंद 2 m/s वेग से गतिमान होकर दुगुने द्रव्यमान की स्थिर गेंद से सम्मुख संघट्ट करती है। यदि प्रत्यावस्थान गुणांक 0.5 है, तो संघट्ट के पश्चात् दोनों के वेग? JEE
माना गेंद 1 (m, u₁=2 m/s) गेंद 2 (2m, u₂=0) से टकराती है। संवेग संरक्षण: m(2) = mv₁ + 2mv₂ ⟹ 2 = v₁ + 2v₂
प्रत्यावस्थान गुणांक: e = (v₂−v₁)/(u₁−u₂) = 0.5 ⟹ v₂ − v₁ = 1
दोनों समीकरणों को हल करने पर: 3v₂ = 3 ⟹ v₂ = 1 m/s; v₁ = v₂ − 1 = 0 m/s
8 m द्रव्यमान का कोई कण h ऊँचाई से गिरकर फर्श से टकराता है और उतनी ही ऊँचाई तक वापस उछलता है। यदि संघट्ट-काल Δt हो, तो फर्श द्वारा कण पर लगाया गया औसत बल? JEE
फर्श से टकराने से ठीक पहले वेग = √(2gh) (नीचे की ओर); टकराने के ठीक बाद वेग = √(2gh) (ऊपर की ओर, क्योंकि उतनी ही ऊँचाई तक उछलता है — प्रत्यास्थ संघट्ट)
संवेग परिवर्तन का परिमाण = m√(2gh) − (−m√(2gh)) = 2m√(2gh)
9 किसी वस्तु पर बल F = (3î+4ĵ) N तथा विस्थापन d = (2î−3ĵ) m। बल द्वारा किया गया कार्य? JEE
10 दो कमानियाँ (बल-स्थिरांक k₁ व k₂, k₁>k₂) — पहले समान विस्तार (केस a) तथा फिर समान बल (केस b) से खींची जाती हैं। कार्यों की तुलना? JEE
केस (a) समान विस्तार x: W = ½kx²; चूँकि k₁ > k₂ ⟹ W₁ > W₂
केस (b) समान बल F: W = F²/(2k); k के व्युत्क्रमानुपाती है ⟹ W₂ > W₁
🏆 NEET/AIPMT में पूछे जा चुके प्रश्न
इस अध्याय से वर्ष 2006 से NEET 2022 तक पूछे गए सभी उपलब्ध प्रश्न — कालानुक्रम में (नवीनतम पहले), पूर्ण हल सहित।
1 यदि किसी लंबी कमानी को 2 cm खींचने पर संचित स्थितिज ऊर्जा U है, तो इसे 8 cm खींचने पर संचित स्थितिज ऊर्जा क्या होगी? AIPMT (Screening) 2006
चरण 1 — सूत्र: V(x) = ½kx² ⟹ V ∝ x²
चरण 2 — अनुपात: V' = U × (8/2)² = U × 16 = 16U
2 किसी आनत तल (ऊँचाई 10 m) पर 2 kg द्रव्यमान के गुटके को ऊपर खिसकाने में 300 J कार्य किया जाता है। g = 10 m/s² लेते हुए, घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य ज्ञात कीजिए। AIPMT (Screening) 2006
3 कोई इंजन नली द्वारा जल पंप करता है। जल नली से v वेग से बाहर निकलता है। यदि नली में जल का प्रति एकांक लंबाई द्रव्यमान m है, तो जल को गतिज ऊर्जा प्रदान करने की दर क्या होगी? AIPMT (Screening) 2009
4 किसी ऊर्ध्वाधर स्प्रिंग (बल-नियतांक k) का एक सिरा छत से बँधा है। M द्रव्यमान के गुटके को स्प्रिंग के निचले सिरे से जोड़कर, स्प्रिंग को आरंभ में अतानित रखते हुए विरामावस्था से छोड़ा जाता है। स्प्रिंग की लंबाई में उत्पन्न अधिकतम विस्तार ज्ञात कीजिए। AIPMT (Screening) 2009
ऊर्जा संरक्षण से (अधिकतम विस्तार xm पर वेग शून्य): गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा में कमी = स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि
5 विरामावस्था से आरंभ करके नियत त्वरण से गतिमान किसी M द्रव्यमान के कण को समय T में चाल v प्राप्त होती है। कण को दी जा रही शक्ति (समय के फलन के रूप में)? AIPMT (Mains) 2010
त्वरण a = v/T; बल F = Ma = Mv/T (अचर बल); समय t पर तात्क्षणिक वेग = at = vt/T
6 कोई इंजन नली-पाइप के माध्यम से जल पंप करता है। जल पाइप से 2 m/s वेग से बाहर निकलता है। पाइप में जल का प्रति एकांक लंबाई द्रव्यमान 100 kg/m है। इंजन की शक्ति ज्ञात कीजिए। AIPMT (Prelims) 2010
7 2 m/s वेग से गतिमान कोई गेंद दुगुने द्रव्यमान की स्थिर गेंद से सम्मुख संघट्ट करती है। यदि प्रत्यावस्थान गुणांक 0.5 है, तो संघट्ट के पश्चात् उनके वेग क्या होंगे? AIPMT (Prelims) 2010
माना गेंद 1 (m, u₁=2 m/s) गेंद 2 (2m, u₂=0) से टकराती है।
संवेग संरक्षण: 2m = mv₁ + 2mv₂ ⟹ v₁ + 2v₂ = 2
प्रत्यावस्थान गुणांक: e = (v₂−v₁)/(u₁−u₂) = 0.5 ⟹ v₂ − v₁ = 1
हल करने पर: 3v₂ = 3 ⟹ v₂ = 1 m/s; v₁ = 0 m/s
उत्तर: पहली गेंद रुक जाती है (v₁ = 0 m/s); दूसरी गेंद 1 m/s की चाल से गति करती है।
8 किसी निकाय की स्थितिज ऊर्जा तब बढ़ती है जब कार्य ______ किया जाता है। AIPMT (Prelims) 2011
स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि तभी होती है जब निकाय द्वारा किसी संरक्षी बल के विरुद्ध कार्य किया जाता है — अर्थात् जब बाह्य कारक द्वारा संरक्षी बल के विरुद्ध धनात्मक कार्य किया जाता है।
अतः यदि Wसंरक्षी बल ऋणात्मक हो (अर्थात् बाह्य कारक बल के विरुद्ध कार्य करे), तो ΔU धनात्मक होगा।
उत्तर: निकाय द्वारा संरक्षी बल के विरुद्ध कार्य किए जाने पर स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है।
9 किसी बल क्षेत्र में कण की स्थितिज ऊर्जा U = A/r² − B/r द्वारा दी गई है, जहाँ A व B धनात्मक नियतांक हैं तथा r कण की दूरी है। साम्यावस्था की दूरी ज्ञात कीजिए। AIPMT (Prelims) 2012
साम्यावस्था पर बल शून्य होता है, अर्थात् dU/dr = 0:
10 दो समरूप कमानियाँ P व Q (बल-नियतांक क्रमशः kP व kQ, जहाँ kP>kQ) को पहले समान विस्तार तक (केस a), फिर समान बल से (केस b) खींचा जाता है। कमानियों द्वारा किए गए कार्य WP व WQ के मध्य संबंध ज्ञात कीजिए। NEET 2015
केस (a) समान विस्तार x: W = ½kx² ⟹ अधिक k वाली कमानी में अधिक कार्य ⟹ WP > WQ (चूँकि kP > kQ)
केस (b) समान बल F: W = F²/(2k) ⟹ कम k वाली कमानी में अधिक कार्य ⟹ WQ > WP
उत्तर: केस (a) में WP > WQ; केस (b) में WQ > WP।
11 m₁ व m₂ द्रव्यमान के दो कण u₁ व u₂ आरंभिक वेगों से गतिमान हैं। संघट्ट पर, एक कण उच्चतर ऊर्जा स्तर पर उत्तेजित हो जाता है, जिसमें ऊर्जा ε अवशोषित होती है। यदि कणों के अंतिम वेग v₁ व v₂ हों, तो संबंध ज्ञात कीजिए। AIPMT 2015 (Cancelled Paper)
ऊर्जा-संरक्षण के अनुसार: कुल आरंभिक गतिज ऊर्जा = कुल अंतिम गतिज ऊर्जा + उत्तेजना में अवशोषित ऊर्जा ε
12 कोई इलेक्ट्रिक लिफ्ट जिसका अधिकतम भार (लिफ्ट+यात्री) 2000 kg है, 1.5 m/s की अचर चाल से ऊपर की ओर गतिमान है। इसकी गति का विरोध करने वाला घर्षण बल 3000 N है। मोटर द्वारा लिफ्ट को प्रदत्त न्यूनतम शक्ति वाट में ज्ञात कीजिए। (g = 10 m/s²) NEET 2022 Phase 2
अचर चाल होने से निवल त्वरण शून्य है — मोटर द्वारा प्रदत्त बल गुरुत्व व घर्षण दोनों को संतुलित करता है:
13 कोई कण पृथ्वी की सतह से S ऊँचाई से छोड़ा जाता है। किसी निश्चित ऊँचाई पर इसकी गतिज ऊर्जा उसकी स्थितिज ऊर्जा की तीन गुनी है। पृथ्वी की सतह से वह ऊँचाई तथा उस क्षण कण की चाल क्रमशः ज्ञात कीजिए। NEET 2022 Phase 1
माना ऊँचाई h पर PE = mgh तथा KE = mg(S−h) (चूँकि S−h दूरी गिर चुकी है)। दिया गया प्रतिबंध: KE = 3 × PE
14 किसी टरबाइन को चलाने के लिए जल 60 m की ऊँचाई से 15 kg/s की दर से गिरता है। घर्षण बल के कारण होने वाली क्षति निवेशी (input) ऊर्जा की 10% है। टरबाइन द्वारा कितनी शक्ति उत्पन्न की जाती है? NEET 2021
निवेशी शक्ति (input power) = (dm/dt) × g × h = 15×10×60 = 9000 W
घर्षण में क्षति = 10% × 9000 = 900 W
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं।
- यह अध्याय NEET में प्रतिवर्ष लगभग 2–3 प्रश्न (8–12 अंक) रखता है — यह भौतिकी के सर्वाधिक भारांक वाले अध्यायों में से एक है; सर्वाधिक बार पूछे गए उप-विषय — संघट्ट (विशेषकर 1D प्रत्यास्थ संघट्ट के विशेष प्रकरण), स्थितिज ऊर्जा वक्र विश्लेषण तथा शक्ति की गणना।
- कार्य-ऊर्जा प्रमेय कोई स्वतंत्र नियम नहीं, बल्कि न्यूटन के द्वितीय नियम का ही समाकल रूप है — यह वैचारिक तथ्य बहुविकल्पीय प्रश्नों में प्रत्यक्ष रूप से पूछा जाता है।
- ऊर्जा-संरक्षण का सार्वत्रिक नियम — किसी विलगित (isolated) निकाय की कुल ऊर्जा नियत रहती है; ऊर्जा का एक रूप (यांत्रिक, ऊष्मीय, रासायनिक, विद्युत, नाभिकीय आदि) दूसरे रूप में रूपांतरित हो सकता है, परन्तु कुल ऊर्जा का सृजन या विनाश असंभव है — यह भौतिकी के सर्वाधिक मौलिक संरक्षण नियमों में से एक है।
- द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता (mass-energy equivalence) — आइंस्टाइन के अनुसार द्रव्यमान स्वयं ऊर्जा का एक रूप है: E = mc² (जहाँ c = प्रकाश की चाल); नाभिकीय विखंडन (fission) व संलयन (fusion) में मुक्त विशाल ऊर्जा इसी सिद्धांत पर आधारित है।
- स्थितिज ऊर्जा वक्र (PE vs x ग्राफ) का विश्लेषण — जहाँ dV/dx = 0 (वक्र का ढाल शून्य) होता है, वहाँ बल शून्य होता है — इसे साम्यावस्था (equilibrium) बिंदु कहते हैं; यदि उस बिंदु पर V न्यूनतम है तो स्थायी साम्य (stable), V अधिकतम है तो अस्थायी साम्य (unstable), तथा V उस परिसर में नियत रहे तो उदासीन साम्य (neutral) कहलाता है।
- अनुज्ञेय गति-क्षेत्र (allowed region) व मोड़-बिंदु (turning points) — यदि केवल संरक्षी बल कार्यरत हों तो कुल ऊर्जा E नियत रहती है; किसी बिंदु x पर K = E − V(x); कण केवल उन्हीं क्षेत्रों में गति कर सकता है जहाँ E ≥ V(x) (अन्यथा K ऋणात्मक हो जाएगी, जो असंभव है)।
- 1D प्रत्यास्थ संघट्ट के सामान्य सूत्र — द्रव्यमान m₁ (वेग u₁) व m₂ (वेग u₂) की सम्मुख प्रत्यास्थ संघट्ट के लिए अंतिम वेग:
v₁ = [(m₁−m₂)u₁+2m₂u₂]/(m₁+m₂) | v₂ = [(m₂−m₁)u₂+2m₁u₁]/(m₁+m₂)इन्हीं सामान्य सूत्रों से "समान द्रव्यमान" व "एक स्थिर भारी/हल्का पिंड" जैसे विशेष प्रकरण व्युत्पन्न किए जाते हैं।
- प्रत्यास्थ संघट्ट का आपेक्षिक वेग नियम — प्रत्यास्थ संघट्ट में संपर्क-पूर्व व संपर्क-पश्चात आपेक्षिक वेग का परिमाण बराबर रहता है: u₁ − u₂ = −(v₁ − v₂); इसी नियम से प्रत्यावस्थान गुणांक e = 1 प्राप्त होता है, जबकि पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट में e = 0 व आंशिक अप्रत्यास्थ संघट्ट में 0 < e < 1।
- प्रत्यावस्थान गुणांक (coefficient of restitution) का सूत्र: e = (संघट्ट-पश्चात आपेक्षिक वेग)/(संघट्ट-पूर्व आपेक्षिक वेग) = (v₂ − v₁)/(u₁ − u₂); e का मान संघट्ट के प्रकार को परिभाषित करता है तथा गतिज ऊर्जा की क्षति की गणना में प्रयुक्त होता है।
- तिरछा (oblique/2D) संघट्ट — जब संघट्ट किसी सरल रेखा में न होकर समतल में हो, तो संवेग संरक्षण को x व y दोनों दिशाओं में अलग-अलग लागू किया जाता है (Σpx = स्थिर, Σpy = स्थिर); समान द्रव्यमान वाले पिंडों के तिरछे प्रत्यास्थ संघट्ट में (एक पिंड प्रारंभ में स्थिर) संघट्ट-पश्चात दोनों पिंड सदैव परस्पर लंबवत् (90°) दिशाओं में गति करते हैं।
- तात्क्षणिक शक्ति व कोण θ का प्रभाव — P = dW/dt = F·v (सदिशों का अदिश गुणनफल), अर्थात् P = Fv cos θ (θ बल व वेग के मध्य कोण); θ = 90° होने पर तात्क्षणिक शक्ति शून्य होती है, भले ही बल व वेग दोनों अशून्य हों।
- शक्ति की व्यावहारिक इकाइयाँ — 1 अश्वशक्ति (horsepower, hp) = 746 वाट; 1 किलोवाट-घंटा (kWh, विद्युत बिल की "यूनिट") = 3.6×10⁶ जूल — यह वास्तव में ऊर्जा की इकाई है, शक्ति की नहीं; यह भ्रम अक्सर वैचारिक प्रश्नों में जाँचा जाता है।
- संरक्षी बल की कसौटी — बल F संरक्षी है यदि व केवल यदि उसका कार्य पथ-निरपेक्ष (path-independent) हो, अर्थात् किसी बंद पथ पर कुल कार्य शून्य हो; ऐसे बल को सदैव किसी स्थितिज ऊर्जा फलन F = −dV/dx के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।
- घर्षण — एक असंरक्षी बल — घर्षण द्वारा किया गया कार्य सदैव ऋणात्मक होता है व यांत्रिक ऊर्जा को ऊष्मा में रूपांतरित करता है; अतः घर्षण की उपस्थिति में केवल कुल ऊर्जा (यांत्रिक + ऊष्मीय) संरक्षित रहती है, केवल यांत्रिक ऊर्जा नहीं।
- कार्य-ऊर्जा प्रमेय बनाम ऊर्जा संरक्षण — कब कौन सा प्रयोग करें — यदि प्रश्न में सभी बल ज्ञात हों तो कार्य-ऊर्जा प्रमेय (Kf − Ki = Wnet) सीधा प्रयोग करना सरल पड़ता है; यदि केवल संरक्षी बल कार्यरत हों तो यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण (Ki + Vi = Kf + Vf) अधिक तीव्र व त्रुटि-रहित विधि है — प्रश्न में बलों की प्रकृति पहचानना हल का पहला कदम होना चाहिए।
- चर बल के अंतर्गत कार्य की गणना — यदि बल का व्यंजक F(x) ज्ञात हो तो कार्य W = ∫F(x)dx (समाकलन); यदि केवल F बनाम x का ग्राफ दिया हो तो कार्य = ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल (चाहे ग्राफ रैखिक हो या वक्रीय)।