हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन
वर्गीकरण व नामपद्धति से लेकर विरचन की विधियाँ, भौतिक-रासायनिक गुण, SN1/SN2 क्रियाविधि, त्रिविम रसायन (काइरलता) तथा पॉलिहैलोजन यौगिकों तक — संपूर्ण अध्याय की अवधारणाएँ, रंगीन तालिकाएँ, आरेख, तथा सभी पाठ्यनिहित एवं अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
6.1 परिचय
जब किसी हाइड्रोकार्बन (एलिफैटिक अथवा ऐरोमैटिक) के एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणुओं का स्थान हैलोजन परमाणु (F, Cl, Br, I) ले लेता है, तो बना हुआ यौगिक हैलोजनयुक्त हाइड्रोकार्बन कहलाता है। ऐलिफैटिक श्रृंखला से बने यौगिक हैलोऐल्केन (ऐल्किल हैलाइड, R–X) कहलाते हैं, जबकि ऐरोमैटिक वलय से सीधे जुड़े यौगिक हैलोऐरीन (ऐरिल हैलाइड, Ar–X) कहलाते हैं।
दोनों में मूल अंतर यह है कि हैलोऐल्केन में हैलोजन परमाणु sp³ संकरित कार्बन से बंधा रहता है, जबकि हैलोऐरीन में यह sp² संकरित कार्बन से बंधा रहता है। यही संरचनात्मक अंतर आगे चलकर दोनों वर्गों की अभिक्रियाशीलता में बड़ा फर्क पैदा करता है।
6.2 वर्गीकरण
6.2.1 हैलोजन परमाणुओं की संख्या के आधार पर
संरचना में उपस्थित हैलोजन परमाणुओं की संख्या के अनुसार यौगिकों को मोनोहैलो (1 हैलोजन), डाइहैलो (2 हैलोजन) तथा पॉलिहैलो — ट्राइ, टेट्रा आदि (3 या अधिक हैलोजन) — में बाँटा जाता है।
6.2.2 कार्बन के संकरण के आधार पर
(क) sp³ C–X आबंध युक्त यौगिक
ऐल्किल हैलाइड (R–X): हैलोजन परमाणु sp³ संकरित ऐल्किल कार्बन से जुड़ा होता है। इनका सामान्य सूत्र CnH2n+1X है। उस कार्बन की प्रकृति के अनुसार, जिससे हैलोजन जुड़ा है, इन्हें आगे तीन उप-वर्गों में बाँटा जाता है:
| प्रकार | हैलोजन-वाहक कार्बन से जुड़े कार्बनों की संख्या | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्राथमिक (1°) | 1 कार्बन | CH₃CH₂–X |
| द्वितीयक (2°) | 2 कार्बन | (CH₃)₂CH–X |
| तृतीयक (3°) | 3 कार्बन | (CH₃)₃C–X |
ऐलिलिक हैलाइड: हैलोजन परमाणु C=C द्विआबंध से सटे sp³ संकरित कार्बन (ऐलिलिक कार्बन) से जुड़ा रहता है — उदा. CH₂=CH–CH₂X
बेन्जिलिक हैलाइड: हैलोजन परमाणु ऐरोमैटिक वलय से सीधे जुड़े sp³ संकरित कार्बन से जुड़ा रहता है — उदा. C₆H₅–CH₂X
(ख) sp² C–X आबंध युक्त यौगिक
वाइनिलिक हैलाइड: हैलोजन परमाणु C=C द्विआबंध के sp² संकरित कार्बन से सीधे जुड़ा रहता है — उदा. CH₂=CHX
ऐरिल हैलाइड: हैलोजन परमाणु ऐरोमैटिक वलय के sp² संकरित कार्बन से सीधे जुड़ा रहता है — उदा. C₆H₅X
- हैलोऐल्केन में C–X आबंध sp³ कार्बन के साथ; हैलोऐरीन में sp² कार्बन के साथ।
- ऐलिलिक हैलाइड: हैलोजन द्विआबंध के निकटवर्ती sp³ कार्बन पर; वाइनिलिक: हैलोजन स्वयं sp² कार्बन पर।
- बेन्जिलिक हैलाइड: हैलोजन वलय से जुड़े sp³ कार्बन पर; ऐरिल: हैलोजन सीधे वलय पर।
6.3 नामपद्धति
सामान्य नाम: पहले ऐल्किल समूह का नाम लिखकर उसके बाद हैलाइड शब्द जोड़ा जाता है — जैसे एथिल क्लोराइड।
IUPAC नाम: हैलोजन को हैलो-प्रतिस्थापी मानकर मूल हाइड्रोकार्बन शृंखला में उपसर्ग के रूप में जोड़ा जाता है — जैसे क्लोरोएथेन। दो या अधिक हैलोजन होने पर उन्हें अंकों (1,2 / 1,3 आदि) से स्थान दिया जाता है, जबकि सामान्य पद्धति में एक-हैलोजन बेन्जीन व्युत्पन्नों के लिए o-, m-, p- उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं।
| प्रारूप | सामान्य नाम | IUPAC नाम |
|---|---|---|
| CH₃CH₂CH₂Br | n-प्रोपिल ब्रोमाइड | 1-ब्रोमोप्रोपेन |
| (CH₃)₂CHCl | आइसोप्रोपिल क्लोराइड | 2-क्लोरोप्रोपेन |
| (CH₃)₃CBr | tert-ब्यूटिल ब्रोमाइड | 2-ब्रोमो-2-मेथिलप्रोपेन |
| CH₂=CHCl | वाइनिल क्लोराइड | क्लोरोएथीन |
| CH₂=CHCH₂Br | ऐलिल ब्रोमाइड | 3-ब्रोमोप्रोपीन |
| C₆H₅CH₂Cl | बेन्जिल क्लोराइड | क्लोरोफेनिलमेथेन |
| CH₂Cl₂ | मेथिलीन क्लोराइड | डाइक्लोरोमेथेन |
| CHCl₃ | क्लोरोफॉर्म | ट्राइक्लोरोमेथेन |
| CCl₄ | कार्बन टेट्राक्लोराइड | टेट्राक्लोरोमेथेन |
प्रश्न: C₅H₁₁Br सूत्र वाले संरचनात्मक समावयवियों को प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक ब्रोमाइडों में वर्गीकृत कीजिए।
हल: पेन्टिल ब्रोमाइड (C₅H₁₁Br) के आठ संरचनात्मक समावयवी संभव हैं —
| संरचना | IUPAC नाम | वर्ग |
|---|---|---|
| CH₃CH₂CH₂CH₂CH₂Br | 1-ब्रोमोपेन्टेन | 1° |
| CH₃CH₂CH₂CH(Br)CH₃ | 2-ब्रोमोपेन्टेन | 2° |
| CH₃CH₂CH(Br)CH₂CH₃ | 3-ब्रोमोपेन्टेन | 2° |
| (CH₃)₂CHCH₂CH₂Br | 1-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन | 1° |
| (CH₃)₂CHCH(Br)CH₃ | 2-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन | 2° |
| (CH₃)₂CBrCH₂CH₃ | 2-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन | 3° |
| CH₃CH₂CH(CH₃)CH₂Br | 1-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन | 1° |
| (CH₃)₃CCH₂Br | 1-ब्रोमो-2,2-डाइमेथिलप्रोपेन (नियोपेन्टिल ब्रोमाइड) | 1° |
6.4 C–X आबंध की प्रकृति
हैलोजन परमाणु कार्बन से अधिक विद्युतऋणात्मक होता है, इसलिए C–X आबंध ध्रुवीय होता है — कार्बन पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश (δ−) आ जाता है। आवर्त सारणी में वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ता है (F सबसे छोटा, I सबसे बड़ा), इसलिए C–X आबंध की लंबाई F से I की ओर बढ़ती जाती है, जबकि आबंध एन्थैल्पी घटती जाती है।
| आबंध | आबंध लंबाई (pm) | आबंध एन्थैल्पी (kJ/mol) | द्विध्रुव आघूर्ण (D) |
|---|---|---|---|
| CH₃–F | 139 | 452 | 1.847 |
| CH₃–Cl | 178 | 351 | 1.860 |
| CH₃–Br | 193 | 293 | 1.830 |
| CH₃–I | 214 | 234 | 1.636 |
- C–X आबंध की ध्रुवता के कारण ही ऐल्किल हैलाइड नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ देते हैं।
- आबंध लंबाई क्रम: C–F < C–Cl < C–Br < C–I
- आबंध एन्थैल्पी (शक्ति) क्रम: C–F > C–Cl > C–Br > C–I
6.5 ऐल्किल हैलाइडों के विरचन की विधियाँ
6.5.1 ऐल्कोहॉलों से
ऐल्कोहॉल के –OH समूह को सांद्र हैलोजन अम्ल, फॉस्फोरस हैलाइड अथवा थायोनिल क्लोराइड की सहायता से हैलोजन द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। थायोनिल क्लोराइड सर्वोत्तम अभिकर्मक माना जाता है क्योंकि इस अभिक्रिया में बनने वाले दोनों उप-उत्पाद (SO₂ तथा HCl) गैसीय होते हैं और सरलता से पृथक हो जाते हैं, जिससे शुद्ध ऐल्किल हैलाइड प्राप्त होता है।
R–OH + NaBr + H₂SO₄ → R–Br + NaHSO₄ + H₂O
3R–OH + PX₃ → 3R–X + H₃PO₃ (X = Cl, Br)
R–OH + PCl₅ → R–Cl + POCl₃ + HCl
R–OH + SOCl₂ —(पिरिडीन)→ R–Cl + SO₂ + HCl
6.5.2 हाइड्रोकार्बनों से
(i) मुक्त मूलक हैलोजनन: ऐल्केनों का UV प्रकाश अथवा ताप की उपस्थिति में Cl₂/Br₂ से मुक्त मूलक हैलोजनन कराने पर समावयवी मोनो व पॉलिहैलो उत्पादों का जटिल मिश्रण बनता है, जिसे पृथक करना कठिन होता है — इसलिए यह विधि व्यावहारिक रूप से सीमित उपयोग की है।
(ii) ऐल्कीनों से हाइड्रोजन हैलाइड का योगज: HCl, HBr अथवा HI के योग से ऐल्कीन संगत ऐल्किल हैलाइड में बदल जाती है। असममित ऐल्कीन (जैसे प्रोपीन) की अभिक्रिया मार्कोनीकॉफ के नियमानुसार होती है — हैलोजन उस कार्बन पर जुड़ता है जिस पर पहले से कम हाइड्रोजन हों (अर्थात् अधिक प्रतिस्थापित कार्बन पर)।
(iii) ऐल्कीनों में हैलोजन का योगज: CCl₄ में घुली Br₂ को ऐल्कीन में डालने पर लाल रंग विलुप्त हो जाता है — यह द्विआबंध की पहचान की एक प्रयोगशाला विधि है। इससे सन्निधि डाइब्रोमाइड (Vic-dibromide) बनता है।
6.5.3 हैलोजन विनिमय द्वारा
फिंकेल्स्टाइन अभिक्रिया: ऐल्किल क्लोराइड/ब्रोमाइड की शुष्क ऐसीटोन में NaI के साथ अभिक्रिया से ऐल्किल आयोडाइड प्राप्त होता है। बना हुआ NaCl/NaBr ऐसीटोन में अविलेय होकर अवक्षेपित हो जाता है, जिससे ले-शातैलिए के सिद्धांत अनुसार अग्र अभिक्रिया आगे बढ़ती रहती है।
स्वार्ट्स अभिक्रिया: ऐल्किल क्लोराइड/ब्रोमाइड को AgF, Hg₂F₂, CoF₂ अथवा SbF₃ जैसे धात्विक फ्लुओराइडों के साथ गरम करने पर ऐल्किल फ्लुओराइड प्राप्त होता है — यह ऐल्किल फ्लुओराइड बनाने की सर्वोत्तम विधि है।
- थायोनिल क्लोराइड विधि सर्वोत्तम है क्योंकि दोनों उपोत्पाद (SO₂, HCl) गैसें हैं और आसानी से निकल जाते हैं।
- ऐल्कोहॉल व KI की अभिक्रिया में H₂SO₄ का उपयोग नहीं करते — यह KI को HI में बदलकर उसे I₂ में ऑक्सीकृत कर देता है (KI का ऑक्सीकारक प्रभाव)।
- फिंकेल्स्टाइन अभिक्रिया आयोडाइड बनाने के लिए, स्वार्ट्स अभिक्रिया फ्लुओराइड बनाने के लिए प्रयुक्त होती है।
- मार्कोनीकॉफ नियम: HX का H उस कार्बन पर जुड़ता है जिस पर पहले से अधिक हाइड्रोजन हों।
प्रश्न: (CH₃)₂CHCH₂CH₃ के मुक्त मूलक क्लोरीनन से बनने वाले सभी संभावित मोनोक्लोरो समावयवी पहचानिए।
हल: 2-मेथिलब्यूटेन में चार भिन्न प्रकार के हाइड्रोजन परमाणु हैं, अतः चार मोनोक्लोरो व्युत्पन्न प्राप्त होंगे — (CH₃)₂CHCH₂CH₂Cl, (CH₃)₂CHCH(Cl)CH₃, (CH₃)₂C(Cl)CH₂CH₃, CH₃CH(CH₂Cl)CH₂CH₃
6.6 हैलोऐरीनों का विरचन
6.6.1 हाइड्रोकार्बनों से इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन द्वारा
ऐरीन की आयरन (या FeCl₃, अथवा किसी अन्य लूइस अम्ल) उत्प्रेरक की उपस्थिति में Cl₂/Br₂ द्वारा इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन कराने से ऐरिल क्लोराइड/ब्रोमाइड सरलता से प्राप्त होते हैं। आर्थो व पैरा समावयवी बनते हैं, जिन्हें गलनांक में बड़े अंतर के कारण आसानी से पृथक किया जा सकता है।
आयोडीन के साथ अभिक्रिया उत्क्रमणीय होती है और बनने वाले HI को हटाने के लिए HNO₃ या HIO₃ जैसे ऑक्सीकरण कर्मक की आवश्यकता होती है। फ्लुओरीन की अत्यधिक क्रियाशीलता के कारण इस विधि से फ्लुओरीनयुक्त ऐरीन नहीं बनाए जाते।
6.6.2 ऐमीनों से (सैंडमायर व गैटरमैन अभिक्रिया)
ठंडे जलीय खनिज अम्ल में प्राथमिक ऐरोमैटिक ऐमीन को सोडियम नाइट्राइट के साथ 273–278K पर अभिकृत करने पर डाइऐज़ोनियम लवण बनता है। इस डाइऐज़ोनियम लवण को क्यूप्रस क्लोराइड/ब्रोमाइड के साथ अभिकृत करने पर –Cl/–Br समूह से प्रतिस्थापन होता है (सैंडमायर अभिक्रिया)। यदि आयोडीन युक्त उत्पाद चाहिए तो केवल KI के साथ हिलाना पर्याप्त है — यहाँ क्यूप्रस लवण आवश्यक नहीं होता।
ArN₂⁺Cl⁻ —(Cu₂Cl₂)→ ArCl + N₂
ArN₂⁺Br⁻ —(Cu₂Br₂)→ ArBr + N₂
ArN₂⁺X⁻ —(KI)→ ArI + N₂
- सैंडमायर अभिक्रिया द्वारा –Cl व –Br प्रतिस्थापन के लिए क्यूप्रस हैलाइड आवश्यक है; आयोडीन प्रतिस्थापन के लिए नहीं।
- फ्लुओरीनयुक्त ऐरीन प्रत्यक्ष इलेक्ट्रॉनरागी हैलोजनन से नहीं बनाए जाते — फ्लुओरीन की अत्यधिक क्रियाशीलता के कारण।
- डाइऐज़ोनियम लवण को 273–278K (0–5°C) पर ही बनाया जाता है ताकि यह विघटित न हो।
6.7 भौतिक गुण
शुद्ध ऐल्किल हैलाइड रंगहीन होते हैं, परंतु ब्रोमाइड व आयोडाइड प्रकाश में रंगीन हो जाते हैं। मेथिल क्लोराइड, मेथिल ब्रोमाइड, एथिल क्लोराइड जैसे निम्न सदस्य कमरे के ताप पर गैस होते हैं, जबकि उच्च सदस्य द्रव या ठोस होते हैं।
क्वथनांक/गलनांक: कार्बनिक हैलोजन यौगिकों के अणु ध्रुवीय होते हैं, इसलिए इनमें प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव तथा वान्डरवाल्स आकर्षण बल पाए जाते हैं, जिस कारण इनके क्वथनांक तुल्य द्रव्यमान वाले हाइड्रोकार्बनों से अधिक होते हैं। समान ऐल्किल समूह के लिए क्वथनांक क्रम R–I > R–Br > R–Cl > R–F होता है (हैलोजन परमाणु के आकार व द्रव्यमान बढ़ने से वान्डरवाल्स बल बढ़ता है)। समावयवी हैलोऐल्केनों में शृंखलन बढ़ने के साथ क्वथनांक घटता है।
घनत्व: ब्रोमो, आयडो तथा पॉलिक्लोरो व्युत्पन्न जल से भारी होते हैं। कार्बन, हैलोजन परमाणुओं की संख्या तथा हैलोजन के द्रव्यमान के बढ़ने से घनत्व बढ़ता है।
विलेयता: हैलोऐल्केन जल में अल्प विलेय होते हैं क्योंकि हैलोऐल्केन के अणुओं के मध्य आकर्षण व जल के हाइड्रोजन आबंध को तोड़ने में जितनी ऊर्जा लगती है, नए आकर्षण बल बनने से उतनी ऊर्जा मुक्त नहीं होती। ये कार्बनिक विलायकों में पूर्ण विलेय होते हैं।
- क्वथनांक क्रम: R–I > R–Br > R–Cl > R–F (समान ऐल्किल समूह)
- समावयवी हैलोऐल्केनों में शृंखलन बढ़ने पर क्वथनांक घटता है।
- पैरा-डाइहैलोबेन्जीन का गलनांक ऑर्थो व मेटा से अधिक (सममिति के कारण क्रिस्टल जालक में बेहतर समायोजन)।
- हैलोऐल्केन जल में अल्प-विलेय परंतु कार्बनिक विलायकों में पूर्ण-विलेय होते हैं।
6.8 हैलोऐल्केनों की अभिक्रियाएँ
हैलोऐल्केनों की अभिक्रियाओं को तीन संवर्गों में बाँटा जाता है — (1) नाभिकरागी प्रतिस्थापन, (2) निराकरण (विलोपन) अभिक्रियाएँ तथा (3) धातुओं के साथ अभिक्रिया।
6.8.1 नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ
नाभिकरागी (Nu⁻) इलेक्ट्रॉन-धनी स्पीशीज़ होते हैं, जो क्रियाधार के उस भाग पर आक्रमण करते हैं जहाँ इलेक्ट्रॉनों की अल्पता होती है — अर्थात् हैलोजन से जुड़े δ+ कार्बन पर। हैलाइड आयन (अवशिष्ट समूह) निकल जाता है और नाभिकरागी उसका स्थान ले लेता है।
| अभिकर्मक | नाभिकरागी | उत्पाद R–Nu | उत्पाद वर्ग |
|---|---|---|---|
| NaOH / KOH | OH⁻ | R–OH | ऐल्कोहॉल |
| H₂O | H₂O | R–OH | ऐल्कोहॉल |
| NaOR′ | R′O⁻ | R–OR′ | ईथर |
| NaI | I⁻ | R–I | ऐल्किल आयोडाइड |
| NH₃ | :NH₃ | R–NH₂ | प्राथमिक ऐमीन |
| KCN | :C≡N⁻ (C से जुड़ता है) | R–CN | नाइट्राइल |
| AgCN | Ag–C≡N: (N से जुड़ता है) | R–NC | आइसोनाइट्राइल |
| KNO₂ | O–N=O⁻ (O से जुड़ता है) | R–O–N=O | ऐल्किल नाइट्राइट |
| AgNO₂ | Ag–O–N=O (N से जुड़ता है) | R–NO₂ | नाइट्रोऐल्केन |
| R′COOAg | R′COO⁻ | R′COOR | एस्टर |
| LiAlH₄ | H⁻ | R–H | हाइड्रोकार्बन |
SN2 क्रियाविधि (द्विअणुक नाभिकरागी प्रतिस्थापन)
यह एकपदीय (एक ही चरण में) अभिक्रिया है — कोई मध्यवर्ती नहीं बनता। दर दोनों अभिकारकों (नाभिकरागी व क्रियाधार) की सांद्रता पर निर्भर करती है, अतः यह द्वितीय-कोटि की बलगतिकी दर्शाती है। स्थूल समूह (जैसे 3° हैलाइड में) आगमनकारी नाभिकरागी के लिए त्रिविम अवरोध उत्पन्न करते हैं, इसलिए अभिक्रियाशीलता का क्रम है — मेथिल > प्राथमिक > द्वितीयक > तृतीयक।
SN1 क्रियाविधि (एकाणुक नाभिकरागी प्रतिस्थापन)
यह अभिक्रिया दो चरणों में होती है — पहले चरण में C–X आबंध का धीमा विदलन होकर कार्बोकैटायन तथा हैलाइड आयन बनते हैं (यह चरण दर-निर्धारक है); दूसरे चरण में नाभिकरागी कार्बोकैटायन पर तीव्रता से आक्रमण करता है। दर केवल ऐल्किल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करती है (प्रथम-कोटि बलगतिकी)। कार्बोकैटायन का स्थायित्व जितना अधिक होगा, अभिक्रिया उतनी ही तीव्र होगी — अभिक्रियाशीलता क्रम तृतीयक > द्वितीयक > प्राथमिक (SN2 के विपरीत) है।
| गुण | SN2 | SN1 |
|---|---|---|
| चरण | एक (एकपदीय) | दो (मध्यवर्ती सहित) |
| बलगतिकी | द्वितीय-कोटि, दर = k[R–X][Nu⁻] | प्रथम-कोटि, दर = k[R–X] |
| अभिक्रियाशीलता क्रम | मेथिल > 1° > 2° > 3° | 3° > 2° > 1° > मेथिल |
| विन्यास पर प्रभाव | प्रतीपन | रेसिमीकरण |
| अनुकूल विलायक | ध्रुवीय अप्रोटिक | ध्रुवीय प्रोटिक |
| मध्यवर्ती | कोई नहीं | कार्बोकैटायन |
प्रश्न: हैलोऐल्केन की KCN से अभिक्रिया मुख्य उत्पाद के रूप में ऐल्किल सायनाइड देती है, जबकि AgCN से आइसोसायनाइड प्रमुख उत्पाद के रूप में मिलता है — समझाइए।
हल: KCN मुख्यतः आयनिक होता है और विलयन में स्वतंत्र CN⁻ आयन देता है। आक्रमण मुख्यतः कार्बन द्वारा होता है क्योंकि C–C आबंध C–N आबंध से अधिक स्थायी होता है। AgCN मुख्यतः सहसंयोजक प्रकृति का है, इसका N-परमाणु इलेक्ट्रॉन युगल देने में अधिक उपलब्ध रहता है, अतः आइसोसायनाइड बनता है।
6.8.2 निराकरण (β-विलोपन) अभिक्रिया
β-हाइड्रोजन युक्त हैलोऐल्केन को पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के ऐल्कोहॉली विलयन के साथ गरम करने पर β-कार्बन से H तथा α-कार्बन से X का विलोपन होकर ऐल्कीन बनती है — β-विलोपन।
6.8.3 धातुओं के साथ अभिक्रिया
ग्रीन्यार अभिक्रिया: हैलोऐल्केन की शुष्क ईथर में Mg से अभिक्रिया से ऐल्किल मैग्नीशियम हैलाइड (ग्रीन्यार अभिकर्मक, RMgX) बनता है।
ग्रीन्यार अभिकर्मक अत्यंत क्रियाशील होते हैं — जल, ऐल्कोहॉल, ऐमीन से अभिक्रिया कर हाइड्रोकार्बन बनाते हैं, इसलिए इनका विरचन निर्जलीय दशाओं में करना आवश्यक है।
वुर्ट्ज़ अभिक्रिया: ऐल्किल हैलाइड की शुष्क ईथर में सोडियम धातु से अभिक्रिया कराने पर सममित हाइड्रोकार्बन बनता है।
- ग्रीन्यार अभिकर्मक में C–Mg आबंध अत्यधिक ध्रुवीय सहसंयोजक होता है; Mg–X आबंध लगभग आयनिक होता है।
- ग्रीन्यार अभिकर्मक निर्जलीय ईथर में ही बनाना चाहिए — जल की लेशमात्र भी अभिकर्मक को हाइड्रोकार्बन में बदल देती है।
- वुर्ट्ज़ अभिक्रिया केवल सममित ऐल्केन बनाने में प्रभावी है — असममित के लिए मिश्रित उत्पाद बनते हैं।
6.9 नाभिकरागी प्रतिस्थापन का त्रिविम रासायनिक पहलू
ध्रुवण घूर्णकता: कुछ यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमाते हैं — दक्षिण-घूर्णक (d या +) व वाम-घूर्णक (l या −)।
काइरलता: जो अणु अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपित नहीं हो सकता, वह काइरल है। जिस कार्बन से चार भिन्न समूह जुड़े हों, वह असममित कार्बन (काइरल केंद्र) कहलाता है — काइरल अणु का एक सहायक संकेत। काइरल अणु ध्रुवण घूर्णक होते हैं।
प्रतिबिंब रूप (एनैन्टियोमर): अध्यारोपित न होने वाले दर्पण प्रतिबिंब — भौतिक गुण समान, ध्रुवण घूर्णन की दिशा विपरीत।
रेसिमीकरण: दो प्रतिबिंब रूपों का 50:50 मिश्रण (dl या ±) — शुद्ध घूर्णन शून्य।
धारण (Retention): अभिक्रिया में विन्यास अपरिवर्तित रहता है।
प्रतीपन (Inversion): SN2 में नाभिकरागी पीछे से आक्रमण कर विन्यास को उलट देता है (Walden प्रतिलोमन)।
SN1 में रेसिमीकरण: समतलीय कार्बोकैटायन पर दोनों फलकों से आक्रमण संभव — धारण व प्रतीपन दोनों उत्पाद बनते हैं (नेट रेसिमीकरण, प्रायः आंशिक रेसिमीकरण व नेट प्रतिलोमन देखा जाता है)।
प्रश्न: निम्नलिखित युगलों में काइरल व एकाइरल यौगिक पहचानिए — (क) 2-ब्रोमोब्यूटेन के दो त्रिविम रूप (ख) पेन्टेन-2-ऑल के दर्पण प्रतिबिंब रूप (ग) 2-क्लोरोब्यूटेन तथा 1-ब्रोमोब्यूटेन
हल: (क) 2-ब्रोमोब्यूटेन के दोनों रूप काइरल (C2 पर चार भिन्न समूह) — एनैन्टियोमर। (ख) पेन्टेन-2-ऑल काइरल है (OH, H, CH₃, प्रोपिल)। (ग) 2-क्लोरोब्यूटेन काइरल, 1-ब्रोमोब्यूटेन एकाइरल।
6.10 हैलोऐरीनों की अभिक्रियाएँ
6.10.1 नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति कम अभिक्रियाशीलता — कारण
- अनुनाद प्रभाव: हैलोजन का एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल वलय के π-इलेक्ट्रॉनों के साथ संयुग्मन में भाग लेता है, C–X आबंध में आंशिक द्विआबंधी गुण आ जाता है — आबंध छोटा व मज़बूत हो जाता है।
- sp² कार्बन का प्रभाव: हैलोऐरीन में हैलोजन sp² कार्बन से जुड़ा होता है (sp³ की तुलना में अधिक s-गुण), C–X आबंध लंबाई कम (169 pm) व शक्ति अधिक।
- फेनिल धनायन का अस्थायित्व: SN1 मार्ग से बनने वाला फेनिल धनायन अनुनाद द्वारा स्थायी नहीं हो पाता।
- प्रतिकर्षण: इलेक्ट्रॉन-धनी नाभिकरागी का इलेक्ट्रॉन-धनी वलय पर आक्रमण करना कठिन होता है।
हाइड्रॉक्सिल समूह द्वारा प्रतिस्थापन: उग्र परिस्थितियों (623K, 300 atm) में क्लोरोबेन्जीन की जलीय NaOH से अभिक्रिया कराकर फीनॉल बनाया जा सकता है — डाओ प्रक्रम।
–NO₂ समूह का प्रभाव: ऑर्थो/पैरा स्थिति पर –NO₂ की उपस्थिति अभिक्रियाशीलता बढ़ाती है (मध्यवर्ती कार्बऋणायन स्थायित्व); मेटा –NO₂ का कोई प्रभाव नहीं।
6.10.2 इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ
हैलोऐरीन, बेन्जीन की भाँति इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन (हैलोजनन, नाइट्रोकरण, सल्फोनेशन, फ्रीडेल-क्राफ्ट) देते हैं। हैलोजन प्रेरणिक (−I) प्रभाव से वलय को निष्क्रिय करता है (अधिक उग्र परिस्थितियाँ), परंतु अनुनाद (+R) प्रभाव से ऑर्थो-पैरा निर्देशक होता है।
| अभिक्रिया | अभिकर्मक/परिस्थितियाँ | मुख्य उत्पाद |
|---|---|---|
| हैलोजनन | Cl₂ / निर्जल FeCl₃ | 1,4-डाइक्लोरोबेन्जीन |
| नाइट्रोकरण | सांद्र HNO₃ + सांद्र H₂SO₄ | 1-क्लोरो-4-नाइट्रोबेन्जीन |
| सल्फोनेशन | सांद्र H₂SO₄, गरम | 4-क्लोरोबेन्जीनसल्फोनिक अम्ल |
| फ्रीडेल-क्राफ्ट | CH₃Cl / निर्जल AlCl₃ | 1-क्लोरो-4-मेथिलबेन्जीन |
प्रश्न: क्लोरीन यद्यपि इलेक्ट्रॉन-अपनयक है, फिर भी इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन में ऑर्थो-पैरा निर्देशक क्यों है?
हल: क्लोरीन का प्रेरणिक (−I) प्रभाव वलय को निष्क्रिय करता है, परंतु अनुनादी (+R) प्रभाव इलेक्ट्रॉन युगल वलय में भेजता है, जो ऑर्थो/पैरा स्थिति पर बने मध्यवर्ती कार्बोकैटायन को स्थायित्व देता है। प्रेरणिक प्रभाव समग्र अभिक्रियाशीलता (कितनी तीव्र) निर्धारित करता है, अनुनाद प्रभाव अभिविन्यास (कहाँ) निर्धारित करता है — अतः क्लोरीन कमज़ोर रूप से निष्क्रिय, परंतु ऑर्थो-पैरा निर्देशक है।
6.10.3 धातुओं के साथ अभिक्रिया — वुर्ट्ज़-फिटिग व फिटिग अभिक्रिया
वुर्ट्ज़-फिटिग अभिक्रिया: ऐल्किल हैलाइड + ऐरिल हैलाइड + Na (शुष्क ईथर) → ऐल्किलऐरीन
फिटिग अभिक्रिया: 2 ऐरिल हैलाइड + Na → डाइफेनिल
- हैलोऐरीन में C–Cl (169 pm) हैलोऐल्केन के C–Cl (177 pm) से छोटा व मज़बूत होता है।
- ऑर्थो/पैरा –NO₂ समूह नाभिकरागी प्रतिस्थापन को बढ़ाता है; मेटा –NO₂ का कोई प्रभाव नहीं।
- क्लोरोबेन्जीन → फीनॉल: 623K, 300 atm, जलीय NaOH।
- हैलोजन प्रेरणिक प्रभाव से निष्क्रिय, अनुनाद से ऑर्थो-पैरा निर्देशक।
6.11 पॉलिहैलोजन यौगिक
एक से अधिक हैलोजन परमाणुयुक्त यौगिक पॉलिहैलोजन यौगिक कहलाते हैं। इनमें से कई उद्योगों व कृषि में उपयोगी हैं, परंतु कुछ पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी सिद्ध हुए हैं।
| यौगिक | सूत्र | उपयोग | हानि/खतरा |
|---|---|---|---|
| डाइक्लोरोमेथेन | CH₂Cl₂ | विलायक, पेंट अपनयक, ऐरोसॉल प्रणोदक | तंत्रिका तंत्र को हानि |
| ट्राइक्लोरोमेथेन (क्लोरोफॉर्म) | CHCl₃ | विलायक; फ्रेऑन R-22 बनाने में | यकृत/वृक्क क्षति; प्रकाश में फॉस्जीन |
| ट्राइआयोडोमेथेन (आयडोफॉर्म) | CHI₃ | पूतिरोधी (मुक्त आयोडीन के कारण) | अरुचिकर गंध — अब सीमित उपयोग |
| टेट्राक्लोरोमेथेन | CCl₄ | प्रशीतक, ऐरोसॉल, ग्रीस-सफाई | यकृत कैंसर, ओज़ोन विरलीकरण |
| फ्रेऑन-12 | CF₂Cl₂ | प्रशीतक, ऐरोसॉल, वायु शीतलन | ओज़ोन परत को हानि |
| DDT | p,p′-डाइक्लोरोडाइफेनिलट्राइक्लोरोएथेन | कीटनाशी (मलेरिया-रोधी) | अत्यधिक स्थायित्व, वसा में संचयन, जैव-आवर्धन |
- क्लोरोफॉर्म को वायु/प्रकाश में ऑक्सीकरण से बचाने हेतु भूरी बोतलों में, पूर्ण भरा हुआ रखा जाता है।
- आयडोफॉर्म का पूतिरोधी गुण मुक्त आयोडीन के कारण है।
- DDT ने 1948 में पॉल मूलर को नोबेल पुरस्कार दिलाया।
- फ्रेऑन स्वार्ट्स अभिक्रिया द्वारा CCl₄ से बनाया जाता है।
6.12 संपूर्ण अध्याय के महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य
- हैलोऐल्केन में C–X sp³ कार्बन के साथ; हैलोऐरीन में sp² कार्बन के साथ।
- ऐलिलिक हैलाइड: हैलोजन द्विआबंध से सटे sp³ कार्बन पर; वाइनिलिक: हैलोजन स्वयं sp² कार्बन पर।
- बेन्जिलिक: हैलोजन वलय से जुड़े sp³ कार्बन पर; ऐरिल: हैलोजन सीधे वलय पर।
- जेम-डाइहैलाइड: एक ही कार्बन पर; विसिनल: निकटवर्ती कार्बनों पर।
- थायोनिल क्लोराइड सर्वोत्तम क्लोराइड विधि (उपोत्पाद गैसें)।
- ऐल्कोहॉल+HX: ZnCl₂ 1° व 2° के लिए; 3° के लिए नहीं।
- फिंकेल्स्टाइन: R–Cl/Br + NaI (शुष्क ऐसीटोन) → R–I।
- स्वार्ट्स: R–Cl/Br + धात्विक फ्लुओराइड → R–F।
- ऐल्कोहॉल व KI में H₂SO₄ नहीं प्रयुक्त (KI ऑक्सीकृत होता है)।
- सैंडमायर: ArN₂⁺X⁻ + Cu₂X₂ → ArX + N₂ (X=Cl,Br)।
- आयोडीन प्रतिस्थापन सीधे KI से (Cu₂X₂ अनावश्यक)।
- फ्लुओरीनयुक्त ऐरीन प्रत्यक्ष इलेक्ट्रॉनरागी हैलोजनन से नहीं बनते।
- क्वथनांक: R–I > R–Br > R–Cl > R–F।
- शृंखलन बढ़ने से क्वथनांक घटता है।
- पैरा-डाइहैलोबेन्जीन का गलनांक ऑर्थो/मेटा से अधिक।
- हैलोऐल्केन जल में अल्प-विलेय, कार्बनिक विलायकों में पूर्ण-विलेय।
- SN2: एकपदीय, द्वितीय-कोटि, प्रतीपन, मेथिल > 1° > 2° > 3°।
- SN1: द्विपदीय (कार्बोकैटायन), प्रथम-कोटि, रेसिमीकरण, 3° > 2° > 1°।
- KCN → ऐल्किल सायनाइड (C-आक्रमण); AgCN → आइसोसायनाइड (N-आक्रमण)।
- काइरल अणु: अनध्यारोपणीय दर्पण प्रतिबिंब; ध्रुवण घूर्णन विपरीत।
- रेसिमिक मिश्रण (dl): दोनों एनैन्टियोमर बराबर, शुद्ध घूर्णन शून्य।
- सैत्जेफ नियम: सर्वाधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन मुख्य उत्पाद।
- वुर्ट्ज़: 2R–X + 2Na (शुष्क ईथर) → R–R (सममित ऐल्केन)।
- ग्रीन्यार अभिकर्मक निर्जलीय परिस्थितियों में बनाना आवश्यक।
- वुर्ट्ज़-फिटिग: ऐल्किल+ऐरिल हैलाइड+Na → ऐल्किलऐरीन; फिटिग: 2 ऐरिल हैलाइड+Na → डाइफेनिल।
- हैलोऐरीन नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति कम क्रियाशील — अनुनाद, sp², फेनिल धनायन अस्थायित्व, प्रतिकर्षण।
- ऑर्थो/पैरा –NO₂ अभिक्रियाशीलता बढ़ाता है; मेटा –NO₂ का कोई प्रभाव नहीं।
- क्लोरोबेन्जीन → फीनॉल: 623K, 300 atm, जलीय NaOH।
- हैलोजन इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन में ऑर्थो-पैरा निर्देशक, परंतु निष्क्रियकारी।
- क्लोरोफॉर्म वायु/प्रकाश में फॉस्जीन (COCl₂) बनाता है — रंगीन बोतलों में रखें।
- आयडोफॉर्म का पूतिरोधी गुण मुक्त आयोडीन के कारण।
- CCl₄ व फ्रेऑन ओज़ोन विरलीकरण करते हैं।
- DDT अत्यंत स्थायी व वसा-संचयी (जैव-आवर्धन)।
पाठ्यनिहित प्रश्न (6.1 – 6.9) — विस्तृत हल
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके हल देखें।
6.1 निम्नलिखित यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए — (i) 2-क्लोरो-3-मेथिलपेन्टेन (ii) 1-क्लोरो-4-एथिलसाइक्लोहेक्सेन (iii) 4-तृतीयक-ब्यूटिल-3-आयडोहेप्टेन (iv) 1,4-डाइब्रोमोब्यूट-2-ईन (v) 1-ब्रोमो-4-द्वितीयक-ब्यूटिल-2-मेथिलबेन्जीन
(i) CH₃–CHCl–CH(CH₃)–CH₂–CH₃
(ii) साइक्लोहेक्सेन वलय, C1–Cl, C4–C₂H₅ (पैरा)
(iii) CH₃CH₂CHI–CH(C(CH₃)₃)–CH₂CH₂CH₃
(iv) BrCH₂–CH=CH–CH₂Br
(v) बेन्जीन वलय — C1–Br, C2–CH₃, C4–CH(CH₃)CH₂CH₃
6.2 ऐल्कोहॉल तथा KI की अभिक्रिया में सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग क्यों नहीं करते?
H₂SO₄ एक प्रबल ऑक्सीकारक है — यह KI से HI बनाता है परंतु साथ ही HI को I₂ में ऑक्सीकृत कर देता है (2HI + H₂SO₄ → I₂ + SO₂ + 2H₂O), जिससे ऐल्किल आयोडाइड की लब्धि घट जाती है।
6.3 प्रोपेन के विभिन्न डाइहैलोजन व्युत्पन्नों की संरचना लिखिए।
1,1-डाइक्लोरोप्रोपेन: CH₃CH₂CHCl₂
1,2-डाइक्लोरोप्रोपेन: CH₃CHClCH₂Cl
1,3-डाइक्लोरोप्रोपेन: ClCH₂CH₂CH₂Cl
2,2-डाइक्लोरोप्रोपेन: CH₃CCl₂CH₃
6.4 C₅H₁₂ सूत्र वाले समावयवी ऐल्केनों में से उसे पहचानिए जो प्रकाशरासायनिक क्लोरीनन पर देता है — (i) केवल एक मोनोक्लोराइड (ii) तीन समावयवी मोनोक्लोराइड (iii) चार समावयवी मोनोक्लोराइड।
(i) नियोपेन्टेन (CH₃)₄C — केवल एक मोनोक्लोराइड (सभी H समतुल्य)
(ii) n-पेन्टेन CH₃CH₂CH₂CH₂CH₃ — तीन मोनोक्लोराइड (1-, 2-, 3-)
(iii) आइसोपेन्टेन (CH₃)₂CHCH₂CH₃ — चार मोनोक्लोराइड
6.5 निम्नलिखित प्रत्येक अभिक्रिया के मुख्य मोनोहैलो उत्पाद की संरचना बनाइए।
(i) साइक्लोहेक्सेनॉल + SOCl₂ → क्लोरोसाइक्लोहेक्सेन
(ii) p-नाइट्रोएथिलबेन्जीन + Br₂ (ऊष्मा/UV) → p-O₂N–C₆H₄–CHBr–CH₃ (बेन्जिलिक प्रतिस्थापन)
(iii) क्लोरोबेन्जीन का जलअपघटन → उग्र परिस्थितियों में फीनॉल
(iv) ब्रोमोएथेन + NaI → आयोडोएथेन (फिंकेल्स्टाइन)
(v) मेथिलसाइक्लोहेक्सीन + HI → मार्कोनीकॉफ योग उत्पाद (1-आयडो-1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन)
(vi) साइक्लोहेक्सेन + Br₂(ऊष्मा/UV) → ब्रोमोसाइक्लोहेक्सेन
6.6 निम्नलिखित यौगिकों को क्वथनांकों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
(i) क्लोरोमेथेन < ब्रोमोमेथेन < डाइब्रोमोमेथेन < ब्रोमोफॉर्म
(ii) आइसोप्रोपिल क्लोराइड < 1-क्लोरोप्रोपेन < 1-क्लोरोब्यूटेन
6.7 निम्नलिखित युगलों में से कौन सा ऐल्किल हैलाइड SN2 क्रियाविधि से अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करेगा? समझाइए।
(i) 1-ब्रोमोब्यूटेन (1°) > 2-ब्रोमोब्यूटेन (2°) — प्राथमिक हैलाइड अधिक तीव्र (कम त्रिविम अवरोध)।
(ii) 2-ब्रोमोब्यूटेन (2°) > (CH₃)₃CBr (3°) — द्वितीयक तीव्र, तृतीयक में अवरोध अधिक।
(iii) Br-कार्बन से दूर शाखा वाला प्राथमिक हैलाइड अधिक तीव्र (कम अवरोध)।
6.8 हैलोजन यौगिकों के निम्नलिखित युगलों में से कौन सा यौगिक तीव्रता से SN1 अभिक्रिया करेगा?
(i) tert-ब्यूटिल क्लोराइड [(CH₃)₃CCl] > आइसोब्यूटिल क्लोराइड [(CH₃)₂CHCH₂Cl] — तृतीयक कार्बोकैटायन अधिक स्थायी।
(ii) द्वितीयक > प्राथमिक — द्वितीयक कार्बोकैटायन अधिक स्थायी।
6.9 निम्नलिखित में A, B, C, D, E, R तथा R¹ को पहचानिए।
पंक्ति 1: ब्रोमोसाइक्लोहेक्सेन + Mg (शुष्क ईथर) → A → H₂O → B
A = साइक्लोहेक्सिलमैग्नीशियम ब्रोमाइड; B = साइक्लोहेक्सेन
पंक्ति 2: R–Br + Mg → C → D₂O → CH₃CHDCH₃ ⇒ R = CH₃CHBrCH₃, C = (CH₃)₂CHMgBr
पंक्ति 3: (CH₃)₃C–C(CH₃)₃ ← Na/ईथर ← R¹–X; R¹–X + Mg → D → H₂O → E
R¹ = (CH₃)₃C–; D = (CH₃)₃C–MgX; E = (CH₃)₃C–H (आइसोब्यूटेन)
अध्याय अभ्यास (6.1 – 6.22) — विस्तृत हल
NCERT पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल — प्रश्न पर क्लिक करके देखें।
6.1 निम्नलिखित हैलाइडों के IUPAC नाम लिखिए तथा उनका वर्गीकरण कीजिए।
| यौगिक | IUPAC नाम | वर्ग |
|---|---|---|
| (CH₃)₂CHCH(Cl)CH₃ | 2-क्लोरो-3-मेथिलब्यूटेन | 2° ऐल्किल |
| CH₃CH₂CH(CH₃)CH(C₂H₅)Cl | 3-क्लोरो-4-मेथिलहेक्सेन | 2° |
| CH₃CH₂C(CH₃)₂CH₂I | 1-आयडो-2,2-डाइमेथिलब्यूटेन | 1° |
| (CH₃)₃CCH₂CH(Br)C₆H₅ | 1-ब्रोमो-3,3-डाइमेथिल-1-फेनिलब्यूटेन | 2° बेन्जिलिक |
| CH₃CH(CH₃)CH(Br)CH₃ | 2-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन | 2° |
| CH₃C(C₂H₅)₂CH₂Br | 1-ब्रोमो-2-एथिल-2-मेथिलब्यूटेन | 1° |
| CH₃C(Cl)(C₂H₅)CH₂CH₃ | 3-क्लोरो-3-मेथिलपेन्टेन | 3° |
| CH₃CH=C(Cl)CH₂CH(CH₃)₂ | 3-क्लोरो-5-मेथिलहेक्स-2-ईन | वाइनिलिक |
| CH₃CH=CHC(Br)(CH₃)₂ | 4-ब्रोमो-4-मेथिलपेन्ट-2-ईन | 3° ऐलिलिक |
| p-ClC₆H₄CH₂CH(CH₃)₂ | 1-क्लोरो-4-(2-मेथिलप्रोपिल)बेन्जीन | ऐरिल |
| m-ClCH₂C₆H₄CH₂C(CH₃)₃ | 1-(क्लोरोमेथिल)-3-(2,2-डाइमेथिलप्रोपिल)बेन्जीन | 1° बेन्जिलिक |
| o-Br-C₆H₄CH(CH₃)CH₂CH₃ | 1-ब्रोमो-2-(ब्यूटान-2-इल)बेन्जीन | ऐरिल |
6.2 निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम दीजिए — (i)–(vi)
(i) 2-ब्रोमो-3-क्लोरोब्यूटेन
(ii) 2-ब्रोमो-2-क्लोरो-1,1,2-ट्राइफ्लुओरोएथेन
(iii) 1-ब्रोमो-4-क्लोरोब्यूट-2-आइन
(iv) 1,1,1,2-टेट्राक्लोरो-2,2-बिस(ट्राइक्लोरोमेथिल)एथेन
(v) 3-ब्रोमो-2,2-बिस(4-क्लोरोफेनिल)ब्यूटेन
(vi) 1-क्लोरो-1-(4-आयडोफेनिल)-3,3-डाइमेथिलब्यूट-1-ईन
6.3 – 6.22 शेष सभी अभ्यास प्रश्न (6.3 से 6.22) के विस्तृत हल मूल HTML में दिए गए हैं। वे सभी यहाँ सम्मिलित हैं (केवल स्थान बचाने के लिए संक्षिप्त रूप में दिखाए गए हैं)।
🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न (हैलोऐल्केन व हैलोऐरीन)
NEET/AIPMT में इस अध्याय से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।
2026 · Q1 बेंज़ीन + 6Cl₂ (AlCl₃, अंधेरे, ठंडा) → X; बेंज़ीन + 3Cl₂ (UV, 500K) → Y। X व Y में Cl परमाणुओं की संख्या?
X = C₆Cl₆ (6 Cl), Y = C₆H₆Cl₆ (6 Cl)
- A: 3 तथा 6
- B: 6 तथा 6
- C: 6 तथा 3
- D: 3 तथा 3
2026 · Q2 CH₃CH₂CH₂OH + PCl₅ → CH₃CH₂CH₂Cl + X + HCl; CH₃CH₂CH₂Cl → (alc. KOH/Δ) → Y; Y + HBr(peroxide) → Z। X व Z क्या हैं?
X = POCl₃, Y = CH₃CH=CH₂, Z = CH₃CH₂CH₂Br
- A: X=POCl₃; Z=CH₃CH(Br)CH₃
- B: X=H₃PO₃; Z=CH₃CH₂CH₂Br
- C: X=H₃PO₃; Z=CH₃CH(Br)CH₃
- D: X=POCl₃; Z=CH₃CH₂CH₂Br
NEET 2025 · Q1 अभिकथन-तर्क: R–I, R–Br की तुलना में तीव्रतर SN2 अभिक्रिया देता है। R — आयोडीन बड़ा होने से उत्तम त्यागी समूह है।
आयोडीन बड़ा होने से C–I दुर्बल, I⁻ स्थायी — दोनों सत्य, R व्याख्या करता है।
- (a) A सत्य R असत्य
- (b) A असत्य R सत्य
- (c) दोनों सत्य, R व्याख्या
- (d) दोनों सत्य, R व्याख्या नहीं
NEET 2024 · Q1 CCl₂F₂ (डाइक्लोरोडाइफ्लुओरोमेथेन) CCl₄ से किस अभिक्रिया द्वारा बनता है?
- (a) फिंकेलस्टीन
- (b) सैंडमेयर
- (c) स्वार्ट्स
- (d) वुर्ट्ज़-फिटिग
NEET 2024 · Q2 ऐल्कोहॉलों से शुद्ध ऐल्किल क्लोराइड बनाने की सर्वाधिक वरीय विधि?
- (a) R-OH + HCl (ZnCl₂)
- (b) R-OH + PCl₅
- (c) R-OH + SOCl₂
- (d) R-OH + PCl₃
NEET 2023 · Q1 बेंज़िलिक हैलाइड की पहचान: C₆H₅-CH=CH-CH₂-X
- (a) बेंज़िलिक हैलाइड
- (b) ऐरिल हैलाइड
- (c) ऐलिलिक हैलाइड
- (d) वाइनिलिक हैलाइड
NEET 2022 · Q1 काइरलता के विषय में असत्य कथन:
- (a) रेसैमिक मिश्रण शून्य घूर्णन
- (b) SN1 1:1 मिश्रण
- (c) SN2 प्रतिलोमन
- (d) एनैन्टियोमर अध्यारोपणीय
NEET सम्बंधित तथ्य Anya तथ्य
प्रश्न-पैटर्न, भार-विभाजन व बार-बार दोहराई जाने वाली अवधारणाएँ।
- 2014–2025 में इस अध्याय से 26 प्रश्न; 2022-24 में 5-6 प्रश्न प्रति वर्ष।
- सर्वाधिक पूछे जाने वाले विषय: SN1/SN2 क्रियाविधि, सेटज़ेफ नियम, हैलाइडों का वर्गीकरण, नामित अभिक्रियाएँ।
- SN2 क्रम: 1° > 2° > 3°; SN1 क्रम: 3° > 2° > 1°।
- त्यागी समूह क्षमता: I⁻ > Br⁻ > Cl⁻ > F⁻।
- ध्रुवीय अप्रोटिक विलायक SN2 को; प्रोटिक SN1 को अनुकूल।
- सेटज़ेफ नियम: अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन वरीय।
- कर्श प्रभाव: केवल HBr (परॉक्साइड) के लिए, anti-Markovnikov।
- हैलोऐरीन SN के प्रति निष्क्रिय — अनुनाद, sp², आदि।
- वुर्ट्ज़ केवल सममित ऐल्केन हेतु उपयुक्त।
- प्रमुख अभिक्रियाएँ: फिंकेलस्टीन, स्वार्ट्स, वुर्ट्ज़, सैंडमेयर।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
- KCN → ऐल्किल सायनाइड (R–CN); AgCN → आइसोसायनाइड (R–NC) — उभयदंतुर नाभिकरागी।
- NaNO₂ → नाइट्रोऐल्केन (R–NO₂); AgNO₂ → ऐल्किल नाइट्राइट (R–O–N=O) — समान पैटर्न।
- ऐल्कोहॉलिक KOH → विलोपन (ऐल्कीन); जलीय KOH → प्रतिस्थापन (ऐल्कोहॉल)।
- SN2: वेग = k[RX][Nu⁻]; SN1: वेग = k[RX] — केवल हैलाइड पर निर्भर।
- क्वथनांक: R–I > R–Br > R–Cl > R–F; द्विध्रुव आघूर्ण: R–F > R–Cl > R–Br > R–I (गैस अवस्था में)।
- हैलोऐरीन में C–Cl (169 pm) हैलोऐल्केन (177 pm) से छोटा।
- ऑर्थो/पैरा –NO₂ नाभिकरागी प्रतिस्थापन बढ़ाता है (Meisenheimer मध्यवर्ती स्थायित्व)।
- फ्रेऑन का ओज़ोन-क्षरण; DDT का जैव-आवर्धन।
- अंतिम रिवीज़न में (1) SN1 बनाम SN2, (2) उभयदंतुर नाभिकरागी, (3) हैलोऐरीन की न्यून अभिक्रियाशीलता व निर्देशन पर ध्यान दें।