हाइड्रोकार्बन — सम्पूर्ण अध्याय नोट्स (अध्याय 9 )
रसायन विज्ञान • कक्षा-11 • अध्याय 9

हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbons)

ऐल्केन, ऐल्कीन, ऐल्काइन तथा ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों की संरचना, नामपद्धति, समावयवता, विरचन, भौतिक-रासायनिक गुणधर्म, क्रियाविधि तथा कैंसरजन्यता तक — संपूर्ण अध्याय की रंगीन तालिकाएँ, आरेख, तथ्य तथा सभी 25 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।

CₙH₂ₙ₊₂ ऐल्केन
CₙH₂ₙ ऐल्कीन
CₙH₂ₙ₋₂ ऐल्काइन
★ NEET फोकस तथ्य

1 परिचय व वर्गीकरण

हाइड्रोकार्बन पद स्वतः स्पष्ट है — इसका अर्थ है केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन से बने यौगिक। हाइड्रोकार्बन ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। LPG (द्रवित पेट्रोलियम गैस), CNG (संघनित प्राकृतिक गैस) तथा LNG (द्रवित प्राकृतिक गैस) — ये सभी हाइड्रोकार्बनों के मिश्रण हैं, जो ईंधन के रूप में उपयोग होते हैं। पेट्रोलियम के प्रभावी आसवन (Fractional distillation) से पेट्रोल, डीज़ल तथा कैरोसिन प्राप्त होते हैं, जबकि कोल गैस, कोल के भंजक आसवन (Destructive distillation) से प्राप्त होती है।

हाइड्रोकार्बन का उपयोग पॉलिथीन, पॉलिप्रोपीन, पॉलिस्टाइरीन जैसे बहुलकों के निर्माण में; उच्च अणुभार वाले हाइड्रोकार्बनों का उपयोग पेंट में विलायक के रूप में; तथा रंजक व औषधियों के निर्माण में प्रारंभिक पदार्थ के रूप में होता है।

1.1 कार्बन-कार्बन आबंध की प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण

वर्गआबंध प्रकृतिउपवर्गउदाहरण
संतृप्तकेवल C−C व C−H एकल आबंधऐल्केन (विवृत शृंखला)CH₄, C₂H₆
केवल C−C व C−H एकल आबंधसाइक्लोऐल्केन (संवृत शृंखला)साइक्लोहेक्सेन
असंतृप्तC=C द्विआबंधऐल्कीनC₂H₄
C≡C त्रिआबंधऐल्काइनC₂H₂
ऐरोमैटिकसंवृत, विशेष अनुनाद-स्थिर निकायबेन्ज़ीन
त्वरित तथ्य
  • LPG घरेलू ईंधन है, जो सबसे कम प्रदूषण वाली गैस है।
  • पेट्रोलियम से प्रभावी आसवन द्वारा पेट्रोल, डीज़ल, कैरोसिन प्राप्त होते हैं; कोल के भंजक आसवन से कोल गैस मिलती है।
  • संतृप्त हाइड्रोकार्बन (ऐल्केन/साइक्लोऐल्केन) सामान्य अवस्थाओं में निष्क्रिय होते हैं, इसलिए इन्हें पैराफिन (Parum=कम, Affinis=क्रियाशील) भी कहा जाता था।
  • ऐल्केनों का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ है।

2 ऐल्केन (Alkane)

ऐल्केन कार्बन-कार्बन एकल आबंधयुक्त संतृप्त विवृत शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन हैं। मेथेन (CH₄) इस परिवार का प्रथम सदस्य है। VSEPR सिद्धांत के अनुसार मेथेन की संरचना चतुष्फलकीय होती है, जिसमें कार्बन केंद्र में तथा चार हाइड्रोजन समचतुष्फलक के चारों कोनों पर स्थित हैं — प्रत्येक H−C−H बंध कोण 109.5° होता है। C−C तथा C−H आबंधों की लंबाइयाँ क्रमशः 154pm व 112pm हैं, जो कार्बन के sp³ संकरित कक्षकों तथा हाइड्रोजन के 1s के समाक्षीय अतिव्यापन से बनते हैं।

2.1 नामपद्धति तथा शृंखला समावयवता

प्रथम तीन सदस्यों (मेथेन, एथेन, प्रोपेन) में केवल एक ही संरचना होती है, परंतु C₄H₁₀ से उच्चतर ऐल्केनों में एक से अधिक संरचनाएँ (समावयव) संभव होती हैं। जैसे n-ब्यूटेन तथा 2-मेथिलप्रोपेन (आइसोब्यूटेन) — दोनों का अणुसूत्र समान C₄H₁₀ है, परंतु क्वथनांक व अन्य गुणधर्म भिन्न हैं। ऐसे समावयवों को शृंखला समावयव कहते हैं, क्योंकि इनमें अंतर कार्बन शृंखला की बनावट (सतत/शाखित) के कारण होता है।

अणुसूत्रसंभावित शृंखला समावयवों की संख्या
C₄H₁₀2
C₅H₁₂3
C₆H₁₄5
C₇H₁₆9
C₁₀H₂₂75

2.2 कार्बन परमाणुओं का वर्गीकरण

प्रकारपरिभाषा
प्राथमिक (1°)अन्य कार्बन से न जुड़ा हो या केवल एक कार्बन से जुड़ा हो
द्वितीयक (2°)दो कार्बन परमाणुओं से जुड़ा हो
तृतीयक (3°)तीन कार्बन परमाणुओं से जुड़ा हो
चतुष्क (4°)चार अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़ा हो

2.3 विरचन (निर्माण की विधियाँ)

स्रोतविधि व शर्तें
असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों सेPt/Pd/Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में H₂ का योग (हाइड्रोजनीकरण)
ऐल्किल हैलाइडों से (i)Zn तथा तनु HCl द्वारा अपचयन
ऐल्किल हैलाइडों से (ii)शुष्क ईथर में सोडियम धातु के साथ (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया) — सम कार्बन संख्या वाले ऐल्केन बनते हैं
कार्बोक्सिलिक अम्लों से (i)सोडा लाइम के साथ गरम करना (विकार्बोक्सिलीकरण) — एक कम कार्बन वाला ऐल्केन
कार्बोक्सिलिक अम्लों से (ii)कोल्बे विद्युत्-अपघटनी विधि — ऐनोड पर सम कार्बन संख्या वाला ऐल्केन
प्रमुख समीकरण CH₂=CH₂ + H₂ →(Pt/Pd/Ni) CH₃−CH₃
CH₃Cl + H₂ →(Zn,H⁺) CH₄ + ZnCl⁺... (सांकेतिक)
C₂H₅Br + 2Na + BrC₂H₅ →(शुष्क ईथर) C₂H₅−C₂H₅ + 2NaBr (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया)
CH₃COONa + NaOH →(CaO,Δ) CH₄ + Na₂CO₃ (विकार्बोक्सिलीकरण)
2CH₃COONa + 2H₂O →(विद्युत्-अपघटन) CH₃−CH₃ + 2CO₂ + H₂ + 2NaOH (कोल्बे विधि)
वुर्ट्ज़ अभिक्रिया का प्रयोग विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले शुद्ध ऐल्केन बनाने के लिए नहीं किया जाता, क्योंकि दो असमान ऐल्किल हैलाइडों के प्रयोग पर तीन उत्पादों (सहउत्पादों सहित) का मिश्रण बनता है, जिसे पृथक् करना कठिन होता है। मेथेन कोल्बे विधि द्वारा नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि इसके लिए किसी कार्बोक्सिलिक अम्ल की आवश्यकता होगी जिसमें कोई कार्बन ही न हो।

2.4 भौतिक गुणधर्म

ऐल्केन अध्रुवीय होते हैं (C−C व C−H की विद्युत्-ऋणात्मकता में बहुत कम अंतर के कारण), जिनके मध्य दुर्बल वांडरवाल्स बल पाए जाते हैं। प्रथम चार सदस्य (C₁−C₄) गैस, C₅−C₁₇ द्रव तथा C₁₈ या अधिक कार्बन वाले ऐल्केन 298K पर ठोस होते हैं। सीधी शृंखला वाले ऐल्केनों का क्वथनांक समावयवी शाखित शृंखला वाले ऐल्केनों की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि शाखाओं की संख्या बढ़ने से अणु की आकृति गोलाकार होकर सतही क्षेत्रफल तथा अंतराअणुक वांडरवाल्स बल घट जाते हैं।

2.5 रासायनिक गुणधर्म

(अ) प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ — हैलोजेनीकरण

मेथेन का क्लोरीनीकरण (उच्च तापक्रम/पराबैंगनी विकिरण में) CH₄ + Cl₂ →(hν) CH₃Cl + HCl (क्लोरोमेथेन)
CH₃Cl + Cl₂ →(hν) CH₂Cl₂ + HCl
CH₂Cl₂ + Cl₂ →(hν) CHCl₃ + HCl
CHCl₃ + Cl₂ →(hν) CCl₄ + HCl
हैलोजेन के साथ अभिक्रिया की गति का क्रम: F₂ >>> Cl₂ >>> Br₂ > I₂। हाइड्रोजन विस्थापन की दर 3° > 2° > 1° है।

मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि — तीन पद

पदक्रिया
प्रारंभन (Initiation)प्रकाश/ऊष्मा की उपस्थिति में Cl₂ का समापघटन: Cl−Cl → Cl• + Cl•
संचरण (Propagation)Cl• मेथेन पर आक्रमण कर CH₃• तथा HCl बनाता है; CH₃•, Cl₂ पर आक्रमण कर CH₃Cl तथा नया Cl• बनाता है — शृंखला आगे बढ़ती है
समापन (Termination)दो मुक्त-मूलक परस्पर संयोजित होकर शृंखला समाप्त करते हैं (जैसे Cl•+Cl•, CH₃•+CH₃•, CH₃•+Cl•)
मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन का उपोत्पाद (byproduct) के रूप में बनना — दो CH₃• मुक्त-मूलकों के परस्पर संयोजन (समापन पद) से समझाया जाता है।

(ब) दहन

सामान्य दहन अभिक्रिया CₙH₂ₙ₊₂ + [(3n+1)/2]O₂ → nCO₂ + (n+1)H₂O (अधिक ऊष्मा उत्सर्जित)
अपर्याप्त वायु में अपूर्ण दहन: CH₄ + O₂ → C(s) + 2H₂O (कार्बन कज्जल बनता है)

(स) अन्य अभिक्रियाएँ

अभिक्रियाविवरण
नियंत्रित ऑक्सीकरणउपयुक्त उत्प्रेरक व दाब पर मेथेनॉल, मेथेनैल या एथेनोइक अम्ल जैसे उत्पाद बनते हैं
समावयवीकरणनिर्जल AlCl₃/HCl की उपस्थिति में n-ऐल्केन शाखित शृंखला ऐल्केनों में बदल जाते हैं
ऐरोमैटीकरण (पुनर्संभवन)छः या अधिक कार्बन वाले n-ऐल्केन Cr₂O₃/V₂O₅ जैसे उत्प्रेरकों की उपस्थिति में 773K, 10-20 वायुमंडलीय दाब पर बेन्ज़ीन या उसके सजातीय व्युत्पन्न में चक्रीकृत हो जाते हैं
भाप के साथ अभिक्रियामेथेन, निकैल उत्प्रेरक की उपस्थिति में 1273K पर CO व H₂ देती है — डाइहाइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन में प्रयुक्त
ताप-अपघटन (भंजन/Cracking)उच्चतर ऐल्केन उच्च ताप पर निम्नतर ऐल्केन या ऐल्कीनों में अपघटित; एक मुक्त-मूलक अभिक्रिया मानी जाती है

2.6 संरूपण (Conformations)

C−C एकल आबंध के चारों ओर मुक्त घूर्णन (यद्यपि पूर्णतः मुक्त नहीं) के कारण त्रिविम में परमाणुओं के विभिन्न विन्यास संभव होते हैं, जिन्हें संरूपण या घूर्णी (Rotamers) कहते हैं। एथेन में दो चरम संरूपण होते हैं — ग्रस्त (Eclipsed, जिसमें हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के अधिक पास होते हैं) तथा सांतरित (Staggered, जिसमें हाइड्रोजन अधिकतम दूरी पर होते हैं)।

(i) ग्रस्त प्रक्षेप (ii) सांतरित प्रक्षेप
चित्र 2.1 — एथेन के न्यूमैन प्रक्षेप: ग्रस्त तथा सांतरित संरूपण
सांतरित संरूपण ग्रस्त की तुलना में अधिक स्थायी होता है (न्यूनतम प्रतिकर्षण/मरोड़ी विकृति के कारण), इसलिए अणु अधिकतर सांतरित संरूपण में रहते हैं। दोनों चरम रूपों के मध्य ऊर्जा-अंतर केवल 12.5 kJ mol⁻¹ है, जो कमरे के ताप पर आसानी से पार हो जाता है — इसलिए एथेन में C−C आबंध का घूर्णन व्यावहारिक रूप से मुक्त माना जाता है और संरूपणों को पृथक् करना संभव नहीं है।
त्वरित तथ्य
  • ऐल्केन का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ है, जिसका प्रथम स्थायी सदस्य मेथेन (CH₄) है।
  • हैलोजेनीकरण मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि (प्रारंभन-संचरण-समापन) द्वारा होता है।
  • वुर्ट्ज़ अभिक्रिया केवल सम कार्बन संख्या वाले शुद्ध ऐल्केन बनाने में उपयोगी है।
  • ऐल्केन के हाइड्रोजन विस्थापन की दर 3° > 2° > 1° है।
  • एथेन का सांतरित संरूपण, ग्रस्त संरूपण से अधिक स्थायी होता है — दोनों में ऊर्जा-अंतर केवल 12.5 kJ mol⁻¹ है।

3 ऐल्कीन (Alkene)

ऐल्कीन द्विआबंधयुक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ है। प्रथम सदस्य एथिलीन अथवा एथीन (C₂H₄) है। एथीन की क्लोरीन से अभिक्रिया कराने पर तैलीय द्रव प्राप्त होता है, इसीलिए ऐल्कीनों को ओलीफीन (तैलीय यौगिक बनाने वाले) भी कहते हैं।

3.1 द्विआबंध की संरचना

ऐल्कीनों में C=C द्विआबंध है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा (σ) आबंध (बंध एन्थैल्पी लगभग 397 kJ mol⁻¹) दो कार्बन परमाणुओं के sp² संकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है, तथा एक दुर्बल पाई (π) आबंध (बंध एन्थैल्पी 284 kJ mol⁻¹) असंकरित 2p कक्षकों के संपार्श्विक अतिव्यापन से बनता है। C=C द्विआबंध लंबाई (134pm), C−C एकल आबंध लंबाई (154pm) से छोटी होती है। दुर्बल π आबंध के कारण ऐल्कीन को दुर्बल बंधित गतिशील इलेक्ट्रॉनों का स्रोत कहा जाता है, इसीलिए इन पर इलेक्ट्रॉनरागी अभिकर्मकों का आक्रमण आसानी से होता है।

3.2 समावयवता

ऐल्कीन संरचनात्मक (शृंखला व स्थिति) एवं ज्यामितीय समावयवता दोनों प्रदर्शित करती हैं। द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जोड़कर संतुष्ट करते हैं (YXC=CXY प्रकार)। यदि इन ठीक स्थितियों में समान समूह एक ही ओर हों, तो समपक्ष (cis), तथा विपरीत ओर हों तो विपक्ष (trans) समावयव कहलाते हैं। यह त्रिविम समावयवता C=C द्विआबंध के इर्द-गिर्द प्रतिबंधित घूर्णन के कारण संभव होती है।

गुणसमपक्ष (cis)विपक्ष (trans)
ध्रुवताअधिक ध्रुवीयकम/लगभग अध्रुवीय
क्वथनांक (द्रव अवस्था में)सामान्यतः अधिकसामान्यतः कम
गलनांक (ठोस अवस्था में)सामान्यतः कमसामान्यतः अधिक

3.3 विरचन

स्रोतविधि व शर्तें
ऐल्काइनों से (i)लिंडलार अभिकर्मक (सल्फर द्वारा आंशिक निष्क्रिय पैलेडीकृत चारकोल) की उपस्थिति में आंशिक अपचयन — समपक्ष ऐल्कीन
ऐल्काइनों से (ii)सोडियम/द्रव अमोनिया द्वारा अपचयन — विपक्ष ऐल्कीन
ऐल्किल हैलाइडों सेऐल्कोहॉली पोटाश के साथ गरम करना — विहाइड्रोहैलोजेनीकरण, β-विलोपन
सन्निध डाइहैलाइडों सेZn धातु से अभिक्रिया — विहैलोजेनीकरण (ZnX₂ का विलोपन)
ऐल्कोहॉलों सेसांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गरम करना — अम्लीय निर्जलीकरण
प्रमुख समीकरण RC≡CR₁ + H₂ →(Pd/C, लिंडलार) समपक्ष ऐल्कीन
RC≡CR₁ + H₂ →(Na/द्रव NH₃) विपक्ष ऐल्कीन
CH₂Br−CH₂Br + Zn → CH₂=CH₂ + ZnBr₂
CH₃−CH(OH)−CH₃ →(सांद्र H₂SO₄, Δ) CH₂=CH−CH₃ + H₂O

3.4 रासायनिक गुणधर्म — योगज अभिक्रियाएँ

अभिक्रियाविवरण
डाइहाइड्रोजन का संयोजनNi/Pd/Pt उत्प्रेरक की उपस्थिति में H₂ का योग — ऐल्केन
हैलोजन का संयोजनBr₂/Cl₂ योग से सन्निध डाइहैलाइड; ब्रोमीन जल का लाल-नारंगी रंग लुप्त होना असंतृप्तता का परीक्षण
हाइड्रोजन हैलाइड का संयोजनHI > HBr > HCl क्रम में अभिक्रियाशीलता; असममित ऐल्कीनों में मार्कोनीकॉफ नियम
सल्फ्यूरिक अम्ल का संयोजनमार्कोनीकॉफ नियमानुसार, ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट
जल का संयोजनH⁺ उत्प्रेरक की उपस्थिति में मार्कोनीकॉफ नियमानुसार ऐल्कोहॉल
ऑक्सीकरणठंडे तनु KMnO₄ (बेयर अभिकर्मक) से ग्लाइकॉल; अम्लीय KMnO₄/K₂Cr₂O₇ से कीटोन/अम्ल
ओज़ोनी अपघटनO₃ का योग कर ओज़ोनाइड, फिर Zn-H₂O से विदलन कर छोटे कार्बोनिल यौगिक — द्विआबंध की स्थिति ज्ञात करने में उपयोगी
बहुलकीकरणउच्च ताप, दाब व उत्प्रेरक की उपस्थिति में अनेक ऐल्कीन अणु जुड़कर बहुलक बनाते हैं (जैसे पॉलिथीन)

मार्कोनीकॉफ नियम

असममित ऐल्कीनों पर HX के योग में, योज्य का अधिक ऋणात्मक भाग उस कार्बन पर जुड़ता है, जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो। यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि क्रियाविधि में H⁺ का आक्रमण द्विआबंध पर होकर अधिक स्थायी (द्वितीयक/तृतीयक) कार्बधनायन बनता है, जिस पर फिर X⁻ जुड़ता है।

क्रियाविधि — प्रोपीन पर HBr का योग CH₃−CH=CH₂ + H⁺ → CH₃−CH⁺−CH₃ (द्वितीयक, अधिक स्थायी) या CH₃−CH₂−CH₂⁺ (प्राथमिक, कम स्थायी)
द्वितीयक कार्बधनायन + Br⁻ → CH₃−CHBr−CH₃ (2-ब्रोमोप्रोपेन, मुख्य उत्पाद)

प्रति मार्कोनीकॉफ योगज (परॉक्साइड/खराश प्रभाव)

परॉक्साइड की उपस्थिति में असममित ऐल्कीनों (जैसे प्रोपीन) से HBr का संयोजन प्रति मार्कोनीकॉफ नियम से होता है — यह केवल HBr के साथ होता है, HCl व HI के साथ नहीं। यह मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि द्वारा होता है, जिसमें अधिक स्थायी द्वितीयक मुक्त-मूलक बनने के कारण 1-ब्रोमोप्रोपेन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
त्वरित तथ्य
  • ऐल्कीन का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ है; C=C में एक σ व एक π आबंध होता है।
  • लिंडलार अभिकर्मक से ऐल्काइन के अपचयन से समपक्ष ऐल्कीन; Na/द्रव NH₃ से विपक्ष ऐल्कीन बनती है।
  • मार्कोनीकॉफ नियम: योज्य का ऋणात्मक भाग हाइड्रोजन-न्यून कार्बन पर जुड़ता है।
  • परॉक्साइड प्रभाव (खराश प्रभाव) केवल HBr के साथ ही देखा जाता है।
  • बेयर अभिकर्मक (ठंडा तनु KMnO₄) असंतृप्तता का परीक्षण है।

4 ऐल्काइन (Alkyne)

ऐल्कीन की तरह ऐल्काइन भी असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें दो कार्बन परमाणुओं के मध्य एक त्रिआबंध होता है। इनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₋₂ है। ऐल्काइन श्रेणी का प्रथम स्थायी सदस्य एथाइन है, जो ऐसीटिलीन नाम से प्रचलित है। ऐसीटिलीन का उपयोग आर्क वेल्डिंग के लिए ऑक्सीऐसीटिलीन ज्वाला के रूप में होता है।

4.1 त्रिआबंध की संरचना

एथाइन के प्रत्येक कार्बन के दो sp संकरित कक्षकों के समाक्षीय अतिव्यापन से कार्बन-कार्बन सिग्माआबंध बनता है, तथा शेष sp कक्षक हाइड्रोजन के 1s कक्षक से अतिव्यापन कर C−H सिग्मा आबंध बनाता है (H−C−C बंध कोण 180°)। प्रत्येक कार्बन के दो असंकरित p-कक्षक परस्पर समांतर होकर संपार्श्विक अतिव्यापन से दो π आबंध बनाते हैं। अतः एथाइन में 1 C−C σ, 2 C−H σ तथा 2 C−C π आबंध होते हैं। C≡C त्रिआबंध की आबंध सामर्थ्य (823 kJ mol⁻¹) C=C द्विआबंध (681 kJ mol⁻¹) व C−C एकल आबंध (348 kJ mol⁻¹) से अधिक होती है, तथा त्रिआबंध लंबाई (120pm) दोनों से छोटी होती है।

4.2 विरचन

स्रोतविधि
कैल्सियम कार्बाइड सेजल के साथ अभिक्रिया — औद्योगिक रूप से एथाइन का निर्माण; CaCO₃→CaO→CaC₂→C₂H₂
सन्निध डाइहैलाइडों सेऐल्कोहॉली KOH से विहाइड्रोहैलोजेनीकरण, फिर सोडामाइड (NaNH₂) से उपचार
कैल्सियम कार्बाइड विधि CaCO₃ →(Δ) CaO + CO₂
CaO + 3C →(Δ) CaC₂ + CO (कैल्सियम कार्बाइड)
CaC₂ + 2H₂O → Ca(OH)₂ + C₂H₂

4.3 रासायनिक गुणधर्म

(अ) ऐल्काइन का अम्लीय गुण

सोडियम धातु या सोडामाइड (NaNH₂) प्रबल क्षारक होते हैं, जो एथाइन के साथ अभिक्रिया करके डाइहाइड्रोजन मुक्त कर सोडियम ऐसीटिलाइड बनाते हैं। यह अभिक्रिया एथीन तथा एथेन प्रदर्शित नहीं करते — यह एथाइन की अम्लीय प्रकृति को इंगित करता है, जिसका कारण sp संकरित कार्बन में अधिकतम s-गुण (50%) के कारण उच्च विद्युत्-ऋणात्मकता है, जिससे त्रिआबंधित कार्बन से जुड़े हाइड्रोजन आसानी से प्रोटॉन के रूप में विलोपित हो जाते हैं।

अम्लीय गुण की अभिक्रिया HC≡CH + Na → HC≡C⁻Na⁺ + ½H₂ (सोडियम ऐथेनाइड)
CH₃−C≡CH + Na⁺NH₂⁻ → CH₃−C≡C⁻Na⁺ + NH₃ (सोडियम प्रोपिनाइड)
ऐल्केन, ऐल्कीन तथा ऐल्काइन की अम्लीय प्रकृति का क्रम: HC≡CH > H₂C=CH₂ > CH₃−CH₃ (त्रिआबंधित कार्बन से जुड़े हाइड्रोजन ही अम्लीय होते हैं, ऐल्काइन के सभी हाइड्रोजन नहीं)।

(ब) योगज अभिक्रियाएँ

अभिकर्मकउत्पाद
डाइहाइड्रोजन (Pt/Pd/Ni)ऐल्कीन, फिर ऐल्केन
हैलोजनटेट्राहैलाइड (दो चरणों में)
हाइड्रोजन हैलाइडजैम डाइहैलाइड (मार्कोनीकॉफ नियमानुसार)
जल (Hg²⁺/H⁺, 333K)कार्बोनिल यौगिक (कुशरॉव अभिक्रिया — एथाइन से एथेनैल, अन्य ऐल्काइनों से कीटोन)
जल का संयोजन — कुशरॉव अभिक्रिया HC≡CH + H−OH →(Hg²⁺/H⁺, 333K) [CH₂=CH−OH] →(समावयवन) CH₃−CHO (एथेनैल)

(स) बहुलकीकरण

प्रकारविवरण
रैखिक बहुलकीकरणअनुकूल परिस्थितियों में एथाइन का रैखिक बहुलकीकरण होने से पॉलिऐसीटिलीन बनता है, जो विद्युत् का सुचालक होने के कारण बैटरियों में इलेक्ट्रोड के रूप में प्रयुक्त होता है
चक्रीय बहुलकीकरणएथाइन को लाल तप्त लौह नलिका में 873K पर प्रवाहित करने पर एथाइन के तीन अणु बहुलकीकृत होकर बेन्ज़ीन बनाते हैं
त्वरित तथ्य
  • ऐल्काइन का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₋₂ है; C≡C में 1σ व 2π आबंध होते हैं।
  • केवल त्रिआबंध से जुड़े हाइड्रोजन ही अम्लीय होते हैं (टर्मिनल ऐल्काइन)।
  • कुशरॉव अभिक्रिया द्वारा एथाइन से एथेनैल तथा अन्य ऐल्काइनों से कीटोन बनते हैं।
  • एथाइन के तीन अणुओं के चक्रीय बहुलकीकरण से बेन्ज़ीन बनती है।

5 ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन

ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन को ऐरीन भी कहते हैं, क्योंकि इनके अधिकांश यौगिकों में विशिष्ट गंध (ग्रीक शब्द "ऐरोमा" = सुगंध) रहती है। जिन ऐरोमैटिक यौगिकों में बेन्ज़ीनवलय होती है, उन्हें बेन्ज़ेनाइड (Benzenoid) तथा जिनमें नहीं होती, उन्हें अबेन्ज़ेनाइड (Nonbenzenoid) कहते हैं।

5.1 बेन्ज़ीन की संरचना — केकुले का योगदान

बेन्ज़ीन को सर्वप्रथम माइकेल फैराडे ने सन् 1825 में प्राप्त किया। इसका अणुसूत्र C₆H₆ है, जो उच्च असंतृप्तता दर्शाता है, परंतु यह किसी ज्ञात ऐल्केन/ऐल्कीन/ऐल्काइन से कोई संबंध नहीं बताता। आगुस्ट केकुले ने सन् 1865 में बेन्ज़ीन की एक संरचना दी, जिसमें छः कार्बन परमाणुओं की चक्रीय व्यवस्था है, जिसमें एकांतर क्रम में द्विआबंध हैं तथा प्रत्येक कार्बन से एक हाइड्रोजन जुड़ा है।

केकुले संरचना की समस्या: यह संरचना 1,2-डाइब्रोमोबेन्ज़ीन के दो समावयवों की संभावना बताती है, परंतु वास्तव में बेन्ज़ीन केवल एक ही ऑर्थो द्विप्रतिस्थापित उत्पाद बनाती है। इस समस्या का निराकरण केकुले ने द्विआबंध के दोलन (Oscillating) की प्रकृति पर विचार करके किया — अर्थात दो केकुले संरचनाएँ तीव्र गति से परस्पर परिवर्तित होती रहती हैं।

5.2 अनुनाद एवं बेन्ज़ीन का स्थायित्व

संयोजकता बंध सिद्धांत के अनुसार, द्विआबंध के दोलन को अनुनाद द्वारा समझाया गया है। बेन्ज़ीन विभिन्न अनुनादी संरचनाओं का संकर है। कक्षीय अतिव्यापन के आधार पर सही चित्र यह है कि बेन्ज़ीन के सभी छः कार्बन sp² संकरित हैं — प्रत्येक कार्बन के दो sp² कक्षक निकटवर्ती कार्बनों के sp² कक्षकों से अतिव्यापन कर छः C−C σ आबंध (समतलीय षट्भुजीय) बनाते हैं, शेष sp² कक्षक H के s-कक्षक से C−H σ आबंध बनाता है, तथा प्रत्येक कार्बन पर बचा असंकरित p-कक्षक (वलय के तल के लंबवत्) पार्श्व-अतिव्यापन से एक विस्थानीकृत π इलेक्ट्रॉन तंत्र बनाता है।

X-किरण विवर्तन आँकड़े दर्शाते हैं कि बेन्ज़ीन में सभी छः C−C आबंध लंबाई समान (139pm) होती है, जो C−C एकल आबंध (154pm) व C=C द्विआबंध (134pm) के मध्य है। यह छः इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण विस्थानीकरण के कारण है, जिसके फलस्वरूप बेन्ज़ीन पर शुद्ध द्विआबंध की अनुपस्थिति सामान्य ऐल्कीन-सदृश योगज अभिक्रिया को रोकती है और यही इसका असामान्य (अपेक्षा से अधिक) स्थायित्व है, जिसे अनुनाद-स्थायीकरण ऊर्जा कहते हैं।

5.3 ऐरोमैटिकता — हकल नियम

अब "ऐरोमैटिक" शब्द सभी वलय-तंत्रों (चाहे बेन्ज़ीनवलय हो या न हो) पर लागू होता है, यदि वे निम्नलिखित तीन गुण दर्शाएँ:

शर्तविवरण
(i) समतलीयतासंपूर्ण वलय एक ही तल में होना चाहिए
(ii) संपूर्ण विस्थानीकरणवलय में इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थानीकरण होना चाहिए
(iii) हकल नियमवलय में (4n+2)π इलेक्ट्रॉन होने चाहिए, जहाँ n पूर्णांक है
उदाहरणतः बेन्ज़ीन में 6π इलेक्ट्रॉन (n=1), नैप्थलीन में 10π (n=2), ऐन्थ्रासीन व फीनेंथ्रीन में 14π (n=3) होते हैं।

5.4 बेन्ज़ीन का विरचन

विधिविवरण
एथाइन के चक्रीय बहुलकीकरण से873K पर लाल तप्त लौह नलिका में एथाइन के तीन अणुओं का चक्रीकरण
ऐरोमैटिक अम्लों के विकार्बोक्सिलीकरण सेबेन्जोइक अम्ल के सोडियम लवण को सोडालाइम के साथ गरम करना
फीनॉल के अपचयन सेफीनॉल की वाष्प को जस्ता चूर्ण पर प्रवाहित करना

5.5 रासायनिक गुणधर्म — इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन

अभिक्रियाअभिकर्मक व शर्तेंउत्पाद
नाइट्रोकरणसांद्र HNO₃ + सांद्र H₂SO₄ (323-333K)नाइट्रोबेन्ज़ीन
हैलोजेनीकरणCl₂/Br₂, निर्जल AlCl₃हैलोऐरीन (जैसे क्लोरोबेन्ज़ीन)
सल्फोनीकरणसांद्र H₂SO₄ (SO₃) के साथ गरम करनाबेन्ज़ीन सल्फोनिक अम्ल
फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरणऐल्किल हैलाइड, निर्जल AlCl₃ऐल्किल बेन्ज़ीन
फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसिलीकरणऐसिल हैलाइड/ऐसिड ऐनहाइड्राइड, निर्जल AlCl₃ऐसिल बेन्ज़ीन

इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन की क्रियाविधि — तीन पद

पदविवरण
(क) इलेक्ट्रॉनरागी की उत्पत्तिलूइस अम्ल (AlCl₃) आक्रमणकारी अभिकर्मक के साथ संयुक्त होकर E⁺ देता है
(ख) कार्बधनायन (ऐरीनोनियम आयन) का बननाE⁺ के आक्रमण से सिग्मा संकुल (sp³ कार्बन युक्त) बनता है, जो अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त करता है
(ग) प्रोटॉन का विलोपनAlCl₄⁻/HSO₄⁻ के आक्रमण द्वारा प्रोटॉन विलोपित होता है, ऐरोमैटिकता पुनः स्थापित होती है
यदि इलेक्ट्रॉनरागी अभिकर्मक को आधिक्य में लिया जाए, तो पुनः प्रतिस्थापन अभिक्रिया होती है — उदाहरणतः बेन्ज़ीन की क्लोरीन की आधिक्य मात्रा के साथ अभिक्रिया कराने पर हैक्साक्लोरोबेन्ज़ीन (C₆Cl₆) प्राप्त हो सकती है।

योगज अभिक्रियाएँ (विशेष परिस्थितियों में)

हाइड्रोजनीकरण व हैलोजनीकरण C₆H₆ + 3H₂ →(Ni,Δ) साइक्लोहेक्सेन
C₆H₆ + 3Cl₂ →(uv, 500K) बेन्ज़ीनहैक्साक्लोराइड (C₆H₆Cl₆, गैमेक्सीन)

दहन

C₆H₆ + 15/2 O₂ → 6CO₂ + 3H₂O
सामान्य हाइड्रोकार्बन दहन सूत्र CₓHᵧ + (x + y/4)O₂ → xCO₂ + (y/2)H₂O

5.6 एकल प्रतिस्थापित बेन्ज़ीन में क्रियात्मक समूह का निर्देशात्मक प्रभाव

यदि एकल प्रतिस्थापित बेन्ज़ीन का पुनः प्रतिस्थापन कराया जाए, तो तीनों संभावित द्विप्रतिस्थापित उत्पाद समान मात्रा में नहीं बनते — यह व्यवहार पहले से उपस्थित प्रतिस्थापी की प्रकृति पर निर्भर करता है। इसे प्रतिस्थापियों का निर्देशात्मक प्रभाव कहते हैं।

वर्गउदाहरण समूहप्रभाव
ऑर्थो/पैरा (सक्रियकारी)−NH₂, −OH, −CH₃, −OCH₃अनुनाद द्वारा o/p स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं
ऑर्थो/पैरा (निष्क्रियकारी)−Cl, −Br−I प्रभाव से निष्क्रिय, परंतु अनुनाद के कारण o/p निर्देशी
मेटा (निष्क्रियकारी)−NO₂, −CN, −COOH, −SO₃Hप्रबल −I प्रभाव से निष्क्रिय; m स्थिति पर आक्रमण होता है
फीनॉल में −OH का एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म वलय में अनुनाद द्वारा विस्थानीकृत होकर o व p स्थिति पर इलेक्ट्रॉन-घनत्व बढ़ाता है, जिससे ये इलेक्ट्रॉनरागी आक्रमण के लिए सक्रिय हो जाती हैं। इसके विपरीत नाइट्रोबेन्ज़ीन में −NO₂ का प्रबल −I प्रभाव वलय पर इलेक्ट्रॉन-घनत्व घटाता है, परंतु o व p स्थिति पर यह घनत्व m स्थिति से अधिक ही रहता है, इसलिए इलेक्ट्रॉनरागी तुलनात्मक रूप से इलेक्ट्रॉनधनी स्थिति (मेटा) पर आक्रमण करता है।
त्वरित तथ्य
  • बेन्ज़ीन को सर्वप्रथम माइकेल फैराडे ने 1825 में प्राप्त किया; केकुले ने 1865 में संरचना दी।
  • ऐरोमैटिकता की शर्तें: समतलीयता, पूर्ण विस्थानीकरण, हकल नियम (4n+2)π इलेक्ट्रॉन।
  • बेन्ज़ीन में सभी C−C आबंध लंबाई समान (139pm) होती है।
  • इलेक्ट्रॉनदाता समूह (जैसे −OH, −NH₂, −CH₃) o/p निर्देशी व सक्रियकारी; इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (जैसे −NO₂, −COOH) मेटा निर्देशी व निष्क्रियकारी।
  • ऐरिल हैलाइड अपवाद — निष्क्रियकारी होते हुए भी o/p निर्देशी।

6 कैंसरजन्य गुण तथा विषाक्तता

बेन्ज़ीन तथा बहुकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन, जिनमें दो से अधिक जुड़ी हुई वलय हों, विषाक्त तथा कैंसर जनित (कैंसरजनी) गुण दर्शाते हैं। बहुकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन, कार्बनिक पदार्थों जैसे तंबाकू, कोल तथा पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन से बनते हैं, जो मानव शरीर में प्रवेश कर विभिन्न जैव रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा DNA को अंततः नष्ट कर कैंसर उत्पन्न करते हैं।

प्रमुख कैंसरजनी हाइड्रोकार्बन: 1,2-बेन्ज़एन्थ्रेसीन, 3-मेथिलकोलेंथ्रीन, 1,2-बेन्ज़पाइरीन, 9,10-डाइमेथिल-1,2-बेन्ज़एन्थ्रेसीन, 1,2,5,6-डाइबेन्ज़एन्थ्रेसीन — ये सभी बहुकेंद्रकीय ऐरोमैटिक यौगिक हैं।

एक-पंक्ति तथ्य सूची

परीक्षा-उपयोगी संकलन
  • हाइड्रोकार्बन केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन के यौगिक हैं — ऊर्जा के मुख्य स्रोत।
  • ऐल्केन CₙH₂ₙ₊₂, ऐल्कीन CₙH₂ₙ, ऐल्काइन CₙH₂ₙ₋₂ — तीनों के सामान्य सूत्र।
  • वुर्ट्ज़ अभिक्रिया केवल सम कार्बन संख्या वाले ऐल्केन के लिए उपयुक्त है।
  • ऐल्केन हैलोजेनीकरण मुक्त-मूलक क्रियाविधि से; हैलोजन सक्रियता क्रम F₂>>>Cl₂>>>Br₂>I₂।
  • एथेन का सांतरित संरूपण ग्रस्त से अधिक स्थायी — ऊर्जा-अवरोध केवल 12.5 kJ/mol।
  • मार्कोनीकॉफ नियम: योज्य का ऋणात्मक भाग हाइड्रोजन-न्यून कार्बन पर जुड़ता है।
  • परॉक्साइड प्रभाव केवल HBr के साथ प्रति-मार्कोनीकॉफ योग देता है।
  • लिंडलार अभिकर्मक से समपक्ष, Na/द्रव NH₃ से विपक्ष ऐल्कीन।
  • टर्मिनल ऐल्काइनों के हाइड्रोजन अम्लीय होते हैं — Na/NaNH₂ से धातु ऐसीटिलाइड।
  • कुशरॉव अभिक्रिया: एथाइन → एथेनैल; अन्य ऐल्काइन → कीटोन।
  • एथाइन के 3 अणुओं के चक्रीय बहुलकीकरण से बेन्ज़ीन (873K, लाल तप्त लौह नलिका)।
  • बेन्ज़ीन: केकुले संरचना, अनुनाद संकर, C−C बंध लंबाई 139pm (सर्वत्र समान)।
  • ऐरोमैटिकता: समतलीयता + पूर्ण विस्थानीकरण + (4n+2)π (हकल नियम)।
  • o,p-निर्देशी समूह सामान्यतः सक्रियकारी (हैलोजन अपवाद); m-निर्देशी सदैव निष्क्रियकारी।
  • बहुकेंद्रकीय ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन कैंसरजनी व विषाक्त होते हैं।

सूत्र सारांश

संकल्पनासूत्र
ऐल्केन सामान्य सूत्रCₙH₂ₙ₊₂
ऐल्कीन सामान्य सूत्रCₙH₂ₙ
ऐल्काइन सामान्य सूत्रCₙH₂ₙ₋₂
दहन (CₓHᵧ)CₓHᵧ + (x+y/4)O₂ → xCO₂ + (y/2)H₂O
हैलोजेनीकरण (मुक्त-मूलक)R−H + X₂ → R−X + HX
वुर्ट्ज़ अभिक्रिया2R−X + 2Na → R−R + 2NaX
डीहाइड्रोहैलोजनीकरणR−CH₂−CH₂−X + KOH(alc) → R−CH=CH₂ + KX + H₂O
हाइड्रोबोरेशन-ऑक्सीकरणऐल्कीन + B₂H₆ → ऐल्किलबोरेन → ऐल्कोहॉल (anti-Markovnikov)
ओज़ोनी अपघटनC=C → O₃ → ओज़ोनाइड → Zn/H₂O → कार्बोनिल यौगिक
हकल नियम(4n+2)π इलेक्ट्रॉन (n=0,1,2,...)
कुशरॉव अभिक्रियाRC≡CH + H₂O →(Hg²⁺/H⁺) R−CO−CH₃

अध्याय अभ्यास — प्रश्न 9.1 से 9.25 तक (विस्तृत हल सहित)

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें। सभी उत्तरों में उपरोक्त 'सूत्र-सूची' व 'तथ्य-सूची' का उपयोग किया गया है।

ऐल्केन — क्रियाविधि व नामकरण
9.1 मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान ऐथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
मेथेन का क्लोरीनीकरण एक मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि से होता है, जिसमें तीन पद होते हैं — प्रारंभन, संचरण तथा समापन।
प्रारंभन पद में प्रकाश की उपस्थिति में Cl₂ का समापघटन होकर दो Cl• मुक्त-मूलक बनते हैं। संचरण पद में Cl• मेथेन पर आक्रमण कर CH₃• (मेथिल मुक्त-मूलक) तथा HCl बनाता है; यह CH₃•, Cl₂ के साथ अभिक्रिया कर CH₃Cl तथा एक नया Cl• बनाता है, जो शृंखला को आगे बढ़ाता है।
समापन पद में विभिन्न संभावनाएँ हो सकती हैं, जिनमें से एक है — दो मेथिल मुक्त-मूलकों (•CH₃) का आपस में संयोजन: •CH₃ + •CH₃ → CH₃−CH₃ (एथेन)।
उत्तर: पार्श्व-अभिक्रिया (side reaction) के रूप में शृंखला समापन पद में दो CH₃• मुक्त-मूलकों के परस्पर संयोजन से एथेन उपोत्पाद (byproduct) के रूप में बनती है।
9.2 निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए — (क) CH₃CH=C(CH₃)₂ (ख) CH₂=CH-C≡C-CH₃ (ग) ब्यूटा-1,3-डाइईन (घ) 4-फेनिलब्यूट-1-ईन (ङ) 2-मेथिलफ़ीनॉल (च) 5-(2-मेथिलप्रोपिल)डेकेन (छ) 4-एथिलडेका-1,5,8-ट्राइईन
(क) CH₃CH=C(CH₃)₂ — 2-मेथिलब्यूट-2-ईन
(ख) CH₂=CH-C≡C-CH₃ — पेन्ट-1-ईन-3-आइन
(ग) ब्यूटा-1,3-डाइईन — ब्यूटा-1,3-डाइईन
(घ) 4-फेनिलब्यूट-1-ईन — 4-फेनिलब्यूट-1-ईन
(ङ) 2-मेथिलफ़ीनॉल — 2-मेथिलफ़ीनॉल
(च) 5-(2-मेथिलप्रोपिल)डेकेन — 5-(2-मेथिलप्रोपिल)डेकेन
(छ) 4-एथिलडेका-1,5,8-ट्राइईन — 4-एथिलडेका-1,5,8-ट्राइईन
उत्तर: ऊपर IUPAC नाम दिए गए हैं।
ऐल्कीन व ऐल्काइन — समावयवता
9.3 C₄H₈ और C₅H₈ के सभी संभावित स्थिति समावयवियों के संरचना-सूत्र एवं IUPAC नाम दीजिए।
C₄H₈ (एक द्विआबंध):
(i) CH₂=CH−CH₂−CH₃ — ब्यूट-1-ईन
(ii) CH₃−CH=CH−CH₃ — ब्यूट-2-ईन
(iii) CH₂=C(CH₃)−CH₃ — 2-मेथिलप्रोपीन
C₅H₈ (एक त्रिआबंध):
(i) HC≡C−CH₂−CH₂−CH₃ — पेन्ट-1-आइन
(ii) CH₃−C≡C−CH₂−CH₃ — पेन्ट-2-आइन
(iii) CH₃−CH(CH₃)−C≡CH — 3-मेथिलब्यूट-1-आइन
उत्तर: C₄H₈ के तीन तथा C₅H₈ के तीन स्थिति समावयव ऊपर सूचीबद्ध हैं।
ओज़ोनी अपघटन
9.4 पेन्ट-2-ईन, 3,4-डाइमेथिलहेप्ट-3-ईन, 2-एथिलब्यूट-1-ईन, 1-फेनिलब्यूट-1-ईन के ओज़ोनी अपघटन के उत्पाद लिखिए।
(i) पेन्ट-2-ईन (CH₃−CH=CH−CH₂−CH₃) → एथेनैल + प्रोपेनैल
(ii) 3,4-डाइमेथिलहेप्ट-3-ईन → ब्यूटेन-2-ओन + पेन्टेन-2-ओन
(iii) 2-एथिलब्यूट-1-ईन → मेथेनैल + पेन्टेन-3-ओन
(iv) 1-फेनिलब्यूट-1-ईन → प्रोपेनैल + बेन्ज़ैल्डिहाइड
उत्तर: ऊपर उत्पाद दिए गए हैं।
9.5 एक ऐल्कीन 'A' के ओज़ोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा ऐथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। A का IUPAC नाम तथा संरचना दीजिए।
ओज़ोनी अपघटन से द्विआबंध के दोनों ओर के टुकड़े मिलकर मूल ऐल्कीन बनाते हैं — पेन्टेन-3-ओन (CH₃CH₂−C(=O)−CH₂CH₃) तथा एथेनैल (CH₃−CHO) दोनों के कार्बोनिल कार्बन ही मूल द्विआबंधित कार्बन थे।
इन्हें जोड़ने पर A: CH₃−CH=C(C₂H₅)−CH₂−CH₃ — 3-एथिलपेन्ट-2-ईन
उत्तर: A = 3-एथिलपेन्ट-2-ईन, संरचना CH₃−CH=C(C₂H₅)−CH₂−CH₃
9.6 एक ऐल्कीन A में तीन C-C, आठ C-H सिग्मा आबंध तथा एक C-C पाई आबंध है। A का ओज़ोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का IUPAC नाम लिखिए।
तीन C−C σ + एक C=C π का अर्थ है 4-कार्बन ऐल्कीन (ब्यूटीन) — C₄H₈। आठ C−H σ इसी संरचना के अनुरूप है।
मोलर द्रव्यमान 44 वाला ऐल्डिहाइड CH₃CHO (एथेनैल) है। दो समान एथेनैल देने वाली ऐल्कीन ब्यूट-2-ईन (CH₃−CH=CH−CH₃) है।
उत्तर: ब्यूट-2-ईन
9.7 एक ऐल्कीन, जिसके ओज़ोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
(यहाँ "प्रोपेनॉल" वास्तव में "प्रोपेनैल" होना चाहिए) प्रोपेनैल (CH₃CH₂−CHO) और पेन्टेन-3-ओन (CH₃CH₂−CO−CH₂CH₃) को कार्बोनिल कार्बन से जोड़ने पर A: CH₃−CH₂−C(=CH−CH₂−CH₃)−CH₂−CH₃ — 3-एथिलहेक्स-3-ईन
उत्तर: CH₃−CH₂−C(=CH−CH₂−CH₃)−CH₂−CH₃ (3-एथिलहेक्स-3-ईन)
दहन समीकरण
9.8 ब्यूटेन, पेन्टीन, हैक्साइन, टॉलूइन के दहन की समीकरण लिखिए।
(i) ब्यूटेन: C₄H₁₀ + 13/2 O₂ → 4CO₂ + 5H₂O
(ii) पेन्टीन (C₅H₁₀): C₅H₁₀ + 15/2 O₂ → 5CO₂ + 5H₂O
(iii) हैक्साइन (C₆H₁₀): C₆H₁₀ + 17/2 O₂ → 6CO₂ + 5H₂O
(iv) टॉलूइन (C₇H₈): C₇H₈ + 9O₂ → 7CO₂ + 4H₂O
उत्तर: ऊपर संतुलित समीकरण दिए गए हैं।
ज्यामितीय समावयवता
9.9 हैक्स-2-ईन की सिस व ट्रांस संरचनाएँ बनाइए। किसका क्वथनांक अधिक होता है और क्यों?
सिस-हैक्स-2-ईन: दोनों बड़े समूह (CH₃ व प्रोपिल) एक ही ओर; ट्रांस-हैक्स-2-ईन: विपरीत ओर।
सिस रूप में द्विध्रुव आघूर्ण अधिक (अधिक ध्रुवीय) होता है, जिससे अंतरअणुक द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण बल प्रबल होता है, इसलिए सिस समावयव का क्वथनांक अधिक होता है।
उत्तर: सिस-हैक्स-2-ईन का क्वथनांक अधिक होता है।
9.10 बेन्ज़ीन में तीन द्वि-आबंध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
बेन्ज़ीन का π इलेक्ट्रॉन पूरी वलय में विस्थानीकृत (delocalized) होते हैं — यह एक अनुनाद संकर है।
विस्थानीकरण के कारण अणु की ऊर्जा किसी भी केकुले संरचना से कम होती है, जिसे अनुनाद-स्थायीकरण ऊर्जा कहते हैं।
उत्तर: अनुनाद के कारण (विस्थानीकृत π इलेक्ट्रॉन) — यह ऐल्कीन-सदृश योगज अभिक्रियाएँ नहीं दिखाती।
ऐरोमैटिकता
9.11 किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं?
(i) समतलीयता — सभी वलय-परमाणु एक तल में।
(ii) पूर्ण विस्थानीकरण — वलय में π इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थानीकरण (संयुग्मित निकाय)।
(iii) हकल नियम — (4n+2)π इलेक्ट्रॉन (n=0,1,2,...)।
उत्तर: तीनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए।
9.25 वुर्ट्ज़ अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन क्यों नहीं बनाए जा सकते? उदाहरण दीजिए।
वुर्ट्ज़ अभिक्रिया में दो समान ऐल्किल हैलाइडों से सम-कार्बन (even) वाला ऐल्केन बनता है। असमान हैलाइडों का प्रयोग करने पर तीन उत्पादों (दो सहउत्पाद + वांछित) का मिश्रण बनता है, जिसे पृथक् करना कठिन है।
उदाहरण: 1-ब्रोमोप्रोपेन (3C) + 1-ब्रोमोब्यूटेन (4C) → हेप्टेन (7C, वांछित) + हैक्सेन (6C, सहउत्पाद) + ऑक्टेन (8C, सहउत्पाद)।
उत्तर: सहउत्पादों के कारण शुद्ध विषम-कार्बन ऐल्केन प्राप्त नहीं होता।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय NEET में 2–4% भारांक रखता है; अधिकांश प्रश्न क्रियाविधि, संरचना-पहचान (ओज़ोनी अपघटन, अनुनाद) व मार्कोनीकॉफ नियम पर आधारित होते हैं।
  • मुक्त मूलक हैलोजनीकरण में C−H बंधों की सापेक्ष सक्रियता: 3° > 2° > 1° > CH₄।
  • वुर्ट्ज़ अभिक्रिया सदैव सम कार्बन संख्या वाला ऐल्केन बनाती है (समान हैलाइडों के साथ)।
तथ्य
  • मार्कोनीकॉफ नियम: H, अधिक H युक्त कार्बन पर; X, कम H युक्त पर (अधिक स्थायी कार्बधनायन)।
  • पेरॉक्साइड प्रभाव केवल HBr के साथ, HCl व HI के साथ नहीं।
  • सेत्ज़ेफ नियम: विलोपन में अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन मुख्य उत्पाद होती है।
  • कार्बधनायन स्थायित्व: 3° > 2° > 1° > मेथिल।
तुलनात्मक
  • ट्रांस ऐल्कीन सिस से अधिक स्थायी (कम त्रिविम प्रतिकर्षण) — हाइड्रोजनीकरण ऊष्मा सिस में अधिक।
  • टर्मिनल ऐल्काइन (≡C−H) अम्लीय — Na, NaNH₂ के साथ धात्विक ऐसीटिलाइड बनाता है; इंटरनल ऐल्काइन यह परीक्षण नहीं देते।
  • लिंडलार उत्प्रेरक → सिस-ऐल्कीन; Na/द्रव NH₃ → ट्रांस-ऐल्कीन।
तथ्य
  • बेन्ज़ीन की अनुनाद ऊर्जा ≈ 36 kcal/mol (≈150.6 kJ/mol)।
  • बेन्ज़ीन में सभी C−C बंध लंबाई 139 pm (एकल 154 pm, द्वि 134 pm के मध्य)।
  • o,p-निर्देशी समूह (सक्रियकारी): −OH, −NH₂, −CH₃; m-निर्देशी (निष्क्रियकारी): −NO₂, −COOH, −CN। हैलोजन o,p-निर्देशी परंतु निष्क्रियकारी।
तुलनात्मक
  • s-लक्षण, अम्लीयता व C−H आबंध लंबाई का क्रम: sp³ (25% s) → sp² (33%) → sp (50%) — अम्लीयता बढ़ती है, आबंध लंबाई घटती है।
चूक गए
  • फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया प्रबल निष्क्रियकारी समूह (जैसे −NO₂) युक्त वलयों पर नहीं होती; ऐनिलीन पर भी असफल (AlCl₃ के साथ संकुल बनने के कारण)।
रणनीति
  • ओज़ोनी अपघटन से संरचना ज्ञात करने हेतु: अचक्रीय ऐल्कीन में द्वि-आबंधों की संख्या + 1 = कार्बोनिल खंडों की संख्या; चक्रीय में एकल द्वि-कार्बोनिल यौगिक बनता है।

🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न (2014–2026)

इस अध्याय से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।

Re-NEET 2026
26R.1 कथन I: ट्रांस-ब्यूट-2-ईन + Br₂ → मेसो-2,3-डाइब्रोमोब्यूटेन। कथन II: सिस-ब्यूट-2-ईन + ठंडा क्षारीय KMnO₄ → मेसो-2,3-ब्यूटेनडाइऑल।
Br₂ का योग anti-योग (ब्रोमोनियम आयन) से होता है, KMnO₄ का syn-योग (चक्रीय मैंगनेट एस्टर) से।
ट्रांस + anti → मेसो; ट्रांस + syn → रेसैमिक। सिस + syn → मेसो; सिस + anti → रेसैमिक।
अतः ट्रांस-ब्यूट-2-ईन + Br₂ (anti) → मेसो (सत्य); सिस-ब्यूट-2-ईन + KMnO₄ (syn) → मेसो (सत्य)।
उत्तर: दोनों कथन सत्य हैं।
NEET 2024 (पुनः परीक्षा)
24R.1 प्रोपीन + B₂H₆ → ट्राइ-n-प्रोपिलबोरेन; H₂O₂/NaOH → ?
हाइड्रोबोरेशन-ऑक्सीकरण anti-Markovnikov योग देता है — बोरॉन कम प्रतिस्थापित कार्बन पर जुड़ता है, ऑक्सीकरण पर −OH वहीं प्रतिस्थापित होता है।
प्रोपीन (CH₃−CH=CH₂) में बोरॉन टर्मिनल कार्बन पर → प्रोपेन-1-ऑल (n-प्रोपेनॉल) बनेगा, प्रोपेन-2-ऑल नहीं।
उत्तर: कथन I सत्य, II असत्य (सही उत्पाद प्रोपेन-1-ऑल)।
NEET 2022
22.1 हेप्टेन, ब्यूटेन, 2-मेथिलब्यूटेन, 2-मेथिलप्रोपेन, हैक्सेन के क्वथनांकों का घटता क्रम बताइए।
शृंखला लंबाई बढ़ने पर क्वथनांक बढ़ता है; शाखन बढ़ने पर घटता है।
क्रम: हेप्टेन (C₇) > हैक्सेन (C₆) > 2-मेथिलब्यूटेन (C₅, शाखित) > ब्यूटेन (C₄, सीधी) > 2-मेथिलप्रोपेन (C₄, सर्वाधिक शाखित)।
उत्तर: हेप्टेन > हैक्सेन > 2-मेथिलब्यूटेन > ब्यूटेन > 2-मेथिलप्रोपेन
NEET 2019
19.1 एक ऐल्कीन "A" के ओज़ोनी अपघटन से प्रोपेनोन व एथेनैल बनते हैं। HCl के योग से बना मुख्य उत्पाद "B" क्या है?
ओज़ोनी अपघटन से A = (CH₃)₂C=CH−CH₃ (2-मेथिलब्यूट-2-ईन)।
HCl के योग (मार्कोनीकॉफ) से 2-क्लोरो-2-मेथिलब्यूटेन (तृतीयक) बनेगा।
उत्तर: A = 2-मेथिलब्यूट-2-ईन; B = 2-क्लोरो-2-मेथिलब्यूटेन
NEET 2017
17.1 ऐल्केन, ऐल्कीन, ऐल्काइन की अम्लीयता का क्रम बताइए।
अम्लीयता ∝ s-लक्षण (sp > sp² > sp³) — ऐल्काइन (sp, 50%) > ऐल्कीन (sp², 33%) > ऐल्केन (sp³, 25%)।
उत्तर: HC≡CH > H₂C=CH₂ > CH₃−CH₃
AIPMT 2015
15.1 1-क्लोरो-1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन बनाने वाली ऐल्कीन कौन-सी है?
मार्कोनीकॉफ नियम से Cl अधिक प्रतिस्थापित कार्बन पर जुड़ता है — अतः ऐल्कीन 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सीन है।
उत्तर: 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सीन
15.2 प्रबल अम्ल से गरम करने पर कौन 2,3-डाइमेथिल-2-ब्यूटीन देगा?
संगत तृतीयक ऐल्कोहॉल 2,3-डाइमेथिलब्यूटेन-2-ऑल निर्जलीकरण से यह टेट्रा-प्रतिस्थापित ऐल्कीन देगा (ज़ैत्सेफ नियम)।
उत्तर: 2,3-डाइमेथिलब्यूटेन-2-ऑल
AIPMT 2014
14.1 किस यौगिक का संकरण CO₂ के समान है?
CO₂ का कार्बन sp संकरित (रैखिक) — ऐल्काइन (एथाइन, HC≡CH) में भी sp होता है।
उत्तर: ऐल्काइन (जैसे एथाइन)

स्रोत: NCERT रसायन विज्ञान, कक्षा 11, एकक 9 — "हाइड्रोकार्बन" (Reprint 2026‑27) पर आधारित पूर्ण अध्याय नोट्स। NEET प्रश्न-संग्रह आधिकारिक AIPMT/NEET प्रश्नपत्रों पर आधारित है।

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