हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbons)
ऐल्केन, ऐल्कीन, ऐल्काइन तथा ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों की संरचना, नामपद्धति, समावयवता, विरचन, भौतिक-रासायनिक गुणधर्म, क्रियाविधि तथा कैंसरजन्यता तक — संपूर्ण अध्याय की रंगीन तालिकाएँ, आरेख, तथ्य तथा सभी 25 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
1 परिचय व वर्गीकरण
हाइड्रोकार्बन पद स्वतः स्पष्ट है — इसका अर्थ है केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन से बने यौगिक। हाइड्रोकार्बन ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। LPG (द्रवित पेट्रोलियम गैस), CNG (संघनित प्राकृतिक गैस) तथा LNG (द्रवित प्राकृतिक गैस) — ये सभी हाइड्रोकार्बनों के मिश्रण हैं, जो ईंधन के रूप में उपयोग होते हैं। पेट्रोलियम के प्रभावी आसवन (Fractional distillation) से पेट्रोल, डीज़ल तथा कैरोसिन प्राप्त होते हैं, जबकि कोल गैस, कोल के भंजक आसवन (Destructive distillation) से प्राप्त होती है।
1.1 कार्बन-कार्बन आबंध की प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण
| वर्ग | आबंध प्रकृति | उपवर्ग | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| संतृप्त | केवल C−C व C−H एकल आबंध | ऐल्केन (विवृत शृंखला) | CH₄, C₂H₆ |
| केवल C−C व C−H एकल आबंध | साइक्लोऐल्केन (संवृत शृंखला) | साइक्लोहेक्सेन | |
| असंतृप्त | C=C द्विआबंध | ऐल्कीन | C₂H₄ |
| C≡C त्रिआबंध | ऐल्काइन | C₂H₂ | |
| ऐरोमैटिक | संवृत, विशेष अनुनाद-स्थिर निकाय | — | बेन्ज़ीन |
- LPG घरेलू ईंधन है, जो सबसे कम प्रदूषण वाली गैस है।
- पेट्रोलियम से प्रभावी आसवन द्वारा पेट्रोल, डीज़ल, कैरोसिन प्राप्त होते हैं; कोल के भंजक आसवन से कोल गैस मिलती है।
- संतृप्त हाइड्रोकार्बन (ऐल्केन/साइक्लोऐल्केन) सामान्य अवस्थाओं में निष्क्रिय होते हैं, इसलिए इन्हें पैराफिन (Parum=कम, Affinis=क्रियाशील) भी कहा जाता था।
- ऐल्केनों का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ है।
2 ऐल्केन (Alkane)
ऐल्केन कार्बन-कार्बन एकल आबंधयुक्त संतृप्त विवृत शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन हैं। मेथेन (CH₄) इस परिवार का प्रथम सदस्य है। VSEPR सिद्धांत के अनुसार मेथेन की संरचना चतुष्फलकीय होती है, जिसमें कार्बन केंद्र में तथा चार हाइड्रोजन समचतुष्फलक के चारों कोनों पर स्थित हैं — प्रत्येक H−C−H बंध कोण 109.5° होता है। C−C तथा C−H आबंधों की लंबाइयाँ क्रमशः 154pm व 112pm हैं, जो कार्बन के sp³ संकरित कक्षकों तथा हाइड्रोजन के 1s के समाक्षीय अतिव्यापन से बनते हैं।
2.1 नामपद्धति तथा शृंखला समावयवता
प्रथम तीन सदस्यों (मेथेन, एथेन, प्रोपेन) में केवल एक ही संरचना होती है, परंतु C₄H₁₀ से उच्चतर ऐल्केनों में एक से अधिक संरचनाएँ (समावयव) संभव होती हैं। जैसे n-ब्यूटेन तथा 2-मेथिलप्रोपेन (आइसोब्यूटेन) — दोनों का अणुसूत्र समान C₄H₁₀ है, परंतु क्वथनांक व अन्य गुणधर्म भिन्न हैं। ऐसे समावयवों को शृंखला समावयव कहते हैं, क्योंकि इनमें अंतर कार्बन शृंखला की बनावट (सतत/शाखित) के कारण होता है।
| अणुसूत्र | संभावित शृंखला समावयवों की संख्या |
|---|---|
| C₄H₁₀ | 2 |
| C₅H₁₂ | 3 |
| C₆H₁₄ | 5 |
| C₇H₁₆ | 9 |
| C₁₀H₂₂ | 75 |
2.2 कार्बन परमाणुओं का वर्गीकरण
| प्रकार | परिभाषा |
|---|---|
| प्राथमिक (1°) | अन्य कार्बन से न जुड़ा हो या केवल एक कार्बन से जुड़ा हो |
| द्वितीयक (2°) | दो कार्बन परमाणुओं से जुड़ा हो |
| तृतीयक (3°) | तीन कार्बन परमाणुओं से जुड़ा हो |
| चतुष्क (4°) | चार अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़ा हो |
2.3 विरचन (निर्माण की विधियाँ)
| स्रोत | विधि व शर्तें |
|---|---|
| असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों से | Pt/Pd/Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में H₂ का योग (हाइड्रोजनीकरण) |
| ऐल्किल हैलाइडों से (i) | Zn तथा तनु HCl द्वारा अपचयन |
| ऐल्किल हैलाइडों से (ii) | शुष्क ईथर में सोडियम धातु के साथ (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया) — सम कार्बन संख्या वाले ऐल्केन बनते हैं |
| कार्बोक्सिलिक अम्लों से (i) | सोडा लाइम के साथ गरम करना (विकार्बोक्सिलीकरण) — एक कम कार्बन वाला ऐल्केन |
| कार्बोक्सिलिक अम्लों से (ii) | कोल्बे विद्युत्-अपघटनी विधि — ऐनोड पर सम कार्बन संख्या वाला ऐल्केन |
CH₃Cl + H₂ →(Zn,H⁺) CH₄ + ZnCl⁺... (सांकेतिक)
C₂H₅Br + 2Na + BrC₂H₅ →(शुष्क ईथर) C₂H₅−C₂H₅ + 2NaBr (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया)
CH₃COONa + NaOH →(CaO,Δ) CH₄ + Na₂CO₃ (विकार्बोक्सिलीकरण)
2CH₃COONa + 2H₂O →(विद्युत्-अपघटन) CH₃−CH₃ + 2CO₂ + H₂ + 2NaOH (कोल्बे विधि)
2.4 भौतिक गुणधर्म
ऐल्केन अध्रुवीय होते हैं (C−C व C−H की विद्युत्-ऋणात्मकता में बहुत कम अंतर के कारण), जिनके मध्य दुर्बल वांडरवाल्स बल पाए जाते हैं। प्रथम चार सदस्य (C₁−C₄) गैस, C₅−C₁₇ द्रव तथा C₁₈ या अधिक कार्बन वाले ऐल्केन 298K पर ठोस होते हैं। सीधी शृंखला वाले ऐल्केनों का क्वथनांक समावयवी शाखित शृंखला वाले ऐल्केनों की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि शाखाओं की संख्या बढ़ने से अणु की आकृति गोलाकार होकर सतही क्षेत्रफल तथा अंतराअणुक वांडरवाल्स बल घट जाते हैं।
2.5 रासायनिक गुणधर्म
(अ) प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ — हैलोजेनीकरण
CH₃Cl + Cl₂ →(hν) CH₂Cl₂ + HCl
CH₂Cl₂ + Cl₂ →(hν) CHCl₃ + HCl
CHCl₃ + Cl₂ →(hν) CCl₄ + HCl
मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि — तीन पद
| पद | क्रिया |
|---|---|
| प्रारंभन (Initiation) | प्रकाश/ऊष्मा की उपस्थिति में Cl₂ का समापघटन: Cl−Cl → Cl• + Cl• |
| संचरण (Propagation) | Cl• मेथेन पर आक्रमण कर CH₃• तथा HCl बनाता है; CH₃•, Cl₂ पर आक्रमण कर CH₃Cl तथा नया Cl• बनाता है — शृंखला आगे बढ़ती है |
| समापन (Termination) | दो मुक्त-मूलक परस्पर संयोजित होकर शृंखला समाप्त करते हैं (जैसे Cl•+Cl•, CH₃•+CH₃•, CH₃•+Cl•) |
(ब) दहन
अपर्याप्त वायु में अपूर्ण दहन: CH₄ + O₂ → C(s) + 2H₂O (कार्बन कज्जल बनता है)
(स) अन्य अभिक्रियाएँ
| अभिक्रिया | विवरण |
|---|---|
| नियंत्रित ऑक्सीकरण | उपयुक्त उत्प्रेरक व दाब पर मेथेनॉल, मेथेनैल या एथेनोइक अम्ल जैसे उत्पाद बनते हैं |
| समावयवीकरण | निर्जल AlCl₃/HCl की उपस्थिति में n-ऐल्केन शाखित शृंखला ऐल्केनों में बदल जाते हैं |
| ऐरोमैटीकरण (पुनर्संभवन) | छः या अधिक कार्बन वाले n-ऐल्केन Cr₂O₃/V₂O₅ जैसे उत्प्रेरकों की उपस्थिति में 773K, 10-20 वायुमंडलीय दाब पर बेन्ज़ीन या उसके सजातीय व्युत्पन्न में चक्रीकृत हो जाते हैं |
| भाप के साथ अभिक्रिया | मेथेन, निकैल उत्प्रेरक की उपस्थिति में 1273K पर CO व H₂ देती है — डाइहाइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन में प्रयुक्त |
| ताप-अपघटन (भंजन/Cracking) | उच्चतर ऐल्केन उच्च ताप पर निम्नतर ऐल्केन या ऐल्कीनों में अपघटित; एक मुक्त-मूलक अभिक्रिया मानी जाती है |
2.6 संरूपण (Conformations)
C−C एकल आबंध के चारों ओर मुक्त घूर्णन (यद्यपि पूर्णतः मुक्त नहीं) के कारण त्रिविम में परमाणुओं के विभिन्न विन्यास संभव होते हैं, जिन्हें संरूपण या घूर्णी (Rotamers) कहते हैं। एथेन में दो चरम संरूपण होते हैं — ग्रस्त (Eclipsed, जिसमें हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के अधिक पास होते हैं) तथा सांतरित (Staggered, जिसमें हाइड्रोजन अधिकतम दूरी पर होते हैं)।
- ऐल्केन का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ है, जिसका प्रथम स्थायी सदस्य मेथेन (CH₄) है।
- हैलोजेनीकरण मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि (प्रारंभन-संचरण-समापन) द्वारा होता है।
- वुर्ट्ज़ अभिक्रिया केवल सम कार्बन संख्या वाले शुद्ध ऐल्केन बनाने में उपयोगी है।
- ऐल्केन के हाइड्रोजन विस्थापन की दर 3° > 2° > 1° है।
- एथेन का सांतरित संरूपण, ग्रस्त संरूपण से अधिक स्थायी होता है — दोनों में ऊर्जा-अंतर केवल 12.5 kJ mol⁻¹ है।
3 ऐल्कीन (Alkene)
ऐल्कीन द्विआबंधयुक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ है। प्रथम सदस्य एथिलीन अथवा एथीन (C₂H₄) है। एथीन की क्लोरीन से अभिक्रिया कराने पर तैलीय द्रव प्राप्त होता है, इसीलिए ऐल्कीनों को ओलीफीन (तैलीय यौगिक बनाने वाले) भी कहते हैं।
3.1 द्विआबंध की संरचना
ऐल्कीनों में C=C द्विआबंध है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा (σ) आबंध (बंध एन्थैल्पी लगभग 397 kJ mol⁻¹) दो कार्बन परमाणुओं के sp² संकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है, तथा एक दुर्बल पाई (π) आबंध (बंध एन्थैल्पी 284 kJ mol⁻¹) असंकरित 2p कक्षकों के संपार्श्विक अतिव्यापन से बनता है। C=C द्विआबंध लंबाई (134pm), C−C एकल आबंध लंबाई (154pm) से छोटी होती है। दुर्बल π आबंध के कारण ऐल्कीन को दुर्बल बंधित गतिशील इलेक्ट्रॉनों का स्रोत कहा जाता है, इसीलिए इन पर इलेक्ट्रॉनरागी अभिकर्मकों का आक्रमण आसानी से होता है।
3.2 समावयवता
ऐल्कीन संरचनात्मक (शृंखला व स्थिति) एवं ज्यामितीय समावयवता दोनों प्रदर्शित करती हैं। द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जोड़कर संतुष्ट करते हैं (YXC=CXY प्रकार)। यदि इन ठीक स्थितियों में समान समूह एक ही ओर हों, तो समपक्ष (cis), तथा विपरीत ओर हों तो विपक्ष (trans) समावयव कहलाते हैं। यह त्रिविम समावयवता C=C द्विआबंध के इर्द-गिर्द प्रतिबंधित घूर्णन के कारण संभव होती है।
| गुण | समपक्ष (cis) | विपक्ष (trans) |
|---|---|---|
| ध्रुवता | अधिक ध्रुवीय | कम/लगभग अध्रुवीय |
| क्वथनांक (द्रव अवस्था में) | सामान्यतः अधिक | सामान्यतः कम |
| गलनांक (ठोस अवस्था में) | सामान्यतः कम | सामान्यतः अधिक |
3.3 विरचन
| स्रोत | विधि व शर्तें |
|---|---|
| ऐल्काइनों से (i) | लिंडलार अभिकर्मक (सल्फर द्वारा आंशिक निष्क्रिय पैलेडीकृत चारकोल) की उपस्थिति में आंशिक अपचयन — समपक्ष ऐल्कीन |
| ऐल्काइनों से (ii) | सोडियम/द्रव अमोनिया द्वारा अपचयन — विपक्ष ऐल्कीन |
| ऐल्किल हैलाइडों से | ऐल्कोहॉली पोटाश के साथ गरम करना — विहाइड्रोहैलोजेनीकरण, β-विलोपन |
| सन्निध डाइहैलाइडों से | Zn धातु से अभिक्रिया — विहैलोजेनीकरण (ZnX₂ का विलोपन) |
| ऐल्कोहॉलों से | सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गरम करना — अम्लीय निर्जलीकरण |
RC≡CR₁ + H₂ →(Na/द्रव NH₃) विपक्ष ऐल्कीन
CH₂Br−CH₂Br + Zn → CH₂=CH₂ + ZnBr₂
CH₃−CH(OH)−CH₃ →(सांद्र H₂SO₄, Δ) CH₂=CH−CH₃ + H₂O
3.4 रासायनिक गुणधर्म — योगज अभिक्रियाएँ
| अभिक्रिया | विवरण |
|---|---|
| डाइहाइड्रोजन का संयोजन | Ni/Pd/Pt उत्प्रेरक की उपस्थिति में H₂ का योग — ऐल्केन |
| हैलोजन का संयोजन | Br₂/Cl₂ योग से सन्निध डाइहैलाइड; ब्रोमीन जल का लाल-नारंगी रंग लुप्त होना असंतृप्तता का परीक्षण |
| हाइड्रोजन हैलाइड का संयोजन | HI > HBr > HCl क्रम में अभिक्रियाशीलता; असममित ऐल्कीनों में मार्कोनीकॉफ नियम |
| सल्फ्यूरिक अम्ल का संयोजन | मार्कोनीकॉफ नियमानुसार, ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट |
| जल का संयोजन | H⁺ उत्प्रेरक की उपस्थिति में मार्कोनीकॉफ नियमानुसार ऐल्कोहॉल |
| ऑक्सीकरण | ठंडे तनु KMnO₄ (बेयर अभिकर्मक) से ग्लाइकॉल; अम्लीय KMnO₄/K₂Cr₂O₇ से कीटोन/अम्ल |
| ओज़ोनी अपघटन | O₃ का योग कर ओज़ोनाइड, फिर Zn-H₂O से विदलन कर छोटे कार्बोनिल यौगिक — द्विआबंध की स्थिति ज्ञात करने में उपयोगी |
| बहुलकीकरण | उच्च ताप, दाब व उत्प्रेरक की उपस्थिति में अनेक ऐल्कीन अणु जुड़कर बहुलक बनाते हैं (जैसे पॉलिथीन) |
मार्कोनीकॉफ नियम
असममित ऐल्कीनों पर HX के योग में, योज्य का अधिक ऋणात्मक भाग उस कार्बन पर जुड़ता है, जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो। यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि क्रियाविधि में H⁺ का आक्रमण द्विआबंध पर होकर अधिक स्थायी (द्वितीयक/तृतीयक) कार्बधनायन बनता है, जिस पर फिर X⁻ जुड़ता है।
द्वितीयक कार्बधनायन + Br⁻ → CH₃−CHBr−CH₃ (2-ब्रोमोप्रोपेन, मुख्य उत्पाद)
प्रति मार्कोनीकॉफ योगज (परॉक्साइड/खराश प्रभाव)
- ऐल्कीन का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ है; C=C में एक σ व एक π आबंध होता है।
- लिंडलार अभिकर्मक से ऐल्काइन के अपचयन से समपक्ष ऐल्कीन; Na/द्रव NH₃ से विपक्ष ऐल्कीन बनती है।
- मार्कोनीकॉफ नियम: योज्य का ऋणात्मक भाग हाइड्रोजन-न्यून कार्बन पर जुड़ता है।
- परॉक्साइड प्रभाव (खराश प्रभाव) केवल HBr के साथ ही देखा जाता है।
- बेयर अभिकर्मक (ठंडा तनु KMnO₄) असंतृप्तता का परीक्षण है।
4 ऐल्काइन (Alkyne)
ऐल्कीन की तरह ऐल्काइन भी असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें दो कार्बन परमाणुओं के मध्य एक त्रिआबंध होता है। इनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₋₂ है। ऐल्काइन श्रेणी का प्रथम स्थायी सदस्य एथाइन है, जो ऐसीटिलीन नाम से प्रचलित है। ऐसीटिलीन का उपयोग आर्क वेल्डिंग के लिए ऑक्सीऐसीटिलीन ज्वाला के रूप में होता है।
4.1 त्रिआबंध की संरचना
एथाइन के प्रत्येक कार्बन के दो sp संकरित कक्षकों के समाक्षीय अतिव्यापन से कार्बन-कार्बन सिग्माआबंध बनता है, तथा शेष sp कक्षक हाइड्रोजन के 1s कक्षक से अतिव्यापन कर C−H सिग्मा आबंध बनाता है (H−C−C बंध कोण 180°)। प्रत्येक कार्बन के दो असंकरित p-कक्षक परस्पर समांतर होकर संपार्श्विक अतिव्यापन से दो π आबंध बनाते हैं। अतः एथाइन में 1 C−C σ, 2 C−H σ तथा 2 C−C π आबंध होते हैं। C≡C त्रिआबंध की आबंध सामर्थ्य (823 kJ mol⁻¹) C=C द्विआबंध (681 kJ mol⁻¹) व C−C एकल आबंध (348 kJ mol⁻¹) से अधिक होती है, तथा त्रिआबंध लंबाई (120pm) दोनों से छोटी होती है।
4.2 विरचन
| स्रोत | विधि |
|---|---|
| कैल्सियम कार्बाइड से | जल के साथ अभिक्रिया — औद्योगिक रूप से एथाइन का निर्माण; CaCO₃→CaO→CaC₂→C₂H₂ |
| सन्निध डाइहैलाइडों से | ऐल्कोहॉली KOH से विहाइड्रोहैलोजेनीकरण, फिर सोडामाइड (NaNH₂) से उपचार |
CaO + 3C →(Δ) CaC₂ + CO (कैल्सियम कार्बाइड)
CaC₂ + 2H₂O → Ca(OH)₂ + C₂H₂
4.3 रासायनिक गुणधर्म
(अ) ऐल्काइन का अम्लीय गुण
सोडियम धातु या सोडामाइड (NaNH₂) प्रबल क्षारक होते हैं, जो एथाइन के साथ अभिक्रिया करके डाइहाइड्रोजन मुक्त कर सोडियम ऐसीटिलाइड बनाते हैं। यह अभिक्रिया एथीन तथा एथेन प्रदर्शित नहीं करते — यह एथाइन की अम्लीय प्रकृति को इंगित करता है, जिसका कारण sp संकरित कार्बन में अधिकतम s-गुण (50%) के कारण उच्च विद्युत्-ऋणात्मकता है, जिससे त्रिआबंधित कार्बन से जुड़े हाइड्रोजन आसानी से प्रोटॉन के रूप में विलोपित हो जाते हैं।
CH₃−C≡CH + Na⁺NH₂⁻ → CH₃−C≡C⁻Na⁺ + NH₃ (सोडियम प्रोपिनाइड)
(ब) योगज अभिक्रियाएँ
| अभिकर्मक | उत्पाद |
|---|---|
| डाइहाइड्रोजन (Pt/Pd/Ni) | ऐल्कीन, फिर ऐल्केन |
| हैलोजन | टेट्राहैलाइड (दो चरणों में) |
| हाइड्रोजन हैलाइड | जैम डाइहैलाइड (मार्कोनीकॉफ नियमानुसार) |
| जल (Hg²⁺/H⁺, 333K) | कार्बोनिल यौगिक (कुशरॉव अभिक्रिया — एथाइन से एथेनैल, अन्य ऐल्काइनों से कीटोन) |
(स) बहुलकीकरण
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| रैखिक बहुलकीकरण | अनुकूल परिस्थितियों में एथाइन का रैखिक बहुलकीकरण होने से पॉलिऐसीटिलीन बनता है, जो विद्युत् का सुचालक होने के कारण बैटरियों में इलेक्ट्रोड के रूप में प्रयुक्त होता है |
| चक्रीय बहुलकीकरण | एथाइन को लाल तप्त लौह नलिका में 873K पर प्रवाहित करने पर एथाइन के तीन अणु बहुलकीकृत होकर बेन्ज़ीन बनाते हैं |
- ऐल्काइन का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₋₂ है; C≡C में 1σ व 2π आबंध होते हैं।
- केवल त्रिआबंध से जुड़े हाइड्रोजन ही अम्लीय होते हैं (टर्मिनल ऐल्काइन)।
- कुशरॉव अभिक्रिया द्वारा एथाइन से एथेनैल तथा अन्य ऐल्काइनों से कीटोन बनते हैं।
- एथाइन के तीन अणुओं के चक्रीय बहुलकीकरण से बेन्ज़ीन बनती है।
5 ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन
ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन को ऐरीन भी कहते हैं, क्योंकि इनके अधिकांश यौगिकों में विशिष्ट गंध (ग्रीक शब्द "ऐरोमा" = सुगंध) रहती है। जिन ऐरोमैटिक यौगिकों में बेन्ज़ीनवलय होती है, उन्हें बेन्ज़ेनाइड (Benzenoid) तथा जिनमें नहीं होती, उन्हें अबेन्ज़ेनाइड (Nonbenzenoid) कहते हैं।
5.1 बेन्ज़ीन की संरचना — केकुले का योगदान
बेन्ज़ीन को सर्वप्रथम माइकेल फैराडे ने सन् 1825 में प्राप्त किया। इसका अणुसूत्र C₆H₆ है, जो उच्च असंतृप्तता दर्शाता है, परंतु यह किसी ज्ञात ऐल्केन/ऐल्कीन/ऐल्काइन से कोई संबंध नहीं बताता। आगुस्ट केकुले ने सन् 1865 में बेन्ज़ीन की एक संरचना दी, जिसमें छः कार्बन परमाणुओं की चक्रीय व्यवस्था है, जिसमें एकांतर क्रम में द्विआबंध हैं तथा प्रत्येक कार्बन से एक हाइड्रोजन जुड़ा है।
5.2 अनुनाद एवं बेन्ज़ीन का स्थायित्व
संयोजकता बंध सिद्धांत के अनुसार, द्विआबंध के दोलन को अनुनाद द्वारा समझाया गया है। बेन्ज़ीन विभिन्न अनुनादी संरचनाओं का संकर है। कक्षीय अतिव्यापन के आधार पर सही चित्र यह है कि बेन्ज़ीन के सभी छः कार्बन sp² संकरित हैं — प्रत्येक कार्बन के दो sp² कक्षक निकटवर्ती कार्बनों के sp² कक्षकों से अतिव्यापन कर छः C−C σ आबंध (समतलीय षट्भुजीय) बनाते हैं, शेष sp² कक्षक H के s-कक्षक से C−H σ आबंध बनाता है, तथा प्रत्येक कार्बन पर बचा असंकरित p-कक्षक (वलय के तल के लंबवत्) पार्श्व-अतिव्यापन से एक विस्थानीकृत π इलेक्ट्रॉन तंत्र बनाता है।
5.3 ऐरोमैटिकता — हकल नियम
अब "ऐरोमैटिक" शब्द सभी वलय-तंत्रों (चाहे बेन्ज़ीनवलय हो या न हो) पर लागू होता है, यदि वे निम्नलिखित तीन गुण दर्शाएँ:
| शर्त | विवरण |
|---|---|
| (i) समतलीयता | संपूर्ण वलय एक ही तल में होना चाहिए |
| (ii) संपूर्ण विस्थानीकरण | वलय में इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थानीकरण होना चाहिए |
| (iii) हकल नियम | वलय में (4n+2)π इलेक्ट्रॉन होने चाहिए, जहाँ n पूर्णांक है |
5.4 बेन्ज़ीन का विरचन
| विधि | विवरण |
|---|---|
| एथाइन के चक्रीय बहुलकीकरण से | 873K पर लाल तप्त लौह नलिका में एथाइन के तीन अणुओं का चक्रीकरण |
| ऐरोमैटिक अम्लों के विकार्बोक्सिलीकरण से | बेन्जोइक अम्ल के सोडियम लवण को सोडालाइम के साथ गरम करना |
| फीनॉल के अपचयन से | फीनॉल की वाष्प को जस्ता चूर्ण पर प्रवाहित करना |
5.5 रासायनिक गुणधर्म — इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन
| अभिक्रिया | अभिकर्मक व शर्तें | उत्पाद |
|---|---|---|
| नाइट्रोकरण | सांद्र HNO₃ + सांद्र H₂SO₄ (323-333K) | नाइट्रोबेन्ज़ीन |
| हैलोजेनीकरण | Cl₂/Br₂, निर्जल AlCl₃ | हैलोऐरीन (जैसे क्लोरोबेन्ज़ीन) |
| सल्फोनीकरण | सांद्र H₂SO₄ (SO₃) के साथ गरम करना | बेन्ज़ीन सल्फोनिक अम्ल |
| फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण | ऐल्किल हैलाइड, निर्जल AlCl₃ | ऐल्किल बेन्ज़ीन |
| फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण | ऐसिल हैलाइड/ऐसिड ऐनहाइड्राइड, निर्जल AlCl₃ | ऐसिल बेन्ज़ीन |
इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन की क्रियाविधि — तीन पद
| पद | विवरण |
|---|---|
| (क) इलेक्ट्रॉनरागी की उत्पत्ति | लूइस अम्ल (AlCl₃) आक्रमणकारी अभिकर्मक के साथ संयुक्त होकर E⁺ देता है |
| (ख) कार्बधनायन (ऐरीनोनियम आयन) का बनना | E⁺ के आक्रमण से सिग्मा संकुल (sp³ कार्बन युक्त) बनता है, जो अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त करता है |
| (ग) प्रोटॉन का विलोपन | AlCl₄⁻/HSO₄⁻ के आक्रमण द्वारा प्रोटॉन विलोपित होता है, ऐरोमैटिकता पुनः स्थापित होती है |
योगज अभिक्रियाएँ (विशेष परिस्थितियों में)
C₆H₆ + 3Cl₂ →(uv, 500K) बेन्ज़ीनहैक्साक्लोराइड (C₆H₆Cl₆, गैमेक्सीन)
दहन
सामान्य हाइड्रोकार्बन दहन सूत्र CₓHᵧ + (x + y/4)O₂ → xCO₂ + (y/2)H₂O
5.6 एकल प्रतिस्थापित बेन्ज़ीन में क्रियात्मक समूह का निर्देशात्मक प्रभाव
यदि एकल प्रतिस्थापित बेन्ज़ीन का पुनः प्रतिस्थापन कराया जाए, तो तीनों संभावित द्विप्रतिस्थापित उत्पाद समान मात्रा में नहीं बनते — यह व्यवहार पहले से उपस्थित प्रतिस्थापी की प्रकृति पर निर्भर करता है। इसे प्रतिस्थापियों का निर्देशात्मक प्रभाव कहते हैं।
| वर्ग | उदाहरण समूह | प्रभाव |
|---|---|---|
| ऑर्थो/पैरा (सक्रियकारी) | −NH₂, −OH, −CH₃, −OCH₃ | अनुनाद द्वारा o/p स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं |
| ऑर्थो/पैरा (निष्क्रियकारी) | −Cl, −Br | −I प्रभाव से निष्क्रिय, परंतु अनुनाद के कारण o/p निर्देशी |
| मेटा (निष्क्रियकारी) | −NO₂, −CN, −COOH, −SO₃H | प्रबल −I प्रभाव से निष्क्रिय; m स्थिति पर आक्रमण होता है |
- बेन्ज़ीन को सर्वप्रथम माइकेल फैराडे ने 1825 में प्राप्त किया; केकुले ने 1865 में संरचना दी।
- ऐरोमैटिकता की शर्तें: समतलीयता, पूर्ण विस्थानीकरण, हकल नियम (4n+2)π इलेक्ट्रॉन।
- बेन्ज़ीन में सभी C−C आबंध लंबाई समान (139pm) होती है।
- इलेक्ट्रॉनदाता समूह (जैसे −OH, −NH₂, −CH₃) o/p निर्देशी व सक्रियकारी; इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (जैसे −NO₂, −COOH) मेटा निर्देशी व निष्क्रियकारी।
- ऐरिल हैलाइड अपवाद — निष्क्रियकारी होते हुए भी o/p निर्देशी।
6 कैंसरजन्य गुण तथा विषाक्तता
बेन्ज़ीन तथा बहुकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन, जिनमें दो से अधिक जुड़ी हुई वलय हों, विषाक्त तथा कैंसर जनित (कैंसरजनी) गुण दर्शाते हैं। बहुकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन, कार्बनिक पदार्थों जैसे तंबाकू, कोल तथा पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन से बनते हैं, जो मानव शरीर में प्रवेश कर विभिन्न जैव रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा DNA को अंततः नष्ट कर कैंसर उत्पन्न करते हैं।
★ एक-पंक्ति तथ्य सूची
- हाइड्रोकार्बन केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन के यौगिक हैं — ऊर्जा के मुख्य स्रोत।
- ऐल्केन CₙH₂ₙ₊₂, ऐल्कीन CₙH₂ₙ, ऐल्काइन CₙH₂ₙ₋₂ — तीनों के सामान्य सूत्र।
- वुर्ट्ज़ अभिक्रिया केवल सम कार्बन संख्या वाले ऐल्केन के लिए उपयुक्त है।
- ऐल्केन हैलोजेनीकरण मुक्त-मूलक क्रियाविधि से; हैलोजन सक्रियता क्रम F₂>>>Cl₂>>>Br₂>I₂।
- एथेन का सांतरित संरूपण ग्रस्त से अधिक स्थायी — ऊर्जा-अवरोध केवल 12.5 kJ/mol।
- मार्कोनीकॉफ नियम: योज्य का ऋणात्मक भाग हाइड्रोजन-न्यून कार्बन पर जुड़ता है।
- परॉक्साइड प्रभाव केवल HBr के साथ प्रति-मार्कोनीकॉफ योग देता है।
- लिंडलार अभिकर्मक से समपक्ष, Na/द्रव NH₃ से विपक्ष ऐल्कीन।
- टर्मिनल ऐल्काइनों के हाइड्रोजन अम्लीय होते हैं — Na/NaNH₂ से धातु ऐसीटिलाइड।
- कुशरॉव अभिक्रिया: एथाइन → एथेनैल; अन्य ऐल्काइन → कीटोन।
- एथाइन के 3 अणुओं के चक्रीय बहुलकीकरण से बेन्ज़ीन (873K, लाल तप्त लौह नलिका)।
- बेन्ज़ीन: केकुले संरचना, अनुनाद संकर, C−C बंध लंबाई 139pm (सर्वत्र समान)।
- ऐरोमैटिकता: समतलीयता + पूर्ण विस्थानीकरण + (4n+2)π (हकल नियम)।
- o,p-निर्देशी समूह सामान्यतः सक्रियकारी (हैलोजन अपवाद); m-निर्देशी सदैव निष्क्रियकारी।
- बहुकेंद्रकीय ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन कैंसरजनी व विषाक्त होते हैं।
✎ सूत्र सारांश
| संकल्पना | सूत्र |
|---|---|
| ऐल्केन सामान्य सूत्र | CₙH₂ₙ₊₂ |
| ऐल्कीन सामान्य सूत्र | CₙH₂ₙ |
| ऐल्काइन सामान्य सूत्र | CₙH₂ₙ₋₂ |
| दहन (CₓHᵧ) | CₓHᵧ + (x+y/4)O₂ → xCO₂ + (y/2)H₂O |
| हैलोजेनीकरण (मुक्त-मूलक) | R−H + X₂ → R−X + HX |
| वुर्ट्ज़ अभिक्रिया | 2R−X + 2Na → R−R + 2NaX |
| डीहाइड्रोहैलोजनीकरण | R−CH₂−CH₂−X + KOH(alc) → R−CH=CH₂ + KX + H₂O |
| हाइड्रोबोरेशन-ऑक्सीकरण | ऐल्कीन + B₂H₆ → ऐल्किलबोरेन → ऐल्कोहॉल (anti-Markovnikov) |
| ओज़ोनी अपघटन | C=C → O₃ → ओज़ोनाइड → Zn/H₂O → कार्बोनिल यौगिक |
| हकल नियम | (4n+2)π इलेक्ट्रॉन (n=0,1,2,...) |
| कुशरॉव अभिक्रिया | RC≡CH + H₂O →(Hg²⁺/H⁺) R−CO−CH₃ |
अध्याय अभ्यास — प्रश्न 9.1 से 9.25 तक (विस्तृत हल सहित)
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें। सभी उत्तरों में उपरोक्त 'सूत्र-सूची' व 'तथ्य-सूची' का उपयोग किया गया है।
9.1 मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान ऐथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
9.2 निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए — (क) CH₃CH=C(CH₃)₂ (ख) CH₂=CH-C≡C-CH₃ (ग) ब्यूटा-1,3-डाइईन (घ) 4-फेनिलब्यूट-1-ईन (ङ) 2-मेथिलफ़ीनॉल (च) 5-(2-मेथिलप्रोपिल)डेकेन (छ) 4-एथिलडेका-1,5,8-ट्राइईन
9.3 C₄H₈ और C₅H₈ के सभी संभावित स्थिति समावयवियों के संरचना-सूत्र एवं IUPAC नाम दीजिए।
(i) CH₂=CH−CH₂−CH₃ — ब्यूट-1-ईन
(ii) CH₃−CH=CH−CH₃ — ब्यूट-2-ईन
(iii) CH₂=C(CH₃)−CH₃ — 2-मेथिलप्रोपीन
(i) HC≡C−CH₂−CH₂−CH₃ — पेन्ट-1-आइन
(ii) CH₃−C≡C−CH₂−CH₃ — पेन्ट-2-आइन
(iii) CH₃−CH(CH₃)−C≡CH — 3-मेथिलब्यूट-1-आइन
9.4 पेन्ट-2-ईन, 3,4-डाइमेथिलहेप्ट-3-ईन, 2-एथिलब्यूट-1-ईन, 1-फेनिलब्यूट-1-ईन के ओज़ोनी अपघटन के उत्पाद लिखिए।
9.5 एक ऐल्कीन 'A' के ओज़ोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा ऐथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। A का IUPAC नाम तथा संरचना दीजिए।
9.6 एक ऐल्कीन A में तीन C-C, आठ C-H सिग्मा आबंध तथा एक C-C पाई आबंध है। A का ओज़ोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का IUPAC नाम लिखिए।
9.7 एक ऐल्कीन, जिसके ओज़ोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
9.8 ब्यूटेन, पेन्टीन, हैक्साइन, टॉलूइन के दहन की समीकरण लिखिए।
9.9 हैक्स-2-ईन की सिस व ट्रांस संरचनाएँ बनाइए। किसका क्वथनांक अधिक होता है और क्यों?
9.10 बेन्ज़ीन में तीन द्वि-आबंध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
9.11 किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं?
9.25 वुर्ट्ज़ अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन क्यों नहीं बनाए जा सकते? उदाहरण दीजिए।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
- यह अध्याय NEET में 2–4% भारांक रखता है; अधिकांश प्रश्न क्रियाविधि, संरचना-पहचान (ओज़ोनी अपघटन, अनुनाद) व मार्कोनीकॉफ नियम पर आधारित होते हैं।
- मुक्त मूलक हैलोजनीकरण में C−H बंधों की सापेक्ष सक्रियता: 3° > 2° > 1° > CH₄।
- वुर्ट्ज़ अभिक्रिया सदैव सम कार्बन संख्या वाला ऐल्केन बनाती है (समान हैलाइडों के साथ)।
- मार्कोनीकॉफ नियम: H, अधिक H युक्त कार्बन पर; X, कम H युक्त पर (अधिक स्थायी कार्बधनायन)।
- पेरॉक्साइड प्रभाव केवल HBr के साथ, HCl व HI के साथ नहीं।
- सेत्ज़ेफ नियम: विलोपन में अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन मुख्य उत्पाद होती है।
- कार्बधनायन स्थायित्व: 3° > 2° > 1° > मेथिल।
- ट्रांस ऐल्कीन सिस से अधिक स्थायी (कम त्रिविम प्रतिकर्षण) — हाइड्रोजनीकरण ऊष्मा सिस में अधिक।
- टर्मिनल ऐल्काइन (≡C−H) अम्लीय — Na, NaNH₂ के साथ धात्विक ऐसीटिलाइड बनाता है; इंटरनल ऐल्काइन यह परीक्षण नहीं देते।
- लिंडलार उत्प्रेरक → सिस-ऐल्कीन; Na/द्रव NH₃ → ट्रांस-ऐल्कीन।
- बेन्ज़ीन की अनुनाद ऊर्जा ≈ 36 kcal/mol (≈150.6 kJ/mol)।
- बेन्ज़ीन में सभी C−C बंध लंबाई 139 pm (एकल 154 pm, द्वि 134 pm के मध्य)।
- o,p-निर्देशी समूह (सक्रियकारी): −OH, −NH₂, −CH₃; m-निर्देशी (निष्क्रियकारी): −NO₂, −COOH, −CN। हैलोजन o,p-निर्देशी परंतु निष्क्रियकारी।
- s-लक्षण, अम्लीयता व C−H आबंध लंबाई का क्रम: sp³ (25% s) → sp² (33%) → sp (50%) — अम्लीयता बढ़ती है, आबंध लंबाई घटती है।
- फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया प्रबल निष्क्रियकारी समूह (जैसे −NO₂) युक्त वलयों पर नहीं होती; ऐनिलीन पर भी असफल (AlCl₃ के साथ संकुल बनने के कारण)।
- ओज़ोनी अपघटन से संरचना ज्ञात करने हेतु: अचक्रीय ऐल्कीन में द्वि-आबंधों की संख्या + 1 = कार्बोनिल खंडों की संख्या; चक्रीय में एकल द्वि-कार्बोनिल यौगिक बनता है।
🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न (2014–2026)
इस अध्याय से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।