साम्यावस्था (Equilibrium)
भौतिक प्रक्रमों की साम्यावस्था से लेकर रासायनिक साम्य के नियम, Kc-Kp, ले-शातेलिए सिद्धांत, अम्ल-क्षारक की तीनों अवधारणाएँ, pH स्केल, बफर विलयन और अल्पविलेय लवणों के विलेयता गुणनफल तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आरेख और सभी 73 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल एक ही जगह।
6.1 भौतिक प्रक्रमों में साम्यावस्था
जब किसी बंद पात्र में कोई द्रव वाष्पित होता है, तो प्रारंभ में वाष्पन तीव्र गति से होता है, परंतु जैसे-जैसे वाष्प-अवस्था में अणुओं की संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे कुछ वाष्प-अणु पुनः द्रव-सतह से टकराकर द्रव में संघनित होने लगते हैं। एक निश्चित समय बाद वाष्पन-दर तथा संघनन-दर बराबर हो जाती है — इसी अवस्था को गतिक साम्यावस्था (Dynamic Equilibrium) कहा जाता है। ध्यान रहे कि यह साम्य स्थैतिक (static) नहीं होता — सतह पर अणुओं का आवागमन निरंतर चलता रहता है, केवल दोनों दिशाओं की दर बराबर हो जाने से मिश्रण का संघटन स्थिर दिखाई देता है।
6.1.1 ठोस-द्रव साम्यावस्था
पूर्णतः रोधी (insulated) थर्मस फ्लास्क में रखी बर्फ एवं जल 273K तथा 1 वायुमंडलीय दाब पर साम्यावस्था में रहते हैं। समय के साथ-साथ बर्फ एवं जल के द्रव्यमान अपरिवर्तित रहते हैं, परंतु सूक्ष्म स्तर पर बर्फ से जल में एवं जल से बर्फ में अणुओं का आदान-प्रदान निरंतर होता रहता है — दोनों दिशाओं की दरें बराबर होती हैं। वायुमंडलीय दाब पर किसी शुद्ध पदार्थ के लिए वह ताप जिस पर ठोस व द्रव प्रावस्थाएँ साम्यावस्था में होती हैं, पदार्थ का मानक गलनांक (मानक हिमांक) कहलाता है।
6.1.2 द्रव-वाष्प साम्यावस्था
स्थिर ताप पर जल-अणुओं द्वारा उत्पन्न दाब को साम्य वाष्प-दाब (Equilibrium Vapour Pressure) कहा जाता है। द्रव का वाष्प-दाब ताप बढ़ने के साथ बढ़ता है। जिस द्रव का वाष्प-दाब अपेक्षाकृत अधिक होता है, वह अधिक वाष्पशील होता है तथा उसका क्वथनांक कम होता है (जैसे ईथर, ऐसीटोन)। बंद पात्र में जल एवं जल-वाष्प 1.013 bar दाब तथा 100°C ताप पर साम्य में रहते हैं — इसी ताप को जल का सामान्य क्वथनांक कहते हैं। क्वथनांक वायुमंडलीय दाब पर निर्भर करता है तथा अधिक ऊँचाई (उन्नतांश) पर घट जाता है।
6.1.3 ठोस-वाष्प साम्यावस्था
कुछ ठोस पदार्थ सीधे ऊर्ध्वपातित होकर वाष्प देते हैं — जैसे आयोडीन को बंद पात्र में रखने पर बैंगनी वाष्प बनती है, जिसकी तीव्रता कुछ समय बाद स्थिर हो जाती है, अर्थात् साम्य स्थापित हो जाता है:
6.1.4 द्रव में ठोस अथवा गैस की घुलनशीलता-संबंधी साम्य
द्रवों में ठोस: किसी निश्चित ताप पर दिए गए विलायक में जब और अधिक विलेय न घुल सके, तो ऐसे विलयन को संतृप्त विलयन कहते हैं। इसमें विलेय की ठोस अवस्था तथा विलयन में उपस्थित अणुओं के बीच गतिक साम्य रहता है — घुलने की दर = क्रिस्टलन की दर। रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों की सहायता से इस गतिक प्रकृति को प्रयोगात्मक रूप से सिद्ध किया गया है।
द्रवों में गैस: सोडा-वाटर की बोतल खोलने पर घुली CO₂ तेजी से बाहर निकलती है, क्योंकि दाब घटने पर CO₂ की विलेयता घट जाती है। यह साम्य हेनरी के नियम के अनुसार होता है — किसी ताप पर दिए गए द्रव में घुली गैस की मात्रा द्रव के ऊपर उस गैस के दाब के समानुपाती होती है।
| प्रक्रम | साम्यावस्था | महत्वपूर्ण निष्कर्ष |
|---|---|---|
| द्रव ⇌ वाष्प | H₂O(l) ⇌ H₂O(g) | निश्चित ताप पर वाष्प-दाब स्थिर |
| ठोस ⇌ द्रव | H₂O(s) ⇌ H₂O(l) | स्थिर दाब पर गलनांक निश्चित |
| ठोस(विलेय) ⇌ विलयन | चीनी(s) ⇌ चीनी(विलयन) | संतृप्त विलयन में विलेय-सांद्रता स्थिर |
| गैस(g) ⇌ गैस(aq) | CO₂(g) ⇌ CO₂(aq) | [गैस(aq)]/[गैस(g)] स्थिर (हेनरी नियम) |
6.1.5 भौतिक प्रक्रमों में साम्यावस्था के सामान्य अभिलक्षण
- निश्चित ताप पर केवल बंद निकाय (Closed System) में ही साम्यावस्था संभव है, खुले निकाय में नहीं।
- साम्यावस्था पर दोनों विरोधी प्रक्रियाएँ (जैसे वाष्पन व संघनन) बराबर वेग से होती हैं — यह गतिक होती है, स्थैतिक नहीं।
- साम्यावस्था पर निकाय के सभी मापने-योग्य गुण-धर्म (वाष्प-दाब, सांद्रता आदि) स्थिर रहते हैं।
- हेनरी का नियम: दिए गए ताप पर घुली गैस की मात्रा उसके आंशिक दाब के समानुपाती होती है।
6.2 रासायनिक प्रक्रमों में साम्यावस्था — गतिक साम्य
बंद निकाय में की जाने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ भी अंततः साम्यावस्था तक पहुँच जाती हैं। ये अभिक्रियाएँ अग्रगामी (Forward) एवं प्रतीपगामी (Backward) दोनों दिशाओं में संपन्न हो सकती हैं। जब दोनों दिशाओं की दरें समान हो जाती हैं, तो अभिकारकों तथा उत्पादों की सांद्रताएँ स्थिर रहती हैं — यही रासायनिक साम्य की अवस्था है।
हाबर-विधि द्वारा अमोनिया-संश्लेषण में समस्थानिक ड्यूटीरियम (D₂, H₂ की जगह) के प्रयोग से यह सिद्ध किया गया कि साम्यावस्था स्थापित होने के बाद भी अग्रगामी व प्रतीपगामी अभिक्रियाएँ रुकती नहीं — मिश्रण में H व D परमाणुओं का व्यामिश्रण (Scrambling) होता रहता है, जिससे साम्य की गतिक प्रकृति सिद्ध होती है। साम्यावस्था दोनों दिशाओं से (अभिकारकों से अथवा उत्पादों से प्रारंभ करके) समान रूप से प्राप्त की जा सकती है।
- बंद निकाय में सभी रासायनिक अभिक्रियाएँ अंततः साम्यावस्था तक पहुँचती हैं।
- साम्यावस्था पर अग्र व प्रतीप अभिक्रियाओं की दरें बराबर होती हैं — मिश्रण का संघटन अपरिवर्तित रहता है।
- साम्यावस्था दोनों दिशाओं (शुद्ध अभिकारकों या शुद्ध उत्पादों से प्रारंभ) से प्राप्त की जा सकती है।
- ड्यूटीरियम-प्रयोग से सिद्ध: साम्यावस्था के बाद भी अणु-स्तर पर अभिक्रियाएँ चलती रहती हैं (गतिक प्रकृति)।
6.3 रासायनिक साम्यावस्था का नियम व साम्यावस्था स्थिरांक
1864 में नॉर्वे के रसायनज्ञ कैटो गुल्डबर्ग एवं पीटर वाजे ने द्रव्य-अनुपाती क्रिया के नियम (Law of Mass Action) के आधार पर प्रस्तावित किया कि किसी उत्क्रमणीय अभिक्रिया aA + bB ⇌ cC + dD में साम्यावस्था पर सांद्रताओं का निम्नलिखित अनुपात एक स्थिरांक होता है:
यहाँ प्रत्येक सांद्रता को संतुलित अभिक्रिया में उसके रससमीकरणमितीय गुणांक के घातांक के रूप में व्यक्त किया जाता है। सांद्रताओं को हमेशा साम्यावस्था पर ही लिया जाता है, इसलिए सामान्यतः 'eq' उपसूचक नहीं लिखा जाता। Kc का मात्रक सांद्रण mol L⁻¹ पर निर्भर करता है।
यदि समीकरण को n से गुणा करें (nA+nB⇌nC+nD), तो नया साम्य स्थिरांक Kcn होगा।
प्रतीप (उत्क्रम) अभिक्रिया का साम्य स्थिरांक, अग्र अभिक्रिया के साम्य स्थिरांक के व्युत्क्रम (1/Kc) के बराबर होता है।
| रासायनिक समीकरण | साम्यावस्था स्थिरांक |
|---|---|
| aA + bB ⇌ cC + dD | Kc |
| cC + dD ⇌ aA + bB | K′c = 1/Kc |
| naA + nbB ⇌ ncC + ndD | K‴c = (Kc)ⁿ |
- Kc = [उत्पाद]ⁿ / [अभिकारक]ᵐ — घातांक रससमीकरणमितीय गुणांकों के बराबर।
- निश्चित ताप पर Kc का मान अपरिवर्तित रहता है, चाहे प्रारंभिक सांद्रताएँ भिन्न हों।
- प्रतीप अभिक्रिया का Kc, अग्र अभिक्रिया के Kc का व्युत्क्रम होता है — K′c = 1/Kc।
- समीकरण को n से गुणा करने पर साम्य स्थिरांक Kcⁿ हो जाता है।
- साम्यावस्था स्थिरांक का व्यंजक लिखते समय ठोस एवं शुद्ध द्रव सामान्यतः शामिल नहीं किए जाते (धारा 6.5 देखें)।
6.4 समांग साम्यावस्था — गैसीय निकाय में Kp
जब सभी अभिकारक व उत्पाद एक ही प्रावस्था (जैसे सभी गैस अथवा सभी विलयन) में हों, तो उसे समांग साम्यावस्था कहते हैं — जैसे N₂(g)+3H₂(g)⇌2NH₃(g)। गैसीय अभिक्रियाओं के लिए साम्यावस्था स्थिरांक को आंशिक दाब के पदों में Kp से व्यक्त करना अधिक सुविधाजनक होता है, क्योंकि आदर्श गैस समीकरण pV=nRT से p = [गैस]RT, अर्थात् स्थिर ताप पर दाब सांद्रण के समानुपाती होता है।
यहाँ ∆n = (गैसीय उत्पादों के मोल) − (गैसीय अभिकारकों के मोल)
Kp की गणना करते समय दाब का मान सदैव bar में लिया जाता है (मानक अवस्था 1 bar), तथा R = 0.0831 bar L mol⁻¹K⁻¹ प्रयुक्त होता है। यदि ∆n = 0 हो, तो Kp = Kc।
| अभिक्रिया | ताप (K) | Kp |
|---|---|---|
| N₂(g)+3H₂(g)⇌2NH₃(g) | 298 | 6.8×10⁵ |
| 2SO₂(g)+O₂(g)⇌2SO₃(g) | 298 | 4.0×10²⁴ |
| N₂O₄(g)⇌2NO₂(g) | 298 | 0.98 |
- समांग साम्य में सभी अभिकारक व उत्पाद एक ही प्रावस्था में होते हैं।
- Kp = Kc(RT)^∆n — यह संबंध गैसीय अभिक्रियाओं के लिए Kp व Kc को जोड़ता है।
- ∆n = 0 पर Kp = Kc; ∆n धनात्मक होने पर Kp, Kc(RT) के गुणक में बड़ा होता है।
- Kp में दाब सदैव bar में लिया जाता है; R = 0.0831 bar L mol⁻¹K⁻¹ प्रयुक्त होता है।
6.5 विषमांग साम्यावस्था
जब साम्यावस्था में एक से अधिक प्रावस्थाएँ (जैसे ठोस+गैस, या ठोस+विलयन) उपस्थित हों, तो उसे विषमांग साम्यावस्था कहते हैं — जैसे CaCO₃(s) ⇌ CaO(s) + CO₂(g)। शुद्ध ठोस एवं शुद्ध द्रव का मोलर सांद्रण उनकी मात्रा पर निर्भर नहीं करता (सदैव स्थिर रहता है), इसलिए इन्हें साम्यावस्था स्थिरांक के व्यंजक में सम्मिलित नहीं किया जाता:
इसी प्रकार निकैल-शुद्धिकरण में प्रयुक्त निकैल कार्बोनिल साम्य Ni(s)+4CO(g)⇌Ni(CO)₄(g) के लिए Kc = [Ni(CO)₄] / [CO]⁴ होगा — ठोस निकैल सम्मिलित नहीं होगा।
- विषमांग साम्य में एक से अधिक प्रावस्थाएँ (ठोस, द्रव, गैस, विलयन) साम्य में होती हैं।
- शुद्ध ठोस व शुद्ध द्रव को साम्यावस्था स्थिरांक के व्यंजक में शामिल नहीं किया जाता (मोलर सांद्रण स्थिर होने के कारण)।
- CaCO₃(s)⇌CaO(s)+CO₂(g) के लिए Kp = pCO₂; यह केवल ताप पर निर्भर करता है।
6.6 साम्यावस्था स्थिरांक के अनुप्रयोग
6.6.1 अभिक्रिया की सीमा (Extent) का अनुमान
| Kc का परिसर | निष्कर्ष |
|---|---|
| Kc > 10³ | उत्पाद प्रबल — अभिक्रिया लगभग पूर्णता के निकट |
| 10⁻³ < Kc < 10³ | अभिकारक व उत्पाद दोनों संतोषजनक मात्रा में उपस्थित |
| Kc < 10⁻³ | अभिकारक प्रबल — अभिक्रिया दुर्लभ अवस्था में ही संपन्न |
6.6.2 अभिक्रिया की दिशा का बोध — अभिक्रिया भागफल Q
किसी भी क्षण (साम्यावस्था हो या न हो) पर सांद्रताओं से परिकलित अनुपात को अभिक्रिया भागफल Q कहते हैं। इसकी तुलना Kc से करने पर अभिक्रिया की दिशा ज्ञात होती है:
Qc < Kc ⟹ अभिक्रिया अग्र (दायीं) दिशा में अग्रसर होगी
Qc = Kc ⟹ निकाय पहले से साम्यावस्था में है
6.6.3 साम्य सांद्रताओं की गणना — पाँच सोपान विधि
- अभिक्रिया के लिए संतुलित समीकरण लिखिए।
- प्रारंभिक सांद्रता, परिवर्तन (x के पदों में) तथा साम्य सांद्रता की सारणी (ICE Table) बनाइए।
- साम्य व्यंजक में साम्य सांद्रताएँ रखकर x के लिए हल कीजिए (रासायनिक रूप से सार्थक मूल चुनें)।
- परिकलित x से सभी स्पीशीज़ की साम्य सांद्रता ज्ञात कीजिए।
- मूल समीकरण में प्रतिस्थापित कर परिणाम की जाँच कीजिए।
- Kc > 10³ ⟹ उत्पाद अधिक; Kc < 10⁻³ ⟹ अभिकारक अधिक; बीच में ⟹ दोनों संतुलित।
- अभिक्रिया भागफल Q, K के समान व्यंजक है परंतु किसी भी (साम्य न होने पर भी) क्षण की सांद्रताओं से परिकलित होता है।
- Qc की Kc से तुलना करके अभिक्रिया की वर्तमान दिशा तुरंत ज्ञात की जा सकती है।
- साम्य-सांद्रता ज्ञात करने में ICE (Initial-Change-Equilibrium) सारणी विधि सर्वाधिक उपयोगी है।
6.7 साम्यावस्था स्थिरांक K, अभिक्रिया भागफल Q तथा गिब्ज़ ऊर्जा G में संबंध
Kc का मान अभिक्रिया की गतिकी पर नहीं, बल्कि ऊष्मागतिकी विशेषतः गिब्ज़ ऊर्जा-परिवर्तन पर निर्भर करता है:
साम्यावस्था पर ∆G = 0 तथा Q = K, अतः: ∆G° = −RT lnK अथवा K = e^(−∆G°/RT)
∆G° < 0 ⟹ K > 1 (अभिक्रिया अग्र दिशा में स्वतःप्रवर्तित, उत्पाद अधिक बनते हैं)
∆G° > 0 ⟹ K < 1 (अभिक्रिया अग्र दिशा में अस्वतःप्रवर्तित, उत्पाद न्यूनतम बनते हैं)
∆G° = 0 ⟹ K = 1
- ∆G° = −RT lnK = −2.303 RT log K — यह K व ऊष्मागतिकी को जोड़ने वाला केंद्रीय सूत्र है।
- ∆G ऋणात्मक ⟹ अभिक्रिया स्वतःप्रवर्तित एवं अग्र दिशा में संपन्न होती है।
- ∆G धनात्मक ⟹ अभिक्रिया स्वतःप्रवर्तित नहीं; प्रतीप अभिक्रिया के लिए ∆G ऋणात्मक होगा।
- K का मान अभिक्रिया की दर (गतिकी) से स्वतंत्र है — यह केवल ऊष्मागतिकी राशि है।
6.8 साम्य को प्रभावित करने वाले कारक
औद्योगिक व प्रयोगशाला उद्देश्यों के लिए यह जानना आवश्यक है कि सांद्रता, दाब, ताप अथवा उत्प्रेरक में परिवर्तन साम्यावस्था को किस दिशा में विस्थापित करते हैं। इसका सामान्य नियम ले-शातेलिए का सिद्धांत देता है:
6.8.1 सांद्रण-परिवर्तन का प्रभाव
अभिकारक/उत्पाद मिलाने से सांद्रता पर पड़े दबाव को कम करने के लिए अभिक्रिया उस दिशा की ओर अग्रसर होती है ताकि मिलाए गए पदार्थ का उपभोग हो सके। इसी प्रकार किसी घटक को हटाने पर अभिक्रिया उस दिशा में अग्रसर होती है जिससे हटाए गए पदार्थ की पूर्ति हो सके। औद्योगिक प्रक्रमों में उत्पाद को लगातार अलग करते रहने से अभिक्रिया अग्र दिशा में चलती रहती है (जैसे अमोनिया-निर्माण में NH₃ का द्रवीकरण करके अलग करना)।
6.8.2 दाब-परिवर्तन का प्रभाव
दाब का प्रभाव केवल तभी होता है जब अभिक्रिया में गैसीय अभिकारकों व गैसीय उत्पादों के मोलों की संख्या भिन्न हो (∆n ≠ 0)। आयतन घटाकर दाब बढ़ाने पर साम्य उस दिशा में विस्थापित होता है जिसमें गैसीय मोलों की संख्या कम हो; आयतन बढ़ाकर दाब घटाने पर साम्य उस दिशा में विस्थापित होता है जिसमें गैसीय मोलों की संख्या अधिक हो।
6.8.3 अक्रिय गैस के योग का प्रभाव
स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस (जैसे आर्गन) मिलाने से साम्य अपरिवर्तित रहता है, क्योंकि इससे भाग लेने वाले पदार्थों की मोलर सांद्रता अथवा आंशिक दाब में कोई परिवर्तन नहीं होता।
6.8.4 ताप-परिवर्तन का प्रभाव
ऊष्माशोषी अभिक्रिया (∆H धनात्मक) का साम्य स्थिरांक ताप बढ़ने पर बढ़ता है।
अमोनिया-संश्लेषण (N₂+3H₂⇌2NH₃; ∆H=−92.38 kJ/mol) ऊष्माक्षेपी है — कम ताप अधिक उत्पाद देता है, परंतु व्यावहारिक रूप से अति निम्न ताप पर अभिक्रिया की दर धीमी हो जाती है, इसलिए उत्प्रेरक (लौह) की सहायता से मध्यम ताप (लगभग 500°C) व उच्च दाब (लगभग 200 atm) पर संतुलन बनाया जाता है।
6.8.5 उत्प्रेरक का प्रभाव
उत्प्रेरक अग्र व प्रतीप दोनों अभिक्रियाओं के लिए सक्रियण ऊर्जा को समान मात्रा में घटाकर साम्यावस्था तक पहुँचने की दर को बढ़ा देता है, परंतु साम्यावस्था के संघटन (K के मान) को परिवर्तित नहीं करता। यह केवल साम्यावस्था प्राप्ति में लगने वाला समय घटाता है।
| कारक | Kc/Kp पर प्रभाव | साम्य-स्थिति पर प्रभाव |
|---|---|---|
| सांद्रण बढ़ाना | अपरिवर्तित | विपरीत घटक बनाने की दिशा में विस्थापन |
| दाब बढ़ाना (आयतन घटाना) | अपरिवर्तित | कम गैसीय मोलों की दिशा में विस्थापन |
| अक्रिय गैस (स्थिर आयतन पर) | अपरिवर्तित | कोई प्रभाव नहीं |
| ताप बढ़ाना | ऊष्माशोषी में बढ़ता, ऊष्माक्षेपी में घटता | ऊष्माशोषी दिशा में विस्थापन |
| उत्प्रेरक | अपरिवर्तित | कोई प्रभाव नहीं (केवल दर बढ़ाता है) |
- ले-शातेलिए सिद्धांत: बाधा डालने पर साम्य उस दिशा में विस्थापित होता है जो बाधा को कम/समाप्त करे।
- दाब का प्रभाव केवल ∆n ≠ 0 वाली गैसीय अभिक्रियाओं पर पड़ता है।
- स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस मिलाने से साम्य अप्रभावित रहता है।
- ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में ताप बढ़ाने पर K घटता है; ऊष्माशोषी में K बढ़ता है।
- उत्प्रेरक साम्य-स्थिति व K का मान नहीं बदलता — केवल साम्यावस्था तक पहुँचने की गति बढ़ाता है।
6.9 विलयन में आयनिक साम्यावस्था
जो पदार्थ जलीय विलयन में विद्युत का चालन करते हैं, उन्हें वैद्युत अपघट्य कहा जाता है — अम्ल, क्षारक तथा लवण इसी वर्ग में आते हैं। माइकल फैराडे ने इन्हें प्रबल (जो लगभग पूर्णतः आयनित होते हैं, जैसे NaCl) तथा दुर्बल (जो आंशिक रूप से आयनित होते हैं, जैसे ऐसीटिक अम्ल) वैद्युत अपघट्यों में वर्गीकृत किया। दुर्बल वैद्युत अपघट्यों में अवियोजित अणुओं तथा आयनों के बीच आयनिक साम्य स्थापित होता है, जो अध्ययन का केंद्रीय विषय है।
- प्रबल वैद्युत अपघट्य (जैसे NaCl, HCl, NaOH) जल में लगभग पूर्णतः आयनित हो जाते हैं।
- दुर्बल वैद्युत अपघट्य (जैसे CH₃COOH, NH₄OH) आंशिक रूप से ही आयनित होते हैं, शेष अणु अवियोजित रहते हैं।
- दुर्बल वैद्युत अपघट्यों में आयनों व अवियोजित अणुओं के बीच गतिक साम्य पाया जाता है।
6.10 अम्ल, क्षारक एवं लवण
6.10.1 आरेनियस धारणा
आरेनियस के अनुसार अम्ल वे पदार्थ हैं जो जल में अपघटित होकर हाइड्रोजन आयन H⁺(aq) देते हैं तथा क्षारक वे जो हाइड्रॉक्सिल आयन OH⁻(aq) देते हैं। यह धारणा केवल जलीय विलयनों तक सीमित है तथा उन पदार्थों (जैसे NH₃) के क्षारीय गुणों की व्याख्या नहीं कर पाती जिनमें हाइड्रॉक्सिल समूह नहीं है।
6.10.2 ब्रान्स्टेड-लोरी अम्ल एवं क्षारक
जब कोई ब्रान्स्टेड अम्ल किसी क्षारक को प्रोटॉन देता है, तो वह अपना संयुग्मी क्षारक बनाता है, तथा क्षारक अपना संयुग्मी अम्ल बनाता है। संयुग्मी अम्ल-क्षार युग्म में केवल एक प्रोटॉन का अंतर होता है। यदि अम्ल प्रबल है तो उसका संयुग्मी क्षारक दुर्बल होगा तथा इसके विपरीत भी सत्य है।
6.10.3 लूइस अम्ल एवं क्षारक
जी.एन. लूइस ने 1923 में अम्ल को इलेक्ट्रॉन-युग्मग्राही तथा क्षारक को इलेक्ट्रॉन-युग्मदाता के रूप में परिभाषित किया। इस व्यापक परिभाषा में BF₃, AlCl₃, Co³⁺, Mg²⁺ जैसे इलेक्ट्रॉन-न्यून स्पीशीज़ भी अम्ल की तरह व्यवहार करती हैं, भले ही उनमें प्रोटॉन न हो — जैसे BF₃ + :NH₃ → BF₃:NH₃।
| धारणा | अम्ल की परिभाषा | क्षारक की परिभाषा | सीमाएँ |
|---|---|---|---|
| आरेनियस | जल में H⁺ देने वाला | जल में OH⁻ देने वाला | केवल जलीय विलयन तक सीमित |
| ब्रान्स्टेड-लोरी | प्रोटॉन-दाता | प्रोटॉन-ग्राही | अप्रोटिक अम्लों (जैसे BF₃) की व्याख्या नहीं |
| लूइस | इलेक्ट्रॉन-युग्मग्राही | इलेक्ट्रॉन-युग्मदाता | सबसे व्यापक — प्रोटॉनरहित अम्लों को भी समाहित करती है |
- आरेनियस अम्ल/क्षारक क्रमशः H⁺(aq)/OH⁻(aq) देते हैं — केवल जलीय माध्यम में लागू।
- ब्रान्स्टेड अम्ल = प्रोटॉन-दाता; ब्रान्स्टेड क्षारक = प्रोटॉन-ग्राही।
- संयुग्मी अम्ल-क्षार युग्म में केवल एक प्रोटॉन का अंतर होता है।
- जल उभयधर्मी (amphoteric) है — HCl के साथ क्षारक तथा NH₃ के साथ अम्ल की भाँति व्यवहार करता है।
- लूइस अम्ल = इलेक्ट्रॉन-युग्मग्राही (जैसे BF₃, H⁺); लूइस क्षारक = इलेक्ट्रॉन-युग्मदाता (जैसे NH₃, OH⁻, H₂O)।
6.11 अम्लों एवं क्षारकों का आयनन
6.11.1 जल का आयनन स्थिरांक व आयनिक गुणनफल
शुद्ध जल स्वयं अम्ल व क्षारक दोनों की भाँति व्यवहार करता है (उभयधर्मी): H₂O(l)+H₂O(l) ⇌ H₃O⁺(aq)+OH⁻(aq)। 298K पर [H⁺]=[OH⁻]=1.0×10⁻⁷ M।
6.11.2 pH स्केल
| विलयन | pH | विलयन | pH |
|---|---|---|---|
| सांद्र HCl | ~ −1.0 | दूध | 6.8 |
| जठर-रस | ~1.2 | मानव रुधिर | 7.4 |
| नींबू पानी | ~2.2 | अंडे का सफेद भाग | 7.8 |
| टमाटर का रस | ~4.2 | चूने का पानी | 10.5 |
| काली कॉफी | 5.0 | 0.1M NaOH | 13 |
6.11.3 दुर्बल अम्लों का आयनन स्थिरांक Ka
जहाँ c = प्रारंभिक सांद्रता, α = आयनन की मात्रा (degree of ionization)
α सामान्यतः बहुत छोटा होने पर सन्निकटन (1−α)≈1 लिया जाता है, जिससे [H⁺]≈√(Ka×c)।
6.11.4 दुर्बल क्षारकों का आयनन स्थिरांक Kb
6.11.5 Ka तथा Kb में संबंध
6.11.6 द्वि एवं बहु-क्षारकी अम्ल तथा द्वि एवं बहु-अम्लीय क्षारक
ऑक्सैलिक अम्ल, सल्फ्यूरिक अम्ल जैसे बहु-प्रोटिक अम्लों के प्रति अणु एक से अधिक आयनन-स्थिरांक होते हैं (Ka₁, Ka₂...)। उच्च कोटि के आयनन स्थिरांक सदैव निम्न कोटि से छोटे होते हैं, क्योंकि आवेशित ऋणायन से पुनः धनात्मक प्रोटॉन निकालना स्थिरवैद्युत बलों के कारण अधिक कठिन होता है।
6.11.7 अम्ल-सामर्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक
अम्ल की सामर्थ्य H–A आबंध की सामर्थ्य एवं ध्रुवणता पर निर्भर करती है। समूह में नीचे जाने पर (परमाणु का आकार बढ़ने से) H–A आबंध कमजोर होता है, अतः अम्ल-सामर्थ्य बढ़ती है (HF≪HCl≪HBr≪HI)। किसी आवर्त में A की विद्युत्-ऋणात्मकता बढ़ने पर अम्ल की ध्रुवता व सामर्थ्य बढ़ती है (CH₄<NH₃<H₂O<HF)।
6.11.8 सम आयन प्रभाव (Common Ion Effect)
6.11.9 लवणों का जल-अपघटन एवं इनके विलयन का pH
| लवण का प्रकार | उदाहरण | विलयन प्रकृति |
|---|---|---|
| प्रबल अम्ल + प्रबल क्षारक | NaCl | उदासीन (pH=7) |
| प्रबल अम्ल + दुर्बल क्षारक | NH₄Cl | अम्लीय (pH<7) |
| दुर्बल अम्ल + प्रबल क्षारक | CH₃COONa | क्षारीय (pH>7) |
| दुर्बल अम्ल + दुर्बल क्षारक | CH₃COONH₄ | लगभग उदासीन (pKa, pKb पर निर्भर) |
- Kw = [H⁺][OH⁻] = 1.0×10⁻¹⁴ (298K); pH+pOH=14।
- pH = −log[H⁺]; pH<7 अम्लीय, pH=7 उदासीन, pH>7 क्षारीय।
- दुर्बल अम्ल के लिए [H⁺]≈√(Ka·c); दुर्बल क्षारक के लिए [OH⁻]≈√(Kb·c)।
- Ka × Kb = Kw (संयुग्मी अम्ल-क्षार युग्म के लिए); pKa+pKb=14।
- प्रबल अम्ल का संयुग्मी क्षारक अत्यंत दुर्बल होता है, तथा इसके विपरीत भी सत्य है।
- बहु-प्रोटिक अम्ल के लिए Ka₁ > Ka₂ > Ka₃ (क्रमिक आयनन कठिन होता जाता है)।
- सम आयन प्रभाव: पहले से उपस्थित आयन मिलाने पर दुर्बल वैद्युत अपघट्य का आयनन दब जाता है।
- लवण जल-अपघटन: प्रबल अम्ल-दुर्बल क्षारक लवण अम्लीय; दुर्बल अम्ल-प्रबल क्षारक लवण क्षारीय; प्रबल-प्रबल लवण उदासीन होता है।
6.12 बफर विलयन
वे विलयन, जिनका pH तनु करने अथवा थोड़ी मात्रा में अम्ल या क्षारक मिलाने के बाद भी लगभग अपरिवर्तित रहता है, बफर विलयन कहलाते हैं। इनका उपयोग औषधीय एवं प्रसाधन-संरूपणों में विशेष pH बनाए रखने हेतु किया जाता है।
यदि अम्ल व लवण (या क्षारक व संयुग्मी अम्ल) की मोलर सांद्रता बराबर ली जाए, तो pH = pKa (या pOH=pKb) हो जाता है, क्योंकि log(1)=0। उदाहरण के लिए ऐसीटिक अम्ल व सोडियम ऐसीटेट के बराबर-बराबर मिश्रण से लगभग 4.76 pH का बफर बनता है; अमोनियम क्लोराइड व अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के बराबर मिश्रण से लगभग 9.25 pH का बफर बनता है। बफर विलयन का pH तनुकरण से अप्रभावित रहता है क्योंकि सांद्रताओं का अनुपात (log के भीतर) अपरिवर्तित रहता है।
- बफर विलयन तनुकरण अथवा थोड़ा अम्ल/क्षारक मिलाने पर भी अपना pH बनाए रखता है।
- अम्लीय बफर = दुर्बल अम्ल + उसका लवण (जैसे CH₃COOH+CH₃COONa)।
- क्षारीय बफर = दुर्बल क्षारक + उसका लवण (जैसे NH₄OH+NH₄Cl)।
- हेंडर्सन-हासेलबल्ख समीकरण: pH = pKa + log([लवण]/[अम्ल])।
- बराबर मोलर सांद्रता पर बफर का pH = pKa (अम्लीय) अथवा pOH = pKb (क्षारीय)।
6.13 अल्पविलेय लवणों की विलेयता साम्यावस्था
6.13.1 विलेयता गुणनफल स्थिरांक Ksp
जल में आयनिक ठोसों की विलेयता में बहुत अंतर होता है — कुछ अत्यधिक विलेय (जैसे कैल्सियम क्लोराइड), तो कुछ अत्यंत अल्प विलेय (जैसे लीथियम फ्लुओराइड, सामान्यतः 'अविलेय' कहलाते हैं)। किसी सामान्य अल्पविलेय लवण MxXy(s) ⇌ xMp+(aq)+yXq−(aq) के लिए:
S = (Ksp / xx·yy)1/(x+y)
जहाँ S = लवण की मोलर विलेयता
साम्यावस्था पर Ksp=Qsp, परंतु अन्य परिस्थितियों में यह अवक्षेपण या विलयन (dissolution) की दिशा का संकेत देता है: यदि Qsp>Ksp हो तो अवक्षेप बनेगा; यदि Qsp<Ksp हो तो और लवण घुल सकता है (कोई अवक्षेप नहीं)।
6.13.2 आयनिक लवणों की विलेयता पर सम आयन प्रभाव
ले-शातेलिए सिद्धांत के अनुसार, यदि विलयन में किसी उभयनिष्ठ (सम) आयन की सांद्रता बढ़ाई जाए, तो लवण का कुछ भाग अवक्षेपित हो जाता है ताकि पुनः Ksp=Qsp हो जाए — फलस्वरूप लवण की विलेयता घट जाती है। भारात्मक विश्लेषण में इसी सिद्धांत का उपयोग किसी आयन को उसके अल्पविलेय लवण के रूप में पूर्णतः अवक्षेपित करने हेतु किया जाता है।
- Ksp = [धनायन]ˣ[ऋणायन]ʸ — अल्पविलेय लवण की साम्यावस्था-सांद्रताओं का गुणनफल।
- Qsp > Ksp ⟹ अवक्षेप बनता है; Qsp < Ksp ⟹ अवक्षेप नहीं बनता (लवण घुलता रहेगा)।
- सम आयन प्रभाव अल्पविलेय लवण की विलेयता को घटाता है (शुद्ध जल की तुलना में)।
- दुर्बल अम्ल के लवण की विलेयता pH घटने (H⁺ बढ़ने) पर बढ़ती है, क्योंकि ऋणायन प्रोटॉनीकृत हो जाता है।
📌 संपूर्ण अध्याय — एक-पंक्ति तथ्य सूची
- साम्यावस्था केवल बंद निकाय में स्थापित होती है, यह सदैव गतिक (dynamic) होती है।
- साम्य पर अग्र व प्रतीप प्रक्रिया की दरें बराबर होती हैं, संघटन स्थिर रहता है।
- वाष्प-दाब, गलनांक, विलेयता व हेनरी-स्थिरांक सभी भौतिक साम्य के उदाहरण हैं।
- Kc = [उत्पाद]/[अभिकारक] (रससमीकरणमितीय घातांकों सहित); निश्चित ताप पर स्थिर।
- Kp = Kc(RT)^∆n; ∆n=0 पर Kp=Kc।
- ठोस व शुद्ध द्रव को K के व्यंजक में शामिल नहीं करते (विषमांग साम्य)।
- प्रतीप अभिक्रिया का K, अग्र अभिक्रिया के K का व्युत्क्रम होता है।
- समीकरण को n गुणा करने पर K, Kⁿ हो जाता है।
- Q>K ⟹ प्रतीप दिशा; Q
- ∆G° = −RT lnK = −2.303 RT log K।
- K>10³ उत्पाद-प्रधान; K<10⁻³ अभिकारक-प्रधान; बीच में दोनों संतुलित।
- बाधा डालने पर साम्य उस दिशा में विस्थापित होता है जो बाधा को कम करे।
- दाब बढ़ाने पर कम गैसीय मोलों की दिशा में विस्थापन (केवल ∆n≠0 पर प्रभावी)।
- ताप बढ़ाने पर ऊष्माशोषी दिशा में विस्थापन; ऊष्माक्षेपी में K घटता है।
- उत्प्रेरक व स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस साम्य-स्थिति को प्रभावित नहीं करते।
- आरेनियस: H⁺/OH⁻ दाता; ब्रान्स्टेड: प्रोटॉन दाता/ग्राही; लूइस: इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही/दाता।
- Kw=[H⁺][OH⁻]=10⁻¹⁴ (298K); pH+pOH=14।
- दुर्बल अम्ल: [H⁺]≈√(Ka·c); दुर्बल क्षारक: [OH⁻]≈√(Kb·c)।
- Ka×Kb=Kw (संयुग्मी युग्म); pKa+pKb=14।
- सम आयन प्रभाव दुर्बल वैद्युत अपघट्य का आयनन दबाता है।
- बफर pH = pKa+log([लवण]/[अम्ल]) — तनुकरण से अप्रभावित।
- Ksp=[धनायन]ˣ[ऋणायन]ʸ; Qsp > Ksp पर अवक्षेप बनता है।
- प्रबल अम्ल-दुर्बल क्षारक लवण अम्लीय; दुर्बल अम्ल-प्रबल क्षारक लवण क्षारीय होता है।
📐 सूत्र सारांश तालिका
| राशि | सूत्र |
|---|---|
| साम्यावस्था स्थिरांक | Kc = [C]ᶜ[D]ᵈ/[A]ᵃ[B]ᵇ |
| Kp-Kc संबंध | Kp = Kc(RT)^∆n |
| प्रतीप अभिक्रिया | K′c = 1/Kc |
| n-गुणित समीकरण | K‴c = Kcⁿ |
| दिशा-निर्धारण | Qc vs Kc |
| ऊष्मागतिकी संबंध | ∆G° = −RT lnK = −2.303 RT logK |
| जल का आयनिक गुणनफल | Kw = [H⁺][OH⁻] = 10⁻¹⁴ (298K) |
| pH | pH = −log[H⁺] |
| pOH | pOH = −log[OH⁻] |
| pH-pOH संबंध | pH + pOH = pKw = 14 |
| दुर्बल अम्ल आयनन | Ka = cα²/(1−α) ≈ [H⁺]²/c |
| दुर्बल क्षारक आयनन | Kb = cα²/(1−α) ≈ [OH⁻]²/c |
| संयुग्मी युग्म संबंध | Ka × Kb = Kw; pKa+pKb=14 |
| बफर (अम्लीय) | pH = pKa + log([लवण]/[अम्ल]) |
| बफर (क्षारीय) | pOH = pKb + log([संयुग्मी अम्ल]/[क्षारक]) |
| लवण जल-अपघटन (दुर्बल-दुर्बल) | pH = 7 + ½(pKa − pKb) |
| विलेयता गुणनफल | Ksp = [Mᵖ⁺]ˣ[Xq⁻]ʸ |
| मोलर विलेयता | S = (Ksp/xˣ·yʸ)^(1/(x+y)) |
अध्याय अभ्यास — संपूर्ण हल
सभी 73 प्रश्नों के चरणबद्ध हल। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करके उसका पूर्ण हल देखें।
6.1 एक द्रव को सीलबंद पात्र में निश्चित ताप पर इसके वाष्प के साथ साम्य में रखा जाता है। पात्र का आयतन अचानक बढ़ा दिया जाता है। (क) वाष्प-दाब परिवर्तन का प्रारंभिक परिणाम? (ख) वाष्पन एवं संघनन दर कैसे बदलती हैं? (ग) अंतिम वाष्प दाब क्या होगा?
6.2 2SO₂(g)+O₂(g)⇌2SO₃(g) के लिए Kc क्या होगा, यदि साम्य पर [SO₂]=0.60M, [O₂]=0.82M एवं [SO₃]=1.90M हैं?
6.73 0.1M HCl में हाइड्रोजन सल्फाइड से संतृप्त विलयन में [S²⁻]=1.0×10⁻¹⁹M है। इस विलयन का 10mL निम्न 0.04M विलयन के 5mL में डाला जाए, तो किनसे अवक्षेप प्राप्त होगा? FeSO₄, MnCl₂, ZnCl₂, CdCl₂
★ अन्य NEET संबंधित तथ्य
- यह अध्याय NEET के सर्वाधिक भारित अध्यायों में से एक है (लगभग 6–8% वेटेज, हर वर्ष 2–4 प्रश्न) — मुख्यतः Kp-Kc संबंध, ले-शातेलिए सिद्धांत, pH-pOH गणना, बफर विलयन व Ksp-आधारित विलेयता गणनाओं से।
- ले-शातेलिए सिद्धांत — यदि साम्यावस्था में किसी निकाय पर बाह्य विक्षोभ (सांद्रता, दाब, ताप में परिवर्तन) लगाया जाए, तो निकाय उस विक्षोभ के प्रभाव को न्यूनतम करने की दिशा में विस्थापित होता है।
- उत्प्रेरक (catalyst) साम्य की स्थिति (साम्य स्थिरांक K) को कभी परिवर्तित नहीं करता — यह केवल अग्र व पश्च दोनों अभिक्रियाओं की दर समान रूप से बढ़ाकर साम्य तक पहुँचने में लगने वाला समय घटाता है।
- Kp और Kc का संबंध — Kp = Kc(RT)^Δn, जहाँ Δn = गैसीय उत्पादों के मोल − गैसीय अभिकारकों के मोल; जब Δn = 0 (जैसे H₂+I₂⇌2HI), तब Kp = Kc।
- अभिक्रिया भागफल (Q) व साम्य स्थिरांक (K) की तुलना — यदि Q < K, अभिक्रिया अग्र दिशा में आगे बढ़ेगी; यदि Q > K, पश्च दिशा में; यदि Q = K, निकाय साम्यावस्था में है।
- ΔG° = −RT ln K — ΔG° ऋणात्मक होने पर K > 1 (उत्पाद-प्रधान साम्य), ΔG° धनात्मक होने पर K < 1 (अभिकारक-प्रधान साम्य); ΔG° = 0 पर K = 1।
- स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस मिलाना — आंशिक दाबों में कोई परिवर्तन नहीं होता, अतः साम्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- स्थिर दाब पर अक्रिय गैस मिलाना — आयतन बढ़ जाता है, जिससे साम्य उस दिशा में विस्थापित होता है जिसमें गैसीय मोलों की संख्या अधिक हो।
- दाब बढ़ाने (आयतन घटाने) पर साम्य सदैव गैसीय मोलों की कम संख्या वाली दिशा में विस्थापित होता है।
- Ksp व विलेयता (s) का संबंध सूत्र-प्रकार के अनुसार बदलता है — AB प्रकार (जैसे AgCl) के लिए Ksp = s²; AB₂ प्रकार (जैसे PbI₂, Mg(OH)₂) के लिए Ksp = 4s³; A₂B₃ प्रकार के लिए Ksp = 108s⁵ — सूत्र-प्रकार पहचान कर सही व्यंजक चुनना संख्यात्मक प्रश्नों में सर्वाधिक भूल का स्रोत है।
- उभयनिष्ठ आयन प्रभाव किसी अल्पविलेय लवण की विलेयता घटाता है।
- लवण जल-अपघटन (hydrolysis) की प्रकृति — प्रबल अम्ल+प्रबल क्षारक का लवण उदासीन (जैसे NaCl); प्रबल अम्ल+दुर्बल क्षारक का लवण अम्लीय (जैसे NH₄Cl); दुर्बल अम्ल+प्रबल क्षारक का लवण क्षारकीय (जैसे CH₃COONa); दुर्बल अम्ल+दुर्बल क्षारक का लवण Ka व Kb के सापेक्ष मान पर निर्भर करता है।
- ताप परिवर्तन से K के मान पर वास्तविक प्रभाव — ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया (∆H ऋणात्मक) में ताप बढ़ाने पर साम्य स्थिरांक K का मान घट जाता है; ऊष्माशोषी अभिक्रिया (∆H धनात्मक) में ताप बढ़ाने पर K का मान बढ़ जाता है — सांद्रता/दाब परिवर्तन केवल साम्य-स्थिति विस्थापित करते हैं, K का मान अपरिवर्तित रहता है।
- pH पैमाना सदैव 0–14 तक सीमित नहीं है — अत्यंत सांद्र प्रबल अम्ल (जैसे 10 M HCl) का pH ऋणात्मक हो सकता है, तथा अत्यंत सांद्र प्रबल क्षारक का pH 14 से अधिक हो सकता है।
- संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म (conjugate acid-base pair) की सामर्थ्य का व्युत्क्रम संबंध — किसी अम्ल की सामर्थ्य जितनी अधिक होगी, उसका संयुग्मी क्षारक उतना ही दुर्बल होगा, तथा इसके विपरीत भी सत्य है — Ka × Kb (संयुग्मी युग्म के लिए) = Kw (25°C पर 10⁻¹⁴)।
NEET विगत वर्ष प्रश्न
AIPMT 2000 से NEET 2026 तक — साम्यावस्था अध्याय (रासायनिक साम्य व आयनिक साम्य दोनों) से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।