रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना
कॉसेल-लुइस सिद्धांत व अष्टक नियम से लेकर आयनिक व सहसंयोजी आबंध, वी.एस.ई.पी.आर. सिद्धांत, संयोजकता आबंध सिद्धांत, संकरण (sp, sp², sp³, sp³d, sp³d²), आण्विक कक्षक सिद्धांत और हाइड्रोजन आबंधन तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, चित्र, त्वरित तथ्य और सभी 40 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही जगह।
4.1 रासायनिक आबंधन की कॉसेल-लुइस अवधारणा
सन् 1916 में कॉसेल तथा लुइस स्वतंत्र रूप से संयोजकता की तर्कसंगत व्याख्या देने में सफल हुए, जो उत्कृष्ट गैसों की अक्रियता पर आधारित थी। लुइस ने परमाणुओं को एक धन आवेशित अष्टि (आंतरिक इलेक्ट्रॉन + नाभिक) तथा बाह्य कोश (अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन) के रूप में निरूपित किया।
लुइस प्रतीक (Lewis Symbol)
किसी अणु के बनने में परमाणुओं के केवल बाह्य कोश इलेक्ट्रॉन (संयोजकता इलेक्ट्रॉन) रासायनिक संयोजन में भाग लेते हैं। प्रतीक के चारों ओर बिंदुओं की संख्या संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या दर्शाती है।
4.1.1 अष्टक नियम (Octet Rule)
परमाणुओं का संयोजन संयोजक इलेक्ट्रॉनों के एक परमाणु से दूसरे पर स्थानांतरण (आयनिक) अथवा संयोजक इलेक्ट्रॉनों के सहभाजन (सहसंयोजी) द्वारा होता है। इस प्रक्रिया में परमाणु अपने संयोजकता कोश में अष्टक (8 इलेक्ट्रॉन) प्राप्त करते हैं — इसे अष्टक नियम कहते हैं।
4.1.2–3 सहसंयोजी आबंध व लुइस बिंदु संरचनाएँ
सन् 1919 में लैंग्म्यूर ने स्थिर घनीय अष्टक की अवधारणा त्यागकर सहसंयोजक आबंध (Covalent Bond) का प्रयोग किया — दो परमाणुओं के बीच एक इलेक्ट्रॉन युग्म के सहभाजन से आबंध बनता है।
लुइस संरचना लिखने के नियम
- प्रत्येक आबंध का निर्माण परमाणुओं के मध्य एक इलेक्ट्रॉन युग्म के सहभाजन से होता है।
- संयुक्त होने वाला प्रत्येक परमाणु सहभाजित युग्म में एक-एक इलेक्ट्रॉन का योगदान देता है।
- सहभाजन के फलस्वरूप संयुक्त होने वाले परमाणु अपने बाह्य कोश में उत्कृष्ट गैस विन्यास प्राप्त कर लेते हैं।
एक इलेक्ट्रॉन युग्म से बंधे दो परमाणु एकल सहसंयोजी आबंध कहलाते हैं। दो इलेक्ट्रॉन युग्मों के सहभाजन से द्वि-आबंध (जैसे CO₂ में) तथा तीन इलेक्ट्रॉन युग्मों के सहभाजन से त्रि-आबंध (जैसे N₂, C₂H₂ में) बनता है।
लुइस संरचना लिखने के पद (Steps)
- कुल इलेक्ट्रॉनों की संख्या = संयुक्त परमाणुओं के संयोजकता-इलेक्ट्रॉनों का योग (ऋणायन के लिए प्रति ऋणावेश 1 e⁻ जोड़ें, धनायन के लिए प्रति धनावेश 1 e⁻ घटाएँ)
- अणु/आयन की आधारभूत (कंकाल) संरचना लिखें (न्यूनतम विद्युत्-ऋणात्मकता वाला परमाणु केंद्रीय होता है; H व F सामान्यतः अंतस्थ)
- पहले एकल आबंध बनाएँ, फिर बाह्य परमाणुओं का अष्टक पूर्ण करें, शेष इलेक्ट्रॉन केंद्रीय परमाणु पर एकाकी युग्म या बहु-आबंधन के लिए प्रयोग करें
| अणु/आयन | लुइस संरचना निरूपण |
|---|---|
| H₂ | H : H अथवा H–H |
| O₂ | Ö::Ö अथवा O=O |
| N₂ | :N⋮⋮N: अथवा N≡N |
| CO | :C⋮⋮O: अथवा C≡O |
| NF₃ | केंद्रीय N, तीन N–F एकल आबंध, N पर एकाकी युग्म |
| CO₃²⁻ | केंद्रीय C, एक C=O तथा दो C–O⁻ (अनुनाद) |
4.1.4–5 फॉर्मल आवेश तथा अष्टक नियम की सीमाएँ
फॉर्मल आवेश अणु में वास्तविक आवेश पृथकन प्रकट नहीं करते, परंतु किसी स्पीशीज़ की कई संभव लुइस संरचनाओं में से न्यूनतम ऊर्जा (न्यूनतम फॉर्मल आवेश) वाली संरचना चुनने में सहायक हैं।
अष्टक नियम की सीमाएँ (तीन प्रमुख अपवाद)
- केंद्रीय परमाणु का अपूर्ण अष्टक: LiCl, BeH₂, BCl₃ (Li, Be, B के संयोजकता e⁻ क्रमशः 1, 2, 3 — 4 से कम)।
- विषम इलेक्ट्रॉन (Odd-Electron) अणु: NO, NO₂ — कुल इलेक्ट्रॉन संख्या विषम होने से अष्टक पूर्ण नहीं होता।
- प्रसारित (Expanded) अष्टक: तीसरे व आगे के आवर्तों में 3d कक्षक उपलब्ध — PF₅, SF₆, H₂SO₄ में केंद्रीय परमाणु के चारों ओर 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन।
- अष्टक नियम उत्कृष्ट गैसों की अक्रियता पर आधारित है, परंतु Xe, Kr भी XeF₂, KrF₂ जैसे यौगिक बनाते हैं।
- यह नियम अणु की आकृति व सापेक्ष स्थायित्व (ऊर्जा) के बारे में कुछ संकेत नहीं देता।
4.2 आयनिक या वैद्युत् संयोजी आबंध
आयनिक आबंध का विरचन इस पर निर्भर करता है: (i) उदासीन परमाणु से धनायन/ऋणायन बनने की सरलता तथा (ii) आयनों के ठोस में जालक (Lattice) निर्मित होने की विधि।
आयनिक आबंध निम्न आयनन एन्थैल्पी तथा अपेक्षाकृत निम्न (अधिक ऋणात्मक) इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी वाले तत्वों के बीच अधिक सरलता से बनते हैं।
4.2.1 जालक एन्थैल्पी (Lattice Enthalpy)
किसी आयनिक यौगिक के स्थायित्व का गुणात्मक मान उसके विरचन जालक एन्थैल्पी पर निर्भर करता है, न कि गैसीय अवस्था में केवल अष्टक प्राप्ति पर।
4.3 आबंध प्राचल (Bond Parameters)
4.3.1 आबंध लंबाई
आबंधित परमाणुओं के नाभिकों के बीच साम्यावस्था दूरी। सहसंयोजी त्रिज्या एक ही अणु में आबंधित दो समरूप परमाणुओं के बीच दूरी का आधा भाग है।
4.3.2 आबंध-कोण
केंद्रीय परमाणु के आसपास उपस्थित आबंधन इलेक्ट्रॉन युग्म को धारण करने वाले ऑर्बिटलों के बीच बनने वाला कोण। जल में H–O–H आबंध कोण = 104.5°
4.3.3 आबंध एन्थैल्पी
गैसीय स्थिति में दो परमाणुओं के बीच विशिष्ट आबंधों के एक मोल को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा। बहुआबंधन (O₂: 498, N₂: 946 kJ mol⁻¹) पर यह अधिक होती है।
4.3.4 आबंध कोटि (Bond Order)
लुइस व्याख्या के अनुसार किसी अणु में दो परमाणुओं के मध्य आबंधों की संख्या। H₂=1, O₂=2, N₂=3, CO=3। आबंध-कोटि बढ़ने पर आबंध एन्थैल्पी बढ़ती है, जबकि आबंध लंबाई घटती है।
4.3.5 अनुनाद संरचनाएँ
- वास्तव में विहित संरचनाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता।
- अणु कुछ समय एक विहित संरचना में और कुछ समय दूसरी में नहीं रहता — यह सदैव अनुनाद संकर रूप में ही रहता है।
- विहित संरचनाओं में कीटो-इनॉल जैसा चलावयवी साम्य नहीं होता।
4.3.6 आबंध-ध्रुवणता
सौ प्रतिशत आयनिक या सहसंयोजी आबंध एक आदर्श स्थिति है; वास्तव में हर आबंध आंशिक रूप से दोनों प्रकृति का मिश्रण होता है। समान परमाणुओं (H₂, O₂) के बीच आबंध अध्रुवीय; भिन्न विद्युत्-ऋणात्मकता वाले परमाणुओं (HF) के बीच आबंध ध्रुवीय होता है।
| अणु | द्विध्रुव आघूर्ण (D) | आकृति |
|---|---|---|
| H₂O | 1.85 | मुड़ी हुई |
| CO₂ | 0 | रैखिक |
| NH₃ | 1.47 | त्रिकोणीय पिरामिड |
| NF₃ | 0.23 | त्रिकोणीय पिरामिड |
| BF₃ | 0 | त्रिकोणीय समतल |
| CH₄, CCl₄ | 0 | चतुष्फलकीय |
फाजान्स के नियम (आंशिक सहसंयोजी लक्षण): धनायन के आकार में कमी, ऋणायन के आकार में वृद्धि, तथा आवेश की मात्रा बढ़ने से आयनिक आबंध का सहसंयोजी लक्षण बढ़ता है।
4.4 संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण (VSEPR) सिद्धांत
सिजविक व पॉवेल (1940) द्वारा प्रस्तावित तथा नाइहोम व गिलेस्पी (1957) द्वारा विकसित। मूल धारणा: अणु की आकृति केंद्रीय परमाणु के आसपास उपस्थित संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्मों (संयोजित अथवा असंयोजित) की संख्या पर निर्भर करती है — ये युग्म एक-दूसरे को प्रतिकर्षित कर त्रिविम में अधिकतम दूरी पर स्थित होने का प्रयत्न करते हैं।
| इलेक्ट्रॉन युग्म | आण्विक ज्यामिति | उदाहरण |
|---|---|---|
| 2 | रैखिक | BeCl₂ |
| 3 | त्रिकोणीय समतल | BF₃ |
| 4 | चतुष्फलकीय | CH₄ |
| 5 | त्रिकोणीय द्विपिरामिडी | PCl₅ |
| 6 | अष्टफलकीय | SF₆ |
| प्रकार | एकाकी युग्म | आकृति (धारित) | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| AB₂E | 1 (त्रिकोणीय समतल आधार) | मुड़ी हुई (119.5°) | SO₂, O₃ |
| AB₃E | 1 (चतुष्फलकीय आधार) | त्रिकोणीय पिरामिड (107°) | NH₃ |
| AB₂E₂ | 2 (चतुष्फलकीय आधार) | मुड़ी हुई (104.5°) | H₂O |
| AB₄E | 1 (त्रिकोणीय द्विपिरामिडी) | ढेंकुली | SF₄ |
| AB₃E₂ | 2 (त्रिकोणीय द्विपिरामिडी) | T-आकृति | ClF₃ |
| AB₄E₂ | 2 (अष्टफलकीय) | वर्ग समतली | XeF₄ |
4.5 संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)
हाइटलर तथा लंडन (1927) द्वारा प्रस्तुत, बाद में पॉलिंग ने विकसित किया। यह क्वांटम यांत्रिकी पर आधारित है और परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन (Overlap) के सिद्धांत से आबंध बनने की व्याख्या करता है।
H₂ अणु का विरचन
दो H परमाणु दूर होने पर कोई अन्योन्य क्रिया नहीं। पास आने पर आकर्षण बल (नाभिक-इलेक्ट्रॉन) तथा प्रतिकर्षण बल (इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन, नाभिक-नाभिक) दोनों बढ़ते हैं। नए आकर्षण बल नए प्रतिकर्षण बलों से अधिक होते हैं — ऊर्जा न्यूनतम होने पर आबंध बनता है (आबंध लंबाई 74 pm, आबंध एन्थैल्पी 435.8 kJ mol⁻¹)।
कक्षक अतिव्यापन व आबंधों के दिशात्मक गुण
CH₄, NH₃, H₂O जैसे बहुपरमाणुक अणुओं की आकृति भी अतिव्यापन द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया, परंतु केवल शुद्ध ('अनसंकरित') कक्षकों के अतिव्यापन से CH₄ की वास्तविक चतुष्फलकीय आकृति (109.5°) स्पष्ट नहीं होती — इसीलिए संकरण की आवश्यकता पड़ती है (अगला खंड देखें)।
4.6 संकरण (Hybridization)
पॉलिंग के अनुसार परमाणु कक्षक संयोजित होकर समतुल्य ऊर्जा व आकार वाले नए 'संकर कक्षक' बनाते हैं। संकरण के लिए आवश्यक: संयोजकता कोश के कक्षक संकरित हों, कक्षकों की ऊर्जा लगभग समान हो; इलेक्ट्रॉन उत्तेजन आवश्यक नहीं।
| संकरण | ज्यामिति | कोण | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| sp | रैखिक | 180° | BeCl₂ |
| sp² | त्रिकोणीय समतल | 120° | BCl₃ |
| sp³ | चतुष्फलकीय | 109.5° | CH₄ |
| sp³d | त्रिकोणीय द्विपिरामिडी | 90°,120° | PCl₅ |
| sp³d² | अष्टफलकीय | 90° | SF₆ |
NH₃ व H₂O में संकरण
NH₃ में N का sp³ संकरण — तीन sp³ कक्षकों में अयुग्मित e⁻ (N–H आबंध), चौथे में एकाकी युग्म। एकाकी युग्म-आबंधी युग्म प्रतिकर्षण अधिक होने से आबंध कोण 109.5° से घटकर 107° हो जाता है (त्रिकोणीय पिरामिड)। H₂O में O का sp³ संकरण, दो एकाकी युग्म — दो एकाकी युग्मों की उपस्थिति के कारण आबंध कोण घटकर 104.5° रह जाता है (मुड़ी हुई/V-आकृति)।
C₂H₄, C₂H₂ में बहु-आबंध
एथीन (C₂H₄): प्रत्येक C sp² संकरित — C–C सिग्मा आबंध (sp²–sp² अतिव्यापन) + अनसंकरित 2p कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन से एक पाई (π) आबंध = द्वि-आबंध। एथाइन (C₂H₂): प्रत्येक C sp संकरित — C–C सिग्मा + दो पाई आबंध = त्रि-आबंध।
d-कक्षकों वाले तत्वों में संकरण — PCl₅ (sp³d) व SF₆ (sp³d²)
PCl₅: P का sp³d संकरण, त्रिकोणीय द्विपिरामिडी आकृति — तीन विषुवतीय आबंध (120°) व दो अक्षीय आबंध (90° कोण, विषुवतीय से कुछ लंबे व दुर्बल, अधिक प्रतिकर्षण के कारण)। SF₆: S का sp³d² संकरण, अष्टफलकीय आकृति, सभी छह S–F आबंध समान (90°)।
- केंद्रीय परमाणु पर संकरित कक्षकों की संख्या = (सिग्मा आबंधों की संख्या + एकाकी युग्मों की संख्या)
- यह संख्या 2 होने पर sp, 3 पर sp², 4 पर sp³, 5 पर sp³d तथा 6 पर sp³d² संकरण होता है।
4.7 आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT)
एफ. हुंड तथा आर.एस. मुलिकन द्वारा सन् 1932 में विकसित। इलेक्ट्रॉन विभिन्न बहुकेंद्रीय आण्विक कक्षकों में उपस्थित रहते हैं (परमाणु कक्षक की तरह नहीं, जो एकल-केंद्रीय होते हैं)।
4.7.1 LCAO विधि — परमाणु कक्षकों का रैखिक संयोग
4.7.2 परमाणु कक्षकों के संयोग की शर्तें
- संयोग करने वाले कक्षकों की ऊर्जा समान या लगभग समान होनी चाहिए
- आण्विक अक्ष के परितः समान सममिति होनी चाहिए
- अधिकतम अतिव्यापन होना चाहिए (जितना अधिक अतिव्यापन, उतना प्रबल आबंध)
4.7.3–4.7.5 प्रकार, ऊर्जा-क्रम व इलेक्ट्रॉन विन्यास
द्वितीय आवर्त के समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं (O₂, F₂, Ne₂) के लिए ऊर्जा-क्रम: σ1s < σ*1s < σ2s < σ*2s < σ2pz < (π2px=π2py) < (π*2px=π*2py) < σ*2pz। शेष अणुओं (Li₂ से N₂) में σ2pz तथा π2p की स्थिति परस्पर बदल जाती है (2s-2p मिश्रण के कारण)।
4.8 समनाभिकीय द्विपरमाणुक अणुओं में आबंधन
| अणु | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (संक्षेप) | आबंध कोटि | चुंबकीय गुण |
|---|---|---|---|
| H₂ | (σ1s)² | 1 | प्रतिचुंबकीय |
| He₂ | (σ1s)²(σ*1s)² | 0 — अस्तित्व नहीं | — |
| Li₂ | KK(σ2s)² | 1 | प्रतिचुंबकीय |
| C₂ | KK(σ2s)²(σ*2s)²(π2px²=π2py²) | 2 | प्रतिचुंबकीय |
| N₂ | KK(σ2s)²(σ*2s)²(π2p⁴)(σ2pz²) | 3 | प्रतिचुंबकीय |
| O₂ | KK(σ2s)²(σ*2s)²(σ2pz²)(π2p⁴)(π*2p1,1) | 2 | अनुचुंबकीय (2 अयुग्मित e⁻) |
| F₂ | ...(π*2p⁴) | 1 | प्रतिचुंबकीय |
4.9 हाइड्रोजन आबंधन
जब हाइड्रोजन परमाणु किसी प्रबल विद्युत्-ऋणात्मक तत्व (N, O, F) से सहसंयोजी आबंध द्वारा जुड़ा होता है, तो सहभाजित इलेक्ट्रॉन युग्म उस तत्व की ओर स्थानांतरित हो जाता है — हाइड्रोजन आंशिक धनावेश (δ+) तथा दूसरा परमाणु आंशिक ऋणावेश (δ−) प्राप्त करता है। यह आंशिक धनावेशित H किसी दूसरे विद्युत्-ऋणात्मक परमाणु से नया (दुर्बल) आबंध बनाता है — इसे हाइड्रोजन आबंध कहते हैं।
प्रकार
- अंतर-अणुक हाइड्रोजन आबंध: समान/भिन्न यौगिकों के दो अलग-अलग अणुओं के बीच — उदाहरण: HF, एल्कोहॉल या जल के अणुओं के बीच।
- अंतरा-अणुक हाइड्रोजन आबंध: एक ही अणु में उपस्थित H व अधिक विद्युत्-ऋणात्मक परमाणु (F,O,N) के बीच — उदाहरण: o-नाइट्रोफिनॉल।
हाइड्रोजन आबंध सहसंयोजी आबंध से दुर्बल परंतु वाण्डरवाल्स बलों से प्रबल होता है। इसका परिमाण यौगिक की भौतिक अवस्था पर निर्भर करता है — ठोस में अधिकतम, गैस में न्यूनतम। यह यौगिकों की संरचना व गुणधर्मों (क्वथनांक, विलेयता आदि) को प्रबलता से प्रभावित करता है।
★ संपूर्ण अध्याय की एक-पंक्ति तथ्य सूची
- कॉसेल तथा लुइस (1916) — रासायनिक आबंधन का इलेक्ट्रॉनिकी सिद्धांत; परमाणु स्थानांतरण या सहभाजन द्वारा अष्टक प्राप्त करते हैं।
- लुइस प्रतीक में बिंदुओं की संख्या = तत्व के संयोजकता इलेक्ट्रॉन; क्रोड इलेक्ट्रॉन संयोजन में भाग नहीं लेते।
- लैंग्म्यूर (1919) — सहसंयोजक आबंध (Covalent Bond) शब्द का प्रयोग; इलेक्ट्रॉन युग्म सहभाजन से आबंध।
- अष्टक नियम की सीमाएँ: अपूर्ण अष्टक (LiCl,BeH₂,BCl₃), विषम इलेक्ट्रॉन अणु (NO,NO₂), प्रसारित अष्टक (PF₅,SF₆,H₂SO₄)।
- फॉर्मल आवेश = संयोजकता e⁻ − अनाबंधी e⁻ − ½(आबंधी e⁻); न्यूनतम फॉर्मल आवेश वाली संरचना अधिक स्थायी।
- आयनिक आबंध: निम्न आयनन एन्थैल्पी + उच्च (ऋणात्मक) इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी वाले तत्वों के बीच सुगमता से बनता है।
- आयनन सदैव ऊष्माशोषी; इलेक्ट्रॉन लब्धि ऊष्माशोषी या ऊष्माक्षेपी हो सकती है।
- जालक एन्थैल्पी = 1 मोल आयनिक ठोस को गैसीय आयनों में अनंत दूरी तक पृथक करने हेतु ऊर्जा; NaCl = 788 kJ mol⁻¹।
- यौगिक का स्थायित्व जालक एन्थैल्पी पर निर्भर करता है, न कि केवल गैसीय अवस्था में अष्टक प्राप्ति पर।
- आबंध लंबाई R = rA + rB (सहसंयोजी त्रिज्याओं का योग); आबंध कोण = केंद्रीय परमाणु पर आबंधन कक्षकों के बीच कोण।
- आबंध एन्थैल्पी: H₂=435.8, O₂=498, N₂=946 kJ mol⁻¹ — बहुआबंधन में अधिक।
- आबंध कोटि बढ़ने पर आबंध एन्थैल्पी बढ़ती है, आबंध लंबाई घटती है (व्युत्क्रमानुपाती संबंध)।
- अनुनाद संकर की ऊर्जा किसी भी विहित संरचना से कम होती है — अणु को स्थायित्व देता है; O₃,CO₃²⁻,CO₂ अनुनाद के उदाहरण।
- द्विध्रुव आघूर्ण μ = आवेश × दूरी; इकाई डिबाए (D), 1D=3.33564×10⁻³⁰ Cm; CO₂,BF₃,CH₄,CCl₄ का μ=0 (सममित आकृति)।
- सिजविक-पॉवेल (1940), नाइहोम-गिलेस्पी (1957) द्वारा संशोधित; प्रतिकर्षण क्रम: lp-lp > lp-bp > bp-bp।
- 2 युग्म = रैखिक; 3 = त्रिकोणीय समतल; 4 = चतुष्फलकीय; 5 = त्रिकोणीय द्विपिरामिडी; 6 = अष्टफलकीय।
- एकाकी युग्म की उपस्थिति आकृति को विकृत करती है — NH₃ (107°, पिरामिडी), H₂O (104.5°, मुड़ी हुई)।
- हाइटलर-लंडन (1927), पॉलिंग द्वारा विकसित; H₂ में आबंध लंबाई 74pm, आबंध एन्थैल्पी 435.8 kJ/mol।
- sp (रैखिक,180°,BeCl₂); sp² (त्रिकोणीय समतल,120°,BCl₃); sp³ (चतुष्फलकीय,109.5°,CH₄); sp³d (त्रिकोणीय द्विपिरामिडी,PCl₅); sp³d² (अष्टफलकीय,SF₆)।
- PCl₅ में अक्षीय आबंध विषुवतीय से लंबे व दुर्बल (अधिक lp-bp जैसा प्रतिकर्षण अक्षीय स्थिति में)।
- C₂H₄ में एक सिग्मा+एक पाई (द्वि-आबंध, sp²); C₂H₂ में एक सिग्मा+दो पाई (त्रि-आबंध, sp)।
- हुंड-मुलिकन (1932); आबंधन कक्षक (कम ऊर्जा) व प्रतिआबंधन कक्षक (अधिक ऊर्जा) LCAO विधि से बनते हैं।
- संयोग की शर्तें: समान/लगभग समान ऊर्जा, समान सममिति, अधिकतम अतिव्यापन।
- आबंध कोटि = ½(Nb−Na); Nb>Na ⇒ स्थायी अणु; He₂,Be₂ का आबंध कोटि 0 ⇒ अस्तित्व नहीं।
- O₂ का MOT विन्यास π*2p में 2 अयुग्मित e⁻ दर्शाता है ⇒ अनुचुंबकीय — यह MOT की एक प्रमुख सफलता है।
- N, O, F से जुड़े H में बनता है; सहसंयोजी से दुर्बल परंतु वाण्डरवाल्स बलों से प्रबल।
- अंतर-अणुक (दो अलग अणुओं के बीच) व अंतरा-अणुक (एक ही अणु में) — दो प्रकार।
- ठोस अवस्था में सर्वाधिक, गैसीय अवस्था में न्यूनतम प्रभाव।
✎ सूत्र-सूची
| विषय | सूत्र |
|---|---|
| फॉर्मल आवेश | = संयोजकता e⁻ − अनाबंधी e⁻ − ½(आबंधी e⁻) |
| आबंध लंबाई | R = rA + rB |
| आबंध कोटि (लुइस) | = अणु में आबंधों की संख्या (एकल=1, द्वि=2, त्रि=3) |
| आबंध कोटि (MOT) | = ½ (Nb − Na) |
| द्विध्रुव आघूर्ण | μ = Q × r ; 1D = 3.33564×10⁻³⁰ C m |
| जालक एन्थैल्पी | MX(s) → M⁺(g) + X⁻(g); ऊर्जा आवश्यक |
| VSEPR प्रतिकर्षण क्रम | lp-lp > lp-bp > bp-bp |
| sp संकरण | 1s+1p; रैखिक, 180° |
| sp² संकरण | 1s+2p; त्रिकोणीय समतल, 120° |
| sp³ संकरण | 1s+3p; चतुष्फलकीय, 109.5° |
| sp³d संकरण | 1s+3p+1d; त्रिकोणीय द्विपिरामिडी |
| sp³d² संकरण | 1s+3p+2d; अष्टफलकीय |
| N₂ ऊर्जा क्रम (Li₂–N₂) | σ1s<σ*1s<σ2s<σ*2s<π2p(x=y)<σ2pz<π*2p(x=y)<σ*2pz |
| O₂,F₂,Ne₂ ऊर्जा क्रम | σ1s<σ*1s<σ2s<σ*2s<σ2pz<π2p(x=y)<π*2p(x=y)<σ*2pz |
अध्याय अभ्यास — प्रश्न 4.1 से 4.40 तक (विस्तृत हल सहित)
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें। सभी उत्तरों में उपरोक्त 'सूत्र-सूची' व 'तथ्य सूची' का उपयोग किया गया है।
4.1 रासायनिक आबंध के बनने की व्याख्या कीजिए।
4.2 निम्नलिखित तत्वों के परमाणुओं के लुइस बिंदु प्रतीक लिखिए — Mg, Na, B, O, N, Br.
4.3 निम्नलिखित परमाणुओं तथा आयनों के लुइस बिंदु प्रतीक लिखिए — S और S²⁻, Al तथा Al³⁺, H और H⁻
4.4 निम्नलिखित अणुओं तथा आयनों की लुइस संरचनाएँ लिखिए — H₂S, SiCl₄, BeF₂, CO₃²⁻, HCOOH
4.40 'आबंध कोटि' से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में आबंध-कोटि का परिकलन कीजिए — N₂, O₂, O₂⁺ तथा O₂⁻
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
- यह अध्याय NEET में 2–4 प्रश्न (8–16 अंक) रखता है — सबसे अधिक बार आण्विक कक्षक सिद्धांत, VSEPR-आकृतियाँ व द्विध्रुव आघूर्ण पर आधारित होते हैं।
- अष्टक नियम के तीन प्रकार के अपवाद — (i) अपूर्ण अष्टक: BeCl₂, BF₃, AlCl₃, (ii) विस्तारित अष्टक: PCl₅, SF₆, IF₇, (iii) विषम इलेक्ट्रॉन स्पीशीज़: NO, NO₂, ClO₂.
- फॉर्मल आवेश = (मुक्त परमाणु के संयोजी इलेक्ट्रॉन) − (अबंधित इलेक्ट्रॉन) − ½(बंधित इलेक्ट्रॉन).
- फेजान का नियम (Fajan's rules) — आयनिक यौगिक में सहसंयोजी लक्षण तब बढ़ता है जब धनायन छोटा हो, ऋणायन बड़ा हो, आवेश अधिक हो, अथवा धनायन में छद्म-उत्कृष्ट गैस विन्यास हो।
- जालक एन्थैल्पी आयनों के आवेश के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा अंतर-आयनिक दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है (कूलॉम के नियम पर आधारित).
- आबंध लंबाई व आबंध कोटि का संबंध — समान परमाणुओं के मध्य आबंध कोटि बढ़ने पर आबंध लंबाई घटती है व आबंध एन्थैल्पी बढ़ती है।
- अनुनाद (resonance) अणु को उसकी सर्वाधिक स्थायी विहित संरचना से भी अधिक स्थायित्व प्रदान करता है; वास्तविक अणु एक संकर संरचना (resonance hybrid) होता है.
- संकरण पहचानने की त्वरित विधि — केंद्रीय परमाणु पर संकरित कक्षकों की संख्या = (सिग्मा आबंधों की संख्या + एकाकी युग्मों की संख्या).
- बंध कोण संकरण के अनुसार आदर्श रूप से — sp में 180°, sp² में 120°, sp³ में 109.5°; एकाकी युग्मों की उपस्थिति में कोण कम हो जाता है.
- आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT) की सफलता — O₂ की अनुचुंबकीय प्रकृति को MOT ही सफलतापूर्वक स्पष्ट करता है (लुइस संरचना व VBT विफल रहते हैं).
- आण्विक कक्षकों के ऊर्जा-क्रम का उलटफेर — 14 या उससे कम कुल इलेक्ट्रॉन वाली स्पीशीज़ (N₂, C₂, B₂) में π2p, σ2p से नीचे (कम ऊर्जा पर) होते हैं; 14 से अधिक इलेक्ट्रॉन वाली स्पीशीज़ (O₂, F₂) में σ2p, π2p से नीचे होता है.
- हाइड्रोजन आबंध की प्रबलता का क्रम — F−H···F > O−H···O > N−H···N (विद्युत्ऋणात्मकता व आकार पर निर्भर).
- सममित अणुओं का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य — BeCl₂, BF₃, CH₄, CCl₄, SF₆, XeF₄, CO₂ — यह सबसे अधिक बार दोहराया जाने वाला ट्रैप है.
🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न — रासायनिक आबंधन (2014–2026)
2014 से 2026 (रीएग्ज़ाम व रद्द पेपर सहित) तक इस अध्याय से NEET में पूछे गए प्रश्न, हल सहित। इस अध्याय से हर वर्ष 2–4 प्रश्न (8–16 अंक) आते हैं — मुख्यतः MOT-आबंध कोटि, VSEPR-आकृति, द्विध्रुव आघूर्ण व संकरण से।