तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता — सम्पूर्ण अध्याय नोट्स (अध्याय 3)
रसायन विज्ञान • कक्षा-11 • अध्याय 3

तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

डॉबेराइनर के त्रिक से लेकर मेंडलीव की आवर्त सारणी, मोज़ले का आधुनिक आवर्त नियम, s-p-d-f ब्लॉक तत्व और परमाणु त्रिज्या, आयनन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी व विद्युत् ऋणात्मकता की आवर्ती प्रवृत्तियाँ — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, चित्र, त्वरित तथ्य और सभी 40 अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही जगह।

Z ∝ गुणधर्म — आधुनिक आवर्त नियम
7 आवर्त · 18 वर्ग — दीर्घ आवर्त सारणी
s,p,d,f — इलेक्ट्रॉनिक ब्लॉक
★ NEET फोकस तथ्य

3.1 तत्त्वों का वर्गीकरण क्यों आवश्यक है?

तत्त्व सभी प्रकार के पदार्थों की मूल इकाई हैं। सन् 1800 में केवल 31 तत्त्व ज्ञात थे; सन् 1865 तक 63 तत्त्वों की जानकारी हो गई थी; आजकल हमें 114 से अधिक तत्त्वों के बारे में पता है, जिनमें से हाल में खोजे गए तत्त्व मानव-निर्मित हैं। इतने सारे तत्त्वों और उनके असंख्य यौगिकों के रसायन का अध्ययन अलग-अलग कर पाना कठिन है — इस कठिनाई को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने तत्त्वों का वर्गीकरण करके अध्ययन को संगठित और आसान बनाया।

त्वरित तथ्य
  • 1800 में 31 तत्त्व ज्ञात थे; 1865 तक 63 तत्त्व; आज 114+ तत्त्व ज्ञात हैं (118 तक खोज पूर्ण)।
  • वर्गीकरण से रासायनिक तथ्यों का अध्ययन तर्कसंगत बनता है और भविष्य में खोजे जाने वाले तत्त्वों के अध्ययन में भी मदद मिलती है।

3.2 आवर्त सारणी की उत्पत्ति

डॉबेराइनर के त्रिक (1829)

जर्मन रसायनज्ञ जॉन डॉबेराइनर ने समान भौतिक व रासायनिक गुणों वाले तीन तत्त्वों के समूहों (त्रिकों) की ओर ध्यान आकर्षित कराया। प्रत्येक त्रिक में बीच वाले तत्त्व का परमाणु-भार शेष दोनों तत्त्वों के परमाणु-भार के औसत मान के लगभग बराबर था।

तत्त्वपरमाणु-भारतत्त्वपरमाणु-भारतत्त्वपरमाणु-भार
Li7Ca40Cl35.5
Na23Sr88Br80
K39Ba137I127

यह नियम केवल कुछ ही तत्त्वों के लिए सही पाया गया, अतः इसे महज संयोग समझकर छोड़ दिया गया। इसके बाद फ्रांसीसी भूगर्भशास्त्री ए.ई.बी. डी चैनकोर्टोइस ने 1862 में तत्त्वों की वृत्ताकार सारणी बनाई, जो भी अधिक ध्यान आकृष्ट नहीं कर सकी।

न्यूलैंड का अष्टक नियम (1865)

अंग्रेज़ रसायनज्ञ जॉन एलेक्ज़ेंडर न्यूलैंड ने तत्त्वों को बढ़ते हुए परमाणु-भार के क्रम में व्यवस्थित किया और पाया कि किसी भी तत्त्व से प्रारंभ करने पर आठवें तत्त्व के गुण प्रथम तत्त्व के समान थे — यह संबंध आठवें सांगीतिक स्वर (eighth musical note) के प्रथम स्वर से संबंध जैसा था।

तत्त्वLiBeBCNOF
परमाणु-भार791112141619
तत्त्वNaMgAlSiPSCl
परमाणु-भार23242729313235.5

न्यूलैंड का अष्टक नियम केवल कैल्शियम (Ca) तक के तत्त्वों के लिए सही प्रतीत हुआ। बाद में रॉयल सोसाइटी (लंदन) ने 1887 में न्यूलैंड को डेवी पदक देकर सम्मानित किया।

मेंडलीव व लोथर मेयर (1869)

रूसी रसायनज्ञ दमित्री मेंडलीव (1834–1907) तथा जर्मन रसायनज्ञ लोथर मेयर (1830–1895) ने स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए 1869 में प्रस्तावित किया कि तत्त्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु-भारों के क्रम में व्यवस्थित करने पर नियमित अंतराल के पश्चात् उनके भौतिक तथा रासायनिक गुणों में समानता पाई जाती है। लोथर मेयर ने भौतिक गुणों (परमाण्वीय आयतन, गलनांक, क्वथनांक) व परमाणु-भार के मध्य वक्र आलेखित किया, जबकि मेंडलीव ने यौगिकों के मूलानुपाती सूत्रों तथा गुणधर्मों की समानता को आधार माना — जो लोथर मेयर के वर्गीकरण से अधिक विस्तृत था। आधुनिक आवर्त सारणी के विकास का श्रेय दमित्री मेंडलीव को दिया गया है।

मेंडलीव
मेंडलीव ने आवर्त नियम पहली बार प्रकाशित किया: "तत्त्वों के गुणधर्म उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं।" उन्होंने समान रासायनिक गुण दर्शाने वाले तत्त्वों को उचित स्थान देने के लिए परमाणु-भार क्रम की उपेक्षा की — उदाहरणार्थ आयोडीन (परमाणु भार टेल्यूरियम से कम) को समूह VII में F, Cl, Br के साथ रखा। उन्होंने न खोजे गए तत्त्वों के लिए रिक्त स्थान भी छोड़े — एल्युमिनियम व सिलिकॉन के नीचे 'एका-एल्युमीनियम' व 'एका-सिलिकॉन' — जो बाद में क्रमशः गैलियम व जर्मेनियम के रूप में खोजे गए।
गुणएका-ऐल्युमिनियम (भविष्यसूचक)गैलियम (खोजा गया)एका-सिलिकॉन (भविष्यसूचक)जर्मेनियम (खोजा गया)
परमाणु-भार68707272.6
घनत्व (g/cm³)5.95.945.55.36
गलनांक/Kनिम्न302.93उच्च1231
ऑक्साइड का सूत्रE₂O₃Ga₂O₃EO₂GeO₂
क्लोराइड का सूत्रECl₃GaCl₃ECl₄GeCl₄
त्वरित तथ्य
  • डॉबेराइनर का त्रिक नियम (1829): त्रिक के मध्य तत्त्व का परमाणु-भार अन्य दो के औसत के बराबर।
  • न्यूलैंड का अष्टक नियम (1865): हर आठवें तत्त्व के गुण पहले तत्त्व जैसे — केवल Ca तक सही।
  • मेंडलीव व लोथर मेयर (1869): परमाणु-भार बढ़ते क्रम में नियमित अंतराल पर गुणों की समानता।
  • मेंडलीव आवर्त नियम: "तत्त्वों के गुणधर्म उनके परमाणु-भारों के आवर्ती फलन होते हैं।"
  • मेंडलीव ने एका-एल्युमिनियम व एका-सिलिकॉन (बाद में गैलियम व जर्मेनियम) की सफल भविष्यवाणी की।

3.3 आधुनिक आवर्त-नियम तथा आवर्त सारणी का वर्तमान स्वरूप

1913 में अंग्रेज़ भौतिकी वैज्ञानिक हेनरी मोज़ले ने तत्त्वों के अभिलाक्षणिक X-किरण स्पेक्ट्रमों में नियमितता पाई — √ν (जहाँ ν, X-किरण की आवृत्ति है) और परमाणु-क्रमांक (Z) के मध्य वक्र आलेखित करने पर सरल रेखा प्राप्त होती है, जबकि परमाणु द्रव्यमान तथा √ν के आलेख में सरल रेखा प्राप्त नहीं होती। अतः मोज़ले ने दर्शाया कि परमाणु-द्रव्यमान की तुलना में किसी तत्त्व का परमाणु-क्रमांक उस तत्त्व के गुणों को दर्शाने में अधिक सक्षम है।

आधुनिक आवर्त नियम "तत्त्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु-क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं।"

आधुनिक आवर्त सारणी में तत्त्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु-क्रमांक के क्रम में सात क्षैतिज पंक्तियों (आवर्त) और 18 ऊर्ध्वाधर स्तंभों (वर्ग/परिवार) में व्यवस्थित किया गया है। इसे आवर्त सारणी का दीर्घ स्वरूप (Long Form) कहते हैं। IUPAC के अनुमोदन अनुसार वर्गों को पुरानी पद्धति (IA...VIIA, VIII, IB...VIIB) के स्थान पर 1 से 18 तक की संख्याओं में अंकित किया गया है।

आवर्त सारणी का दीर्घ स्वरूप — s, p, d, f ब्लॉक s-ब्लॉक d-ब्लॉक (वर्ग 3–12) p-ब्लॉक f-ब्लॉक (लैंथेनॉयड व एक्टिनॉयड) — मुख्य सारणी के नीचे अलग दर्शाया जाता है f-ब्लॉक (14+14 तत्त्व) आवर्त 1 → 7 (क्षैतिज)
चित्र 3.1 — आवर्त सारणी के चार ब्लॉक (s, p, d, f) का सरल प्रारूप — इलेक्ट्रॉन किस उपकोश में भर रहे हैं, उसके आधार पर वर्गीकरण।

आधुनिक आवर्त नियम के द्वारा प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले 94 तत्त्वों में उल्लेखनीय समानताएँ मिलीं। नेप्ट्यूनियम व प्लूटोनियम भी यूरेनियम के अयस्क पिच ब्लैंड में पाए गए, जिससे अकार्बनिक रसायन शास्त्र में प्रोत्साहन मिला और कृत्रिम अल्पायु वाले तत्त्वों की खोज हुई।

आवर्त-सारणी में कुल सात आवर्त हैं। आवर्त-संख्या आवर्त में तत्त्व की अधिकतम मुख्य क्वांटम संख्या (n) को दर्शाती है। प्रथम आवर्त में 2 तत्त्व उपस्थित हैं; इसके बाद के आवर्तों में क्रमशः 8, 8, 18, 18 और 32 तत्त्व हैं। सातवाँ आवर्त अपूर्ण आवर्त है, जिसमें सैद्धांतिक रूप से अधिकतम 32 तत्त्व होने चाहिए।

त्वरित तथ्य
  • हेनरी मोज़ले (1913) ने X-किरण स्पेक्ट्रम अध्ययन से सिद्ध किया कि परमाणु-क्रमांक (Z), परमाणु-द्रव्यमान की तुलना में तत्त्व-गुणों का बेहतर सूचक है।
  • आधुनिक आवर्त नियम: तत्त्वों के भौतिक-रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु-क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं।
  • आवर्त सारणी के दीर्घ स्वरूप में 7 आवर्त तथा 18 वर्ग हैं।
  • आवर्त 1,2,3,4,5,6,7 में क्रमशः 2, 8, 8, 18, 18, 32, (अपूर्ण, अधिकतम 32) तत्त्व होते हैं।
  • आवर्त-संख्या = तत्त्व की अधिकतम मुख्य क्वांटम संख्या (n)।

3.4 100 से अधिक परमाणु-क्रमांक वाले तत्त्वों का नामकरण

उच्च परमाणु-क्रमांक वाले नए तत्त्व अत्यंत अस्थिर होते हैं और उनकी केवल सूक्ष्म मात्रा प्राप्त होती है, जिससे उनकी खोज के दावों में विवाद हो जाता है (उदाहरण: 104 परमाणु-क्रमांक के तत्त्व पर अमेरिकी व रूसी वैज्ञानिकों का विवाद)। इस कठिनाई को दूर करने के लिए IUPAC ने सुझाव दिया कि जब तक तत्त्व की खोज सिद्ध व नाम का समर्थन नहीं हो जाता, तब तक शून्य एवं 1 से 9 तक अंकों के लिए संख्यात्मक मूल (numerical root) का प्रयोग करते हुए, परमाणु-क्रमांक के आधार पर सीधे अस्थायी नाम दिया जाए।

अंकमूलसंक्षिप्त रूप
0niln
1unu
2bib
3trit
4quadq
5pentp
6hexh
7septs
8octo
9enne

मूलों को अंकों के क्रम में एक साथ रखा जाता है और अंत में 'इअम' (ium) जोड़ दिया जाता है। बाद में IUPAC प्रतिनिधि के मतदान से तत्त्व को स्थायी नाम व प्रतीक (अक्सर खोज-स्थान या प्रसिद्ध वैज्ञानिक के सम्मान में) दिया जाता है। परमाणु-क्रमांक 118 तक तत्त्वों की खोज हो चुकी है और सभी के अधिकृत IUPAC नामों की घोषणा हो चुकी है।

उदाहरण 3.1

120 परमाणु-क्रमांक वाले तत्त्व का IUPAC नाम तथा प्रतीक क्या होगा?

अंक 1, 2, 0 के लिए मूल क्रमशः un, bi, nil हैं। अतः नाम = Unbinilium, प्रतीक = Ubn।

उत्तर: Unbinilium (Ubn)
त्वरित तथ्य
  • 100 से अधिक परमाणु-क्रमांक वाले तत्त्वों को पहले अस्थायी नाम (संख्यात्मक मूल + ium) व तीन अक्षर का प्रतीक दिया जाता है, बाद में स्थायी नाम IUPAC मतदान से मिलता है।
  • Z=101→Mendelevium(Md), 103→Lawrencium(Lr), 104→Rutherfordium(Rf), 106→Seaborgium(Sg), 118→Oganesson(Og)।
  • सीबर्गियम (Sg, 106) का नाम ग्लेन टी सीबर्ग के सम्मान में रखा गया — यह पहला तत्त्व था जिसका नाम किसी जीवित वैज्ञानिक के नाम पर रखा गया।

3.5 तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा आवर्त-सारणी

(क) आवर्त में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

आवर्त, मुख्य ऊर्जा या बाह्य कोश के लिए n का मान बताता है। प्रत्येक उत्तरोत्तर आवर्त की पूर्ति अगले उच्च मुख्य ऊर्जा स्तर (n=1,2...) से संबंधित होती है। प्रत्येक आवर्त में तत्त्वों की संख्या, भरे जाने वाले ऊर्जा-स्तर में उपलब्ध परमाणु-कक्षकों की संख्या से दुगुनी होती है।

आवर्त (n)भरे जाने वाले कक्षकतत्त्वों की संख्याप्रारंभ – अंत तत्त्व
11s2H – He
22s, 2p8Li – Ne
33s, 3p8Na – Ar
44s, 3d, 4p18K – Kr
55s, 4d, 5p18Rb – Xe
66s, 4f, 5d, 6p32Cs – Rn
77s, 5f, 6d, 7p32 (अपूर्ण)Fr – 118वाँ तत्त्व

चौथे आवर्त में 4p कक्षक के भरने से पूर्व ही 3d कक्षक का भरना शुरू हो जाता है (ऊर्जात्मक रूप से अनुकूल) — इससे 3d संक्रमण-श्रेणी प्राप्त होती है (स्केन्डियम Z=21 से जिंक Z=30 तक)। छठे आवर्त में 4f कक्षकों का भरना सीरियम (Z=58) से शुरू होकर ल्यूटीशियम (Z=71) पर समाप्त होता है — इसे लैंथेनॉयड श्रेणी कहते हैं। ऐक्टिनियम (Z=89) के पश्चात् 5f कक्षक भरने से ऐक्टिनॉयड श्रेणी प्राप्त होती है। 4f तथा 5f आंतरिक संक्रमण-श्रेणियों को आवर्त सारणी के मुख्य भाग से बाहर नीचे अलग रखा गया है, ताकि संरचना अक्षुण्ण रह सके।

उदाहरण 3.2

आवर्त सारणी के पाँचवें आवर्त में 18 तत्त्वों के होने की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?

n=5 पर उपलब्ध कक्षकों 5s, 4d, 5p की ऊर्जाओं के बढ़ने का क्रम: 5s < 4d < 5p — कुल मिलाकर 9 कक्षक उपलब्ध हैं (1+5+3=9)। इनमें अधिकतम 18 इलेक्ट्रॉन भरे जा सकते हैं, इसीलिए आवर्त 5 में 18 तत्त्व होते हैं।

(ख) वर्गवार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

एक ही वर्ग या ऊर्ध्वाधर स्तंभ में उपस्थित तत्त्वों के संयोजकता कोश (Valence Shell) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते हैं। उदाहरणार्थ वर्ग 1 (क्षार धातुओं) का संयोजकता कोश विन्यास ns¹ होता है। यह स्पष्ट करता है कि किसी तत्त्व के गुणधर्म उसके परमाणु-क्रमांक पर निर्भर करते हैं, न कि उसके सापेक्षिक परमाणु-द्रव्यमान पर।

परमाणु-संख्याप्रतीकइलेक्ट्रॉनिक विन्यास
3Li1s²2s¹ अथवा [He]2s¹
11Na[Ne]3s¹
19K[Ar]4s¹
37Rb[Kr]5s¹
55Cs[Xe]6s¹
87Fr[Rn]7s¹
त्वरित तथ्य
  • आवर्त-संख्या = तत्त्व की अधिकतम मुख्य क्वांटम संख्या (n)।
  • आवर्त 1–7 में क्रमशः 2, 8, 8, 18, 18, 32, 32(अपूर्ण) तत्त्व होते हैं।
  • एक वर्ग के सभी तत्त्वों का संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है — इसी कारण समान रासायनिक गुण दर्शाते हैं।
  • 4f श्रेणी (लैंथेनॉयड): Ce(58)–Lu(71); 5f श्रेणी (ऐक्टिनॉयड): Th(90)–Lr(103)।

3.6 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और तत्त्वों के प्रकार (s, p, d, f ब्लॉक)

आवर्त वर्गीकरण का सैद्धांतिक मूलाधार 'ऑफबाऊ का सिद्धांत' (Aufbau Principle) तथा परमाणुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है। किस प्रकार के कक्षक इलेक्ट्रॉनों द्वारा भरे जा रहे हैं, इसके आधार पर तत्त्वों को चार ब्लॉकों — s, p, d, f — में विभाजित किया जा सकता है।

s-ब्लॉक वर्ग 1, 2 ns¹⁻² d-ब्लॉक (संक्रमण तत्त्व) वर्ग 3–12 (n-1)d¹⁻¹⁰ns⁰⁻² p-ब्लॉक वर्ग 13–18 ns²np¹⁻⁶ f-ब्लॉक — (n-2)f¹⁻¹⁴(n-1)d⁰⁻¹ns² (नीचे अलग)
चित्र 3.2 — विभिन्न कक्षकों के भरने के आधार पर आवर्त सारणी में तत्त्वों के प्रकार (s, p, d, f ब्लॉक)।

दो अपवाद: (1) हीलियम — इसे s-ब्लॉक में संबद्ध होना चाहिए (He=1s²), परंतु इसका स्थान वर्ग 18 के तत्त्वों के साथ p-ब्लॉक में है क्योंकि इसका संयोजी कोश पूरा भरा हुआ है, जिससे यह उत्कृष्ट गैसों के अभिलक्षण प्रदर्शित करता है। (2) हाइड्रोजन — केवल एक s-इलेक्ट्रॉन (H=1s¹) होने से इसे वर्ग 1 में रखा जा सकता है, परंतु यह एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर उत्कृष्ट गैस विन्यास भी प्राप्त कर सकता है (हैलोजन जैसा व्यवहार) — अतः इसे आवर्त सारणी में सबसे ऊपर अलग स्थान दिया गया है।

3.6.1 s-ब्लॉक के तत्त्व

वर्ग 1 (क्षारीय धातुएँ, विन्यास ns¹) तथा वर्ग 2 (क्षारीय मृदा धातुएँ, विन्यास ns²)। ये सभी क्रियाशील धातुएँ हैं, आयनन एन्थैल्पी के मान कम, वर्ग में नीचे जाने पर धात्विक लक्षण व अभिक्रियाशीलता बढ़ती है। लीथियम व बेरीलियम को छोड़कर s-ब्लॉक तत्त्वों के यौगिक मुख्यतः आयनिक होते हैं।

3.6.2 p-ब्लॉक के तत्त्व

वर्ग 13 से वर्ग 18 तक — विन्यास ns²np¹ से ns²np⁶ तक। p-ब्लॉक व s-ब्लॉक तत्त्वों को संयुक्त रूप से निरूपक तत्त्व (Representative Elements) या मुख्य वर्ग के तत्त्व कहा जाता है। प्रत्येक आवर्त ns²np⁶ (उत्कृष्ट गैस विन्यास) पर समाप्त होता है। उत्कृष्ट गैसों से पहले दो महत्त्वपूर्ण अधातु वर्ग हैं — वर्ग 17 के हैलोजन तथा वर्ग 16 के चाल्कोजेन — इनकी उच्च ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी होती है।

3.6.3 d-ब्लॉक के तत्त्व (संक्रमण तत्त्व)

वर्ग 3 से वर्ग 12 तक — सामान्य विन्यास (n-1)d¹⁻¹⁰ns⁰⁻²। ये सभी धातुएँ हैं, इनके आयन प्रायः रंगीन होते हैं तथा परिवर्ती संयोजकता एवं अनुचुंबकीयता प्रदर्शित करते हैं, और उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त होते हैं। d-ब्लॉक तत्त्व रासायनिक तौर पर अतिक्रियाशील s-ब्लॉक तथा कम क्रियाशील वर्ग 13-14 के तत्त्वों के बीच सेतु का कार्य करते हैं, इसीलिए इन्हें 'संक्रमण तत्त्व' भी कहते हैं।

3.6.4 f-ब्लॉक के तत्त्व (आंतरिक संक्रमण तत्त्व)

लैंथेनॉयड (₅₈Ce – ₇₁Lu) तथा ऐक्टिनॉयड (₉₀Th – ₁₀₃Lr) — सामान्य विन्यास [(n-2)f¹⁻¹⁴(n-1)d⁰⁻¹ns²]। ये सभी धातुएँ हैं। ऐक्टिनॉयड श्रेणी के तत्त्व रेडियोधर्मी (Radioactive) होते हैं; यूरेनियम के बाद वाले तत्त्व 'परायूरेनियम तत्त्व' कहलाते हैं।

उदाहरण 3.3

परमाणु क्रमांक 117 एवं 120 वाले तत्त्वों की खोज अब तक नहीं हो पाई है। बताएँ कि इन तत्त्वों का स्थान आवर्त सारणी के किस परिवार/वर्ग में होना चाहिए तथा प्रत्येक का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्या होगा?

परमाणु क्रमांक 117 वाले तत्त्व का स्थान हैलोजन परिवार (वर्ग 17) में At के नीचे होगा; इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]5f¹⁴6d¹⁰7s²7p⁵। परमाणु क्रमांक 120 वाले तत्त्व का स्थान वर्ग 2 (क्षारीय मृदा धातुएँ) में Ra के नीचे होगा; इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Uuo]8s²।

3.6.5 धातु, अधातु और उप-धातु

तत्त्वों को s-, p-, d- तथा f-ब्लॉकों में वर्गीकरण के अलावा उनके गुणों के आधार पर मोटे तौर पर धातुओं तथा अधातुओं में विभाजित किया जा सकता है। ज्ञात तत्त्वों में 78 प्रतिशत से अधिक संख्या धातुओं की है, जो आवर्त सारणी की बाईं ओर स्थित हैं। धातुएँ कमरे के ताप पर सामान्यतः ठोस होती हैं (मर्करी अपवाद है)। धातुओं के गलनांक-क्वथनांक उच्च, ये ताप-विद्युत् के सुचालक, आघातवर्ध्य तथा तन्य होती हैं।

दूसरी ओर अधातुएँ आवर्त सारणी के दाईं ओर स्थित हैं, कक्ष-ताप पर ठोस/द्रव/गैस हो सकती हैं, इनके गलनांक-क्वथनांक कम, ताप-विद्युत् की अल्प चालक तथा भंगुर (brittle) होती हैं।

धातुओं से अधातुओं में परिवर्तन असंलग्न (abrupt) नहीं, बल्कि टेढ़ी-मेढ़ी रेखा (Zig-Zag Line) के रूप में होता है। इस विकर्ण रेखा के सीमावर्ती स्थित तत्त्व — जर्मेनियम, सिलिकॉन, आर्सेनिक, एंटिमनी तथा टेल्युरियम — धातुओं व अधातुओं दोनों के अभिलक्षण दर्शाते हैं, इन्हें उप-धातु (Metalloid) कहते हैं।

उदाहरण 3.4

परमाणु क्रमांक और आवर्त सारणी में स्थिति को ध्यान में रखते हुए Si, Be, Mg, Na एवं P को उनके बढ़ते हुए धात्विक लक्षण के क्रम में व्यवस्थित कीजिए।

वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धात्विक गुण बढ़ता है; आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर घटता है। अतः बढ़ता क्रम: P < Si < Be < Mg < Na

त्वरित तथ्य
  • s-ब्लॉक: वर्ग 1-2, विन्यास ns¹⁻²; क्रियाशील धातुएँ।
  • p-ब्लॉक: वर्ग 13-18, विन्यास ns²np¹⁻⁶; इसमें धातु, अधातु व उपधातु सभी।
  • d-ब्लॉक (संक्रमण तत्त्व): वर्ग 3-12, विन्यास (n-1)d¹⁻¹⁰ns⁰⁻²; रंगीन आयन, परिवर्ती संयोजकता, उत्प्रेरक गुण।
  • f-ब्लॉक (आंतरिक संक्रमण तत्त्व): लैंथेनॉयड व ऐक्टिनॉयड; विन्यास (n-2)f¹⁻¹⁴(n-1)d⁰⁻¹ns²।
  • He अपवाद: s-विन्यास होते हुए भी p-ब्लॉक (वर्ग 18) में रखा जाता है। H भी विशेष स्थिति में सबसे ऊपर अलग रखा जाता है।
  • 78% से अधिक ज्ञात तत्त्व धातुएँ हैं; उपधातु (Metalloid): Si, Ge, As, Sb, Te — धातु-अधातु सीमा रेखा पर स्थित।
  • वर्ग में नीचे जाने पर धात्विक गुण ↑; आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर धात्विक गुण ↓।

3.7.1 भौतिक गुणधर्मों की प्रवृत्ति

(क) परमाणु त्रिज्या

परमाणु के आकार का सही-सही निर्धारण जटिल है, क्योंकि परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉन अभ्र (electron cloud) की कोई स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं है। संयुक्त अवस्था में परमाणुओं के बीच की दूरी के आधार पर परमाणु-आकार का आकलन किया जाता है:

  • सहसंयोजक त्रिज्या (Covalent Radius): एकल आबंध से जुड़े दो अधातु परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी (बंध दूरी) का आधा भाग। उदा. Cl₂ के लिए बंध दूरी 198 pm ⇒ त्रिज्या = 99 pm।
  • धात्विक त्रिज्या (Metallic Radius): धात्विक क्रिस्टल में स्थित धातु कोरों की अंतरा-नाभिकीय दूरी का आधा भाग। उदा. Cu में 256 pm ⇒ त्रिज्या = 128 pm।
परमाणु (आवर्त II)LiBeBCNOF
परमाणु त्रिज्या (pm)1521118877746664
परमाणु (आवर्त III)NaMgAlSiPSCl
परमाणु त्रिज्या (pm)18616014311711010499

आवर्त में प्रवृत्ति: बाईं से दाईं ओर बढ़ने पर परमाणु-त्रिज्या घटती है (नाभिकीय आवेश बढ़ने से संयोजी इलेक्ट्रॉनों का आकर्षण बढ़ता है)। वर्ग में प्रवृत्ति: नीचे की ओर बढ़ने पर मुख्य क्वांटम संख्या (n) बढ़ने व आवरण-प्रभाव के कारण परमाणु-त्रिज्या बढ़ती है। (उत्कृष्ट गैसों की तुलना में वाण्डरवाल्स त्रिज्या का प्रयोग होता है, सहसंयोजक त्रिज्या का नहीं।)

(ख) आयनी त्रिज्या

धनायन अपने जनक परमाणु से छोटा होता है (इलेक्ट्रॉनों की संख्या घटती है, नाभिकीय आवेश वही रहता है)। ऋणायन का आकार जनक परमाणु से अधिक होता है (अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन(नों) से प्रतिकर्षण बढ़ता है, प्रभावी नाभिकीय आवेश घटता है)। उदा. F⁻ त्रिज्या = 136 pm जबकि F परमाणु त्रिज्या केवल 64 pm; Na त्रिज्या 186 pm जबकि Na⁺ त्रिज्या केवल 95 pm।

समइलेक्ट्रॉनी स्पीशीज़ (Isoelectronic species): दो या अधिक स्पीशीज़ जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान हो। उदा. O²⁻, F⁻, Na⁺, Mg²⁺ — सभी में 10 इलेक्ट्रॉन। अधिक धनावेशित धनायन की त्रिज्या कम होगी (नाभिक-इलेक्ट्रॉन आकर्षण अधिक); अधिक ऋणावेशित ऋणायन की त्रिज्या अधिक होगी (इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अधिक)।

उदाहरण 3.5

निम्नलिखित स्पीशीज़ में किसकी त्रिज्या अधिकतम तथा किसकी न्यूनतम होगी: Mg, Mg²⁺, Al, Al³⁺

आवर्त में बाईं से दाईं ओर परमाणु त्रिज्या घटती है; धनायन जनक परमाणु से छोटा होता है; समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज़ में अधिक नाभिकीय आवेश वाली की त्रिज्या छोटी।

अधिकतम आकार: Mg; न्यूनतम आकार: Al³⁺

(ग) आयनन एन्थैल्पी

तलस्थ अवस्था में विलगित गैसीय परमाणु से बाह्यतम इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने में जो ऊर्जा लगती है, उसे 'तत्त्व की आयनन एन्थैल्पी' कहते हैं (ΔiH, इकाई kJ mol⁻¹)।

X(g) → X⁺(g) + e⁻    (प्रथम आयनन एन्थैल्पी)     X⁺(g) → X²⁺(g) + e⁻    (द्वितीय आयनन एन्थैल्पी)

आयनन एन्थैल्पी सदैव धनात्मक होती है। द्वितीय आयनन एन्थैल्पी सदैव प्रथम से अधिक होती है (धनावेशित आयन से इलेक्ट्रॉन निकालना कठिन)। यदि विनिर्दिष्ट (specified) न किया गया हो, तो 'आयनन एन्थैल्पी' का अर्थ प्रथम आयनन एन्थैल्पी समझा जाता है।

आवर्त में प्रवृत्ति: बाईं से दाईं ओर बढ़ने पर सामान्यतः वृद्धि (नाभिकीय आवेश बढ़ने व त्रिज्या घटने से)। वर्ग में प्रवृत्ति: ऊपर से नीचे जाने पर कमी (त्रिज्या बढ़ने व आवरण-प्रभाव बढ़ने से)। उत्कृष्ट गैसों की आयनन एन्थैल्पी अत्यधिक (उच्चिष्ठ) तथा क्षारीय धातुओं की सबसे कम (निम्निष्ठ) होती है।

अपवाद: बेरीलियम की तुलना में बोरॉन की आयनन एन्थैल्पी कम है (2s इलेक्ट्रॉन की तुलना में 2p इलेक्ट्रॉन कम दृढ़ता से बँधा है, अधिक परिरक्षित)। नाइट्रोजन की तुलना में ऑक्सीजन की आयनन एन्थैल्पी कम है (N में तीनों 2p इलेक्ट्रॉन अलग-अलग कक्षकों में — हुंड का नियम — अधिक स्थायित्व; O में एक कक्षक में युग्मित इलेक्ट्रॉन, अधिक प्रतिकर्षण)।

उदाहरण 3.6

तीसरे आवर्त के तत्त्वों Na, Mg और Si की प्रथम आयनन एन्थैल्पी ΔiH का मान क्रमशः 496, 737 और 786 kJ mol⁻¹ है। पूर्वानुमान कीजिए कि ऐलुमीनियम का प्रथम ΔiH मान 575 या 760 kJ mol⁻¹ में से किसके अधिक पास होगा।

यह 575 kJ mol⁻¹ के अधिक पास होगा। ऐलुमीनियम का मान मैग्नीशियम के मान से कम होना चाहिए, क्योंकि नाभिक से 3p-इलेक्ट्रॉन 3s-इलेक्ट्रॉनों द्वारा परिरक्षित होते हैं।

(घ) इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी

जब उदासीन गैसीय परमाणु इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन में परिवर्तित होता है, तो इस प्रक्रम में हुए एन्थैल्पी परिवर्तन को 'इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी' (ΔegH) कहते हैं।

X(g) + e⁻ → X⁻(g)

हैलोजनों (वर्ग 17) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अत्यधिक ऋणात्मक होती है (एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर स्थायी उत्कृष्ट गैस विन्यास प्राप्त)। उत्कृष्ट गैसों की एन्थैल्पी अत्यधिक धनात्मक होती है (अगले क्वांटम स्तर में इलेक्ट्रॉन को प्रवेश कराना पड़ता है)।

आवर्त में प्रवृत्ति: बाईं से दाईं ओर बढ़ने पर अधिक ऋणात्मक (कुछ अनियमितता के साथ)। वर्ग में प्रवृत्ति: नीचे जाने पर कम ऋणात्मक। अपवाद: O तथा F की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अपने-अपने वर्गों के अगले तत्त्वों (S, Cl) से कम ऋणात्मक है, क्योंकि छोटे आकार व कम क्वांटम स्तर (n=2) में प्रविष्ट इलेक्ट्रॉन का प्रतिकर्षण अधिक होता है।

उदाहरण 3.7

P, S, Cl तथा F में से किसकी अधिकतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा किसकी न्यूनतम होगी?

आवर्त में बाईं से दाईं ओर बढ़ने पर एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है; 3p-कक्षक (बड़ा) में इलेक्ट्रॉन प्रवेश की तुलना में 2p-कक्षक में प्रतिकर्षण अधिक होता है।

सर्वाधिक ऋणात्मक: Cl; सबसे कम ऋणात्मक: P

(च) विद्युत् ऋणात्मकता

परमाणु के रासायनिक यौगिक में सहसंयोजक आबंध के इलेक्ट्रॉन युग्म को अपनी ओर आकर्षित करने की योग्यता का गुणात्मक माप विद्युत् ऋणात्मकता है। यह सीधे मापने योग्य राशि नहीं है, इसके लिए कई पैमाने विकसित हुए हैं — सर्वाधिक प्रचलित पॉलिंग पैमाना है (लीनियस पॉलिंग, 1922 — F की विद्युत् ऋणात्मकता 4.0 आँकी गई, सर्वाधिक)।

परमाणु (आवर्त II)LiBeBCNOF
विद्युत्-ऋणात्मकता1.01.52.02.53.03.54.0

विद्युत् ऋणात्मकता किसी तत्त्व के लिए स्थिर नहीं है — यह इस बात पर निर्भर करती है कि तत्त्व किस दूसरे तत्त्व से जुड़ा है। आवर्त में प्रवृत्ति: बाईं से दाईं (Li से F) बढ़ती है (परमाणु त्रिज्या घटने से)। वर्ग में प्रवृत्ति: ऊपर से नीचे (F से At) घटती है (त्रिज्या बढ़ने से)। विद्युत्-ऋणात्मकता का सीधा संबंध अधातु गुणधर्मों से है — आवर्त में विद्युत्-ऋणात्मकता बढ़ने के साथ अधातु गुणधर्म भी बढ़ता है।

आवर्त सारणी में आवर्ती प्रवृत्ति आवर्त में दाईं ओर: आयनन एन्थैल्पी ↑, इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता ↑, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक आवर्त में दाईं ओर: परमाणु त्रिज्या ↓ , धात्विक गुण ↓ , अधात्विक गुण ↑ वर्ग में नीचे: परमाणु त्रिज्या ↑, धात्विक गुण ↑ वर्ग में नीचे: आयनन एन्थैल्पी ↓, विद्युत् ऋणात्मकता ↓
चित्र 3.3 — आवर्त सारणी में तत्त्वों की आवर्त प्रवृत्ति (परमाणु त्रिज्या, आयनन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी, विद्युत् ऋणात्मकता व धात्विक/अधात्विक गुण)।
त्वरित तथ्य — भौतिक गुणधर्मों की आवर्तिता
  • परमाणु त्रिज्या: आवर्त में बाएँ→दाएँ घटती है; वर्ग में ऊपर→नीचे बढ़ती है।
  • धनायन जनक परमाणु से छोटा; ऋणायन जनक परमाणु से बड़ा होता है।
  • समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज़ में अधिक नाभिकीय आवेश ⇒ छोटी त्रिज्या।
  • आयनन एन्थैल्पी: आवर्त में बाएँ→दाएँ ↑ (सामान्यतः); वर्ग में ऊपर→नीचे ↓; सदैव धनात्मक; द्वितीय > प्रथम।
  • अपवाद: Be>B और N>O (आयनन एन्थैल्पी में)।
  • इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी: आवर्त में बाएँ→दाएँ अधिक ऋणात्मक; वर्ग में नीचे कम ऋणात्मक; हैलोजन सर्वाधिक ऋणात्मक; उत्कृष्ट गैस धनात्मक; O व F अपने वर्ग के अगले सदस्य (S, Cl) से कम ऋणात्मक।
  • विद्युत् ऋणात्मकता: पॉलिंग पैमाना; F का मान सर्वाधिक (4.0); आवर्त में बाएँ→दाएँ ↑; वर्ग में नीचे ↓; यह मापनीय राशि नहीं, बंध-साथी पर निर्भर।

3.7.2 रासायनिक गुणधर्मों में आवर्त प्रवृत्ति

(क) संयोजकता में आवर्तिता या ऑक्सीकरण अवस्थाएँ

निरूपक तत्त्वों की संयोजकता सामान्यतः उस तत्त्व के बाह्यतम कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है, या आठ में से बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या घटाने पर जो संख्या प्राप्त होती है, वही संयोजकता कहलाती है। इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता को ध्यान में रखते हुए किसी विशेष यौगिक में तत्त्व के किसी परमाणु द्वारा अन्य परमाणु के आवेश की संख्या ग्रहण करने को उसकी 'ऑक्सीकरण अवस्था' कहते हैं।

समूह12131415161718
संयोजी इलेक्ट्रॉन12345678
संयोजकता12343,52,61,70,8
समूह121314151617
हाइड्राइडLiH,NaH,KHCaH₂B₂H₆,AlH₃CH₄,SiH₄,GeH₄,SnH₄NH₃,PH₃,AsH₃,SbH₃H₂O,H₂S,H₂Se,H₂TeHF,HCl,HBr,HI
ऑक्साइडLi₂O,Na₂O,K₂OMgO,CaO,SrO,BaOB₂O₃,Al₂O₃,Ga₂O₃,In₂O₃CO₂,SiO₂,GeO₂,SnO₂,PbO₂N₂O₃/N₂O₅, P₄O₆/P₄O₁₀SO₃,SeO₃,TeO₃Cl₂O₇
उदाहरण 3.8

आवर्त सारणी का उपयोग करते हुए, सिलिकॉन एवं ब्रोमीन तथा ऐलुमीनियम तथा सल्फर के संयोग से बने यौगिकों के अणु-सूत्र की प्रागुक्ति कीजिए।

सिलिकॉन (वर्ग 14, संयोजकता 4) + ब्रोमीन (वर्ग 17, संयोजकता 1) ⇒ SiBr₄। ऐलुमीनियम (वर्ग 13, संयोजकता 3) + सल्फर (वर्ग 16, संयोजकता 2) ⇒ Al₂S₃।

उदाहरण 3.9

क्या ऐलुमीनियम के यौगिक Al[Cl(H₂O)₅]²⁺ में ऐलुमीनियम की ऑक्सीकरण अवस्था और सहसंयोजकता समान है?

ऐलुमीनियम की ऑक्सीकरण अवस्था +3 और सहसंयोजकता 6 है — अतः ये समान नहीं हैं।

(ख) द्वितीय आवर्त के तत्त्वों के गुणधर्मों में असंगतता

प्रत्येक वर्ग का प्रथम तत्त्व — वर्ग 1 (लीथियम), वर्ग 2 (बेरीलियम) और वर्ग 13-17 (बोरॉन से फ्लुओरीन) — अपने वर्ग के अन्य सदस्यों से अनेक पहलुओं में भिन्न है। इसका कारण: छोटा आकार, अधिक आवेश/त्रिज्या अनुपात तथा अधिक विद्युत्-ऋणात्मकता। वर्गों के प्रथम सदस्य में केवल चार संयोजक कक्षक (2s व 2p) उपलब्ध होते हैं, अतः अधिकतम सहसंयोजकता चार होती है (जैसे बोरॉन केवल [BF₄]⁻ बना सकता है), जबकि द्वितीय सदस्य के लिए 9 संयोजक कक्षक (3s, 3p, 3d) उपलब्ध होने से अधिक संयोजी कक्षक उपयोग हो सकते हैं (जैसे ऐलुमीनियम [AlF₆]³⁻ बनाता है)।

इसे आवर्त गुणधर्मों में 'विकर्ण संबंध' (Diagonal Relationship) कहते हैं — लीथियम अन्य क्षारीय धातुओं से तथा बेरीलियम अन्य क्षारीय मृदा धातुओं से भिन्न व्यवहार करते हुए, अगले वर्गों के द्वितीय तत्त्वों (मैग्नीशियम, ऐलुमीनियम) से अधिक मिलते-जुलते हैं।

त्वरित तथ्य — रासायनिक गुणधर्मों की आवर्तिता
  • निरूपक तत्त्वों की संयोजकता = बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या या (8 − बाह्यतम इलेक्ट्रॉन)।
  • ऑक्सीकरण अवस्था = यौगिक में तत्त्व के परमाणु द्वारा ग्रहण किया गया आभासी आवेश (इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता आधारित)।
  • विकर्ण संबंध: Li↔Mg, Be↔Al — गुणधर्मों में तुल्यता, क्योंकि वर्ग के प्रथम सदस्य में केवल 4 संयोजी कक्षक (2s,2p) उपलब्ध होते हैं।
  • बोरॉन अधिकतम [BF₄]⁻ बना सकता है; ऐलुमीनियम [AlF₆]³⁻ बना सकता है (d-कक्षक उपलब्धता के कारण)।

3.7.3 रासायनिक अभिक्रियाशीलता तथा आवर्तिता

आवर्त में सबसे बाईं ओर स्थित तत्त्व (क्षारीय धातुओं) की आयनन एन्थैल्पी सबसे कम है और सबसे दाईं ओर के तत्त्व (हैलोजन से पहले) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी सबसे अधिक ऋणात्मक है। आवर्त सारणी में दोनों छोरों पर सबसे अधिक और मध्य में सबसे कम रासायनिक क्रियाशीलता होती है — बाईं ओर (क्षारीय धातुओं में) इलेक्ट्रॉन खोकर धनायन बनाकर, और सबसे दाईं ओर (हैलोजन परिवार) इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर ऋणायन बनाकर।

तत्त्वों की रासायनिक क्रियाशीलता उनकी ऑक्सीजन और हैलोजन से क्रिया कराकर दर्शाई जा सकती है। आवर्त के दोनों किनारों के तत्त्व ऑक्सीजन से सरलतापूर्वक संयोग करके ऑक्साइड बनाते हैं — सबसे बाईं ओर के तत्त्वों के ऑक्साइड सबसे अधिक क्षारीय (जैसे Na₂O), सबसे दाईं ओर के अम्लीय (जैसे Cl₂O₇), तथा मध्य के तत्त्वों के ऑक्साइड उभयधर्मी (जैसे Al₂O₃, As₂O₃) या उदासीन (जैसे CO, NO, N₂O) होते हैं।

उदाहरण 3.10

जल से रासायनिक अभिक्रिया द्वारा दर्शाएँ कि Na₂O एक क्षारीय एवं Cl₂O₇ एक अम्लीय ऑक्साइड है।

2Na₂O + H₂O → 2NaOH (प्रबल क्षार)    Cl₂O₇ + H₂O → 2HClO₄ (प्रबल अम्ल)

निरूपक तत्त्वों की तुलना में संक्रमण धातुओं (3d श्रेणी) के आवर्त में परमाणु त्रिज्या का परिवर्तन बहुत कम है; आंतरिक संक्रमण धातुओं (4f श्रेणी) के लिए और भी कम है। संक्रमण तत्त्वों की आयनन एन्थैल्पी s- व p-ब्लॉक तत्त्वों के मध्य होती है, अतः ये वर्ग 1 और 2 की धातुओं की तुलना में कम विद्युत्धनी हैं।

त्वरित तथ्य — अभिक्रियाशीलता
  • आवर्त सारणी में दोनों छोरों पर सबसे अधिक तथा मध्य में सबसे कम रासायनिक क्रियाशीलता होती है।
  • बाईं ओर के तत्त्वों के ऑक्साइड क्षारीय (Na₂O); दाईं ओर के अम्लीय (Cl₂O₇); मध्य के उभयधर्मी (Al₂O₃) या उदासीन (CO, NO)।
  • उभयधर्मी ऑक्साइड क्षारों से अम्लीय व अम्लों से क्षारीय व्यवहार करते हैं; उदासीन ऑक्साइड में अम्ल/क्षार दोनों गुण अनुपस्थित।
  • संक्रमण तत्त्वों में परमाणु त्रिज्या का परिवर्तन आवर्त में बहुत कम होता है (d-कक्षक इलेक्ट्रॉनों की परिरक्षण क्षमता के कारण)।

संपूर्ण अध्याय की एक-पंक्ति तथ्य सूची

इतिहास व आवर्त सारणी का विकास
  • डॉबेराइनर का त्रिक नियम (1829): मध्य तत्त्व का परमाणु-भार शेष दो के औसत के बराबर — केवल कुछ तत्त्वों तक सीमित।
  • न्यूलैंड का अष्टक नियम (1865): हर आठवें तत्त्व के गुण पहले जैसे — केवल Ca तक सही; न्यूलैंड को 1887 में डेवी पदक मिला।
  • मेंडलीव व लोथर मेयर (1869): परमाणु-भार के बढ़ते क्रम में तत्त्व व्यवस्थित करने पर गुणों की आवर्तिता — मेंडलीव का वर्गीकरण अधिक व्यापक (यौगिकों के मूलानुपाती सूत्रों पर आधारित)।
  • मेंडलीव आवर्त नियम: तत्त्वों के गुणधर्म उनके परमाणु-भारों के आवर्ती फलन होते हैं।
  • मेंडलीव ने एका-एल्युमिनियम (गैलियम) व एका-सिलिकॉन (जर्मेनियम) की भविष्यवाणी सफलतापूर्वक की।
  • हेनरी मोज़ले (1913): X-किरण स्पेक्ट्रम अध्ययन से सिद्ध किया कि परमाणु-क्रमांक (Z) तत्त्व-गुणों का बेहतर सूचक है।
  • आधुनिक आवर्त नियम: तत्त्वों के भौतिक-रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु-क्रमांकों (Z) के आवर्ती फलन होते हैं।
आवर्त सारणी की संरचना
  • दीर्घ आवर्त सारणी में 7 आवर्त (क्षैतिज पंक्तियाँ) व 18 वर्ग (ऊर्ध्वाधर स्तंभ) हैं।
  • आवर्त 1–7 में तत्त्वों की संख्या: 2, 8, 8, 18, 18, 32, 32(अपूर्ण)।
  • आवर्त-संख्या = तत्त्व की अधिकतम मुख्य क्वांटम संख्या (n)।
  • 4f श्रेणी (लैंथेनॉयड): Ce(58)–Lu(71)। 5f श्रेणी (ऐक्टिनॉयड): Th(90)–Lr(103)।
  • 100 से अधिक परमाणु-क्रमांक वाले तत्त्वों को IUPAC संख्यात्मक-मूल नामकरण (nil,un,bi,tri...+ium) से अस्थायी नाम मिलता है।
  • परमाणु-क्रमांक 118 तक तत्त्वों की खोज व नामकरण पूर्ण हो चुका है (अंतिम: Oganesson, Og)।
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास व ब्लॉक
  • s-ब्लॉक: वर्ग 1-2, विन्यास ns¹⁻²; क्रियाशील धातुएँ, कम आयनन एन्थैल्पी।
  • p-ब्लॉक: वर्ग 13-18, विन्यास ns²np¹⁻⁶; धातु+अधातु+उपधातु सभी शामिल; s व p ब्लॉक मिलकर 'निरूपक/मुख्य वर्ग तत्त्व'।
  • d-ब्लॉक (संक्रमण तत्त्व): वर्ग 3-12, विन्यास (n-1)d¹⁻¹⁰ns⁰⁻²; रंगीन आयन, परिवर्ती संयोजकता, अनुचुंबकीय, उत्प्रेरक।
  • f-ब्लॉक (आंतरिक संक्रमण तत्त्व): विन्यास (n-2)f¹⁻¹⁴(n-1)d⁰⁻¹ns²; सभी धातुएँ; ऐक्टिनॉयड रेडियोधर्मी।
  • He अपवाद: s-विन्यास (1s²) परंतु स्थान p-ब्लॉक/वर्ग 18 में (पूर्ण भरा संयोजी कोश)। H भी विशेष स्थिति के कारण अलग स्थान पर।
  • एक ही वर्ग के तत्त्वों का संयोजकता कोश विन्यास समान होता है, इसलिए रासायनिक गुण समान।
धातु, अधातु व उपधातु
  • 78% से अधिक ज्ञात तत्त्व धातुएँ हैं (आवर्त सारणी के बाईं ओर)।
  • धातुएँ: उच्च गलनांक-क्वथनांक, ताप-विद्युत् सुचालक, आघातवर्ध्य व तन्य, ठोस (Hg अपवाद)।
  • अधातुएँ: निम्न गलनांक-क्वथनांक (B,C अपवाद), कुचालक, भंगुर, ठोस/द्रव/गैस।
  • उपधातु (Metalloid): Si, Ge, As, Sb, Te — धातु-अधातु विकर्ण सीमा पर, दोनों के गुण दर्शाते हैं।
  • वर्ग में नीचे: धात्विक गुण ↑; आवर्त में बाएँ→दाएँ: धात्विक गुण ↓, अधात्विक गुण ↑।
भौतिक व रासायनिक गुणधर्मों की आवर्तिता
  • परमाणु त्रिज्या: आवर्त में ↓ (बाएँ→दाएँ), वर्ग में ↑ (ऊपर→नीचे)।
  • धनायन जनक परमाणु से छोटा; ऋणायन जनक परमाणु से बड़ा होता है।
  • समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज़ में अधिक नाभिकीय आवेश ⇒ छोटी त्रिज्या (उदा. Al³⁺ < Mg²⁺ < Na⁺ < F⁻ < O²⁻ < N³⁻)।
  • आयनन एन्थैल्पी: सदैव धनात्मक; द्वितीय > प्रथम > ...; आवर्त में ↑, वर्ग में ↓; अपवाद Be>B, N>O।
  • इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी: आवर्त में अधिक ऋणात्मक (बाएँ→दाएँ), वर्ग में कम ऋणात्मक (ऊपर→नीचे); हैलोजन सर्वाधिक ऋणात्मक; उत्कृष्ट गैस धनात्मक; अपवाद: O, F अपने वर्ग के अगले सदस्य से कम ऋणात्मक।
  • विद्युत्-ऋणात्मकता (पॉलिंग पैमाना): F=4.0 (सर्वाधिक); आवर्त में ↑ (बाएँ→दाएँ), वर्ग में ↓ (ऊपर→नीचे); तत्त्व के लिए स्थिर नहीं, बंध-साथी पर निर्भर।
  • निरूपक तत्त्वों की संयोजकता = बाह्य इलेक्ट्रॉन संख्या या (8 − बाह्य इलेक्ट्रॉन संख्या)।
  • विकर्ण संबंध: Li↔Mg, Be↔Al — वर्ग के प्रथम सदस्य में केवल 4 संयोजी कक्षक (2s,2p) उपलब्ध, अतः अधिकतम सहसंयोजकता 4।
  • रासायनिक क्रियाशीलता आवर्त के दोनों छोरों पर सर्वाधिक, मध्य में सबसे कम।
  • ऑक्साइड प्रवृत्ति: बाईं ओर क्षारीय (Na₂O), दाईं ओर अम्लीय (Cl₂O₇), मध्य में उभयधर्मी (Al₂O₃)/उदासीन (CO,NO)।

सूत्र व तथ्य तालिका

राशि/संबंधविवरण / सूत्र
आधुनिक आवर्त नियमगुणधर्म ∝ परमाणु-क्रमांक (Z) के आवर्ती फलन
आवर्त-संख्याअधिकतम मुख्य क्वांटम संख्या (n)
s-ब्लॉक विन्यासns¹⁻²
p-ब्लॉक विन्यासns²np¹⁻⁶
d-ब्लॉक विन्यास(n−1)d¹⁻¹⁰ns⁰⁻²
f-ब्लॉक विन्यास(n−2)f¹⁻¹⁴(n−1)d⁰⁻¹ns²
आयनन प्रक्रमX(g) → X⁺(g) + e⁻ ; ΔᵢH सदैव धनात्मक
इलेक्ट्रॉन लब्धि प्रक्रमX(g) + e⁻ → X⁻(g)
संयोजकता (निरूपक तत्त्व)= बाह्य इलेक्ट्रॉन संख्या, या (8 − बाह्य इलेक्ट्रॉन संख्या)
परमाणु त्रिज्या प्रवृत्तिआवर्त में ↓ (Z↑ से); वर्ग में ↑ (n↑ व आवरण-प्रभाव से)
आयनन एन्थैल्पी प्रवृत्तिआवर्त में ↑; वर्ग में ↓
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी प्रवृत्तिआवर्त में अधिक ऋणात्मक; वर्ग में कम ऋणात्मक
विद्युत्-ऋणात्मकता प्रवृत्तिआवर्त में ↑; वर्ग में ↓ (पॉलिंग पैमाना, F=4.0 अधिकतम)
धात्विक/अधात्विक गुणआवर्त में बाएँ→दाएँ धात्विक↓ अधात्विक↑; वर्ग में नीचे धात्विक↑
IUPAC संख्यात्मक मूल0=nil,1=un,2=bi,3=tri,4=quad,5=pent,6=hex,7=sept,8=oct,9=enn (+ium अंत में)

अध्याय अभ्यास — प्रश्न 3.1 से 3.40 तक (विस्तृत हल सहित)

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके विस्तृत हल देखें। आयनन एन्थैल्पी व इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के प्रश्नों में उपरोक्त 'त्वरित तथ्य सूची' में दिए गए वास्तविक मानों का उपयोग किया गया है।

3.1 आवर्त सारणी में व्यवस्था का भौतिक आधार क्या है?
आधुनिक आवर्त सारणी में तत्त्वों की व्यवस्था का भौतिक आधार उनका परमाणु-क्रमांक (Z) है — जो कि तत्त्व के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से सीधे संबंधित है।
उत्तर: परमाणु-क्रमांक (Z) / इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
3.2 मेंडलीव ने किस महत्वपूर्ण गुणधर्म को अपनी आवर्त सारणी में तत्त्वों के वर्गीकरण का आधार बनाया? क्या वे उसपर दृढ़ रह पाए?
मेंडलीव ने तत्त्वों के परमाणु-भार तथा उनसे प्राप्त यौगिकों के मूलानुपाती सूत्रों व गुणधर्मों की समानता को आधार बनाया।
वे पूर्णतः परमाणु-भार क्रम पर दृढ़ नहीं रह पाए — उदाहरणार्थ आयोडीन का परमाणु-भार टेल्यूरियम से कम था, फिर भी गुणधर्मों की समानता के आधार पर उन्होंने आयोडीन को हैलोजन समूह (वर्ग VII) में F, Cl, Br के साथ रखा, न कि परमाणु-भार क्रम के अनुसार।
उत्तर: परमाणु-भार आधार; नहीं, गुणधर्मों की समानता के लिए उन्होंने परमाणु-भार क्रम की उपेक्षा की।
3.3 मेंडलीव के आवर्त नियम और आधुनिक आवर्त नियम में मौलिक अंतर क्या है?
मेंडलीव का आवर्त नियम: "तत्त्वों के गुणधर्म उनके परमाणु-भारों के आवर्ती फलन होते हैं।"
आधुनिक आवर्त नियम: "तत्त्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु-क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं।"
मौलिक अंतर: मेंडलीव नियम 'परमाणु-भार' पर आधारित था, जबकि आधुनिक नियम 'परमाणु-क्रमांक (Z)' पर आधारित है।
3.4 क्वांटम संख्याओं के आधार पर सिद्ध कीजिए कि आवर्त सारणी के छठवें आवर्त में 32 तत्त्व होने चाहिए।
छठे आवर्त (n=6) में क्रमिक रूप से भरे जाने वाले कक्षक हैं: 6s, 4f, 5d, 6p (ऊर्जा-अनुक्रम के अनुसार)।
इनमें अधिकतम इलेक्ट्रॉन क्षमता: 6s में 2, 4f में 14 (7 कक्षक × 2), 5d में 10 (5 कक्षक × 2), 6p में 6 (3 कक्षक × 2)।
कुल = 2 + 14 + 10 + 6 = 32
उत्तर: अतः छठे आवर्त में अधिकतम 32 तत्त्व हो सकते हैं, जो सिद्ध करता है कि इसमें 32 तत्त्व होने चाहिए।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय NEET में 2–3 प्रश्न (लगभग 4–6% वेटेज) के साथ आता है, जिनमें अधिकांश तुलनात्मक होते हैं — "निम्न में से किस तत्व की त्रिज्या/आयनन एन्थैल्पी सबसे अधिक/कम है" प्रकार के, अतः प्रवृत्तियों (trends) के अपवादों को याद रखना सबसे अधिक अंक दिलाता है।
  • मोज़ले का आधुनिक आवर्त नियम — मेण्डेलीफ के परमाणु द्रव्यमान-आधारित नियम का सुधार करते हुए मोज़ले ने बताया कि तत्वों के गुणधर्म उनके परमाणु क्रमांक (atomic number) के आवर्ती फलन हैं, न कि परमाणु द्रव्यमान के।
  • परमाणु क्रमांक आधार बनने से मेण्डेलीफ सारणी की विसंगतियाँ (जैसे Co-Ni, Ar-K, Te-I युग्मों का उल्टा क्रम) स्वतः सुलझ गईं, क्योंकि परमाणु क्रमांक के क्रम में ये तत्व सही स्थान पर आ जाते हैं।
तथ्य
  • 100 से अधिक परमाणु क्रमांक वाले तत्वों का IUPAC नामकरण — अंकों के लिए मूल शब्द: 0-nil, 1-un, 2-bi, 3-tri, 4-quad, 5-pent, 6-hex, 7-sept, 8-oct, 9-enn; तीनों अंकों को क्रमशः जोड़कर अंत में "-ium" प्रत्यय लगाया जाता है (जैसे 104 = Un-nil-quad-ium)। ऐसे नाम अस्थायी होते हैं, बाद में स्थायी नाम (जैसे 104 = रदरफोर्डियम, Rf) IUPAC द्वारा स्वीकृत किया जाता है।
तुलनात्मक
  • विकर्ण संबंध (diagonal relationship) — आवर्त 2 के तत्व (Li, Be, B) आवर्त 3 के तिरछे (diagonally) स्थित तत्वों (Mg, Al, Si) से असाधारण समानता दिखाते हैं, क्योंकि दोनों का आवेश/त्रिज्या अनुपात (polarising power) लगभग समान होता है — जैसे Li व Mg दोनों के कार्बोनेट गर्म करने पर विघटित होकर ऑक्साइड बनाते हैं (Na₂CO₃ के विपरीत)।
  • लैन्थेनाइड संकुचन के कारण 4d व 5d श्रेणी के समान वर्ग वाले तत्वों (जैसे Zr व Hf, Nb व Ta) की परमाण्विक/आयनिक त्रिज्याएँ लगभग समान हो जाती हैं, जिससे उनके रासायनिक गुणधर्मों में असाधारण समानता व पृथक्करण में कठिनाई होती है।
तथ्य
  • निष्क्रिय युग्म प्रभाव (Inert Pair Effect) — भारी p-ब्लॉक तत्त्वों (जैसे Tl, Pb, Bi) में बाह्यतम ns² इलेक्ट्रॉन-युग्म आबंध-निर्माण में भाग लेने से 'अनिच्छुक' रहता है, जिससे इनकी निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था (वर्ग संख्या − 2) अपेक्षित उच्चतर अवस्था (वर्ग संख्या के बराबर) से अधिक स्थायी हो जाती है — जैसे Pb²⁺ यौगिक, Pb⁴⁺ यौगिकों से अधिक स्थायी होते हैं। यह "अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था = वर्ग संख्या" वाले सामान्य नियम का एक महत्त्वपूर्ण अपवाद है।

NEET विगत वर्ष प्रश्न

AIPMT 2000 से NEET 2026 तक — इस अध्याय से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।

RE-NEET 2026 निम्न में से इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी (electron gain enthalpy) की सही प्रवृत्ति कौन-सी है?
हैलोजनों में इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी (ऋणात्मक चिह्न सहित) का मानक क्रम: Cl > F > Br > I
F का आकार अत्यंत छोटा होने से नए इलेक्ट्रॉन व पहले से उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के बीच प्रबल प्रतिकर्षण होता है, जिससे इसकी EGE, Cl से भी कम ऋणात्मक (कम एक्सोथर्मिक) हो जाती है
उत्तर: Cl > F > Br > I (परिमाण के अनुसार सही प्रवृत्ति)
NEET 2025 निम्न कथनों में सही कथन चुनिए: A. Ga का गलनांक बहुत उच्च है, जबकि Cs का बहुत निम्न है B. N व Cl की विद्युत्-ऋणात्मकता (पॉलिंग मान) समान नहीं है C. Ar, K⁺, Cl⁻, Ca²⁺, S²⁻ सभी समइलेक्ट्रॉनिक हैं D. Na,Mg,Al,Si की IE1 का क्रम Si>Al>Mg>Na है E. Cs की परमाण्विक त्रिज्या, Li व Rb से अधिक है
A: गलत — Ga का गलनांक वास्तव में असामान्यतः बहुत निम्न (≈30°C, लगभग कक्ष ताप के पास) होता है, "बहुत उच्च" नहीं
B: गलत — पॉलिंग स्केल पर N व Cl दोनों की विद्युत्-ऋणात्मकता संयोगवश समान (≈3.0) होती है
C: सही — सभी में 18 इलेक्ट्रॉन (Ar के समान) हैं, अतः समइलेक्ट्रॉनिक
D: गलत — वास्तविक क्रम Si > Mg > Al > Na है (Mg का अर्ध-पूरित 3s² स्थायित्व के कारण Al से अधिक IE1)
E: सही — वर्ग 1 में नीचे जाने पर त्रिज्या बढ़ती है; Cs, Li व Rb दोनों से नीचे है
उत्तर: C और E सही हैं
NEET 2024 Li, Be, B, C, N को बढ़ती हुई प्रथम आयनन एन्थैल्पी के क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
सामान्य प्रवृत्ति आवर्त में बाईं से दाईं ओर बढ़ती है, परंतु 2s²/2p¹ (Be→B) संक्रमण पर एक अपवाद आता है — पूर्ण भरे 2s² कक्षक से इलेक्ट्रॉन निकालना, अर्ध-भरे 2p¹ से निकालने से कठिन है, अतः IE1(B) < IE1(Be)
वास्तविक मान (eV के निकट): Li≈5.4, B≈8.3, Be≈9.3, C≈11.3, N≈14.5
उत्तर: बढ़ता क्रम — Li < B < Be < C < N

NCERT रसायन विज्ञान, कक्षा 11, एकक 3 — "तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता" (Reprint 2026‑27) पर आधारित पूर्ण अध्याय नोट्स। NEET प्रश्न-संग्रह आधिकारिक AIPMT/NEET प्रश्नपत्रों पर आधारित है।

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