जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • अध्याय 10

जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग

ऊतक संवर्धन, Bt फसलें, पुनर्योगज इंसुलिन, जीन चिकित्सा, आणविक निदान, पारजीवी जंतु, GEAC, बायोपाइरेसी एवं पेटेंट — परीक्षा‑केंद्रित विस्तृत विवेचन।

★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 जैव प्रौद्योगिकी — उपयोगों का विस्तार

कृषि, चिकित्सा, पर्यावरण एवं उद्योग में व्यापक अनुप्रयोग

जैव प्रौद्योगिकी में आनुवंशिक रूप से रूपांतरित सूक्ष्मजीवों, कवक, पौधों व जंतुओं का उपयोग कर जैव भैषजिक एवं जैविक पदार्थों का औद्योगिक स्तर पर उत्पादन किया जाता है। इसके उपयोग चिकित्सा शास्त्र, निदानसूचक, कृषि, संसाधित खाद्य, जैव सुधार, अपशिष्ट प्रतिपादन व ऊर्जा उत्पादन में हो रहे हैं।

तीन विवेचनात्मक अनुसंधान क्षेत्र
  • उत्प्रेरकों का निर्माण: सूक्ष्मजीवों या शुद्ध एंजाइमों के रूप में सर्वोत्तम उत्प्रेरक का विकास।
  • अभियांत्रिकी द्वारा परिस्थितियाँ: उत्प्रेरक के कार्य हेतु सर्वोत्तम परिस्थितियों का निर्माण।
  • अनुप्रवाह प्रक्रमण: प्रोटीन/कार्बनिक यौगिकों के शुद्धीकरण में तकनीक का उपयोग।
NEET फोकस
  • जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग स्वास्थ्य व खाद्य उत्पादन के क्षेत्र में जीवनस्तर सुधार हेतु।
  • तीन क्षेत्र — उत्प्रेरक, परिस्थितियाँ, अनुप्रवाह प्रक्रमण

2 कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग

ऊतक संवर्धन, कायिक संकरण, Bt फसलें, RNAi

खाद्य उत्पादन में वृद्धि हेतु तीन संभावनाएँ — कृषि रसायन आधारित कृषि, कार्बनिक कृषि, तथा आनुवंशिकत: निर्मित फसल आधारित कृषिहरित क्रांति द्वारा खाद्य आपूर्ति में तिगुनी वृद्धि के बावजूद, बढ़ती जनसंख्या का पेट भर पाना संभव नहीं है — क्योंकि उत्तम प्रबंधकीय व्यवस्था व कृषि रसायन विकासशील देशों के किसानों के लिए महंगे हैं।

ऊतक संवर्धन (Tissue Culture)

1950 के दशक में वैज्ञानिकों ने जाना कि एक पूर्ण पादप कर्तोतकी (किसी भी पादप भाग) से पुनर्जनित किया जा सकता है — इसे विशिष्ट पोषक मीडिया में रोगाणुरहित परिस्थितियों में उगाया जाता है। किसी कोशिका की कर्तोतकी से पूर्ण पादप में जनित्र होने की क्षमता पूर्णशक्तता कहलाती है।

पोषक माध्यम में स्युक्रोज (कार्बन स्रोत), अकार्बनिक लवण, विटामिन, अमीनो अम्ल तथा वृद्धि नियंत्रक (ऑक्सिन, साइटोकाइनिन) प्रदान किए जाते हैं।

ऊतक संवर्धन — सूक्ष्मप्रवर्धन कर्तोतकी (पादप भाग) पोषक मीडिया (सुक्रोज+लवण+ ऑक्सिन-साइटोकाइनिन) कैलस निर्माण (पूर्णशक्तता) हजारों सोमाक्लोन (आनुवंशिक रूप से समान) उदाहरण: टमाटर, केला, सेब आदि का सूक्ष्मप्रवर्धन
चित्र 10.1 — ऊतक संवर्धन द्वारा सूक्ष्मप्रवर्धन (स्वनिर्मित)
सोमाक्लोन: ऊतक संवर्धन द्वारा उत्पन्न आनुवंशिक रूप से मूल पादप के समान पादप। विषाणु-मुक्त पादप: विभज्योतक (मेरिस्टेम) संवर्धन से — क्योंकि विषाणु संवहन तंत्र (फ्लोएम) से फैलते हैं, पर शीर्षस्थ विभज्योतक में संवहन तंत्र अविकसित होता है, इसलिए विषाणु वहाँ तक नहीं पहुँचते।

कायिक संकरण (Somatic Hybridization)

पादपों की कोशिका भित्ति का पाचन कर प्रोटोप्लास्ट (प्लाज्मा झिल्ली से घिरा नग्न कोशिका) पृथक किया जाता है। दो भिन्न पादपों के प्रोटोप्लास्ट युग्मित होकर कायिक संकर उत्पन्न करते हैं — यह प्रक्रम कायिक संकरण कहलाता है।

पोमेटो (Tomato + Potato): टमाटर व आलू के प्रोटोप्लास्ट संलयन से बना संकर, जिसमें टमाटर व आलू दोनों के अभिलक्षण संयुक्त थे, परंतु व्यावसायिक उपयोग हेतु वांछित अभिलक्षणों का अभाव था — इसी कारण GM फसलों की आवश्यकता महसूस हुई।

आनुवंशिकत: रूपांतरित जीव (GMO)

ऐसे पौधे, जीवाणु, कवक व जंतु जिनके जीन हस्तकौशल द्वारा परिवर्तित किए जा चुके हैं — GMO कहलाते हैं। लाभ:

लाभविवरण
अजैव प्रतिबल सहिष्णुताठंडा, सूखा, लवण, ताप के प्रति सहिष्णु फसलें
पीड़कनाशी प्रतिरोधरासायनिक पीड़कनाशकों पर कम निर्भरता
कटाई पश्चात् नुकसान में कमीभंडारण अवधि बढ़ाना
खनिज उपयोग क्षमता में वृद्धिमृदा उर्वरता समापन को रोकना
पोषणिक स्तर में वृद्धिगोल्डन राइस (विटामिन A समृद्ध)

Bt — जैव पीड़कनाशक

Btबैसीलस थुरीनजिएंसीस जीवाणु से प्राप्त जीवविष। Bt विष जीन को पौधों में क्लोन कर पीड़क-प्रतिरोधी फसलें (Bt कपास, Bt मक्का, धान, टमाटर, आलू, सोयाबीन) विकसित की गईं।

Bt विष की सक्रियण प्रक्रिया Bacillus thuringiensis निष्क्रिय प्राक्जीव विष (क्राई प्रोटीन) कीट द्वारा ग्रहण क्षारीय pH में सक्रिय विष बनना आँत में छिद्र → कीट मृत्यु
चित्र 10.2 — Bt विष की सक्रियण प्रक्रिया (स्वनिर्मित)
क्राई जीननियंत्रित करता है
क्राई 1 एसी व क्राई 2 एबीकपास के मुकुल कृमि (बॉलवर्म)
क्राई 1 एबीमक्का छेदक (कॉर्न बोरर)
Bt विष सक्रियण: निष्क्रिय प्राक्जीव विष → कीट की क्षारीय आँत में सक्रिय → आंत्र-भित्ति पर छिद्र → कीट मृत्यु। मनुष्यों की अम्लीय आँत में यह सक्रिय नहीं होता, इसलिए Bt फसलें मनुष्यों के लिए हानिरहित हैं।

RNAi — सूत्रकृमि प्रतिरोध

मिल्वाडेगाइन इनकोगनीशिया तंबाकू की जड़ों को संक्रमित कर पैदावार घटाता है। RNA अंतर्क्षेप (RNAi) तकनीक द्वारा — एग्रोबैक्टीरियम वाहक का उपयोग कर सूत्रकृमि-विशिष्ट जीन को पादप में प्रविष्ट कराया जाता है, जिससे पूरक RNA बनकर सूत्रकृमि की mRNA निष्क्रिय हो जाती है।

NEET फोकस
  • ऊतक संवर्धन — पूर्णशक्तता; सोमाक्लोन आनुवंशिक रूप से समान
  • विषाणु-मुक्त पादप — विभज्योतक (मेरिस्टेम) संवर्धन
  • कायिक संकरण — प्रोटोप्लास्ट फ्यूजन; पोमेटो (टमाटर+आलू)
  • Bt = बैसीलस थुरीनजिएंसीस; क्राई जीन
  • RNAi — dsRNA द्वारा mRNA निष्क्रिय

3 चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग

पुनर्योगज इंसुलिन, जीन चिकित्सा, आणविक निदान

पुनर्योगज DNA तकनीक ने स्वास्थ्य सुरक्षा में अत्यधिक प्रभाव डाला है — सुरक्षित व अत्यधिक प्रभावी चिकित्सीय औषधियों का अधिक मात्रा में उत्पादन संभव है। वर्तमान में ~30 पुनर्योगज चिकित्सीय औषधियाँ विश्व में स्वीकृत हैं, जिनमें से 12 भारत में विपणित हो रही हैं।

पुनर्योगज इंसुलिन

पहले मधुमेह रोगियों का इंसुलिन जानवरों (सुअर, गाय) के अग्नाशय से निकाला जाता था, जिससे एलर्जी या अन्य प्रतिक्रियाएँ होती थीं।

इंसुलिन दो पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं — A व B — से बना, जो डाईसल्फाइड बंधों द्वारा जुड़ी होती हैं। प्राक्-इंसुलिन में C पेप्टाइड (अतिरिक्त फैलाव) होता है, जो परिपक्वता के दौरान अलग हो जाता है।

प्राक्-इंसुलिन → इंसुलिन प्राक्-इंसुलिन A पेप्टाइड C पेप्टाइड B पेप्टाइड इंसुलिन (A + B, S-S बंध) C पेप्टाइड (परिपक्व इंसुलिन में नहीं)
चित्र 10.3 — प्राक्-इंसुलिन में C पेप्टाइड (स्वनिर्मित)
1983 — एली लिली (अमेरिकी कंपनी) ने इ. कोलाई में मानव इंसुलिन की A व B शृंखलाओं का उत्पादन कर, उन्हें डाईसल्फाइड बंध द्वारा जोड़कर मानव इंसुलिन निर्मित किया।

जीन चिकित्सा (Gene Therapy)

जीन चिकित्सा — ADA न्यूनता (1990) रोगी के रक्त से लसीकाणु निकालना शरीर से बाहर संवर्धन (कल्चर) सक्रिय ADA cDNA रेट्रोवायरल वाहक द्वारा प्रवेश रोगी के शरीर में वापस
चित्र 10.4 — जीन चिकित्सा प्रक्रम (स्वनिर्मित)
1990 — प्रथम जीन चिकित्सा: ADA (एडेनोसीन डिएमीनेज) न्यूनता (गंभीर संयुक्त प्रतिरक्षा-न्यूनता) से पीड़ित चार वर्षीय बालिका में की गई।

आणविक निदान (Molecular Diagnosis)

PCR

न्यूक्लिक अम्ल का प्रवर्धन कर अल्प-मात्रा वाले रोगजनकों की पहचान — एड्स (HIV), कैंसर जीन उत्परिवर्तन।

ELISA

प्रतिजन-प्रतिरक्षी पारस्परिक क्रिया पर आधारित निदान — HIV, टाइफॉइड आदि।

NEET फोकस
  • इंसुलिन — A व B शृंखला, S-S बंध
  • प्राक्-इंसुलिन में C पेप्टाइड
  • 1983 — एली लिली द्वारा इ. कोलाई में मानव इंसुलिन
  • 1990 — ADA-न्यूनता की पहली जीन चिकित्सा
  • PCR — प्रवर्धन; ELISA — प्रतिजन-प्रतिरक्षी क्रिया

4 पारजीवी जंतु

ट्रांसजेनिक पशु — उपयोग एवं महत्त्व

पारजीवी जंतु — वे जंतु जिनके DNA में परिचालन द्वारा एक अतिरिक्त (बाहरी) जीन व्यवस्थित होता है, जो अपना लक्षण व्यक्त करता है। उपस्थित पारजीवी जंतुओं में 95%+ चूहे हैं।

शरीर क्रिया व विकास

जीन नियंत्रण व विकास पर प्रभावों का अध्ययन (जैसे इंसुलिन जैसे विकास कारक)।

रोग अध्ययन

कैंसर, सिस्टीक फाइब्रोसिस, रूमेटॉयड आर्थराइटिस, एल्जिमर हेतु पारजीवी नमूने।

जैविक उत्पाद

1997 — पारजीवी गाय "रोजी" — मानव अल्फा-लेक्टएल्बुमिन (2.4 g/L) युक्त दुग्ध।

टीका सुरक्षा

मानव पर प्रयोग से पहले टीके की सुरक्षा जाँच हेतु पारजीवी चूहे (जैसे पोलियो टीका)।

रासायनिक सुरक्षा परीक्षण

आविषालुता सुरक्षा परीक्षण — पारजीवी जंतुओं के कुछ जीन उन्हें अतिसंवेदनशील बनाते हैं।

1997 — पारजीवी गाय "रोजी": मानव अल्फा-लेक्टएल्बुमिन युक्त दुग्ध (2.4 g/L) — मानव शिशुओं के लिए अत्यंत संतुलित पोषक तत्व।
NEET फोकस
  • पारजीवी जंतुओं में 95%+ चूहे
  • 1997 — पारजीवी गाय "रोजी"
  • उपयोग — रोग अध्ययन, जैविक उत्पाद, टीका/रासायनिक सुरक्षा

5 नैतिक मुद्दे

GEAC, बायोपाइरेसी, पेटेंट संशोधन

आनुवंशिक रूपांतरण के अप्रत्याशित पारिस्थितिक परिणाम हो सकते हैं। अतः नैतिक मानदंडों की आवश्यकता है।

GEAC — आनुवंशिक अभियांत्रिकी संस्तुति समिति

GEAC (Genetic Engineering Appraisal Committee): भारत सरकार की नियामक संस्था — GM अनुसंधान, उत्पादन व सार्वजनिक उपयोग की सुरक्षा व वैधानिकता तय करती है।

बायोपाइरेसी व एकस्व (पेटेंट) मुद्दे

बायोपाइरेसी — बिना अनुमोदन व क्षतिपूरक भुगतान के जैव संसाधनों/परंपरागत ज्ञान का उपयोग।

बासमती धान विवाद (1997): अमेरिकी कंपनी राइसटेक (Ricetec) ने भारत की पारंपरिक बासमती किस्मों से विकसित 'नई' किस्म पर पेटेंट प्राप्त कर लिया — यह बायोपाइरेसी का क्लासिक उदाहरण है।
भारतीय एकस्व बिल (पेटेंट बिल) में संशोधन: भारतीय संसद ने हाल ही में पेटेंट नियमों को मजबूत बनाने, आपात्कालिक प्रावधान व अनुसंधान एवं विकासीय प्रयासों को शामिल करने के लिए संशोधन पारित किया है।
NEET फोकस
  • GEAC — भारत में GM जीवों की नियामक संस्था
  • बायोपाइरेसी — बिना अनुमति जैव संसाधनों का उपयोग
  • बासमती विवाद — 1997, राइसटेक
  • भारतीय पेटेंट बिल — 2005 में संशोधन

NEET फैक्ट‑शीट

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

अवधारणाप्रमुख तथ्य
ऊतक संवर्धनपूर्णशक्तता, सोमाक्लोन (आनुवंशिक रूप से समान)
विषाणु-मुक्त पादपविभज्योतक (मेरिस्टेम) संवर्धन
कायिक संकरणप्रोटोप्लास्ट फ्यूजन → पोमेटो
Btबैसीलस थुरीनजिएंसीस → क्राई 1 AC, 2 AB (बॉलवर्म), 1 AB (मक्का छेदक)
RNAidsRNA → mRNA निष्क्रिय (सूत्रकृमि प्रतिरोध)
गोल्डन राइसबीटा-कैरोटीन (प्रो-विटामिन A)
इंसुलिनA + B शृंखलाएँ, S-S बंध; 1983 — एली लिली
जीन चिकित्सा1990 — ADA-न्यूनता (SCID)
PCRन्यूक्लिक अम्ल प्रवर्धन
ELISAप्रतिजन-प्रतिरक्षी क्रिया
पारजीवी गाय1997 — "रोजी" (α-lactalbumin)
GEACभारत की GM नियामक संस्था
बासमती विवाद1997 — राइसटेक (बायोपाइरेसी)

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 ADA न्यूनता से पीड़ित बालिका को 1990 में किस प्रकार की चिकित्सा दी गई?

उत्तर: जीन चिकित्सा

1990 में पहली नैदानिक जीन चिकित्सा ADA-न्यूनता (SCID) के उपचार हेतु की गई — रोगी के लसीकाणुओं को शरीर से बाहर निकालकर, रेट्रोवायरल वाहक से सक्रिय ADA cDNA प्रविष्ट कर पुनः शरीर में डाला गया।

2 बासमती धान पर पेटेंट विवाद किससे संबंधित है?

उत्तर: बायोपाइरेसी

1997 में अमेरिकी कंपनी राइसटेक ने भारत की पारंपरिक बासमती किस्मों पर पेटेंट ले लिया था — यह बिना अनुमोदन व क्षतिपूर्ति के जैव संसाधनों के उपयोग (बायोपाइरेसी) का क्लासिक उदाहरण है।

3 Bt विष प्राक्-विष से सक्रिय विष में किस कारण परिवर्तित होता है?

उत्तर: कीट की क्षारीय आँत में सक्रियण

Bt विष निष्क्रिय प्राक्जीव विष के रूप में उत्पन्न होता है; केवल संवेदनशील कीट की क्षारीय आँत में घुलकर सक्रिय होता है, जो आंत्र-भित्ति को नष्ट करता है — मनुष्यों की अम्लीय आँत में सक्रिय नहीं होता।

4 गोल्डन राइस में किसके जैवसंश्लेषण हेतु जीन प्रविष्ट किए गए हैं?

उत्तर: बीटा-कैरोटीन (प्रो-विटामिन A)

गोल्डन राइस में डैफोडिल/मक्का से प्राप्त फाइटोइन सिंथेज़ तथा जीवाणु से प्राप्त क्रिटीन डीसैचुरेज़ जीन प्रविष्ट कर बीटा-कैरोटीन संश्लेषण कराया गया है, जो विटामिन A न्यूनता दूर करने में सहायक है।

5 भारत में GM अनुसंधान एवं सार्वजनिक सेवा हेतु GM जीवों की सुरक्षा को नियंत्रित करने वाली संस्था कौन-सी है?

उत्तर: GEAC

GEAC (आनुवंशिक अभियांत्रिकी अनुमोदन समिति) — भारत सरकार की नियामक संस्था, जो GM जीवों की सुरक्षा, अनुसंधान व सार्वजनिक उपयोग की वैधानिकता तय करती है।

6 विषाणु-मुक्त पौधे प्राप्त करने के लिए ऊतक संवर्धन में पौधे का कौन-सा भाग लिया जाता है?

उत्तर: शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem)

विषाणु संवहन तंत्र (फ्लोएम) से फैलते हैं, परंतु शीर्षस्थ विभज्योतक में संवहन तंत्र अविकसित होता है, इसलिए विषाणु वहाँ तक नहीं पहुँचते — इसी भाग से विषाणु-मुक्त पौधे प्राप्त किए जाते हैं।

7 Bt कपास के संबंध में कौन-सा कथन सही नहीं है?

उत्तर: यह सभी प्रकार के कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी है

Bt कपास केवल विशिष्ट लेपिडोप्टेरान पीड़कों (जैसे बॉलवर्म) के प्रति प्रतिरोधी है, सभी कीटनाशकों के प्रति नहीं — यह एक सामान्य भ्रामक कथन है।

8 सूत्रकृमि (Meloidogyne incognitia) से सुरक्षा हेतु किस तकनीक का उपयोग किया गया?

उत्तर: RNA अंतर्क्षेप (RNAi)

सूत्रकृमि-विशिष्ट जीन के अनुरूप व विपरीत RNA बनाने वाला DNA पादप में प्रविष्ट कराया गया, जिससे dsRNA बनकर सूत्रकृमि की mRNA निष्क्रिय हो गई — जिससे परजीवी जीवित नहीं रह पाता।

9 प्रथम नैदानिक जीन चिकित्सा किस रोग के उपचार हेतु की गई?

उत्तर: ADA-न्यूनता (SCID)

1990 में ADA-न्यूनता (गंभीर संयुक्त प्रतिरक्षा-न्यूनता) के उपचार हेतु पहली जीन चिकित्सा की गई थी — अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण व एंजाइम प्रतिस्थापन चिकित्सा लाभकारी हैं, परंतु पूर्णतः उपचारकारी नहीं।

10 फसल जैव-प्रौद्योगिकी में जीन-स्थानांतरण हेतु किसका उपयोग किया जाता है?

उत्तर: एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेशिएंस व प्लाज्मिड

पादपों में जीन-स्थानांतरण हेतु एग्रोबैक्टीरियम का Ti प्लाज्मिड-आधारित तंत्र प्रयुक्त होता है — रेट्रोवायरल संवाहक मुख्यतः जंतु/मानव कोशिकाओं (जीन चिकित्सा) में प्रयुक्त होता है।

अतिरिक्त NEET तथ्य

सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं

महत्वपूर्ण
  • इस अध्याय से NEET में प्रतिवर्ष 2–3 प्रश्न (~8–12 अंक) पूछे जाते हैं।
  • सबसे अधिक पूछे जाने वाले टॉपिक — Bt कपास, गोल्डन राइस, जीन चिकित्सा, बायोपाइरेसी
तुलनात्मक
  • पादप vs जंतु जीन-स्थानांतरण: पादप — एग्रोबैक्टीरियम Ti प्लाज्मिड; जंतु/मानव — रेट्रोवायरल वाहक।
  • गोल्डन राइस vs बासमती: गोल्डन राइस — सकारात्मक (विटामिन A); बासमती — नैतिक विवाद (बायोपाइरेसी)।
तथ्य
  • गोल्डन राइस के जीन स्रोत: डैफोडिल (फाइटोइन सिंथेज़) + जीवाणु (क्रिटीन डीसैचुरेज़)।
  • प्रथम पारजीवी गाय "रोजी" (1997): मानव अल्फा-लेक्टएल्बुमिन (2.4 g/L) युक्त दुग्ध।
ट्रैप
  • Bt कपास — सभी कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी — यह हमेशा गलत होता है (केवल विशिष्ट पीड़कों के प्रति)।
  • ADA-न्यूनता के उपचार — पूर्णतः उपचारकारी — यह भी गलत है; केवल जीन चिकित्सा स्थायी समाधान है।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — Bt फसलें (क्राई जीन), गोल्डन राइस, जीन चिकित्सा (ADA), बायोपाइरेसी (बासमती) — इन चारों पर विशेष ध्यान दें, इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।

संक्षिप्त सार

कृषि अनुप्रयोग

ऊतक संवर्धन (सोमाक्लोन), Bt फसलें (क्राई जीन), RNAi (सूत्रकृमि प्रतिरोध), गोल्डन राइस (विटामिन A)।

चिकित्सा अनुप्रयोग

पुनर्योगज इंसुलिन (A+B, S-S बंध; 1983, एली लिली); जीन चिकित्सा (ADA-न्यूनता, 1990); PCR/ELISA निदान।

पारजीवी जंतु

95%+ चूहे; 1997 — "रोजी" (α-lactalbumin); रोग अध्ययन, टीका/रासायनिक सुरक्षा।

नैतिक मुद्दे

GEAC (भारत की GM नियामक संस्था); बायोपाइरेसी (बासमती विवाद, 1997); भारतीय पेटेंट बिल संशोधन (2005)।

NEET फोकस

Bt फसलें, गोल्डन राइस, जीन चिकित्सा, बायोपाइरेसी — सर्वाधिक पूछे जाने वाले टॉपिक।

प्रमुख वर्ष

1983 — पुनर्योगज इंसुलिन; 1990 — जीन चिकित्सा; 1997 — रोजी व बासमती विवाद; 2005 — पेटेंट बिल संशोधन।

? अभ्यास प्रश्न-उत्तर

प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें एवं उत्तर देखें

प्रश्न 1 विषाणु मुक्त पादप तैयार करने के लिए पादप का कौन सा भाग सबसे उपयुक्त है तथा क्यों?
उत्तर

विभज्योतक (मेरिस्टेम — शीर्ष तथा कक्षीय) सबसे उपयुक्त है। कारण — यदि पूरा पादप किसी विषाणु से संक्रमित है, तब भी विभज्योतक विषाणु से अप्रभावित रहता है, क्योंकि इस क्षेत्र में संवहन तंत्र अविकसित होता है — इसलिए विषाणु वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। अतः विभज्योतक संवर्धन द्वारा विषाणु-मुक्त पादप प्राप्त किए जा सकते हैं (जैसे केला, गन्ना, आलू)।

प्रश्न 2 सूक्ष्मप्रवर्धन के मुख्य लाभ क्या हैं?
उत्तर
  • तीव्र गति से बड़े पैमाने पर उत्पादन — अल्प अवधि में हजारों पादप प्रवर्धन।
  • आनुवंशिक रूप से समान संतति (सोमाक्लोन) — मूल पादप के समान अभिलक्षण।
  • रोग/विषाणु मुक्त पादप — विभज्योतक संवर्धन से।
  • मूल्यवान किस्मों का संरक्षण व प्रवर्धन — टमाटर, केला, सेब आदि।
प्रश्न 3 ऊतक संवर्धन माध्यम के घटक क्या हैं?
उत्तर
  • कार्बन स्रोत: स्युक्रोज (शर्करा) — ऊर्जा प्रदाता।
  • अकार्बनिक लवण: खनिज तत्त्व (N, P, K आदि)।
  • विटामिन: कोशिका वृद्धि हेतु।
  • अमीनो अम्ल: प्रोटीन संश्लेषण हेतु।
  • वृद्धि नियंत्रक: ऑक्सिन, साइटोकाइनिन — कोशिका विभाजन व विभेदन नियंत्रण।
प्रश्न 4 Bt विष जीवाणु को स्वयं क्यों नहीं मारता?
उत्तर

Bt विष प्रोटीन जीवाणु के अंदर निष्क्रिय प्राक्जीव विष के रूप में उत्पन्न होता है। यह केवल कीट की क्षारीय आँत में ही घुलनशील व सक्रिय होता है — इसलिए यह जीवाणु को स्वयं हानि नहीं पहुँचाता।

प्रश्न 5 पारजीवी जंतु क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर

पारजीवी जंतु — वे जंतु जिनके DNA में परिचालन द्वारा एक अतिरिक्त (बाहरी) जीन व्यवस्थित होता है, जो अपना लक्षण व्यक्त करता है।

उदाहरण — 1997, पारजीवी गाय "रोजी": मानव अल्फा-लेक्टएल्बुमिन जीन प्रविष्ट कराकर, इसके दूध में मानव प्रोटीन (2.4 g/L) प्राप्त किया गया — जो मानव शिशुओं के लिए संतुलित पोषक तत्व है।

प्रश्न 6 GM फसलों के लाभ व हानि लिखिए।
उत्तर

लाभ: अजैव प्रतिबल सहिष्णुता, पीड़क प्रतिरोध (कम रासायनिक कीटनाशक), बेहतर पोषण (गोल्डन राइस), कम कटाई-पश्चात् नुकसान, खनिज उपयोग क्षमता में वृद्धि।

हानियाँ: पारिस्थितिक अनिश्चितता, संभावित एलर्जी/स्वास्थ्य प्रभाव, जैव विविधता पर प्रभाव, पेटेंट/बायोपाइरेसी मुद्दे, उच्च प्रारंभिक लागत।

प्रश्न 7 क्राई प्रोटीन क्या है? इसका उत्पादन व उपयोग बताइए।
उत्तर

क्राई प्रोटीनबैसीलस थुरीनजिएंसीस जीवाणु द्वारा उत्पादित कीट-विषाक्त प्रोटीन। इन्हें कूटबद्ध करने वाले जीन — क्राई जीन (जैसे क्राई 1 AC, क्राई 2 AB, क्राई 1 AB)।

उपयोग: वैज्ञानिकों ने क्राई जीन को पौधों (कपास, मक्का) में क्लोन कर Bt फसलें विकसित की हैं, जो विशिष्ट पीड़कों (बॉलवर्म, कॉर्न बोरर) के प्रति प्रतिरोधी होती हैं — जिससे रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता कम होती है।

प्रश्न 8 जीन चिकित्सा क्या है? ADA-न्यूनता के उदाहरण से समझाइए।
उत्तर

जीन चिकित्सा — दोषपूर्ण जीन की भरपाई हेतु सामान्य जीन को कोशिका/ऊतक में प्रवेश कराना।

ADA-न्यूनता (1990): रोगी के लसीकाणु → शरीर से बाहर संवर्धन → सक्रिय ADA cDNA (रेट्रोवायरल वाहक द्वारा) प्रवेश → पुनः शरीर में स्थापन। ये कोशिकाएँ मृतप्राय होती हैं, अतः समय-समय पर दोहराना पड़ता है। स्थायी समाधान — मज्जा कोशिकाओं में भ्रूणीय अवस्था में जीन प्रवेश।

प्रश्न 9 ई. कोलाई में मानव जीन क्लोनिंग के चरण बताइए।
उत्तर
  1. जीन का पृथक्करण/संश्लेषण (जैसे इंसुलिन A व B शृंखला अनुक्रम)।
  2. प्लाज्मिड वाहक में प्रविष्टि (प्रतिबंधन एंजाइम + लाइगेज → पुनर्योगज DNA)।
  3. ई. कोलाई में ट्रांसफॉर्मेशन (CaCl₂ + 42°C तापाघात)।
  4. चयन (एंटीबायोटिक प्रतिरोधी मार्कर से)।
  5. बड़े पैमाने पर संवर्धन व अभिव्यक्ति
  6. निष्कर्षण, शुद्धीकरण व प्रोटीन निर्माण (A व B को S-S बंध से जोड़ना)।
प्रश्न 10 RNAi द्वारा अवांछित हाइड्रोकार्बन कैसे हटाए जा सकते हैं?
उत्तर

RNAi तकनीक द्वारा अवांछित हाइड्रोकार्बन/फैटी एसिड के जैवसंश्लेषण हेतु उत्तरदायी विशिष्ट जीन को निष्क्रिय (साइलेंस) किया जा सकता है — उस जीन के विरुद्ध पूरक dsRNA बनाकर, जिससे उसका mRNA निष्क्रिय हो जाता है और अवांछित हाइड्रोकार्बन का जैवसंश्लेषण रुक जाता है या कम हो जाता है। वैकल्पिक रूप से, वांछित फैटी एसिड-संशोधक एंजाइमों के जीन डालकर भी तेल संरचना सुधारी जा सकती है।

प्रश्न 11 गोल्डन राइस क्या है?
उत्तर

गोल्डन राइस — एक GM धान की किस्म, जिसके दानों में आनुवंशिक अभियांत्रिकी द्वारा बीटा-कैरोटीन (प्रो-विटामिन A) संश्लेषित कराया गया है — इसी कारण चावल के दाने पीले/सुनहरे रंग के होते हैं। यह विटामिन A की कमी (विशेषकर विकासशील देशों में) को दूर करने में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 12 क्या मानव रक्त में प्रोटीएज़ व न्यूक्लिएज़ हैं?
उत्तर

हाँ, मानव रक्त में प्रोटीएज़ (जैसे थ्रॉम्बिन, प्लाज़्मिन — रक्त स्कंदन/फाइब्रिनोलिसिस) व न्यूक्लिएज़ (DNase, RNase — बाह्यकोशिकीय न्यूक्लिक अम्ल विघटन) दोनों उपस्थित होते हैं। यही कारण है कि इंसुलिन जैसे प्रोटीन का इंजेक्शन द्वारा प्रयोग आवश्यक है, तथा जीन चिकित्सा में DNA को सुरक्षात्मक वाहक (वायरल वेक्टर) में पैक करना पड़ता है।

प्रश्न 13 मुखीय सक्रिय औषध प्रोटीन बनाने की समस्याएँ व विधियाँ लिखिए।
उत्तर

विधियाँ: कैप्सूलीकरण (लाइपोसोम/नैनोकण आवरण), एंजाइम अवरोधकों का सह-प्रयोग, अवशोषण वर्धकों का प्रयोग, पादप-आधारित मौखिक टीके/प्रोटीन (Molecular Pharming)।

मुख्य समस्याएँ: पाचक प्रोटीएज़ द्वारा अपघटन, पेट का अम्लीय वातावरण (प्रोटीन विकृत), बड़े अणु आकार के कारण निम्न अवशोषण, यकृत में प्रथम-पास चयापचय, तथा संभावित प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रिया।

यह अध्ययन सामग्री जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोगों — कृषि, चिकित्सा, पारजीवी जंतु, नैतिक मुद्दे — को सरल, मौलिक एवं परीक्षा-अनुकूल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिसमें NEET-स्तरीय तथ्य, तुलनात्मक तालिकाएँ एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर सम्मिलित हैं।

जैव प्रौद्योगिकी — जीवन की आणविक संभावनाओं को मानव कल्याण हेतु साकार करने का अद्भुत माध्यम।

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