रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • अध्याय 19

रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

हाइपोथैलेमस से लेकर अधिवृक्क, अग्नाशय व जनन ग्रंथियों तक — हर अंतःस्रावी ग्रंथि, उसके हार्मोन, उनके कार्य तथा जुड़े हुए विकारों का विस्तृत व परीक्षा-केंद्रित विवेचन।

★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 हार्मोन क्या हैं — रासायनिक समन्वय की भूमिका

तंत्रिका तंत्र तेज़, हार्मोन तंत्र स्थायी

आप पहले ही अध्ययन कर चुके हैं कि तंत्रिका तंत्र विभिन्न अंगों के बीच एक बिंदु-दर-बिंदु द्रुत समन्वय का कार्य करता है। तंत्रिकीय समन्वय काफी तेज़ लेकिन अल्प अवधि का होता है। तंत्रिका तंतुओं द्वारा शरीर की सभी कोशिकाओं का तंत्रिकायन नहीं होने के कारण, कोशिकीय क्रियाओं के लिए तथा निरंतर नियमन के लिए एक विशेष प्रकार के समन्वय की आवश्यकता होती है — यह कार्य हार्मोन द्वारा संपादित होता है। तंत्रिका तंत्र और अंतःस्रावी तंत्र मिलकर शरीर की शरीर-क्रियात्मक कार्यों का समन्वय और नियंत्रण करते हैं।

अंतःस्रावी ग्रंथियों में नलिकाएँ नहीं होती हैं, इसलिए वे नलिकाविहीन ग्रंथियाँ कहलाती हैं। इनके स्राव हार्मोन कहलाते हैं। हार्मोन की परंपरागत परिभाषा के अनुसार 'हार्मोन अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित रक्त में मुक्त किए जाने वाले रसायन हैं, जो दूरस्थ लक्ष्य अंग तक पहुँचाए जाते हैं।' परंतु अब इस परिभाषा को रूपांतरित किया गया है, जिसके अनुसार 'हार्मोन सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होने वाले अपोषक रसायन हैं जो अंतरकोशिकीय संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं।' इस नई परिभाषा के अंतर्गत सुनियोजित अंतःस्रावी ग्रंथियों से स्रावित हार्मोन के अतिरिक्त कई नए अणु भी सम्मिलित हो जाते हैं।

अकशेरुकी बनाम कशेरुकी अंतःस्रावी तंत्र अकशेरुकियों में कम हार्मोन के साथ एक सरल अंतःस्रावी तंत्र होता है, जबकि कशेरुकियों में कई रसायन हार्मोन की तरह कार्य कर उनमें समन्वय स्थापित करते हैं। मानव अंतःस्रावी तंत्र इस दृष्टि से सबसे जटिल व सुव्यवस्थित प्रणालियों में गिना जाता है।
NEET फोकस
  • हार्मोन की नई परिभाषा — "सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न अपोषक रसायन जो अंतरकोशिकीय संदेशवाहक हैं" — पुरानी परिभाषा से भिन्न है, दोनों को उलट कर पूछा जा सकता है।
  • अंतःस्रावी ग्रंथियाँ नलिकाविहीन (ductless) होती हैं, जबकि बहिःस्रावी ग्रंथियाँ नलिकायुक्त होती हैं — यह भेद objective प्रश्न में सीधे पूछा जाता है।

2 मानव अंतःस्रावी तंत्र — हाइपोथैलेमस

पीयूष ग्रंथि का "मास्टर कंट्रोलर"

अंतःस्रावी ग्रंथियाँ और शरीर के विभिन्न भागों में स्थित हार्मोन स्रावित करने वाले ऊतक/कोशिकाएँ मिलकर अंतःस्रावी तंत्र का निर्माण करते हैं। पीयूष ग्रंथि, पिनियल ग्रंथि, थायरॉइड, एड्रीनल, अग्नाशय, पैराथायरॉइड, थाइमस और जनन ग्रंथियाँ (नर में वृषण और मादा में अंडाशय) हमारे शरीर के सुनियोजित अंतःस्रावी अंग हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य अंग जैसे जठर-आंत्रीय मार्ग, यकृत, वृक्क, हृदय आदि भी हार्मोन का उत्पादन करते हैं।

हाइपोथैलेमस, डाइनसिफेलॉन (अग्रमस्तिष्क पश्च) का आधार भाग है और यह शरीर के विविध प्रकार के कार्यों का नियंत्रण करता है। इसमें हार्मोन का उत्पादन करने वाली कई तंत्रिकास्रावी कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें न्यूक्ली कहते हैं। ये हार्मोन पीयूष ग्रंथि से स्रवित होने वाले हार्मोन के संश्लेषण और स्राव का नियंत्रण करते हैं।

हाइपोथैलेमस से स्रावित होने वाले हार्मोन दो प्रकार के होते हैं — मोचक हार्मोन (जो पीयूष ग्रंथि से हार्मोन के स्राव को प्रेरित करते हैं) और निरोधी हार्मोन (जो पीयूष ग्रंथि से हार्मोन को रोकते हैं)। उदाहरणार्थ, हाइपोथैलेमस से निकलने वाला गोनेडोट्रोफिन मुक्तकारी हार्मोन पीयूष ग्रंथि में गोनेडोट्रोफिन हार्मोन के संश्लेषण एवं स्राव को प्रेरित करता है। वहीं दूसरी ओर हाइपोथैलेमस से ही स्रवित सोमेटोस्टेटिन हार्मोन, पीयूष ग्रंथि से वृद्धि हार्मोन के स्राव का रोधक है।

ये हार्मोन हाइपोथैलेमस की तंत्रिकोशिकाओं से प्रारंभ होकर, तंत्रिकाक्ष होते हुए तंत्रिका सिरों पर मुक्त कर दिए जाते हैं। ये हार्मोन निवाहिका परिवहन-तंत्र द्वारा पीयूष ग्रंथि तक पहुँचते हैं और अग्र पीयूष ग्रंथि के कार्यों का नियमन करते हैं। पश्च पीयूष ग्रंथि का तंत्रिकीय नियमन सीधे हाइपोथैलेमस के अधीन होता है।

NEET फोकस
  • हाइपोथैलेमस कुल 7 मुक्तकारी (releasing) हार्मोन और 3 निरोधी (inhibiting) हार्मोन स्रावित करता है — यह संख्या सीधे पूछी जाती है।
  • हाइपोथैलेमो-पीयूष निवाहिका तंत्र (hypothalamo-hypophyseal portal system) केवल अग्र पीयूष ग्रंथि को नियंत्रित करता है, जबकि पश्च पीयूष ग्रंथि सीधे तंत्रिकाक्ष द्वारा नियंत्रित होती है — यह भेद बार-बार पूछा जाता है।

3 पीयूष ग्रंथि

"मास्टर ग्लैंड" — शरीर की सबसे महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथि

पीयूष ग्रंथि एक सेला टर्सिका नामक अस्थिल गुहा में स्थित होती है और एक वृंत द्वारा हाइपोथैलेमस से जुड़ी होती है। आंतरिकी के अनुसार पीयूष ग्रंथि एडिनोहाइपोफाइसिस और न्यूरोहाइपोफाइसिस नामक दो भागों में विभाजित होती है।

एडिनोहाइपोफाइसिस दो भागों का बना होता है — पार्स डिस्टेलिस और पार्स इंटरमीडिया। पार्स डिस्टेलिस को साधारणतया अग्र पीयूष ग्रंथि कहते हैं, जिससे वृद्धि हार्मोन या सोमेटोट्रोपिन (GH), प्रोलैक्टिन (PRL) या मेमोट्रोपिन, थायरॉइड प्रेरक हार्मोन (TSH), एड्रिनोकार्टिकोट्रॉफिक हार्मोन (ACTH) या कॉर्टिकोट्रोफिन, ल्यूटीनाइजिंग हार्मोन (LH) और पुटिका प्रेरक हार्मोन (FSH) का स्राव होता है। पार्स इंटरमीडिया एक मात्र हार्मोन लेनोसाइट प्रेरक हार्मोन (MSH) या मेलेनोट्रोफिन का स्राव करता है — यद्यपि मानव में पार्स इंटरमीडिया, पार्स डिस्टेलिस में लगभग जुड़ा होता है।

अग्र पीयूष हार्मोनसंक्षेपमुख्य कार्य
वृद्धि हार्मोन / सोमेटोट्रोपिनGHशारीरिक वृद्धि नियमन
प्रोलैक्टिनPRLस्तन ग्रंथि वृद्धि व दुग्ध निर्माण
थायरॉइड प्रेरक हार्मोनTSHथायरॉइड हार्मोन संश्लेषण को प्रेरित
एड्रिनोकार्टिकोट्रॉफिक हार्मोनACTHएड्रीनल वल्कुट को ग्लूकोकॉर्टिकॉइड स्रवण हेतु प्रेरित
ल्यूटीनाइजिंग हार्मोनLHनर में एंड्रोजन स्रवण; मादा में अंडोत्सर्ग
पुटिका प्रेरक हार्मोनFSHनर में शुक्रजनन; मादा में पुटिका वृद्धि

न्यूरोहाइपोफाइसिस (पार्स नर्वोसा) या पश्च पीयूष ग्रंथि, हाइपोथैलेमस द्वारा उत्पादित किए जाने वाले हार्मोन ऑक्सीटॉसिन और वेसोप्रेसिन का संग्रह और स्राव करती है। ये हार्मोन वास्तव में हाइपोथैलेमस द्वारा संश्लेषित होते हैं और तंत्रिकाक्ष होते हुए पश्च पीयूष ग्रंथि में पहुँचा दिए जाते हैं।

वृद्धि हार्मोन से जुड़े विकार

वृद्धिकारी हार्मोन (GH) के अति स्राव से शरीर की असामान्य वृद्धि होती है जिसे जाइगेंटिज्म (अतिकायकता) कहते हैं, और इसके अल्प स्राव से वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है जिसे पिट्यूटरी ड्वार्फिज्म (बौनापन या वामनता) कहते हैं। वयस्कों में विशेष रूप से मध्य आयुवर्ग के लोगों में वृद्धिकारी हार्मोन के अतिस्राव से अत्यधिक विकृति (विशेषतः चेहरे की) हो जाती है, जिसे अतिकायता (एक्रोमिगेली) कहते हैं। इससे गंभीर जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं, तथा यदि नियंत्रित न किया गया तो समय से पूर्व मृत्यु भी हो सकती है।

पश्च पीयूष के दो हार्मोन ऑक्सीटॉसिन हमारे शरीर की चिकनी पेशियों पर कार्य करता है और उनके संकुचन को प्रेरित करता है — मादाओं में यह प्रसव के समय गर्भाशयी पेशियों के संकुचन और दुग्ध ग्रंथियों से दूध के स्राव को प्रेरित करता है। वेसोप्रेसिन मुख्यतः वृक्क की दूरस्थ संवलित नलिका से जल एवं आयनों के पुनरावशोषण को प्रेरित करता है, जिससे मूत्र के साथ जल का ह्रास (डाइयूरेसिस) कम हो — इसीलिए इसे प्रतिमूत्रल हार्मोन या एंटी-डाइयूरेटिक हार्मोन (ADH) भी कहते हैं। ADH के संश्लेषण अथवा स्रवण को प्रभावित करने वाली विकृति के परिणामस्वरूप वृक्क की जल-संरक्षण क्षमता में ह्रास होता है, जिससे जल का ह्रास एवं निर्जलीकरण हो जाता है — इस अवस्थिति को उदकमेह (डायबिटीज़ इन्सीपिडस) कहते हैं।
NEET फोकस — पीयूष हार्मोन विकारों का जाल
  • जाइगेंटिज्म (बचपन में GH अधिक) बनाम एक्रोमिगेली (वयस्कता में GH अधिक) — इन दोनों को उलट कर पूछा जाता है, याद रखें: बचपन=lengthwise growth, वयस्क=चेहरे व हाथ-पैर की विकृति।
  • डायबिटीज़ इन्सीपिडस (ADH की कमी) बनाम डायबिटीज़ मेलिटस (इंसुलिन की कमी) — दोनों एकदम अलग विकार हैं पर नाम की समानता से confusion होता है।
  • कुल 6 अग्र पीयूष हार्मोन में से 2 गोनेडोट्रोपिन (LH व FSH) हैं और 1 (ACTH) एड्रीनल वल्कुट को नियंत्रित करता है — यह "ट्रॉफिक हार्मोन" वर्गीकरण objective प्रश्न में आता है।

4 पिनियल व थायरॉइड ग्रंथि

जैविक घड़ी व उपापचय की नियंत्रक ग्रंथियाँ

पिनियल ग्रंथि

पिनियल ग्रंथि अग्र मस्तिष्क के पृष्ठीय (ऊपरी) भाग में स्थित होती है। पिनियल ग्रंथि मेलेटोनिन हार्मोन स्रावित करती है। मेलेटोनिन हमारे शरीर की दैनिक लय (24 घंटे) के नियमन का एक महत्वपूर्ण कार्य करता है — उदाहरण के लिए यह सोने-जागने के चक्र एवं शरीर के तापक्रम को नियंत्रित करता है। इन सबके अतिरिक्त मेलेटोनिन उपापचय, वर्णकता, मासिक (आर्तव) चक्र व प्रतिरक्षा क्षमता को भी प्रभावित करता है।

थायरॉइड ग्रंथि

थायरॉइड ग्रंथि श्वास नली के दोनों ओर स्थित दो पालियों से बनी होती है। दोनों पालियाँ संयोजी ऊतक की पतली पल्लीनुमा इस्थमस से जुड़ी होती हैं। प्रत्येक थायरॉइड ग्रंथि पुटकों और भरण ऊतकों की बनी होती है। प्रत्येक थायरॉइड पुटक एक गुहा को घेरे पुटक कोशिकाओं से निर्मित होता है। ये पुटक कोशिकाएँ दो हार्मोन, टेट्राआयडोथायरोनीनस (T₄) अथवा थायरोक्सीन तथा ट्राईआइडोथायरोनीन (T₃) का संश्लेषण करती हैं। थायरॉइड हार्मोन के सामान्य दर से संश्लेषण के लिए आयोडीन आवश्यक है।

हमारे भोजन में आयोडीन की कमी से अवथायरॉइडता एवं थायरॉइड ग्रंथि की वृद्धि हो जाती है, जिसे साधारणतया गलगंड (गॉइटर) कहते हैं। गर्भावस्था के समय अवथायरॉइडता के कारण गर्भ में विकसित हो रहे बालक की वृद्धि विकृत हो जाती है — इससे बच्चे की अवरोधित वृद्धि (क्रिटेनिज्म) या वामनता तथा मंदबुद्धि, त्वचा असामान्यता, मूक बधिरता आदि हो जाती हैं। वयस्क स्त्रियों में अवथायराइडता मासिक चक्र को अनियमित कर देता है। थायरॉइड ग्रंथि के कैंसर अथवा इसमें गाँठों की वृद्धि से थायरॉइड हार्मोन के संश्लेषण की दर असामान्य रूप से अधिक हो जाती है — इस स्थिति को थायरॉइड अतिक्रियता कहते हैं, जो शरीर की कार्यिकी पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

थायरॉइड हार्मोन आधारीय उपापचयी दर के नियमन में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ये हार्मोन लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया में भी सहायता करते हैं। थायरॉइड हार्मोन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के उपापचय (संश्लेषण और विखंडन) को भी नियंत्रित करते हैं। जल और विद्युत उपघट्यों का नियमन भी थायरॉइड हार्मोन प्रभावित करते हैं। थायरॉइड ग्रंथि से एक प्रोटीन हार्मोन, थायरोकैल्सिटोनिन (TCT) का भी स्राव होता है जो रक्त में कैल्सियम स्तर को नियंत्रित करता है।

नेत्रोत्सेधी गलगंड (ग्रेव्स रोग) नेत्रोत्सेधी गलगंड (एक्सऑप्थैलमिक ग्वायटर) थायरॉइड अतिक्रियता का एक रूप है। थायरॉइड ग्रंथि में वृद्धि, नेत्र गोलकों का बाहर की ओर उभर आना, आधारी उपापचय दर में वृद्धि एवं भार में ह्रास इसके अभिलक्षण हैं। इसे ग्रेव्स रोग भी कहते हैं।
NEET फोकस — थायरॉइड हार्मोन का पूरा नेटवर्क
  • T₃ और T₄ के संश्लेषण के लिए आयोडीन अनिवार्य है — आयोडीन की कमी से गलगंड होता है, यह fact हर साल पूछा जाता है।
  • क्रिटेनिज्म (जन्मजात/गर्भावस्था में अवथायरॉइडता) बनाम मिक्सिडीमा (वयस्क अवथायरॉइडता) — पाठ में सीधे mixedema शब्द नहीं है पर concept रूप में यह भेद ज़रूरी है।
  • थायरोकैल्सिटोनिन (TCT) रक्त में कैल्सियम स्तर को घटाता है — यह पैराथायरॉइड हार्मोन (जो बढ़ाता है) के विपरीत प्रभाव डालता है, यह antagonism सीधे पूछा जाता है।
  • ग्रेव्स रोग की पहचान: नेत्र गोलकों का उभार + वज़न में कमी + तेज़ उपापचय दर — यह क्लासिक triad बार-बार पूछा जाता है।

5 पैराथायरॉइड व थाइमस ग्रंथि

कैल्सियम नियमन व प्रतिरक्षा-विकास की ग्रंथियाँ

पैराथायरॉइड ग्रंथि

मानव में चार पैराथायरॉइड ग्रंथियाँ, थायरॉइड ग्रंथि की पश्च सतह पर स्थित होती हैं। थायरॉइड ग्रंथि की दो पालियों पर प्रत्येक में एक जोड़ी पैराथायरॉइड ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जो पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH) नामक एक पेप्टाइड हार्मोन का स्राव करती हैं। PTH का स्राव रक्त के साथ परिसंचरित कैल्सियम आयन के द्वारा नियमित होता है।

पैराथायरॉइड हार्मोन रक्त में Ca²⁺ के स्तर को बढ़ाता है। PTH अस्थियों पर कार्य कर अस्थि अवशोषण (विघटन/विखनिजन) प्रक्रम में सहायता करता है। PTH वृक्क नलिकाओं से Ca²⁺ के पुनरावशोषण तथा पचित भोजन से Ca²⁺ के अवशोषण को भी प्रेरित करता है। अतः यह स्पष्ट है कि PTH एक अतिकैल्सियम रक्तता हार्मोन (हाइपरकैल्सेमिक हार्मोन) है, क्योंकि यह रक्त में Ca²⁺ स्तर को बढ़ाता है।

थाइमस ग्रंथि

थाइमस ग्रंथि महाधमनी के उदर पक्ष पर उरोस्थि के पीछे फेफड़ों के बीच स्थित एक पालीयुक्त संरचना है। थाइमस ग्रंथि प्रतिरक्षा तंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह ग्रंथि थाइमोसिन नामक पेप्टाइड हार्मोन का स्राव करती है। थाइमोसिन टी-लिंफोसाइट्स के विभेदीकरण में मुख्य भूमिका निभाते हैं जो कोशिका माध्य प्रतिरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त थाइमोसिन तरल प्रतिरक्षा (ह्यूमोरल इम्युनिटी) के लिए प्रतिजैविक के उत्पादन को भी प्रेरित करते हैं।

बढ़ती उम्र के साथ थाइमस का अपघटन होने लगता है, फलस्वरूप थाइमोसिन का उत्पादन घट जाता है — इसी के परिणामस्वरूप वृद्धों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कमज़ोर पड़ जाती है।

NEET फोकस
  • PTH को "हाइपरकैल्सेमिक हार्मोन" कहा जाता है (रक्त Ca²⁺ बढ़ाता है), जबकि TCT को हाइपोकैल्सेमिक कहा जा सकता है (रक्त Ca²⁺ घटाता है) — दोनों मिलकर Ca²⁺ का संतुलन बनाए रखते हैं।
  • थाइमस बुढ़ापे के साथ अपघटित होती है — इसीलिए वृद्धावस्था में प्रतिरक्षा क्षमता घट जाती है, यह इम्यूनोलॉजी अध्याय के साथ क्रॉस-टॉपिक प्रश्न बनाता है।

6 अधिवृक्क ग्रंथि

"आपातकालीन" व दीर्घकालिक तनाव प्रबंधन ग्रंथि

हमारे शरीर में प्रत्येक वृक्क के अग्र भाग में एक स्थित एक जोड़ी अधिवृक्क ग्रंथियाँ होती हैं। ग्रंथियाँ दो प्रकार के ऊतकों से निर्मित होती हैं। ग्रंथि के बीच में स्थित ऊतक अधिवृक्क मध्यांश और बाहरी ओर स्थित ऊतक अधिवृक्क वल्कुट कहलाता है।

अधिवृक्क मध्यांश — तात्कालिक "फाइट या फ्लाइट" हार्मोन

अधिवृक्क मध्यांश दो प्रकार के हार्मोन का स्राव करता है जिन्हें एड्रिनलीन या एपिनेफ्रीन और नॉरएड्रिनलीन या नारएपिनेफ्रीन कहते हैं। इन्हें सम्मिलित रूप में कैटेकॉलमीनस कहते हैं। एड्रिनलीन और नॉरएड्रिनलीन किसी भी प्रकार के दबाव या आपातकालीन स्थिति में अधिकता में तेजी से स्रावित होते हैं, इसी कारण ये आपातकालीन हार्मोन या युद्ध हार्मोन या फ्लाइट हार्मोन कहलाते हैं।

एड्रिनलीन/नॉरएड्रिनलीन → सतर्कता, पुतलियों का फैलाव, रोंगटे खड़े होना, पसीना, हृदय धड़कन ↑, श्वसन दर ↑, ग्लाइकोजन अपघटन ↑ → रक्त ग्लूकोज ↑

ये हार्मोन सक्रियता (तेज़ी), आँखों की पुतलियों के फैलाव, रोंगटे खड़े होना, पसीना आदि को बढ़ाते हैं। दोनों हार्मोन हृदय की धड़कन, हृदय संकुचन की क्षमता और श्वसन दर को बढ़ाते हैं। कैटेकोलएमीन, ग्लाइकोजन के विखंडन को भी प्रेरित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। साथ ही ये लिपिड और प्रोटीन के विखंडन को भी प्रेरित करते हैं।

अधिवृक्क वल्कुट — तीन परतें, कई स्टीरॉयड हार्मोन

अधिवृक्क वल्कुट को तीन परतों में विभाजित किया जा सकता है — जोना रेटिक्यूलेरिस (आंतरिक परत), जोना फेसिक्यूलेटा (मध्य परत) और जोना ग्लोमेरूलोसा (बाहरी परत)। अधिवृक्क वल्कुट कई हार्मोन का स्राव करता है जिन्हें सम्मिलित रूप से कॉर्टिकोस्टीरॉइड हार्मोन या कॉर्टिकॉइड कहते हैं।

वर्गमुख्य उदाहरणमुख्य कार्य
ग्लूकोकॉर्टिकॉइडकॉर्टिसॉलकार्बोहाइड्रेट उपापचय, प्रतिशोथ क्रिया
मिनरलोकॉर्टिकॉइडएल्डोस्टीरॉनजल-विद्युत अपघट्य संतुलन

जो कॉर्टिकोस्टीरॉइड कार्बोहाइड्रेट के उपापचय में संलग्न होते हैं, ग्लूकोकॉर्टिकॉइड कहलाते हैं — हमारे शरीर में कॉर्टिसॉल मुख्य ग्लूकोकॉर्टिकॉइड है। जल और विद्युत अपघट्यों का संतुलन करने वाले कॉर्टिकोस्टीरॉइड, मिनरलोकॉर्टिकॉइड्स कहलाते हैं — हमारे शरीर में एल्डोस्टीरॉन मुख्य मिनरलोकॉर्टिकॉइड है।

ग्लूकोकॉर्टिकॉइड ग्लाइकोजन संश्लेषण, ग्लूकोनियोजिनेसिस, वसा अपघटन और प्रोटीन अपघटन को प्रेरित करते हैं तथा एमीनो अम्लों के कोशिकीय ग्रहण और उपयोग को अवरोधित करते हैं। कॉर्टिसॉल, हृदय संवहनी तंत्र के रखरखाव तथा वृक्क की क्रियाओं में भी संलग्न होता है। ग्लूकोकॉर्टिकोइड एवं विशेष रूप से कॉर्टिसाल प्रतिशोथ प्रतिक्रियाओं को प्रेरित करता है तथा प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया को अवरोधित करता है। कॉर्टिसाल लाल रुधिर कणिकाओं के उत्पादन को भी प्रेरित करता है।

एल्डोस्टीरॉन मुख्यतः वृक्क नलिकाओं पर कार्य करता है और Na⁺ एवं जल के पुनरावशोषण तथा K⁺ व फॉस्फेट आयन के उत्सर्जन को प्रेरित करता है। इस प्रकार एल्डोस्टीरॉन, वैद्युत अपघट्यों, शरीर द्रव के आयतन, परासरणी दाब और रक्त दाब को बनाए रखने में सहायक होता है।

एडीसन रोग एड्रीनल वल्कुट द्वारा हार्मोन के अल्प स्रावण के कारण कार्बोहाइड्रेट उपापचय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण अत्यंत दुर्बलता एवं थकावट का अनुभव होता है तथा एडीसन रोग हो जाता है। एड्रीनल वल्कुट द्वारा कुछ मात्रा में एंडोजेनिक स्टीराइड का भी स्राव होता है जो यौवनारंभ के समय अक्षीय रोम, जघन रोम, तथा मुख (आनन) रोम की वृद्धि में भूमिका अदा करते हैं।
NEET फोकस — अधिवृक्क ग्रंथि की पूरी संरचना याद रखने का तरीका
  • अधिवृक्क वल्कुट की तीन परतें (बाहर से भीतर): जोना ग्लोमेरूलोसा → जोना फेसिक्यूलेटा → जोना रेटिक्यूलेरिस — इन्हें क्रम में याद रखना ज़रूरी है, संक्षेप याद करें: "GFR" (Glomerulosa-Fasciculata-Reticularis, बाहर से भीतर)।
  • कैटेकोलएमीन = अधिवृक्क मध्यांश से, कॉर्टिकोस्टीरॉइड = अधिवृक्क वल्कुट से — यह भेद स्थान व स्रावित हार्मोन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • कॉर्टिसॉल एक प्रतिशोथ (anti-inflammatory) हार्मोन है, इसलिए चिकित्सा में स्टेरॉयड (कॉर्टिसॉल-समान) का उपयोग सूजन कम करने के लिए किया जाता है — यह क्लिनिकल-relevance वाला प्रश्न है।
  • एडीसन रोग = कॉर्टिकोस्टीरॉइड की कमी, कुशिंग सिंड्रोम (पाठ में सीधे नहीं है पर सामान्य ज्ञान में पूछा जा सकता है) = कॉर्टिसॉल की अधिकता।

7 अग्नाशय

रक्त शर्करा नियमन की केंद्रीय ग्रंथि

अग्नाशय एक संयुक्त ग्रंथि है जो अंतःस्रावी और बहिःस्रावी दोनों के रूप में कार्य करती है। अंतःस्रावी अग्नाशय 'लैंगरहैंस द्वीपों' से निर्मित होता है। साधारण मनुष्य के अग्नाशय में लगभग 10 से 20 लाख लैंगरहैंस द्वीप होते हैं जो अग्नाशयी ऊतकों का 1 से 2 प्रतिशत होता है। प्रत्येक लैंगरहैंस द्वीप में मुख्य रूप से दो प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें α और β कोशिकाएँ कहते हैं। α कोशिकाएँ ग्लूकागॉन तथा β कोशिकाएँ इंसुलिन हार्मोन का स्राव करती हैं।

हार्मोनस्रावित कोशिकामुख्य लक्ष्यप्रभाव
ग्लूकागॉनα कोशिकाएँयकृत कोशिकाएँग्लाइकोजन अपघटन → रक्त ग्लूकोज बढ़ता है (हाइपरग्लाइसीमिक)
इंसुलिनβ कोशिकाएँहिपेटोसाइट, एडीपोसाइटग्लूकोज अभिग्रहण → रक्त ग्लूकोज घटता है (हाइपोग्लासीमिक)

ग्लूकागॉन एक पेप्टाइड हार्मोन है जो सामान्य रक्त शर्करा स्तर के नियमन में मुख्य भूमिका निभाता है। ग्लूकागॉन मुख्य रूप से यकृत कोशिकाओं पर कार्य कर ग्लाइकोजन अपघटन को प्रेरित करता है जिसके फलस्वरूप रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त यह ग्लूकोनियोजिनेसिस की प्रक्रिया को भी प्रेरित करता है जिससे कि हाइपरग्लाइसिमिया (अति ग्लूकोज रक्तता) होती है। ग्लूकागॉन कोशिकीय शर्करा के अभिग्रहण और उपयोग को कम करता है — अतः ग्लूकागॉन हाइपरग्लाइसिमिक हार्मोन है।

इंसुलिन भी एक प्रोटीन हार्मोन है जो ग्लूकोज समस्थापन के नियमन में मुख्य भूमिका निभाता है। इंसुलिन मुख्यतः हिपेटोसाइट और एडीपोसाइट पर कार्य करता है और कोशिकीय ग्लूकोज अभिग्रहण और उपयोग को बढ़ाता है — इसके फलस्वरूप ग्लूकोज तीव्रता से रक्त हिपेटोसाइट और एडीपोसाइट में जाता है और रक्त शर्करा का स्तर कम (हाइपोग्लासीमिया) हो जाता है। इंसुलिन लक्ष्य कोशिकाओं में ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की प्रक्रिया को भी प्रेरित करता है। रक्त में ग्लूकोज समस्थापन का नियमन सम्मिलित रूप से दो हार्मोन इंसुलिन और ग्लूकागॉन द्वारा होता है।

मधुमेह (डायबिटीज़ मेलिटस) लंबी अवधि तक हाइपरग्लाइसीमिया (अति ग्लूकोज रक्तता) होने पर डायबिटीज़ मेलिटस (मधुमेह) बीमारी हो जाती है, जो मूत्र के साथ शर्करा का ह्रास और हानिकारक पदार्थों जैसे कीटोन बॉडीज़ के निर्माण से जुड़ी है। मधुमेह के मरीज़ों का इंसुलिन द्वारा सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है।
NEET फोकस
  • α कोशिकाएँ = ग्लूकागॉन (हाइपरग्लाइसीमिक), β कोशिकाएँ = इंसुलिन (हाइपोग्लासीमिक) — इन दोनों को उलट कर पूछा जाना सबसे common trap है।
  • लैंगरहैंस द्वीप अग्नाशयी ऊतक का केवल 1–2% बनाते हैं, फिर भी ये रक्त शर्करा नियमन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।
  • अग्नाशय एक मिश्रित ग्रंथि (heterocrine gland) है — बहिःस्रावी (पाचक एंजाइम) व अंतःस्रावी (हार्मोन) दोनों कार्य करती है — यह fact हमेशा पूछा जाता है।

8 वृषण व अंडाशय — जनन ग्रंथियाँ

प्राथमिक लैंगिक अंग व द्वितीयक अंतःस्रावी अंग

वृषण

एंड्रोजन व टेस्टोस्टेरॉनलेडिंग कोशिकाएँ

नर में उदर गुहा (पेडू) के बाहर वृषण कोष में एक जोड़ी वृषण स्थित होते हैं। वृषण प्राथमिक लैंगिक अंग के साथ ही अंतःस्रावी ग्रंथि के रूप में भी कार्य करता है। वृषण शुक्रजनक नलिका और भरण या अंतराली ऊतक का बना होता है। लेडिंग कोशिकाएँ या अंतराली कोशिकाएँ अंतरनलिकीय स्थानों में उपस्थित होती हैं और एंड्रोजन या नर हार्मोन तथा टेस्टोस्टेरॉन प्रमुख हार्मोन का स्राव करती हैं।

एंड्रोजन नर के सहायक जनन अंगों जैसे कि एपीडिडाईमस, शुक्रवाहिका, सेमिनल वेसीकल, प्रोस्टेट ग्रंथि, यूरिथ्रा आदि के परिवर्धन, परिपक्वन और क्रियाओं का नियमन करते हैं। ये हार्मोन पेशीय वृद्धि, मुख और अक्षीय रोम की वृद्धि, क्रोधात्मकता, निम्न स्वरमान या आवाज़ इत्यादि को उत्तेजित करते हैं। एंड्रोजन शुक्राणु निर्माण की प्रक्रिया में प्रेरक भूमिका निभाते हैं। एंड्रोजन केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर कार्य कर नर लैंगिक व्यवहार (लिबिडो) को प्रभावित करता है। ये हार्मोन प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट उपापचय पर उपाचयी प्रभाव डालते हैं।

अंडाशय

एस्ट्रोजेन व प्रोजेस्टेरॉनग्राफियन पुटिका

मादाओं के उदर में अंडाशय का एक युग्म (जोड़ा) होता है। अंडाशय एक प्राथमिक मादा लैंगिक अंग है जो प्रत्येक मासिक चक्र में एक अंडे को उत्पादित करते हैं। इसके अतिरिक्त अंडाशय दो प्रकार के स्टीरॉइड हार्मोन समूहों का भी उत्पादन करते हैं, जिन्हें एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरॉन कहते हैं। अंडाशय अंडपुटक और भरण ऊतक का बना होता है। एस्ट्रोजेन का संश्लेषण एवं स्राव प्रमुख रूप से परिवर्धित हो रहे अंडाशयी पुटकों द्वारा होता है। अंडोत्सर्ग के पश्चात विखंडित पुटिका, कॉर्पसल्यूटियम में बदल जाता है जो कि मुख्यतया प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन का स्राव करता है।

एस्ट्रोजेन स्त्रियों में द्वितीयक लैंगिक अंगों की वृद्धि तथा क्रियाओं का प्रेरण, अंडाशयी पुटिकाओं का परिवर्धन, द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का प्रकटन (जैसे उच्च आवाज़ की स्वरमान), स्तन ग्रंथियों का परिवर्धन इत्यादि अनेक क्रियाएँ करते हैं। एस्ट्रोजेन स्त्रियों के लैंगिक व्यवहार का नियामक भी है। प्रोजेस्टेरॉन प्रसवता में सहायक होते हैं — प्रोजेस्टेरॉन दुग्ध ग्रंथियों पर भी कार्य कर के दुग्ध संग्रह कूपिकाओं के निर्माण और दुग्ध के स्राव में सहायता करते हैं।

NEET फोकस
  • वृषण की लेडिंग (इंटरस्टिशियल) कोशिकाएँ टेस्टोस्टेरॉन स्रावित करती हैं — शुक्रजनक नलिका स्वयं शुक्राणु बनाती है, हार्मोन नहीं — यह भेद सीधे पूछा जाता है।
  • अंडोत्सर्ग के बाद बची पुटिका कॉर्पस ल्यूटियम में बदलती है, जो मुख्यतः प्रोजेस्टेरॉन स्रावित करती है — यह प्रजनन जीव विज्ञान अध्याय से क्रॉस-टॉपिक प्रश्न है।
  • दोनों जनन ग्रंथियाँ (वृषण, अंडाशय) "गोनैड्स" कहलाती हैं और ये पीयूष के LH व FSH द्वारा नियंत्रित होती हैं — यह पूरी feedback chain (हाइपोथैलेमस → पीयूष → गोनैड) परीक्षा में एकीकृत रूप से पूछी जाती है।

9 हृदय, वृक्क और जठर-आंत्रीय पथ के हार्मोन

गैर-पारंपरिक अंतःस्रावी अंग जो हार्मोन बनाते हैं

अब तक आप अंतःस्रावी ग्रंथियों और उनके हार्मोन के बारे में समझ चुके होंगे। यद्यपि पहले इंगित किया जा चुका है कि हार्मोन का स्राव कुछ अन्य अंगों द्वारा भी होता है जो अंतःस्रावी ग्रंथियाँ नहीं हैं। उदाहरण के लिए हृदय की अलिंद भित्ति द्वारा एक पेप्टाइड हार्मोन का स्राव होता है, जिसे एट्रियल नेट्रियुरेटिक कारक (ANF) कहते हैं — यह रक्त दाब को कम करता है। जब रक्त दाब बढ़ जाता है, तो ANF के स्राव और इसकी क्रिया के फलस्वरूप रक्त वाहिकाएँ विस्फारित हो जाती हैं तथा रक्त दाब कम हो जाता है।

वृक्क की जक्स्टाग्लोमेरूलर कोशिकाएँ, इरिथ्रोपोइटिन नामक हार्मोन का उत्पादन करती हैं जो रक्तांणु उत्पत्ति (आरबीसी के निर्माण) को प्रेरित करता है।

जठर-आंत्रीय हार्मोनकार्य
गैस्ट्रिनजठर ग्रंथियों पर कार्य कर हाइड्रोक्लोरिक अम्ल व पेप्सिनोजेन के स्राव को प्रेरित करता है
सेक्रेटिनबहिःस्रावी अग्नाशय पर कार्य कर जल तथा बाइकार्बोनेट आयनों के स्राव को प्रेरित करता है
कोलिसिस्टोकाइनिन (CCK)अग्नाशय व पित्ताशय दोनों पर कार्य कर अग्नाशयी एंजाइम व पित्त रस के स्राव को प्रेरित करता है
जठर अवरोधी पेप्टाइड (GIP)जठर स्राव और उसकी गतिशीलता को अवरुद्ध करता है

अनेक अन्य ऊतक, जो अंतःस्रावी नहीं हैं, कई हार्मोन का स्राव करते हैं जिन्हें वृद्धिकारक कहते हैं। ये वृद्धिकारक, ऊतकों की सामान्य वृद्धि और उनकी मरम्मत और पुनर्जनन के लिए आवश्यक हैं।

NEET फोकस
  • ANF हृदय की अलिंद भित्ति से स्रावित होता है और रक्तदाब कम करता है — यह रेनिन-एंजियोटेंसिन तंत्र (जो रक्तदाब बढ़ाता है) का प्राकृतिक विरोधी माना जाता है, cross-chapter प्रश्न (उत्सर्जन अध्याय से) में आता है।
  • इरिथ्रोपोइटिन वृक्क से स्रावित होता है और RBC निर्माण को प्रेरित करता है — यह हेमेटोलॉजी से जुड़ा क्रॉस-टॉपिक बिंदु है।
  • जठर-आंत्रीय 4 हार्मोन (गैस्ट्रिन, सेक्रेटिन, CCK, GIP) में से केवल GIP जठर स्राव को रोकता है, बाकी तीनों उत्तेजक हैं — यह विषम प्रश्न में आ सकता है।

10 हार्मोन क्रिया की क्रियाविधि

झिल्ली ग्राही बनाम अंतराकोशिकीय ग्राही

हार्मोन लक्ष्य ऊतकों पर उपस्थित हार्मोनग्राही विशिष्ट प्रोटीन से जुड़कर अपना प्रभाव डालते हैं। लक्ष्य कोशिका झिल्लियों पर उपस्थित हार्मोनग्राही, झिल्ली योजित ग्राही, और कोशिका के अंदर उपस्थित ग्राही अंतराकोशिकीयग्राही कहलाते हैं, जिसमें से अधिकांश केंद्रकीय ग्राही (केंद्रक में उपस्थित) होते हैं।

हार्मोन, ग्राहियों के साथ जुड़कर हार्मोनग्राही सम्मिश्र का निर्माण करते हैं। प्रत्येक ग्राही सिर्फ एक हार्मोन के लिए विशिष्ट होता है, अतः ग्राही विशिष्ट होते हैं। हार्मोनग्राही सम्मिश्र के बनने से लक्ष्य ऊतक में कुछ जैव रासायनिक परिवर्तन होते हैं — अतः लक्ष्य ऊतक में उपापचय एवं कार्यिकी का नियमन हार्मोन द्वारा होता है।

रासायनिक प्रकृति के आधार पर हार्मोन को समूहों में विभाजित किया जा सकता है:

  • पेप्टाइड, पॉलीपेप्टाइड, प्रोटीन हार्मोन (जैसे इंसुलिन, ग्लूकागॉन, पीयूष ग्रंथि हार्मोन, हाइपोथैलेमिक हार्मोन इत्यादि)
  • स्टीरॉइड (उदाहरण के लिए कोटीसोल, टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्राडायोल और प्रोजेस्टेरॉन)
  • आयोडोथाइरोनिन (थायराइड हार्मोन)
  • अमीनो अम्लों के व्युत्पन्न (उदाहरण के लिए एपीनेफ्रीन)
झिल्ली-योजित ग्राही हार्मोन → द्वितीयक संदेशवाहक (चक्रीय AMP, IP₃, Ca²⁺) → अंतःकोशिकीय उपापचय नियमन
अंतराकोशिकीय ग्राही हार्मोन → हार्मोनग्राही सम्मिश्र + जीनोम → जीन अभिव्यक्ति नियमन

जो हार्मोन झिल्ली योजित ग्राहियों से क्रिया करते हैं वे साधारणतया लक्ष्य कोशिकाओं में प्रवेश नहीं कर पाते हैं, लेकिन द्वितीयक संदेशवाहकों का उत्पादन कर (जैसे कि चक्रीय AMP, IP₃, Ca²⁺ आदि) अंततः कोशिकीय उपापचय का नियमन करते हैं। अंतरकोशिकीय ग्राहियों से क्रिया करने वाले हार्मोन (जैसे स्टीरॉइड हार्मोन, आयोडोथाइरोनिन आदि) हार्मोनग्राही सम्मिश्र एवं जीनोम के पारस्परिक क्रिया से जीन की अभिव्यक्ति अथवा गुणसूत्र क्रिया का नियमन करते हैं। संयुक्त जैव-रासायनिक क्रियाएँ शरीर की कार्यिकी तथा वृद्धि को प्रभावित करती हैं।

NEET फोकस — हार्मोन क्रिया की क्रियाविधि (बहुत महत्वपूर्ण topic)
  • पेप्टाइड/प्रोटीन हार्मोन पानी में घुलनशील होने के कारण कोशिका झिल्ली पार नहीं कर पाते — इसलिए ये झिल्ली-योजित ग्राहियों से जुड़ते हैं और द्वितीयक संदेशवाहक (second messenger) मार्ग का उपयोग करते हैं।
  • स्टीरॉइड हार्मोन वसा में घुलनशील होने के कारण सीधे कोशिका झिल्ली पार कर भीतर प्रवेश कर सकते हैं — इसलिए ये अंतराकोशिकीय (मुख्यतः केंद्रकीय) ग्राहियों से जुड़कर सीधे जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।
  • द्वितीयक संदेशवाहक के उदाहरण: चक्रीय AMP (cAMP), IP₃, Ca²⁺ — ये सीधे objective प्रश्न में पूछे जाते हैं।
  • यह concept endocrinology के हर प्रश्न की नींव है — पेप्टाइड बनाम स्टीरॉइड हार्मोन के क्रिया-तंत्र का भेद बार-बार दोहराया जाता है।

NEET फैक्ट-शीट — एक नज़र में

परीक्षा से ठीक पहले रिवीज़न के लिए संकलित प्रमुख तथ्य

ग्रंथि / हार्मोनप्रमुख तथ्य
हाइपोथैलेमस7 मुक्तकारी + 3 निरोधी हार्मोन
अग्र पीयूष हार्मोनGH, PRL, TSH, ACTH, LH, FSH (6 हार्मोन)
पश्च पीयूष हार्मोनऑक्सीटॉसिन, वेसोप्रेसिन (ADH) — हाइपोथैलेमस में बनते हैं
GH अधिकता (बचपन) / कमी (बचपन)जाइगेंटिज्म / पिट्यूटरी ड्वार्फिज्म
GH अधिकता (वयस्क)एक्रोमिगेली
ADH कमीडायबिटीज़ इन्सीपिडस (उदकमेह)
पिनियल हार्मोनमेलेटोनिन — दैनिक लय (सर्केडियन रिदम) नियंत्रण
थायरॉइड हार्मोनT₃, T₄ (आयोडीन आवश्यक), TCT (Ca²⁺ घटाता है)
आयोडीन कमीगलगंड (गॉइटर), क्रिटेनिज्म (गर्भावस्था में)
थायरॉइड अतिक्रियताग्रेव्स रोग / नेत्रोत्सेधी गलगंड
पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH)Ca²⁺ बढ़ाता है (हाइपरकैल्सेमिक)
थाइमोसिनT-लिंफोसाइट विभेदीकरण
अधिवृक्क मध्यांशएड्रिनलीन, नॉरएड्रिनलीन (कैटेकोलएमीन)
अधिवृक्क वल्कुट परतें (बाहर→भीतर)ग्लोमेरूलोसा → फेसिक्यूलेटा → रेटिक्यूलेरिस
ग्लूकोकॉर्टिकॉइड / मिनरलोकॉर्टिकॉइडकॉर्टिसॉल / एल्डोस्टीरॉन
अधिवृक्क हार्मोन कमीएडीसन रोग
अग्नाशय α / β कोशिकाएँग्लूकागॉन (हाइपरग्लाइसीमिक) / इंसुलिन (हाइपोग्लासीमिक)
इंसुलिन कमीडायबिटीज़ मेलिटस (मधुमेह)
वृषण हार्मोनटेस्टोस्टेरॉन (लेडिंग कोशिकाओं से)
अंडाशय हार्मोनएस्ट्रोजेन (पुटिका से), प्रोजेस्टेरॉन (कॉर्पस ल्यूटियम से)
ANFहृदय अलिंद से, रक्तदाब घटाता है
इरिथ्रोपोइटिनवृक्क से, RBC निर्माण प्रेरित करता है
जठर-आंत्रीय हार्मोनगैस्ट्रिन, सेक्रेटिन, CCK, GIP
पेप्टाइड हार्मोन क्रियाविधिझिल्ली ग्राही → द्वितीयक संदेशवाहक (cAMP, IP₃, Ca²⁺)
स्टीरॉइड हार्मोन क्रियाविधिअंतराकोशिकीय (केंद्रकीय) ग्राही → जीन अभिव्यक्ति नियमन

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय (रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण) से विगत वर्षों में आए प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 निम्नलिखित में से कौन सा हार्मोन पीयूष ग्रंथि के अग्र भाग से स्रावित नहीं होता — (a) GH (b) FSH (c) ऑक्सीटॉसिन (d) ACTH।

उत्तर: (c) ऑक्सीटॉसिन।

ऑक्सीटॉसिन वास्तव में हाइपोथैलेमस द्वारा संश्लेषित होता है और पश्च पीयूष ग्रंथि (न्यूरोहाइपोफाइसिस) केवल इसका संग्रहण व स्राव करती है, संश्लेषण नहीं। GH, FSH व ACTH तीनों अग्र पीयूष (एडिनोहाइपोफाइसिस) से संश्लेषित व स्रावित होते हैं। यह "स्रावित बनाम संग्रहित" वाला भेद NEET का सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला ट्रैप है।

2 वृद्धि हार्मोन (GH) की अधिकता से बचपन में तथा वयस्कता में क्रमशः कौन सी अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं?

उत्तर: बचपन में — जाइगेंटिज्म (अतिकायकता); वयस्कता में — एक्रोमिगेली (अतिकायता, विशेषतः चेहरे व हाथ-पैर की विकृति)।

यह भेद इसलिए बनता है क्योंकि बचपन में एपिफाइसियल ग्रोथ प्लेट अभी बंद नहीं हुई होती, इसलिए हड्डियाँ लंबाई में बढ़ती हैं; वयस्कता में ग्रोथ प्लेट बंद हो चुकी होती है, इसलिए वृद्धि केवल चौड़ाई/मोटाई में (चेहरे, हाथ, पैर की हड्डियों में) होती है। NEET में इन दोनों नामों को उलट कर पूछना बहुत आम है।

3 ADH (वेसोप्रेसिन) की कमी से होने वाला विकार तथा इंसुलिन की कमी से होने वाला विकार — दोनों में क्या अंतर है, यद्यपि दोनों के नाम में "डायबिटीज़" शब्द समान है?

उत्तर: ADH की कमी से डायबिटीज़ इन्सीपिडस (उदकमेह) होता है — इसमें अत्यधिक तनु (dilute) मूत्र बनता है व निर्जलीकरण होता है, रक्त शर्करा सामान्य रहती है। इंसुलिन की कमी से डायबिटीज़ मेलिटस (मधुमेह) होता है — इसमें रक्त शर्करा असामान्य रूप से बढ़ जाती है (हाइपरग्लाइसीमिया) और मूत्र में ग्लूकोज उत्सर्जित होने लगता है।

यह दोनों नामों की समानता के कारण NEET का सबसे classic confusion-trap प्रश्न है — एक वृक्क/पीयूष से जुड़ा है, दूसरा अग्नाशय से।

4 थायरॉइड हार्मोन (T₃, T₄) के संश्लेषण के लिए कौन सा तत्व आवश्यक है, तथा इसकी कमी से गर्भावस्था के दौरान कौन सी अवस्था उत्पन्न होती है?

उत्तर: आयोडीन आवश्यक है; गर्भावस्था के दौरान इसकी कमी से गर्भस्थ शिशु में क्रिटेनिज्म (अवरोधित वृद्धि/वामनता तथा मंदबुद्धि) उत्पन्न होता है।

वयस्क में आयोडीन की कमी से गलगंड (गॉइटर) होता है, जबकि गर्भावस्था में यह कमी शिशु की मानसिक व शारीरिक वृद्धि को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकती है — यह दोनों परिणामों (वयस्क बनाम गर्भस्थ शिशु) का भेद NEET में अलग-अलग पूछा जाता है।

5 थायरोकैल्सिटोनिन (TCT) व पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH) रक्त कैल्सियम स्तर पर विपरीत प्रभाव कैसे डालते हैं?

उत्तर: PTH रक्त Ca²⁺ स्तर को बढ़ाता है (हाइपरकैल्सेमिक), जबकि TCT रक्त Ca²⁺ स्तर को घटाता है (हाइपोकैल्सेमिक) — दोनों मिलकर शरीर में कैल्सियम का संतुलन बनाए रखते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि TCT थायरॉइड ग्रंथि से स्रावित होता है, न कि पैराथायरॉइड से — यह नाम की समानता (दोनों में "थायरॉइड" शब्द) के कारण छात्रों को भ्रमित करता है, इसलिए NEET में यह भेद बार-बार जाँचा जाता है।

6 अधिवृक्क वल्कुट की तीन परतें बाहर से भीतर की ओर किस क्रम में व्यवस्थित हैं, तथा प्रत्येक परत मुख्यतः कौन सा हार्मोन-वर्ग स्रावित करती है?

उत्तर: बाहर से भीतर — जोना ग्लोमेरूलोसा (मिनरलोकॉर्टिकॉइड जैसे एल्डोस्टीरॉन) → जोना फेसिक्यूलेटा (ग्लूकोकॉर्टिकॉइड जैसे कॉर्टिसॉल) → जोना रेटिक्यूलेरिस (कुछ एंडोजेनिक स्टीरॉइड)।

इस क्रम को अक्सर उलट कर या परत-हार्मोन जोड़ी बदल कर पूछा जाता है — याद रखने का सूत्र "GFR" (Glomerulosa-Fasciculata-Reticularis, बाहर से भीतर की दिशा में) उपयोगी है।

7 अग्नाशय के लैंगरहैंस द्वीपों की α व β कोशिकाएँ क्रमशः कौन सा हार्मोन स्रावित करती हैं, और इनका रक्त शर्करा पर प्रभाव क्या है?

उत्तर: α कोशिकाएँ — ग्लूकागॉन (रक्त शर्करा बढ़ाता है, हाइपरग्लाइसीमिक); β कोशिकाएँ — इंसुलिन (रक्त शर्करा घटाता है, हाइपोग्लासीमिक)।

यह α/β व उनके हार्मोन-प्रभाव को उलट कर पूछना NEET का सबसे आम ट्रैप-प्रश्न है — याद रखें, वर्णानुक्रम में α पहले आता है और ग्लूकागॉन भी शर्करा को "बढ़ाकर" पहले क्रम (अधिकता) की दिशा में काम करता है, इस स्मृति-सूत्र से भ्रम से बचा जा सकता है।

8 वृषण की कौन सी कोशिकाएँ टेस्टोस्टेरॉन का स्राव करती हैं, तथा अंडाशय में अंडोत्सर्ग के बाद बची पुटिका किसमें बदलकर कौन सा हार्मोन स्रावित करती है?

उत्तर: वृषण में लेडिंग (इंटरस्टिशियल) कोशिकाएँ टेस्टोस्टेरॉन स्रावित करती हैं; अंडोत्सर्ग के बाद बची पुटिका कॉर्पस ल्यूटियम में बदलकर मुख्यतः प्रोजेस्टेरॉन स्रावित करती है।

शुक्रजनक नलिका स्वयं शुक्राणु उत्पन्न करती है, हार्मोन नहीं — यह भेद (शुक्रजनक नलिका बनाम लेडिंग कोशिकाएँ) NEET में बार-बार पूछा जाता है। इसी तरह अंडाशयी पुटिका (एस्ट्रोजेन) व कॉर्पस ल्यूटियम (प्रोजेस्टेरॉन) के हार्मोन को भी उलट कर पूछा जाता है।

9 पेप्टाइड हार्मोन व स्टीरॉइड हार्मोन की क्रियाविधि में मूल अंतर क्या है, और यह अंतर किस भौतिक गुण पर आधारित है?

उत्तर: पेप्टाइड हार्मोन जल-घुलनशील होने के कारण कोशिका झिल्ली पार नहीं कर पाते, इसलिए झिल्ली-योजित ग्राहियों से जुड़कर द्वितीयक संदेशवाहक (cAMP, IP₃, Ca²⁺) मार्ग से कार्य करते हैं। स्टीरॉइड हार्मोन वसा-घुलनशील होने के कारण सीधे कोशिका झिल्ली पार कर भीतर प्रवेश करते हैं तथा अंतराकोशिकीय (मुख्यतः केंद्रकीय) ग्राहियों से जुड़कर सीधे जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।

यह घुलनशीलता-आधारित भेद (water-soluble vs lipid-soluble) endocrinology के हर वर्ष के NEET प्रश्नों की नींव है — इसे कभी भूलना नहीं चाहिए।

10 हृदय व वृक्क द्वारा स्रावित हार्मोन कौन से हैं, तथा इनका रक्तदाब/रक्तांणु उत्पत्ति पर क्या प्रभाव है?

उत्तर: हृदय की अलिंद भित्ति — एट्रियल नेट्रियुरेटिक कारक (ANF), जो रक्तदाब को घटाता है; वृक्क की जक्स्टाग्लोमेरूलर कोशिकाएँ — इरिथ्रोपोइटिन, जो RBC निर्माण (रक्तांणु उत्पत्ति) को प्रेरित करता है।

यह याद रखना ज़रूरी है कि ये दोनों अंग परंपरागत अंतःस्रावी ग्रंथियाँ नहीं हैं, फिर भी हार्मोन स्रावित करते हैं — NEET में इसे अक्सर "गैर-पारंपरिक अंतःस्रावी अंग पहचानो" वाले प्रश्न में पूछा जाता है।

अन्य NEET तथ्य

इस अध्याय से जुड़े कुछ अतिरिक्त सूक्ष्म तथ्य, जो ऊपर के अनुभागों में विस्तार से नहीं आए

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय (रासायनिक समन्वय एवं एकीकरण) NEET में लगभग हर वर्ष 2-3 प्रश्न देता है — सबसे अधिक बार दोहराया जाने वाला प्रारूप हार्मोन-ग्रंथि-कार्य सुमेलन तथा विकार-आधारित (जैसे अधिक/कम स्राव) प्रश्न है।
तथ्य
  • हार्मोन की आधुनिक परिभाषा — "सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न अपोषक (non-nutrient) रसायन जो अंतरकोशिकीय संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं" — यह पुरानी परिभाषा ("अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा रक्त में स्रावित रसायन") से भिन्न है; दोनों परिभाषाओं को अदल-बदल कर पूछा जाना आम है।
तथ्य
  • पीयूष ग्रंथि का स्थान — सेला टर्सिका नामक अस्थिल गुहा में स्थित होती है तथा एक वृंत द्वारा हाइपोथैलेमस से जुड़ी रहती है — इसे "मास्टर ग्लैंड" भी कहा जाता है, क्योंकि यह अन्य कई ग्रंथियों (थायरॉइड, अधिवृक्क वल्कुट, गोनैड्स) को ट्रॉफिक हार्मोन के ज़रिए नियंत्रित करती है।
तुलनात्मक
  • हाइपोथैलेमो-पीयूष निवाहिका तंत्र — केवल अग्र पीयूष ग्रंथि को नियंत्रित करता है; पश्च पीयूष सीधे तंत्रिकाक्ष द्वारा नियंत्रित होती है (हाइपोथैलेमस के न्यूक्ली से सीधा तंत्रिका संबंध) — यह "पोर्टल सिस्टम बनाम प्रत्यक्ष तंत्रिका मार्ग" वाला सूक्ष्म भेद है।
तथ्य
  • ऑक्सीटॉसिन व वेसोप्रेसिन दोनों नॉनापेप्टाइड (9 एमीनो अम्लों से बने) हार्मोन हैं, जिनका संश्लेषण हाइपोथैलेमस में होता है — दोनों की संरचना में केवल दो एमीनो अम्लों का अंतर होता है, फिर भी इनके कार्य पूर्णतः भिन्न (क्रमशः पेशी-संकुचन व जल-पुनरावशोषण) हैं।
तथ्य
  • पार्स इंटरमीडिया का एकमात्र हार्मोन — मेलानोसाइट प्रेरक हार्मोन (MSH), जो त्वचा की वर्णकता (मेलानोसाइट्स पर क्रिया) का नियमन करता है — मानव में यह भाग पार्स डिस्टेलिस से लगभग जुड़ा होता है, इसलिए वयस्क मनुष्यों में इसकी क्रियाशीलता सीमित मानी जाती है।
तथ्य
  • वृद्धि हार्मोन (GH) की क्रियाविधि अप्रत्यक्ष है — यह सीधे अस्थियों पर कार्य करने की बजाय यकृत को सोमेटोमेडिन (IGF-1) नामक मध्यस्थ कारक स्रावित करने हेतु प्रेरित करता है, और यही सोमेटोमेडिन वास्तव में अस्थि-वृद्धि को उत्तेजित करता है — इसलिए बचपन में एपिफाइसियल प्लेट के जुड़ने से पहले GH अधिकता से जाइगेंटिज्म (लंबाई में वृद्धि) तथा प्लेट जुड़ने के बाद वयस्कों में केवल एक्रोमिगेली (चेहरे-हाथ-पैर की विकृति) होती है।
तुलनात्मक
  • T₄ बनाम T₃ — थायरॉइड ग्रंथि से मात्रा में सबसे अधिक T₄ (थायरॉक्सीन) स्रावित होता है, परंतु परिधीय ऊतकों में इसका रूपांतरण होकर बना T₃ जैविक रूप से कहीं अधिक सक्रिय (potent) होता है — "अधिक मात्रा = अधिक सक्रिय" वाली धारणा यहाँ ग़लत साबित होती है।
तथ्य
  • नेत्रोत्सेधी गलगंड (ग्रेव्स रोग) — थायरॉइड अतिक्रियता का एक विशेष रूप है, जिसमें नेत्र गोलकों का बाहर उभरना, आधारी उपापचय दर में वृद्धि व भार में कमी तीनों लक्षण एक साथ पाए जाते हैं — यह triad अक्सर case-based प्रश्न में पूछी जाती है।
तुलनात्मक
  • PTH की कमी बनाम अधिकता — PTH की कमी (हाइपोपैराथायरॉइडिज़्म) से रक्त-कैल्सियम स्तर घट जाता है (हाइपोकैल्सेमिया), जिससे पेशीय ऐंठन (टेटनी) हो सकती है; जबकि PTH की अधिकता से रक्त-कैल्सियम बढ़ता है (हाइपरकैल्सेमिया) व अस्थियाँ कमज़ोर होती हैं — दोनों विपरीत विकृतियों को अलग-अलग पहचानें।
तथ्य
  • थाइमस ग्रंथि की उम्र के साथ अपघटन — बढ़ती उम्र के साथ थाइमस का आकार व थाइमोसिन उत्पादन घटता जाता है, जिसके कारण वृद्धावस्था में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से कमज़ोर पड़ जाती है — यह प्रतिरक्षा विज्ञान (immunology) अध्याय से जुड़ा एक क्रॉस-टॉपिक तथ्य है।
तुलनात्मक
  • मिनरैलोकॉर्टिकॉइड बनाम ग्लूकोकॉर्टिकॉइड — एल्डोस्टीरॉन मिनरैलोकॉर्टिकॉइड वर्ग का है (मुख्यतः वैद्युत-अपघट्य व जल संतुलन नियंत्रित करता है), जबकि कॉर्टिसॉल ग्लूकोकॉर्टिकॉइड वर्ग का है (मुख्यतः उपापचय व शोथ-विरोधी क्रिया करता है) — दोनों ही अधिवृक्क वल्कुट से स्रावित होते हैं, पर अलग-अलग उप-वर्गों के हैं। एडीसन रोग इन्हीं वल्कुटीय हार्मोन की कमी से होता है।
तथ्य
  • कैटेकोलएमीन का "फाइट या फ्लाइट" प्रभाव — एड्रिनलीन व नॉरएड्रिनलीन दोनों हृदय-दर, श्वसन-दर व ग्लाइकोजन अपघटन बढ़ाते हैं, जिससे शरीर आपातकालीन स्थिति के लिए तुरंत तैयार हो जाता है — इसलिए इन्हें "आपातकालीन हार्मोन" या "युद्ध हार्मोन" भी कहा जाता है।
तुलनात्मक
  • FSH बनाम LH का नर में लक्ष्य — कभी न उलझाएँ — नर में FSH मुख्यतः वृषण की सर्टोली कोशिकाओं पर कार्य कर शुक्रजनन को सहायता देता है, जबकि LH मुख्यतः लेडिंग (अंतराली) कोशिकाओं पर कार्य कर टेस्टोस्टेरॉन के स्रवण को प्रेरित करता है — दोनों गोनैडोट्रोपिन एक ही नलिका पर नहीं, बल्कि अलग-अलग कोशिका-प्रकारों पर कार्य करते हैं।
तथ्य
  • hCG (मानव कोरिओनिक गोनेडोट्रोपिन) — यह एक शास्त्रीय अंतःस्रावी ग्रंथि से नहीं बल्कि अपरा (प्लेसेंटा) से स्रावित होता है तथा गर्भावस्था के आरंभिक चरण में कॉर्पस ल्यूटियम को बनाए रखता है — यह जनन-तंत्र अध्याय से जुड़ा एक बार-बार पूछा जाने वाला क्रॉस-टॉपिक तथ्य है।
तुलनात्मक
  • इंसुलिन — रक्त-शर्करा घटाने वाला एकमात्र प्रमुख हार्मोन — जहाँ ग्लूकागॉन, कॉर्टिसॉल, एड्रिनलीन व वृद्धि हार्मोन (GH) — ये सभी रक्त-शर्करा को बढ़ाते हैं (हाइपरग्लाइसीमिक), वहीं इंसुलिन अकेला ऐसा हार्मोन है जो इसे घटाता है (हाइपोग्लासीमिक) — यह "odd one out" वाला वर्गीकरण प्रश्न बहुत बार पूछा जाता है।
तथ्य
  • जठर-आंत्रीय हार्मोन में एकमात्र निरोधक हार्मोन — जठर अवरोधी पेप्टाइड (GIP) जठर स्राव व उसकी गतिशीलता को रोकता है, जबकि गैस्ट्रिन, सेक्रेटिन व कोलिसिस्टोकाइनिन (CCK) तीनों उत्तेजक (stimulatory) प्रभाव डालते हैं — "कौन सा अलग है" वाला odd-one-out प्रश्न इसी तथ्य पर आधारित होता है।
तुलनात्मक
  • रासायनिक वर्गीकरण में एपीनेफ्रीन का ट्रैप — पेप्टाइड/प्रोटीन (इंसुलिन, पीयूष हार्मोन), स्टीरॉइड (कॉर्टिसॉल, टेस्टोस्टेरॉन, एस्ट्राडायोल), आयोडोथाइरोनिन (T₃/T₄) — इन तीन वर्गों के विपरीत एपीनेफ्रीन एक एमीनो अम्ल व्युत्पन्न (amino acid derivative) हार्मोन है, न कि पेप्टाइड — इसे प्रोटीन-वर्ग में रख देना एक सामान्य त्रुटि है।
रणनीति
  • दोहराव के लिए सबसे प्रभावी रणनीति — रोज़ एक बार ग्रंथि-हार्मोन-कार्य सुमेलन तालिका व एक बार विकार-जोड़े (जाइगेंटिज्म-एक्रोमिगेली, डायबिटीज़ इन्सीपिडस-मेलिटस, हाइपो-हाइपर पैराथायरॉइडिज़्म, एडीसन-कुशिंग) दोहराएँ — इसी अध्याय के अधिकांश ट्रैप प्रश्न इन्हीं दो श्रेणियों से बनते हैं।

संक्षिप्त सार

हार्मोन व अंतःस्रावी तंत्र

हार्मोन सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न अंतरकोशिकीय संदेशवाहक हैं। अंतःस्रावी तंत्र हाइपोथैलेमस, पीयूष, पिनियल, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, अधिवृक्क, अग्नाशय, थाइमस व जनन ग्रंथियों से मिलकर बनता है।

पीयूष ग्रंथि

अग्र पीयूष 6 हार्मोन (GH, PRL, TSH, ACTH, LH, FSH) स्रावित करती है; पश्च पीयूष हाइपोथैलेमस द्वारा बने ऑक्सीटॉसिन व वेसोप्रेसिन का संग्रहण-स्रवण करती है।

थायरॉइड व पैराथायरॉइड

T₃/T₄ उपापचय दर नियंत्रित करते हैं (आयोडीन आवश्यक)। PTH व TCT मिलकर रक्त Ca²⁺ का संतुलन बनाए रखते हैं।

अधिवृक्क ग्रंथि

मध्यांश तात्कालिक तनाव हार्मोन (कैटेकोलएमीन) बनाता है; वल्कुट दीर्घकालिक कॉर्टिकोस्टीरॉइड (ग्लूकोकॉर्टिकॉइड व मिनरलोकॉर्टिकॉइड) बनाता है।

अग्नाशय व जनन ग्रंथियाँ

इंसुलिन-ग्लूकागॉन रक्त शर्करा नियंत्रित करते हैं। वृषण टेस्टोस्टेरॉन व अंडाशय एस्ट्रोजेन-प्रोजेस्टेरॉन स्रावित करते हैं।

हार्मोन क्रियाविधि

पेप्टाइड हार्मोन झिल्ली-ग्राही व द्वितीयक संदेशवाहक से कार्य करते हैं; स्टीरॉइड हार्मोन सीधे अंतराकोशिकीय ग्राही से जुड़कर जीन नियमन करते हैं।

? प्रश्न-उत्तर

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प्रश्न 1 निम्नलिखित की परिभाषा लिखिए:
उत्तर

(अ) बहिःस्रावी ग्रंथियाँ — वे ग्रंथियाँ जिनमें नलिकाएँ होती हैं और जो अपने स्राव को नलिकाओं के ज़रिए सीधे किसी सतह या गुहा में मुक्त करती हैं, बहिःस्रावी ग्रंथियाँ कहलाती हैं — जैसे स्वेद ग्रंथि, लार ग्रंथि।

(ब) अंतःस्रावी ग्रंथियाँ — वे ग्रंथियाँ जिनमें कोई नलिका नहीं होती और जो अपने स्राव (हार्मोन) को सीधे रक्त में मुक्त करती हैं, जिससे वे रक्त द्वारा दूरस्थ लक्ष्य अंग तक पहुँच जाते हैं, अंतःस्रावी या नलिकाविहीन ग्रंथियाँ कहलाती हैं।

(स) हार्मोन — हार्मोन सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होने वाले अपोषक रसायन हैं जो अंतरकोशिकीय संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं और लक्ष्य अंग/ऊतक की क्रियाओं का नियमन करते हैं।

प्रश्न 2 हमारे शरीर में पाई जाने वाली अंतःस्रावी ग्रंथियों की स्थिति चित्र बनाकर प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर

यह एक चित्रात्मक प्रश्न है। चित्र में मानव शरीर की रूपरेखा बनाकर निम्न ग्रंथियों को उनके स्थान पर चिह्नित करना चाहिए — मस्तिष्क में हाइपोथैलेमस, पिनियल व पीयूष ग्रंथि; गर्दन में थायरॉइड व पैराथायरॉइड; वक्ष में थाइमस (उरोस्थि के पीछे); उदर में अग्नाशय, वृक्क के ऊपर अधिवृक्क ग्रंथि; तथा पेडू क्षेत्र में नर में वृषण और मादा में अंडाशय।

प्रश्न 3 निम्न द्वारा स्रवित हार्मोन का नाम लिखिए:
उत्तर

(अ) हाइपोथैलेमस — मुक्तकारी व निरोधी हार्मोन (जैसे गोनेडोट्रोफिन मुक्तकारी हार्मोन, सोमेटोस्टेटिन); साथ ही ऑक्सीटॉसिन व वेसोप्रेसिन का संश्लेषण भी यहीं होता है।

(ब) पीयूष ग्रंथि — GH, PRL, TSH, ACTH, LH, FSH, MSH (अग्र भाग से); ऑक्सीटॉसिन व वेसोप्रेसिन का संग्रहण-स्रवण (पश्च भाग से)।

(स) थायरॉइड — T₃ (ट्राईआइडोथायरोनीन), T₄ (थायरोक्सीन), थायरोकैल्सिटोनिन (TCT)।

(द) पैराथायरॉइड — पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH)।

(य) अधिवृक्क ग्रंथि — एड्रिनलीन व नॉरएड्रिनलीन (मध्यांश से); ग्लूकोकॉर्टिकॉइड (कॉर्टिसॉल) व मिनरलोकॉर्टिकॉइड (एल्डोस्टीरॉन) तथा कुछ एंडोजेनिक स्टीराइड (वल्कुट से)।

(र) अग्नाशय — इंसुलिन (β कोशिकाओं से) व ग्लूकागॉन (α कोशिकाओं से)।

(ल) वृषण — एंड्रोजन/टेस्टोस्टेरॉन (लेडिंग कोशिकाओं से)।

(व) अंडाशय — एस्ट्रोजेन व प्रोजेस्टेरॉन।

(श) थायमस — थाइमोसिन।

(स) एट्रियम — एट्रियल नेट्रियुरेटिक कारक (ANF)।

(ष) वृक्क — इरिथ्रोपोइटिन।

(ह) जठर-आंत्रीय पथ — गैस्ट्रिन, सेक्रेटिन, कोलिसिस्टोकाइनिन (CCK), जठर अवरोधी पेप्टाइड (GIP)।

प्रश्न 4 रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए — हार्मोन व उसकी लक्ष्य ग्रंथि:
उत्तर

(अ) हाइपोथैलेमिक हार्मोन — लक्ष्य ग्रंथि: पीयूष ग्रंथि (विशेषतः अग्र पीयूष)।

(ब) थायरोट्रॉफिन (TSH) — लक्ष्य ग्रंथि: थायरॉइड ग्रंथि।

(स) कॉर्टिकोट्रॉफिन (ACTH) — लक्ष्य ग्रंथि: अधिवृक्क वल्कुट।

(द) गोनेडोट्रोपिन (LH, FSH) — लक्ष्य ग्रंथि: जनन ग्रंथियाँ (वृषण/अंडाशय)।

(य) मेलानोट्रोफिन (MSH) — लक्ष्य ऊतक: त्वचा की मेलानोसाइट कोशिकाएँ।

प्रश्न 5 निम्नलिखित हार्मोन के कार्यों के बारे में टिप्पणी लिखिए:
उत्तर

(अ) पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH) — यह रक्त में Ca²⁺ के स्तर को बढ़ाता है। यह अस्थियों पर कार्य कर अस्थि अवशोषण (विखनिजन) को प्रेरित करता है, वृक्क नलिकाओं से Ca²⁺ के पुनरावशोषण को बढ़ाता है, तथा पचित भोजन से Ca²⁺ के अवशोषण को भी प्रेरित करता है — इसीलिए इसे हाइपरकैल्सेमिक हार्मोन कहा जाता है।

(ब) थायरॉइड हार्मोन — आधारीय उपापचयी दर के नियमन में मुख्य भूमिका निभाते हैं, लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में सहायक होते हैं, कार्बोहाइड्रेट-प्रोटीन-वसा के उपापचय को नियंत्रित करते हैं तथा जल व विद्युत उपघट्यों का नियमन भी करते हैं।

(स) थाइमोसिन — T-लिंफोसाइट्स के विभेदीकरण में मुख्य भूमिका निभाता है, जो कोशिका-माध्य प्रतिरक्षा के लिए आवश्यक है, तथा तरल प्रतिरक्षा हेतु प्रतिजैविक (एंटीबॉडी) के उत्पादन को भी प्रेरित करता है।

(द) एंड्रोजन — नर के सहायक जनन अंगों के परिवर्धन व परिपक्वन का नियमन करता है, द्वितीयक लैंगिक लक्षण (पेशीय वृद्धि, दाढ़ी-मूँछ, आवाज़ में बदलाव) उत्पन्न करता है, शुक्राणु निर्माण को प्रेरित करता है, तथा नर लैंगिक व्यवहार (लिबिडो) को नियंत्रित करता है।

(य) एस्ट्रोजेन — स्त्रियों में द्वितीयक लैंगिक अंगों की वृद्धि व क्रियाओं को प्रेरित करता है, अंडाशयी पुटिकाओं के परिवर्धन में सहायक है, द्वितीयक लैंगिक लक्षणों को प्रकट करता है, तथा स्त्रियों के लैंगिक व्यवहार का नियामक है।

(र) इंसुलिन एवं ग्लूकागॉन — इंसुलिन कोशिकीय ग्लूकोज अभिग्रहण व उपयोग बढ़ाकर रक्त शर्करा घटाता है (हाइपोग्लासीमिक); ग्लूकागॉन यकृत में ग्लाइकोजन अपघटन व ग्लूकोनियोजिनेसिस बढ़ाकर रक्त शर्करा बढ़ाता है (हाइपरग्लाइसीमिक) — दोनों मिलकर रक्त ग्लूकोज का संतुलन बनाए रखते हैं।

प्रश्न 6 निम्न के उदाहरण दीजिए:
उत्तर

(अ) हाइपरग्लाइसीमिक हार्मोन एवं हाइपोग्लासीमिक हार्मोन — ग्लूकागॉन (हाइपरग्लाइसीमिक — रक्त शर्करा बढ़ाता है) एवं इंसुलिन (हाइपोग्लासीमिक — रक्त शर्करा घटाता है)।

(ब) हाइपर कैल्सीमिक हार्मोन — पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH)।

(स) गोनेडोट्रॉफिक हार्मोन — ल्यूटीनाइजिंग हार्मोन (LH) व पुटिका प्रेरक हार्मोन (FSH)।

(द) प्रोजेस्टेशनल हार्मोन — प्रोजेस्टेरॉन।

(य) रक्तदाब निम्नकारी हार्मोन — एट्रियल नेट्रियुरेटिक कारक (ANF)।

(र) एंड्रोजन एवं एस्ट्रोजेन — एंड्रोजन का उदाहरण टेस्टोस्टेरॉन (वृषण से) है; एस्ट्रोजेन का उदाहरण एस्ट्राडायोल (अंडाशय से) है।

प्रश्न 7 निम्नलिखित विकार किस हार्मोन की कमी के कारण होते हैं:
उत्तर

(अ) डायबिटीज़ (मधुमेह) — इंसुलिन की कमी (या इसकी क्रिया में प्रतिरोध) के कारण होता है, जिससे रक्त शर्करा का स्तर लंबे समय तक असामान्य रूप से अधिक बना रहता है।

(ब) गॉइटर (गलगंड) — थायरॉइड हार्मोन (T₃, T₄) की कमी के कारण होता है, जो मुख्यतः भोजन में आयोडीन की कमी से उत्पन्न होती है।

(स) क्रेटीनिज़्म — गर्भावस्था के दौरान माँ में थायरॉइड हार्मोन की कमी (अवथायरॉइडता) के कारण गर्भस्थ शिशु में होता है, जिससे बच्चे की वृद्धि व मानसिक विकास बाधित होता है।

प्रश्न 8 FSH की कार्यविधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर

पुटिका प्रेरक हार्मोन (FSH) अग्र पीयूष ग्रंथि से स्रावित एक गोनेडोट्रॉफिक हार्मोन है। नरों में यह शुक्रजनक नलिकाओं पर कार्य करके शुक्रजनन (शुक्राणु निर्माण) की प्रक्रिया को नियंत्रित व प्रेरित करता है। मादाओं में FSH अंडाशयी पुटिकाओं (फॉलिकल्स) की वृद्धि और परिवर्धन को प्रेरित करता है, जिससे पुटिका परिपक्व होकर ग्राफियन पुटिका बनती है — यह प्रक्रिया अंततः अंडोत्सर्ग की तैयारी में सहायक होती है। इस तरह FSH दोनों लिंगों में जनन ग्रंथियों की क्रियाशीलता को सीधे नियंत्रित करता है।

प्रश्न 9 निम्नलिखित के जोड़े बनाइए:
उत्तर
स्तंभ Iस्तंभ IIसंबंध का स्पष्टीकरण
T₄थायरॉइडT₄ (थायरोक्सीन) थायरॉइड ग्रंथि की पुटक कोशिकाओं से संश्लेषित होता है।
PTHपैराथायरॉइडपैराथायरॉइड हार्मोन (PTH) पैराथायरॉइड ग्रंथि से स्रावित होता है।
गोनेडोट्रॉफिक रिलीज़िंग हार्मोनहाइपोथैलेमसयह हार्मोन हाइपोथैलेमस से स्रावित होकर पीयूष ग्रंथि को गोनेडोट्रोपिन स्राव के लिए प्रेरित करता है।
ल्यूटिनाइजिंग हार्मोनपीयूष ग्रंथिल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH) अग्र पीयूष ग्रंथि से स्रावित एक गोनेडोट्रॉफिक हार्मोन है।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री मानव अंतःस्रावी तंत्र की हर ग्रंथि, उसके हार्मोन, उनके विशिष्ट कार्यों तथा जुड़े हुए विकारों को सरल व मौलिक भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी तथ्य-बॉक्स, तुलनात्मक तालिकाएँ व प्रश्नोत्तर भी शामिल किए गए हैं।

शरीर के भीतर बिना किसी तार या नली के चल रहा यह रासायनिक संवाद ही जीवन की हर लय को थामे रखता है।

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