गमन एवं संचलन — सम्पूर्ण अध्ययन
जीव विज्ञान • अध्याय 17

गमन एवं संचलन

कोशिकीय स्तर की महीन गति से लेकर पूरे शरीर के स्थानांतरण तक — पेशियों की सूक्ष्म संरचना, सर्पीतंतु सिद्धांत, मानव कंकाल तंत्र, संधियों के प्रकार तथा जुड़े हुए प्रमुख विकारों का विस्तृत व परीक्षा-केंद्रित विवेचन।

★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 गति व गमन — बुनियादी समझ

हर जीवधारी की एक सार्वभौमिक विशेषता

संचलन (गति) समस्त जीवधारियों की एक सर्वव्यापी विशेषता है। जंतुओं व पादपों दोनों में अनगिनत प्रकार की गति देखने को मिलती है। सबसे सरल उदाहरण अमीबा जैसे एककोशिक जीव का है, जिसमें जीवद्रव्य का प्रवाही संचलन होता है। कई सूक्ष्मजीव पक्ष्माभ, कशाभ अथवा स्पर्शक के ज़रिए गति प्रदर्शित करते हैं, जबकि मनुष्य अपने पाद, जबड़े, पलक व जिह्वा जैसे अंगों को सचेत रूप से गतिशील कर सकता है।

जब किसी गति में जीव के स्थान अथवा अवस्थिति में परिवर्तन होता है, और यह गति ऐच्छिक (स्वेच्छा से नियंत्रित) होती है, तो इसे विशेष रूप से गमन कहा जाता है। टहलना, दौड़ना, चढ़ना, उड़ना और तैरना — ये सभी गमन के अलग-अलग रूप हैं, जो मूलतः गति (संचलन) की ही व्यापक श्रेणी में आते हैं।

एक ज़रूरी सूक्ष्म भेद चलन (संचलन) के लिए ज़िम्मेदार संरचनाएँ हमेशा अन्य कार्यों में शामिल संरचनाओं से अलग नहीं होतीं। जैसे पैरामिशियम में पक्ष्माभ भोजन को कोशिका-ग्रसनी तक पहुँचाने तथा चलन — दोनों कार्य एक साथ करते हैं। इसी तरह हाइड्रा अपने स्पर्शक का उपयोग शिकार पकड़ने और चलने, दोनों उद्देश्यों के लिए करता है। मनुष्य भी अपने पाद का उपयोग शरीर की मुद्रा बदलने के साथ-साथ चलने के लिए भी करता है — इसीलिए गति व चलन का पृथक अध्ययन संभव नहीं है। एक व्यापक सिद्धांत यही है: सभी चलन (गमन) गति के अंतर्गत आते हैं, लेकिन सभी गति चलन नहीं होतीं।

जंतुओं में गमन के तरीके परिस्थितियों की माँग व आवास के अनुरूप बदलते रहते हैं। फिर भी अधिकांश मामलों में गमन की क्रिया मुख्यतः भोजन, आश्रय, साथी, अनुकूल प्रजनन-स्थल, अनुकूल प्राकृतिक परिस्थिति की तलाश या शत्रुओं/भक्षियों से बचने के मकसद से की जाती है।

NEET फोकस
  • याद रखें: "सभी संचलन (locomotion) गति हैं, पर सभी गति संचलन नहीं" — यह लाइन सीधे कथन आधारित प्रश्न में पूछी जाती है।
  • पैरामिशियम व हाइड्रा के उदाहरण अक्सर "dual-function structure" (दोहरे कार्य वाली संरचना) के concept में पूछे जाते हैं।

2 गति के प्रकार

अमीबीय, पक्ष्माभी व पेशीय — तीन मुख्य श्रेणियाँ

मानव शरीर की कोशिकाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की गति प्रदर्शित करती हैं — अमीबीय, पक्ष्माभी व पेशीय। पक्ष्माभ व कशाभिका दोनों ही कोशिका झिल्ली की अपवृद्धि (आउटग्रोथ) होते हैं। कशाभिकीय गति शुक्राणुओं को तैरने में सहायता करती है, स्पंज के नाल तंत्र में जल संचारण को बनाए रखती है, तथा यूग्लीना जैसे प्रोटोजोआ में चलन का काम करती है।

अमीबीय गति

हमारे शरीर में कुछ विशिष्ट कोशिकाएँ — जैसे महाभक्षकाणु (मैक्रोफेज) व श्वेताणु (ल्यूकोसाइट्स) — रुधिर में अमीबीय गति प्रदर्शित करती हैं। यह क्रिया जीवद्रव्य के प्रवाही स्वभाव द्वारा कूकूट पाद (स्यूडोपोडिया) बनाकर की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे अमीबा गति करता है। कोशिका कंकाल तंत्र के घटक, जैसे सूक्ष्मतंतु, भी इस अमीबीय गति में सहयोगी होते हैं।

पक्ष्माभी गति

हमारे अधिकांश नलिकाकार अंग, जिनकी भीतरी सतह पक्ष्माभ-युक्त उपभित्ति से आस्तारित होती है, पक्ष्माभी गति दर्शाते हैं। श्वास नली में पक्ष्माभों की समन्वित गति वायुमंडलीय वायु के साथ भीतर आने वाले धूल-कणों व बाहरी पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होती है। इसी तरह मादा प्रजनन मार्ग में डिंब का परिवहन भी पक्ष्माभी गति की मदद से ही संभव होता है।

पेशीय गति

हमारे पादों, जबड़ों व जिह्वा जैसे अंगों की गति के लिए पेशीय गति अनिवार्य है। पेशियों के संकुचन के गुण का प्रभावी उपयोग मनुष्य व अधिकांश बहुकोशिकीय जीवों में चलन तथा अन्य प्रकार की गतियों में होता है। किसी भी चलन के लिए पेशीय, कंकालीय व तंत्रिका तंत्र की पूर्ण समन्वित क्रिया आवश्यक होती है।

3 पेशी — प्रकार व मूल संरचना

शरीर के भार का लगभग आधा हिस्सा पेशियों का

पेशी एक विशेष प्रकार का ऊतक है जिसकी उत्पत्ति भ्रूण के मध्यजनस्तर से होती है। एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य के कुल शारीरिक भार का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा पेशियों का ही होता है। पेशियों में कई विशिष्ट गुण पाए जाते हैं — उत्तेजनशीलता, संकुचनशीलता, प्रसार्यता व प्रत्यास्थता।

पेशियों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है, जैसे उनका स्थापन (कहाँ स्थित हैं), उनका रंग-रूप, तथा उनकी क्रिया के नियमन की पद्धति। स्थापन के आधार पर पेशियाँ तीन प्रकार की होती हैं — कंकाल पेशी, अंतरंग पेशी तथा हृद पेशी।

पेशी प्रकारस्थानरंग-रूपनियंत्रण
कंकाल पेशीकंकाल अवयवों के निकट संपर्क मेंरेखितऐच्छिक (तंत्रिका तंत्र द्वारा स्वेच्छा से नियंत्रित)
अंतरंग पेशी (चिकनी)खोखले अंतरंग अंगों (आहार नाल, जनन मार्ग) की भीतरी भित्तिअरेखितअनैच्छिक
हृद पेशीहृदय की भित्तिरेखित व शाखितअनैच्छिक

कंकाल पेशियाँ शारीरिक कंकाल अवयवों के निकट संपर्क में होती हैं। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर इनमें साफ धारियाँ दिखाई देती हैं, इसीलिए इन्हें रेखित पेशी भी कहा जाता है। चूँकि इनकी क्रियाओं का तंत्रिका तंत्र द्वारा ऐच्छिक नियंत्रण होता है, इसलिए इन्हें ऐच्छिक पेशी भी कहते हैं। ये मुख्य रूप से चलन-क्रिया व शारीरिक मुद्रा बदलने में सहायक होती हैं।

अंतरंग पेशियाँ शरीर के खोखले अंतरंग अंगों — जैसे आहार नाल, जनन मार्ग आदि — की भीतरी भित्ति में स्थित होती हैं। ये अरेखित व चिकनी दिखाई देती हैं, इसीलिए इन्हें चिकनी पेशी (अरेखित पेशी) भी कहा जाता है। इनकी क्रिया तंत्रिका तंत्र के ऐच्छिक नियंत्रण में नहीं होती, इसलिए ये अनैच्छिक पेशियाँ कहलाती हैं। ये पाचन मार्ग द्वारा भोजन के तथा जनन मार्ग द्वारा युग्मक (गैमीट) के संचरण में मदद करती हैं।

हृद पेशियाँ हृदय की पेशियाँ हैं। अनेक हृद-पेशी कोशिकाएँ मिलकर एक शाश्वत (स्थायी) रचना में जुड़ी रहती हैं, जो हृद-पेशी का निर्माण करती हैं। रंग-रूप के आधार पर हृद पेशियाँ रेखित होती हैं, लेकिन इनकी क्रिया अनैच्छिक स्वभाव की होती है, क्योंकि तंत्रिका तंत्र इन्हें सीधे नियंत्रित नहीं करता — इनकी लयबद्धता स्वतः उत्पन्न (मायोजेनिक) होती है।

NEET फोकस
  • हृद पेशी की एक अनूठी विशेषता यह है कि यह रेखित होते हुए भी अनैच्छिक है — यह विरोधाभासी तथ्य NEET में सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला बिंदु है।
  • पेशियों की तुलनात्मक विशेषताएँ (रेखित/अरेखित, ऐच्छिक/अनैच्छिक, शाखित/अशाखित) टेबल-आधारित एक-लाइनर प्रश्नों में बार-बार आती हैं।
  • वयस्क शरीर भार में पेशियों का योगदान: 40–50% — सीधे संख्यात्मक प्रश्न में पूछा जा सकता है।

कंकाल पेशी की सूक्ष्म संरचना

प्रत्येक संगठित कंकाल पेशी कई पेशी बंडलों अथवा पूलिकाओं (फैसिकल्स) से बनी होती है, जो संयुक्त रूप से कोलैजनी संयोजी ऊतक की एक परत से घिरी रहती हैं जिसे संपुट (फैसिया) कहते हैं। प्रत्येक पेशी बंडल में कई पेशी रेशे होते हैं। प्रत्येक पेशी रेशा एक विशेष प्लाज़्मा झिल्ली से आस्तारित होता है जिसे सार्कोलेमा कहा जाता है।

पेशी रेशा वास्तव में एक संकोशिका (मल्टीन्यूक्लिएट कोशिका) है, क्योंकि इसके पेशीद्रव्य (सार्कोप्लाज़्म) में कई केंद्रक पाए जाते हैं। पेशी रेशों की अंतःद्रव्य जालिका, यानी पेशीद्रव्य जालिका (सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम), कैल्सियम आयनों का भंडार-गृह होती है। पेशी रेशे की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसके भीतर पेशीद्रव्य में समांतर रूप से व्यवस्थित अनेक तंतु उपस्थित होते हैं, जिन्हें पेशीतंतु (मायोफिलामेंट) कहते हैं — और इन तंतुओं की छोटी-छोटी इकाइयों को पेशीतंतुक (मायोफाइब्रिल) कहा जाता है।

प्रत्येक पेशी-तंतुक में क्रमवार गहरे व हल्के पट्ट (बैंड) होते हैं। विस्तृत अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि इनका यह रेखित रूप दो प्रमुख संकुचनशील प्रोटीन — एक्टिन व मायोसिन — के विशेष प्रकार के वितरण के कारण बनता है। हल्के बैंडों में एक्टिन प्रोटीन होता है, जिसे I-बैंड या समदैशिक बैंड कहते हैं, जबकि गहरे बैंडों को A-बैंड या विषम दैशिक बैंड कहा जाता है, जिसमें मायोसिन होता है।

दोनों प्रोटीन छड़ जैसी संरचनाओं में परस्पर समांतर तथा पेशी-रेशक के अनुदैर्घ्य अक्ष के भी समांतर व्यवस्थित रहते हैं। एक्टिन तंतु मायोसिन तंतुओं की तुलना में पतले होते हैं, इसीलिए इन्हें क्रमशः पतले व मोटे तंतु कहा जाता है। प्रत्येक I-बैंड के बीचोबीच इसे दो भागों में बाँटने वाली एक प्रत्यास्थ रेखा होती है, जिसे Z-रेखा कहते हैं — पतले तंतु इस Z-रेखा से मज़बूती से जुड़े रहते हैं। A-बैंड के मोटे तंतु, A-बैंड के बीचोबीच स्थित एक पतली रेशेदार झिल्ली — M-रेखा — द्वारा आपस में जुड़े होते हैं।

पेशी रेशों की पूरी लंबाई में A व I बैंड एकांतर क्रम (बारी-बारी) में व्यवस्थित होते हैं। दो लगातार Z-रेखाओं के बीच स्थित पेशी-रेशक का हिस्सा एक संकुचन कार्यात्मक इकाई बनाता है, जिसे सार्कोमियर कहते हैं। विश्राम की अवस्था में, पतले तंतुओं के सिरे दोनों ओर के मोटे तंतुओं के बीच के भाग को छोड़कर अपने स्वतंत्र सिरों पर एक-दूसरे के ऊपर आंशिक रूप से अतिच्छादित होते हैं (यानी पतले तंतुओं के सिरे मोटे तंतुओं के सिरों के बीच के क्षेत्र में पाए जाते हैं)। मोटे तंतुओं का केंद्रीय भाग, जो पतले तंतुओं से अतिच्छादित नहीं होता, H-क्षेत्र कहलाता है।

NEET फोकस — सार्कोमियर आरेख याद रखने का शॉर्टकट
  • A-बैंड (गहरा/dark) = मायोसिन (मोटे तंतु) — इसकी लंबाई संकुचन के दौरान स्थिर रहती है।
  • I-बैंड (हल्का/light) = एक्टिन (पतले तंतु) — संकुचन के दौरान इसकी लंबाई घटती है।
  • Z-रेखा प्रत्येक I-बैंड के बीच में होती है; M-रेखा प्रत्येक A-बैंड के बीच में होती है — दोनों को अक्सर उलट कर पूछा जाता है, सावधान रहें!
  • दो Z-रेखाओं के बीच का भाग = 1 सार्कोमियर (संकुचन की क्रियात्मक इकाई)।
  • H-क्षेत्र संकुचन के समय घटता है और अधिकतम संकुचन पर लुप्त भी हो सकता है।

संकुचनशील प्रोटीन की सूक्ष्म संरचना

प्रत्येक एक्टिन (पतला) तंतु एक-दूसरे के चारों ओर सर्पिल रूप से कुंडलित दो F-एक्टिन (तंतुमय एक्टिन) श्रृंखलाओं से मिलकर बना होता है। प्रत्येक F-एक्टिन वास्तव में गोलाकार G-एक्टिन इकाइयों का एक बहुलक है। इसके साथ एक अन्य प्रोटीन — ट्रोपोमायोसिन — के दो तंतु F-एक्टिन के निकट पूरी लंबाई में फैले रहते हैं। इसके अतिरिक्त एक जटिल ट्रोपोनिन प्रोटीन अणु ट्रोपोमायोसिन पर नियत अंतरालों पर पाया जाता है। विश्राम की अवस्था में ट्रोपोनिन की एक उप-इकाई एक्टिन तंतुओं पर मायोसिन के बंधन बनाने वाले सक्रिय स्थानों को ढककर रखती है।

प्रत्येक मायोसिन (मोटा) तंतु भी एक बहुलक प्रोटीन है। कई एकलकी प्रोटीन इकाइयाँ, जिन्हें मेरोमायोसिन कहते हैं, मिलकर एक मोटा तंतु बनाती हैं। प्रत्येक मेरोमायोसिन के दो महत्वपूर्ण भाग होते हैं — एक छोटी भुजा सहित गोलाकार सिर, तथा एक पूँछ। सिर को भारी मेरोमायोसिन (HMM) और पूँछ को हल्का मेरोमायोसिन (LMM) कहा जाता है। मेरोमायोसिन के अवयव, यानी सिर व छोटी भुजा, नियत दूरी तथा एक निश्चित कोण पर A-तंतु से बाहर की ओर उभरे रहते हैं, जिसे क्रॉस भुजा (क्रॉस-आर्म) कहते हैं। गोलाकार सिर एक सक्रिय एटीपीएज़ एंजाइम है, जिसमें ATP के बंधन का स्थान तथा एक्टिन के लिए सक्रिय स्थान — दोनों मौजूद रहते हैं।

पेशी संकुचन की क्रियाविधि — सर्पीतंतु सिद्धांत

पेशी संकुचन की क्रियाविधि को सर्पीतंतु सिद्धांत (स्लाइडिंग फिलामेंट थ्योरी) द्वारा बेहतर ढंग से समझाया जा सकता है, जिसके अनुसार पेशीय रेशों का संकुचन पतले तंतुओं के मोटे तंतुओं के ऊपर सरकने से होता है — इसमें स्वयं तंतुओं की लंबाई नहीं बदलती, बल्कि वे एक-दूसरे पर सरक कर सार्कोमियर को छोटा कर देते हैं।

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की प्रेरक तंत्रिका द्वारा एक संकेत भेजे जाने से पेशी संकुचन की शुरुआत होती है। एक प्रेरक न्यूरॉन तथा इससे जुड़े पेशीय रेशे मिलकर एक प्रेरक इकाई (मोटर यूनिट) का गठन करते हैं। प्रेरक तंत्रिका-अंत तथा पेशीय रेशे के सार्कोलेमा की संधि को तंत्रिका-पेशी संगम अथवा प्रेरक अंत्य पट्टिका (न्यूरोमस्कुलर जंक्शन) कहते हैं।

तंत्रिका संकेत → एसिटिल कोलिन मुक्त → क्रिया विभव उत्पन्न → Ca²⁺ मुक्त → ट्रोपोनिन-एक्टिन बंधन खुलना → क्रॉस सेतु निर्माण → संकुचन

इस संगम पर एक तंत्रिक संकेत पहुँचने से एक तंत्रिका संचारी (एसिटिल कोलिन) मुक्त होता है, जो सार्कोलेमा में एक क्रिया विभव (एक्शन पोटेंशियल) उत्पन्न करता है। यह विभव पूरे पेशीय रेशे में फैल जाता है, जिससे सार्कोप्लाज़्म में कैल्सियम आयन मुक्त हो जाते हैं। कैल्सियम आयनों के स्तर में हुई इस वृद्धि से एक्टिन तंतु पर मौजूद ट्रोपोनिन की उप-इकाई कैल्सियम से बंध जाती है, जिससे एक्टिन के ढके हुए सक्रिय स्थान खुल जाते हैं।

अब ATP के जल-अपघटन से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग करते हुए मायोसिन के सिर एक्टिन के इन खुले सक्रिय स्थानों से जुड़कर क्रॉस-सेतु (क्रॉस-ब्रिज) बना लेते हैं। इस बंधन के फलस्वरूप जुड़े हुए एक्टिन तंतु A-बैंड के केंद्र की ओर खिंचते हैं। इनसे जुड़ी हुई Z-रेखा भी भीतर की ओर खिंच जाती है, जिससे सार्कोमियर छोटा हो जाता है यानी संकुचित हो जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया से स्पष्ट है कि पेशी के छोटे होने यानी संकुचन के दौरान I-बैंडों की लंबाई घट जाती है, जबकि A-बैंडों की लंबाई पहले जैसी ही बनी रहती है। ADP व अकार्बनिक फॉस्फेट (Pi) मुक्त होने पर मायोसिन सिर पुनः विश्राम अवस्था में लौट जाता है। एक नए ATP अणु के मायोसिन सिर से जुड़ने पर क्रॉस-सेतु टूट जाता है। मायोसिन सिर ATP को अपघटित कर पेशी के आगे संकुचन के लिए यह चक्र दोहराते रहते हैं, परंतु जैसे ही तंत्रिका संवेगी संकेत समाप्त हो जाता है, सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम द्वारा कैल्सियम आयनों के पुनः अवशोषण से एक्टिन के सक्रिय स्थान फिर से ढक जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप Z-रेखाएँ अपने मूल स्थान पर वापस लौट जाती हैं, यानी पेशी शिथिल (रिलैक्स) हो जाती है।

थकान व मायोग्लोबिन — लाल व श्वेत पेशियाँ विभिन्न पेशियों में तंत्रिका उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया की अवधि में अंतर हो सकता है। पेशियों के बार-बार उत्तेजित होने पर उनमें ग्लाइकोजन के अवायवी विखंडन से लैक्टिक अम्ल का जमाव होने लगता है, जिससे थकान (श्रांति) होती है। पेशी में ऑक्सीजन भंडारित करने वाला लाल रंग का एक वर्णक मायोग्लोबिन होता है। जिन पेशियों में मायोग्लोबिन की मात्रा अधिक होती है, वे लाल दिखाई देती हैं — इन्हें लाल पेशियाँ (Type I / धीमी ऑक्सिडेटिव फाइबर) कहा जाता है। इनमें माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या भी अधिक होती है, जो ATP-निर्माण हेतु भंडारित ऑक्सीजन की बड़ी मात्रा का उपयोग कर सकती हैं — इसीलिए इन्हें वायुजीवी पेशियाँ भी कहा जा सकता है। इसके विपरीत, कुछ पेशियों में मायोग्लोबिन की मात्रा बहुत कम होती है, जिससे वे हल्के अथवा श्वेत रंग की दिखती हैं — इन्हें श्वेत पेशियाँ (Type II / तेज़ ग्लाइकोलिटिक फाइबर) कहा जाता है। इनमें माइटोकॉन्ड्रिया अल्पसंख्यक होते हैं, लेकिन पेशीद्रव्य जालिका अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होती है — ये मुख्यतः अवायवीय विधि से ऊर्जा प्राप्त करती हैं।
NEET फोकस
  • क्रॉस-सेतु टूटने के लिए नए ATP का जुड़ना ज़रूरी है — Rigor mortis (शव कठोरता) इसी सिद्धांत पर आधारित है, ATP की अनुपलब्धता के कारण क्रॉस-सेतु नहीं टूटते।
  • संकुचन के तुरंत ट्रिगर के लिए ज़िम्मेदार आयन: Ca²⁺ (न कि Na⁺ या K⁺, जो सार्कोलेमा में क्रिया विभव के लिए ज़िम्मेदार हैं)।
  • ट्रोपोनिन बनाम ट्रोपोमायोसिन: ट्रोपोमायोसिन सक्रिय स्थल को ढकता है, जबकि ट्रोपोनिन कैल्सियम से बंधकर उसे हटाता है — दोनों की भूमिका को उलट कर पूछा जाता है।
  • लाल पेशियाँ = अधिक मायोग्लोबिन + अधिक माइटोकॉन्ड्रिया + वायुजीवी श्वसन। श्वेत पेशियाँ = कम मायोग्लोबिन + अधिक सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम + अवायवीय श्वसन — यह तुलना बार-बार पूछी जाती है।

4 कंकाल तंत्र

206 अस्थियों व उपास्थियों का सुव्यवस्थित ढांचा

कंकाल तंत्र में अस्थियों का एक ढांचा तथा उपास्थियाँ होती हैं। शरीर की गति में इस तंत्र की केंद्रीय भूमिका होती है — ज़रा कल्पना कीजिए, यदि जबड़ों के बिना भोजन चबाना पड़े या पाद अस्थियों के बिना टहलना हो! अस्थि व उपास्थि दोनों ही विशेष प्रकार के संयोजी ऊतक हैं। इनकी आधात्री (मैट्रिक्स) में लवणों की उपस्थिति के कारण अस्थियाँ कठोर होती हैं, जबकि कोंड्रोइटिन लवण उपास्थियों की आधात्री को आनम्य (लचीला) बनाते हैं।

मनुष्य में यह पूरा तंत्र 206 अस्थियों तथा कुछ उपास्थियों से मिलकर बना होता है, और इसे दो प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है — अक्षीय कंकाल एवं उपांगीय कंकाल।

NEET फोकस — कंकाल के संख्यात्मक आंकड़े
  • कुल अस्थियाँ = 206 | अक्षीय कंकाल = 80 | उपांगीय कंकाल = 126
  • करोटि की कुल अस्थियाँ = 22 (कपालीय 8 + आननी 14) — साथ ही 6 कर्ण अस्थिकाएँ व 1 हायॉइड अलग से गिनी जाती हैं (ये 22 में शामिल नहीं)।
  • कशेरुक दंड = 26 कशेरुकाएँ (ग्रीवा 7, वक्षीय 12, कटि 5, त्रिक 1-संयोजित, अनुत्रिक 1-संयोजित)
  • पसलियाँ = 12 जोड़ी (24) — वास्तविक 7 जोड़ी, कूट (asternal) 3 जोड़ी, प्लावी (floating) 2 जोड़ी
  • प्रत्येक पाद में अस्थियाँ = 30 (अग्रपाद व पश्चपाद दोनों में)

अक्षीय कंकाल — करोटि व कशेरुक दंड

अक्षीय कंकाल में 80 अस्थियाँ होती हैं, जो शरीर की मुख्य अक्ष पर वितरित रहती हैं। करोटि, मेरुदंड, उरोस्थि (स्टर्नम) तथा पसलियाँ मिलकर अक्षीय कंकाल का निर्माण करती हैं।

करोटि अस्थियों के दो समुच्चयों — कपालीय (क्रेनियल) व आननी (फेशियल) — से बनी है, जिनका कुल योग 22 है। कपालीय अस्थियों की संख्या 8 होती है, जो मस्तिष्क के लिए एक कठोर रक्षक बाह्य आवरण, यानी कपाल, का निर्माण करती हैं। आननी भाग में 14 कंकालीय अवयव होते हैं, जो करोटि के सामने का चेहरे वाला भाग बनाते हैं।

एक U-आकार की एकल अस्थि हाइऑइड मुख गुहा के ठीक नीचे स्थित होती है। प्रत्येक मध्यकर्ण में तीन बेहद छोटी अस्थियाँ होती हैं — मैलियस, इनकस व स्टेपीज़ — जिन्हें सामूहिक रूप से कर्ण अस्थिकाएँ कहा जाता है। कपाल भाग कशेरुक दंड के अग्र भाग के साथ दो अनुकपाल अस्थिकंदों (ऑसीपिटल कॉन्डाइल्स) की सहायता से जुड़ता है — इसीलिए मानव करोटि को द्विकंदीय (डाइकॉन्डाइलिक) करोटि कहा जाता है।

हमारा कशेरुक दंड क्रम में व्यवस्थित पृष्ठ भाग में स्थित 26 इकाइयों का बना होता है जिन्हें कशेरुक कहते हैं। यह कपाल के आधार से शुरू होकर धड़ भाग का मुख्य ढांचा तैयार करता है। प्रत्येक कशेरुक के बीच का हिस्सा खोखला (तंत्रिकीय नाल) होता है, जिससे होकर मेरुरज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) गुज़रती है। प्रथम कशेरुक को एटलस कहा जाता है, जो अनुकपाल अस्थिकंदों के साथ संधियोजन करता है।

कशेरुक दंड को, कपाल की ओर से गिनना शुरू करने पर, ग्रीवा (7), वक्षीय (12), कटि (5), त्रिक/सैक्रम (1 संयोजित) तथा अनुत्रिक/कॉक्सिक्स (1 संयोजित) कशेरुकाओं में विभेदित किया जाता है। ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या मनुष्य सहित लगभग सभी स्तनधारियों में 7 (सात) ही होती है — यह एक दिलचस्प तथ्य है कि जिराफ़ जैसी लंबी गर्दन वाले स्तनधारी में भी ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या 7 ही रहती है, बस प्रत्येक कशेरुका आकार में लंबी हो जाती है। कशेरुक दंड मेरुरज्जु की रक्षा करता है, सिर का आधार बनता है और पसलियों तथा पीठ की पेशियों के संधि-स्थल का निर्माण करता है।

उरोस्थि (स्टर्नम) वक्ष की मध्य अधर रेखा पर स्थित एक चपटी अस्थि है, जो पसलियों के अग्र सिरों को आपस में जोड़ने का काम करती है।

पसलियाँ, उपांगीय कंकाल व मेखलाएँ

पसलियों की 12 जोड़ियाँ होती हैं। प्रत्येक पसली एक पतली चपटी अस्थि है जो पृष्ठ भाग में कशेरुक दंड और अधर भाग में उरोस्थि के साथ जुड़ी होती है। इसके पृष्ठ सिरे पर दो संधियोजन सतहें होती हैं, जिस कारण इसे द्विशिरस्थ (बाइसेफैलिक) भी कहा जाता है।

प्रथम सात जोड़ी पसलियों को वास्तविक पसलियाँ कहा जाता है — पृष्ठ में ये वक्षीय कशेरुकों से और अधरीय भाग में उरोस्थि से काचाभ उपास्थि (हायलिन कार्टिलेज) की सहायता से सीधे जुड़ी रहती हैं। आठवीं, नौवीं व दसवीं जोड़ी-पसलियाँ उरोस्थि के साथ सीधे संधियोजित नहीं होतीं, बल्कि काचाभ उपास्थि के सहयोग से सातवीं पसली से जुड़ती हैं — इन्हें वर्टिब्रोकॉन्ड्रल (कूट) पसलियाँ कहा जाता है। पसलियों की अंतिम दो जोड़ियाँ (11वीं व 12वीं) अधर में जुड़ी हुई नहीं होतीं, इसीलिए इन्हें प्लावी पसलियाँ (फ्लोटिंग रिब्स) कहा जाता है। वक्षीय कशेरुक, पसलियाँ व उरोस्थि मिलकर पसली पंजर (रिब केज) की संरचना करते हैं, जो हृदय व फेफड़ों जैसे महत्वपूर्ण अंगों की सुरक्षा करता है।

उपांगीय कंकाल — अंसमेखला व अग्रपाद

30 अस्थियाँ प्रति पादह्यूमरस, रेडियस, अल्ना

पादों की अस्थियाँ अपनी मेखला के साथ मिलकर उपांगीय कंकाल बनाती हैं। प्रत्येक पाद में कुल 30 अस्थियाँ होती हैं। अग्रपाद (भुजा) की अस्थियाँ हैं — ह्यूमरस, रेडियस व अल्ना, कार्पल्स (कलाई की अस्थियाँ, संख्या में 8), मेटाकार्पल्स (हथेली की अस्थियाँ, संख्या में 5) और फैलेंजेज़ (अंगुलियों की अस्थियाँ, संख्या में 14)।

अंस (शोल्डर) मेखला अस्थियाँ अक्षीय कंकाल तथा अग्रपाद के बीच संधियोजन में सहायता करती हैं। प्रत्येक अंस मेखला के दो अर्ध भाग होते हैं, और प्रत्येक अर्ध भाग में एक क्लेविकल (जत्रुक/कॉलर बोन) एवं एक स्कैपुला होता है। स्कैपुला वक्ष के पृष्ठ भाग में दूसरी व सातवीं पसली के बीच स्थित एक बड़ी चपटी, त्रिभुजाकार अस्थि है। स्कैपुला के पश्च चपटे त्रिभुजाकार भाग में एक उभार (कंटक) एक विस्तृत चपटे प्रबंध के रूप में होता है जिसे एक्रोमिन कहते हैं, जिसके साथ क्लैविकल संधियोजन करती है। एक्रोमिन के नीचे एक अवनमन — ग्लीनॉयड गुहा — ह्यूमरस के शीर्ष के साथ कंधों की जोड़ बनाने के लिए संधियोजन करती है।

उपांगीय कंकाल — श्रोणि मेखला व पश्चपाद

फीमर सबसे लंबी अस्थिइलियम, इस्चियम, प्यूबिस

पश्चपाद की अस्थियाँ हैं — फीमर (ऊरु अस्थि, शरीर की सबसे लंबी अस्थि), टिबिया व फिबुला, टार्सल (टखनों की अस्थियाँ, संख्या में 7), मेटाटार्सल (संख्या में 5) व अंगुलि अस्थियाँ फैलेंजेज़। कप के आकार की एक अस्थि — पटेल्ला (घुटना फलक) — घुटने को अधर की ओर से ढकती है।

श्रोणि (पेल्विक) मेखला में दो श्रोणि अस्थियाँ होती हैं। प्रत्येक श्रोणि अस्थि तीन अस्थियों के संलयन से बनी होती है — इलियम, इस्चियम व प्यूबिस। इन अस्थियों के संयोजन स्थल पर एक गुहा — एसिटैबुलम — होती है, जिससे ऊरु अस्थि (फीमर) संधियोजन करती है। अधर भाग में श्रोणि मेखला के दोनों भाग मिलकर प्यूबिक सलंयन (प्यूबिक सिम्फिसिस) बनाते हैं, जिसमें रेशेदार उपास्थि होती है।

NEET फोकस — गिनतियों का जाल (सबसे ज़्यादा confusion यहीं होता है)
  • कार्पल्स (कलाई) = 8, टार्सल (टखने) = 7 — इन्हें अक्सर आपस में बदलकर पूछा जाता है, ध्यान रखें!
  • मेटाकार्पल्स = 5, मेटाटार्सल = 5 — दोनों बराबर हैं।
  • फैलेंजेज़ प्रति हाथ/पाद = 14 (अंगूठे में 2, बाकी चार अंगुलियों में 3-3)।
  • फीमर मानव शरीर की सबसे लंबी व सबसे मज़बूत अस्थि है — यह fact सीधे पूछा जाता है।
  • ऊरु अस्थि (फीमर) एसिटैबुलम से जुड़ती है, जबकि ह्यूमरस ग्लीनॉयड गुहा से — दोनों जोड़ अलग-अलग टाइप की संधि (बॉल एंड सॉकेट) बनाते हैं।

5 संधियाँ या जोड़

गति के लिए अनिवार्य संरचनात्मक संधि-स्थल

संधियाँ या जोड़ हर प्रकार की गति के लिए आवश्यक हैं, जिनमें शरीर की अस्थियाँ सहयोगी होती हैं — चलन-गति भी इसका अपवाद नहीं है। जोड़ अस्थियों अथवा एक अस्थि व एक उपास्थि के बीच का संधि-स्थल है। जोड़ों द्वारा गति के लिए पेशी-जनित बल का उपयोग किया जाता है, और यहाँ जोड़ आलंब (फल्क्रम) की तरह कार्य करते हैं। जोड़ों पर गति विभिन्न कारकों पर निर्भरता के कारण अलग-अलग होती है। जोड़ों को मुख्यतः तीन संरचनात्मक रूपों में वर्गीकृत किया गया है — रेशीय, उपास्थियुक्त तथा साइनोवियल (स्रावी)।

संधि प्रकारगति की सीमाउदाहरण
रेशीय संधिगति नहीं होतीकपाल की चपटी अस्थियों की सीवन (suture)
उपास्थियुक्त संधिसीमित गतिदो निकटवर्ती कशेरुकों के बीच का जोड़
साइनोवियल संधि (कंदुक खल्लिका)बहुदिशीय, व्यापक गतिह्यूमरस व अंस मेखला के बीच (कंधे की जोड़)
साइनोवियल संधि (कब्ज़ा)एक तल में गतिघुटना संधि
साइनोवियल संधि (धुराग्र)घूर्णी गतिएटलस व अक्ष के बीच
साइनोवियल संधि (विसर्पी)फिसलने जैसी सीमित गतिकार्पल्स के बीच
साइनोवियल संधि (सैडल)दो तलों में गतिअंगूठे के कार्पल व मेटाकार्पल के बीच

रेशीय जोड़ किसी भी प्रकार की गति नहीं होने देते। इस तरह के जोड़ द्वारा कपाल की चपटी अस्थियाँ, जो घने रेशीय संयोजी ऊतक की सहायता से सीवन (सूचर) के रूप में जुड़कर कपाल बनाती हैं, आपस में स्थिर रूप से जुड़ी रहती हैं।

उपास्थि युक्त जोड़ों में अस्थियाँ आपस में उपास्थियों द्वारा जुड़ी होती हैं। कशेरुक दंड में दो निकटवर्ती कशेरुकों के बीच इसी प्रकार के जोड़ हैं जो सीमित गति होने देते हैं।

साइनोवियल जोड़ों की विशेषता दो अस्थियों की संधियोजन सतहों के बीच तरल से भरी साइनोवियल गुहा की उपस्थिति है। इस तरह की व्यवस्था में पर्याप्त गति संभव होती है। ये जोड़ चलन सहित कई तरह की गति में सहायता करते हैं। कंदुक खल्लिका संधि (ह्यूमरस व अंस मेखला के बीच), कब्ज़ा संधि (घुटना संधि), धुराग्र संधि (एटलस व अक्ष के बीच), विसर्पी संधि (कार्पल्स के बीच) तथा सैडल जोड़ (अंगूठे के कार्पल व मेटाकार्पल के बीच) इसके कुछ उदाहरण हैं।

NEET फोकस
  • कंदुक खल्लिका संधि (बॉल एंड सॉकेट जॉइंट) सबसे अधिक गति की स्वतंत्रता देता है — कंधे व कूल्हे की संधि इसके उदाहरण हैं।
  • धुराग्र (पिवट) संधि सिर को घुमाने में मदद करती है — एटलस-अक्ष संधि इसका क्लासिक उदाहरण है।
  • प्रत्येक जोड़ के "उदाहरण" वाले प्रश्न NEET में बहुत बार आते हैं, इसलिए ऊपर की टेबल को याद रखना फायदेमंद है।

6 पेशीय व कंकाल तंत्र के विकार

जोड़ों व पेशियों से जुड़ी सामान्य चिकित्सीय स्थितियाँ

विकारकारण / विवरण
माइस्थेनिया ग्रेविसएक स्वप्रतिरक्षा (ऑटोइम्यून) विकार जो तंत्रिका-पेशी संधि को प्रभावित करता है। इससे कमज़ोरी और कंकाली पेशियों का पक्षाघात होता है।
पेशीय दुष्पोषण (मस्कुलर डिस्ट्रॉफी)आनुवंशिक विकारों के कारण कंकाल पेशी का क्रमिक ह्रास (डिजनरेशन)।
अपतानिका (टेटनी)शरीर में कैल्सियम आयनों की कमी से पेशी में तीव्र ऐंठन।
संधि शोथ (आर्थराइटिस)जोड़ों की सूजन।
अस्थि सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस)उम्र-संबंधित विकार, जिसमें अस्थि पदार्थों की कमी से अस्थि-भंग की प्रबल संभावना बनती है। एस्ट्रोजन स्तर में कमी इसका सामान्य कारक है।
गाउटजोड़ों में यूरिक अम्ल के क्रिस्टल जमा होने के कारण जोड़ों की सूजन व तीव्र दर्द।
NEET फोकस
  • माइस्थेनिया ग्रेविस में ऑटोएंटीबॉडी एसिटिलकोलिन रिसेप्टर्स पर हमला करती हैं — यह इम्यूनोलॉजी के साथ क्रॉस-टॉपिक प्रश्न में पूछा जा सकता है।
  • ऑस्टियोपोरोसिस का सामान्य कारण एस्ट्रोजन में कमी है — यह विशेष रूप से रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में आम है।
  • गाउट में जमा होने वाला पदार्थ = यूरिक अम्ल क्रिस्टल — प्यूरिन उपापचय से जुड़ा हुआ विकार।

NEET फैक्ट-शीट — एक नज़र में

परीक्षा से ठीक पहले रिवीज़न के लिए संकलित प्रमुख तथ्य

बिंदुतथ्य / संख्या
वयस्क शरीर भार में पेशियों का हिस्सा40–50%
कुल कंकालीय अस्थियाँ206
अक्षीय कंकाल की अस्थियाँ80
उपांगीय कंकाल की अस्थियाँ126 (63 × 2)
करोटि की अस्थियाँ (कपालीय + आननी)22 (8 + 14)
कर्ण अस्थिकाएँ (प्रति कान)3 (मैलियस, इनकस, स्टेपीज़)
ग्रीवा कशेरुकाएँ7 (लगभग सभी स्तनधारियों में समान)
कुल कशेरुकाएँ26 (7+12+5+1+1)
पसलियों की जोड़ियाँ12 (वास्तविक 7 + कूट 3 + प्लावी 2)
प्रति पाद अस्थियाँ30
कार्पल्स / टार्सल8 / 7
फैलेंजेज़ प्रति पाद14
सबसे लंबी अस्थिफीमर (ऊरु अस्थि)
संकुचन का सिद्धांतसर्पीतंतु सिद्धांत (स्लाइडिंग फिलामेंट थ्योरी)
संकुचन का ट्रिगर आयनCa²⁺ (सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम से मुक्त)
क्रॉस-सेतु टूटने के लिए आवश्यकनया ATP अणु
संकुचन में स्थिर रहने वाला बैंडA-बैंड
संकुचन में घटने वाला बैंडI-बैंड (व H-क्षेत्र)
पेशी में ऑक्सीजन भंडारण वर्णकमायोग्लोबिन

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

इस अध्याय से NEET/AIPMT में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न, वर्ष के संदर्भ सहित — अभ्यास हेतु

1 सार्कोमियर के संकुचन के दौरान निम्न में से कौन सा कथन सत्य है — A-बैंड की लंबाई घटती है या I-बैंड की?

उत्तर: संकुचन के दौरान I-बैंड की लंबाई घटती है, जबकि A-बैंड की लंबाई स्थिर (अपरिवर्तित) रहती है।

सर्पी तंतु सिद्धांत के अनुसार मायोसिन (मोटे तंतु, A-बैंड) की वास्तविक लंबाई कभी नहीं बदलती — केवल एक्टिन (पतले तंतु) A-बैंड के भीतर सरककर केंद्र की ओर खिंचते हैं, जिससे I-बैंड व H-क्षेत्र दोनों छोटे होते जाते हैं। NEET में यह concept अक्सर उलट कर (A-बैंड घटता है, यह कहकर) गलत विकल्प के रूप में दिया जाता है — सतर्क रहें।

2 पेशी संकुचन में क्रॉस-सेतु के टूटने के लिए किसकी आवश्यकता होती है?

उत्तर: एक नए ATP अणु के मायोसिन सिर से जुड़ने की।

यह वही सिद्धांत है जिस पर मृत्यु के बाद होने वाली शव-कठोरता (rigor mortis) आधारित है — मृत्यु के बाद ATP का निर्माण रुक जाने से क्रॉस-सेतु टूट नहीं पाते और पेशियाँ अकड़ी हुई अवस्था में रह जाती हैं। NEET में यह प्रश्न प्रत्यक्ष रूप से भी और rigor mortis के व्यावहारिक उदाहरण के साथ जोड़कर भी पूछा जाता रहा है।

3 मनुष्य के कंकाल तंत्र में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं, तथा इनमें से अक्षीय व उपांगीय कंकाल का विभाजन क्या है?

उत्तर: कुल 206 अस्थियाँ — अक्षीय कंकाल में 80 तथा उपांगीय कंकाल में 126।

यह अत्यंत उच्च-आवृत्ति वाला direct-fact प्रश्न है। इसके साथ अक्सर करोटि (22), कशेरुक दंड (26) व पसलियों (12 जोड़ी/24) की उप-गणनाएँ भी एक साथ पूछी जाती हैं — इसलिए पूरी संख्यात्मक शृंखला (206 → 80+126 → 22+26+24+... ) एक साथ याद रखना ज़रूरी है।

4 मानव कशेरुक दंड में ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या कितनी होती है, और क्या यह जिराफ़ जैसी लंबी गर्दन वाले स्तनधारियों में भी समान रहती है?

उत्तर: 7 — यह संख्या लगभग सभी स्तनधारियों (जिराफ़ सहित) में समान रहती है।

जिराफ़ की गर्दन लंबी होने का कारण कशेरुकाओं की संख्या बढ़ना नहीं, बल्कि प्रत्येक कशेरुका का आकार में लंबा होना है। यह एक क्लासिक comparative-anatomy प्रश्न है, जो NEET में अक्सर "अपवाद खोजो" (कौन इस नियम का अपवाद है) के रूप में पूछा जाता है — सही उत्तर है कि कोई अपवाद सामान्यतः नहीं है, संख्या 7 ही बनी रहती है।

5 निम्नलिखित में से कौन सा जोड़ा सुमेलित नहीं है — (a) कार्पल्स-8 (b) टार्सल-7 (c) मेटाकार्पल्स-5 (d) फैलेंजेज़-12।

उत्तर: (d) असुमेलित है — फैलेंजेज़ की सही संख्या 14 है, न कि 12।

प्रत्येक हाथ/पाद में फैलेंजेज़ की संख्या 14 होती है (अंगूठे में 2, शेष चार अंगुलियों में 3-3 = 2+12=14)। कार्पल्स (8) व टार्सल (7) की संख्या को अक्सर आपस में बदल कर भी गलत विकल्प बनाया जाता है — इस पूरे set की संख्याएँ बहुत सावधानी से याद रखनी चाहिए।

6 हृद पेशी (कार्डियक मसल) की सबसे विशिष्ट पहचान क्या है, जो इसे कंकाल पेशी व चिकनी पेशी दोनों से अलग बनाती है?

उत्तर: हृद पेशी रेखित (striated) होते हुए भी अनैच्छिक (involuntary) होती है।

कंकाल पेशी रेखित व ऐच्छिक होती है, चिकनी पेशी अरेखित व अनैच्छिक होती है — लेकिन हृद पेशी इन दोनों नियमों को तोड़ते हुए रेखित संरचना के बावजूद अनैच्छिक रूप से (स्वतः, मायोजेनिक ढंग से) कार्य करती है। यह विरोधाभासी संयोजन NEET का सबसे लोकप्रिय single-line MCQ है।

7 पेशी संकुचन के दौरान ट्रोपोनिन की भूमिका क्या है, और यह ट्रोपोमायोसिन से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: ट्रोपोमायोसिन विश्राम अवस्था में एक्टिन के सक्रिय स्थलों को ढक कर रखता है; ट्रोपोनिन कैल्सियम आयनों से बंधकर इन स्थलों को खोल देता है, जिससे मायोसिन जुड़ सके।

NEET में इन दोनों प्रोटीनों की भूमिका को अक्सर उलट कर पूछा जाता है (यह कहते हुए कि ट्रोपोनिन ढकता है और ट्रोपोमायोसिन खोलता है) — सही क्रम याद रखें: Ca²⁺ → ट्रोपोनिन से बंधन → ट्रोपोमायोसिन का स्थानांतरण → एक्टिन का सक्रिय स्थल उजागर।

8 लाल पेशियों (Type I fibres) में माइटोकॉन्ड्रिया व मायोग्लोबिन की मात्रा अधिक होने का शारीरिक महत्व क्या है?

उत्तर: लाल पेशियाँ अधिक ऑक्सीजन भंडारित व उपयोग कर वायुजीवी श्वसन द्वारा निरंतर, थकान-प्रतिरोधी संकुचन में सक्षम होती हैं।

यह इन्हें लगातार कार्य (जैसे मुद्रा बनाए रखने वाली पेशियों) के लिए उपयुक्त बनाता है, जबकि श्वेत पेशियाँ (कम मायोग्लोबिन, अवायवीय श्वसन) तेज़ पर अल्पकालिक शक्ति-कार्य के लिए उपयुक्त होती हैं। NEET में यह concept अक्सर धावकों की मांसपेशी-प्रकार (sprint vs endurance) के व्यावहारिक उदाहरण से जोड़कर भी पूछा जाता है।

9 मानव शरीर में सबसे लंबी व सबसे मज़बूत अस्थि कौन सी है, तथा यह किस संधि द्वारा श्रोणि मेखला से जुड़ती है?

उत्तर: फीमर (ऊरु अस्थि) सबसे लंबी अस्थि है, जो एसिटैबुलम के साथ कंदुक खल्लिका संधि (बॉल एंड सॉकेट जॉइंट) द्वारा श्रोणि मेखला से जुड़ती है।

यह प्रश्न अक्सर ह्यूमरस-ग्लीनॉयड गुहा (कंधे की जोड़) के साथ तुलना करके पूछा जाता है — दोनों ही कंदुक खल्लिका संधि के उदाहरण हैं, लेकिन अलग-अलग मेखलाओं (श्रोणि व अंस) से जुड़े होते हैं।

10NEET 2015 निम्न में से कौन सी संधि गति की अनुमति नहीं देती — (a) साइनोवियल (b) उपास्थियुक्त (c) रेशीय (d) कंदुक खल्लिका।

उत्तर: (c) रेशीय संधि।

रेशीय संधि (जैसे कपाल की सीवन/सूचर) किसी भी प्रकार की गति नहीं होने देती — यह पूर्णतः स्थिर जोड़ है। उपास्थियुक्त संधि सीमित गति देती है, जबकि साइनोवियल संधि (जिसके अंतर्गत कंदुक खल्लिका भी आती है) सबसे अधिक व स्वतंत्र गति की अनुमति देती है — यह तीन-स्तरीय वर्गीकरण (गति-रहित → सीमित → पूर्ण) NEET में बहुत बार पूछा जाता है।

11NEET 2015 कंकाल तंत्र का निम्नलिखित में से कौन सा कार्य नहीं है?

उत्तर: शरीर की ऊष्मा (body heat) का उत्पादन — यह कंकाल तंत्र का कार्य नहीं है।

कंकाल तंत्र के प्रमुख कार्यों में शरीर को आकार व सहारा देना, खनिज (कैल्सियम, फॉस्फोरस) का भंडारण, संचलन में सहायता तथा (अस्थि मज्जा द्वारा) रक्त कणिकाओं का निर्माण शामिल है। शरीर की ऊष्मा वास्तव में उपापचय (चयापचय/श्वसन) की प्रक्रिया से उत्पन्न होती है, न कि सीधे कंकाल तंत्र से — यह अंतर NEET में विकल्पों को उलझाने के लिए बार-बार प्रयोग किया जाता है।

12AIPMT 2014 तंत्रिका-पेशी संगम (neuromuscular junction) पर वास्तव में क्या घटित होता है, जब एक प्रेरक तंत्रिका पेशी रेशे को उद्दीपित करती है?

उत्तर: प्रेरक तंत्रिका द्वारा तंत्रिका-पेशी संगम (neuromuscular junction) पर ही पेशी रेशे का उद्दीपन होता है, जहाँ न्यूरोट्रांसमीटर (एसिटिल कोलिन) मुक्त होकर सार्कोलेमा में क्रिया विभव उत्पन्न करता है।

यह संगम तंत्रिका-अंत्य पट्ट (मोटर एंड प्लेट) भी कहलाता है। इसके ठीक बाद क्रिया विभव पूरे पेशी रेशे में फैलता है और सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम से कैल्सियम मुक्त करता है — यह पूरी शृंखला NEET में क्रम-आधारित (sequence-based) प्रश्नों में भी बार-बार पूछी जाती है।

13NEET 2013 मनुष्य में संचलन (locomotion) से संबंधित निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

उत्तर: जोड़ों में यूरिक अम्ल के क्रिस्टलों का संचय उनमें शोथ (सूजन) उत्पन्न करता है — यह सही कथन है।

यह स्थिति गाउट (Gout) कहलाती है, जो पेशी व कंकाल तंत्र के प्रमुख विकारों में से एक है। इसी प्रश्न में दिए गए अन्य कथन (जैसे "आसन्न कशेरुकाओं के बीच का जोड़ रेशीय संधि है" या "मनुष्य में 10 वक्षीय कशेरुक होते हैं") गलत होते हैं — सही उत्तर हेतु यह याद रखें कि आसन्न कशेरुकाओं के बीच उपास्थियुक्त संधि होती है, और वक्षीय कशेरुकाओं की संख्या 12 है, 10 नहीं।

14AIPMT 2012 मायस्थीनिया ग्रेविस (Myasthenia gravis) के संबंध में सही कथन क्या है?

उत्तर: मायस्थीनिया ग्रेविस एक स्वप्रतिरक्षी (autoimmune) विकार है, जो तंत्रिका-पेशी संगम (neuromuscular junction) को प्रभावित करता है और पेशीय थकान व दुर्बलता उत्पन्न करता है।

इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली एसिटिल कोलिन ग्राहियों के विरुद्ध प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) बनाती है, जिससे तंत्रिका संकेत पेशी तक ठीक से नहीं पहुँच पाता और पेशी क्रमिक रूप से कमज़ोर होती जाती है, गंभीर मामलों में लकवा तक हो सकता है। NEET में इसे अक्सर अन्य विकारों (पेशीय दुष्पोषण, गाउट, संधि शोथ) के साथ मिलाकर "सही कथन चुनें" प्रकार के प्रश्न में पूछा जाता है।

15AIPMT 2011 हमारे मूत्रवाहिनी (ureters) में किस प्रकार की पेशियाँ पाई जाती हैं?

उत्तर: चिकनी (अरेखित) व अनैच्छिक पेशियाँ।

मूत्रवाहिनी एक खोखला अंतरंग अंग है, इसलिए इसकी भित्ति में अंतरंग (चिकनी) पेशियाँ पाई जाती हैं, जो तंत्रिका तंत्र के ऐच्छिक नियंत्रण में नहीं होतीं और मूत्र को क्रमाकुंचन गति द्वारा वृक्क से मूत्राशय तक धकेलती हैं। यह अवधारणा अक्सर आहार नाल व जनन मार्ग की चिकनी पेशियों के साथ तुलना करके पूछी जाती है।

16AIPMT 2007 निम्नलिखित में से कौन सा जोड़ा अपनी सही कुल संख्या दर्शाता है — (a) मनुष्य में ग्रीवा कशेरुक — 8 (b) मनुष्य में प्लावी पसलियाँ — 4 (c) प्रोटीन में मिलने वाले अमीनो अम्ल — 16 (d) मधुमेह के प्रकार — 3।

उत्तर: (b) मनुष्य में प्लावी (फ्लोटिंग) पसलियों की संख्या 4 है (11वीं व 12वीं जोड़ी, दोनों ओर मिलाकर) — यही सही सुमेलित विकल्प है।

शेष सभी विकल्प गलत हैं — मनुष्य में ग्रीवा कशेरुकाएँ 8 नहीं बल्कि 7 होती हैं, प्रोटीन में सामान्यतः 20 अमीनो अम्ल पाए जाते हैं (16 नहीं), और मधुमेह मुख्यतः 2 प्रकार (Type-I व Type-II) का होता है, 3 नहीं। यह "सही गणना पहचानो" प्रकार का प्रश्न कई विषयों को एक साथ जोड़कर पूछा जाता है, इसलिए हर संख्या को स्वतंत्र रूप से जाँचना ज़रूरी है।

17NEET 2023 पेशी संकुचन (muscle contraction) की क्रियाविधि के संबंध में निम्नलिखित में से सही कथन चुनें।

उत्तर: क्रिया विभव सार्कोलेमा में उत्पन्न होकर पेशीद्रव्य जालिका से कैल्सियम मुक्त करता है, जो ट्रोपोनिन से बंधकर पतले तंतु पर सक्रिय स्थल खोलता है, और सार्कोमियर छोटा होने के दौरान एक्टिन तंतु A-बैंड के केंद्र की ओर खिंचते हैं — ये सभी कथन सही हैं।

NEET 2023 में इस टॉपिक पर बहु-कथन (statement-based) प्रश्न पूछा गया था, जिसमें एक भ्रामक विकल्प यह भी दिया जाता है कि "संकेत केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से संवेदी तंत्रिका (sensory neuron) द्वारा भेजा जाता है" — यह गलत है, क्योंकि संकेत सदैव प्रेरक तंत्रिका (motor neuron) द्वारा भेजा जाता है, संवेदी तंत्रिका द्वारा नहीं।

अन्य NEET संबंधित तथ्य

फैक्ट-शीट में शामिल संख्याओं के अतिरिक्त, कुछ और महत्वपूर्ण अवधारणात्मक बिंदु — जो अक्सर भ्रामक विकल्पों के रूप में पूछे जाते हैं

रोचक तथ्य
  • पेशी रेशों को मुख्यतः दो श्रेणियों में बाँटा जाता है — लाल पेशियाँ (Type I, धीमी-आकुंचनशील) जिनमें मायोग्लोबिन व माइटोकॉन्ड्रिया अधिक होते हैं और जो थकान-प्रतिरोधी, सतत कार्य (जैसे मुद्रा बनाए रखना, मैराथन) के लिए उपयुक्त हैं; तथा श्वेत पेशियाँ (Type II, तीव्र-आकुंचनशील) जो अवायवीय श्वसन पर निर्भर रहकर तेज़ किंतु अल्पकालिक शक्ति (जैसे स्प्रिंट) प्रदान करती हैं।
रोचक तथ्य
  • शव-कठोरता (Rigor Mortis) — मृत्यु के बाद ATP का उत्पादन रुक जाने से मायोसिन क्रॉस-सेतु एक्टिन से जुड़े ही रह जाते हैं और टूट नहीं पाते, जिससे पेशियाँ अकड़ी हुई अवस्था में आ जाती हैं। यह सर्पीतंतु सिद्धांत का एक क्लासिक व्यावहारिक अनुप्रयोग है, जो NEET में अवधारणात्मक प्रश्न के रूप में बार-बार आता है।
तुलनात्मक
  • संधियों का तीन-स्तरीय वर्गीकरण हमेशा याद रखें — रेशीय संधि (कोई गति नहीं, जैसे कपालीय सीवन) → उपास्थियुक्त संधि (सीमित गति, जैसे प्यूबिक सिम्फिसिस) → साइनोवियल संधि (पूर्ण/स्वतंत्र गति, जैसे कंदुक खल्लिका व कब्ज़ा जोड़)। NEET अक्सर इन तीनों में से किसी एक उदाहरण को दूसरी श्रेणी में डालकर भ्रामक विकल्प बनाता है।
तथ्य
  • अंस मेखला व श्रोणि मेखला में मूल अंतर — श्रोणि मेखला का अधर भाग दोनों तरफ की प्यूबिक अस्थियों के मिलने से एक विशेष जोड़, प्यूबिक सलंयन (सिम्फिसिस), बनाता है, जो अंस मेखला में कहीं नहीं पाया जाता — यह अंतर तुलनात्मक प्रश्नों में सीधे पूछा जाता है।
तथ्य
  • कशेरुक दंड का विभाजन — कुल 26 कशेरुकाएँ इस क्रम में होती हैं: 7 ग्रीवा + 12 वक्षीय + 5 कटि + 1 त्रिक (5 त्रिक कशेरुकाओं के संलयन से) + 1 अनुत्रिक (4 अनुत्रिक कशेरुकाओं के संलयन से)। यह संलयन वाला तथ्य अक्सर भूल जाते हैं और सीधे "26" के बजाय "33" गिन बैठते हैं — ध्यान रहे, वयस्क में संलयन के बाद अंतिम गिनती 26 ही होती है।
रणनीति
  • NEET के आधिकारिक विश्लेषण के अनुसार यह अध्याय (गमन एवं संचलन) प्रतिवर्ष औसतन 3–4 प्रश्न (लगभग 2% वेटेज) लाता है, जिनमें सबसे अधिक भार पेशी संकुचन की क्रियाविधि व कंकाल तंत्र की संख्यात्मक जानकारी पर रहता है — इसलिए फैक्ट-शीट की संख्याएँ रटना अनिवार्य है।

संक्षिप्त सार

गति के प्रकार

मानव कोशिकाएँ अमीबीय (श्वेताणु), पक्ष्माभी (श्वास नली, डिंबवाहिनी) व पेशीय — तीन प्रकार की गति दर्शाती हैं। सभी चलन गति हैं, पर सभी गति चलन नहीं।

पेशी के प्रकार

कंकाल पेशी (रेखित, ऐच्छिक), अंतरंग पेशी (अरेखित, अनैच्छिक) व हृद पेशी (रेखित पर अनैच्छिक) — तीनों की सूक्ष्म संरचना व नियंत्रण अलग-अलग हैं।

सार्कोमियर व सर्पीतंतु सिद्धांत

एक्टिन व मायोसिन के परस्पर सरकने से संकुचन होता है। Ca²⁺ आयन ट्रोपोनिन से बंधकर सक्रिय स्थल खोलते हैं, ATP क्रॉस-सेतु के बनने व टूटने दोनों में ज़रूरी है।

कंकाल तंत्र

206 अस्थियाँ, अक्षीय (80) व उपांगीय (126) में विभाजित। करोटि, कशेरुक दंड, पसलियाँ व उरोस्थि अक्षीय कंकाल बनाते हैं; पाद अस्थियाँ व मेखलाएँ उपांगीय कंकाल बनाती हैं।

संधियाँ

रेशीय (गति-रहित), उपास्थियुक्त (सीमित गति) व साइनोवियल (व्यापक गति) — तीन मुख्य प्रकार। साइनोवियल संधियाँ चलन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

विकार

माइस्थेनिया ग्रेविस, पेशीय दुष्पोषण, अपतानिका, संधि शोथ, अस्थि सुषिरता व गाउट — ये सभी पेशी व कंकाल तंत्र से जुड़े प्रमुख विकार हैं।

? प्रश्न-उत्तर

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प्रश्न 1 कंकाल पेशी के एक सार्कोमियर का चित्र बनाएँ और विभिन्न भागों को चिह्नित करें।
उत्तर

सार्कोमियर एक चित्रात्मक प्रश्न है, लेकिन इसके प्रमुख भाग इस प्रकार हैं — दो Z-रेखाएँ (दोनों सिरों पर), दो अर्ध I-बैंड (प्रत्येक Z-रेखा के पास, हल्के रंग के, केवल पतले एक्टिन तंतु से बने), बीच में A-बैंड (गहरे रंग का, मोटे मायोसिन तंतुओं से बना, जिसके बीच में M-रेखा होती है), तथा A-बैंड के केंद्र में H-क्षेत्र (जहाँ केवल मायोसिन तंतु होते हैं, एक्टिन नहीं पहुँचता)। चित्र बनाते समय ध्यान रहे कि दो लगातार Z-रेखाओं के बीच का पूरा भाग ही एक सार्कोमियर कहलाता है।

प्रश्न 2 पेशी संकुचन के सर्पी तंतु सिद्धांत को परिभाषित करें।
उत्तर

सर्पी तंतु सिद्धांत के अनुसार पेशी संकुचन के दौरान एक्टिन (पतले) व मायोसिन (मोटे) तंतुओं की अपनी वास्तविक लंबाई में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसके बजाय, मायोसिन के सिर ATP से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग करते हुए एक्टिन तंतुओं से क्रॉस-सेतु बनाते हैं और उन्हें अपनी ओर खींचते हुए A-बैंड के केंद्र की तरफ सरकाते हैं। इस सरकने की क्रिया से Z-रेखाएँ भी पास आ जाती हैं, जिससे पूरा सार्कोमियर छोटा हो जाता है — यही संकुचन है। चूँकि तंतु स्वयं सिकुड़ते नहीं, बल्कि एक-दूसरे के ऊपर सरकते हैं, इसीलिए इसे सर्पी तंतु (स्लाइडिंग फिलामेंट) सिद्धांत कहा जाता है।

प्रश्न 3 पेशी संकुचन के प्रमुख चरणों का वर्णन करें।
उत्तर

पेशी संकुचन की पूरी प्रक्रिया को क्रमबद्ध चरणों में समझा जा सकता है — सबसे पहले केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से एक प्रेरक तंत्रिका संकेत तंत्रिका-पेशी संगम तक पहुँचता है, जहाँ एसिटिल कोलिन नामक तंत्रिका संचारी मुक्त होता है। यह सार्कोलेमा में एक क्रिया विभव उत्पन्न करता है, जो समस्त पेशीय रेशे में फैल जाता है। इससे सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम से कैल्सियम आयन मुक्त होते हैं, जो ट्रोपोनिन से बंधकर एक्टिन के ढके हुए सक्रिय स्थान खोल देते हैं। इसके बाद ATP से ऊर्जा प्राप्त कर मायोसिन के सिर एक्टिन से जुड़कर क्रॉस-सेतु बनाते हैं और एक्टिन तंतुओं को केंद्र की ओर खींचते हैं, जिससे सार्कोमियर छोटा होता जाता है। नए ATP के जुड़ने से क्रॉस-सेतु टूटते हैं और मायोसिन विश्राम अवस्था में लौट जाता है — तंत्रिका संकेत समाप्त होने पर कैल्सियम पुनः अवशोषित हो जाता है और पेशी शिथिल हो जाती है।

प्रश्न 4 'सही' या 'गलत' लिखें:
उत्तर
  • (क) एक्टिन पतले तंतु में स्थित होता है — सही। एक्टिन पतले तंतुओं का मुख्य घटक है, जो हल्के I-बैंड में पाया जाता है।
  • (ख) रेखित पेशीरेशे का H-क्षेत्र मोटे और पतले, दोनों तंतुओं को प्रदर्शित करता है — गलत। H-क्षेत्र केवल मोटे मायोसिन तंतुओं को प्रदर्शित करता है; यहाँ एक्टिन (पतले) तंतु मौजूद नहीं होते, इसीलिए यह A-बैंड का हल्का दिखने वाला मध्य भाग है।
  • (ग) मानव कंकाल में 206 अस्थियाँ होती हैं — सही। कुल 206 अस्थियों में से 80 अक्षीय कंकाल में तथा 126 उपांगीय कंकाल में होती हैं।
  • (घ) मनुष्य में 11 जोड़ी पसलियाँ होती हैं — गलत। मनुष्य में पसलियों की 12 जोड़ी होती हैं, न कि 11।
  • (च) उरोस्थि शरीर के अधर भाग में स्थित होती है — सही। उरोस्थि वक्ष की मध्य अधर रेखा पर स्थित एक चपटी अस्थि है, जिससे पसलियों के अग्र सिरे जुड़ते हैं।
प्रश्न 5 इनके बीच अंतर बताएँ:
उत्तर

(क) एक्टिन और मायोसिन — एक्टिन पतला संकुचनशील तंतु है, जो F-एक्टिन की दो कुंडलित श्रृंखलाओं से बना होता है तथा हल्के I-बैंड में पाया जाता है; इसके साथ ट्रोपोमायोसिन व ट्रोपोनिन प्रोटीन भी जुड़े रहते हैं। मायोसिन मोटा संकुचनशील तंतु है, जिसमें गोलाकार सिर (जो ATPase एंजाइम की तरह कार्य करता है) व पूँछ होती है, और यह गहरे A-बैंड में स्थित रहता है। एक्टिन-मायोसिन का सापेक्ष सरकना ही संकुचन का आधार है।

(ख) लाल और श्वेत पेशियाँ — लाल पेशियों में मायोग्लोबिन तथा माइटोकॉन्ड्रिया की मात्रा अधिक होती है, इसलिए ये अधिक ऑक्सीजन भंडारित कर वायुजीवी श्वसन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करती हैं और लगातार कार्य के लिए उपयुक्त होती हैं। श्वेत पेशियों में मायोग्लोबिन बहुत कम होता है, माइटोकॉन्ड्रिया अल्पसंख्यक होते हैं, लेकिन पेशीद्रव्य जालिका अधिक होती है — ये मुख्यतः अवायवीय विधि से ऊर्जा प्राप्त कर तेज़ किंतु अल्पकालिक संकुचन के लिए उपयुक्त होती हैं।

(ग) अंस एवं श्रोणि मेखला — अंस मेखला के प्रत्येक अर्ध भाग में एक क्लेविकल व एक स्कैपुला होता है, जो अग्रपाद (भुजा) को अक्षीय कंकाल से जोड़ता है और ह्यूमरस के साथ ग्लीनॉयड गुहा द्वारा संधियोजन करता है। श्रोणि मेखला में इलियम, इस्चियम व प्यूबिस के संलयन से बनी दो श्रोणि अस्थियाँ होती हैं, जो पश्चपाद (टांग) को अक्षीय कंकाल से जोड़ती हैं और फीमर के साथ एसिटैबुलम द्वारा संधियोजन करती हैं; इसके अतिरिक्त श्रोणि मेखला का अधर भाग प्यूबिक सलंयन बनाता है, जो अंस मेखला में नहीं पाया जाता।

प्रश्न 6 स्तंभ I का स्तंभ II से मिलान करें:
उत्तर
स्तंभ Iस्तंभ IIसंबंध का स्पष्टीकरण
चिकनी पेशीअनैच्छिकचिकनी (अंतरंग) पेशी की क्रिया तंत्रिका तंत्र के ऐच्छिक नियंत्रण में नहीं होती।
ट्रोपोमायोसिनपतले तंतुट्रोपोमायोसिन एक्टिन (पतले तंतु) के साथ इसकी पूरी लंबाई में जुड़ा रहता है।
लाल पेशीमायोग्लोबिनलाल पेशियों में मायोग्लोबिन वर्णक की अधिक मात्रा होने से उनका रंग लाल दिखता है।
कपालसीवन (सूचर)कपाल की चपटी अस्थियाँ रेशीय जोड़ों द्वारा सीवन के रूप में जुड़ती हैं।
प्रश्न 7 मानव शरीर की कोशिकाओं द्वारा प्रदर्शित विभिन्न गतियाँ कौन सी हैं?
उत्तर

मानव शरीर की कोशिकाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की गति दर्शाती हैं — अमीबीय गति (जैसे रुधिर में महाभक्षकाणु व श्वेताणु में, जो जीवद्रव्य की प्रवाही गति द्वारा कूकूट पाद बनाकर होती है), पक्ष्माभी गति (जैसे श्वास नली की भीतरी सतह पर, जो धूल-कणों को बाहर निकालने में मदद करती है, तथा मादा प्रजनन मार्ग में डिंब के परिवहन में) और पेशीय गति (जो पादों, जबड़ों व जिह्वा जैसे अंगों की गति के लिए आवश्यक है, और चलन का मुख्य आधार है)।

प्रश्न 8 आप किस प्रकार से एक कंकाल पेशी और हृद पेशी में विभेद करेंगे?
उत्तर

कंकाल पेशी व हृद पेशी दोनों ही सूक्ष्मदर्शी में रेखित (धारीदार) दिखाई देती हैं, इसलिए रंग-रूप के आधार पर ये समान लग सकती हैं, लेकिन इनमें कई बुनियादी अंतर हैं। कंकाल पेशी शारीरिक कंकाल अवयवों के निकट संपर्क में होती है और इसकी क्रिया तंत्रिका तंत्र द्वारा ऐच्छिक रूप से नियंत्रित होती है — यानी यह हमारी इच्छा से संकुचित व शिथिल होती है, जैसे भुजा या टांग की पेशियाँ। इसके विपरीत हृद पेशी केवल हृदय की भित्ति में पाई जाती है, इसकी कोशिकाएँ शाखित होती हैं और आपस में एक शाश्वत जालिकावत रचना बनाती हैं, तथा इसकी क्रिया पूर्णतः अनैच्छिक व स्वतः-उत्पादित (मायोजेनिक) होती है — तंत्रिका तंत्र इसे केवल गति की दर को समायोजित करता है, सीधे नियंत्रित नहीं करता।

प्रश्न 9 निम्नलिखित जोड़ों के प्रकार बताएँ:
उत्तर

(क) एटलस/अक्ष (एक्सिस) — धुराग्र संधि (पिवट जॉइंट), जो सिर को घुमाने की अनुमति देती है।

(ख) अंगूठे के कार्पल/मेटाकार्पल — सैडल जोड़, जो दो तलों में गति की अनुमति देता है।

(ग) फैलेंजेज़ के बीच — कब्ज़ा संधि (हिंज जॉइंट), जो एक ही तल में गति देती है।

(घ) फीमर/एसिटैबुलम — कंदुक खल्लिका संधि (बॉल एंड सॉकेट जॉइंट), जो व्यापक व बहुदिशीय गति की अनुमति देती है — कूल्हे की जोड़।

(च) कपालीय अस्थियों के बीच — रेशीय संधि (सीवन/सूचर), जिसमें कोई गति नहीं होती।

(छ) श्रोणि मेखला की प्यूबिक अस्थियों के बीच — उपास्थियुक्त संधि (प्यूबिक सिम्फिसिस), जो सीमित गति देती है।

प्रश्न 10 रिक्त स्थानों में उचित शब्दों को भरें:
उत्तर

(क) सभी स्तनधारियों में (कुछ को छोड़कर) 7 ग्रीवा कशेरुक होते हैं।

(ख) प्रत्येक मानव पाद में फैलेंजेज़ की संख्या 14 है।

(ग) मायोफाइब्रिल के पतले तंतुओं में 2 'F' एक्टिन और दो अन्य दूसरे प्रोटीन, जैसे ट्रोपोमायोसिन और ट्रोपोनिन होते हैं।

(घ) पेशी रेशा में कैल्सियम पेशीद्रव्य जालिका (सार्कोप्लाज़्मिक रेटीक्यूलम) में भंडारित रहता है।

(च) 11वीं और 12वीं पसलियों की जोड़ियों को प्लावी पसलियाँ कहते हैं।

(छ) मनुष्य का कपाल 8 अस्थियों से बना होता है।

यह विस्तृत अध्ययन सामग्री मानव शरीर में गति व गमन के प्रकार, पेशी की सूक्ष्म संरचना, सर्पीतंतु सिद्धांत, कंकाल तंत्र, संधियों के प्रकार तथा संबंधित विकारों को सरल व मौलिक भाषा में समझाने के लिए तैयार की गई है, जिसमें NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी तथ्य-बॉक्स, तुलनात्मक तालिकाएँ व प्रश्नोत्तर भी शामिल किए गए हैं।

हर कदम, हर पलक झपकना और हर धड़कन — इन सबके पीछे एक्टिन और मायोसिन के बीच का वही सूक्ष्म, अनवरत सरकना काम कर रहा होता है।

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