अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी
परमाणु के ऊर्जा बैंड से लेकर नैज व अपद्रव्यी अर्धचालक, p-n संधि, डायोड, दिष्टकारी, ट्रांजिस्टर तथा लॉजिक गेट तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आरेख और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।
1 भूमिका
निर्वात नलिकाओं से ठोस-अवस्था अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी तक
ऐसी युक्तियाँ जिनमें इलेक्ट्रॉनों का नियंत्रित प्रवाह प्राप्त किया जा सके, सभी इलेक्ट्रॉनिक परिपथों की मूलभूत रचना खंड होती हैं। सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज से पहले ऐसी युक्तियाँ अधिकांशतः निर्वात नलिकाएँ (या वाल्व) थीं, जैसे निर्वात डायोड (2 इलेक्ट्रोड: एनोड-प्लेट तथा कैथोड), ट्रायोड (3 इलेक्ट्रोड: कैथोड, प्लेट तथा ग्रिड), टेट्रोड तथा पेंटोड (क्रमशः 4 तथा 5 इलेक्ट्रोडों के साथ)।
किसी निर्वात नलिका में इलेक्ट्रॉनों की आपूर्ति एक तप्त कैथोड द्वारा की जाती है तथा विभिन्न इलेक्ट्रोडों के बीच वोल्टता को परिवर्तित करके निर्वात में इन इलेक्ट्रॉनों का नियंत्रित प्रवाह प्राप्त किया जाता है। अंतरा-इलेक्ट्रोडी स्थान में इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के लिए निर्वात आवश्यक होता है, अन्यथा गतिमान इलेक्ट्रॉन वायु के अणुओं से टकराकर अपनी ऊर्जा खो सकते हैं। इन युक्तियों में इलेक्ट्रॉन केवल कैथोड से एनोड की ओर प्रवाहित हो सकते हैं — यही कारण है कि ऐसी युक्तियों को साधारणतया वाल्व कहते हैं।
आधुनिक ठोस-अवस्था अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी का प्रादुर्भाव सन् 1930 में इस आभास से किया गया कि कुछ ठोस अवस्था अर्धचालक तथा उनकी संधियों में यह संभावना होती है कि उनमें आवेश वाहकों की संख्या तथा उनके प्रवाह की दिशा को नियंत्रित किया जा सकता है। प्रकाश, ऊष्मा तथा अल्प अनुप्रयुक्त वोल्टता जैसे उत्तेजक किसी अर्धचालक में गतिमान आवेशों की संख्या परिवर्तित कर सकते हैं।
अर्धचालक युक्तियों को औपचारिक रूप से समझे जाने से भी बहुत पहले प्रकृति में पाए जाने वाले गैलेना (लैड सल्फाइड PbS) के एक क्रिस्टल जिसके साथ धातु का एक संपर्क बिंदु संयोजित था, का उपयोग रेडियो तरंगों के संसूचक के रूप में किया जा चुका था।
निम्नलिखित अनुभागों में हम अर्धचालक भौतिकी की कुछ मूल अवधारणाओं से परिचय कराएँगे तथा संधि डायोड (2-इलेक्ट्रोडों की युक्ति) तथा द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर (3-इलेक्ट्रोडों की युक्ति) जैसी कुछ अर्धचालक युक्तियों की चर्चा करेंगे।
- सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज हुई; इससे पहले निर्वात नलिकाएँ (वाल्व) प्रयुक्त होती थीं।
- निर्वात डायोड में 2 इलेक्ट्रोड (एनोड/प्लेट, कैथोड); ट्रायोड में 3 (कैथोड, प्लेट, ग्रिड); टेट्रोड में 4; पेंटोड में 5 इलेक्ट्रोड होते हैं।
- निर्वात नलिकाओं में इलेक्ट्रॉन केवल कैथोड से एनोड की ओर (एक ही दिशा में) प्रवाहित होते हैं।
- ठोस-अवस्था अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी का प्रादुर्भाव सन् 1930 में हुआ।
- अर्धचालक युक्तियों में आवेश वाहकों की आपूर्ति व प्रवाह ठोस के भीतर ही होता है।
- गैलेना (PbS) क्रिस्टल का उपयोग प्राचीन काल में रेडियो तरंगों के संसूचक के रूप में किया गया था।
2 धातुओं, चालकों तथा अर्धचालकों का वर्गीकरण
चालकता एवं ऊर्जा बैंड के आधार पर
चालकता के आधार पर
विद्युत चालकता (σ) अथवा प्रतिरोधकता (ρ = 1/σ) के सापेक्ष मान के आधार पर ठोस पदार्थों का निम्न प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है:
| वर्ग | प्रतिरोधकता ρ (Ω m) | चालकता σ (S m⁻¹) |
|---|---|---|
| धातु | 10⁻² – 10⁻⁸ | 10² – 10⁸ |
| अर्धचालक | 10⁻⁵ – 10⁶ | 10⁵ – 10⁻⁶ |
| विद्युतरोधी | 10¹¹ – 10¹⁹ | 10⁻¹¹ – 10⁻¹⁹ |
अर्धचालकों के प्रकार
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| तात्विक अर्धचालक (Elemental) | Si और Ge |
| यौगिक अकार्बनिक | CdS, GaAs, CdSe, InP आदि |
| यौगिक कार्बनिक | एंथ्रासीन, मादित थैलोस्यानीस आदि |
| कार्बनिक बहुलक (Organic polymers) | पॉलीपाइरोल, पॉलीऐनिलीन, पॉलीथायोफ़ीन आदि |
इस अध्याय में हम केवल अकार्बनिक अर्धचालक, विशेषकर तात्विक अर्धचालकों Si तथा Ge के अध्ययन तक ही सीमित रहेंगे।
ऊर्जा बैंड के आधार पर
बोर परमाणु मॉडल के अनुसार किसी वियुक्त परमाणु में उसके किसी इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा उस इलेक्ट्रॉन की परिभ्रमण कक्षा पर निर्भर करती है। परंतु जब परमाणु एक-दूसरे के निकट आकर कोई ठोस बना लेते हैं तो निकटस्थ परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों की बाह्य कक्षाएँ अत्यधिक पास-पास आ जाती हैं और एक-दूसरे को ढक लेती हैं। इसके परिणामस्वरूप किसी ठोस में इलेक्ट्रॉन की गति की प्रकृति किसी वियुक्त परमाणु के इलेक्ट्रॉन की गति से अत्यधिक भिन्न हो जाती है।
किसी क्रिस्टल के भीतर प्रत्येक इलेक्ट्रॉन की अपनी अद्वितीय स्थिति होती है, इसीलिए प्रत्येक इलेक्ट्रॉन के ऊर्जा स्तर भिन्न होते हैं। ये भिन्न ऊर्जा स्तर ऊर्जा बैंडों का निर्माण करते हैं। वह ऊर्जा स्तर जिसमें संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर समाविष्ट हैं, संयोजकता बैंड कहलाता है। संयोजकता बैंड के ऊपर स्थित बैंड को चालन बैंड कहते हैं।
तीन प्रकरण — धातु, विद्युतरोधी व अर्धचालक
| प्रकरण | पदार्थ | ऊर्जा अंतराल E_g | व्यवहार |
|---|---|---|---|
| प्रकरण I | धातु | चालन व संयोजकता बैंड अतिव्यापी (E_g ≈ 0) | संयोजकता बैंड से इलेक्ट्रॉन सरलता से चालन बैंड में जाते हैं — प्रतिरोध कम, चालकता उच्च |
| प्रकरण II | विद्युतरोधी | E_g > 3 eV (अधिक) | तापीय उत्तेजन से भी इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में नहीं पहुँच सकते — कोई विद्युत चालन संभव नहीं |
| प्रकरण III | अर्धचालक | E_g < 3 eV (लघु परिमित अंतराल) | कमरे के ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन अंतराल पार कर चालन बैंड में पहुँच जाते हैं — मध्यम प्रतिरोध |
- धातु: ρ ~ 10⁻² – 10⁻⁸ Ωm; अर्धचालक: ρ ~ 10⁻⁵ – 10⁶ Ωm; विद्युतरोधी: ρ ~ 10¹¹ – 10¹⁹ Ωm।
- संयोजकता बैंड (Valence band): संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर वाला बैंड (नीचे)।
- चालन बैंड (Conduction band): संयोजकता बैंड के ऊपर स्थित बैंड।
- ऊर्जा बैंड अंतराल (E_g): संयोजकता बैंड के शीर्ष और चालन बैंड की तली के बीच का अंतराल।
- धातु में E_g ≈ 0; विद्युतरोधी में E_g > 3 eV; अर्धचालक में E_g < 3 eV।
- कार्बन (डायमंड): E_g = 5.4 eV; सिलिकॉन (Si): E_g = 1.1 eV; जर्मेनियम (Ge): E_g = 0.7 eV।
- Sn (टिन) चौथे समूह का तत्व है परंतु धातु है क्योंकि इसका E_g ≈ 0 eV है।
3 नैज अर्धचालक
शुद्ध अर्धचालक — इलेक्ट्रॉन व होल
Ge और Si का सबसे साधारण उदाहरण लेंगे जिनकी जालक रचना हीरे जैसी रचना कहलाती है। प्रत्येक परमाणु चार अन्य निकटतम परमाणुओं द्वारा घिरा होता है। Si और Ge में चार संयोजकता इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसकी क्रिस्टलीय रचना में प्रत्येक Si या Ge परमाणु अपने चार संयोजकता इलेक्ट्रॉनों में से एक-एक इलेक्ट्रॉन को अपने चार निकटतम परमाणुओं के साथ सहभागिता कराने की प्रवृत्ति रखता है — यही सहभागी इलेक्ट्रॉन युगल सहसंयोजी बंध या संयोजकता आबंध कहलाते हैं।
जैसे-जैसे ताप बढ़ता है, इन इलेक्ट्रॉनों को और ऊष्मीय ऊर्जा प्राप्त होने लगती है जिससे इनमें से कुछ इलेक्ट्रॉन टूट कर अलग हो सकते हैं (मुक्त इलेक्ट्रॉन बनकर चालन में योगदान करते हैं)। ऊष्मीय ऊर्जा क्रिस्टलीय जालक के कुछ परमाणुओं को प्रभावी रूप से आयनीकृत कर देती है तथा बंध में एक रिक्त स्थान बना देती है। मुक्त इलेक्ट्रॉन (आवेश −q) जहाँ से निकलकर आया है, वहाँ वह प्रभावी आवेश (+q) का एक रिक्त स्थान छोड़ देता है — इसे होल कहते हैं। होल प्रभावी धनात्मक आवेश वाले एक आभासी मुक्त कण की तरह व्यवहार करता है।
यहाँ ni को नैज वाहक सांद्रता कहते हैं — नैज अर्धचालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या ne, होलों की संख्या nh के बराबर होती है।
होल की गति व धारा
अर्धचालकों में यह अद्वितीय गुण होता है कि उनमें इलेक्ट्रॉनों के साथ-साथ होल भी गति करते हैं। जब कभी क्रिस्टल में कहीं भी एक अपूरित बंध होगा तब बंधित इलेक्ट्रॉनों की वास्तविक गति होगी और इसका वर्णन करने के लिए होलों की गति केवल एक सहज उपाय है। किसी वास्तविक क्रिस्टल में विद्युत क्षेत्र की क्रिया के फलस्वरूप यह होल ऋणात्मक विभव की ओर गति करते हैं, जिससे एक होल धारा Ih मिलती है।
- Si व Ge में 4 संयोजकता इलेक्ट्रॉन होते हैं; इनकी जालक रचना हीरे जैसी होती है।
- प्रत्येक परमाणु 4 निकटतम परमाणुओं से सहसंयोजी बंध बनाता है।
- नैज अर्धचालक में n_e = n_h = n_i (नैज वाहक सांद्रता)।
- होल: बंध में इलेक्ट्रॉन की रिक्ति — प्रभावी धनात्मक आवेश वाला आभासी मुक्त कण।
- कुल धारा I = I_e + I_h।
- साम्यावस्था में आवेश वाहकों की उत्पत्ति दर = पुनःसंयोजन दर।
- 0 K पर नैज अर्धचालक विद्युतरोधी की भाँति व्यवहार करता है।
4 अपद्रव्यी अर्धचालक
मादन (Doping), n-प्रकार व p-प्रकार
किसी नैज अर्धचालक की चालकता उसके ताप पर निर्भर करती है, परंतु कक्ष-ताप पर इसकी चालकता बहुत कम होती है। इसलिए कोई भी महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक युक्ति नैज अर्धचालकों द्वारा विकसित नहीं की जा सकती। इनकी चालकता में सुधार अर्धचालकों में अशुद्धियों का उपयोग करके किया जाता है।
जब किसी शुद्ध अर्धचालक में कोई उपयुक्त अशुद्धि अत्यल्प मात्रा में (जैसे कुछ भाग प्रति मिलियन, ppm में) मिलाई जाती है तो उसकी चालकता में कई गुना वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार के पदार्थों को अपद्रव्यी अर्धचालक अथवा अशुद्धि अर्धचालक कहते हैं। वांछित अशुद्धि को सावधानीपूर्वक मिश्रित करना मादन या अपमिश्रण कहलाता है तथा अशुद्धि परमाणु अपमिश्रक कहलाते हैं।
चतुःसंयोजक Si अथवा Ge के मादन के लिए दो प्रकार के अपमिश्रक उपयोग किए जाते हैं:
| अपमिश्रक प्रकार | संयोजकता | उदाहरण | अर्धचालक प्रकार |
|---|---|---|---|
| पंच संयोजक | 5 | आर्सेनिक (As), ऐंटीमनी (Sb), फ़ॉस्फ़ोरस (P) | n-प्रकार |
| त्रि संयोजक | 3 | इंडियम (In), बोरॉन (B), ऐलुमिनियम (Al) | p-प्रकार |
n-प्रकार का अर्धचालक
मान लीजिए कि हम Si या Ge (संयोजकता 4) को एक पंचसंयोजक (संयोजकता 5) तत्व से अपमिश्रित करें। जब +5 संयोजकता वाला तत्व Si के एक परमाणु को प्रतिस्थापित करके अपना स्थान ग्रहण करता है तो इसके इलेक्ट्रॉनों में से चार, निकटवर्ती चार सिलिकॉन परमाणुओं से बंध बनाते हैं, जबकि पाँचवाँ इलेक्ट्रॉन जनक परमाणु से दुर्बल बंध द्वारा जुड़ा रहता है।
पंचसंयोजक अपमिश्रक के साथ अपमिश्रण होने पर इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक तथा होल अल्पांश आवेश वाहक बन जाते हैं। इसीलिए इस प्रकार के अर्धचालकों को n-प्रकार के अर्धचालक कहते हैं।
p-प्रकार का अर्धचालक
p-प्रकार का अर्धचालक तब बनता है जब Si या Ge (चतुर्थसंयोजी) में ग्रुप-III की त्रिसंयोजी अशुद्धियाँ; जैसे Al, B, In आदि अपमिश्रित की जाती हैं। अपमिश्रक में Si या Ge की अपेक्षा एक बाहरी इलेक्ट्रॉन कम होता है और इसलिए यह परमाणु तीन ओर से Si परमाणुओं से बंध बना सकता है, लेकिन चौथी ओर बंध बनाने के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन उपलब्ध न होने के कारण चौथा बंध बनाने में सफल नहीं हो पाता। अतः त्रिसंयोजक परमाणु तथा चौथे निकटस्थ परमाणु के बीच बंध में एक रिक्ति अथवा होल होता है।
त्रिसंयोजक अपमिश्रक को ग्राही अशुद्धि कहते हैं। p-प्रकार के अर्धचालकों में होल बहुसंख्यक वाहक तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक हैं।
तापीय साम्य में वाहक सांद्रता
- अपद्रव्यी अर्धचालक: शुद्ध अर्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि (ppm मात्रा में) मिलाने से बना अर्धचालक।
- मादन (Doping) = अशुद्धि मिश्रित करना; अपमिश्रक (Dopant) = अशुद्धि परमाणु।
- पंचसंयोजक अपमिश्रक (As, Sb, P) → n-प्रकार अर्धचालक; दाता अशुद्धि।
- त्रिसंयोजक अपमिश्रक (In, B, Al) → p-प्रकार अर्धचालक; ग्राही अशुद्धि।
- n-प्रकार में n_e >> n_h; p-प्रकार में n_h >> n_e।
- तापीय साम्य संबंध: n_e n_h = n_i² (सभी दशाओं में लागू)।
- अपद्रव्यी अर्धचालकों में क्रिस्टल समग्र रूप से विद्युत उदासीन रहता है।
- Si में दाता आयनन ऊर्जा ≈0.05 eV; Ge में ≈0.01 eV (नैज बैंड-गैप से बहुत कम)।
5 p-n संधि
विसरण, अपवाह व हासी क्षेत्र
p-n संधि बहुत सी अर्धचालक युक्तियों जैसे डायोड, ट्रांजिस्टर आदि की मूल इकाई है। p-प्रकार के सिलिकॉन (p-Si) अर्धचालक की पतली पटलिका पर विचार कीजिए। परिशुद्ध रूप से पंचसंयोजक अशुद्धि की अल्प मात्रा मिलाकर किसी p-Si पटलिका के कुछ भाग को n-Si में परिवर्तित किया जा सकता है।
किसी p-n संधि के निर्माण के समय दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ होती हैं — विसरण तथा अपवाह।
विसरण (Diffusion)
किसी n-प्रकार के अर्धचालक में इलेक्ट्रॉनों की सांद्रता होलों की सांद्रता की तुलना में अधिक होती है। इसी प्रकार p-प्रकार के अर्धचालक में होलों की सांद्रता इलेक्ट्रॉनों की सांद्रता की तुलना में अधिक होती है। p-n संधि के निर्माण के समय, सांद्रता प्रवणता के कारण होल p-फलक से n-फलक (p→n) की ओर विसरित होते हैं तथा इलेक्ट्रॉन n-फलक से p-फलक (n→p) की ओर विसरित होते हैं। आवेश वाहकों की इस गति के कारण संधि से एक विसरण धारा प्रवाहित होती है।
हासी क्षेत्र (Depletion region)
जब कोई इलेक्ट्रॉन p से n की ओर विसरित होता है तो वह अपने पीछे एक आयनित दाता n-फलक पर छोड़ देता है (निश्चल धनावेश)। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉन विसरित होते हैं, संधि के n-फलक पर धनावेश की एक परत विकसित हो जाती है। इसी प्रकार, जब कोई होल p→n की ओर विसरित होता है तो वह अपने पीछे एक आयनित ग्राही (ऋणात्मक आवेश) छोड़ देता है — संधि के p-फलक पर ऋणात्मक आवेश की परत विकसित हो जाती है।
अपवाह (Drift) व रोधिका विभव
संधि के n-फलक पर धनात्मक स्पेस-चार्ज क्षेत्र तथा p-फलक पर ऋणात्मक स्पेस-चार्ज क्षेत्र होने के कारण संधि पर धनात्मक आवेश से ऋणात्मक आवेश की ओर एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इस क्षेत्र के कारण संधि के p-फलक का इलेक्ट्रॉन n-फलक की ओर तथा संधि के n-फलक का होल p-फलक की ओर गति करता है — इस गति को अपवाह कहते हैं, जो विसरण धारा के विपरीत होती है।
यह प्रक्रम उस समय तक चलता रहता है जब तक कि विसरण धारा तथा अपवाह धारा परिमाण में समान नहीं हो जातीं। साम्यावस्था में p-n संधि पर कोई नेट विद्युत धारा नहीं होती।
- p-n संधि निर्माण में दो प्रक्रियाएँ: विसरण तथा अपवाह।
- विसरण: सांद्रता प्रवणता के कारण होल p→n तथा इलेक्ट्रॉन n→p की ओर गति करते हैं।
- हासी क्षेत्र: संधि पर बना मुक्त आवेश-रहित स्पेस-चार्ज क्षेत्र।
- अपवाह: विद्युत क्षेत्र के कारण होने वाली विपरीत गति।
- साम्यावस्था में विसरण धारा = अपवाह धारा; संधि पर कोई नेट धारा नहीं।
- रोधिका विभव V₀ साम्यावस्था में विकसित होता है।
- p-n संधि केवल दो अर्धचालक टुकड़ों को भौतिक रूप से जोड़कर नहीं बनाई जा सकती।
6 अर्धचालक डायोड
अग्रदिशिक व पश्चदिशिक बायस
अर्धचालक डायोड मूल रूप से एक p-n संधि होती है जिसके सिरों पर धात्विक संपर्क जुड़े होते हैं ताकि इस संधि पर कोई बाह्य वोल्टता अनुप्रयुक्त की जा सके। इस युक्ति के दो टर्मिनल होते हैं।
अग्रदिशिक बायस में p-n संधि डायोड
जब किसी अर्धचालक डायोड के दो सिरों के बीच कोई बाह्य वोल्टता V इस प्रकार अनुप्रयुक्त की जाती है कि बैटरी का धन टर्मिनल p-फलक से तथा ऋण टर्मिनल n-फलक से संयोजित करते हैं, तो इसे अग्रदिशिक बायसित कहते हैं।
अनुप्रयुक्त वोल्टता की दिशा अंतःनिर्मित विभव V₀ के विपरीत होती है। इसके परिणामस्वरूप, हासी स्तर की मोटाई घट जाती है तथा रोधिका ऊँचाई कम हो जाती है — अग्रदिशिक बायस में प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ − V) होती है।
कुल अग्रदिशिक डायोड धारा का मान होल विसरण धारा तथा इलेक्ट्रॉन विसरण के कारण पारंपरिक धारा का योग होता है। इस धारा का परिमाण प्रायः मिलीऐम्पियर में होता है।
पश्चदिशिक बायस में p-n संधि डायोड
जब किसी अर्धचालक डायोड के दो सिरों के बीच कोई बाह्य वोल्टता (V) इस प्रकार अनुप्रयुक्त करते हैं कि बैटरी के धन टर्मिनल को n-फलक से तथा ऋण टर्मिनल को p-फलक से जोड़ते हैं, तो डायोड को पश्चदिशिक बायसित कहते हैं।
यहाँ अनुप्रयुक्त वोल्टता की दिशा रोधिका विभव की दिशा के समान होती है। इसके परिणामस्वरूप रोधिका की ऊँचाई बढ़ जाती है तथा हासी क्षेत्र की चौड़ाई में वृद्धि हो जाती है — पश्चदिशिक बायसन् में प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ + V) होती है। यह विसरण धारा को अत्यधिक कम कर देती है।
भंजन वोल्टता (Breakdown voltage)
पश्चदिशिक बायस में किसी क्रांतिक पश्चदिशिक वोल्टता तक विद्युतधारा सारभूत रूप से वोल्टता पर निर्भर नहीं करती। इस वोल्टता को भंजन वोल्टता कहते हैं। जब V = Vbr तब डायोड पश्चदिशिक धारा में तेज़ी से वृद्धि होती है — यहाँ तक कि बायस वोल्टता में अल्प वृद्धि करने पर भी धारा में अत्यधिक परिवर्तन हो जाता है।
गतिक प्रतिरोध
- अर्धचालक डायोड मूल रूप से एक p-n संधि है जिसके सिरों पर धात्विक संपर्क होते हैं।
- अग्रदिशिक बायस: बैटरी का धन p-फलक से, ऋण n-फलक से जुड़ा — प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ − V), धारा mA में।
- पश्चदिशिक बायस: बैटरी का धन n-फलक से, ऋण p-फलक से जुड़ा — प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ + V), धारा µA में (नगण्य)।
- अल्पांश वाहक अंतःक्षेपण अग्रदिशिक बायस में होता है।
- देहली/कट-इन वोल्टता: जर्मेनियम ≈0.2V; सिलिकॉन ≈0.7V।
- भंजन वोल्टता (V_br): जिस पर पश्चदिशिक धारा में अचानक तीव्र वृद्धि हो जाती है।
- गतिक प्रतिरोध r_d = ΔV/ΔI।
- अग्रदिशिक बायस मापन के लिए मिलीऐमीटर; पश्चदिशिक बायस मापन के लिए माइक्रोऐमीटर।
7 संधि डायोड का दिष्टकारी के रूप में अनुप्रयोग
अर्ध-तरंग व पूर्ण तरंग दिष्टकारी
किसी संधि डायोड के V-I अभिलाक्षणिक में हम यह देखते हैं कि वह केवल तभी विद्युत धारा प्रवाहित होने देता है जब वह अग्रदिशिक बायसित होता है। अतः यदि किसी डायोड के सिरों पर कोई प्रत्यावर्ती वोल्टता अनुप्रयुक्त की जाए तो चक्र के केवल उसी भाग में परिपथ में धारा प्रवाहित होगी जब डायोड अग्रदिशिक बायसित है। डायोड के इस गुण का उपयोग प्रत्यावर्ती वोल्टता का दिष्टकरण करने में किया जाता है — इस कार्य के लिए जिस परिपथ का उपयोग करते हैं उसे दिष्टकारी कहते हैं।
अर्ध-तरंग दिष्टकारी
यदि डायोड के सिरों पर कोई प्रत्यावर्ती (ac) वोल्टता श्रेणीक्रम में संयोजित लोड प्रतिरोध RL के साथ अनुप्रयुक्त की जाए तो लोड के सिरों पर केवल ac निवेश के उस अर्धचक्र में जिसमें डायोड अग्रदिशिक बायसित है, एक स्पंदमान वोल्टता दृष्टिगोचर होगी। ट्रांसफ़ार्मर की द्वितीयक कुंडली टर्मिनल A तथा B पर वांछित ac वोल्टता की आपूर्ति करती है।
पूर्ण तरंग दिष्टकारी
दो डायोडों का उपयोग करके एक ऐसी परिपथ व्यवस्था की जाती है जिससे ac चक्र के धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों ही अर्धचक्रों में तदनुरूपी दिष्टकृत निर्गत वोल्टता प्राप्त होती है। इसमें दोनों डायोडों के n-फलकों को एक साथ संयोजित कर देते हैं तथा निर्गत को डायोडों के इस उभयनिष्ठ बिंदु तथा ट्रांसफ़ार्मर की द्वितीयक कुंडली के मध्य बिंदु के बीच प्राप्त किया जाता है — इस ट्रांसफ़ार्मर को मध्य निष्कासी ट्रांसफ़ार्मर कहते हैं।
प्रत्येक डायोड द्वारा दिष्टकृत वोल्टता कुल द्वितीयक कुंडली से प्राप्त वोल्टता की केवल आधी ही है — प्रत्येक डायोड केवल आधे चक्र का दिष्टकरण करता है, परंतु दो डायोड प्रत्यावर्ती चक्रों का दिष्टकरण करते हैं। स्पष्टतः, दिष्ट वोल्टता या धारा प्राप्त करने के लिए यह अर्ध-तरंग दिष्टकारी से अधिक दक्ष परिपथ है।
संधारित्र फ़िल्टर
इस प्रकार प्राप्त दिष्टकृत वोल्टता अर्ध ज्याक्रोणी आकृति की होती है। यद्यपि यह एकदिशिक होती है परंतु इसका मान स्थायी नहीं होता। स्पंदमान वोल्टता से dc निर्गत प्राप्त करने के लिए निर्गत टर्मिनलों के सिरों पर सामान्यतः कोई संधारित्र संयोजित कर देते हैं — इसे फ़िल्टर कहते हैं।
- दिष्टकारी: ac वोल्टता को dc में परिवर्तित करने वाला परिपथ; डायोड की एक-दिशिक धारा प्रवाह क्षमता पर आधारित।
- अर्ध-तरंग दिष्टकारी: एक डायोड, केवल एक अर्धचक्र में निर्गत — निर्गत आवृत्ति = निवेश आवृत्ति।
- पूर्ण तरंग दिष्टकारी: दो डायोड + मध्य निष्कासी ट्रांसफ़ार्मर (या 4 डायोड), दोनों अर्धचक्रों में निर्गत — निर्गत आवृत्ति = 2×निवेश आवृत्ति।
- पूर्ण तरंग दिष्टकारी, अर्ध-तरंग दिष्टकारी से अधिक दक्ष है।
- दिष्टकृत निर्गत को स्थिर dc बनाने के लिए संधारित्र फ़िल्टर उपयोग किया जाता है।
- फ़िल्टर कालांक (τ = R_L C) जितना अधिक, निर्गत वोल्टता उतनी ही अधिक शिखर मान के निकट व स्थिर रहती है।
8 ट्रांजिस्टर
तीन-टर्मिनल अर्धचालक युक्ति एवं प्रवर्धन
ट्रांजिस्टर तीन भागों से बनी एक अर्धचालक युक्ति है — उत्सर्जक (Emitter, E), आधार (Base, B) तथा संग्राहक (Collector, C)। यह दो प्रकार का होता है: n-p-n तथा p-n-p। आधार अत्यंत पतला (~कुछ माइक्रोमीटर) व हल्के रूप से अपमिश्रित होता है, जबकि उत्सर्जक भारी रूप से अपमिश्रित तथा संग्राहक मध्यम रूप से अपमिश्रित व बड़े आकार का होता है।
धाराओं में संबंध
उत्सर्जक धारा (IE) का अधिकांश भाग (~95–99%) संग्राहक धारा (IC) के रूप में तथा शेष अल्प भाग आधार धारा (IB) के रूप में प्रवाहित होता है।
उभयनिष्ठ उत्सर्जक (Common Emitter, CE) विन्यास
इस विन्यास में उत्सर्जक इनपुट तथा आउटपुट दोनों परिपथों के लिए उभयनिष्ठ (सामान्य) होता है — यह प्रवर्धक के रूप में सर्वाधिक प्रयुक्त विन्यास है।
हल: β = ΔIC/ΔIB = (10−5)mA/(150−100)μA = 5×10⁻³/50×10⁻⁶ = 100
- ट्रांजिस्टर तीन-टर्मिनल युक्ति: उत्सर्जक (E), आधार (B), संग्राहक (C)।
- दो प्रकार: n-p-n तथा p-n-p।
- ट्रांजिस्टर क्रिया हेतु: E-B संधि अग्र-अभिनत, B-C संधि पश्च-अभिनत।
- धारा संबंध: I_E = I_B + I_C (I_E सबसे बड़ी)।
- उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास: इनपुट व आउटपुट दोनों के लिए उत्सर्जक सामान्य।
- β = ΔI_C/ΔI_B; α = ΔI_C/ΔI_E; β = α/(1−α)।
- वोल्टता लब्धि A_V = β×R_L/R_i; शक्ति लब्धि = β×A_V।
- CE विन्यास प्रवर्धकों में सर्वाधिक प्रयुक्त।
9 डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी व लॉजिक गेट
बूलियन बीजगणित एवं डिजिटल परिपथ
डिजिटल परिपथों में सिग्नल केवल दो विविक्त स्तरों — 0 (निम्न) तथा 1 (उच्च) — में होते हैं। लॉजिक गेट वह डिजिटल परिपथ है जो एक या अधिक द्वि-आधारी (binary) निवेशों को बूलियन बीजगणित के नियमानुसार संसाधित कर एक निर्गत उत्पन्न करता है। ये अर्धचालक डायोड व ट्रांजिस्टर से निर्मित होते हैं।
मूल लॉजिक गेट व बूलियन व्यंजक
| गेट | बूलियन व्यंजक | नियम |
|---|---|---|
| OR | Y = A+B | निर्गत 1 तभी जब कम से कम एक निवेश 1 हो |
| AND | Y = A·B | निर्गत 1 तभी जब सभी निवेश 1 हों |
| NOT | Y = Ā | निर्गत सदैव निवेश के विपरीत (प्रतिलोम) |
| NAND | Y = A·B | AND के बाद NOT — निर्गत 0 तभी जब सभी निवेश 1 हों |
| NOR | Y = A+B | OR के बाद NOT — निर्गत 1 तभी जब सभी निवेश 0 हों |
सत्यमान सारणियाँ (A, B निवेश; Y निर्गत)
| A | B | OR (A+B) | AND (A·B) | NAND | NOR |
|---|---|---|---|---|---|
| 0 | 0 | 0 | 0 | 1 | 1 |
| 0 | 1 | 1 | 0 | 1 | 0 |
| 1 | 0 | 1 | 0 | 1 | 0 |
| 1 | 1 | 1 | 1 | 0 | 0 |
- डिजिटल परिपथ में सिग्नल दो ही स्तर: 0 (निम्न) व 1 (उच्च)।
- लॉजिक गेट: बूलियन बीजगणित के नियमानुसार निवेशों को संसाधित कर निर्गत देता है।
- मूल गेट: OR, AND, NOT; सार्वत्रिक गेट: NAND, NOR।
- NAND = AND + NOT; NOR = OR + NOT।
- NAND का निर्गत 0 तभी जब सभी निवेश 1 (सत्यमान सारणी से)।
- NOR का निर्गत 1 तभी जब सभी निवेश 0।
- NAND/NOR के दोनों निवेश जोड़ने पर NOT गेट प्राप्त होता है।
- डी मॉर्गन के नियम: (A·B)' = A'+B' तथा (A+B)' = A'·B'।
✓ सारांश व सूत्र-सूची
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
वर्गीकरण
धातु (ρ~10⁻⁸–10⁻² Ωm); अर्धचालक (ρ~10⁻⁵–10⁶ Ωm); विद्युतरोधी (ρ~10¹¹–10¹⁹ Ωm)
ऊर्जा बैंड अंतराल
C: 5.4eV; Si: 1.1eV; Ge: 0.7eV; Sn: ≈0eV
नैज अर्धचालक
n_e = n_h = n_i
अपद्रव्यी अर्धचालक
n-प्रकार (दाता, पंचसंयोजी); p-प्रकार (ग्राही, त्रिसंयोजी)
तापीय साम्य संबंध
n_e n_h = n_i² (सभी अर्धचालकों के लिए)
p-n संधि
विसरण + अपवाह; हासी क्षेत्र; रोधिका विभव V₀
डायोड
अग्रदिशिक: mA, कम प्रतिरोध; पश्चदिशिक: µA, अधिक प्रतिरोध
दिष्टकारी
अर्ध-तरंग (50Hz→50Hz); पूर्ण-तरंग (50Hz→100Hz)
ट्रांजिस्टर व लॉजिक गेट
β=ΔI_C/ΔI_B; NAND व NOR सार्वत्रिक गेट
📊 भौतिक राशियाँ तालिका
प्रतीक, मात्रक एवं सूत्र
| राशि/संबंध | सूत्र | टिप्पणी |
|---|---|---|
| नैज वाहक सांद्रता संबंध | ne = nh = ni | नैज अर्धचालकों के लिए |
| तापीय साम्य संबंध | ne nh = ni² | सभी दशाओं में (नैज व अपद्रव्यी दोनों) |
| n-प्रकार अर्धचालक | ne >> nh | पंचसंयोजी अपमिश्रण से |
| p-प्रकार अर्धचालक | nh >> ne | त्रिसंयोजी अपमिश्रण से |
| कुल धारा | I = Ie + Ih | इलेक्ट्रॉन धारा + होल धारा |
| अग्रदिशिक बायस रोधिका ऊँचाई | (V₀ − V) | रोधिका कम हो जाती है |
| पश्चदिशिक बायस रोधिका ऊँचाई | (V₀ + V) | रोधिका बढ़ जाती है |
| गतिक प्रतिरोध | rd = ΔV/ΔI | वोल्टता व धारा के लघु परिवर्तनों का अनुपात |
| अर्ध-तरंग दिष्टकारी निर्गत आवृत्ति | fout = fin | निवेश आवृत्ति के बराबर |
| पूर्ण तरंग दिष्टकारी निर्गत आवृत्ति | fout = 2 fin | निवेश आवृत्ति की दुगुनी |
| ट्रांजिस्टर धारा संबंध | IE = IB + IC | उत्सर्जक धारा सबसे अधिक |
| ट्रांजिस्टर धारा प्रवर्धन (CE) | β = ΔIC/ΔIB | उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास |
| शक्ति लब्धि | β × AV | धारा लब्धि × वोल्टता लब्धि |
★ NEET फैक्ट-शीट
त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| ट्रांजिस्टर की खोज | सन् 1948 में |
| निर्वात नलिकाओं के इलेक्ट्रोड | डायोड 2; ट्रायोड 3; टेट्रोड 4; पेंटोड 5 |
| अर्धचालक उदाहरण | Si, Ge, GaAs, CdS, CdSe, InP |
| ऊर्जा अंतराल — कार्बन | 5.4 eV (विद्युतरोधी) |
| ऊर्जा अंतराल — Si | 1.1 eV (अर्धचालक) |
| ऊर्जा अंतराल — Ge | 0.7 eV (अर्धचालक) |
| ऊर्जा अंतराल — Sn | ≈0 eV (धातु) |
| नैज अर्धचालक में | n_e = n_h = n_i |
| तापीय साम्य संबंध | n_e × n_h = n_i² |
| n-प्रकार अपमिश्रक | पंचसंयोजी (As, Sb, P) — दाता |
| p-प्रकार अपमिश्रक | त्रिसंयोजी (In, B, Al) — ग्राही |
| n-प्रकार में बहुसंख्यक वाहक | इलेक्ट्रॉन |
| p-प्रकार में बहुसंख्यक वाहक | होल |
| p-n संधि में हासी क्षेत्र | माइक्रोमीटर के दसवें भाग की कोटि |
| अग्रदिशिक बायस धारा | mA में |
| पश्चदिशिक बायस धारा | µA में |
| कट-इन वोल्टता — Ge | ≈0.2 V |
| कट-इन वोल्टता — Si | ≈0.7 V |
| अर्ध-तरंग दिष्टकारी आवृत्ति (50Hz निवेश) | 50 Hz निर्गत |
| पूर्ण-तरंग दिष्टकारी आवृत्ति (50Hz निवेश) | 100 Hz निर्गत |
| ट्रांजिस्टर के तीन टर्मिनल | E (उत्सर्जक), B (आधार), C (संग्राहक) |
| ट्रांजिस्टर क्रिया की शर्त | E-B संधि अग्र; B-C संधि पश्च |
| ट्रांजिस्टर में धारा संबंध | I_E = I_B + I_C |
| β (CE विन्यास) | β = ΔI_C/ΔI_B |
| सार्वत्रिक गेट | NAND, NOR |
| NAND का निर्गत 0 कब? | सभी निवेश 1 होने पर |
| NOR का निर्गत 1 कब? | सभी निवेश 0 होने पर |
| डी मॉर्गन के नियम | (A·B)' = A'+B'; (A+B)' = A'·B' |
📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु
1 कार्बन, सिलिकॉन तथा जर्मेनियम परमाणुओं में प्रत्येक के चार संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनके संयोजकता व चालन बैंड ऊर्जा अंतराल क्रमशः (Eg)C, (Eg)Si व (Eg)Ge द्वारा निरूपित हैं। निम्न में से कौन-सा संबंध सत्य है?
उत्तर: (Eg)_C > (Eg)_Si > (Eg)_Ge
परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ संयोजी इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर की कक्षा में होते हैं, अतः वर्जित ऊर्जा अंतराल घटता है (C: 5.4 eV, Si: 1.1 eV, Ge: 0.7 eV)
2 यदि शुद्ध जर्मेनियम क्रिस्टल में एंटीमनी की थोड़ी मात्रा मिलाई जाए, तो यह ______ हो जाएगा।
उत्तर: n-प्रकार (n-type)
एंटीमनी (Sb) पंचसंयोजी (Group 15) तत्व है — यह दाता अशुद्धि के रूप में कार्य करता है, प्रत्येक Sb परमाणु एक अतिरिक्त शिथिल-बद्ध इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है।
3 500K पर शुद्ध सिलिकॉन में इलेक्ट्रॉन (n_e) व होल (n_h) की सांद्रता समान अर्थात् 1.5×10¹⁶ m⁻³ है। इंडियम अपमिश्रण द्वारा n_h को बढ़ाकर 4.5×10²² m⁻³ कर दिया जाता है। परिणामी अपमिश्रित अर्धचालक किस प्रकार का होगा?
उत्तर: p-प्रकार का अर्धचालक
n_e × n_h = n_i² ⟹ n_e = n_i²/n_h = (1.5×10¹⁶)²/(4.5×10²²) = 5×10⁹ m⁻³
चूँकि n_h (4.5×10²²) >> n_e (5×10⁹), होल बहुसंख्यक वाहक हैं — यह p-प्रकार है (इंडियम त्रिसंयोजी ग्राही अशुद्धि है)।
4 किसी ट्रांजिस्टर को उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में नियत संग्राहक वोल्टता V_C=1.5V पर संचालित किया जाता है, जिसमें आधार धारा में 100μA से 150μA का परिवर्तन, संग्राहक धारा में 5mA से 10mA का परिवर्तन उत्पन्न करता है। धारा प्रवर्धन गुणांक β ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 100
β = ΔI_C/ΔI_B = (10−5)mA/(150−100)μA = 5×10⁻³/50×10⁻⁶ = 100
5 किसी उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि 50 है, निवेश प्रतिबाधा 100Ω तथा निर्गत प्रतिबाधा 200Ω है। प्रवर्धक की शक्ति लब्धि ज्ञात कीजिए।
उत्तर: 1250
धारा लब्धि = वोल्टता लब्धि × (R_i/R_o) = 50×(100/200) = 25
शक्ति लब्धि = वोल्टता लब्धि × धारा लब्धि = 50×25 = 1250
6 दो निवेशों A व B तथा निर्गत Y वाले किसी लॉजिक परिपथ की सत्यमान सारणी इस प्रकार है: A=1,B=1→Y=0; A=1,B=0→Y=1; A=0,B=1→Y=1; A=0,B=0→Y=1। यह कौन-सा गेट है?
उत्तर: NAND गेट
निर्गत केवल तभी 0 है जब दोनों निवेश 1 हों — यही NAND गेट की विशिष्ट पहचान है (Y = A·B का पूरक)।
➕ अतिरिक्त NEET तथ्य
सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं
- यह अध्याय NEET में प्रतिवर्ष 2–4 प्रश्न (8–16 अंक) रखता है — भौतिकी के भारी अध्यायों में गिना जाता है; सर्वाधिक बार पूछे गए उप-विषय — ऊर्जा बैंड सिद्धांत, p-n संधि व दिष्टकरण, ट्रांजिस्टर अभिलक्षण तथा लॉजिक गेट (सत्यमान सारणी) हैं।
- ज़ेनर डायोड — भारी अपमिश्रित p-n संधि डायोड, प्रतिलोम अभिनति में भंजन वोल्टता (V_z) क्षेत्र में संचालित; वोल्टता नियंत्रक के रूप में प्रयुक्त।
- ज़ेनर भंजन बनाम हिमस्खलन भंजन — ज़ेनर: कम वोल्टता, भारी अपमिश्रित, प्रबल विद्युत क्षेत्र; हिमस्खलन: उच्च वोल्टता, हल्के अपमिश्रित, संघट्ट शृंखला अभिक्रिया।
- प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) — अग्र अभिनति में संचालित भारी अपमिश्रित p-n संधि; पुनर्संयोजन से प्रकाश उत्सर्जन; λ=hc/Eg।
- फोटोडायोड — प्रतिलोम अभिनति में संचालित; प्रकाश-तीव्रता के संसूचन हेतु; फोटॉन द्वारा उत्पन्न इलेक्ट्रॉन-होल युग्म प्रतिलोम धारा बढ़ाते हैं।
- सौर सेल — अनबायस्ड p-n संधि; प्रकाश-वोल्टीय प्रभाव से वि.वा.बल उत्पन्न होता है।
- नैज बनाम बाह्य अर्धचालकों की ताप निर्भरता — दोनों में ताप बढ़ने पर चालकता बढ़ती है (धातुओं से विपरीत)।
- p-प्रकार बनाम n-प्रकार अपमिश्रण — त्रिसंयोजी → स्वीकर्ता स्तर, होल बहुसंख्यक; पंचसंयोजी → दाता स्तर, इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक; दोनों ही क्रिस्टल विद्युत उदासीन रहते हैं।
- पूर्ण-तरंग बनाम अर्ध-तरंग दिष्टकारी — अर्ध-तरंग: दक्षता ~40.6%; पूर्ण-तरंग: दक्षता ~81.2%; पूर्ण-तरंग में तरंग-गुणांक कम।
- ट्रांजिस्टर की तीन विन्यास — CB, CE, CC; CE विन्यास धारा लब्धि (β) व वोल्टता लब्धि दोनों देता है, अतः प्रवर्धकों में सर्वाधिक प्रयुक्त।
- α (CB) बनाम β (CE) — β = α/(1−α), α = β/(1+β); α सदैव 1 के निकट, β बड़ा।
- ट्रांजिस्टर — स्विच बनाम प्रवर्धक — कर्तन क्षेत्र: OFF स्विच; संतृप्ति: ON स्विच; सक्रिय क्षेत्र: प्रवर्धक।
- ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना — चालक: E_g≈0; अर्धचालक: E_g≈1eV; कुचालक: E_g>3eV।
- डी मॉर्गन के नियम व सार्वत्रिक गेट — (A·B)'=A'+B' तथा (A+B)'=A'·B'; NAND व NOR सार्वत्रिक गेट।
- p-n संधि में अवक्षय क्षेत्र व अवरोध विभव — विसरण से बना आवेश-रहित क्षेत्र; अवरोध विभव Si: ≈0.7V, Ge: ≈0.3V; अग्र अभिनति इस अवरोध को घटाती है, प्रतिलोम अभिनति बढ़ाती है।
- चालन में द्वि-प्रकार के आवेश वाहक — अर्धचालकों में इलेक्ट्रॉन व होल दोनों (I=I_e+I_h); धातुओं में केवल इलेक्ट्रॉन।
- इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — ऊर्जा बैंड सिद्धांत, n/p-प्रकार अपमिश्रण, p-n संधि व डायोड, अग्र/पश्च अभिनति, ट्रांजिस्टर (β, I_E=I_B+I_C), लॉजिक गेट (सत्यमान सारणी) — इन छह टॉपिक पर विशेष ध्यान दें, इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।
? अभ्यास प्रश्न-उत्तर
NCERT अध्याय 14 के सभी 6 प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें
प्रश्न 14.1 किसी n-प्रकार के सिलिकॉन में निम्नलिखित में से कौन-सा प्रकथन सत्य है? (a) इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। (b) इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। (c) होल अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। (d) होल बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
n-प्रकार के अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक होते हैं, तथा होल अल्पसंख्यक होते हैं। अपमिश्रक पंचसंयोजी (संयोजकता 5, जैसे As, Sb, P) होता है।
सही विकल्प (c) है: होल (विवर) अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
प्रश्न 14.2 अभ्यास 14.1 में दिए गए कथनों में से कौन-सा p-प्रकार के अर्धचालकों के लिए सत्य है?
p-प्रकार के अर्धचालक में होल बहुसंख्यक होते हैं तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक होते हैं। अपमिश्रक त्रिसंयोजी (संयोजकता 3, जैसे In, B, Al) होता है।
सही विकल्प (d) है: होल (विवर) बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
प्रश्न 14.3 कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम, प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन हैं। इनकी विशेषता ऊर्जा बैंड अंतराल द्वारा पृथक्कृत संयोजकता और चालन बैंड द्वारा दी गई हैं। निम्न में से कौन-सा प्रकथन सत्य है? (a) (Eg)Si < (Eg)Ge < (Eg)C (b) (Eg)C < (Eg)Ge > (Eg)Si (c) (Eg)C > (Eg)Si > (Eg)Ge (d) (Eg)C = (Eg)Si = (Eg)Ge
चारों संयोजी इलेक्ट्रॉन क्रमशः द्वितीय (C), तृतीय (Si) तथा चतुर्थ (Ge) कक्षा में होते हैं। नाभिक से दूरी बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन कम दृढ़ता से बंधा होगा, अतः आयनन ऊर्जा (E_g) घटेगी।
सही विकल्प (c) है: (Eg)_C > (Eg)_Si > (Eg)_Ge
प्रश्न 14.4 बिना बायस p-n संधि से, होल p-क्षेत्र में n-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं, क्योंकि (a) n-क्षेत्र में मुक्त इलेक्ट्रॉन उन्हें आकर्षित करते हैं। (b) ये विभवांतर के कारण संधि के पार गति करते हैं। (c) p-क्षेत्र में होल-सांद्रता, n-क्षेत्र में इनकी सांद्रता से अधिक है। (d) उपरोक्त सभी।
बिना बायस स्थिति में होलों का p-क्षेत्र से n-क्षेत्र की ओर सांद्रता प्रवणता के कारण विसरण होता है, क्योंकि p-क्षेत्र में होलों की सांद्रता n-क्षेत्र में होलों की सांद्रता से बहुत अधिक होती है।
सही विकल्प (c) है: p-क्षेत्र में होल-सांद्रता, n-क्षेत्र में इनकी सांद्रता से अधिक है।
प्रश्न 14.5 जब p-n संधि पर अग्रदिशिक बायस अनुप्रयुक्त किया जाता है, तब यह (a) विभव रोधक बढ़ाता है। (b) बहुसंख्यक वाहक धारा को शून्य कर देता है। (c) विभव रोधक को कम कर देता है। (d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
अग्रदिशिक बायस में बाह्य वोल्टता की दिशा संधि के अंतःनिर्मित रोधिका विभव के विपरीत होती है, जिससे हासी क्षेत्र की मोटाई घट जाती है तथा रोधिका विभव (V₀ − V) तक कम हो जाता है।
सही विकल्प (c) है: अग्रदिशिक बायस विभव रोधक को कम कर देता है।
प्रश्न 14.6 अर्ध-तरंगी दिष्टकरण में, यदि निवेश आवृत्ति 50 Hz है तो निर्गम आवृत्ति क्या है? समान निवेश आवृत्ति हेतु पूर्ण तरंग दिष्टकारी की निर्गम आवृत्ति क्या है?
अर्ध-तरंग दिष्टकारी में: केवल एक अर्धचक्र (धनात्मक) का उपयोग होता है, दूसरे अर्धचक्र में कोई निर्गत नहीं मिलता। अतः निर्गत की पुनरावृत्ति दर = निवेश आवृत्ति = 50 Hz
पूर्ण तरंग दिष्टकारी में: दोनों अर्धचक्रों (धनात्मक व ऋणात्मक) का उपयोग होता है, एक चक्र में दो स्पंद प्राप्त होते हैं। अतः निर्गत की पुनरावृत्ति दर = 2 × निवेश आवृत्ति = 100 Hz