अध्याय 11: जीवों में जनन – Junior School Online
🔬 Science – Class 7 – Chapter 11

🌱 जीवों में जनन (Reproduction in Organisms)

जानें कि जनन क्या है, अलैंगिक जनन की विधियाँ – मुकुलन, खण्डन, बीजाणु निर्माण, वर्धी प्रजनन, लैंगिक जनन – पुष्प के भाग, परागण, निषेचन, तथा बीजों का प्रकीर्णन के बारे में विस्तार से।

📖 अध्याय सामग्री (Chapter Content)

1 🧬 जनन – परिचय एवं आवश्यकता

जनन (Reproduction) – माता-पिता से संतति का जन्म – अपने समान जीवों को जन्म देने की क्रिया।

  • आवश्यकता: अपने वंश को बनाये रखने के लिए सभी जीव जनन क्रिया करते हैं।
  • कायिक अंग: जड़, तना, पत्तियाँ – पौधों के शरीर के भाग।
  • जनन अंग: फूल – जिनसे फल एवं बीज बनते हैं।
  • पौधों में जनन दो प्रकार का होता है – अलैंगिक एवं लैंगिक

📌 जनन का उद्देश्य: प्रजाति को सतत बनाए रखना तथा नई पीढ़ी को जन्म देना।

2 🔄 अलैंगिक जनन – परिचय

अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) – पौधे के किसी भी भाग (जड़, तना, पत्तियों) से नये पौधे उत्पन्न होते हैं – बीजों का उपयोग नहीं होता।

  • उदाहरण: गन्ना, आलू, अदरक – तने के टुकड़ों द्वारा उगाए जाते हैं।
  • अलैंगिक जनन की चार विधियाँ – मुकुलन, खण्डन, बीजाणु निर्माण, वर्धी प्रजनन।

🔬 अलैंगिक जनन की विशेषताएँ

  • एक ही जनक से संतति उत्पन्न होती है।
  • संतति आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है।
  • बीजों की आवश्यकता नहीं होती।
3 🔬 मुकुलन (Budding) – यीस्ट में जनन

मुकुलन (Budding) – यीस्ट (खमीर) में पायी जाने वाली जनन विधि।

  • यीस्ट (Yeast): एककोशिक जीव – ब्रेड (पावरोटी) को फुलाने में प्रयुक्त।
  • प्रक्रिया: यीस्ट कोशिका से एक छोटा सा उभार (मुकुल या कली) निकलता है – धीरे-धीरे वृद्धि करके मातृ कोशिका से अलग होकर नयी कोशिका बन जाती है।
  • कई मुकुल बिना अलग हुए एक श्रृंखला में पाये जाते हैं।
  • उदाहरण: यीस्ट में मुकुलन द्वारा जनन।

🔎 मुकुलन की विशेषता: यह अलैंगिक जनन की सरलतम विधि है – एक कोशिका से नयी कोशिका का निर्माण।

4 ✂️ खण्डन (Fragmentation) – शैवाल में जनन

खण्डन (Fragmentation) – शैवाल (जैसे स्पाइरोगाइरा, यूलोफ्रिस) में पायी जाने वाली जनन विधि।

  • प्रक्रिया: शैवाल के तनु (थैलस) अनेक खण्डों में टूट जाते हैं – प्रत्येक खण्ड से नया पौधा विकसित होता है।
  • उदाहरण: स्पाइरोगाइरा तथा यूलोफ्रिस – हरे रंग के शैवाल जो तालाबों में तैरते हैं।

🌿 खण्डन की विशेषता

यह अलैंगिक जनन की एक सरल विधि है – जिसमें जनक का शरीर टुकड़ों में विभक्त होकर नये जीवों को जन्म देता है।

5 🍄 बीजाणु निर्माण (Spore Formation)

बीजाणु निर्माण (Spore Formation) – कवक (फफूँद) में पायी जाने वाली जनन विधि।

  • उदाहरण: अचार या भीगी हुई डबलरोटी पर सफेद रंग का फफूँद (राइजोपस)।
  • संरचना: कवक तन्तु (हाइफी) के ऊपरी सिरे फूल जाते हैं – जिनमें अत्यन्त छोटी रचनाएँ बीजाणु (Spores) बनती हैं।
  • प्रकीर्णन: बीजाणु प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहते हैं – हवा द्वारा नम स्थानों पर गिरकर अंकुरित होते हैं।
  • अन्य उदाहरण: शैवाल, मॉस, फर्न आदि में भी बीजाणुओं द्वारा जनन होता है।

💡 बीजाणुओं की विशेषता: ये अत्यन्त सूक्ष्म, हल्के एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रहने वाले होते हैं।

6 🌿 वर्धी प्रजनन (Vegetative Propagation)

वर्धी प्रजनन (Vegetative Propagation) – पौधों के कायिक अंगों (जड़, तना, पत्ती) द्वारा नये पौधे उत्पन्न करना।

  • प्राकृतिक विधियाँ:
    • जड़ द्वारा: शकरकन्द, डहेलिया, सतावर – जड़ों से नये पौधे।
    • तना द्वारा: आलू (आँखें), अदरक (प्रकन्द), गन्ना (तने के टुकड़े)।
    • पत्ती द्वारा: अजूबा (Bryophyllum) – पत्ती के किनारों से नये पौधे।
  • कृत्रिम विधियाँ: कलम लगाना (Cutting), लेयरिंग, ग्राफ्टिंग – मानव द्वारा पौधे उगाने की विधियाँ।

🌱 वर्धी प्रजनन के लाभ

  • बीजों की आवश्यकता नहीं – शीघ्र वृद्धि।
  • जनक के समान गुणों वाली संतति प्राप्त होती है।
  • उद्यान एवं कृषि में उपयोगी।
7 🌸 लैंगिक जनन – पुष्प के भाग

लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) – बीजों के द्वारा नये पौधे उगते हैं।

🌺 पुष्प के भाग (Flower Parts)

  • बाह्यदल (Sepals): हरे रंग के – कली की अवस्था में आन्तरिक भागों की सुरक्षा करते हैं तथा प्रकाश-संश्लेषण भी करते हैं।
  • दल (Petals): रंगीन एवं आकर्षक – कीट-पतंगों को परागण के लिए आकर्षित करते हैं। (गुड़हल – 5 दल, सरसों – 4 दल)
  • पुंकेसर (Stamen): पुष्प का नर भाग – तन्तु (Filament) + परागकोष (Anther) – परागकण बनते हैं।
  • स्त्रीकेसर (Pistil/Carpel): पुष्प का मादा भाग – अण्डाशय (Ovary) + वर्तिका (Style) + वर्तिकाग्र (Stigma) – अण्डाशय में बीजाण्ड (Ovule) होता है।
  • पुष्पासन (Thalamus): जिस आसन पर पुष्प के सभी भाग टिके होते हैं।

📌 महत्वपूर्ण: पुंकेसर पुष्प का नर भाग है, स्त्रीकेसर मादा भाग। दल रंगीन होकर परागण में सहायक होते हैं।

8 🦋 परागण एवं निषेचन

परागण (Pollination) – परागकणों का परागकोश से निकलकर वर्तिकाग्र पर पहुँचने की क्रिया।

  • स्व-परागण (Self-pollination): परागकण अपने ही पुष्प या उसी पौधे के दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं।
  • पर-परागण (Cross-pollination): परागकण उसी जाति के अन्य पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं।
  • परागण के माध्यम: वायु, जल, कीट-पतंगे, मनुष्य, अन्य जन्तु।

निषेचन (Fertilization) – नर एवं मादा युग्मकों का संयोग।

  • परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होकर परागनलिका बनाता है – जिसमें नर युग्मक होते हैं।
  • परागनलिका वर्तिका से होकर बीजाण्ड (अण्डकोश) में प्रवेश करती है।
  • नर युग्मक मादा युग्मक से संयोग करता है – युग्मनज (Zygote) बनता है।
  • युग्मनज से भ्रूण का विकास होता है।
  • निषेचन के बाद बीजाण्ड → बीज तथा अण्डाशय → फल बनता है।
  • पुष्प के अन्य भाग मुरझाकर गिर जाते हैं।

🍎 निषेचन के बाद परिवर्तन

बीजाण्ड → बीज, अण्डाशय → फल, पुष्प के अन्य भाग मुरझाकर गिर जाते हैं।

9 🌬️ बीजों का प्रकीर्णन (Seed Dispersal)

प्रकीर्णन (Dispersal) – बीजों एवं फलों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाव।

  • आवश्यकता: एक ही स्थान पर उगे पौधों के बीच स्थान, जल, खनिज एवं प्रकाश के लिए संघर्ष न हो।
  • प्रकीर्णन की विधियाँ:
    • वायु द्वारा: हल्के, पंखदार या रोमयुक्त बीज (जैसे – सिंहपर्णी, मेपल)।
    • जल द्वारा: जल में तैरने वाले फल/बीज (जैसे – नारियल)।
    • जन्तुओं द्वारा: काँटेदार या चिपकने वाले बीज (जैसे – चिरचिटा, गेंदा) – जन्तुओं के शरीर से चिपककर या खाकर प्रकीर्णित होते हैं।
    • मानव द्वारा: कृषि एवं व्यापार के माध्यम से।
  • बीज विशेष रचनाओं (काँटे, पंख, रोम) में रूपान्तरित हो जाते हैं – प्रकीर्णन में सहायक।

🌍 प्रकीर्णन का महत्व: पौधों की प्रजातियों का विस्तार, प्रतिस्पर्धा में कमी, नए क्षेत्रों में उपनिवेश।

10 📖 सारांश – हमने क्या सीखा
  • जनन – माता-पिता से संतति का जन्म – वंश बनाए रखना।
  • अलैंगिक जनन: एक जनक, बिना बीज के – मुकुलन (यीस्ट), खण्डन (स्पाइरोगाइरा), बीजाणु (राइजोपस), वर्धी प्रजनन (आलू, अजूबा)।
  • लैंगिक जनन: दो जनक, बीजों द्वारा – पुष्प के भाग (बाह्यदल, दल, पुंकेसर, स्त्रीकेसर)।
  • परागण: स्व-परागण एवं पर-परागण – वायु, जल, कीट-पतंगों द्वारा।
  • निषेचन: नर एवं मादा युग्मकों का संयोग – युग्मनज → भ्रूण → बीज।
  • प्रकीर्णन: वायु, जल, जन्तुओं द्वारा बीजों का फैलाव।

✅ मुख्य बिंदु

जनन जीवन की आधारभूत क्रिया है – जो प्रजाति को सतत बनाए रखती है।
अलैंगिक जनन सरल एवं शीघ्र है, जबकि लैंगिक जनन में विविधता उत्पन्न होती है।

🧩 मिलान अभ्यास – 11: जीवों में जनन

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🧠 Practice Quiz – 11: जीवों में जनन

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📝 इस इकाई में हमने सीखा

जनन – वंश बनाए रखने की क्रिया
अलैंगिक – एक जनक, बिना बीज
मुकुलन – यीस्ट में (कली)
खण्डन – स्पाइरोगाइरा
बीजाणु – राइजोपस (फफूँद)
वर्धी – आलू, अजूबा, गन्ना
लैंगिक – बीजों द्वारा (पुष्प)
पुष्प भाग – बाह्यदल, दल, पुंकेसर, स्त्रीकेसर
परागण – स्व/पर-परागण
निषेचन – नर+मादा युग्मक = युग्मनज
प्रकीर्णन – वायु, जल, जन्तु
बीज→पौधा – नई पीढ़ी का जन्म
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