रेशों से वस्त्र तक (Fibre to Fabric)

रेशों से वस्त्र तक – Junior School Online
🔬 Science – Class 7 – Chapter 2

🧵 रेशों से वस्त्र तक (Fibre to Fabric)

जानें कि कपास और जूट जैसे पादप रेशों से लेकर ऊन और रेशम जैसे जन्तु रेशों तक – ये कैसे प्राप्त होते हैं, इन्हें कैसे संसाधित किया जाता है, और इनका दैनिक जीवन में क्या महत्व है।

🎯 Learning Objectives

🌿पादप रेशे (कपास, जूट)
🐑ऊन – स्रोत एवं प्रकार
🧶ऊन का संसाधन (Processing)
🐛रेशम – जीवन-चक्र एवं प्राप्ति
🏭सेरीकल्चर एवं रीलिंग
👗जन्तु रेशों की उपयोगिता

📖 अध्याय सामग्री (Chapter Content)

1 🌾 परिचय – पादप एवं जन्तु रेशे

पादप रेशे (Plant fibres) – पौधों से प्राप्त होते हैं।

  • 🔹 कपास – कपास के पौधों के बिनौलों से रुई प्राप्त होती है।
  • 🔹 जूट – पटसन या सनई के पौधों के तनों से प्राप्त किया जाता है।
  • 🔹 उपयोग: कपास → कागज, सूती वस्त्र, चादर, पर्दे; जूट → रस्सी, बोरा, दरी।

जन्तु रेशे (Animal fibres) – जन्तुओं से प्राप्त होते हैं।

  • 🔹 ऊन – भेड़, याक, ऊँट, बकरी आदि के बालों से।
  • 🔹 रेशम – रेशम कीट के कोकून से।

📌 मुख्य अंतर: पादप रेशे पौधों से, जन्तु रेशे जन्तुओं से प्राप्त होते हैं।

2 🐑 ऊन प्रदान करने वाले जन्तु

ऊन – भेड़ की त्वचा के मुलायम घने बालों से प्राप्त होता है। अन्य जन्तु भी ऊन देते हैं:

  • 🔹 याक – तिब्बत, लद्दाख
  • 🔹 ऊँट – रेगिस्तानी क्षेत्र
  • 🔹 अंगोरा बकरी – जम्मू-कश्मीर (अंगोरा ऊन)
  • 🔹 कश्मीरी बकरी – पश्मीना (शालें)
  • 🔹 लामा, ऐल्पेका – दक्षिण अमेरिका
क्र.सं.नस्ल का नामराज्य जहाँ पायी जाती हैऊन का उपयोग
1बाखरवालजम्मू और कश्मीरऊनी शालें
2रामपुर बुशायरउत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेशभूरे ऊन वाले कम्बल
3नाली (नली)राजस्थान, पंजाब, हरियाणागलीचे
4लोहीराजस्थान, पंजाबऊनी वस्त्र
5मारवाड़ीगुजरातमोटी व रूक्ष ऊन (कम्बल)
6पाटनवाड़गुजरातहोजरी

💡 वर्णात्मक प्रजनन – अच्छी नस्ल की भेड़ों के चयन की प्रक्रिया, जिनसे अच्छी गुणवत्ता वाली ऊन प्राप्त होती है।

3 🧶 ऊन का संसाधन (Processing of Wool)

भेड़ के बालों को ऊन के धागों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया के चरण:

  1. कटाई (Shearing) – भेड़ के बालों की कटाई (गर्मी के मौसम में) – मशीनों द्वारा।
  2. अभिमाजन (Scouring) – रेशों को पानी से धोना – चिकनाई, धूल, गन्दगी हटाना।
  3. छंटाई (Sorting) – रेशों को लम्बाई, चिकनाई, हल्केपन के आधार पर अलग करना।
  4. कताई (Spinning) – रेशों को धागों में बदलना।
  5. रंगाई (Dyeing) – विभिन्न रंगों में रंगना।
  6. ऊनी धागा बनाना (Making yarn) – सुलझाकर लपेटना, बुनाई के लिए तैयार करना।

⚠️ व्यावसायिक संकट

ऊन उद्योग के कारीगर एन्थ्रेक्स (Anthrax) नामक जीवाणु से संक्रमित हो सकते हैं, जो रुधिर रोग "सोटर्स रोग" का कारण बनता है।

📌 भारत में ऊन उत्पादन

भेड़ों की संख्या में विश्व में तीसरा स्थान (चीन, ऑस्ट्रेलिया के बाद)। न्यूजीलैण्ड की मेरीनो भेड़ से सर्वोत्तम ऊन।

4 🐛 रेशम – जीवन-चक्र एवं प्राप्ति

रेशम (Silk) – एक प्राकृतिक रेशा, रेशम कीट के कोकून से प्राप्त होता है।

  • 🔹 आविष्कार: चीन में, चीन विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक।
  • 🔹 भारत: विश्व का लगभग 13% रेशम उत्पादन।

🔄 रेशम कीट का जीवन-चक्र (Life Cycle)

  1. अण्डा (Egg) – मादा रेशम कीट शहतूत की पत्तियों की निचली सतह पर अण्डे देती है।
  2. लार्वा (Larva) / इल्ली (Caterpillar) – अण्डों से सफेद रंग के लार्वा निकलते हैं, ये पत्तियाँ खाते हैं (4-6 सप्ताह)।
  3. कोकून (Cocoon) – लार्वा अपनी रेशम ग्रंथि से लसदार पदार्थ (प्रोटीनयुक्त) उत्सर्जित करता है और उसे अपने चारों ओर लपेटता है, जो हवा में सूखकर रेशम का रेशा बनता है। इसके अन्दर लार्वा प्यूपा में बदल जाता है।
  4. वयस्क कीट (Adult moth) – प्यूपा से वयस्क रेशम कीट बनता है, जो कोकून को काटकर बाहर निकलता है।

💡 कोकून (Cocoon) – गोलाकार संरचना जिसमें प्यूपा बन्द होता है।

5 🏭 सेरीकल्चर एवं रीलिंग

सेरीकल्चर (Sericulture) – रेशम कीट पालन का विज्ञान।

  • 🔹 भारत के मुख्य केन्द्र: कर्नाटक (मैसूर, बंगलूरु), आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, असम। उत्तराखण्ड (नैनीताल, हल्द्वानी) भी अग्रणी।
  • 🔹 किसान शहतूत के पेड़ों पर रेशम कीट पालते हैं। मादा अण्डे देती है, इन्हें कागज/कपड़े पर एकत्र कर बेचा जाता है।
  • 🔹 अण्डों से लार्वा निकलते हैं, इन्हें शहतूत की पत्तियाँ खिलाई जाती हैं। 25-30 दिनों में कोकून बनाते हैं।

रीलिंग (Reeling) – कोकून से रेशम के रेशे निकालने की प्रक्रिया।

  • 🔹 कोकून को उबलते पानी में 10-15 मिनट डाला जाता है – इससे गोंद घुल जाता है और रेशे अलग हो जाते हैं।
  • 🔹 4-8 कोकून के रेशों को एक साथ मिलाकर धागा बनाया जाता है।
  • 🔹 महत्वपूर्ण: कोकून से वयस्क कीट बनने से पूर्व ही रीलिंग करनी चाहिए, अन्यथा रेशा टूट जाता है (गुणवत्ता कम हो जाती है)।

📌 रेशम के प्रकार

शहतूत (Mulberry) – सबसे प्रचलित। अन्य: टसर, मूंगा, कोसा, एरी – ओक, अरंडी आदि पेड़ों के पत्तों पर पलने वाले कीटों से।

6 👗 जन्तु रेशों के उपयोग (Uses of Animal Fibres)

🧣 ऊन के उपयोग

  • स्वेटर, शॉल, कम्बल, लोई, टोपी, जैकेट
  • कालीन, गलीचे, पावदान
  • ठण्ड से बचाव – रेशों के बीच वायु ऊष्मा की कुचालक की तरह कार्य करती है।

🧵 रेशम के उपयोग

  • रेशमी बनारसी साड़ियाँ, घाघरा-चोली, चूड़ीदार-शेरवानी
  • पैराशूट, बुलेटप्रूफ कपड़े
  • आपरेशन में प्रयुक्त धागे (सर्जिकल सिवनी)
  • हल्के, मुलायम, चमकीले, मजबूत, टिकाऊ

🔍 क्रियाकलाप – कृत्रिम रेशम vs शुद्ध रेशम

जलाने पर कृत्रिम रेशम पिघलता है और तीखी गंध देता है; शुद्ध रेशम अच्छी गंध के साथ पूरी तरह जलता है।

📊 कुछ रोचक तथ्य

  • एक कोकून से 300-900 मीटर तक रेशम का धागा निकलता है।
  • 1 किलोग्राम रेशम के लिए लगभग 5500 कोकूनों की आवश्यकता होती है।
  • लगभग 1% कोकून को वयस्क कीट बनने के लिए छोड़ा जाता है (प्रजनन हेतु)।

🧠 Practice Quiz – रेशों से वस्त्र तक

🎯 आपकी प्रगति
स्कोर: 0/0

✅ एक बार उत्तर चुनने के बाद बदला नहीं जा सकता।

📝 इस इकाई में हमने सीखा

पादप रेशे – कपास (बिनौला), जूट (तना)
जन्तु रेशे – ऊन (भेड़, याक, बकरी) और रेशम (रेशम कीट)
ऊन संसाधन – कटाई → अभिमाजन → छंटाई → कताई → रंगाई → ऊनी धागा
रेशम जीवन-चक्र – अण्डा → लार्वा → प्यूपा (कोकून) → वयस्क कीट
सेरीकल्चर – रेशम कीट पालन; रीलिंग – कोकून से रेशम निकालना
उपयोग – ऊन (गर्मी के लिए), रेशम (हल्के, मजबूत वस्त्र और विशेष उपयोग)
तथ्य – 1 कोकून = 300-900 मीटर धागा, 1 kg रेशम = 5500 कोकून
व्यावसायिक संकट – एन्थ्रेक्स (सोटर्स रोग), कृत्रिम vs शुद्ध रेशम पहचान
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