अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी — सम्पूर्ण अध्याय
कक्षा-12 • भौतिकी • अध्याय 14

अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी

परमाणु के ऊर्जा बैंड से लेकर नैज व अपद्रव्यी अर्धचालक, p-n संधि, डायोड, दिष्टकारी, ट्रांजिस्टर तथा लॉजिक गेट तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आरेख और सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही स्थान पर।

n_e n_h = n_i² वाहक सांद्रता संबंध
E_g ऊर्जा बैंड अंतराल
p-n संधि डायोड
★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित

1 भूमिका

निर्वात नलिकाओं से ठोस-अवस्था अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी तक

ऐसी युक्तियाँ जिनमें इलेक्ट्रॉनों का नियंत्रित प्रवाह प्राप्त किया जा सके, सभी इलेक्ट्रॉनिक परिपथों की मूलभूत रचना खंड होती हैं। सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज से पहले ऐसी युक्तियाँ अधिकांशतः निर्वात नलिकाएँ (या वाल्व) थीं, जैसे निर्वात डायोड (2 इलेक्ट्रोड: एनोड-प्लेट तथा कैथोड), ट्रायोड (3 इलेक्ट्रोड: कैथोड, प्लेट तथा ग्रिड), टेट्रोड तथा पेंटोड (क्रमशः 4 तथा 5 इलेक्ट्रोडों के साथ)।

किसी निर्वात नलिका में इलेक्ट्रॉनों की आपूर्ति एक तप्त कैथोड द्वारा की जाती है तथा विभिन्न इलेक्ट्रोडों के बीच वोल्टता को परिवर्तित करके निर्वात में इन इलेक्ट्रॉनों का नियंत्रित प्रवाह प्राप्त किया जाता है। अंतरा-इलेक्ट्रोडी स्थान में इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के लिए निर्वात आवश्यक होता है, अन्यथा गतिमान इलेक्ट्रॉन वायु के अणुओं से टकराकर अपनी ऊर्जा खो सकते हैं। इन युक्तियों में इलेक्ट्रॉन केवल कैथोड से एनोड की ओर प्रवाहित हो सकते हैं — यही कारण है कि ऐसी युक्तियों को साधारणतया वाल्व कहते हैं।

निर्वात नलिकाओं की सीमाएँ: ये आकार में बड़ी होती हैं, अधिक शक्ति का उपभोग करती हैं तथा प्रचालन में सामान्यतः उच्च वोल्टता (~100 V) की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इनका जीवनकाल अपेक्षाकृत कम तथा विश्वसनीयता भी कम होती है।

आधुनिक ठोस-अवस्था अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी का प्रादुर्भाव सन् 1930 में इस आभास से किया गया कि कुछ ठोस अवस्था अर्धचालक तथा उनकी संधियों में यह संभावना होती है कि उनमें आवेश वाहकों की संख्या तथा उनके प्रवाह की दिशा को नियंत्रित किया जा सकता है। प्रकाश, ऊष्मा तथा अल्प अनुप्रयुक्त वोल्टता जैसे उत्तेजक किसी अर्धचालक में गतिमान आवेशों की संख्या परिवर्तित कर सकते हैं।

मुख्य अंतर: अर्धचालक युक्तियों में आवेश वाहकों की आपूर्ति तथा प्रवाह स्वयं ठोस के भीतर ही होता है, जबकि निर्वात नलिकाओं/वाल्वों में गतिमान इलेक्ट्रॉनों को तप्त कैथोड से प्राप्त किया जाता था तथा निर्वातित स्थानों में प्रवाहित कराया जाता था। अर्धचालक युक्तियों में बाहरी तापन अथवा अधिक निर्वातित स्थान की आवश्यकता नहीं होती — ये आकार में छोटी, कम शक्ति उपभोग करने वाली, कम वोल्टता पर काम करने वाली, लंबे जीवनकाल तथा अच्छी विश्वसनीयता वाली होती हैं।

अर्धचालक युक्तियों को औपचारिक रूप से समझे जाने से भी बहुत पहले प्रकृति में पाए जाने वाले गैलेना (लैड सल्फाइड PbS) के एक क्रिस्टल जिसके साथ धातु का एक संपर्क बिंदु संयोजित था, का उपयोग रेडियो तरंगों के संसूचक के रूप में किया जा चुका था।

निम्नलिखित अनुभागों में हम अर्धचालक भौतिकी की कुछ मूल अवधारणाओं से परिचय कराएँगे तथा संधि डायोड (2-इलेक्ट्रोडों की युक्ति) तथा द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर (3-इलेक्ट्रोडों की युक्ति) जैसी कुछ अर्धचालक युक्तियों की चर्चा करेंगे।

त्वरित तथ्य
  • सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज हुई; इससे पहले निर्वात नलिकाएँ (वाल्व) प्रयुक्त होती थीं।
  • निर्वात डायोड में 2 इलेक्ट्रोड (एनोड/प्लेट, कैथोड); ट्रायोड में 3 (कैथोड, प्लेट, ग्रिड); टेट्रोड में 4; पेंटोड में 5 इलेक्ट्रोड होते हैं।
  • निर्वात नलिकाओं में इलेक्ट्रॉन केवल कैथोड से एनोड की ओर (एक ही दिशा में) प्रवाहित होते हैं।
  • ठोस-अवस्था अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी का प्रादुर्भाव सन् 1930 में हुआ।
  • अर्धचालक युक्तियों में आवेश वाहकों की आपूर्ति व प्रवाह ठोस के भीतर ही होता है।
  • गैलेना (PbS) क्रिस्टल का उपयोग प्राचीन काल में रेडियो तरंगों के संसूचक के रूप में किया गया था।

2 धातुओं, चालकों तथा अर्धचालकों का वर्गीकरण

चालकता एवं ऊर्जा बैंड के आधार पर

चालकता के आधार पर

विद्युत चालकता (σ) अथवा प्रतिरोधकता (ρ = 1/σ) के सापेक्ष मान के आधार पर ठोस पदार्थों का निम्न प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है:

वर्गप्रतिरोधकता ρ (Ω m)चालकता σ (S m⁻¹)
धातु10⁻² – 10⁻⁸10² – 10⁸
अर्धचालक10⁻⁵ – 10⁶10⁵ – 10⁻⁶
विद्युतरोधी10¹¹ – 10¹⁹10⁻¹¹ – 10⁻¹⁹
ऊपर दिए गए ρ तथा σ के मान केवल कोटि मान के सूचक हैं और दिए गए परिसर के बाहर भी जा सकते हैं। धातु, विद्युतरोधी पदार्थ तथा अर्धचालकों के बीच भेद करने के लिए प्रतिरोधकता का सापेक्ष मान ही मात्र एक मापदंड नहीं है।

अर्धचालकों के प्रकार

प्रकारउदाहरण
तात्विक अर्धचालक (Elemental)Si और Ge
यौगिक अकार्बनिकCdS, GaAs, CdSe, InP आदि
यौगिक कार्बनिकएंथ्रासीन, मादित थैलोस्यानीस आदि
कार्बनिक बहुलक (Organic polymers)पॉलीपाइरोल, पॉलीऐनिलीन, पॉलीथायोफ़ीन आदि

इस अध्याय में हम केवल अकार्बनिक अर्धचालक, विशेषकर तात्विक अर्धचालकों Si तथा Ge के अध्ययन तक ही सीमित रहेंगे।

ऊर्जा बैंड के आधार पर

बोर परमाणु मॉडल के अनुसार किसी वियुक्त परमाणु में उसके किसी इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा उस इलेक्ट्रॉन की परिभ्रमण कक्षा पर निर्भर करती है। परंतु जब परमाणु एक-दूसरे के निकट आकर कोई ठोस बना लेते हैं तो निकटस्थ परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों की बाह्य कक्षाएँ अत्यधिक पास-पास आ जाती हैं और एक-दूसरे को ढक लेती हैं। इसके परिणामस्वरूप किसी ठोस में इलेक्ट्रॉन की गति की प्रकृति किसी वियुक्त परमाणु के इलेक्ट्रॉन की गति से अत्यधिक भिन्न हो जाती है।

किसी क्रिस्टल के भीतर प्रत्येक इलेक्ट्रॉन की अपनी अद्वितीय स्थिति होती है, इसीलिए प्रत्येक इलेक्ट्रॉन के ऊर्जा स्तर भिन्न होते हैं। ये भिन्न ऊर्जा स्तर ऊर्जा बैंडों का निर्माण करते हैं। वह ऊर्जा स्तर जिसमें संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर समाविष्ट हैं, संयोजकता बैंड कहलाता है। संयोजकता बैंड के ऊपर स्थित बैंड को चालन बैंड कहते हैं।

चालन बैंड (रिक्त, 4N अवस्था) E_C संयोजकता बैंड (पूर्णतः भरी, 4N अवस्था) E_V E_g ऊर्जा बैंड अंतराल (Energy Band Gap, E_g)
चित्र 14.1 — 0 K पर किसी अर्धचालक में ऊर्जा बैंड की स्थितियाँ: संयोजकता बैंड (नीचे, पूर्णतः भरा) व चालन बैंड (ऊपर, रिक्त), दोनों के बीच ऊर्जा अंतराल E_g।

तीन प्रकरण — धातु, विद्युतरोधी व अर्धचालक

प्रकरणपदार्थऊर्जा अंतराल E_gव्यवहार
प्रकरण Iधातुचालन व संयोजकता बैंड अतिव्यापी (E_g ≈ 0)संयोजकता बैंड से इलेक्ट्रॉन सरलता से चालन बैंड में जाते हैं — प्रतिरोध कम, चालकता उच्च
प्रकरण IIविद्युतरोधीE_g > 3 eV (अधिक)तापीय उत्तेजन से भी इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में नहीं पहुँच सकते — कोई विद्युत चालन संभव नहीं
प्रकरण IIIअर्धचालकE_g < 3 eV (लघु परिमित अंतराल)कमरे के ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन अंतराल पार कर चालन बैंड में पहुँच जाते हैं — मध्यम प्रतिरोध
NEET फोकस
  • धातु: ρ ~ 10⁻² – 10⁻⁸ Ωm; अर्धचालक: ρ ~ 10⁻⁵ – 10⁶ Ωm; विद्युतरोधी: ρ ~ 10¹¹ – 10¹⁹ Ωm।
  • संयोजकता बैंड (Valence band): संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर वाला बैंड (नीचे)।
  • चालन बैंड (Conduction band): संयोजकता बैंड के ऊपर स्थित बैंड।
  • ऊर्जा बैंड अंतराल (E_g): संयोजकता बैंड के शीर्ष और चालन बैंड की तली के बीच का अंतराल।
  • धातु में E_g ≈ 0; विद्युतरोधी में E_g > 3 eV; अर्धचालक में E_g < 3 eV।
  • कार्बन (डायमंड): E_g = 5.4 eV; सिलिकॉन (Si): E_g = 1.1 eV; जर्मेनियम (Ge): E_g = 0.7 eV।
  • Sn (टिन) चौथे समूह का तत्व है परंतु धातु है क्योंकि इसका E_g ≈ 0 eV है।

3 नैज अर्धचालक

शुद्ध अर्धचालक — इलेक्ट्रॉन व होल

Ge और Si का सबसे साधारण उदाहरण लेंगे जिनकी जालक रचना हीरे जैसी रचना कहलाती है। प्रत्येक परमाणु चार अन्य निकटतम परमाणुओं द्वारा घिरा होता है। Si और Ge में चार संयोजकता इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसकी क्रिस्टलीय रचना में प्रत्येक Si या Ge परमाणु अपने चार संयोजकता इलेक्ट्रॉनों में से एक-एक इलेक्ट्रॉन को अपने चार निकटतम परमाणुओं के साथ सहभागिता कराने की प्रवृत्ति रखता है — यही सहभागी इलेक्ट्रॉन युगल सहसंयोजी बंध या संयोजकता आबंध कहलाते हैं।

जैसे-जैसे ताप बढ़ता है, इन इलेक्ट्रॉनों को और ऊष्मीय ऊर्जा प्राप्त होने लगती है जिससे इनमें से कुछ इलेक्ट्रॉन टूट कर अलग हो सकते हैं (मुक्त इलेक्ट्रॉन बनकर चालन में योगदान करते हैं)। ऊष्मीय ऊर्जा क्रिस्टलीय जालक के कुछ परमाणुओं को प्रभावी रूप से आयनीकृत कर देती है तथा बंध में एक रिक्त स्थान बना देती है। मुक्त इलेक्ट्रॉन (आवेश −q) जहाँ से निकलकर आया है, वहाँ वह प्रभावी आवेश (+q) का एक रिक्त स्थान छोड़ देता है — इसे होल कहते हैं। होल प्रभावी धनात्मक आवेश वाले एक आभासी मुक्त कण की तरह व्यवहार करता है।

नैज वाहक सांद्रताne = nh = ni

यहाँ ni को नैज वाहक सांद्रता कहते हैं — नैज अर्धचालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या ne, होलों की संख्या nh के बराबर होती है।

होल की गति व धारा

अर्धचालकों में यह अद्वितीय गुण होता है कि उनमें इलेक्ट्रॉनों के साथ-साथ होल भी गति करते हैं। जब कभी क्रिस्टल में कहीं भी एक अपूरित बंध होगा तब बंधित इलेक्ट्रॉनों की वास्तविक गति होगी और इसका वर्णन करने के लिए होलों की गति केवल एक सहज उपाय है। किसी वास्तविक क्रिस्टल में विद्युत क्षेत्र की क्रिया के फलस्वरूप यह होल ऋणात्मक विभव की ओर गति करते हैं, जिससे एक होल धारा Ih मिलती है।

कुल धाराI = Ie + Ih
ऊष्मा से उत्पन्न चालन इलेक्ट्रॉनों के कारण इलेक्ट्रॉन धारा Ie तथा होल धारा Ih का योग संपूर्ण धारा I होती है। चालन इलेक्ट्रॉनों तथा होलों के उत्पन्न होने के साथ-साथ पुनःसंयोजन का प्रक्रम भी होता है जिसमें इलेक्ट्रॉन होल के साथ पुनःसंयोजित होते हैं — साम्यावस्था में आवेश वाहकों के उत्पन्न होने की दर उनके पुनःसंयोजन की दर के बराबर होती है।
उदाहरण 14.1 (महत्वपूर्ण): C, Si तथा Ge की जालक संरचना समान होती है। फिर भी C विद्युतरोधी है जबकि Si व Ge नैज अर्धचालक हैं — क्योंकि इनके परमाणुओं के चार बंधित इलेक्ट्रॉन क्रमशः द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ कक्षा में होते हैं। अतः इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा (आयनिक ऊर्जा E_g) सबसे कम Ge के लिए, इससे अधिक Si के लिए और सबसे अधिक C के लिए होती है। इस प्रकार Ge व Si में विद्युत चालन के लिए स्वतंत्र इलेक्ट्रॉनों की संख्या सार्थक होती है जबकि C में यह नगण्य होती है।
NEET फोकस
  • Si व Ge में 4 संयोजकता इलेक्ट्रॉन होते हैं; इनकी जालक रचना हीरे जैसी होती है।
  • प्रत्येक परमाणु 4 निकटतम परमाणुओं से सहसंयोजी बंध बनाता है।
  • नैज अर्धचालक में n_e = n_h = n_i (नैज वाहक सांद्रता)।
  • होल: बंध में इलेक्ट्रॉन की रिक्ति — प्रभावी धनात्मक आवेश वाला आभासी मुक्त कण।
  • कुल धारा I = I_e + I_h।
  • साम्यावस्था में आवेश वाहकों की उत्पत्ति दर = पुनःसंयोजन दर।
  • 0 K पर नैज अर्धचालक विद्युतरोधी की भाँति व्यवहार करता है।

4 अपद्रव्यी अर्धचालक

मादन (Doping), n-प्रकार व p-प्रकार

किसी नैज अर्धचालक की चालकता उसके ताप पर निर्भर करती है, परंतु कक्ष-ताप पर इसकी चालकता बहुत कम होती है। इसलिए कोई भी महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक युक्ति नैज अर्धचालकों द्वारा विकसित नहीं की जा सकती। इनकी चालकता में सुधार अर्धचालकों में अशुद्धियों का उपयोग करके किया जाता है।

जब किसी शुद्ध अर्धचालक में कोई उपयुक्त अशुद्धि अत्यल्प मात्रा में (जैसे कुछ भाग प्रति मिलियन, ppm में) मिलाई जाती है तो उसकी चालकता में कई गुना वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार के पदार्थों को अपद्रव्यी अर्धचालक अथवा अशुद्धि अर्धचालक कहते हैं। वांछित अशुद्धि को सावधानीपूर्वक मिश्रित करना मादन या अपमिश्रण कहलाता है तथा अशुद्धि परमाणु अपमिश्रक कहलाते हैं।

चतुःसंयोजक Si अथवा Ge के मादन के लिए दो प्रकार के अपमिश्रक उपयोग किए जाते हैं:

अपमिश्रक प्रकारसंयोजकताउदाहरणअर्धचालक प्रकार
पंच संयोजक5आर्सेनिक (As), ऐंटीमनी (Sb), फ़ॉस्फ़ोरस (P)n-प्रकार
त्रि संयोजक3इंडियम (In), बोरॉन (B), ऐलुमिनियम (Al)p-प्रकार

n-प्रकार का अर्धचालक

मान लीजिए कि हम Si या Ge (संयोजकता 4) को एक पंचसंयोजक (संयोजकता 5) तत्व से अपमिश्रित करें। जब +5 संयोजकता वाला तत्व Si के एक परमाणु को प्रतिस्थापित करके अपना स्थान ग्रहण करता है तो इसके इलेक्ट्रॉनों में से चार, निकटवर्ती चार सिलिकॉन परमाणुओं से बंध बनाते हैं, जबकि पाँचवाँ इलेक्ट्रॉन जनक परमाणु से दुर्बल बंध द्वारा जुड़ा रहता है।

इस अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन को मुक्त करने के लिए आवश्यक आयनन ऊर्जा बहुत कम होती है — जर्मेनियम में ~0.01 eV तथा सिलिकॉन में लगभग 0.05 eV। इसके विपरीत किसी नैज अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन को वर्जित बैंड से स्थानांतरण के लिए (जर्मेनियम में ~0.72 eV तथा सिलिकॉन में ~1.1 eV) ऊर्जा चाहिए। पंचसंयोजक अपमिश्रक को दाता अशुद्धि कहते हैं।
n-प्रकार के अर्धचालक के लिएne >> nh

पंचसंयोजक अपमिश्रक के साथ अपमिश्रण होने पर इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक तथा होल अल्पांश आवेश वाहक बन जाते हैं। इसीलिए इस प्रकार के अर्धचालकों को n-प्रकार के अर्धचालक कहते हैं।

p-प्रकार का अर्धचालक

p-प्रकार का अर्धचालक तब बनता है जब Si या Ge (चतुर्थसंयोजी) में ग्रुप-III की त्रिसंयोजी अशुद्धियाँ; जैसे Al, B, In आदि अपमिश्रित की जाती हैं। अपमिश्रक में Si या Ge की अपेक्षा एक बाहरी इलेक्ट्रॉन कम होता है और इसलिए यह परमाणु तीन ओर से Si परमाणुओं से बंध बना सकता है, लेकिन चौथी ओर बंध बनाने के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन उपलब्ध न होने के कारण चौथा बंध बनाने में सफल नहीं हो पाता। अतः त्रिसंयोजक परमाणु तथा चौथे निकटस्थ परमाणु के बीच बंध में एक रिक्ति अथवा होल होता है।

p-प्रकार के अर्धचालक के लिएnh >> ne

त्रिसंयोजक अपमिश्रक को ग्राही अशुद्धि कहते हैं। p-प्रकार के अर्धचालकों में होल बहुसंख्यक वाहक तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक हैं।

ध्यान दें: क्रिस्टल एक समग्र ऋणात्मक उदासीनता बनाए रखता है क्योंकि अतिरिक्त आवेश वाहकों पर आवेश की मात्रा जालक में आयनीकृत क्रोडों पर आवेश की मात्रा के ही समान एवं विपरीत होती है।

तापीय साम्य में वाहक सांद्रता

तापीय साम्य संबंध (सभी अर्धचालकों के लिए)ne nh = ni²
उदाहरण 14.2 (हल सहित): शुद्ध Si क्रिस्टल में 5×10²⁸ परमाणु m⁻³ है, इसे पंचसंयोजी As से 1 ppm सांद्रता पर अपमिश्रित किया जाता है। n_i = 1.5×10¹⁶ m⁻³ दिया है। चूँकि तापीय जनित (n_i~10¹⁶) की तुलना में अपमिश्रण से उत्पन्न इलेक्ट्रॉन (n_e≈N_D=5×10²²m⁻³) कहीं अधिक हैं, अतः n_e≈N_D। फिर n_e n_h=n_i² से होलों की संख्या n_h = (2.25×10³²)/(5×10²²) ≈ 4.5×10⁹ m⁻³।
NEET फोकस
  • अपद्रव्यी अर्धचालक: शुद्ध अर्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि (ppm मात्रा में) मिलाने से बना अर्धचालक।
  • मादन (Doping) = अशुद्धि मिश्रित करना; अपमिश्रक (Dopant) = अशुद्धि परमाणु।
  • पंचसंयोजक अपमिश्रक (As, Sb, P) → n-प्रकार अर्धचालक; दाता अशुद्धि।
  • त्रिसंयोजक अपमिश्रक (In, B, Al) → p-प्रकार अर्धचालक; ग्राही अशुद्धि।
  • n-प्रकार में n_e >> n_h; p-प्रकार में n_h >> n_e।
  • तापीय साम्य संबंध: n_e n_h = n_i² (सभी दशाओं में लागू)।
  • अपद्रव्यी अर्धचालकों में क्रिस्टल समग्र रूप से विद्युत उदासीन रहता है।
  • Si में दाता आयनन ऊर्जा ≈0.05 eV; Ge में ≈0.01 eV (नैज बैंड-गैप से बहुत कम)।

5 p-n संधि

विसरण, अपवाह व हासी क्षेत्र

p-n संधि बहुत सी अर्धचालक युक्तियों जैसे डायोड, ट्रांजिस्टर आदि की मूल इकाई है। p-प्रकार के सिलिकॉन (p-Si) अर्धचालक की पतली पटलिका पर विचार कीजिए। परिशुद्ध रूप से पंचसंयोजक अशुद्धि की अल्प मात्रा मिलाकर किसी p-Si पटलिका के कुछ भाग को n-Si में परिवर्तित किया जा सकता है।

किसी p-n संधि के निर्माण के समय दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ होती हैं — विसरण तथा अपवाह।

विसरण (Diffusion)

किसी n-प्रकार के अर्धचालक में इलेक्ट्रॉनों की सांद्रता होलों की सांद्रता की तुलना में अधिक होती है। इसी प्रकार p-प्रकार के अर्धचालक में होलों की सांद्रता इलेक्ट्रॉनों की सांद्रता की तुलना में अधिक होती है। p-n संधि के निर्माण के समय, सांद्रता प्रवणता के कारण होल p-फलक से n-फलक (p→n) की ओर विसरित होते हैं तथा इलेक्ट्रॉन n-फलक से p-फलक (n→p) की ओर विसरित होते हैं। आवेश वाहकों की इस गति के कारण संधि से एक विसरण धारा प्रवाहित होती है।

हासी क्षेत्र (Depletion region)

जब कोई इलेक्ट्रॉन p से n की ओर विसरित होता है तो वह अपने पीछे एक आयनित दाता n-फलक पर छोड़ देता है (निश्चल धनावेश)। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉन विसरित होते हैं, संधि के n-फलक पर धनावेश की एक परत विकसित हो जाती है। इसी प्रकार, जब कोई होल p→n की ओर विसरित होता है तो वह अपने पीछे एक आयनित ग्राही (ऋणात्मक आवेश) छोड़ देता है — संधि के p-फलक पर ऋणात्मक आवेश की परत विकसित हो जाती है।

संधि के दोनों फलकों को विकसित इस स्पेस-चार्ज क्षेत्र को हासी क्षेत्र कहते हैं। इसकी मोटाई माइक्रोमीटर के दसवें भाग की कोटि की होती है।

अपवाह (Drift) व रोधिका विभव

संधि के n-फलक पर धनात्मक स्पेस-चार्ज क्षेत्र तथा p-फलक पर ऋणात्मक स्पेस-चार्ज क्षेत्र होने के कारण संधि पर धनात्मक आवेश से ऋणात्मक आवेश की ओर एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इस क्षेत्र के कारण संधि के p-फलक का इलेक्ट्रॉन n-फलक की ओर तथा संधि के n-फलक का होल p-फलक की ओर गति करता है — इस गति को अपवाह कहते हैं, जो विसरण धारा के विपरीत होती है।

यह प्रक्रम उस समय तक चलता रहता है जब तक कि विसरण धारा तथा अपवाह धारा परिमाण में समान नहीं हो जातीं। साम्यावस्था में p-n संधि पर कोई नेट विद्युत धारा नहीं होती।

रोधिका विभव (Barrier potential)V₀ — n-क्षेत्र से p-क्षेत्र की ओर इलेक्ट्रॉनों की गति को रोकने वाला विभव, जो साम्यावस्था में उत्पन्न होता है
उदाहरण 14.3: क्या p-n संधि बनाने के लिए हम p-प्रकार के अर्धचालक की एक पट्टी को n-प्रकार के अर्धचालक से भौतिक रूप से संयोजित कर p-n संधि प्राप्त कर सकते हैं? नहीं! कोई भी पट्टी, चाहे कितनी ही समतल हो, अंतर-परमाण्वीय क्रिस्टल अंतराल (~2 से 3 Å) से कहीं ज़्यादा खुरदरी होगी और इसलिए परमाण्विक स्तर पर अविच्छिन्न संपर्क संभव नहीं होगा। प्रवाहित होने वाले आवेश वाहकों के लिए संधि एक विच्छिन्नता की तरह व्यवहार करेगी।
NEET फोकस
  • p-n संधि निर्माण में दो प्रक्रियाएँ: विसरण तथा अपवाह।
  • विसरण: सांद्रता प्रवणता के कारण होल p→n तथा इलेक्ट्रॉन n→p की ओर गति करते हैं।
  • हासी क्षेत्र: संधि पर बना मुक्त आवेश-रहित स्पेस-चार्ज क्षेत्र।
  • अपवाह: विद्युत क्षेत्र के कारण होने वाली विपरीत गति।
  • साम्यावस्था में विसरण धारा = अपवाह धारा; संधि पर कोई नेट धारा नहीं।
  • रोधिका विभव V₀ साम्यावस्था में विकसित होता है।
  • p-n संधि केवल दो अर्धचालक टुकड़ों को भौतिक रूप से जोड़कर नहीं बनाई जा सकती।

6 अर्धचालक डायोड

अग्रदिशिक व पश्चदिशिक बायस

अर्धचालक डायोड मूल रूप से एक p-n संधि होती है जिसके सिरों पर धात्विक संपर्क जुड़े होते हैं ताकि इस संधि पर कोई बाह्य वोल्टता अनुप्रयुक्त की जा सके। इस युक्ति के दो टर्मिनल होते हैं।

अग्रदिशिक बायस में p-n संधि डायोड

जब किसी अर्धचालक डायोड के दो सिरों के बीच कोई बाह्य वोल्टता V इस प्रकार अनुप्रयुक्त की जाती है कि बैटरी का धन टर्मिनल p-फलक से तथा ऋण टर्मिनल n-फलक से संयोजित करते हैं, तो इसे अग्रदिशिक बायसित कहते हैं।

अनुप्रयुक्त वोल्टता की दिशा अंतःनिर्मित विभव V₀ के विपरीत होती है। इसके परिणामस्वरूप, हासी स्तर की मोटाई घट जाती है तथा रोधिका ऊँचाई कम हो जाती है — अग्रदिशिक बायस में प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ − V) होती है।

अनुप्रयुक्त वोल्टता के कारण, इलेक्ट्रॉन n-फलक हासी क्षेत्र को पार कर p-फलक पर पहुँचते हैं (जहाँ वे अल्पांश वाहक हैं)। इसी प्रकार p-फलक के होल संधि को पार करके n-फलक पर पहुँचते हैं। इस प्रक्रम को अल्पांश वाहक अंतःक्षेपण कहते हैं।

कुल अग्रदिशिक डायोड धारा का मान होल विसरण धारा तथा इलेक्ट्रॉन विसरण के कारण पारंपरिक धारा का योग होता है। इस धारा का परिमाण प्रायः मिलीऐम्पियर में होता है।

पश्चदिशिक बायस में p-n संधि डायोड

जब किसी अर्धचालक डायोड के दो सिरों के बीच कोई बाह्य वोल्टता (V) इस प्रकार अनुप्रयुक्त करते हैं कि बैटरी के धन टर्मिनल को n-फलक से तथा ऋण टर्मिनल को p-फलक से जोड़ते हैं, तो डायोड को पश्चदिशिक बायसित कहते हैं।

यहाँ अनुप्रयुक्त वोल्टता की दिशा रोधिका विभव की दिशा के समान होती है। इसके परिणामस्वरूप रोधिका की ऊँचाई बढ़ जाती है तथा हासी क्षेत्र की चौड़ाई में वृद्धि हो जाती है — पश्चदिशिक बायसन् में प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ + V) होती है। यह विसरण धारा को अत्यधिक कम कर देती है।

पश्चदिशिक बायस में अपवाह धारा (सामान्यतः µA में) भी होती है, परंतु यह अंतःक्षिप्त वाहकों के कारण अग्रदिशिक धारा (mA में) की तुलना में नगण्य होती है। डायोड प्रतीप धारा अनुप्रयुक्त वोल्टता पर अत्यधिक निर्भर नहीं होती, बल्कि संधि के दोनों फलकों पर अल्पांश वाहकों की सांद्रता द्वारा सीमित होती है।

भंजन वोल्टता (Breakdown voltage)

पश्चदिशिक बायस में किसी क्रांतिक पश्चदिशिक वोल्टता तक विद्युतधारा सारभूत रूप से वोल्टता पर निर्भर नहीं करती। इस वोल्टता को भंजन वोल्टता कहते हैं। जब V = Vbr तब डायोड पश्चदिशिक धारा में तेज़ी से वृद्धि होती है — यहाँ तक कि बायस वोल्टता में अल्प वृद्धि करने पर भी धारा में अत्यधिक परिवर्तन हो जाता है।

देहली वोल्टता (Threshold voltage) / कट-इन वोल्टता: जर्मेनियम डायोड के लिए ~0.2 वोल्ट तथा सिलिकॉन डायोड के लिए ~0.7 वोल्ट।

गतिक प्रतिरोध

गतिक प्रतिरोध की परिभाषाrd = ΔV / ΔI
उदाहरण 14.4 (हल सहित): किसी सिलिकॉन डायोड के लिए वक्र से: (a) I=20mA पर V=0.8V तथा I=10mA पर V=0.7V — अतः rfb=ΔV/ΔI=0.1V/10mA=10 Ω। (b) V=−10V पर I=−1µA — अतः rrb=10V/1µA=1.0×10⁷ Ω।
NEET फोकस
  • अर्धचालक डायोड मूल रूप से एक p-n संधि है जिसके सिरों पर धात्विक संपर्क होते हैं।
  • अग्रदिशिक बायस: बैटरी का धन p-फलक से, ऋण n-फलक से जुड़ा — प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ − V), धारा mA में।
  • पश्चदिशिक बायस: बैटरी का धन n-फलक से, ऋण p-फलक से जुड़ा — प्रभावी रोधिका ऊँचाई (V₀ + V), धारा µA में (नगण्य)।
  • अल्पांश वाहक अंतःक्षेपण अग्रदिशिक बायस में होता है।
  • देहली/कट-इन वोल्टता: जर्मेनियम ≈0.2V; सिलिकॉन ≈0.7V।
  • भंजन वोल्टता (V_br): जिस पर पश्चदिशिक धारा में अचानक तीव्र वृद्धि हो जाती है।
  • गतिक प्रतिरोध r_d = ΔV/ΔI।
  • अग्रदिशिक बायस मापन के लिए मिलीऐमीटर; पश्चदिशिक बायस मापन के लिए माइक्रोऐमीटर।

7 संधि डायोड का दिष्टकारी के रूप में अनुप्रयोग

अर्ध-तरंग व पूर्ण तरंग दिष्टकारी

किसी संधि डायोड के V-I अभिलाक्षणिक में हम यह देखते हैं कि वह केवल तभी विद्युत धारा प्रवाहित होने देता है जब वह अग्रदिशिक बायसित होता है। अतः यदि किसी डायोड के सिरों पर कोई प्रत्यावर्ती वोल्टता अनुप्रयुक्त की जाए तो चक्र के केवल उसी भाग में परिपथ में धारा प्रवाहित होगी जब डायोड अग्रदिशिक बायसित है। डायोड के इस गुण का उपयोग प्रत्यावर्ती वोल्टता का दिष्टकरण करने में किया जाता है — इस कार्य के लिए जिस परिपथ का उपयोग करते हैं उसे दिष्टकारी कहते हैं।

अर्ध-तरंग दिष्टकारी

यदि डायोड के सिरों पर कोई प्रत्यावर्ती (ac) वोल्टता श्रेणीक्रम में संयोजित लोड प्रतिरोध RL के साथ अनुप्रयुक्त की जाए तो लोड के सिरों पर केवल ac निवेश के उस अर्धचक्र में जिसमें डायोड अग्रदिशिक बायसित है, एक स्पंदमान वोल्टता दृष्टिगोचर होगी। ट्रांसफ़ार्मर की द्वितीयक कुंडली टर्मिनल A तथा B पर वांछित ac वोल्टता की आपूर्ति करती है।

इस प्रकार, निर्गत वोल्टता यद्यपि अभी भी परिवर्तनीय है परंतु यह केवल एक ही दिशा में प्रतिबंधित होने के कारण दिष्टकारी कहलाती है। चूँकि हमें ac तरंग के केवल एक ही अर्धचक्र में निर्गत वोल्टता प्राप्त हो रही है, अतः इस परिपथ को अर्ध-तरंग दिष्टकारी कहते हैं।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी

दो डायोडों का उपयोग करके एक ऐसी परिपथ व्यवस्था की जाती है जिससे ac चक्र के धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों ही अर्धचक्रों में तदनुरूपी दिष्टकृत निर्गत वोल्टता प्राप्त होती है। इसमें दोनों डायोडों के n-फलकों को एक साथ संयोजित कर देते हैं तथा निर्गत को डायोडों के इस उभयनिष्ठ बिंदु तथा ट्रांसफ़ार्मर की द्वितीयक कुंडली के मध्य बिंदु के बीच प्राप्त किया जाता है — इस ट्रांसफ़ार्मर को मध्य निष्कासी ट्रांसफ़ार्मर कहते हैं।

प्रत्येक डायोड द्वारा दिष्टकृत वोल्टता कुल द्वितीयक कुंडली से प्राप्त वोल्टता की केवल आधी ही है — प्रत्येक डायोड केवल आधे चक्र का दिष्टकरण करता है, परंतु दो डायोड प्रत्यावर्ती चक्रों का दिष्टकरण करते हैं। स्पष्टतः, दिष्ट वोल्टता या धारा प्राप्त करने के लिए यह अर्ध-तरंग दिष्टकारी से अधिक दक्ष परिपथ है।

संधारित्र फ़िल्टर

इस प्रकार प्राप्त दिष्टकृत वोल्टता अर्ध ज्याक्रोणी आकृति की होती है। यद्यपि यह एकदिशिक होती है परंतु इसका मान स्थायी नहीं होता। स्पंदमान वोल्टता से dc निर्गत प्राप्त करने के लिए निर्गत टर्मिनलों के सिरों पर सामान्यतः कोई संधारित्र संयोजित कर देते हैं — इसे फ़िल्टर कहते हैं।

जब संधारित्र के सिरों पर वोल्टता में वृद्धि हो रही होती है तो वह आवेशित हो जाता है। यदि परिपथ में कोई लोड है तो यह लोड से होकर विसर्जित होने लगता है तथा इसके सिरों पर वोल्टता कम होने लगती है। दिष्टकृत निर्गत के अगले अर्ध चक्र में यह फिर अपनी शिखर वोल्टता तक आवेशित होता है। संधारित्र के सिरों पर वोल्टता में कमी होने की दर संधारित्र की धारिता C तथा परिपथ में लगे प्रभावी प्रतिरोधक RL के प्रतिरोध गुणनफल (कालांक) पर निर्भर करती है — कालांक का मान अधिक होने के लिए C का मान अधिक होना चाहिए।
NEET फोकस
  • दिष्टकारी: ac वोल्टता को dc में परिवर्तित करने वाला परिपथ; डायोड की एक-दिशिक धारा प्रवाह क्षमता पर आधारित।
  • अर्ध-तरंग दिष्टकारी: एक डायोड, केवल एक अर्धचक्र में निर्गत — निर्गत आवृत्ति = निवेश आवृत्ति।
  • पूर्ण तरंग दिष्टकारी: दो डायोड + मध्य निष्कासी ट्रांसफ़ार्मर (या 4 डायोड), दोनों अर्धचक्रों में निर्गत — निर्गत आवृत्ति = 2×निवेश आवृत्ति।
  • पूर्ण तरंग दिष्टकारी, अर्ध-तरंग दिष्टकारी से अधिक दक्ष है।
  • दिष्टकृत निर्गत को स्थिर dc बनाने के लिए संधारित्र फ़िल्टर उपयोग किया जाता है।
  • फ़िल्टर कालांक (τ = R_L C) जितना अधिक, निर्गत वोल्टता उतनी ही अधिक शिखर मान के निकट व स्थिर रहती है।

8 ट्रांजिस्टर

तीन-टर्मिनल अर्धचालक युक्ति एवं प्रवर्धन

ट्रांजिस्टर तीन भागों से बनी एक अर्धचालक युक्ति है — उत्सर्जक (Emitter, E), आधार (Base, B) तथा संग्राहक (Collector, C)। यह दो प्रकार का होता है: n-p-n तथा p-n-p। आधार अत्यंत पतला (~कुछ माइक्रोमीटर) व हल्के रूप से अपमिश्रित होता है, जबकि उत्सर्जक भारी रूप से अपमिश्रित तथा संग्राहक मध्यम रूप से अपमिश्रित व बड़े आकार का होता है।

ट्रांजिस्टर क्रिया की तीन शर्तें: (i) उत्सर्जक-आधार संधि अग्र-अभिनत तथा आधार-संग्राहक संधि पश्च-अभिनत होनी चाहिए। (ii) आधार अत्यंत पतला व हल्के रूप से अपमिश्रित होना चाहिए ताकि अधिकांश आवेश वाहक संग्राहक तक पहुँच सकें। (iii) उत्सर्जक अत्यधिक भारी रूप से अपमिश्रित होना चाहिए ताकि पर्याप्त आवेश वाहक उपलब्ध हों।

धाराओं में संबंध

IE = IB + IC

उत्सर्जक धारा (IE) का अधिकांश भाग (~95–99%) संग्राहक धारा (IC) के रूप में तथा शेष अल्प भाग आधार धारा (IB) के रूप में प्रवाहित होता है।

उभयनिष्ठ उत्सर्जक (Common Emitter, CE) विन्यास

इस विन्यास में उत्सर्जक इनपुट तथा आउटपुट दोनों परिपथों के लिए उभयनिष्ठ (सामान्य) होता है — यह प्रवर्धक के रूप में सर्वाधिक प्रयुक्त विन्यास है।

धारा प्रवर्धन गुणांक (β) = ΔIC/ΔIB  (नियत VCE पर)
वोल्टता लब्धि AV = β × (RL/Ri)    शक्ति लब्धि = β × AV
उदाहरण 14.5 (हल सहित): किसी ट्रांजिस्टर को उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में नियत संग्राहक वोल्टता VC=1.5V पर संचालित किया जाता है। आधार धारा में 100μA से 150μA का परिवर्तन, संग्राहक धारा में 5mA से 10mA का परिवर्तन उत्पन्न करता है। धारा प्रवर्धन β ज्ञात कीजिए।

हल: β = ΔIC/ΔIB = (10−5)mA/(150−100)μA = 5×10⁻³/50×10⁻⁶ = 100
NEET फोकस
  • ट्रांजिस्टर तीन-टर्मिनल युक्ति: उत्सर्जक (E), आधार (B), संग्राहक (C)।
  • दो प्रकार: n-p-n तथा p-n-p।
  • ट्रांजिस्टर क्रिया हेतु: E-B संधि अग्र-अभिनत, B-C संधि पश्च-अभिनत।
  • धारा संबंध: I_E = I_B + I_C (I_E सबसे बड़ी)।
  • उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास: इनपुट व आउटपुट दोनों के लिए उत्सर्जक सामान्य।
  • β = ΔI_C/ΔI_B; α = ΔI_C/ΔI_E; β = α/(1−α)।
  • वोल्टता लब्धि A_V = β×R_L/R_i; शक्ति लब्धि = β×A_V।
  • CE विन्यास प्रवर्धकों में सर्वाधिक प्रयुक्त।

9 डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी व लॉजिक गेट

बूलियन बीजगणित एवं डिजिटल परिपथ

डिजिटल परिपथों में सिग्नल केवल दो विविक्त स्तरों — 0 (निम्न) तथा 1 (उच्च) — में होते हैं। लॉजिक गेट वह डिजिटल परिपथ है जो एक या अधिक द्वि-आधारी (binary) निवेशों को बूलियन बीजगणित के नियमानुसार संसाधित कर एक निर्गत उत्पन्न करता है। ये अर्धचालक डायोड व ट्रांजिस्टर से निर्मित होते हैं।

मूल लॉजिक गेट व बूलियन व्यंजक

गेटबूलियन व्यंजकनियम
ORY = A+Bनिर्गत 1 तभी जब कम से कम एक निवेश 1 हो
ANDY = A·Bनिर्गत 1 तभी जब सभी निवेश 1 हों
NOTY = Āनिर्गत सदैव निवेश के विपरीत (प्रतिलोम)
NANDY = A·BAND के बाद NOT — निर्गत 0 तभी जब सभी निवेश 1 हों
NORY = A+BOR के बाद NOT — निर्गत 1 तभी जब सभी निवेश 0 हों
NAND व NOR — सार्वत्रिक गेट: इन दोनों गेटों के संयोजन से अन्य सभी मूल गेट (AND, OR, NOT) बनाए जा सकते हैं, इसलिए इन्हें सार्वत्रिक गेट कहा जाता है। उदाहरणार्थ, किसी NAND गेट के दोनों निवेशों को आपस में जोड़ने (A को दोनों निवेशों पर लगाने) पर वह NOT गेट की भाँति कार्य करता है: Y=A·A=Ā।

सत्यमान सारणियाँ (A, B निवेश; Y निर्गत)

ABOR (A+B)AND (A·B)NANDNOR
000011
011010
101010
111100
याद रखने की युक्ति: NAND का निर्गत केवल तभी 0 होता है जब सभी निवेश 1 हों (शेष सभी दशाओं में 1)। NOR का निर्गत केवल तभी 1 होता है जब सभी निवेश 0 हों (शेष सभी दशाओं में 0)।
NEET फोकस
  • डिजिटल परिपथ में सिग्नल दो ही स्तर: 0 (निम्न) व 1 (उच्च)।
  • लॉजिक गेट: बूलियन बीजगणित के नियमानुसार निवेशों को संसाधित कर निर्गत देता है।
  • मूल गेट: OR, AND, NOT; सार्वत्रिक गेट: NAND, NOR।
  • NAND = AND + NOT; NOR = OR + NOT।
  • NAND का निर्गत 0 तभी जब सभी निवेश 1 (सत्यमान सारणी से)।
  • NOR का निर्गत 1 तभी जब सभी निवेश 0।
  • NAND/NOR के दोनों निवेश जोड़ने पर NOT गेट प्राप्त होता है।
  • डी मॉर्गन के नियम: (A·B)' = A'+B' तथा (A+B)' = A'·B'।

✓ सारांश व सूत्र-सूची

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

वर्गीकरण

धातु (ρ~10⁻⁸–10⁻² Ωm); अर्धचालक (ρ~10⁻⁵–10⁶ Ωm); विद्युतरोधी (ρ~10¹¹–10¹⁹ Ωm)

ऊर्जा बैंड अंतराल

C: 5.4eV; Si: 1.1eV; Ge: 0.7eV; Sn: ≈0eV

नैज अर्धचालक

n_e = n_h = n_i

अपद्रव्यी अर्धचालक

n-प्रकार (दाता, पंचसंयोजी); p-प्रकार (ग्राही, त्रिसंयोजी)

तापीय साम्य संबंध

n_e n_h = n_i² (सभी अर्धचालकों के लिए)

p-n संधि

विसरण + अपवाह; हासी क्षेत्र; रोधिका विभव V₀

डायोड

अग्रदिशिक: mA, कम प्रतिरोध; पश्चदिशिक: µA, अधिक प्रतिरोध

दिष्टकारी

अर्ध-तरंग (50Hz→50Hz); पूर्ण-तरंग (50Hz→100Hz)

ट्रांजिस्टर व लॉजिक गेट

β=ΔI_C/ΔI_B; NAND व NOR सार्वत्रिक गेट

📊 भौतिक राशियाँ तालिका

प्रतीक, मात्रक एवं सूत्र

राशि/संबंधसूत्रटिप्पणी
नैज वाहक सांद्रता संबंधne = nh = niनैज अर्धचालकों के लिए
तापीय साम्य संबंधne nh = ni²सभी दशाओं में (नैज व अपद्रव्यी दोनों)
n-प्रकार अर्धचालकne >> nhपंचसंयोजी अपमिश्रण से
p-प्रकार अर्धचालकnh >> neत्रिसंयोजी अपमिश्रण से
कुल धाराI = Ie + Ihइलेक्ट्रॉन धारा + होल धारा
अग्रदिशिक बायस रोधिका ऊँचाई(V₀ − V)रोधिका कम हो जाती है
पश्चदिशिक बायस रोधिका ऊँचाई(V₀ + V)रोधिका बढ़ जाती है
गतिक प्रतिरोधrd = ΔV/ΔIवोल्टता व धारा के लघु परिवर्तनों का अनुपात
अर्ध-तरंग दिष्टकारी निर्गत आवृत्तिfout = finनिवेश आवृत्ति के बराबर
पूर्ण तरंग दिष्टकारी निर्गत आवृत्तिfout = 2 finनिवेश आवृत्ति की दुगुनी
ट्रांजिस्टर धारा संबंधIE = IB + ICउत्सर्जक धारा सबसे अधिक
ट्रांजिस्टर धारा प्रवर्धन (CE)β = ΔIC/ΔIBउभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास
शक्ति लब्धिβ × AVधारा लब्धि × वोल्टता लब्धि

★ NEET फैक्ट-शीट

त्वरित पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख बिंदु

अवधारणाप्रमुख तथ्य
ट्रांजिस्टर की खोजसन् 1948 में
निर्वात नलिकाओं के इलेक्ट्रोडडायोड 2; ट्रायोड 3; टेट्रोड 4; पेंटोड 5
अर्धचालक उदाहरणSi, Ge, GaAs, CdS, CdSe, InP
ऊर्जा अंतराल — कार्बन5.4 eV (विद्युतरोधी)
ऊर्जा अंतराल — Si1.1 eV (अर्धचालक)
ऊर्जा अंतराल — Ge0.7 eV (अर्धचालक)
ऊर्जा अंतराल — Sn≈0 eV (धातु)
नैज अर्धचालक मेंn_e = n_h = n_i
तापीय साम्य संबंधn_e × n_h = n_i²
n-प्रकार अपमिश्रकपंचसंयोजी (As, Sb, P) — दाता
p-प्रकार अपमिश्रकत्रिसंयोजी (In, B, Al) — ग्राही
n-प्रकार में बहुसंख्यक वाहकइलेक्ट्रॉन
p-प्रकार में बहुसंख्यक वाहकहोल
p-n संधि में हासी क्षेत्रमाइक्रोमीटर के दसवें भाग की कोटि
अग्रदिशिक बायस धाराmA में
पश्चदिशिक बायस धाराµA में
कट-इन वोल्टता — Ge≈0.2 V
कट-इन वोल्टता — Si≈0.7 V
अर्ध-तरंग दिष्टकारी आवृत्ति (50Hz निवेश)50 Hz निर्गत
पूर्ण-तरंग दिष्टकारी आवृत्ति (50Hz निवेश)100 Hz निर्गत
ट्रांजिस्टर के तीन टर्मिनलE (उत्सर्जक), B (आधार), C (संग्राहक)
ट्रांजिस्टर क्रिया की शर्तE-B संधि अग्र; B-C संधि पश्च
ट्रांजिस्टर में धारा संबंधI_E = I_B + I_C
β (CE विन्यास)β = ΔI_C/ΔI_B
सार्वत्रिक गेटNAND, NOR
NAND का निर्गत 0 कब?सभी निवेश 1 होने पर
NOR का निर्गत 1 कब?सभी निवेश 0 होने पर
डी मॉर्गन के नियम(A·B)' = A'+B'; (A+B)' = A'·B'

📝 NEET में पूछे जा चुके प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्नों की शैली — अभ्यास हेतु

1 कार्बन, सिलिकॉन तथा जर्मेनियम परमाणुओं में प्रत्येक के चार संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनके संयोजकता व चालन बैंड ऊर्जा अंतराल क्रमशः (Eg)C, (Eg)Si व (Eg)Ge द्वारा निरूपित हैं। निम्न में से कौन-सा संबंध सत्य है?

उत्तर: (Eg)_C > (Eg)_Si > (Eg)_Ge

परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ संयोजी इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर की कक्षा में होते हैं, अतः वर्जित ऊर्जा अंतराल घटता है (C: 5.4 eV, Si: 1.1 eV, Ge: 0.7 eV)

2 यदि शुद्ध जर्मेनियम क्रिस्टल में एंटीमनी की थोड़ी मात्रा मिलाई जाए, तो यह ______ हो जाएगा।

उत्तर: n-प्रकार (n-type)

एंटीमनी (Sb) पंचसंयोजी (Group 15) तत्व है — यह दाता अशुद्धि के रूप में कार्य करता है, प्रत्येक Sb परमाणु एक अतिरिक्त शिथिल-बद्ध इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है।

3 500K पर शुद्ध सिलिकॉन में इलेक्ट्रॉन (n_e) व होल (n_h) की सांद्रता समान अर्थात् 1.5×10¹⁶ m⁻³ है। इंडियम अपमिश्रण द्वारा n_h को बढ़ाकर 4.5×10²² m⁻³ कर दिया जाता है। परिणामी अपमिश्रित अर्धचालक किस प्रकार का होगा?

उत्तर: p-प्रकार का अर्धचालक

n_e × n_h = n_i² ⟹ n_e = n_i²/n_h = (1.5×10¹⁶)²/(4.5×10²²) = 5×10⁹ m⁻³

चूँकि n_h (4.5×10²²) >> n_e (5×10⁹), होल बहुसंख्यक वाहक हैं — यह p-प्रकार है (इंडियम त्रिसंयोजी ग्राही अशुद्धि है)।

4 किसी ट्रांजिस्टर को उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में नियत संग्राहक वोल्टता V_C=1.5V पर संचालित किया जाता है, जिसमें आधार धारा में 100μA से 150μA का परिवर्तन, संग्राहक धारा में 5mA से 10mA का परिवर्तन उत्पन्न करता है। धारा प्रवर्धन गुणांक β ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 100

β = ΔI_C/ΔI_B = (10−5)mA/(150−100)μA = 5×10⁻³/50×10⁻⁶ = 100

5 किसी उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि 50 है, निवेश प्रतिबाधा 100Ω तथा निर्गत प्रतिबाधा 200Ω है। प्रवर्धक की शक्ति लब्धि ज्ञात कीजिए।

उत्तर: 1250

धारा लब्धि = वोल्टता लब्धि × (R_i/R_o) = 50×(100/200) = 25

शक्ति लब्धि = वोल्टता लब्धि × धारा लब्धि = 50×25 = 1250

6 दो निवेशों A व B तथा निर्गत Y वाले किसी लॉजिक परिपथ की सत्यमान सारणी इस प्रकार है: A=1,B=1→Y=0; A=1,B=0→Y=1; A=0,B=1→Y=1; A=0,B=0→Y=1। यह कौन-सा गेट है?

उत्तर: NAND गेट

निर्गत केवल तभी 0 है जब दोनों निवेश 1 हों — यही NAND गेट की विशिष्ट पहचान है (Y = A·B का पूरक)।

➕ अतिरिक्त NEET तथ्य

सूक्ष्म बिंदु जो अक्सर परीक्षा में पूछे जाते हैं

महत्वपूर्ण
  • यह अध्याय NEET में प्रतिवर्ष 2–4 प्रश्न (8–16 अंक) रखता है — भौतिकी के भारी अध्यायों में गिना जाता है; सर्वाधिक बार पूछे गए उप-विषय — ऊर्जा बैंड सिद्धांत, p-n संधि व दिष्टकरण, ट्रांजिस्टर अभिलक्षण तथा लॉजिक गेट (सत्यमान सारणी) हैं।
तथ्य
  • ज़ेनर डायोड — भारी अपमिश्रित p-n संधि डायोड, प्रतिलोम अभिनति में भंजन वोल्टता (V_z) क्षेत्र में संचालित; वोल्टता नियंत्रक के रूप में प्रयुक्त।
तुलनात्मक
  • ज़ेनर भंजन बनाम हिमस्खलन भंजन — ज़ेनर: कम वोल्टता, भारी अपमिश्रित, प्रबल विद्युत क्षेत्र; हिमस्खलन: उच्च वोल्टता, हल्के अपमिश्रित, संघट्ट शृंखला अभिक्रिया।
तथ्य
  • प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) — अग्र अभिनति में संचालित भारी अपमिश्रित p-n संधि; पुनर्संयोजन से प्रकाश उत्सर्जन; λ=hc/Eg।
तथ्य
  • फोटोडायोड — प्रतिलोम अभिनति में संचालित; प्रकाश-तीव्रता के संसूचन हेतु; फोटॉन द्वारा उत्पन्न इलेक्ट्रॉन-होल युग्म प्रतिलोम धारा बढ़ाते हैं।
तथ्य
  • सौर सेल — अनबायस्ड p-n संधि; प्रकाश-वोल्टीय प्रभाव से वि.वा.बल उत्पन्न होता है।
तुलनात्मक
  • नैज बनाम बाह्य अर्धचालकों की ताप निर्भरता — दोनों में ताप बढ़ने पर चालकता बढ़ती है (धातुओं से विपरीत)।
तुलनात्मक
  • p-प्रकार बनाम n-प्रकार अपमिश्रण — त्रिसंयोजी → स्वीकर्ता स्तर, होल बहुसंख्यक; पंचसंयोजी → दाता स्तर, इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक; दोनों ही क्रिस्टल विद्युत उदासीन रहते हैं।
तथ्य
  • पूर्ण-तरंग बनाम अर्ध-तरंग दिष्टकारी — अर्ध-तरंग: दक्षता ~40.6%; पूर्ण-तरंग: दक्षता ~81.2%; पूर्ण-तरंग में तरंग-गुणांक कम।
तथ्य
  • ट्रांजिस्टर की तीन विन्यास — CB, CE, CC; CE विन्यास धारा लब्धि (β) व वोल्टता लब्धि दोनों देता है, अतः प्रवर्धकों में सर्वाधिक प्रयुक्त।
तुलनात्मक
  • α (CB) बनाम β (CE) — β = α/(1−α), α = β/(1+β); α सदैव 1 के निकट, β बड़ा।
तथ्य
  • ट्रांजिस्टर — स्विच बनाम प्रवर्धक — कर्तन क्षेत्र: OFF स्विच; संतृप्ति: ON स्विच; सक्रिय क्षेत्र: प्रवर्धक।
तथ्य
  • ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना — चालक: E_g≈0; अर्धचालक: E_g≈1eV; कुचालक: E_g>3eV।
तुलनात्मक
  • डी मॉर्गन के नियम व सार्वत्रिक गेट — (A·B)'=A'+B' तथा (A+B)'=A'·B'; NAND व NOR सार्वत्रिक गेट।
रणनीति
  • p-n संधि में अवक्षय क्षेत्र व अवरोध विभव — विसरण से बना आवेश-रहित क्षेत्र; अवरोध विभव Si: ≈0.7V, Ge: ≈0.3V; अग्र अभिनति इस अवरोध को घटाती है, प्रतिलोम अभिनति बढ़ाती है।
तथ्य
  • चालन में द्वि-प्रकार के आवेश वाहक — अर्धचालकों में इलेक्ट्रॉन व होल दोनों (I=I_e+I_h); धातुओं में केवल इलेक्ट्रॉन।
रणनीति
  • इस अध्याय की पुनरावृत्ति के लिए — ऊर्जा बैंड सिद्धांत, n/p-प्रकार अपमिश्रण, p-n संधि व डायोड, अग्र/पश्च अभिनति, ट्रांजिस्टर (β, I_E=I_B+I_C), लॉजिक गेट (सत्यमान सारणी) — इन छह टॉपिक पर विशेष ध्यान दें, इनसे 80%+ प्रश्न कवर हो जाते हैं।

? अभ्यास प्रश्न-उत्तर

NCERT अध्याय 14 के सभी 6 प्रश्नों के विस्तृत हल — प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करें

प्रश्न 14.1 किसी n-प्रकार के सिलिकॉन में निम्नलिखित में से कौन-सा प्रकथन सत्य है? (a) इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। (b) इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। (c) होल अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। (d) होल बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
उत्तर

n-प्रकार के अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक होते हैं, तथा होल अल्पसंख्यक होते हैं। अपमिश्रक पंचसंयोजी (संयोजकता 5, जैसे As, Sb, P) होता है।

सही विकल्प (c) है: होल (विवर) अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।

प्रश्न 14.2 अभ्यास 14.1 में दिए गए कथनों में से कौन-सा p-प्रकार के अर्धचालकों के लिए सत्य है?
उत्तर

p-प्रकार के अर्धचालक में होल बहुसंख्यक होते हैं तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक होते हैं। अपमिश्रक त्रिसंयोजी (संयोजकता 3, जैसे In, B, Al) होता है।

सही विकल्प (d) है: होल (विवर) बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।

प्रश्न 14.3 कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम, प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन हैं। इनकी विशेषता ऊर्जा बैंड अंतराल द्वारा पृथक्कृत संयोजकता और चालन बैंड द्वारा दी गई हैं। निम्न में से कौन-सा प्रकथन सत्य है? (a) (Eg)Si < (Eg)Ge < (Eg)C (b) (Eg)C < (Eg)Ge > (Eg)Si (c) (Eg)C > (Eg)Si > (Eg)Ge (d) (Eg)C = (Eg)Si = (Eg)Ge
उत्तर

चारों संयोजी इलेक्ट्रॉन क्रमशः द्वितीय (C), तृतीय (Si) तथा चतुर्थ (Ge) कक्षा में होते हैं। नाभिक से दूरी बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन कम दृढ़ता से बंधा होगा, अतः आयनन ऊर्जा (E_g) घटेगी।

सही विकल्प (c) है: (Eg)_C > (Eg)_Si > (Eg)_Ge

प्रश्न 14.4 बिना बायस p-n संधि से, होल p-क्षेत्र में n-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं, क्योंकि (a) n-क्षेत्र में मुक्त इलेक्ट्रॉन उन्हें आकर्षित करते हैं। (b) ये विभवांतर के कारण संधि के पार गति करते हैं। (c) p-क्षेत्र में होल-सांद्रता, n-क्षेत्र में इनकी सांद्रता से अधिक है। (d) उपरोक्त सभी।
उत्तर

बिना बायस स्थिति में होलों का p-क्षेत्र से n-क्षेत्र की ओर सांद्रता प्रवणता के कारण विसरण होता है, क्योंकि p-क्षेत्र में होलों की सांद्रता n-क्षेत्र में होलों की सांद्रता से बहुत अधिक होती है।

सही विकल्प (c) है: p-क्षेत्र में होल-सांद्रता, n-क्षेत्र में इनकी सांद्रता से अधिक है।

प्रश्न 14.5 जब p-n संधि पर अग्रदिशिक बायस अनुप्रयुक्त किया जाता है, तब यह (a) विभव रोधक बढ़ाता है। (b) बहुसंख्यक वाहक धारा को शून्य कर देता है। (c) विभव रोधक को कम कर देता है। (d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर

अग्रदिशिक बायस में बाह्य वोल्टता की दिशा संधि के अंतःनिर्मित रोधिका विभव के विपरीत होती है, जिससे हासी क्षेत्र की मोटाई घट जाती है तथा रोधिका विभव (V₀ − V) तक कम हो जाता है।

सही विकल्प (c) है: अग्रदिशिक बायस विभव रोधक को कम कर देता है।

प्रश्न 14.6 अर्ध-तरंगी दिष्टकरण में, यदि निवेश आवृत्ति 50 Hz है तो निर्गम आवृत्ति क्या है? समान निवेश आवृत्ति हेतु पूर्ण तरंग दिष्टकारी की निर्गम आवृत्ति क्या है?
उत्तर

अर्ध-तरंग दिष्टकारी में: केवल एक अर्धचक्र (धनात्मक) का उपयोग होता है, दूसरे अर्धचक्र में कोई निर्गत नहीं मिलता। अतः निर्गत की पुनरावृत्ति दर = निवेश आवृत्ति = 50 Hz

पूर्ण तरंग दिष्टकारी में: दोनों अर्धचक्रों (धनात्मक व ऋणात्मक) का उपयोग होता है, एक चक्र में दो स्पंद प्राप्त होते हैं। अतः निर्गत की पुनरावृत्ति दर = 2 × निवेश आवृत्ति = 100 Hz

यह अध्ययन सामग्री अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी — ऊर्जा बैंड, नैज व अपद्रव्यी अर्धचालक, p-n संधि, डायोड, दिष्टकारी, ट्रांजिस्टर एवं लॉजिक गेट — को सरल, मौलिक एवं परीक्षा-अनुकूल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिसमें NEET-स्तरीय तथ्य, तुलनात्मक तालिकाएँ एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर सम्मिलित हैं।

अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी — आधुनिक डिजिटल युग की रीढ़।

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