ऊष्मागतिकी
तापीय साम्य, शून्य कोटि नियम, ऊष्मा-कार्य-आंतरिक ऊर्जा, प्रथम नियम, विशिष्ट ऊष्मा धारिता, अवस्था चर, ऊष्मागतिकीय प्रक्रम, द्वितीय नियम, उत्क्रमणीयता तथा कार्नो इंजन — सम्पूर्ण व्याख्या, हल किए गए उदाहरण, अभ्यास प्रश्नों के हल एवं NEET PYQs सहित।
11.1 भूमिका
ऊष्मागतिकी की प्रकृति एवं यांत्रिकी से भेद
ऊष्मागतिकी भौतिकी की वह शाखा है जो ऊष्मा तथा ताप की अवधारणा एवं ऊष्मा के अन्य प्रकार की ऊर्जाओं में अंतरा-रूपांतरण का विवेचन करती है। यह एक स्थूल विज्ञान (Macroscopic Science) है, क्योंकि यह द्रव्य की आण्विक संरचना पर विचार नहीं करती, बल्कि निकाय की स्थूल प्रकृति (दाब, आयतन, ताप, द्रव्यमान जैसी राशियों) पर विचार करती है, जिन्हें हम अपनी इंद्रियों से अनुभव और माप सकते हैं।
यांत्रिकी व ऊष्मागतिकी में भेद: यांत्रिकी में रुचि बलों तथा बल आघूर्णों के प्रभाव में गति कर रहे कणों एवं पिंडों में होती है — संपूर्ण निकाय की गति महत्वपूर्ण होती है। ऊष्मागतिकी में संपूर्ण निकाय की गति पर विचार नहीं किया जाता, बल्कि पिंड की आंतरिक स्थूल अवस्था में रुचि होती है। जब बंदूक से गोली दागी जाती है, तब जो परिवर्तन होता है वह गोली की यांत्रिक अवस्था (गतिज ऊर्जा) में होता है, उसके ताप में नहीं। जब गोली लकड़ी में धँसकर रुक जाती है, तो गोली की गतिज ऊर्जा ऊष्मा में रूपांतरित हो जाती है — ताप गोली की आंतरिक अव्यवस्थित गति से संबंधित होता है, न कि गोली की संपूर्ण गति से।
11.2 तापीय साम्य
रुद्धोष्म एवं ऊष्मा-पार्थ दीवारें
यांत्रिकी में साम्यावस्था से तात्पर्य है कि निकाय पर नेट बाह्य बल व बल आघूर्ण शून्य हैं। ऊष्मागतिकी में साम्यावस्था का अर्थ है: निकाय की वह अवस्था जिसमें निकाय को अभिलक्षणित करने वाले स्थूल चर (दाब, आयतन, ताप) समय के साथ परिवर्तित नहीं होते।
रुद्धोष्म दीवार (Adiabatic wall): ऐसी दीवार जिससे ऊष्मा आर-पार नहीं जा पाती। ऊष्मा-पार्थ दीवार (Diathermic wall): चालक दीवार जिससे ऊष्मा एक निकाय से दूसरे में चली जाती है।
दो निकायों के मध्य की साम्यावस्था को तापीय साम्य कहते हैं — तापीय साम्य में दो निकायों के ताप समान होते हैं।
- रुद्धोष्म दीवार से ऊष्मा नहीं जाती
- ऊष्मा-पार्थ (चालक) दीवार से ऊष्मा जाती है
- तापीय साम्य ⟹ दोनों निकायों के ताप समान
11.3 ऊष्मागतिकी का शून्य कोटि नियम
ताप की अवधारणा का आधार
इस नियम के माध्यम से विधिवत् ताप की अवधारणा विकसित होती है — वह भौतिक राशि जो सभी परस्पर तापीय साम्य वाले निकायों के लिए समान मान रखती है, ताप (T) कहलाती है।
11.4 ऊष्मा, आंतरिक ऊर्जा तथा कार्य
अवस्था चर एवं ऊर्जा स्थानांतरण की विधियाँ
आंतरिक ऊर्जा (U): निकाय के अणुओं की स्थितिज व गतिज ऊर्जाओं का योग। ऊष्मागतिकी में निकाय की समग्र (स्थानांतरीय) गतिज ऊर्जा प्रासंगिक नहीं होती — आंतरिक ऊर्जा में केवल निकाय के अणुओं की यादृच्छिक (अव्यवस्थित) गति से संबंधित ऊर्जा समाहित होती है। आंतरिक ऊर्जा एक ऊष्मागतिकीय अवस्था चर है — इसका मान केवल निकाय की वर्तमान अवस्था पर निर्भर करता है, न कि इस बात पर कि यह अवस्था किस पथ से (इतिवृत्ति से) प्राप्त हुई।
- ऊष्मा: निकाय व परिवेश के बीच तापांतर के कारण ऊर्जा का स्थानांतरण।
- कार्य: पिस्टन जैसे साधनों द्वारा उत्पन्न ऊर्जा का स्थानांतरण, जिसमें तापांतर सम्मिलित नहीं होता।
- आंतरिक ऊर्जा (U) — अवस्था चर
- ऊष्मा (Q) व कार्य (W) — अवस्था चर नहीं, पथ-निर्भर
- U केवल अव्यवस्थित आणविक गति से संबंधित है
11.5 ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम
ऊर्जा संरक्षण का सामान्य नियम
माना ΔQ = परिवेश द्वारा निकाय को दी गई ऊष्मा, ΔW = निकाय द्वारा परिवेश पर किया गया कार्य, ΔU = निकाय की आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन।
(ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम — ऊर्जा संरक्षण का सामान्य रूप)
यह ऊर्जा संरक्षण का सामान्य नियम है, जिसे किसी भी उस निकाय पर लागू किया जा सकता है जिसमें परिवेश को अथवा परिवेश से ऊष्मा स्थानांतरण पर ध्यान दिया जाता है।
चूँकि U एक अवस्था चर है, ΔU केवल प्रारंभिक व अंतिम अवस्थाओं पर निर्भर करता है, न कि उस पथ पर जिससे निकाय एक अवस्था से दूसरी में जाता है। यद्यपि ΔQ व ΔW दोनों सामान्यतः पथ पर निर्भर करते हैं, परंतु उनका संयोजन (ΔQ−ΔW) पथ पर निर्भर नहीं करता। यदि कोई निकाय ऐसी प्रक्रिया अपनाता है जिसमें ΔU=0 (उदाहरणार्थ, आदर्श गैस का समतापीय प्रसार), तो ΔQ = ΔW होता है।
- प्रथम नियम — ΔQ = ΔU + ΔW
- ΔU पथ-निरपेक्ष (अवस्था चर)
- ΔQ व ΔW पथ-निर्भर
- ΔU=0 होने पर ΔQ = ΔW
11.6 विशिष्ट ऊष्मा धारिता
ऊष्मा धारिता, मोलर विशिष्ट ऊष्मा एवं कैलोरी
ठोसों के लिए, ऊर्जा सम विभाजन नियम से: प्रत्येक परमाणु अपनी माध्य स्थिति के दोनों ओर कंपन करता है, तीन विमाओं में माध्य ऊर्जा 3kBT होती है। ठोस के एक मोल के लिए कुल ऊर्जा U=3RT, अतः स्थिर दाब पर (जहाँ ठोस के लिए ΔV नगण्य है, ΔQ=ΔU):
गैसों के लिए दो विशिष्ट ऊष्माएँ परिभाषित की जाती हैं — स्थिर आयतन पर विशिष्ट ऊष्मा धारिता (Cv) तथा स्थिर दाब पर विशिष्ट ऊष्मा धारिता (Cp)। आदर्श गैस के लिए सरल संबंध:
- ठोसों के लिए C ≈ 3R (डुलॉन्ग-पेटी नियम)
- गैसों के लिए CP − CV = R
- 1 cal = 4.186 J
11.7 ऊष्मागतिकीय अवस्था चर तथा अवस्था का समीकरण
विस्तीर्ण एवं गहन चर
किसी ऊष्मागतिकीय निकाय की प्रत्येक साम्य अवस्था को कुछ स्थूल चरों (दाब, आयतन, ताप, द्रव्यमान) के विशिष्ट मानों द्वारा पूरी तरह वर्णित किया जा सकता है। कोई ऊष्मागतिकीय निकाय सदैव साम्य स्थिति में नहीं होता (उदाहरण: निर्वात में मुक्त प्रसार, विस्फोटक रासायनिक अभिक्रिया — इनमें निकाय असाम्यावस्था से गुजरता है)।
अवस्था चर दो प्रकार के होते हैं:
| चर का प्रकार | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| विस्तीर्ण (Extensive) | निकाय के आकार पर निर्भर; भागों में बाँटने पर मान घटता है | U, V, M |
| गहन (Intensive) | आकार पर निर्भर नहीं; भागों में बाँटने पर मान अपरिवर्तित | P, T, ρ |
- आदर्श गैस समीकरण — PV = μRT
- विस्तीर्ण — U, V, M (आकार पर निर्भर)
- गहन — P, T, ρ (आकार पर निर्भर नहीं)
11.8 ऊष्मागतिकीय प्रक्रम
स्थैतिककल्प, समतापीय, रुद्धोष्म, समआयतनिक, समदाबीय, चक्रीय
11.8.1 स्थैतिककल्प प्रक्रम (Quasi-static Process)
ऐसा आदर्शीकृत प्रक्रम जो सैद्धांतिक रूप से अनंत रूप से धीमा होता है, जिसमें निकाय अपने परिवेश से पूरी अवधि में तापीय व यांत्रिक साम्य में रहता है। इस प्रक्रम के हर चरण में निकाय के दाब व उसके बाह्य दाब का अंतर, तथा निकाय व परिवेश के मध्य तापांतर अत्यंत सूक्ष्म होता है।
| प्रक्रम का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| समतापीय (Isothermal) | स्थिर ताप (T) |
| समदाबीय (Isobaric) | स्थिर दाब (P) |
| समआयतनिक (Isochoric) | स्थिर आयतन (V) |
| रुद्धोष्म (Adiabatic) | निकाय व परिवेश के मध्य ऊष्मा प्रवाह नहीं (ΔQ=0) |
11.8.2 समतापीय प्रक्रम
आदर्श गैस के लिए आंतरिक ऊर्जा केवल ताप पर निर्भर करती है, अतः समतापीय प्रक्रम में ΔU=0। इसलिए ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से Q = W — गैस को दी गई ऊष्मा पूर्णतः कार्य में रूपांतरित हो जाती है।
11.8.3 रुद्धोष्म प्रक्रम
रुद्धोष्म प्रक्रम में यदि गैस द्वारा कार्य संपादित होता है (W>0), तो T2<T1 अर्थात् गैस का ताप घटता है; यदि कार्य गैस पर संपादित होता है (W<0), तो गैस का ताप बढ़ता है।
11.8.4 समआयतनिक प्रक्रम
V नियत रहता है — न तो गैस पर कोई कार्य होता है, न ही गैस द्वारा कोई कार्य संपादित होता है (W=0)। अवशोषित ऊष्मा पूर्ण रूप से आंतरिक ऊर्जा व ताप को परिवर्तित करने में व्यय होती है।
11.8.5 समदाबीय प्रक्रम
अवशोषित ऊष्मा आंशिक रूप से आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि करने में तथा आंशिक रूप से कार्य करने में व्यय होती है।
11.8.6 चक्रीय प्रक्रम
निकाय अपनी प्रारंभिक अवस्था में वापस लौट आता है। चूँकि आंतरिक ऊर्जा अवस्था चर है, चक्रीय प्रक्रम के लिए ΔU=0। अतः अवशोषित ऊष्मा की कुल मात्रा निकाय द्वारा किए गए कार्य के बराबर होती है।
- समतापीय — PV = नियतांक; W = μRT ln(V₂/V₁); ΔU=0
- रुद्धोष्म — PVγ = नियतांक; W = μR(T₁−T₂)/(γ−1)
- समआयतनिक — W = 0
- समदाबीय — W = PΔV
- चक्रीय — ΔU = 0, Q = W
11.9 ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम
केल्विन-प्लैंक एवं क्लॉसियस प्रकथन
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण नियम है। परंतु ऐसे बहुत से मनोगम्य (imaginable) प्रक्रम हैं जो प्रथम नियम से पूर्णतया अनुमत हैं तथापि कभी होते हुए दिखाई नहीं देते (जैसे — मेज पर पड़ी पुस्तक स्वतः उछलकर किसी ऊँचाई पर पहुँच जाए)। यह नियम, जो प्रथम नियम से संगत परंतु अप्राकृतिक प्रक्रमों को स्वीकृति नहीं देता, ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम कहलाता है।
द्वितीय नियम किसी ऊष्मा इंजन की दक्षता तथा किसी प्रशीतक के निष्पादन गुणांक की मूल सीमा निर्धारित करता है।
ऐसा कोई प्रक्रम संभव नहीं है जिसका एकमात्र परिणाम किसी ऊष्मा भंडार से ऊष्मा का अवशोषण करना तथा उस ऊष्मा को पूर्णतया कार्य में रूपांतरित करना हो।
ऐसा कोई भी प्रक्रम संभव नहीं है जिसका एकमात्र परिणाम किसी ठंडे पिंड से किसी गर्म पिंड में ऊष्मा स्थानांतरण हो।
- केल्विन-प्लैंक: एकल भंडार से ऊष्मा लेकर पूर्णतः कार्य में बदलना असंभव
- क्लॉसियस: बिना बाह्य कार्य के ठंडे से गर्म में ऊष्मा-स्थानांतरण असंभव
- ऊष्मा इंजन की दक्षता η < 1 सदैव
11.10 उत्क्रमणीय व अनुत्क्रमणीय प्रक्रम
उत्क्रमणीयता की शर्तें एवं अनुत्क्रमणीयता के कारण
कोई ऊष्मागतिकीय प्रक्रम (अवस्था i → अवस्था f) उत्क्रमणीय तभी होता है यदि उसे इस प्रकार वापस लौटाया जा सके कि निकाय व परिवेश दोनों अपनी प्रारंभिक अवस्थाओं में वापस आ जाएँ तथा परिवेश में कहीं भी किसी भी प्रकार का अन्य परिवर्तन न हो। प्रकृति में सभी नैसर्गिक प्रक्रम अनुत्क्रमणीय होते हैं।
कोई प्रक्रम उत्क्रमणीय तभी होता है जब वह स्थैतिककल्प हो (परिवेश के साथ प्रत्येक चरण पर साम्य निकाय) तथा निकाय में कोई क्षयकारी प्रभाव (जैसे घर्षण, श्यानता) न हों।
अनुत्क्रमणीयता मुख्यतः दो कारणों से उत्पन्न होती है: (1) अनेक प्रक्रम निकाय को असंतुलन की अवस्थाओं में ले जाते हैं (मुक्त प्रसार, विस्फोटक अभिक्रिया), (2) अनेक प्रक्रमों में घर्षण, श्यानता व अन्य क्षय संबंधी प्रभाव निहित होते हैं।
- प्रकृति के सभी नैसर्गिक प्रक्रम अनुत्क्रमणीय
- उत्क्रमणीयता की शर्तें — स्थैतिककल्प + क्षयकारी प्रभाव-रहित
- अनुत्क्रमणीयता के 2 कारण — असाम्यावस्था + घर्षण/श्यानता
11.11 कार्नो इंजन
उत्क्रमणीय ऊष्मा इंजन एवं कार्नो प्रमेय
फ्रेंच इंजीनियर साडी कार्नो ने 1824 में सर्वप्रथम यह प्रश्न उठाया था कि दो तापों (T1 गर्म भंडार, T2 ठंडा भंडार) के बीच कार्य करने वाले किसी ऊष्मा इंजन की अधिकतम दक्षता कितनी होगी। दो तापों के मध्य कार्य करने वाला कोई उत्क्रमणीय ऊष्मा इंजन कार्नो इंजन कहलाता है।
कार्नो चक्र में चार चरण होते हैं (कार्यकारी पदार्थ के रूप में आदर्श गैस):
- T1 पर समतापीय प्रसार
- T1 से T2 तक रुद्धोष्म प्रसार
- T2 पर समतापीय संपीडन
- T2 से T1 तक रुद्धोष्म संपीडन
(कार्नो इंजन के लिए एक व्यापक संबंध)
- कार्नो दक्षता — η = 1 − T2/T1 (केवल तापों पर निर्भर)
- कार्नो चक्र — 2 समतापीय + 2 रुद्धोष्म (कुल 4 चरण)
- कार्नो प्रमेय — कोई भी इंजन कार्नो से अधिक दक्ष नहीं
- प्रशीतक COP — T2/(T1−T2)
🎯 एक-पंक्ति तथ्य — त्वरित पुनरावृत्ति
Quick Revision Facts — सभी महत्वपूर्ण बिंदु एक स्थान पर
- ऊष्मागतिकी एक स्थूल विज्ञान है — यह द्रव्य की आण्विक संरचना पर नहीं, स्थूल चरों (दाब, आयतन, ताप) पर विचार करती है।
- ऊष्मागतिकी में निकाय की संपूर्ण गति पर विचार नहीं होता, केवल आंतरिक स्थूल अवस्था पर होता है।
- रुद्धोष्म दीवार से ऊष्मा आर-पार नहीं जाती; ऊष्मा-पार्थ (चालक) दीवार से ऊष्मा एक निकाय से दूसरे में जाती है।
- ऊष्मागतिकीय साम्यावस्था में निकाय के स्थूल चर समय के साथ परिवर्तित नहीं होते।
- शून्य कोटि नियम: यदि दो निकाय किसी तीसरे निकाय के साथ पृथक्-पृथक् तापीय साम्य में हों तो वे परस्पर भी तापीय साम्य में होते हैं — इसी से ताप की अवधारणा जन्म लेती है।
- शून्य कोटि नियम का प्रतिपादन 1931 में आर.एच. फाउलर ने किया था (प्रथम व द्वितीय नियम के बहुत बाद)।
- आंतरिक ऊर्जा (U) = अणुओं की स्थितिज व गतिज ऊर्जाओं का योग; यह केवल यादृच्छिक (अव्यवस्थित) गति से संबंधित ऊर्जा है, संपूर्ण निकाय की गतिज ऊर्जा शामिल नहीं।
- आंतरिक ऊर्जा एक अवस्था चर है — केवल अवस्था पर निर्भर, पथ (इतिवृत्ति) पर नहीं।
- ऊष्मा व कार्य अवस्था चर नहीं हैं — ये ऊर्जा स्थानांतरण की विधियाँ हैं जिनसे आंतरिक ऊर्जा परिवर्तित होती है।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW — यह ऊर्जा संरक्षण का सामान्य नियम है।
- यदि ΔU=0 (जैसे समतापीय प्रसार में), तो ΔQ = ΔW होता है।
- विशिष्ट ऊष्मा धारिता s=(1/m)(ΔQ/ΔT); मोलर विशिष्ट ऊष्मा धारिता C=(1/μ)(ΔQ/ΔT)।
- ठोसों के लिए ऊर्जा सम विभाजन नियम से मोलर विशिष्ट ऊष्मा C = 3R (कार्बन एक अपवाद है)।
- 1 कैलोरी = 4.186 J; SI में जूल के उपयोग से "यांत्रिक तुल्यांक" पद अब निरर्थक है।
- आदर्श गैस के लिए: CP − CV = R (सार्वत्रिक गैस नियतांक)।
- अवस्था चर दो प्रकार के होते हैं — विस्तीर्ण (Extensive): U,V,M (आकार पर निर्भर); गहन (Intensive): P,T,ρ (आकार पर निर्भर नहीं)।
- स्थैतिककल्प प्रक्रम अनंत रूप से धीमा प्रक्रम है जिसमें निकाय पूरी अवधि में परिवेश से तापीय व यांत्रिक साम्य में रहता है।
- समतापीय प्रक्रम: PV=नियतांक; रुद्धोष्म प्रक्रम: PVγ=नियतांक, जहाँ γ=CP/CV।
- समतापीय प्रक्रम में ΔU=0 (आदर्श गैस के लिए U केवल T पर निर्भर); अतः Q=W।
- समआयतनिक प्रक्रम में कोई कार्य नहीं होता (W=0); समदाबीय प्रक्रम में W=PΔV।
- चक्रीय प्रक्रम के लिए ΔU=0 (निकाय प्रारंभिक अवस्था में लौट आता है); अतः अवशोषित ऊष्मा = किया गया कार्य।
- ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम बताता है कि किसी भी ऊष्मा इंजन की दक्षता η=1 (100%) नहीं हो सकती।
- केल्विन-प्लैंक प्रकथन: केवल एक ऊष्मा भंडार से ऊष्मा लेकर उसे पूर्णतः कार्य में बदलना असंभव है।
- क्लॉसियस प्रकथन: बिना बाह्य कार्य के ठंडे पिंड से गर्म पिंड में ऊष्मा स्थानांतरण असंभव है।
- प्रकृति के सभी नैसर्गिक प्रक्रम अनुत्क्रमणीय होते हैं। उत्क्रमणीय प्रक्रम एक आदर्श धारणा है।
- कोई प्रक्रम उत्क्रमणीय तभी होता है जब वह स्थैतिककल्प हो तथा उसमें कोई क्षयकारी प्रभाव (घर्षण/श्यानता) न हो।
- अनुत्क्रमणीयता के 2 मुख्य कारण: (1) निकाय का असंतुलन अवस्था में जाना (मुक्त प्रसार), (2) घर्षण/श्यानता जैसे क्षय प्रभाव।
- कार्नो इंजन दो तापों के बीच कार्य करने वाला एक उत्क्रमणीय ऊष्मा इंजन है — यह अधिकतम संभव दक्षता का इंजन है।
- कार्नो चक्र में 2 समतापीय व 2 रुद्धोष्म प्रक्रम होते हैं (कुल 4 चरण)।
- कार्नो इंजन की दक्षता: η = 1 − T2/T1 — केवल तापों पर निर्भर करती है, कार्यकारी पदार्थ पर नहीं।
- कार्नो प्रमेय: दो निश्चित तापों के बीच कार्य करने वाले किसी भी इंजन की दक्षता कार्नो इंजन की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती।
- Q>0 का अर्थ निकाय को ऊष्मा दी गई; Q<0 का अर्थ निकाय से ऊष्मा निकाली गई; W>0 का अर्थ निकाय द्वारा कार्य किया गया; W<0 का अर्थ निकाय पर कार्य किया गया।
➕ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु
- ऊष्मा इंजन की सामान्य दक्षता सूत्र — किसी भी (न केवल कार्नो) चक्रीय ऊष्मा इंजन की दक्षता η = W/Q₁ = 1 − Q₂/Q₁ होती है, जहाँ Q₁ = स्रोत से ली गई ऊष्मा, Q₂ = सिंक को दी गई ऊष्मा — कार्नो इंजन के लिए ही यह आगे η=1−T₂/T₁ के रूप में सरलीकृत होता है।
- स्वतंत्रता की कोटि व Cv का संबंध — ऊर्जा-समविभाजन नियम के अनुसार Cv = (f/2)R, जहाँ f = स्वतंत्रता की कोटियाँ — एकपरमाणुक गैस (f=3): Cv=3R/2, Cp=5R/2, γ=5/3; द्विपरमाणुक गैस (f=5): Cv=5R/2, Cp=7R/2, γ=7/5।
- मुक्त प्रसार में ताप अपरिवर्तित रहता है — मुक्त प्रसार (निर्वात में) में Q=0 व W=0, अतः ΔU=0 — आदर्श गैस के लिए U केवल T पर निर्भर, अतः ताप भी अपरिवर्तित — इसे रुद्धोष्म उत्क्रमणीय प्रसार से न उलझाएँ, जिसमें गैस बाह्य कार्य करती है (W>0) व ताप वास्तव में घटता है।
- प्रथम नियम की सीमा — दिशा नहीं बताता — प्रथम नियम केवल यह बताता है कि कोई प्रक्रम ऊर्जा की दृष्टि से संभव है या नहीं, परंतु यह नहीं बताता कि कोई प्रक्रम स्वतः किस दिशा में घटित होगा — यह केवल द्वितीय नियम निर्धारित करता है।
- एन्ट्रॉपी (Entropy) — द्वितीय नियम का एक वैकल्पिक, अधिक सामान्य कथन — किसी वियुक्त निकाय की कुल एन्ट्रॉपी किसी भी स्वतः प्रवर्तित प्रक्रम में कभी घट नहीं सकती (सदैव बढ़ती है अथवा उत्क्रमणीय आदर्श प्रक्रम में स्थिर रहती है)।
- कार्नो इंजन — एक आदर्शीकृत सैद्धांतिक सीमा, व्यवहार में अप्राप्य — कार्नो इंजन को पूर्णतः स्थैतिककल्प व क्षयकारी प्रभावों से पूर्णतः रहित होना आवश्यक है — व्यवहार में कोई भी वास्तविक इंजन इन दोनों शर्तों को ठीक-ठीक पूरा नहीं कर सकता।
- ऊष्मागतिकीय ताप-मापक्रम — पदार्थ-निरपेक्ष परिभाषा — केल्विन ने कार्नो इंजन की दक्षता के आधार पर एक ताप-मापक्रम परिभाषित किया, जो किसी विशेष तापमापी पदार्थ के गुणधर्मों पर निर्भर नहीं करता।
- प्रथम व द्वितीय प्रकार की चिरगति मशीन — प्रथम प्रकार: बिना ऊर्जा-निवेश के निरंतर कार्य (प्रथम नियम का उल्लंघन); द्वितीय प्रकार: एकल ऊष्मा-भंडार से ऊष्मा लेकर पूर्णतः कार्य में बदलना (द्वितीय नियम का उल्लंघन) — दोनों असंभव सिद्ध।
- सभी उत्क्रमणीय इंजनों की समान दक्षता — दो निश्चित तापों के मध्य कार्यरत सभी उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता बिल्कुल समान होती है, चाहे वे किसी भी कार्यकारी पदार्थ का उपयोग करें।
- दक्षता की सीमाएँ — किसी वास्तविक ऊष्मा इंजन की दक्षता (η) सदैव 0 व 1 के मध्य होती है (0 < η < 1) — यदि गणना से η>1 अथवा ऋणात्मक प्राप्त हो, तो यह गणना में त्रुटि का संकेत है।
- ऊष्मा इंजन बनाम प्रशीतक — ऊष्मा इंजन: उच्च ताप से ऊष्मा लेकर, कुछ कार्य में बदलकर, शेष निम्न ताप को देता है (चक्र दक्षिणावर्त); प्रशीतक: बाह्य कार्य निकाय पर करके, निम्न ताप से ऊष्मा लेकर उच्च ताप को देता है (चक्र वामावर्त)।
- चक्रीय प्रक्रम में कार्य — P-V ग्राफ पर बंद वक्र द्वारा घिरा क्षेत्रफल — दक्षिणावर्त चक्र में कार्य धनात्मक (ऊष्मा इंजन), वामावर्त में ऋणात्मक (प्रशीतक)।
- रुद्धोष्म प्रक्रम में कार्य का सूत्र — Q=0 होने से कार्य पूर्णतः आंतरिक ऊर्जा की कीमत पर: W = −ΔU = nCᵥ(T₁−T₂) — रुद्धोष्म प्रसार में गैस स्वयं ठंडी होकर कार्य करती है।
- ऊष्मा-पार्थ बनाम रुद्धोष्म दीवार — ऊष्मा-पार्थ (diathermic) दीवार ऊष्मा को गुजरने देती है; रुद्धोष्म (adiabatic) दीवार ऊष्मा को नहीं गुजरने देती — परीक्षा में इन दोनों शब्दों को उलट कर पूछना एक सामान्य ट्रैप है।
- गैसों की मोलर विशिष्ट ऊष्मा — ठोसों की तुलना में परिवर्ती क्यों — ठोसों के लिए मोलर विशिष्ट ऊष्मा एक निश्चित मान (लगभग 3R) रखती है; गैसों के लिए यह इस पर निर्भर करती है कि ऊष्मा किस प्रक्रम (स्थिर आयतन अथवा स्थिर दाब) पर दी जा रही है — इसीलिए Cᵥ व Cₚ दो पृथक मान परिभाषित करने पड़ते हैं।
- अंतिम रिवीज़न में इन तीन बिंदुओं को प्राथमिकता दें — (1) प्रथम नियम (ΔQ=ΔU+ΔW) व सभी चारों प्रक्रमों में इसके विशिष्ट रूप, (2) कार्नो इंजन व प्रशीतक दोनों के दक्षता/COP सूत्र व इनके बीच का संबंध, (3) उत्क्रमणीयता की शर्तें व अनुत्क्रमणीयता के सभी उदाहरण।
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उदाहरण जल के वाष्पन में ΔQ, ΔW तथा ΔU ज्ञात करना (धारा 11.5)
1g जल को अपनी द्रव प्रावस्था से वाष्प प्रावस्था में परिवर्तित होने पर, जल की मापी गई गुप्त ऊष्मा 2256 J/g है अर्थात् ΔQ=2256 J। वायुमंडलीय दाब पर, 1g जल का आयतन द्रव प्रावस्था में 1 cm³ तथा वाष्प प्रावस्था में 1671 cm³ होता है। ΔQ, ΔW व ΔU ज्ञात कीजिए।
हल:
ΔQ = 2256 J (दिया गया)
ΔW = P(Vg−Vl) = 1.013×105 × (1671−1)×10−6 = 1.013×105 × 1671×10−6 ≈ 169.2 J
प्रथम नियम से: ΔU = ΔQ − ΔW = 2256 − 169.2 = 2086.8 J
प्र. 11.1 गीज़र में ईंधन व्यय की दर
कोई गीज़र 3.0 लीटर प्रति मिनट की दर से बहते हुए जल को 27°C से 77°C तक गर्म करता है। यदि गीज़र का परिचालन गैस बर्नर द्वारा किया जाए तो ईंधन के व्यय की क्या दर होगी? बर्नर के ईंधन की दहन-ऊष्मा 4.0×10⁴ J g⁻¹ है।
हल:
जल की प्रवाह दर = 3.0 L/min = 3000 g/min (जल का घनत्व 1 g/cm³ मानकर)
ΔT = 77−27 = 50°C
प्रति मिनट आवश्यक ऊष्मा: Q = m × s × ΔT = 3000 g × 4.186 J g−1°C−1 × 50°C
Q = 3000 × 209.3 = 627900 J/min ≈ 6.279×105 J/min
ईंधन व्यय की दर = Q / (दहन-ऊष्मा प्रति ग्राम) = 6.279×105 / 4.0×104
प्र. 11.2 नाइट्रोजन के ताप में वृद्धि हेतु ऊष्मा
स्थिर दाब पर 2.0×10⁻² kg नाइट्रोजन (कमरे के ताप पर) के ताप में 45°C वृद्धि करने के लिए कितनी ऊष्मा की आपूर्ति की जानी चाहिए? (N₂ का अणुभार = 28; R = 8.3 J mol⁻¹ K⁻¹)
हल:
मोलों की संख्या: μ = द्रव्यमान/अणुभार = 20 g / 28 g/mol = 0.7143 mol
N₂ एक द्विपरमाणुक गैस है, अतः स्थिर दाब पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा: CP = (7/2)R
CP = 3.5 × 8.3 = 29.05 J mol−1K−1
आवश्यक ऊष्मा: Q = μ × CP × ΔT = 0.7143 × 29.05 × 45 ≈ 933.75 J
प्र. 11.3(a) अंतिम ताप औसत (T₁+T₂)/2 क्यों नहीं होता
हल: अंतिम साम्यावस्था का ताप दोनों पिंडों की ऊष्मा धारिताओं (द्रव्यमान × विशिष्ट ऊष्मा) पर निर्भर करता है, केवल तापों के औसत पर नहीं। यदि दोनों पिंडों की ऊष्मा धारिताएँ भिन्न हों, तो अधिक ऊष्मा धारिता वाले पिंड का ताप कम बदलेगा — साधारण औसत केवल तभी प्राप्त होगा जब दोनों की ऊष्मा धारिताएँ बराबर हों।
प्र. 11.3(b) शीतलक की विशिष्ट ऊष्मा अधिक क्यों होनी चाहिए
हल: उच्च विशिष्ट ऊष्मा धारिता वाला द्रव अपने स्वयं के ताप में अपेक्षाकृत कम वृद्धि के साथ ही अधिक मात्रा में ऊष्मा अवशोषित कर सकता है। इस कारण शीतलक बिना स्वयं अत्यधिक गर्म हुए संयंत्र के विभिन्न भागों से बड़ी मात्रा में ऊष्मा प्रभावी ढंग से दूर ले जा सकता है।
प्र. 11.3(c) कार चलाने पर टायरों में वायुदाब क्यों बढ़ता है
हल: कार चलाते समय टायर व सड़क के बीच घर्षण उत्पन्न होता है, जिससे ऊष्मा उत्पन्न होकर टायर के भीतर की वायु का ताप बढ़ जाता है। टायर का आयतन लगभग स्थिर रहता है, अतः आदर्श गैस समीकरण के अनुसार नियत आयतन पर ताप बढ़ने से दाब भी बढ़ जाता है (P∝T)।
प्र. 11.3(d) बंदरगाह शहर की जलवायु रेगिस्तानी शहर से अधिक शीतोष्ण क्यों
हल: बंदरगाह के समीप स्थित बड़े जलाशय (समुद्र) का विशिष्ट ऊष्मा धारिता बहुत अधिक होती है। दिन में समुद्र धीरे-धीरे ऊष्मा अवशोषित करता है तथा रात्रि में यह ऊष्मा धीरे-धीरे मुक्त करता है — इससे तटीय शहर की जलवायु सम/शीतोष्ण रहती है। रेगिस्तानी शहर में मिट्टी/रेत (कम विशिष्ट ऊष्मा) दिन में तेजी से गर्म तथा रात में तेजी से ठंडी होती है।
प्र. 11.4 हाइड्रोजन के रुद्धोष्म संपीडन में दाब वृद्धि
गतिशील पिस्टन लगे किसी सिलिंडर में मानक ताप व दाब पर 3 मोल हाइड्रोजन भरी है। सिलिंडर की दीवारें ऊष्मारोधी पदार्थ की बनी हैं। यदि गैस को उसके आरंभिक आयतन के आधे आयतन तक संपीडित किया जाए तो गैस का दाब कितना बढ़ेगा?
हल:
चूँकि सिलिंडर व पिस्टन दोनों ऊष्मारोधी हैं, यह एक रुद्धोष्म प्रक्रम है।
हाइड्रोजन (द्विपरमाणुक गैस) के लिए γ = 7/5 = 1.4
रुद्धोष्म समीकरण: P₁V₁γ = P₂V₂γ; दिया है V₂ = V₁/2
P₂ = P₁ × 21.4 = 2.639 × P₁
P₁ = 1.013×105 Pa → P₂ = 2.674×105 Pa
प्र. 11.5 दूसरी प्रक्रिया में किया गया नेट कार्य
रुद्धोष्म विधि द्वारा किसी गैस की अवस्था परिवर्तन करते समय उसकी एक साम्यावस्था A से दूसरी साम्यावस्था B तक ले जाने में निकाय पर 22.3 J कार्य किया जाता है। यदि गैस को दूसरी प्रक्रिया द्वारा A से B में लाने में निकाय द्वारा अवशोषित नेट ऊष्मा 9.35 cal है तो बाद के प्रकरण में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य कितना है? (1 cal = 4.19 J)
हल:
प्रथम प्रक्रिया (रुद्धोष्म): ΔQ = 0; निकाय पर कार्य = 22.3 J, अतः ΔW₁ = −22.3 J
ΔU = ΔQ − ΔW = 0 − (−22.3) = 22.3 J
U अवस्था चर है, अतः दूसरी प्रक्रिया के लिए भी ΔU = 22.3 J
दूसरी प्रक्रिया: ΔQ = 9.35 cal = 39.1765 J
39.1765 = 22.3 + ΔW₂ → ΔW₂ = 16.876 J
प्र. 11.6 गैस का मुक्त प्रसार (सिलिंडर A व B)
समान धारिता वाले दो सिलिंडर A तथा B एक-दूसरे से स्टॉपकॉक द्वारा जुड़े हैं। A में मानक ताप व दाब पर गैस भरी है जबकि B पूर्णतः निर्वातित है। स्टॉपकॉक यकायक खोल दी जाती है। (a) अंतिम दाब? (b) आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन? (c) ताप में परिवर्तन? (d) क्या माध्यमिक अवस्थाएँ P-V-T पृष्ठ पर होंगी?
हल: यह मुक्त प्रसार है।
(a) चूँकि ताप अपरिवर्तित रहता है (नीचे दिखाया गया), बॉयल नियम से दाब आधा हो जाएगा: अंतिम दाब = 0.5 atm।
(b) मुक्त प्रसार में W=0 तथा Q=0 → ΔU = 0।
(c) ΔU=0 तथा आदर्श गैस के लिए U केवल T पर निर्भर → ΔT=0।
(d) नहीं — मुक्त प्रसार अनुत्क्रमणीय व असाम्यावस्था प्रक्रम है; माध्यमिक अवस्थाएँ P-V-T पृष्ठ पर निरूपित नहीं हो सकतीं।
प्र. 11.7 हीटर से आंतरिक ऊर्जा वृद्धि की दर
एक हीटर किसी निकाय को 100 W की दर से ऊष्मा प्रदान करता है। यदि निकाय 75 J s⁻¹ की दर से कार्य करता है, तो आंतरिक ऊर्जा की वृद्धि किस दर से होगी?
हल:
dU/dt = dQ/dt − dW/dt = 100 − 75
प्र. 11.8 D→E→F पथ में कुल कार्य
किसी ऊष्मागतिकीय निकाय को मूल अवस्था D से मध्यवर्ती अवस्था E तक एक रेखीय प्रक्रम द्वारा ले जाया गया है [D=(2.0 m³, 600 N/m²), E=(5.0 m³, 300 N/m²)]। एक समदाबी प्रक्रम द्वारा इसके आयतन को E से F तक ले जाकर मूल मान तक कम कर देते हैं [F=(2.0 m³, 300 N/m²)]। गैस द्वारा D से E तथा वहाँ से F तक कुल किए गए कार्य का आकलन कीजिए।
हल:
पथ D→E (रेखीय प्रक्रम): P-V ग्राफ पर D से E तक सीधी रेखा के नीचे का क्षेत्रफल (समलंब) ही कार्य है:
औसत दाब = (600+300)/2 = 450 N/m²; ΔV = 3.0 m³
W(D→E) = 450 × 3.0 = 1350 J
पथ E→F (समदाबी, P=300 N/m² स्थिर): ΔV = −3.0 m³
W(E→F) = 300 × (−3.0) = −900 J
कुल कार्य = 1350 + (−900) = 450 J
🚀 NEET/JEE स्तरीय अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
कार्नो प्रशीतक, चक्रीय प्रक्रम, रुद्धोष्म संबंध आदि पर आधारित 15 उच्च-स्तरीय प्रश्न
1 दो कार्नो इंजनों का श्रेणीक्रम (Cascade) — समान कार्य आउटपुट
दो कार्नो इंजन A व B श्रेणीक्रम में कार्य करते हैं। यदि दोनों इंजनों द्वारा किया गया कार्य बराबर है, तो मध्यवर्ती ताप T ज्ञात कीजिए।
हल: माना A द्वारा T₁ से ली गई ऊष्मा Q₁ है।
WA = Q₁(1−T/T₁); A द्वारा T पर दी गई ऊष्मा Q = Q₁(T/T₁)
WB = Q(1−T₂/T) = Q₁(T/T₁)(1−T₂/T)
WA = WB रखने पर: 1 − T/T₁ = T/T₁ − T₂/T₁ → T₁ + T₂ = 2T
2 कार्नो इंजन (η=1/10) को प्रशीतक के रूप में उपयोग
एक कार्नो इंजन की दक्षता 1/10 है। इसे प्रशीतक के रूप में प्रयोग किया जाए तथा निकाय पर 10 J कार्य किया जाए, तो निम्न ताप भंडार से अवशोषित ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
हल: η = 1/10 ⟹ T₂/T₁ = 9/10
COP = T₂/(T₁−T₂) = (9/10)/(1/10) = 9
Q₂ = COP × W = 9 × 10
3 प्रशीतक: फ्रीज़र ताप −13°C, COP = 5
किसी आदर्श प्रशीतक के हिमकोष्ठ का ताप −13°C है तथा COP 5 है। उस कक्ष का ताप ज्ञात कीजिए जिसे ऊष्मा अस्वीकृत की जाती है।
हल: T₂ = 260K; 5 = 260/(T₁−260) → T₁−260 = 52 → T₁ = 312K
4 ताँबे व जल की कैलोरीमिति
60 g ताँबे के टुकड़े (s=0.1 cal g⁻¹°C⁻¹) को 100°C तक गर्म कर 10°C पर रखे 100 g जल में डाला जाता है। अंतिम ताप ज्ञात कीजिए।
हल: 60×0.1×(100−T) = 100×1×(T−10)
600 − 6T = 100T − 1000 → 1600 = 106T
5 आयताकार P-V चक्र में नेट कार्य
गैस आयताकार चक्र ABCDA (दक्षिणावर्त) से गुजरती है — A(2 m³, 1×10⁵ Pa), B(6 m³, 1×10⁵), C(6 m³, 3×10⁵), D(2 m³, 3×10⁵)। नेट कार्य?
हल: W = ΔP × ΔV = (3×10⁵−1×10⁵) × (6−2) = 2×10⁵ × 4
6 रुद्धोष्म प्रक्रम में P ∝ T³ से γ ज्ञात करना
किसी रुद्धोष्म प्रक्रम में P ∝ T³। γ = ?
हल: T ∝ P(γ−1)/γ तथा T ∝ P1/3 (दिया है)
(γ−1)/γ = 1/3 → 3γ−3 = γ → 2γ = 3
7 समतापीय संपीडन में गैस पर किया गया कार्य
1 मोल आदर्श गैस को 300 K पर समतापीय रूप से V से V/2 तक संपीडित किया जाता है। गैस द्वारा किया गया कार्य? (R=8.31 J/mol K)
हल: W = μRT ln(V₂/V₁) = 1×8.31×300×ln(0.5) = 2493×(−0.693)
8 रुद्धोष्म प्रक्रम में किया गया कार्य
2 मोल एकपरमाणुक गैस (γ=5/3) का ताप रुद्धोष्म प्रसार में 500K से 300K। W? (R=8.31)
हल: W = μR(T₁−T₂)/(γ−1) = 2×8.31×200/(2/3) = 3324×3/2
9 त्रिभुजाकार चक्र में नेट कार्य
त्रिभुजाकार P-V चक्र ABCA (दक्षिणावर्त) — A(1 m³,10 kPa), B(3 m³,10 kPa), C(1 m³,30 kPa)। नेट कार्य?
हल: क्षेत्रफल = ½×आधार×ऊँचाई = ½×2×(30−10)×10³
10 दो कार्नो इंजन श्रेणीक्रम — बराबर दक्षता की शर्त
दो कार्नो इंजन A व B श्रेणीक्रम में कार्य करते हैं। दोनों इंजनों की दक्षता बराबर हो, तो मध्यवर्ती ताप T?
हल: ηA = 1−T/T₁ = ηB = 1−T₂/T
T/T₁ = T₂/T → T² = T₁T₂
11 तीन भिन्न पथों में ΔU की तुलना
गैस को अवस्था A से B तक तीन भिन्न मार्गों से ले जाया जाता है। Q₁,Q₂,Q₃ तथा ΔU₁,ΔU₂,ΔU₃ में संबंध?
हल: U अवस्था चर है — पथ-निरपेक्ष। Q पथ-निर्भर है।
12 6 g हीलियम के लिए अवस्था-समीकरण
6 g हीलियम (M=4 g/mol) के लिए P, V, T के बीच अवस्था-समीकरण लिखिए।
हल: n = 6/4 = 1.5 mol
13 उत्क्रमणीय व अनुत्क्रमणीय प्रक्रम की पहचान
निम्न में से उत्क्रमणीय कौन-सा है? (a) घर्षण सहित फिसलना (b) निर्वात में मुक्त प्रसार (c) अत्यंत धीमी, घर्षण-रहित समतापीय प्रसार (d) विस्फोटक अभिक्रिया
हल: उत्क्रमणीयता के लिए स्थैतिककल्प होना व क्षयकारी प्रभाव-रहित होना आवश्यक।
14 प्रशीतक COP व दक्षता के बीच संबंध
कार्नो इंजन की दक्षता η है। प्रशीतक के रूप में COP ज्ञात कीजिए।
हल: η = 1−T₂/T₁ ⟹ T₂/T₁ = 1−η
COP = (T₂/T₁)/(1−T₂/T₁) = (1−η)/(1−(1−η)) = (1−η)/η
15 मिश्रित गैस निकाय का γ ज्ञात करना
2 मोल हीलियम (γ=5/3) + 2 मोल हाइड्रोजन (γ=7/5) के मिश्रण का γ?
हल: Cv(मिश्रण) = [2×(3/2)R + 2×(5/2)R]/4 = [3R+5R]/4 = 2R
Cp(मिश्रण) = 2R+R = 3R
🏅 NEET में पूछे गए प्रश्न (30 PYQs)
AIPMT/NEET परीक्षाओं (2000–2026) में इस अध्याय से पूछे गए 30 वास्तविक प्रश्न, वर्ष-क्रमानुसार (नवीनतम पहले), पूर्ण हल सहित
1 रुद्धोष्म प्रसार में, 1 मोल एकपरमाणुक गैस (γ=5/3) का ताप 60K से 50K हो जाता है। कार्य ज्ञात कीजिए। (R=8.3 J/mol K) RE-NEET 2026
W = μR(T₁−T₂)/(γ−1) = 1×8.3×10/(2/3) = 83×3/2
2 विद्युत हीटर 100 W की दर से ऊष्मा प्रदान करता है। निकाय 75 J/s कार्य करता है। आंतरिक ऊर्जा वृद्धि की दर? NEET 2026
dU/dt = 100 − 75
3 किसी ऊष्मागतिकीय निकाय की साम्यावस्था को किन राशियों द्वारा वर्णित किया जाता है? (A) दाब (B) कुल ऊष्मा (C) ताप (D) आयतन (E) किया गया कार्य NEET 2024 (Re-Exam)
साम्यावस्था केवल अवस्था चरों द्वारा वर्णित होती है।
4 निम्न में से किस प्रक्रम में निकाय द्वारा न तो ऊष्मा अवशोषित होती है, न ही उत्सर्जित? NEET 2019
रुद्धोष्म प्रक्रम की परिभाषा ही यह है कि ΔQ=0।
5 0°C व 100°C के बीच कार्य करने वाले आदर्श ऊष्मा इंजन (कार्नो) की दक्षता? NEET 2018
T₁=373K, T₂=273K; η = 1−273/373 = 100/373
6 100°C व 1 atm पर 0.1 g जल को भाप में बदलने हेतु 54 cal ऊष्मा; भाप का आयतन 167.1 cc। आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन? NEET 2018
Q = 54×4.2 = 226.8 J; W = 1.013×10⁵×167.1×10⁻⁶ = 16.93 J
ΔU = 226.8 − 16.93
7 कार्नो इंजन की दक्षता 1/10 है। इसे प्रशीतक के रूप में 10 J कार्य पर चलाया जाए तो निम्न ताप से अवशोषित ऊर्जा? NEET 2017
η=1/10 ⟹ T₂/T₁=9/10; COP = 9
Q₂ = 9×10
8 प्रशीतक के भीतर ताप t₂°C है। प्रति जूल विद्युत ऊर्जा खपत पर कक्ष को दी गई ऊष्मा? (कमरा t₁°C) NEET 2016 (Phase 2)
COP = T₂/(T₁−T₂); Q₂ = COP×1
कक्ष को दी कुल ऊष्मा Q₁ = Q₂+1 = T₂/(T₁−T₂)+1
9 1 मोल एकपरमाणुक गैस PV³=नियतांक के प्रक्रम से गुजरती है। ऊष्मा धारिता? NEET 2016 (Phase 2)
पॉलिट्रॉपिक: C = Cv + R/(1−n); n=3, Cv=(3/2)R
C = (3/2)R + R/(−2) = (3/2)R − (1/2)R
10 गैस को आधे आयतन तक कई प्रक्रमों द्वारा संपीडित किया जाता है। किसमें सर्वाधिक कार्य? AIPMT 2015
रुद्धोष्म वक्र, समतापीय वक्र से अधिक तीव्र होता है (γ>1)।
11 प्रशीतक का COP 5 है; फ्रीज़र ताप −20°C। किस ताप पर ऊष्मा अस्वीकृत? AIPMT 2015
T₂=253K; 5 = 253/(T₁−253) → T₁ = 253+50.6
12 निकाय a→c दो पथों adc व abc द्वारा। Uₐ=10 J; dQ₁=50 J, dW₁=20 J (पथ adc); dQ₂=36 J (पथ abc)। पथ abc में कार्य? NEET 2013 (Karnataka)
ΔU(adc) = 50−20 = 30 J → U_c = 40 J
ΔU(abc) = 30 J (पथ-निरपेक्ष)
dW₂ = 36−30
13 दो कार्नो इंजन श्रेणीक्रम में; दोनों की दक्षता बराबर। मध्यवर्ती ताप T? NEET 2013 (Karnataka)
1−T/T₁ = 1−T₂/T → T² = T₁T₂
14 रुद्धोष्म प्रक्रम में P∝T³। Cp/Cv? NEET 2013
(γ−1)/γ = 1/3 → 2γ=3
15 1 g हीलियम (M=4) का ताप T₁ से T₂ तक बढ़ाने हेतु ऊष्मा (नियत आयतन)? NEET 2013
n=1/4; Cv=(3/2)R
Q = (1/4)×(3/2)R×(T₂−T₁)
16 गैस को A से B तक तीन प्रक्रमों द्वारा। Q₁,Q₂,Q₃ व ΔU₁,ΔU₂,ΔU₃ का संबंध? AIPMT 2012 (Mains)
U अवस्था चर → पथ-निरपेक्ष; Q पथ-निर्भर।
17 γ=1.4 वाली द्विपरमाणुक गैस (2 atm) रुद्धोष्म रूप से संपीडित — ताप 27°C→927°C। अंतिम दाब? AIPMT 2011 (Mains)
T₂/T₁ = 4; (γ−1)/γ = 2/7
4 = (P₂/P₁)^(2/7) ⟹ P₂/P₁ = 4^(7/2) = 128
18 1 kg बर्फ 0°C पर पिघलकर 0°C जल। एंट्रॉपी परिवर्तन? (L=80 cal/g) AIPMT 2011 (Prelims)
ΔS = Q/T = (1000×80)/273
19 समतापीय प्रसार में गैस परिवेश के विरुद्ध −150 J कार्य करती है। निष्कर्ष? AIPMT 2011 (Prelims)
ΔU=0 (समतापीय); Q = W = −150 J
20 एकपरमाणुक गैस (P₁,V₁) को रुद्धोष्म रूप से V₁/8 तक संपीडित। अंतिम दाब? (γ=5/3) AIPMT 2010 (Mains)
P₂ = P₁×8^(5/3) = P₁×2⁵ = 32P₁
21 ΔU व ΔW दिया; ΔQ का संबंध? AIPMT 2010 (Prelims)
प्रथम नियम का प्रत्यक्ष कथन।
22 2 kcal ऊष्मा अवशोषित; 500 J कार्य। आंतरिक ऊर्जा परिवर्तन? AIPMT 2009
Q = 2000×4.18 = 8360 J; ΔU = 8360−500
23 बंद चक्रीय प्रक्रम में Q, E, W का संबंध? AIPMT 2008
चक्रीय प्रक्रम: E(=ΔU) = 0; Q = W
24 इंजन की दक्षता 1/6; सिंक ताप 62°C कम → दक्षता दोगुनी। स्रोत ताप? AIPMT 2007
T₂ = 5T₁/6; (5T₁/6−62)/T₁ = 2/3
5T₁−372 = 4T₁
25 कार्नो इंजन (सिंक 300K) की दक्षता 40%; 50% और बढ़ाने हेतु स्रोत ताप वृद्धि? AIPMT 2006
0.4=1−300/T₁ → T₁=500K; नई η=0.6 → T₁′=750K
26 आदर्श गैस की Cp=(7/2)R। Cp/Cv? AIPMT 2006
Cv = Cp−R = (5/2)R
27 कार्नो इंजन 227°C व 127°C के बीच; 6×10⁴ cal अवशोषित। कार्य में परिवर्तित ऊष्मा? AIPMT 2005
η = 1−400/500 = 0.2; W = 0.2×6×10⁴
28 कार्नो इंजन 227°C व 127°C के बीच; 6 kcal अवशोषित। कार्य में परिवर्तित ऊष्मा? AIPMT 2003
η = 0.2; W = 0.2×6
29 कार्नो इंजन की दक्षता 50% (सिंक 500K)। स्रोत वही, दक्षता 60% करने हेतु नया सिंक ताप? AIPMT 2002
0.5=1−500/T₁ → T₁=1000K
0.6 = 1−T₂′/1000 → T₂′=400K
30 दावा: 127°C स्रोत व 27°C सिंक पर इंजन की दक्षता 26% AIPMT 2001
ηmax = 1−300/400 = 0.25 = 25%