उपसहसंयोजन यौगिक
वर्नर के सिद्धांत, नामकरण, समावयवता से लेकर संयोजकता आबंध सिद्धांत, क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत, धातु कार्बोनिलों में आबंधन तथा जैविक व औद्योगिक महत्व तक — पूरे अध्याय की संकल्पनाएँ, सूत्र, त्वरित तथ्य, आरेख और सभी पाठ्यनिहित व अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत हल, एक ही जगह।
5.1 उपसहसंयोजन यौगिकों का वर्नर का सिद्धांत
संक्रमण धातुएँ बड़ी संख्या में संकुल यौगिक बनाती हैं, जिनमें धातु परमाणु अनेक ऋणायनों अथवा उदासीन अणुओं से इलेक्ट्रॉनों का सहसंयोजन कर परिबद्ध रहते हैं — ऐसे यौगिक उपसहसंयोजन यौगिक कहलाते हैं। क्लोरोफिल (मैग्नीशियम), हीमोग्लोबिन (आयरन) तथा विटामिन B₁₂ (कोबाल्ट) इसके जैविक उदाहरण हैं।
सर्वप्रथम स्विस वैज्ञानिक अल्फ्रेड वर्नर (1866–1919) ने उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचनाओं के संबंध में अपने विचार प्रतिपादित किए। कोबाल्ट(III) क्लोराइड–अमोनिया संकुलों के प्रेक्षणों से उन्होंने प्राथमिक व द्वितीयक संयोजकता की धारणा प्रस्तुत की।
| रंग | सूत्र | चालकता संबंध | AgCl (मोल) |
|---|---|---|---|
| पीला | [Co(NH₃)₆]³⁺3Cl⁻ | 1:3 विद्युत अपघट्य | 3 |
| नीललोहित | [CoCl(NH₃)₅]²⁺2Cl⁻ | 1:2 विद्युत अपघट्य | 2 |
| हरा | [CoCl₂(NH₃)₄]⁺Cl⁻ | 1:1 विद्युत अपघट्य | 1 |
| बैंगनी | [CoCl₂(NH₃)₄]⁺Cl⁻ | 1:1 विद्युत अपघट्य | 1 |
2. प्राथमिक संयोजकताएँ आयननीय होती हैं तथा ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं।
3. द्वितीयक संयोजकताएँ अन-आयननीय होती हैं (उदासीन अणुओं/ऋणायनों द्वारा संतुष्ट); यह उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है, किसी धातु के लिए सामान्यतः निश्चित।
4. द्वितीयक संयोजकता से आबंधित समूह विशिष्ट रूप से दिक्स्थान में व्यवस्थित रहते हैं — समन्वय बहुफलक (Coordination polyhedra)।
वर्नर ने यह भी बताया कि संक्रमण तत्वों के समन्वय यौगिकों में सामान्यतः अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय व वर्ग समतली ज्यामितियाँ पाई जाती हैं। [Co(NH₃)₆]³⁺, [CoCl(NH₃)₅]²⁺ तथा [CoCl₂(NH₃)₄]⁺ अष्टफलकीय हैं; [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय; [PtCl₄]²⁻ वर्ग समतली है।
द्वि लवण तथा संकुल में अंतर
द्वि लवण जैसे कार्नैलाइट (KCl·MgCl₂·6H₂O), मोर लवण (FeSO₄·(NH₄)₂SO₄·6H₂O), फिटकरी (KAl(SO₄)₂·12H₂O) जल में पूर्णरूप से साधारण आयनों में वियोजित हो जाते हैं। परंतु K₄[Fe(CN)₆] में उपस्थित [Fe(CN)₆]⁴⁻ संकुल आयन, Fe²⁺ तथा CN⁻ आयनों में वियोजित नहीं होता — यही मूल अंतर है।
- वर्नर ने 1898 में उपसहसंयोजन यौगिकों का सिद्धांत प्रस्तुत किया; 1913 में इस कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
- प्राथमिक संयोजकता = आयननीय (ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट); द्वितीयक संयोजकता = अन-आयननीय (उपसहसंयोजन संख्या के बराबर)।
- [Co(NH₃)₆]³⁺, [CoCl(NH₃)₅]²⁺, [CoCl₂(NH₃)₄]⁺ अष्टफलकीय; [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय; [PtCl₄]²⁻ वर्ग समतली।
- द्वि लवण जल में पूर्णतः वियोजित होते हैं; संकुल यौगिकों के संकुल आयन वियोजित नहीं होते (जैसे K₄[Fe(CN)₆])।
5.2 उपसहसंयोजन यौगिकों से संबंधित पारिभाषिक शब्द
| शब्द | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| उपसहसंयोजन सत्ता | केंद्रीय धातु से निश्चित संख्या में आबंधित आयन/अणु | [CoCl₃(NH₃)₃] |
| केंद्रीय परमाणु/आयन | वह परमाणु/आयन जो निश्चित ज्यामिति में परिबद्ध रहता है | [NiCl₂(H₂O)₄] में Ni²⁺ |
| लिगन्ड | केंद्रीय परमाणु/आयन से परिबद्ध आयन/अणु | Cl⁻, H₂O, NH₃ |
| उपसहसंयोजन संख्या (CN) | धातु से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की संख्या | [PtCl₆]²⁻ में Pt की CN=6 |
| समन्वय मंडल | केंद्रीय परमाणु व उससे जुड़े लिगन्ड | K₄[Fe(CN)₆] में [Fe(CN)₆]⁴⁻ |
| ऑक्सीकरण संख्या | लिगन्डों को हटाने पर केंद्रीय परमाणु पर आवेश | [Cu(CN)₄]³⁻ में Cu(I) |
| होमोलेप्टिक संकुल | धातु केवल एक प्रकार के दाता समूह से जुड़ा | [Co(NH₃)₆]³⁺ |
| हेट्रोलेप्टिक संकुल | धातु एक से अधिक प्रकार के दाता समूहों से जुड़ा | [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺ |
लिगन्ड के प्रकार (दंतुरता के आधार पर)
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| एकदंतुर (unidentate) | एक दाता परमाणु द्वारा परिबद्ध | Cl⁻, H₂O, NH₃ |
| द्विदंतुर (didentate) | दो दाता परमाणुओं द्वारा परिबद्ध | en, C₂O₄²⁻ |
| बहुदंतुर (polydentate) | अनेक दाता परमाणु | N(CH₂CH₂NH₂)₃ |
| षट्दंतुर (hexadentate) | छह दाता परमाणु | EDTA⁴⁻ (2N + 4O) |
| उभयदंती (ambidentate) | दो भिन्न दाता परमाणु, कोई एक भाग लेता है | −NO₂/−ONO, SCN⁻/NCS⁻ |
समन्वय बहुफलक की आकृतियाँ
- उपसहसंयोजन संख्या केवल σ आबंधों की संख्या पर निर्धारित होती है; π आबंध नहीं गिने जाते।
- एकदंतुर, द्विदंतुर, बहुदंतुर व षट्दंतुर — दाता परमाणुओं की संख्या पर वर्गीकरण।
- EDTA⁴⁻ एक महत्वपूर्ण षट्दंतुर लिगन्ड है (2N+4O)।
- कीलेट संकुल एकदंतुर लिगन्ड युक्त संकुलों से अधिक स्थायी होते हैं (कीलेट प्रभाव)।
- उभयदंती लिगन्ड (जैसे −NO₂/−ONO, SCN⁻/NCS⁻) दो भिन्न परमाणुओं में से किसी एक द्वारा संयोजित हो सकते हैं।
5.3 उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण
5.3.1 एककेंद्रकी उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र
(ii) तत्पश्चात लिगन्डों को अंग्रेज़ी वर्णमाला के क्रम में लिखा जाता है (आवेश पर निर्भर नहीं)।
(iii) बहुदंतुर लिगन्ड भी वर्णमाला के क्रम में; संकेताक्षर के प्रथम अक्षर के आधार पर स्थिति।
(iv) संपूर्ण उपसहसंयोजन सत्ता को गुरुकोष्ठक [ ] में लिखते हैं।
(v) समन्वय मंडल में धातु व लिगन्डों के मध्य स्थान नहीं छोड़ा जाता।
(vi) उपसहसंयोजन सत्ता का आवेश गुरुकोष्ठक के बाहर दाईं ओर मूर्धांक में लिखा जाता है।
5.3.2 एककेंद्रकी उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण
(ii) केंद्रीय परमाणु के नाम से पूर्व लिगन्डों के नाम वर्णमाला क्रम में (सूत्र के विपरीत)।
(iii) ऋणावेशित लिगन्डों के नाम के अंत में −o आता है (2004 से −ido, अतः क्लोरो→क्लोरिडो); उदासीन व धनावेशित लिगन्डों के नाम नहीं बदलते — अपवाद: H₂O=एक्वा, NH₃=ऐम्मीन, CO=कार्बोनिल, NO=नाइट्रोसिल।
(iv) एक से अधिक समान लिगन्ड होने पर डाइ, ट्राइ आदि (सरल लिगन्ड) या बिस, ट्रिस, टेट्राकिस (जटिल/संख्यात्मक-पूर्वलग्न वाले लिगन्ड) पूर्व-लगाते हैं।
(v) धातु की ऑक्सीकरण अवस्था रोमन अंकों में कोष्ठक में दर्शाई जाती है।
(vi) धनायनिक संकुल में धातु का सामान्य नाम; ऋणायनिक संकुल में धातु नाम के अंत में −ऐट (ate) अनुलग्न (कुछ धातुओं के लैटिन नाम, जैसे Fe के लिए फेरेट)।
| यौगिक | IUPAC नाम |
|---|---|
| [Cr(NH₃)₃(H₂O)₃]Cl₃ | ट्राइऐम्मीनट्राइएक्वाक्रोमियम(III) क्लोराइड |
| [Co(H₂NCH₂CH₂NH₂)₃]₂(SO₄)₃ | ट्रिस(एथेन-1,2-डाइऐमीन)कोबाल्ट(III) सल्फेट |
| [Ag(NH₃)₂][Ag(CN)₂] | डाइऐम्मीनसिल्वर(I)डाइसायनिडोअर्जेन्टेट(I) |
- सूत्र में लिगन्ड वर्णमाला क्रम में; नाम में भी लिगन्ड वर्णमाला क्रम में।
- 2004 IUPAC: ऋणावेशित लिगन्ड के नाम के अंत में −इडो (−ido); जैसे क्लोरो→क्लोरिडो।
- उदासीन लिगन्डों के विशेष नाम: H₂O=एक्वा, NH₃=ऐम्मीन, CO=कार्बोनिल, NO=नाइट्रोसिल।
- ऋणायनिक संकुल में धातु नाम के अंत में −ऐट; Fe=फेरेट, Cu=क्यूप्रेट।
- बहुदंतुर लिगन्ड कोष्ठक में लिखे जाते हैं; बिस/ट्रिस/टेट्राकिस उपयोग होते हैं।
5.4 उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता
समावयवी ऐसे दो या इससे अधिक यौगिक होते हैं जिनके रासायनिक सूत्र समान होते हैं परंतु परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न होती है।
2. संरचनात्मक समावयवता: (क) बंधनी (ख) उपसहसंयोजन (ग) आयनन (घ) विलायकयोजन
5.4.1 ज्यामितीय समावयवता
यह हेट्रोलेप्टिक संकुलों में पाई जाती है — मुख्यतः 4 व 6 CN वाले संकुलों में। [MX₂L₂] (वर्ग समतल) में दो X लिगन्ड समपक्ष (cis) पास-पास अथवा विपक्ष (trans) एक-दूसरे के विपरीत रहते हैं।
[MX₂L₄] अष्टफलकीय में भी cis/trans संभव है। [Ma₃b₃] (जैसे [Co(NH₃)₃(NO₂)₃]) में फलकीय (fac) तथा रेखांशिक (mer) समावयवी प्राप्त होते हैं।
5.4.2 ध्रुवण समावयवता
ध्रुवण समावयव एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं जिन्हें अध्यारोपित नहीं किया जा सकता — प्रतिबिंब रूप या एनैन्टिओमर। ऐसे अणु/आयन काइरल (chiral) कहलाते हैं।
5.4.3 बंधनी समावयवता
उभयदंती लिगन्ड युक्त संकुलों में — थायोसायनेट NCS⁻, नाइट्रोजन (M−NCS) अथवा सल्फर (M−SCN) से बंध सकता है। [Co(NH₃)₅(NO₂)]Cl₂ — नाइट्राइट ऑक्सीजन द्वारा (M−ONO) लाल, नाइट्रोजन द्वारा (M−NO₂) पीला होता है।
5.4.4 उपसहसंयोजन समावयवता
धनायनिक व ऋणायनिक उपसहसंयोजन सत्ता के मध्य लिगन्डों के अंतरपरिवर्तन से — [Co(NH₃)₆][Cr(CN)₆] व [Cr(NH₃)₆][Co(CN)₆]।
5.4.5 आयनन समावयवता
प्रतिआयन स्वयं लिगन्ड बन सकता है — [Co(NH₃)₅(SO₄)]Br तथा [Co(NH₃)₅Br]SO₄।
5.4.6 विलायकयोजन समावयवता
जल विलायक में हाइड्रेट समावयवता — [Cr(H₂O)₆]Cl₃ (बैंगनी) तथा [Cr(H₂O)₅Cl]Cl₂·H₂O (भूरा-हरा)।
- ज्यामितीय: cis/trans; [Ma₃b₃] में fac/mer।
- चतुष्फलकीय संकुल ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाते।
- ध्रुवण समावयव = अध्यारोपित न हो सकने वाले दर्पण प्रतिबिंब (एनैन्टिओमर)।
- बंधनी समावयवता उभयदंती लिगन्ड (NO₂⁻, SCN⁻) युक्त संकुलों में।
- उपसहसंयोजन: धनायन व ऋणायन के बीच लिगन्ड अंतरपरिवर्तन।
- आयनन: प्रतिआयन स्वयं लिगन्ड बन सकता है।
- विलायकयोजन (हाइड्रेट): विलायक अणु सीधे लिगन्ड या क्रिस्टल जालक में।
5.5 उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन
5.5.1 संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)
इस सिद्धांत के अनुसार, लिगन्डों के प्रभाव में धातु परमाणु/आयन अपने (n−1)d, ns, np अथवा ns, np, nd कक्षकों का उपयोग संकरण के लिए कर सकता है।
| समन्वय संख्या | संकरण | ज्यामिति |
|---|---|---|
| 4 | sp³ | चतुष्फलकीय |
| 4 | dsp² | वर्ग समतली |
| 5 | sp³d | त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी |
| 6 | sp³d² | अष्टफलकीय (बाह्य/उच्च प्रचक्रण) |
| 6 | d²sp³ | अष्टफलकीय (आंतरिक/निम्न प्रचक्रण) |
प्रतिचुंबकीय [Co(NH₃)₆]³⁺ (d⁶) आंतरिक कक्षक (d²sp³); अनुचुंबकीय [CoF₆]³⁻ बाह्य कक्षक (sp³d²)।
5.5.2 VBT की सीमाएँ
(ii) चुंबकीय आँकड़ों की कोई मात्रात्मक व्याख्या नहीं
(iii) दुर्बल/प्रबल लिगन्ड में भेद नहीं
(iv) ऊष्मागतिकीय/गतिक स्थायित्व की व्याख्या नहीं
5.5.3 क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)
CFT एक स्थिर वैद्युत मॉडल है — धातु-लिगन्ड आबंध आयनिक माने जाते हैं। विलगित धातु आयन के पाँचों d-कक्षकों की ऊर्जा समान होती है (अपभ्रष्ट/degenerate), परंतु लिगन्ड क्षेत्र में विपाटन (splitting) होता है।
(क) अष्टफलकीय विपाटन
dx²−y² व dz² (अक्षों पर) → eg (उच्च ऊर्जा); dxy, dyz, dxz (अक्षों के मध्य) → t2g (निम्न ऊर्जा)। ऊर्जा अंतर = Δo।
d⁴ आयनों के लिए — यदि Δo < P (युग्मन ऊर्जा): उच्च प्रचक्रण (t2g³eg¹); यदि Δo > P: निम्न प्रचक्रण (t2g⁴eg⁰)।
(ख) चतुष्फलकीय विपाटन
विपाटन अष्टफलकीय से उलटा व छोटा होता है: Δt = 4/9 Δo — अतः निम्न प्रचक्रण विरले ही देखा जाता है।
5.5.4 उपसहसंयोजन यौगिकों में रंग
रंग d-d संक्रमण के कारण होता है — संकुल का रंग अवशोषित रंग का पूरक रंग होता है। [Ti(H₂O)₆]³⁺ में t2g¹→eg¹ संक्रमण से बैंगनी रंग प्राप्त होता है।
5.5.5 CFT की सीमाएँ
CFT लिगन्ड को बिंदु आवेश मानता है, जो स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी के तथ्यों से असंगत है; यह सहसंयोजक आबंध प्रकृति को नकारता है — इन कमियों को लिगन्ड क्षेत्र सिद्धांत (LFT) व आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT) द्वारा सुधारा गया।
- VBT: d²sp³/dsp²/sp³d²/sp³d/sp³ संकरण; आंतरिक/बाह्य कक्षक संकुल।
- VBT रंग व मात्रात्मक चुंबकीय व्याख्या नहीं देता।
- CFT: स्थिर वैद्युत मॉडल; लिगन्ड बिंदु आवेश।
- अष्टफलकीय: eg(+3/5Δo), t2g(−2/5Δo); Δt=4/9Δo।
- स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: I⁻<Br⁻<Cl⁻<F⁻<H₂O<NH₃<en<CN⁻<CO।
- Δo<P ⟹ उच्च प्रचक्रण; Δo>P ⟹ निम्न प्रचक्रण।
- रंग की उत्पत्ति d-d संक्रमण से।
5.6 धातु कार्बोनिलों में आबंधन
होमोलेप्टिक कार्बोनिल — [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय, [Fe(CO)₅] त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी, [Cr(CO)₆] अष्टफलकीय है।
M−C π आबंध: धातु के पूरित d कक्षकों से इलेक्ट्रॉन CO के रिक्त π* कक्षक में दान
- [Ni(CO)₄] चतुष्फलकीय, [Fe(CO)₅] त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी, [Cr(CO)₆] अष्टफलकीय।
- [Mn₂(CO)₁₀]: दो Mn(CO)₅ इकाइयाँ Mn−Mn आबंध से जुड़ी।
- M−C में σ (C→M) व π (M→CO) दोनों — सहक्रियाशीलता।
- सहक्रियाशीलता आबंधन M−CO आबंध को मज़बूत बनाता है।
5.7 उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व तथा अनुप्रयोग
- विश्लेषणात्मक रसायन: EDTA, DMG, α-नाइट्रोसो-β-नेफ्थॉल; जल की कठोरता का आकलन Na₂EDTA अनुमापन द्वारा।
- धातुकर्म: सिल्वर/गोल्ड निष्कर्षण — [Au(CN)₂]⁻; मॉण्ड प्रक्रम — [Ni(CO)₄]।
- जैव तंत्र: क्लोरोफिल (Mg), हीमोग्लोबिन (Fe), विटामिन B₁₂ (Co), कार्बोक्सीपेप्टिडेज-A (Zn)।
- औद्योगिक उत्प्रेरक: विल्किन्सन उत्प्रेरक [(Ph₃P)₃RhCl] — एल्कीनों का हाइड्रोजनीकरण।
- वैद्युतलेपन: [Ag(CN)₂]⁻ व [Au(CN)₂]⁻ से एकसार लेपन।
- फ़ोटोग्राफी: [Ag(S₂O₃)₂]³⁻ — हाइपो विलयन द्वारा स्थायीकरण।
- औषध रसायन: D-पेनिसिलऐमीन, डेसफेरीऑक्सिम B, EDTA (लेड विषाक्तता), cis-प्लेटिन (कैंसर-रोधी)।
★ संपूर्ण अध्याय — एक-पंक्ति तथ्य सूची
- वर्नर सिद्धांत (1898): प्राथमिक (आयननीय) व द्वितीयक (अन-आयननीय, CN के बराबर) संयोजकता।
- द्वि लवण जल में पूर्णतः वियोजित; संकुल आयन (जैसे [Fe(CN)₆]⁴⁻) वियोजित नहीं होता।
- उपसहसंयोजन संख्या = केंद्रीय परमाणु से जुड़े σ-दाता परमाणुओं की संख्या।
- एकदंतुर/द्विदंतुर/बहुदंतुर/षट्दंतुर — दाता परमाणुओं की संख्या पर आधारित।
- उभयदंती लिगन्ड: दो भिन्न दाता परमाणु (NO₂⁻, SCN⁻)।
- कीलेट संकुल एकदंतुर लिगन्ड संकुलों से अधिक स्थायी (कीलेट प्रभाव)।
- सूत्र में लिगन्ड वर्णमाला क्रम; नाम में भी लिगन्ड नाम वर्णमाला क्रम।
- ऋणावेशित लिगन्ड नाम अंत में −इडो (2004 IUPAC); एक्वा, ऐम्मीन, कार्बोनिल, नाइट्रोसिल।
- ऋणायनिक संकुल में धातु नाम अंत में −ऐट (Fe=फेरेट, Cu=क्यूप्रेट)।
- त्रिविम: ज्यामितीय (cis/trans, fac/mer) व ध्रुवण (d/l, एनैन्टिओमर)।
- संरचनात्मक: बंधनी, उपसहसंयोजन, आयनन, विलायकयोजन (हाइड्रेट)।
- चतुष्फलकीय संकुल कभी ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाते।
- [MX₂L₄] अष्टफलकीय व [MX₂L₂] वर्ग समतल में cis/trans संभव।
- [Ma₃b₃] अष्टफलकीय में fac/mer।
- बंधनी समावयवता उभयदंती लिगन्ड (NO₂⁻/ONO⁻, SCN⁻/NCS⁻) युक्त संकुलों में।
- VBT: d²sp³/dsp²/sp³d²/sp³d/sp³ संकरण; d²sp³=आंतरिक (निम्न प्रचक्रण), sp³d²=बाह्य (उच्च प्रचक्रण)।
- VBT रंग व मात्रात्मक व्याख्या नहीं देता।
- CFT: अष्टफलकीय eg(+3/5Δo), t2g(−2/5Δo); Δt=4/9Δo।
- स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: I⁻<Br⁻<Cl⁻<F⁻<H₂O<NH₃<en<CN⁻<CO।
- रंग d-d संक्रमण से; लिगन्ड न हो तो रंगहीन।
- धातु कार्बोनिल में M−C σ (C→M) व π (M→CO) — सहक्रियाशीलता।
- क्लोरोफिल=Mg, हीमोग्लोबिन=Fe, विटामिन B₁₂=Co।
- cis-प्लेटिन कैंसर-रोधी; EDTA लेड विषाक्तता उपचार में।
★ महत्वपूर्ण राशियाँ, सूत्र व तुलना तालिका
| संकरण | ज्यामिति | उदाहरण |
|---|---|---|
| sp³ | चतुष्फलकीय | [Ni(CO)₄], [NiCl₄]²⁻ |
| dsp² | वर्ग समतली | [Ni(CN)₄]²⁻, [PtCl₄]²⁻ |
| sp³d | त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी | [Fe(CO)₅] |
| sp³d² | अष्टफलकीय (बाह्य) | [CoF₆]³⁻ |
| d²sp³ | अष्टफलकीय (आंतरिक) | [Co(NH₃)₆]³⁺ |
| राशि | सूत्र/मान |
|---|---|
| अष्टफलकीय eg ऊर्जा वृद्धि | (3/5)Δo |
| अष्टफलकीय t2g ऊर्जा कमी | (2/5)Δo |
| चतुष्फलकीय व अष्टफलकीय संबंध | Δt = (4/9)Δo |
| चुंबकीय आघूर्ण | μ = √{n(n+2)} BM |
| प्रबल क्षेत्र | Δo > P ⟹ निम्न प्रचक्रण |
| दुर्बल क्षेत्र | Δo < P ⟹ उच्च प्रचक्रण |
चुंबकीय आघूर्ण संदर्भ सारणी
| अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (n) | μ (BM) = √n(n+2) |
|---|---|
| 0 | 0 (प्रतिचुंबकीय) |
| 1 | 1.73 |
| 2 | 2.83 |
| 3 | 3.87 |
| 4 | 4.90 |
| 5 | 5.92 |
उदासीन लिगन्ड = 0; एकल ऋणायनी (Cl⁻, CN⁻) = −1; द्विऋणायनी (C₂O₄²⁻) = −2
पाठ्यनिहित प्रश्न (5.1 – 5.10) — विस्तृत हल
प्रत्येक प्रश्न पर क्लिक करके हल देखें।
5.1 निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखिए — (i) टेट्राऐम्मीनडाइएक्वाकोबाल्ट(III)क्लोराइड (ii) पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकैलेट(II) (iii) ट्रिस(एथेन-1,2-डाइऐमीन)क्रोमियम(III)क्लोराइड (iv) ऐम्मीनब्रोमिडोक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-प्लैटिनेट(II) (v) डाइक्लोरोबिस(एथेन-1,2-डाइऐमीन)प्लैटिनम(IV)नाइट्रेट (vi) आयरन(III)हेक्सासायनिडोफेरेट(II)
5.2 निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए — (i)–(vi)
5.3 निम्नलिखित संकुलों द्वारा प्रदर्शित समावयवता का प्रकार बतलाइए — (i)–(iv)
5.4 [Co(NH₃)₅Cl]SO₄ तथा [Co(NH₃)₅(SO₄)]Cl आयनन समावयव हैं — इसका प्रमाण दीजिए।
5.5 VBT के आधार पर [Ni(CN)₄]²⁻ प्रतिचुंबकीय व [NiCl₄]²⁻ अनुचुंबकीय क्यों है?
5.6 [NiCl₄]²⁻ अनुचुंबकीय जबकि [Ni(CO)₄] प्रतिचुंबकीय — दोनों चतुष्फलकीय क्यों?
5.7 [Fe(H₂O)₆]³⁺ प्रबल अनुचुंबकीय, [Fe(CN)₆]³⁻ दुर्बल अनुचुंबकीय — समझाइए।
5.8 [Co(NH₃)₆]³⁺ आंतरिक कक्षक, [Ni(NH₃)₆]²⁺ बाह्य कक्षक — क्यों?
5.9 वर्ग समतली [Pt(CN)₄]²⁻ में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या?
5.10 [Mn(H₂O)₆]²⁺ में 5 अयुग्मित, [Mn(CN)₆]⁴⁻ में 1 अयुग्मित — CFT से समझाइए।
अध्याय अभ्यास (5.1 – 5.32) — विस्तृत हल
NCERT पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल — प्रश्न पर क्लिक करके देखें।
5.1 वर्नर की अभिधारणाओं के आधार पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन को समझाइए।
5.2 FeSO₄ तथा (NH₄)₂SO₄ का 1:1 मोलर मिश्रण Fe²⁺ परीक्षण देता है, परंतु CuSO₄ व अमोनिया का 1:4 मिश्रण Cu²⁺ परीक्षण नहीं देता — क्यों?
5.28 संकुल [Co(NH₃)₆]Cl₂ से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे?
5.30 K[Co(CO)₄] में कोबाल्ट की ऑक्सीकरण संख्या है — (i) +1 (ii) +3 (iii) –1 (iv) –3
5.31 निम्न में सर्वाधिक स्थायी संकुल है — (i) [Fe(H₂O)₆]³⁺ (ii) [Fe(NH₃)₆]³⁺ (iii) [Fe(C₂O₄)₃]³⁻ (iv) [FeCl₆]³⁻
5.32 [Ni(NO₂)₆]⁴⁻, [Ni(NH₃)₆]²⁺, [Ni(H₂O)₆]²⁺ के लिए अवशोषण तरंगदैर्ध्य का सही क्रम बताइए।
🎯 NEET में अब तक आए प्रश्न (उपसहसंयोजन यौगिक)
NEET/AIPMT में इस अध्याय से पूछे गए प्रश्न, हल सहित।
2026 · Q1 सूची-I (संकुल) को सूची-II (आकृति) से सुमेलित कीजिए: [Pt(Cl₂)(NH₃)₂], [Co(NH₃)₆]Cl₃, [NiCl₄]²⁻, [Fe(CO)₅]
2026 · Q2 कौन सा उभयदंतुर लिगन्ड है?
NEET 2025 · Q1 न्यूनतम चालकता वाला संकुल पहचानिए:
NEET 2024 · Q1 कथन-I: [Co(NH₃)₆]³⁺ समलिगन्डी, [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺ विषमलिगन्डी। कथन-II: [Co(NH₃)₆]³⁺ में एक प्रकार का लिगन्ड, [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺ में एक से अधिक प्रकार।
NEET 2024 · Q2 [CoF₆]³⁻ तथा [Co(C₂O₄)₃]³⁻ के 'केवल-चक्रण' चुंबकीय आघूर्ण क्रमशः हैं:
NEET 2024 · Q3 EDTA आयन है:
NEET 2023 · Q1 समलिगन्डी संकुल पहचानिए:
NEET 2022 (Phase 2) · Q1 अभिकथन-तर्क: धातु कार्बोनिलों में M−C बंध में σ व π दोनों लक्षण।
NEET 2018 · Q1 [Ni(CO)₄] की आकृति व चुंबकीय व्यवहार:
NEET 2017 · Q1 σ-बंधित ऑर्गेनोमेटैलिक यौगिक का उदाहरण:
NEET 2016 (Phase 2) · Q1 जॉन-टेलर प्रभाव किस d⁸ संकुल में प्रेक्षित नहीं होता?
NEET सम्बंधित तथ्य Anya तथ्य
प्रश्न-पैटर्न, भार-विभाजन व बार-बार दोहराई जाने वाली अवधारणाएँ।
- 2014–2025 में इस अध्याय से 41 प्रश्न पूछे गए; NEET 2024 में 9 प्रश्न तक शामिल थे।
- प्रश्न मुख्यतः IUPAC नामकरण, समावयवता, CFT (चुंबकीय आघूर्ण, CFSE, संकरण) पर केंद्रित।
- चुंबकीय आघूर्ण: μ=√n(n+2) BM — n=1⇒1.73, n=2⇒2.83, n=3⇒3.87, n=4⇒4.90, n=5⇒5.92।
- स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी: I⁻<Br⁻<Cl⁻<F⁻<H₂O<NH₃<en<CN⁻<CO।
- प्रबल क्षेत्र → निम्न चक्रण (प्रायः प्रतिचुंबकीय); दुर्बल क्षेत्र → उच्च चक्रण (प्रायः अनुचुंबकीय)।
- समलिगन्डी (एक प्रकार का लिगन्ड) बनाम विषमलिगन्डी (एक से अधिक प्रकार)।
- कीलेट प्रभाव — बहुदंतुर लिगन्ड वाले संकुल अधिक स्थायी।
- CFSE — d⁰, d⁵(उच्च-चक्रण), d¹⁰ के लिए शून्य।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
- EAN नियम (सिजविक) — EAN = Z − ऑक्सीकरण अवस्था + 2×CN; Ni(CO)₄, Fe(CO)₅, Cr(CO)₆ के लिए EAN = अक्रिय गैस परमाणु क्रमांक।
- प्राथमिक संयोजकता (ऑक्सीकरण अवस्था) आयनीकरणीय; द्वितीयक (CN) अन-आयनीकरणीय व दिशात्मक — ज्यामिति सदैव द्वितीयक से।
- ऑक्सीकरण अवस्था व उपसहसंयोजन संख्या भिन्न — [Co(NH₃)₆]³⁺ में Co की OS +3, CN=6।
- VBT की सीमाएँ — रंग, मात्रात्मक चुंबकीय व्याख्या व दुर्बल/प्रबल लिगन्ड भेद नहीं करता।
- IUPAC नामकरण — लिगन्ड वर्णानुक्रम; ऋणायनी संकुल में −ऐट (Fe→फेरेट, Cu→क्यूप्रेट)।
- सेतु-बंधी लिगन्ड के लिए μ (म्यू) उपसर्ग।
- उभयदंती लिगन्ड — NO₂⁻ (N→नाइट्रो, O→नाइट्रिटो), SCN⁻ (S→थायोसायनेटो, N→आइसोथायोसायनेटो)।
- चतुष्फलकीय Δt ≈ 4/9 Δo — अतः चतुष्फलकीय संकुल लगभग सदैव उच्च-चक्रण।
- द्वि लवण (जैसे मोर लवण) जल में पूर्ण वियोजित; उपसहसंयोजन यौगिक (जैसे [Cu(NH₃)₄]SO₄) संकुल आयन बनाए रखते हैं।
- ऑर्गेनोमेटैलिक — फेरोसीन [Fe(η⁵-C₅H₅)₂] सैंडविच यौगिक का उदाहरण।
- अंतिम रिवीज़न में इन तीन क्षेत्रों को प्राथमिकता दें — (1) IUPAC नामकरण, (2) समावयवता के प्रकार, (3) CFT आधारित चुंबकीय आघूर्ण व CFSE।