तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय
न्यूरॉन की सूक्ष्म संरचना से लेकर तंत्रिका आवेग की उत्पत्ति, सिनेप्स से संचरण, और मानव मस्तिष्क के हर भाग की भूमिका तक — तंत्रिका तंत्र की पूरी कार्यप्रणाली का विस्तृत व परीक्षा-केंद्रित विवेचन।
★ NEET फोकस फैक्ट्स सम्मिलित1 समन्वय की आवश्यकता क्यों?
शरीर के अंग अकेले काम नहीं कर सकते
मानव शरीर में अनेक अंग व अंग-तंत्र पाए जाते हैं, जो स्वतंत्र रूप से कार्य करने में असमर्थ होते हैं। जैव स्थिरता (समअवस्था) बनाए रखने के लिए इन अंगों के कार्यों में समन्वय अत्यंत आवश्यक है। समन्वयता एक ऐसी क्रियाविधि है, जिसके द्वारा दो या अधिक अंगों में क्रियाशीलता बढ़ती है तथा एक-दूसरे अंगों के कार्यों में मदद मिलती है।
उदाहरण के लिए, जब हम शारीरिक व्यायाम करते हैं तो पेशियों के संचालन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ जाती है, साथ ही ऑक्सीजन की माँग भी बढ़ जाती है। इसकी पूर्ति के लिए श्वसन दर, हृदय स्पंदन दर व वृक्क वाहिनियों में रक्त प्रवाह की दर बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है। जैसे ही व्यायाम बंद किया जाता है, तंत्रिकीय क्रियाएँ फुफ्फुस, हृदय, रक्त वाहिनियों, वृक्क व अन्य अंगों के कार्यों में पुनः संतुलन स्थापित कर देती हैं। हमारे शरीर में तंत्रिका तंत्र व अंतःस्रावी तंत्र सम्मिलित रूप से इन अंगों की क्रियाओं में समन्वय करते हैं तथा उन्हें एकीकृत करते हैं, जिससे सभी क्रियाएँ एक साथ सुचारु रूप से संचालित होती रहती हैं।
तंत्रिका तंत्र का परिचय
सभी प्राणियों का तंत्रिका तंत्र अति विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं से बनता है, जिन्हें तंत्रिकोशिका (न्यूरॉन) कहते हैं। ये कोशिकाएँ विभिन्न उद्दीपनों को पहचान कर ग्रहण करती हैं तथा इनका संचरण करती हैं।
निम्न अकशेरुकी प्राणियों में तंत्रिकीय संगठन बहुत ही सरल प्रकार का होता है। उदाहरणार्थ हाइड्रा में यह तंत्रिकीय जाल के रूप में होता है। कीटों का तंत्रिका तंत्र इससे कहीं अधिक व्यवस्थित होता है — इसमें मस्तिष्क अनेक गुच्छिकाओं (गैंग्लिया) एवं तंत्रिकीय ऊतकों का बना होता है। कशेरुकी प्राणियों में सबसे अधिक विकसित तंत्रिका तंत्र पाया जाता है।
- हाइड्रा का तंत्रिका तंत्र "तंत्रिकीय जाल" (nerve net) प्रकार का होता है — कोई केंद्रीकरण नहीं होता, यह विकास के इतिहास में सबसे आदिम/सरल तंत्रिका संगठन का उदाहरण है।
- कीटों में गुच्छिकाओं (ganglia) का बना तंत्रिका तंत्र होता है — यह "नर्व नेट" से एक कदम आगे का विकसित रूप है।
2 मानव तंत्रिका तंत्र
केंद्रीय व परिधीय — दो मुख्य विभाजन
मानव का तंत्रिका तंत्र दो भागों में विभाजित होता है — (क) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तथा (ख) परिधीय तंत्रिका तंत्र। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु सम्मिलित हैं, जहाँ सूचनाओं का संसाधन एवं नियंत्रण होता है। मस्तिष्क एवं परिधीय तंत्रिका तंत्र सभी तंत्रिकाओं से मिलकर बनता है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क व मेरुरज्जु) से जुड़ी होती हैं।
| तंत्रिका प्रकार | दिशा | कार्य |
|---|---|---|
| संवेदी (अभिवाही) | ऊतक/अंग → केंद्रीय तंत्रिका तंत्र | उद्दीपनों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचाना |
| चालक (अपवाही) | केंद्रीय तंत्रिका तंत्र → अंग | नियामक उद्दीपनों को संबंधित अंगों तक पहुँचाना |
परिधीय तंत्रिका तंत्र में दो प्रकार की तंत्रिकाएँ होती हैं — (अ) संवेदी या अभिवाही एवं (ब) चालक/प्रेरक या अपवाही। संवेदी या अभिवाही तंत्रिकाएँ उद्दीपनों को ऊतकों/अंगों से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचाती हैं, जबकि चालक/अभिवाही तंत्रिकाएँ नियामक उद्दीपनों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से संबंधित परिधीय ऊतक/अंगों तक पहुँचाती हैं।
कायिक व स्वायत्त तंत्रिका तंत्र
परिधीय तंत्रिका तंत्र दो भागों में विभाजित होता है — कायिक तंत्रिका तंत्र तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र। कायिक तंत्रिका तंत्र उद्दीपनों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से शरीर के ऐच्छिक (नियंत्रणीय) अंगों व कंकाल पेशियों में पहुँचाता है। स्वायत्त तंत्रिका तंत्र पुनः दो भागों — (अ) अनुकंपी तंत्रिका तंत्र व (ब) परानुकंपी तंत्रिका तंत्र — में वर्गीकृत किया गया है, जो शरीर के अनैच्छिक अंगों व चिकनी पेशियों को नियंत्रित करता है।
अंतरंग तंत्रिका तंत्र परिधीय तंत्रिका तंत्र का एक भाग है। इसके अंतर्गत वे सभी तंत्रिकाएँ, तंत्रिका तंतु, गुच्छिकाएँ एवं जालिकाएँ सम्मिलित हैं, जिनके द्वारा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से आवेग, अंतरंगों तक तथा अंतरंगों से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक संचरित होते हैं।
- मानव तंत्रिका तंत्र → केंद्रीय (CNS) [मस्तिष्क + मेरुरज्जु] और परिधीय (PNS) [सभी तंत्रिकाएँ]
- PNS → कायिक (Somatic) [ऐच्छिक, कंकाल पेशियों को नियंत्रित] और स्वायत्त (Autonomic/ANS) [अनैच्छिक]
- ANS → अनुकंपी (Sympathetic) और परानुकंपी (Parasympathetic) — ये दोनों प्रायः एक-दूसरे के विपरीत (antagonistic) कार्य करते हैं, यह concept बार-बार पूछा जाता है।
- PNS में 12 जोड़ी कपालीय तंत्रिकाएँ व 31 जोड़ी मेरु तंत्रिकाएँ होती हैं — यह संख्या NEET का classic direct-fact प्रश्न है।
3 तंत्रिकोशिका (न्यूरॉन) — संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई
तंत्रिका तंत्र की सबसे छोटी कार्यात्मक इकाई
न्यूरॉन एक सूक्ष्मदर्शीय संरचना है जो तीन भागों से मिलकर बनती है — कोशिका काय, द्रुमाक्ष्य (डेंड्राइट) व तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन)। कोशिका काय में कोशिका द्रव्य व प्रारूपिक कोशिकांग तथा एक विशेष दानेदार अंगक निसेल ग्रेन्यूल पाए जाते हैं। छोटे तंतु जो कोशिका काय से प्रवर्धित होकर लगातार विभाजित होते हैं तथा जिनमें निसेल ग्रेन्यूल भी पाए जाते हैं, द्रुमाक्ष्य कहलाते हैं — ये तंतु उद्दीपनों को कोशिका काय की ओर भेजते हैं।
एक तंत्रिकोशिका में एक ही तंत्रिकाक्ष निकलता है। इसका दूरस्थ भाग शाखित होता है और प्रत्येक शाखित भाग का अंतिम छोर एक लड़ीनुमा संरचना — सिनेप्टिक नॉब — बनाता है, जिसमें सिनेप्टी पुटिकाएँ होती हैं। इन पुटिकाओं में रसायन न्यूरोट्रांसमीटर पाए जाते हैं। तंत्रिकाक्ष तंत्रिकीय आवेगों को कोशिका काय से दूर सिनेप्स पर अथवा तांत्रिकीय-पेशी संधि पर पहुँचाते हैं।
| न्यूरॉन प्रकार | संरचनात्मक विशेषता | पाया जाता है |
|---|---|---|
| बहुध्रुवीय (मल्टीपोलर) | एक तंत्रिकाक्ष व दो या अधिक द्रुमाक्ष्य युक्त | प्रमस्तिष्क वल्कुट में |
| द्विध्रुवीय (बाइपोलर) | एक तंत्रिकाक्ष एवं एक द्रुमाक्ष्य | दृष्टि पटल (रेटिना) में |
| एकध्रुवीय (यूनिपोलर) | कोशिका काय से केवल एक ही प्रवर्ध निकलता है | भ्रूणीय अवस्था में मुख्यतः |
तंत्रिकाक्ष दो प्रकार के होते हैं — आच्छदी व आच्छदहीन। आच्छदी तंत्रिका तंतु श्वान कोशिका से ढके रहते हैं, जो तंत्रिकाक्ष के चारों ओर माइलिन आवरण बनाती है। माइलिन आवरणों के बीच अंतराल पाए जाते हैं, जिन्हें रेनवीयर के नोड कहते हैं। आच्छदी तंत्रिका तंतु मेरू व कपाल तंत्रिकाओं में पाए जाते हैं। आच्छदहीन तंत्रिका तंतु भी श्वान कोशिका से घिरे रहते हैं, लेकिन वे एक्सॉन के चारों ओर माइलिन आवरण नहीं बनाते — सामान्यतया ये स्वायत्त तथा कायिक तंत्रिका तंत्र में मिलते हैं।
- माइलिनेटेड (आच्छदी) तंतुओं में आवेग साल्टेटरी संचरण (नोड-टू-नोड कूदते हुए) से गुज़रता है — इसलिए यह अनमाइलिनेटेड की तुलना में कहीं अधिक तेज़ होता है, यह fact सीधे पूछा जाता है।
- रेनवीयर के नोड (नोड्स ऑफ रेनवियर) माइलिन आवरण की अनुपस्थिति वाले अंतराल हैं — इन्हीं पर Na⁺/K⁺ चैनल संकेंद्रित होते हैं।
तंत्रिका आवेगों की उत्पत्ति व संचरण
तंत्रिकोशिकाएँ (न्यूरॉन) उद्दीपनशील कोशिकाएँ हैं, क्योंकि उनकी झिल्ली धुवीय अवस्था में रहती है। विभिन्न प्रकार के आयन पथ (चैनल) तंत्रिका झिल्ली पर पाए जाते हैं, जो विभिन्न आयनों के लिए चयनात्मक पारगम्य होते हैं। जब कोई न्यूरॉन आवेगों का संचरण नहीं कर रहा होता — जैसे कि विराम अवस्था में — तब तंत्रिकाक्ष झिल्ली सोडियम आयनों की तुलना में पोटैशियम आयनों तथा क्लोराइड आयनों के लिए अधिक पारगम्य होती है। इसी प्रकार यह झिल्ली, तंत्रिकाक्ष द्रव्य में उपस्थित ऋण-आवेशित प्रोटिकल में भी अपारगम्य होती है।
धीरे-धीरे तंत्रिकाक्ष के तंत्रिका द्रव्य में K⁺ तथा ऋणात्मक आवेशित प्रोटीन की उच्च सांद्रता तथा Na⁺ की निम्न सांद्रता होती है। इस भिन्नता के कारण सांद्रता प्रवणता बनती है। झिल्ली पर पाई जाने वाली इस आयनिक प्रवणता को सोडियम-पोटैशियम पंप द्वारा नियमित किया जाता है — यह पंप प्रति चक्र 3 Na⁺ को बाहर की ओर तथा 2 K⁺ को कोशिका के भीतर पहुँचाता है।
परिणामस्वरूप तंत्रिकाक्ष झिल्ली की बाहरी सतह धन आवेशित, जबकि आंतरिक सतह ऋण आवेशित हो जाती है — इसलिए यह ध्रुवित हो जाती है। विराम स्थिति में प्लाज़्मा झिल्ली पर इस विभवांतर को विरामकला विभव (रेस्टिंग मेम्ब्रेन पोटेंशियल) कहते हैं।
जब किसी एक स्थान पर ध्रुवित झिल्ली पर आवेग होता है, तब उस स्थल की ओर स्थित झिल्ली Na⁺ के लिए मुक्त पारगमी हो जाती है, जिसके फलस्वरूप Na⁺ तीव्र गति से भीतर जाते हैं और उस सतह पर विपरीत ध्रुवता हो जाती है — यानी झिल्ली की बाहरी सतह ऋणात्मक आवेशित तथा आंतरिक सतह धनात्मक आवेशित हो जाती है। इस विपरीत ध्रुवता को विध्रुवीकरण कहा जाता है। इस स्थल पर झिल्ली की सतह पर विद्युत विभवांतर को क्रियात्मक विभव कहते हैं, जिसे तथ्यात्मक रूप से तंत्रिका आवेग कहा जाता है।
तंत्रिकाक्ष से कुछ आगे की झिल्ली की बाहरी सतह पर धनात्मक आवेश तथा आंतरिक सतह पर ऋणात्मक आवेश होता है। परिणामस्वरूप इस स्थल की ओर झिल्ली की आंतरिक सतह पर आवेग विभव का संचरण होता है, जिससे उस अगले स्थल पर भी आवेग (क्रियात्मक विभव) उत्पन्न होता है। इस तरह तंत्रिकाक्ष की पूरी लंबाई के समांतर यह क्रम बार-बार दोहराया जाता है, और आवेग आगे बढ़ता रहता है।
उद्दीपन द्वारा प्रेरित Na⁺ की बढ़ी हुई पारगम्यता क्षणिक होती है, उसके तुरंत बाद K⁺ की पारगम्यता बढ़ जाती है। कुछ ही क्षणों के भीतर K⁺ झिल्ली के बाहर की ओर परासरित होता है और उद्दीपन के स्थान पर विरामकला विभव पुनः संग्रहित हो जाता है, तथा तंतु आगे के उद्दीपनों के लिए एक बार फिर उत्तरदायी हो जाते हैं।
- विराम अवस्था: झिल्ली K⁺ व Cl⁻ के लिए अधिक पारगम्य, Na⁺ के लिए कम पारगम्य → बाहर धनावेशित, भीतर ऋणावेशित।
- विध्रुवीकरण: Na⁺ चैनल खुलते हैं, Na⁺ तेज़ी से भीतर आते हैं → भीतर धनावेशित, बाहर ऋणावेशित हो जाता है (झिल्ली विध्रुवित)।
- पुनर्ध्रुवीकरण: Na⁺ चैनल बंद होते हैं, K⁺ चैनल खुलते हैं, K⁺ बाहर जाते हैं → झिल्ली फिर विराम अवस्था में लौटती है।
- सोडियम-पोटैशियम पंप का अनुपात 3 Na⁺ बाहर : 2 K⁺ भीतर — यह संख्या सीधे पूछी जाती है, इसे उलटा मत लिखें।
- क्रियात्मक विभव = तंत्रिका आवेग — दोनों शब्द पर्यायवाची हैं, यह concept objective प्रश्न में आता है।
आवेगों का संचरण — सिनेप्स
तंत्रिका आवेगों का एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक संचरण सिनेप्सिस द्वारा होता है। एक सिनेप्स का निर्माण पूर्व सिनैप्टिक न्यूरॉन तथा पश्च सिनेप्टिक न्यूरॉन की झिल्ली द्वारा होता है, जो सिनेप्टिक दरार द्वारा विभक्त हो भी सकती है या नहीं भी। सिनेप्स दो प्रकार के होते हैं — विद्युत सिनेप्स एवं रासायनिक सिनेप्स।
| विशेषता | विद्युत सिनेप्स | रासायनिक सिनेप्स |
|---|---|---|
| झिल्लियों की स्थिति | एक-दूसरे के अत्यंत निकट | सिनेप्टिक दरार द्वारा पृथक |
| संचरण का माध्यम | प्रत्यक्ष विद्युत धारा | न्यूरोट्रांसमीटर रसायन |
| संचरण की गति | अधिक तीव्र | अपेक्षाकृत धीमा |
| मानव तंत्र में प्रचलन | बहुत कम | अधिकांश सिनेप्स इसी प्रकार के |
विद्युत सिनेप्सिस पर, पूर्व और पश्च सिनेप्टिक न्यूरॉन की झिल्लियाँ एक-दूसरे के समीप होती हैं। एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक विद्युत धारा का प्रवाह सिनेप्सिस से होता है। विद्युतीय सिनेप्सिस से आवेग का संचरण, एक तंत्रिकाक्ष से आवेग के संचरण के समान होता है, और यह रासायनिक सिनेप्सिस से संचरण की तुलना में अधिक तीव्र होता है। हमारे तंत्र में विद्युतीय सिनेप्सिस बहुत कम होते हैं।
रासायनिक सिनेप्स पर, पूर्व एवं पश्च सिनेप्टिक न्यूरॉन्स की झिल्लियाँ द्रव से भरे अवकाश द्वारा पृथक होती हैं जिसे सिनेप्टिक दरार कहते हैं। सिनेप्सिस द्वारा आवेगों के संचरण में न्यूरोट्रांसमीटर (तंत्रिका संचारी) कहलाने वाले रसायन सम्मिलित होते हैं। तंत्रिकाक्ष के छोर पर स्थित आश्रय पुटिकाएँ तंत्रिका संचारी अणुओं से भरी होती हैं। जब तक आवेग तंत्रिकाक्ष के छोर तक पहुँचता है, यह सिनेप्टिक पुटिका की गति को झिल्ली की ओर उत्तेजित करता है, जहाँ वे प्लाज़्मा झिल्ली के साथ जुड़कर तंत्रिका संचारी अणुओं को सिनेप्टिक दरार में मुक्त कर देते हैं।
मुक्त किए गए तंत्रिका संचारी अणु पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर स्थित विशिष्ट ग्राहियों से जुड़ जाते हैं। इस जुड़ाव के फलस्वरूप आयन चैनल खुल जाते हैं और उसमें आयनों के आगमन से पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर नया विभव उत्पन्न हो जाता है। उत्पन्न हुआ यह नया विभव उत्तेजक या अवरोधक हो सकता है।
- तंत्रिकाक्ष के छोर पर आवेग पहुँचने से Ca²⁺ आयन प्रवेश करते हैं, जो सिनेप्टिक पुटिकाओं को झिल्ली की ओर गति करने के लिए उत्तेजित करते हैं — यही न्यूरोट्रांसमीटर मुक्ति की शुरुआत है।
- रासायनिक सिनेप्स आवेग को केवल एक दिशा में संचरित करता है (unidirectional), क्योंकि न्यूरोट्रांसमीटर केवल पूर्व सिनेप्टिक झिल्ली से मुक्त होते हैं।
- प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर उदाहरण: एसिटिलकोलिन, डोपामीन, सेरोटोनिन, नॉरएड्रेनलिन — इन्हें अन्य अध्यायों (मानसिक स्वास्थ्य, स्वायत्त तंत्रिका तंत्र) के साथ जोड़कर भी पूछा जा सकता है।
4 केंद्रीय तंत्रिका तंत्र — मानव मस्तिष्क
शरीर का केंद्रीय सूचना-प्रसारण अंग
मस्तिष्क हमारे शरीर का केंद्रीय सूचना प्रसारण अंग है और यह 'आदेश व नियंत्रण तंत्र' की तरह कार्य करता है। यह ऐच्छिक गमन, शरीर के संतुलन, प्रमुख अनैच्छिक अंगों के कार्य (जैसे फेफड़े, हृदय, वृक्क आदि), तापमान नियंत्रण, भूख एवं प्यास, परिवहन, लय, अनेकों अंतःस्रावी ग्रंथियों की क्रियाएँ और मानव व्यवहार का नियंत्रण करता है। यह देखने, सुनने, बोलने की प्रक्रिया, याददाश्त, कुशाग्रता, भावनाओं और विचारों का भी स्थल है।
मानव मस्तिष्क खोपड़ी के द्वारा अच्छी तरह सुरक्षित रहता है। खोपड़ी के भीतर कपालीय मेनिंजेज से घिरा होता है, जिसकी बाहरी परत ड्यूरा मैटर, बहुत पतली मध्य परत एरेक्नॉइड और एक आंतरिक परत पाया मैटर (जो कि मस्तिष्क ऊतकों के संपर्क में होती है) कहलाती है। मस्तिष्क को 3 मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है — (i) अग्र मस्तिष्क, (ii) मध्य मस्तिष्क, और (iii) पश्च मस्तिष्क।
- ड्यूरा मैटर (सबसे बाहरी, मज़बूत) → एरेक्नॉइड मैटर (पतली मध्य परत) → पाया मैटर (सबसे भीतरी, मस्तिष्क ऊतक के सीधे संपर्क में)
- यह क्रम उल्टा-सीधा करके पूछा जाता है — याद रखने का सूत्र: "Do Aliens Poke" (Dura, Arachnoid, Pia)
अग्र मस्तिष्क
अग्र मस्तिष्क सेरीब्रम, थेलेमस और हाइपोथेलेमस का बना होता है। सेरीब्रम (प्रमस्तिष्क) मानव मस्तिष्क का एक बड़ा भाग बनाता है। एक गहरी लंबवत विदर प्रमस्तिष्क को दो भागों, दाएँ व बाएँ प्रमस्तिष्क गोलार्द्धों में विभक्त करती है। ये गोलार्द्ध तंत्रिका तंतुओं की पट्टी कार्पस कैलोसम द्वारा जुड़े होते हैं।
प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध को कोशिकाओं की एक परत आवरित करती है, जिसे प्रमस्तिष्क वल्कुट कहते हैं तथा यह निश्चित गर्तों में बदल जाती है। प्रमस्तिष्क वल्कुट को इसके धूसर रंग के कारण धूसर द्रव्य कहा जाता है — तंत्रिका कोशिका काय सांद्रित होकर इसे यह रंग प्रदान करती है। प्रमस्तिष्क वल्कुट में प्रेरक क्षेत्र, संवेदी भाग और बड़े भाग होते हैं, जो स्पष्टतया न तो प्रेरक क्षेत्र होते हैं न ही संवेदी — ये भाग सहभागी क्षेत्र कहलाते हैं तथा जटिल क्रियाओं जैसे अंतर संवेदी सहभागिता, स्मरण, संपर्क सूत्र आदि के लिए उत्तरदायी होते हैं।
इस पथ के रेशे माइलिन आच्छद से आवरित हैं, जो कि प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध का आंतरिक भाग बनाते हैं। ये इस परत को सफेद अपारदर्शी रूप प्रदान करते हैं, जिसे श्वेत द्रव्य कहते हैं। प्रमस्तिष्क थेलेमस नामक संरचना के चारों ओर लिपटा होता है, जो कि संवेदी और प्रेरक संकेतों का मुख्य संपर्क स्थल है।
थेलेमस के आधार पर स्थित मस्तिष्क का दूसरा मुख्य भाग हाइपोथेलेमस स्थित होता है। हाइपोथेलेमस में कई केंद्र होते हैं, जो शरीर के तापमान, खाने और पीने का नियंत्रण करते हैं। इसमें कई तंत्रिका स्रावी कोशिकाएँ भी होती हैं जो हाइपोथेलेमिक हार्मोन का स्रवण करती हैं। प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध का आंतरिक भाग और अंदरूनी अंगों जैसे एमिगडाला, हिप्पोकैंपस आदि का समूह मिलकर एक जटिल संरचना का निर्माण करता है, जिसे लिंबिकलोब या लिंबिक तंत्र कहते हैं। यह हाइपोथेलेमस के साथ मिलकर लैंगिक व्यवहार, मनोभावनाओं की अभिव्यक्ति (जैसे उत्तेजना, खुशी, गुस्सा और भय) आदि का नियंत्रण करता है।
- धूसर द्रव्य (Grey matter) = तंत्रिका कोशिका काय संकेंद्रित (myelin रहित) | श्वेत द्रव्य (White matter) = माइलिन आच्छद युक्त तंत्रिकाक्ष — यह भेद बार-बार confuse कराया जाता है।
- हाइपोथेलेमस शरीर के तापमान नियमन, भूख-प्यास नियंत्रण व हार्मोन स्रवण (हाइपोथेलेमिक हार्मोन) के लिए ज़िम्मेदार है — यह अंतःस्रावी तंत्र अध्याय से जुड़ा हुआ क्रॉस-टॉपिक बिंदु है।
- लिंबिक तंत्र (एमिगडाला + हिप्पोकैंपस) को "भावनात्मक मस्तिष्क" (emotional brain) भी कहा जाता है — भय, क्रोध, यौन व्यवहार का नियंत्रण।
- कार्पस कैलोसम दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्द्धों को जोड़ता है — यह fact सीधे पूछा जाता है।
मध्य मस्तिष्क व पश्च मस्तिष्क
मध्य मस्तिष्क अग्र मस्तिष्क के थेलेमस/हाइपोथेलेमस तथा पश्च मस्तिष्क के पोंस के बीच स्थित होता है। एक नाल — प्रमस्तिष्क तरल नलिका — मध्य मस्तिष्क से गुज़रती है। मध्य मस्तिष्क का ऊपरी भाग चार लोबनुमा उभारों का बना होता है, जिन्हें कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमीन कहते हैं।
पश्च मस्तिष्क पोंस, अनुमस्तिष्क और मध्यांश (मेड्यूला ओबलोंगेटा) का बना होता है। पोंस रेशेनुमा पथ का बना होता है जो कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ते हैं। अनुमस्तिष्क की सतह विलगित होती है जो न्यूरोंस को अतिरिक्त स्थान प्रदान करती है — इसी कारण इसका पृष्ठीय क्षेत्रफल प्रमस्तिष्क की तुलना में भी अधिक जटिल रूप से मुड़ा होता है। मस्तिष्क का मध्यांश मेरुरज्जु से जुड़ा होता है। मध्यांश में श्वसन, हृदय परिसंचारी प्रतिवर्तन और पाचक रसों के स्राव के नियंत्रण केंद्र होते हैं।
मध्य मस्तिष्क, पोंस और मेडुला ओबलोंगेटा मस्तिष्क स्तंभ (ब्रेन स्टेम) के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं। मस्तिष्क स्तंभ, मस्तिष्क और मेरु रज्जु के बीच संयोजन स्थापित करता है।
- अनुमस्तिष्क (सेरिबेलम) कर्ण की अर्द्धचंद्राकार नलिकाओं (semicircular canals) तथा श्रवण तंत्र से प्राप्त सूचनाओं को एकीकृत करता है — यह शारीरिक संतुलन व मुद्रा नियंत्रण का केंद्र है, यह fact बहुत बार पूछा जाता है।
- मेडुला ओब्लोंगेटा = श्वसन, हृदय दर व जठर रस स्राव का नियंत्रण केंद्र — इसे अक्सर "जीवन का केंद्र" (vital centre) भी कहा जाता है।
- मध्य मस्तिष्क का कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमीन दृष्टि व श्रवण से जुड़े प्रतिवर्ती क्रियाओं के एकीकरण में सहायक है।
- मस्तिष्क स्तंभ (brain stem) = मध्य मस्तिष्क + पोंस + मेडुला — यह श्वसन व हृदय जैसी जीवन-रक्षक क्रियाओं का नियंत्रण करता है, इसे "मास्टर क्लॉक" प्रश्न में गलत तरीके से जोड़ा जा सकता है।
★ NEET फैक्ट-शीट — एक नज़र में
परीक्षा से ठीक पहले रिवीज़न के लिए संकलित प्रमुख तथ्य
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| तंत्रिका तंत्र की क्रियात्मक इकाई | न्यूरॉन (तंत्रिकोशिका) |
| न्यूरॉन के 3 भाग | कोशिका काय, द्रुमाक्ष्य, तंत्रिकाक्ष |
| विरामकला विभव | बाहर धनावेशित, भीतर ऋणावेशित (~ −70 mV) |
| Na⁺-K⁺ पंप अनुपात | 3 Na⁺ बाहर : 2 K⁺ भीतर |
| क्रियात्मक विभव का अन्य नाम | तंत्रिका आवेग |
| संकुचन/संचरण ट्रिगर करने वाला आयन सिनेप्स पर | Ca²⁺ |
| सिनेप्स के प्रकार | विद्युत सिनेप्स (तेज़, दुर्लभ) व रासायनिक सिनेप्स (धीमा, सामान्य) |
| मेनिंजेज की 3 परतें (बाहर से भीतर) | ड्यूरा मैटर → एरेक्नॉइड → पाया मैटर |
| मस्तिष्क के 3 प्रमुख भाग | अग्र, मध्य व पश्च मस्तिष्क |
| अग्र मस्तिष्क के घटक | सेरीब्रम, थेलेमस, हाइपोथेलेमस |
| दोनों गोलार्द्धों को जोड़ने वाली संरचना | कार्पस कैलोसम |
| धूसर द्रव्य / श्वेत द्रव्य | कोशिका काय संकेंद्रित / माइलिन आच्छदित तंतु |
| तापमान, भूख-प्यास नियंत्रण केंद्र | हाइपोथेलेमस |
| भावनाओं (क्रोध, भय, यौन व्यवहार) का केंद्र | लिंबिक तंत्र |
| पश्च मस्तिष्क के घटक | पोंस, अनुमस्तिष्क, मेडुला ओब्लोंगेटा |
| शारीरिक संतुलन का केंद्र | अनुमस्तिष्क (सेरिबेलम) |
| श्वसन, हृदय-दर, जठर रस नियंत्रण केंद्र | मेडुला ओब्लोंगेटा |
| मस्तिष्क स्तंभ के भाग | मध्य मस्तिष्क + पोंस + मेडुला |
| कपालीय / मेरु तंत्रिकाओं की संख्या | 12 जोड़ी / 31 जोड़ी |
📝 NEET/AIPMT में पूछे जा चुके प्रश्न
इस अध्याय से NEET/AIPMT में अब तक पूछे गए वास्तविक प्रश्न (2000 से 2026 तक), वर्ष के संदर्भ व विकल्पों सहित — हर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें
1AIPMT 2000 तंत्रिका संचरण के दौरान तंत्रिकाक्ष झिल्ली (एक्सोलेमा) का विध्रुवीकरण किसके कारण होता है?
उत्तर: (ब) Na⁺ आयनों का झिल्ली के भीतर की ओर तीव्र प्रवाह।
उद्दीपन मिलने पर झिल्ली की Na⁺ के प्रति पारगम्यता अचानक बढ़ जाती है, जिससे Na⁺ आयन कोशिका के भीतर तेज़ी से प्रवेश करते हैं और झिल्ली की ध्रुवता उलट जाती है — यही विध्रुवीकरण है, जो क्रियात्मक विभव (तंत्रिका आवेग) का आधार बनता है।
2AIPMT 2002 तंत्रिका के रेनवीयर के नोड (Node of Ranvier) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
उत्तर: (ब) यह दो आसन्न श्वान कोशिकाओं के बीच का अनावृत (माइलिन-रहित) स्थान है।
रेनवीयर के नोड केवल आच्छादित (माइलिनेटेड) तंत्रिकाक्षों में पाए जाते हैं, जहाँ माइलिन आवरण नियमित अंतराल पर टूटा रहता है — यही वह स्थान है जहाँ आयन-चैनल सघनता से मौजूद होते हैं, जिससे साल्टेटरी (कूदते हुए) संचरण संभव होता है और आवेग तेज़ी से आगे बढ़ता है।
3AIPMT 2003 तंत्रिका कोशिका में जिसे पहले निसेल कणिकाएँ (Nissl's granules) कहा जाता था, अब उन्हें किस रूप में पहचाना जाता है?
उत्तर: (ब) खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum)।
निसेल कणिकाएँ वास्तव में RER के समूह हैं, जो न्यूरॉन के कोशिका काय में स्थित होती हैं और प्रचुर मात्रा में प्रोटीन-संश्लेषण के लिए उत्तरदायी हैं — न्यूरॉन को उसकी लंबी प्रक्रियाओं (द्रुमाक्ष्य, तंत्रिकाक्ष) के रखरखाव हेतु निरंतर प्रोटीन-आपूर्ति चाहिए, इसीलिए यहाँ RER प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
4AIPMT 2004 तंत्रिका झिल्ली की विरामावस्था में, यदि सांद्रता प्रवणता के अनुसार मुक्त विसरण होने दिया जाए, तो वह किस दिशा में प्रवाह उत्पन्न करेगा?
उत्तर: (ब) K⁺ का कोशिका के भीतर से बाहर की ओर प्रवाह।
विरामावस्था में कोशिका के भीतर K⁺ की सांद्रता बाहर की तुलना में अधिक होती है, इसलिए यदि केवल सांद्रता प्रवणता के अनुसार मुक्त विसरण होने दिया जाए, तो K⁺ अपनी उच्च सांद्रता (भीतर) से निम्न सांद्रता (बाहर) की ओर स्वाभाविक रूप से बाहर निकलेगा — यही विरामकला विभव बनाए रखने का मूल आधार भी है।
5AIPMT 2005 पार्किंसन रोग (कंपन व अंगों की प्रगतिशील जकड़न से पहचाना जाने वाला) मस्तिष्क के किन न्यूरॉनों के क्षरण से होता है, जो गति-नियंत्रण में शामिल हैं तथा किस न्यूरोट्रांसमीटर का उपयोग करते हैं?
उत्तर: (ब) डोपामिन (Dopamine)।
पार्किंसन रोग में मस्तिष्क के उन न्यूरॉनों का क्षरण होता है जो डोपामिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर का उपयोग कर स्वैच्छिक गति-नियंत्रण में भाग लेते हैं — डोपामिन की कमी के कारण ही कंपन (ट्रेमर) व मांसपेशियों की जकड़न जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
6AIPMT 2005 निम्नलिखित में से कौन-सा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (autonomous nervous system) की क्रिया का उदाहरण है?
उत्तर: (ब) हृदय स्पंदन दर का नियमन।
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम) आंतरिक अंगों — जैसे हृदय, फेफड़े, आहार नाल — की अनैच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है, जिन पर हमारा सचेत/ऐच्छिक नियंत्रण नहीं होता। इसके विपरीत हाथ-पैर की गति व पलक झपकना — ये सभी कायिक (सोमैटिक) तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित ऐच्छिक क्रियाएँ हैं।
7AIPMT 2006 निम्नलिखित में से कौन-सा पदार्थ न्यूरोट्रांसमीटर के रूप में कार्य नहीं करता?
उत्तर: (स) हीमोग्लोबिन।
हीमोग्लोबिन लाल रुधिर कणिकाओं में पाया जाने वाला एक श्वसन-रंजक प्रोटीन है, जो ऑक्सीजन परिवहन का कार्य करता है — इसका सिनेप्टिक संचरण से कोई संबंध नहीं है। एसीटिलकोलिन, डोपामिन व नॉरएड्रीनलिन — ये तीनों वास्तविक व सुपरिचित न्यूरोट्रांसमीटर हैं।
8AIPMT 2007 तंत्रिका आवेग के संचरण के दौरान, प्लाज़्मा झिल्ली की भीतरी सतह पर विद्युत आवेश में किस प्रकार का परिवर्तन होता है?
उत्तर: (अ) ऋणात्मक से धनात्मक।
विरामावस्था में झिल्ली की भीतरी सतह ऋणावेशित रहती है। जब उद्दीपन के कारण Na⁺ तेज़ी से भीतर प्रवेश करता है, तो भीतरी सतह अस्थायी रूप से धनावेशित हो जाती है — यही विध्रुवीकरण है, जो क्रियात्मक विभव (नर्व इम्पल्स) का आधार है।
9AIPMT 2008 तंत्रिका आवेग के संचरण के दौरान, क्रियात्मक विभव (action potential) मुख्यतः किस आयन की गति के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है?
उत्तर: (ब) Na⁺ का कोशिका के भीतर की ओर तीव्र प्रवाह।
उद्दीपन मिलने पर वोल्टेज-गेटेड Na⁺ चैनल खुल जाते हैं, जिससे Na⁺ आयन तेज़ी से कोशिका के भीतर प्रवेश करते हैं और झिल्ली विध्रुवित हो जाती है — यही क्रियात्मक विभव (एक्शन पोटेंशियल) की उत्पत्ति का मूल कारण है।
10AIPMT 2009 मनुष्यों में अल्जाइमर रोग (Alzheimer's disease) किस पदार्थ की कमी से संबंधित है?
उत्तर: (ब) एसीटिलकोलिन (Acetylcholine)।
अल्जाइमर रोग में मस्तिष्क में एसीटिलकोलिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर बनाने वाले न्यूरॉनों का क्षरण होता है, जिससे स्मृति (याददाश्त) व संज्ञानात्मक क्षमताओं में क्रमिक गिरावट आती है — यह पार्किंसन रोग (डोपामिन-संबंधी) से अलग है, जिसे अक्सर भ्रामक विकल्प के रूप में दिया जाता है।
11AIPMT 2010 शरीर के तापमान तथा खाने की इच्छा (भूख) को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका केंद्र मस्तिष्क के किस भाग में स्थित हैं?
उत्तर: (ब) हाइपोथेलेमस।
हाइपोथेलेमस में शरीर के तापमान, भूख व प्यास को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट केंद्र मौजूद होते हैं — यह अंतःस्रावी व तंत्रिका, दोनों तंत्रों को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण नियामक केंद्र भी है, जो हाइपोथेलेमिक हार्मोन भी स्रावित करता है।
12AIPMT 2011 जब कोई न्यूरॉन विरामावस्था में हो, यानी कोई आवेग संचरित नहीं कर रहा हो, तो उसकी तंत्रिकाक्ष झिल्ली किस अवस्था में होती है?
उत्तर: (ब) ध्रुवीकृत (Polarised)।
विरामावस्था में सोडियम-पोटैशियम पंप के कारण झिल्ली की बाहरी सतह धनावेशित तथा भीतरी सतह ऋणावेशित बनी रहती है — यही ध्रुवीकृत अवस्था (विरामकला विभव) है, जो आवेग आने तक बनी रहती है।
13AIPMT 2012 मानव पश्च मस्तिष्क (hind brain) तीन भागों से मिलकर बना है, इनमें से एक भाग कौन-सा है?
उत्तर: (स) अनुमस्तिष्क (Cerebellum)।
पश्च मस्तिष्क तीन भागों — पोंस, अनुमस्तिष्क तथा मेडुला ऑब्लांगेटा — से मिलकर बना है। थेलेमस, हाइपोथेलेमस व कॉर्पस कैलोसम — ये सभी वास्तव में अग्र मस्तिष्क के भाग हैं, पश्च मस्तिष्क के नहीं — यह अंतर अक्सर भ्रामक विकल्प के रूप में दिया जाता है।
14NEET 2013 मानव कोशिका के भीतर सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला धनायन (intracellular cation) कौन-सा है?
उत्तर: (ब) K⁺ (पोटैशियम आयन)।
कोशिका के भीतर K⁺ की सांद्रता बाहरी वातावरण की तुलना में कहीं अधिक होती है, जबकि Na⁺ की सांद्रता बाहर अधिक होती है — यह असमान वितरण ही तंत्रिका कोशिका की विरामकला विभव व क्रियात्मक विभव, दोनों का आधार है।
15AIPMT 2014 मस्तिष्क के हाइपोथेलेमस भाग में चोट लगने से सर्वाधिक संभावना किस क्रिया के बाधित होने की है?
उत्तर: (ब) शरीर का तापमान-नियमन (थर्मोरेगुलेशन)।
हाइपोथेलेमस शरीर के आंतरिक तापमान को स्थिर बनाए रखने वाला मुख्य नियामक केंद्र है, साथ ही भूख-प्यास व कई हार्मोनों के स्रवण को भी नियंत्रित करता है — इसमें चोट लगने पर सबसे पहले व सबसे स्पष्ट रूप से तापमान-नियमन प्रभावित होता है।
16AIPMT 2015 मेरुरज्जु की अग्र-शृंगी कोशिकाओं (anterior horn cells) के नष्ट होने से किसकी क्षति होने की सर्वाधिक संभावना है?
उत्तर: (ब) प्रेरक (मोटर) क्रियाएँ।
मेरुरज्जु की अग्र-शृंगी में प्रेरक (मोटर) न्यूरॉनों की कोशिका काय स्थित होती हैं, जो कंकाल पेशियों को संकेत भेजती हैं। इनके नष्ट होने से संबंधित पेशियों तक प्रेरक संकेत पहुँचना बंद हो जाता है, जिससे पक्षाघात (पैरालिसिस) जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है — यह संवेदी क्षति से पूरी तरह अलग तंत्र है।
17NEET 2017 न्यूरोट्रांसमीटर के ग्राही स्थल (receptor sites) कहाँ स्थित होते हैं?
उत्तर: (ब) पश्च सिनेप्टिक झिल्ली (postsynaptic membrane) पर।
न्यूरोट्रांसमीटर, सिनेप्टिक दरार पार करने के बाद पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर स्थित विशिष्ट ग्राहियों से बँधते हैं, जिससे वहाँ आयन-चैनल खुल जाते हैं और एक नया विभव उत्पन्न होता है — यह आवेग को अगले न्यूरॉन तक स्थानांतरित करने की कड़ी है।
18NEET 2017 माइलिन आवरण (myelin sheath) का निर्माण किसके द्वारा होता है?
उत्तर: (ब) श्वान कोशिकाएँ (Schwann cells)।
परिधीय तंत्रिका तंत्र में तंत्रिकाक्ष के चारों ओर श्वान कोशिकाएँ लपेटकर माइलिन आवरण बनाती हैं, जिससे साल्टेटरी संचरण संभव होता है और आवेग-गति काफी तेज़ हो जाती है (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में यह कार्य ऑलिगोडेंड्रोसाइट करती हैं, जो NCERT स्तर पर कम पूछा जाता है)।
19NEET 2018 निसेल कणिकाएँ (Nissl's bodies) मुख्यतः किससे बनी होती हैं?
उत्तर: (स) मुक्त राइबोसोम व खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (RER)।
निसेल कणिकाएँ न्यूरॉन के कोशिका काय में स्थित RER व मुक्त राइबोसोम के समूह हैं, जो प्रोटीन-संश्लेषण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं — न्यूरॉन को अपनी लंबी प्रक्रियाओं के रखरखाव व न्यूरोट्रांसमीटर-संबंधी प्रोटीनों के निर्माण हेतु निरंतर उच्च प्रोटीन-संश्लेषण चाहिए।
20NEET 2018 निम्नलिखित में से कौन-सी संरचना/क्षेत्र उसके कार्य के साथ गलत सुमेलित है?
उत्तर: (ब) — लिम्बिक तंत्र का "गति (movement) का नियंत्रण" के साथ जोड़ा जाना गलत है।
लिम्बिक तंत्र वास्तव में मस्तिष्क के विभिन्न भागों को जोड़ने वाले तंतु-पथों से बना है, जो लैंगिक व्यवहार, उत्तेजना, आनंद, क्रोध व भय जैसी भावनाओं की अभिव्यक्ति व नियमन में भूमिका निभाता है — गति-नियंत्रण इसका कार्य नहीं है (यह कार्य मुख्यतः अनुमस्तिष्क व प्रमस्तिष्क वल्कुट का है)। शेष तीनों सुमेलन सही हैं।
21NEET 2022 Phase 1 सिनेप्स (Synapse) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
उत्तर: (स) — यह कथन गलत है।
विद्युत सिनेप्स में वास्तव में दोनों न्यूरॉनों की झिल्लियाँ आपस में इतनी करीब व जुड़ी रहती हैं कि विद्युत धारा (आयनिक धारा) सीधे एक कोशिका से दूसरी में प्रवाहित हो सके, जिससे संचरण लगभग तात्क्षणिक होता है — रासायनिक सिनेप्स के विपरीत, जहाँ दोनों झिल्लियों के बीच स्पष्ट सिनेप्टिक दरार होती है।
22NEET 2024 निम्नलिखित सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें — (A) पोंस (B) हाइपोथेलेमस (C) मेडुला (D) अनुमस्तिष्क — कार्यों के साथ।
उत्तर: (ब) — पोंस मस्तिष्क के विभिन्न भागों को जोड़ता है; हाइपोथेलेमस में न्यूरोस्रावी कोशिकाएँ होती हैं; मेडुला श्वसन व जठर-स्रावों को नियंत्रित करता है; तथा अनुमस्तिष्क न्यूरॉनों हेतु अतिरिक्त स्थान देने के साथ-साथ मुद्रा व संतुलन को नियमित करता है।
यह "मस्तिष्क भाग → कार्य" सुमेलन NEET में हर वर्ष किसी न किसी रूप में दोहराया जाता है — प्रत्येक भाग का एक ही सबसे विशिष्ट पहचान-बिंदु याद रखना सबसे कारगर रणनीति है।
23NEET 2024 दो कथनों पर विचार करें — कथन-I: प्रमस्तिष्क गोलार्ध कॉर्पस कैलोसम नामक तंत्रिका-पथ द्वारा आपस में जुड़े हैं। कथन-II: मस्तिष्क स्तंभ (brain stem) मेडुला ऑब्लांगेटा, पोंस तथा प्रमस्तिष्क से मिलकर बना है। सही उत्तर चुनें।
उत्तर: (ब) — कथन-I सही है, किंतु कथन-II गलत है।
कॉर्पस कैलोसम वास्तव में दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्धों को जोड़ने वाला तंत्रिका-पथ है (कथन-I सही)। किंतु मस्तिष्क स्तंभ वास्तव में मेडुला ऑब्लांगेटा, पोंस तथा मध्य मस्तिष्क से मिलकर बनता है, प्रमस्तिष्क से नहीं — प्रमस्तिष्क मस्तिष्क स्तंभ का भाग नहीं माना जाता (कथन-II गलत)।
24ReNEET 2026 निम्नलिखित में से कौन-सा मानव केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) का भाग नहीं है?
उत्तर: (स) कपालीय तंत्रिकाएँ — ये CNS का भाग नहीं हैं।
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) में केवल मस्तिष्क व मेरुरज्जु शामिल हैं — मस्तिष्क के सभी उप-भाग (जैसे अनुमस्तिष्क) भी इसी में गिने जाते हैं। किंतु कपालीय व मेरू तंत्रिकाएँ परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) का भाग हैं, जो CNS को शरीर के बाकी हिस्सों से जोड़ती हैं।
25NEET 2026 सिनेप्स में न्यूरोट्रांसमीटर हेतु विशिष्ट ग्राही (receptors) कहाँ उपस्थित होते हैं?
उत्तर: (ब) पश्च सिनेप्टिक झिल्ली (postsynaptic membrane) पर।
यह प्रश्न NEET 2017 में भी लगभग इसी रूप में पूछा जा चुका है — न्यूरोट्रांसमीटर सिनेप्टिक दरार पार करके पश्च सिनेप्टिक झिल्ली के विशिष्ट ग्राहियों से बँधते हैं, जहाँ वे नए आयन-चैनल खोलकर अगला विभव उत्पन्न करते हैं।
✦ अन्य NEET संबंधित तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु, जो अक्सर विकल्पों में उलझन पैदा करते हैं
- पश्च मस्तिष्क बनाम अग्र मस्तिष्क को कभी न उलझाएँ — पश्च मस्तिष्क: पोंस, अनुमस्तिष्क, मेडुला। अग्र मस्तिष्क: सेरीब्रम, थेलेमस, हाइपोथेलेमस। "थेलेमस/हाइपोथेलेमस पश्च मस्तिष्क का भाग है" जैसा कथन हमेशा गलत होता है — यह AIPMT 2012 में सीधे पूछा जा चुका है।
- न्यूरोट्रांसमीटर व उनसे जुड़े रोग — डोपामिन की कमी: पार्किंसन रोग (गति-नियंत्रण, कंपन); एसीटिलकोलिन की कमी: अल्जाइमर रोग (स्मृति-ह्रास)। दोनों को आपस में बदलना NEET का एक क्लासिक भ्रामक विकल्प है।
- निसेल कणिकाएँ = RER + मुक्त राइबोसोम — ये न्यूरॉन के कोशिका काय में स्थित होती हैं, तंत्रिकाक्ष या द्रुमाक्ष्य में नहीं। यह तथ्य 2003, 2018 व अन्य वर्षों में बार-बार पूछा जा चुका है।
- विरामकला विभव बनाम क्रियात्मक विभव — विरामावस्था में K⁺ भीतर अधिक व Na⁺ बाहर अधिक (झिल्ली ध्रुवीकृत, भीतरी सतह ऋणात्मक)। उद्दीपन पर Na⁺ का तीव्र अंतर्वाह झिल्ली को विध्रुवित कर देता है (भीतरी सतह अस्थायी रूप से धनात्मक)। यह दिशा (K⁺ बाहर बनाम Na⁺ भीतर) उलटकर पूछना NEET का सबसे पुराना व सबसे बार दोहराया गया ट्रैप है।
- माइलिन आवरण किसने बनाया — परिधीय तंत्रिका तंत्र में श्वान कोशिकाएँ माइलिन आवरण बनाती हैं; केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में यह कार्य ऑलिगोडेंड्रोसाइट करते हैं। NCERT स्तर पर मुख्यतः श्वान कोशिका ही पूछी जाती है।
- NEET विश्लेषण के अनुसार इस अध्याय से प्रतिवर्ष औसतन 2–4 प्रश्न (लगभग 3% वेटेज) आते हैं, जिनमें न्यूरॉन की संरचना/निसेल कणिकाएँ, विरामकला व क्रियात्मक विभव, सिनेप्टिक संचरण, तथा मस्तिष्क के भागों व उनके कार्यों का सुमेलन सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले उप-विषय रहे हैं — पिछले 20+ वर्षों में इसी पैटर्न की पुनरावृत्ति सबसे अधिक देखी गई है।
✓ संक्षिप्त सार
समन्वय व तंत्रिका तंत्र
तंत्रिका तंत्र समन्वयी तथा एकीकृत क्रियाओं के साथ ही अंगों की उपापचयी व समस्थैतिक क्रियाओं का नियंत्रण करता है। मानव तंत्रिका तंत्र केंद्रीय (CNS) व परिधीय (PNS) में बँटा है।
न्यूरॉन व तंत्रिका आवेग
न्यूरॉन की झिल्ली सांद्रता प्रवणता के कारण उत्तेजक होती है। विरामकला विभव, विध्रुवीकरण व पुनर्ध्रुवीकरण के क्रम से तंत्रिका आवेग उत्पन्न व संचरित होता है।
सिनेप्स
पूर्व व पश्च सिनेप्टिक न्यूरॉन की झिल्लियाँ सिनेप्स बनाती हैं। रासायनिक सिनेप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर के ज़रिए, जबकि विद्युत सिनेप्स पर सीधे विद्युत धारा द्वारा संचरण होता है।
अग्र मस्तिष्क
सेरीब्रम, थेलेमस व हाइपोथेलेमस से बना। हाइपोथेलेमस तापक्रम, खाने-पीने का नियंत्रण करता है; लिंबिक तंत्र भावनाओं व लैंगिक व्यवहार से संबंधित है।
मध्य व पश्च मस्तिष्क
मध्य मस्तिष्क दृष्टि-श्रवण एकीकरण से जुड़ा है। पश्च मस्तिष्क (पोंस, अनुमस्तिष्क, मेडुला) संतुलन व जीवन-रक्षक क्रियाओं का केंद्र है।
मस्तिष्क स्तंभ
मध्य मस्तिष्क, पोंस व मेडुला मिलकर मस्तिष्क स्तंभ बनाते हैं, जो मस्तिष्क व मेरु रज्जु के बीच संयोजन स्थापित करता है।
? प्रश्न-उत्तर
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प्रश्न 1 निम्नलिखित संरचना का संक्षेप में वर्णन कीजिए — मस्तिष्क
मस्तिष्क हमारे शरीर का केंद्रीय सूचना-प्रसारण अंग है, जो खोपड़ी द्वारा सुरक्षित रहता है और कपालीय मेनिंजेज (ड्यूरा मैटर, एरेक्नॉइड व पाया मैटर) से घिरा होता है। इसे तीन मुख्य भागों — अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क व पश्च मस्तिष्क — में विभक्त किया जाता है। अग्र मस्तिष्क सेरीब्रम, थेलेमस व हाइपोथेलेमस से बना है और सोचने, याद रखने व स्वैच्छिक क्रियाओं का केंद्र है; मध्य मस्तिष्क दृष्टि-श्रवण एकीकरण से जुड़ा है; पश्च मस्तिष्क (पोंस, अनुमस्तिष्क, मेडुला) शारीरिक संतुलन तथा श्वसन-हृदय जैसी अनैच्छिक जीवन-रक्षक क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
प्रश्न 2 निम्नलिखित की तुलना कीजिए:
(अ) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और परिधीय तंत्रिका तंत्र — केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) में मस्तिष्क व मेरुरज्जु शामिल हैं, जहाँ सूचनाओं का संसाधन व नियंत्रण होता है — यह पूरे तंत्र का "मुख्यालय" है। परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) में वे सभी तंत्रिकाएँ शामिल हैं जो CNS को शरीर के बाकी हिस्सों से जोड़ती हैं, और इसे आगे कायिक व स्वायत्त तंत्रिका तंत्र में बाँटा गया है — यह मूलतः संदेशवाहक की भूमिका निभाता है।
(ब) स्थिर विभव और सक्रिय विभव — स्थिर (विरामकला) विभव वह अवस्था है जब तंत्रिकाक्ष झिल्ली विश्राम में होती है — बाहरी सतह धनावेशित व भीतरी सतह ऋणावेशित रहती है, और यह अवस्था तब तक बनी रहती है जब तक कोई उद्दीपन नहीं मिलता। सक्रिय (क्रियात्मक) विभव तब उत्पन्न होता है जब उद्दीपन के कारण Na⁺ चैनल खुलते हैं और झिल्ली विध्रुवित हो जाती है — यानी भीतरी सतह अस्थायी रूप से धनावेशित हो जाती है; यही तंत्रिका आवेग है।
प्रश्न 3 निम्नलिखित प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए:
(अ) तंत्रिका तंतु की झिल्ली का ध्रुवीकरण — विराम अवस्था में सोडियम-पोटैशियम पंप द्वारा प्रति चक्र 3 Na⁺ बाहर व 2 K⁺ भीतर पहुँचाए जाते हैं, जिससे झिल्ली की बाहरी सतह धनावेशित व भीतरी सतह ऋणावेशित हो जाती है — इसी अवस्था को ध्रुवीकरण कहा जाता है, और इस विभवांतर को विरामकला विभव कहते हैं।
(ब) तंत्रिका तंतु की झिल्ली का विध्रुवीकरण — जब उद्दीपन के कारण झिल्ली के किसी एक स्थल पर Na⁺ के लिए पारगम्यता अचानक बढ़ जाती है, तो Na⁺ तेज़ी से भीतर प्रवेश करते हैं, जिससे उस स्थल पर ध्रुवता उलट जाती है — बाहरी सतह ऋणावेशित तथा भीतरी सतह धनावेशित हो जाती है। इसी प्रक्रिया को विध्रुवीकरण कहते हैं, और इसी से क्रियात्मक विभव (तंत्रिका आवेग) उत्पन्न होता है।
(स) रासायनिक सिनेप्स द्वारा तंत्रिका आवेगों का संवहन — आवेग जब तंत्रिकाक्ष के अंतिम छोर तक पहुँचता है, तो Ca²⁺ आयनों के प्रवेश से सिनेप्टिक पुटिकाएँ झिल्ली की ओर गति करके न्यूरोट्रांसमीटर को सिनेप्टिक दरार में मुक्त करती हैं। ये न्यूरोट्रांसमीटर पश्च सिनेप्टिक झिल्ली के विशिष्ट ग्राहियों से जुड़कर आयन चैनल खोलते हैं, जिससे पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर नया (उत्तेजक या अवरोधक) विभव उत्पन्न हो जाता है, और इस तरह आवेग अगले न्यूरॉन तक पहुँच जाता है।
प्रश्न 4 निम्नलिखित का नामांकित चित्र बनाइए — न्यूरॉन, मस्तिष्क
यह एक चित्रात्मक प्रश्न है। न्यूरॉन के चित्र में कोशिका काय (जिसमें केंद्रक व निसेल ग्रेन्यूल हों), शाखित द्रुमाक्ष्य, लंबा तंत्रिकाक्ष (माइलिन आवरण व रेनवीयर के नोड सहित), तथा अंत में सिनेप्टिक नॉब व सिनेप्टिक पुटिकाएँ दर्शानी चाहिए। मस्तिष्क के समितार्धी (सेजीटल) काट में प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध, कार्पस कैलोसम, थेलेमस, हाइपोथेलेमस, मध्य मस्तिष्क, पोंस, अनुमस्तिष्क, मेडुला तथा मेरुरज्जु के जुड़ाव को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना चाहिए।
प्रश्न 5 निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
(अ) तंत्रीय समन्वयन — यह वह क्रियाविधि है जिसके द्वारा तंत्रिका तंत्र शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं में तालमेल बनाता है, ताकि सभी अंग एक-दूसरे के साथ सुसंगत रूप से कार्य करें। यह त्वरित व बिंदु-दर-बिंदु संचरण द्वारा संभव होता है, और अंतःस्रावी तंत्र के साथ मिलकर समग्र समन्वय-व्यवस्था बनाता है।
(ब) अग्र मस्तिष्क — अग्र मस्तिष्क सेरीब्रम, थेलेमस व हाइपोथेलेमस से बना है। सेरीब्रम सोचने, याद रखने, ऐच्छिक क्रियाओं व संवेदी सूचनाओं के विश्लेषण का केंद्र है; थेलेमस संवेदी-प्रेरक संकेतों का मुख्य संपर्क स्थल है; हाइपोथेलेमस तापमान, भूख-प्यास व हार्मोन स्रवण को नियंत्रित करता है।
(स) मध्य मस्तिष्क — मध्य मस्तिष्क अग्र व पश्च मस्तिष्क के बीच स्थित एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमीन नामक चार लोबनुमा उभार होते हैं, जो दृष्टि व श्रवण से जुड़ी प्रतिवर्ती क्रियाओं के एकीकरण में सहायक हैं।
(द) पश्च मस्तिष्क — पश्च मस्तिष्क पोंस, अनुमस्तिष्क व मेडुला ओब्लोंगेटा से बना है। पोंस मस्तिष्क के विभिन्न भागों को जोड़ता है, अनुमस्तिष्क शारीरिक संतुलन व मुद्रा को नियंत्रित करता है, और मेडुला श्वसन, हृदय-दर व पाचक रस स्राव जैसी अनैच्छिक जीवन-रक्षक क्रियाओं का केंद्र है।
प्रश्न 6 निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए — सिनेप्टिक संचरण की क्रियाविधि
सिनेप्टिक संचरण की क्रियाविधि में सबसे पहले तंत्रिका आवेग तंत्रिकाक्ष के अंतिम छोर तक पहुँचता है, जहाँ Ca²⁺ आयनों के प्रवेश से सिनेप्टिक पुटिकाएँ पूर्व सिनेप्टिक झिल्ली की ओर गति करती हैं और उससे जुड़कर न्यूरोट्रांसमीटर अणुओं को सिनेप्टिक दरार में मुक्त कर देती हैं। ये न्यूरोट्रांसमीटर दरार पार करके पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर स्थित विशिष्ट ग्राहियों से बँध जाते हैं, जिससे वहाँ आयन चैनल खुल जाते हैं और एक नया विभव (उत्तेजक या अवरोधक) उत्पन्न हो जाता है — इस तरह आवेग एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक स्थानांतरित हो जाता है।
प्रश्न 7 (अ) सक्रिय विभव उत्पन्न करने में Na⁺ की भूमिका का वर्णन कीजिए। (ब) सिनेप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर मुक्त करने में Ca²⁺ की भूमिका का वर्णन कीजिए।
(अ) सक्रिय विभव में Na⁺ की भूमिका — विराम अवस्था में तंत्रिकाक्ष झिल्ली Na⁺ के लिए अपेक्षाकृत कम पारगम्य होती है। जैसे ही उद्दीपन प्राप्त होता है, झिल्ली के उस स्थान पर Na⁺ के लिए पारगम्यता अचानक तेज़ी से बढ़ जाती है, जिससे Na⁺ आयन कोशिका के भीतर तेज़ी से प्रवेश करते हैं। इस तीव्र आवक से झिल्ली की ध्रुवता उलट जाती है यानी भीतरी सतह अस्थायी रूप से धनावेशित हो जाती है — यही विध्रुवीकरण है, और इसी से क्रियात्मक (सक्रिय) विभव उत्पन्न होता है, जो आगे तंत्रिकाक्ष की पूरी लंबाई में संचरित होता है।
(ब) न्यूरोट्रांसमीटर मुक्ति में Ca²⁺ की भूमिका — जब तंत्रिका आवेग तंत्रिकाक्ष के अंतिम छोर तक पहुँचता है, तो वहाँ की झिल्ली में Ca²⁺ चैनल खुल जाते हैं और कैल्सियम आयन कोशिका के भीतर प्रवेश करते हैं। यह कैल्सियम प्रवाह सिनेप्टिक पुटिकाओं को प्लाज़्मा झिल्ली की ओर गति करने तथा उससे जुड़ने के लिए उत्तेजित करता है, जिसके फलस्वरूप पुटिकाओं में भरे न्यूरोट्रांसमीटर अणु सिनेप्टिक दरार में मुक्त हो जाते हैं — यह पूरी प्रक्रिया सिनेप्टिक संचरण की पहली और सबसे ज़रूरी कड़ी है।
प्रश्न 8 निम्न के बीच में अंतर बताइए:
(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तंत्रिकाक्ष — आच्छादित (माइलिनेटेड) तंत्रिकाक्ष श्वान कोशिका से बने माइलिन आवरण से ढके रहते हैं, जिनके बीच-बीच में रेनवीयर के नोड नामक अंतराल पाए जाते हैं — ये मेरू व कपाल तंत्रिकाओं में मिलते हैं और इनमें आवेग संचरण तेज़ (साल्टेटरी) होता है। अनाच्छादित तंत्रिकाक्ष भी श्वान कोशिका से घिरे रहते हैं, लेकिन इनके चारों ओर माइलिन आवरण नहीं बनता — ये सामान्यतः स्वायत्त व कायिक तंत्रिका तंत्र में पाए जाते हैं और इनमें आवेग संचरण अपेक्षाकृत धीमा होता है।
(ब) द्रुमाक्ष्य और तंत्रिकाक्ष — द्रुमाक्ष्य (डेंड्राइट) कोशिका काय से निकलने वाले छोटे, शाखित तंतु हैं जो उद्दीपनों को ग्रहण कर कोशिका काय की ओर भेजते हैं — इनमें भी निसेल ग्रेन्यूल पाए जाते हैं। तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) एक न्यूरॉन में केवल एक ही होता है, जो अपेक्षाकृत लंबा होता है और तंत्रिकीय आवेगों को कोशिका काय से दूर सिनेप्स या तांत्रिकीय-पेशी संधि तक पहुँचाता है।
(स) थेलेमस और हाइपोथेलेमस — थेलेमस अग्र मस्तिष्क में संवेदी व प्रेरक संकेतों के लिए मुख्य संपर्क स्थल (relay station) का काम करता है। हाइपोथेलेमस थेलेमस के आधार पर स्थित है और इसमें ऐसे केंद्र होते हैं जो शरीर के तापमान, खाने-पीने की इच्छा को नियंत्रित करते हैं, तथा यह हाइपोथेलेमिक हार्मोन का स्रवण भी करता है।
(द) प्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क — प्रमस्तिष्क (सेरीब्रम) अग्र मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है, जो सोचने, याद रखने, संवेदी विश्लेषण व ऐच्छिक क्रियाओं का केंद्र है, और इसकी सतह पर वल्कुट (कोर्टेक्स) पाया जाता है। अनुमस्तिष्क पश्च मस्तिष्क का भाग है, जो कर्ण की अर्द्धचंद्राकार नलिकाओं व श्रवण तंत्र से सूचनाएँ प्राप्त कर शारीरिक संतुलन व मुद्रा को नियंत्रित करता है — इसकी भूमिका सोचने-समझने की नहीं, बल्कि गति-समन्वय की है।
प्रश्न 9 (अ) मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग कौनसा है? (ब) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का कौनसा भाग मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है?
(अ) मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग प्रमस्तिष्क (सेरीब्रम) है — यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा हिस्सा है और सोचने, तर्क करने, याद रखने, भाषा, संवेदी विश्लेषण तथा ऐच्छिक क्रियाओं जैसे उच्चतर मानसिक कार्यों के लिए ज़िम्मेदार है, जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग बनाते हैं।
(ब) हाइपोथेलेमस में स्थित सुप्राकाइज़्मैटिक न्यूक्लियस (SCN) को मास्टर क्लॉक कहा जाता है, क्योंकि यह शरीर की दैनिक जैविक लय (सर्केडियन रिदम) — जैसे नींद-जागरण चक्र, तापमान चक्र आदि — का नियमन करता है और अन्य अंगों की जैविक घड़ियों को समन्वित रखता है।
प्रश्न 10 निम्न में भेद स्पष्ट कीजिए:
(अ) संवेदी तंत्रिका एवं प्रेरक तंत्रिका — संवेदी (अभिवाही) तंत्रिकाएँ उद्दीपनों को ऊतकों/अंगों से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की ओर ले जाती हैं — यानी संदेश की दिशा शरीर से मस्तिष्क की ओर होती है। प्रेरक (अपवाही/चालक) तंत्रिकाएँ नियामक संकेतों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से संबंधित अंगों तक ले जाती हैं — यानी संदेश की दिशा मस्तिष्क से शरीर की ओर होती है।
(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तंत्रिका तंतु में आवेग संचरण — आच्छादित (माइलिनेटेड) तंतुओं में आवेग रेनवीयर के नोड से नोड तक कूदते हुए (साल्टेटरी संचरण) आगे बढ़ता है, जिससे संचरण की गति काफी तेज़ होती है। अनाच्छादित (अनमाइलिनेटेड) तंतुओं में आवेग झिल्ली की पूरी लंबाई में क्रमिक रूप से आगे बढ़ता है, जिससे संचरण की गति अपेक्षाकृत धीमी रहती है।
(स) कपालीय तंत्रिकाएँ एवं मेरू तंत्रिकाएँ — कपालीय तंत्रिकाएँ सीधे मस्तिष्क से निकलती हैं और इनकी कुल संख्या 12 जोड़ी होती है — ये मुख्यतः सिर व गर्दन के अंगों (आँख, कान, नाक आदि) को नियंत्रित करती हैं। मेरू तंत्रिकाएँ मेरुरज्जु से निकलती हैं और इनकी कुल संख्या 31 जोड़ी होती है — ये शरीर के धड़ व अंगों (हाथ-पैर) को नियंत्रित करती हैं।